बेरोजगारी के इस दौर में साथ छोड़ती फिजा़एँ
0हर रात सोचता हूँ, एक नई सुबह आये, सुबह तो हर रोज़ आती है, पर बैरंग चली आती है फिर सोचा,कि ये रात बदल जाए, पर,ख्वाव वदलकर, सुनसान चली आती
साभार : आईएलओ प्रकाशित पुस्तक “मुक्ति की रह” अनौपचारिक अर्थव्यवस्था मोटे तौर पर इस प्रकार परिभाषित की जा सकती है- ऐसी अर्थव्यवस्था जिसमें अनिगमित उद्यम, अनियत या दिहाड़ी मजदूर है। भारत सहित
देश की सबसे बड़ी समस्या बेरोजगारी पर पटना से “ अनिकेत प्रियदर्शी ” ने अपने विचार जनोक्ति को लिखा है जिन्हें हम यहाँ प्रकाशित कर रहे हैं : बेरोजगारी स्वतंत्र
हर रात सोचता हूँ, एक नई सुबह आये, सुबह तो हर रोज़ आती है, पर बैरंग चली आती है फिर सोचा,कि ये रात बदल जाए, पर,ख्वाव वदलकर, सुनसान चली आती
साभार : आईएलओ प्रकाशित पुस्तक “मुक्ति की रह” अनौपचारिक अर्थव्यवस्था मोटे तौर पर इस प्रकार परिभाषित की जा सकती है- ऐसी अर्थव्यवस्था जिसमें अनिगमित उद्यम, अनियत या दिहाड़ी मजदूर है। भारत सहित
देश की सबसे बड़ी समस्या बेरोजगारी पर पटना से “ अनिकेत प्रियदर्शी ” ने अपने विचार जनोक्ति को लिखा है जिन्हें हम यहाँ प्रकाशित कर रहे हैं : बेरोजगारी स्वतंत्र