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	<title>JANOKTI : जनोक्ति :  राज-समाज और जन की आवाज &#187; sex in indian philosophy</title>
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		<title>सेक्स चिंतन -7</title>
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		<pubDate>Sun, 12 Sep 2010 06:25:34 +0000</pubDate>
		<dc:creator>जयराम "विप्लव"</dc:creator>
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		<description><![CDATA[प्रिय आत्मन ! सेक्स चिंतन की कड़ियाँ पिछले कुछ महीनों से जुड़ नहीं पा रही थी &#124; आज थोड़ी फुरसत में कुछ मानवोपयोगी तथ्यों के आलोक में इस श्रृंखला को आगे बढा रहा हूँ &#124; अब तक सेक्स चिंतन की ]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;">प्रिय आत्मन !</p>
<p style="text-align: justify;"><span style="color: #000080;"><strong><a rel="attachment wp-att-6841" href="http://www.janokti.com/%e0%a4%b8%e0%a5%87%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b8/%e0%a4%b8%e0%a5%87%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b8-%e0%a4%9a%e0%a4%bf%e0%a4%82%e0%a4%a4%e0%a4%a8-7/attachment/love-sex-kamsutra/"><img class="alignright size-medium wp-image-6841" title="love -sex-kamsutra" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2010/09/love-sex-kamsutra-300x294.jpg" alt="" width="300" height="294" /></a><a href="http://www.janokti.com/category/%E0%A4%B8%E0%A5%87%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%B8/">सेक्स चिंतन</a></strong></span><a href="http://www.janokti.com/category/%E0%A4%B8%E0%A5%87%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%B8/"> </a>की कड़ियाँ पिछले कुछ महीनों से जुड़ नहीं पा रही थी | आज थोड़ी फुरसत में कुछ मानवोपयोगी तथ्यों के आलोक में इस श्रृंखला को आगे बढा रहा हूँ | अब तक <strong><a href="http://www.janokti.com/category/%E0%A4%B8%E0%A5%87%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%B8/">सेक्स चिंतन</a></strong><a href="http://www.janokti.com/category/%E0%A4%B8%E0%A5%87%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%B8/"> </a>की कड़ियाँ पढ़ते आये पाठकों को अधिक विस्तार से भूमिका समझाने की आवश्यकता नहीं है | हाँ , जो लोग प्रथम दृष्टया इस चिंतन में भागीदारी कर रहे हैं उनसे आग्रह है कि वो <strong><a href="http://www.janokti.com/%E0%A4%B8%E0%A5%87%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%B8/%E0%A4%B8%E0%A5%87%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%B8-%E0%A4%9A%E0%A4%BF%E0%A4%82%E0%A4%A4%E0%A4%A8-6/">इस लिंक पर जाकर संलेख</a></strong> की पृष्ठभूमि समझ लें !</p>
<p style="text-align: justify;">काम संस्कृत शब्द है जिसका अर्थ है आनंद की इच्छा या आकांक्षा। काम का अर्थ सीधे-सीधे सेक्स या सम्भोग से लगाया जाता है | आप सभी ने कामदेव के बारे में सुना होगा जिन्होंने ध्यानस्थ योगराज भगवान् शिव के मन में वैराग्य की जगह राग-रंग अर्थात कामेच्छा उत्पन्न करने हेतु अपने प्राणों का बलिदान किया था | प्रेम का नाम आते हीं सबसे पहले कामदेव और उनकी पत्नी रति का नाम आता है | इन्हीं कामदेव को प्रेम का देवता कहा गया है और इन्हीं के नाम का अग्रांश से &#8221; काम &#8221; शब्द की उत्पत्ति समझी जाती है | <a href="http://www.janokti.com/category/%E0%A4%B8%E0%A5%87%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%B8/">कामशास्त्र</a> , काम अर्थात स्थूल अर्थों में संभोग और प्रेम करने की कला का शास्त्र है।   कामशास्त्र में काम उस सुखानुभूति को कहते हैं जो सफल सम्भोग से नायक नायिका (नर-नारी ) को प्राप्त होता हैं अर्थात स्त्री &#8211; पुरुष सफल सम्भोग से जिस आनंद को प्राप्त करते हैं वहीँ काम हैं | सफल सम्भोग से प्राप्त सुख को पाने की प्रबल इच्छा भी काम हैं | अर्थात सफल सम्भोग से स्त्री &#8211; पुरुष आत्मसंतुष्टि आत्मानंद का अनुभव करते हैं , इस आनंद को प्राप्त करने की जो अभिलाषा होती हैं उसे ही शास्त्रों में काम कहा गया हैं |</p>
<p style="text-align: justify;">हिंदू जीवन दर्शन में काम की भूमिका एवं उसके महत्व को सहज भाव से स्वीकारा गया है। उसे न तो गोपनीय रखा गया और न ही वर्जित करार दिया गया। इतनी महत्वपूर्ण बात जिससे सृष्टि जन्मती और मर जाती है इससे कैसे बचा जा सकता है   किन्तु पाश्‍चात्‍य चिंतन में नर &#8211; नारी के दैहिक मिलन को ही सेक्‍स, काम, प्रेम का आधार माना गया है। प्रेम शरीर से ही आरम्‍भ होता है। शरीर ही प्रेम की जन्‍मभूमि है। जिन पाश्‍चात्‍य चिन्‍तकों ने ‘सेक्‍स&#8217; पर विचार किया है उनमें निम्‍नलिखित चिन्‍तकों के नाम अधिक महत्‍वपूर्ण हैं -, 1.सिग्‍मंड फ्रायड ( 1856 &#8211; 1939 ), 2.डी.एच.लारेंस ( 1885 &#8211; 1930 ), 3.अल्‍फ्रेड चार्ल्‍स किंजी ( 1894 &#8211; 1956 ), 4.माइकेल फकोल्‍ट ( 1929 &#8211; 1984 ),</p>
<p style="text-align: justify;"><strong><span style="color: #000080;">पश्चिम के सेक्स सम्बन्धी चिंतन और भारतीय चिंतन में अंतर पर  प्रो0 महावीर सरन जैन के विचार : -</span></strong></p>
<p style="text-align: justify;">पाश्‍चात्‍य चिन्‍तकों के सेक्‍स सम्‍बंधी चिन्‍तन का सार यह है कि सेक्‍स नर नारी का शारीरिक मिलन है, सेक्‍स दैहिक, सांसारिक एवं स्‍थूल कर्म है, सेक्‍स नर नारी के बीच रुधिर का संवाद है अथवा रुधिर की ऊष्‍मा से परिणत सहज सम्‍भोग है। सम्‍भोग की सहज वृत्‍ति से भयभीत होना, सम्‍भोग की सहज वृत्‍ति से पलायन करना, सम्‍भोग की सहज वृत्‍ति से विमुख होना अस्‍वास्‍थकर है। संक्षेप में यह कहा जा सकता है कि सेक्‍स सम्‍बंधी पाश्‍चात्‍य चिन्‍तन कामाकुल एर्न्‍द्रिय संवेगों की शारीरिक वास्‍तविकता के चारों ओर चक्‍कर लगाता है।, <a href="http://www.janokti.com/category/%E0%A4%B8%E0%A5%87%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%B8/">भारतीय चिन्‍तन में</a> ‘काम&#8217; को उसके मूल स्‍वरूप में स्‍वीकार किया गया है एवं उसे सम्‍मान भी दिया गया है। धर्म, अर्थ, काम एवं मोक्ष की चार उपलब्‍धियों में से एक उपलब्‍धि ‘काम&#8217; भी है किन्‍तु उसका स्‍थान धर्म एवं अर्थ के बाद है तथा काम ही जीवन की मंजिल नहीं है, उसकी एकान्‍तिक सत्‍ता नहीं है, काम से मोक्ष की दिशा में उन्‍मुख होना है। धर्म से विवेक प्राप्‍त होता है, संयम प्राप्‍त होता है, दायित्‍व बोध होता है, कर्तव्‍य पालन होता है। अर्थ व्‍यक्‍ति को पुरुषार्थी, सम्‍पन्‍न, समर्थ, सक्षम बनाता है। इसके बाद ही गार्हस्‍थ जीवन का विधान है जिसमें पुरुष एवं स्‍त्री के बीच प्रजनन के पावन उद्‌देश्‍य से मर्यादित काम का प्रेम में पर्यवसान होता है। प्रेम प्रसंगों के गति पथ की सीमा शरीर पर आकर रुक नही जाती, शरीर के धरातल पर ही निःश्‍ोष नहीं हो जाती अपितु प्रेममूलक एर्न्‍द्रिय संवेगों की भावों में परिणति और भावों का विचारों में पर्यवसान तथा विचारों एवं प्रत्‍ययों का पुनः भावों एवं संवेगों में रूपान्‍तरण &#8211; यह चक्र चलता रहता है। काम ऐन्‍द्रिय सीमाओं से ऊपर उठकर अतीन्‍द्रिय उन्‍नयन की ओर उन्‍मुख होता है। प्रेम शरीर में जन्‍म लेता है लेकिन वह ऊर्ध्‍व गति धारण कर प्रेमी प्रेमिका के मन के आकाश की ओर उड्‌डीयमान होता है।, भारतीय पौराणिक मान्‍यता के अनुसार काम ही कामदेव हैं और उनकी पत्‍नी रति हैं। काम और रति के सहयोग से संसृति का आकार बनता है। ये दोनों सृष्‍टि के पूर्व विद्‌यमान थे। इन्‍हीं से सृष्‍टि के समस्‍त पदार्थ उत्‍पन्‍न हुए। प्रश्‍नोपनिषद्‌ में वर्णित है कि कात्‍यायन कबंधी के आचार्य पिप्‍पलाद से यह प्रश्‍न करने पर कि सृष्‍टि में जो कुछ दृष्‍टिगोचर है वह आदि में किससे उत्‍पन्‍न हुआ आचार्य ने उत्‍तर दिया -, तस्‍मै स होवाच प्रजाकामो वै प्रजापतिः।, स तपोऽतप्‍यत स तपस्‍तप्‍त्‍वा स मिथुनमुत्‍पादयत।, रयिं च प्राणं चेत्‍येतौ मे बहुधा प्रजाः करिष्‍यत इति।, ( अधीश्‍वर प्रजापति को जब प्रजा उत्‍पन्‍न करन की कामना हुई तो उन्‍होने तप किया। तप के बाद उन्‍होंने ‘मिथुन&#8217; &#8211; द्वित्‍व, युग्‍म, जोड़ा &#8211; उत्‍पन्‍न किया। यह मिथुन रयि = रति एवं प्राण = काम है। यही मेरी विविध प्रकार की प्रजा उत्‍पन्‍न करेंगे। ) काम प्राण शक्‍ति एवं रयि रति शक्‍ति के प्रतीक हैं।, भारतीय साधना का यह वैशिष्‍ट्‌य है कि यह काम का पर्यवसान मोक्ष में मानती है। कामाध्‍यात्‍म काम = भोग एवं अध्‍यात्‍म = मोक्ष का एकीकरण है जो सिद्धों का मार्ग है। भारतीय तंत्र साधना का सार है कि रति के आनन्‍द से, कामानन्‍द से, संभोग के आनन्‍द से ब्रह्मानन्‍द की प्राप्‍ति सम्‍भव है। इसके लिए तांत्रिक योग का आश्रय लेते हैं जिसका फलितार्थ होता है कि साधारण अवस्‍था में तो जगत के जीव जन्‍तु अधोलिंग ही रहते हैं, कुण्‍डलिनी शक्‍ति के प्रबुद्‌ध होने पर ये ऊर्ध्‍वलिंग के रूप में आ सकते हैं अर्थात्‌ कुण्‍डलिनी शक्‍ति के उद्‌बोधन के बिना जीव की ऊर्ध्‍वगति नहीं हो सकती।, खजुराहो में मिथुनाचार को अंकित करने वाली विभिन्‍न प्रतिमाओं के कलात्‍मक बोध से यह प्रतीति होती है कि ये प्रतिमायें नर नारी के दैहिक मिलन की विभिन्‍न भंगिमाओं का जीता जागता अंकन ही नहीं हैं, जीवन के उत्‍साह, उछाह, उमंग, उल्‍लास, कर्मण्‍यता, जीवंतता, आशावाद, प्रेरणा एवं सक्रियता की अनुपम उत्‍प्रेरक कला कृतियाँ भी हैं।, जिनका मन विषय वासना से लीन हे, काम कुंठाओं से ग्रसित है उन्‍हें ये पाषाण प्रतिमायें गर्हित, अश्‍लील, कुत्‍सित नजर आती हैं मगर सिद्ध साधकों को ये मैथुनाचार में रत शिव शक्‍ति के द्वैत से अद्वैत की ओर उन्‍मुख होने वाली मनः स्‍थिति की प्रतीक प्रतीत होती हैं। सहज एवं स्‍वस्‍थ्‍य चित्‍त वाले गुणग्राहक एवं कलाप्रेमी का येे प्रतिमायें भोग एवं प्रेम से उपलब्‍ध परितुष्‍टि एवं परितृप्‍ति तथा प्रशांत एवं एकाग्रचित्‍तता की सौन्‍दर्यपूर्ण कलात्‍मक अभिव्‍यक्‍तियाँ लगती हैं। एक स्‍वस्‍थ एवं तटस्‍थ द्रष्‍टा को भी मैथुनाचार में रत प्रतिमाओं के मुखमंडल पर असंयमित वासना की कुरूपता एवं पाशविकता नजर नहीं आती अपितु उसे इन प्रतिमाओं के मुखमंडल पर अखंड एवं अविचल शान्‍ति, सुखप्रदायक परितृप्‍ति एवं संतुष्‍टि तथा भावपूर्ण प्रसन्‍नता एवं मुदिता अवलोकित होती है।</p>
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		<title>खुले आम सजता..देह का बाज़ार&#8230;&#8230;</title>
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		<pubDate>Sat, 04 Sep 2010 05:51:50 +0000</pubDate>
		<dc:creator>पूजा सिंह आदर्श</dc:creator>
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		<description><![CDATA[शाम हुई सज गए&#8230;&#8230;&#8230; कोठों के बाज़ार, मन का गाहक न मिला बिका बदन सौ बार। ये शेर मैंने एक बार किसी कवि सम्मलेन में सुना था,जिसमे मुझे कई नामचीन कविओं और शायरों को सुनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ था। ]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<div>
<div><a rel="attachment wp-att-6514" href="http://www.janokti.com/%e0%a4%85%e0%a4%82%e0%a4%a7%e0%a5%87%e0%a4%b0-%e0%a4%a8%e0%a4%97%e0%a4%b0%e0%a5%80/%e0%a4%96%e0%a5%81%e0%a4%b2%e0%a5%87-%e0%a4%86%e0%a4%ae-%e0%a4%b8%e0%a4%9c%e0%a4%a4%e0%a4%be-%e0%a4%a6%e0%a5%87%e0%a4%b9-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%ac%e0%a4%be%e0%a5%9b%e0%a4%be%e0%a4%b0/attachment/pross/"><img class="alignleft size-medium wp-image-6514" title="pross" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2010/09/pross-300x300.jpg" alt="" width="300" height="300" /></a>शाम हुई सज गए&#8230;&#8230;&#8230; कोठों के बाज़ार,<br />
मन का गाहक न मिला बिका बदन सौ बार।</div>
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<div>ये शेर मैंने एक बार किसी कवि सम्मलेन में सुना था,जिसमे मुझे कई नामचीन कविओं और शायरों को सुनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ था। शेर तो याद रहा लेकिन कवि नाम याद नहीं&#8230;खैर इससे कोई विशेष फर्क नहीं पड़ता&#8230;इसका मतलब समझने की जरुरत है कि कितनी गहरी बात छुपी है इस शेर में&#8230;..उस insan की पीड़ा छुपी है जिसे अपना बदन बेचने जैसा घिनौना काम करना पड़ता है&#8230;..कहने को तो लिखने के लिए ये कोई नया मुद्दा नहीं है पर फिर भी ये वो मुद्दा है जिसपर,लिखना जरूरी है और लगातार लिखा भी जाना चाहिए। मानवीय संवेदनाओं के चलते कुछ सामाजिक समस्याओं के प्रति हम उतने गंभीर नहीं होते जितना हमें होना चाहिए बस यही सोच कर रह जातें हैं कि अरे&#8230;.इसपर तो कई बार और बहुत कुछ लिखा जा चुका है। लेकिन अपने दायित्व से पीछे न हटते हुए आज उस विषय पर कलम चलाने की सोची जो एक लड़की होने के नाते भी मुझे लिखने पर मजबूर करता है। मेरा ये लेख समर्पित है उन लड़किओं और महिलाओं के नाम जो अपना और अपने परिवार का पेट भरने के लिए उस दल-दल में घुसने को मजबूर हो जाती हैं जिसे समाज ने वैश्यावृति का नाम दिया है।वैश्यावृति हमारे लिए कोई नयी चीज़ नहीं है ये कई सौ साल पहले भी होती थी और आज भी होती है &#8230;.वेश्यालयों को संरक्षण तब भी मिलता था और आज भी मिलता है&#8230;&#8230;.इससे आने वाली सड़ांध पूरे समाज को दूषित करती है ये जानते तो सब हैं पर मानता कोई नहीं &#8230;&#8230;पर न मानने से सच झूठ में तो नहीं बदला करता &#8230;.<br />
हर शहर में एक ऐसी बदनाम जगह जरूर होती है जिसे इस सभ्य समाज ने रेड लाइट एरिया का नाम दिया है। यहाँ शाम होते ही सज जाती है बेजान जिस्मो की मंडी,,,बेजान इस लिए कहा क्योंकि जान तो है पर आत्मा नहीं है,जिस काम को करने में आत्मा साथ न दे उसे और क्या कहा जाएगा??????अभी कुछ दिन पहले ही हमारे मेरठ शहर में यहाँ के रेड लाइट एरिया से पुलिस ने छापा मारकर करीब सात नेपाली लड़किओं को इस दल-दल से बाहर निकाला यहाँ से बरामद सभी लड़कियां नाबालिग थी और सभी की उम्र १६-१७ साल से जयादा नहीं थी। इन सभी लड़किओं को नेपाल से भारत काम दिलाने के बहाने से बहला-फुसलाकर लाया गया था। ये सब लड़कियां गरीब घरों की थी जिन्हें काम की बेहद जरुरत थी और इनकी इसी मजबूरी का फ़ायदा उठाकर,,,,जिस्म के दलालों ने इनकी इज्ज़त का सौदा करके ,इन्हें ये नरक भोगने के लिए छोड़ दिया। जहाँ हवस के भूखे भेड़िये इनके जिस्म को दिन रात नोचतें हैं। दलालों की इस मंडी में सब कुछ बिकता है&#8230;&#8230;जिस्म के साथ आत्मा,इंसानियत ,भावनाएं ।इस दुनिया में सब कुछ बिकाऊ है, इसलिए इन सब के खरीदार मिल जायेंगे आपको। किसी को इस बात से कोई सरोकार नहीं है कि कोई इस घिनौने काम को क्यों कर रहा है बस अपना मतलब निकलना चाहिए। अब क्या होगा इन लड़किओं का,,,क्या ये समाज में सर उठा कर जी पाएंगी&#8230;.क्या इनके घर वाले इन्हें अपनाएंगे??कौन तो इन्हें काम देगा??कौन इनका हाथ थामेगा????एक बड़ा सवाल हम सब के लिए&#8230;&#8230;&#8230;<br />
मुझे नहीं नहीं लगता की कोई भी औरत शौकिया इस काम को करती होगी ,किसी भी औरत को खुद को धंधेवाली कहलवाना पसंद होगा&#8230;.इससे बड़ा दाग तो उसके लिए हो ही नहीं सकता। अपने घर-परिवार को पालने,अपने बच्चों को दो वक़्त की रोटी खिलाने के लिए उसे इस कीचड में उतरना ही पड़ता है। कोई भी माँ अपने बच्चे को भूख से बिलखते हुए नहीं देख सकती जब उसके पास कोई और रास्ता नहीं बचता तो अंत में उसे अपना जिस्म ही याद आता है,कि इसे ही बेच कर ही अपने बच्चे या घरवालों का पेट भर सके। क्यों??? आखिर???क्यों&#8230;. हम अपने को सभ्य कैसे कह सकते हैं जब हम किसी की मजबूरी का फ़ायदा उठा कर उससे वो काम कराएँ जिसे इस सभ्य समाज में सबसे ख़राब नजरों से देखा जाता है। न जाने कितनी मासूम लड़किओं को रोजाना इस दल-दल में धकेल दिया जाता है इनमे से शायद ही कोई खुशनसीब लड़की होती होगी जिसे इस नरक से समय रहते मुक्ति मिल जाए। पर मुक्ति मिलने से भी क्या होगा??????????????क्या ये समाज इन्हें वही इज्ज़त देगा जो इन्हें मिलनी चाहिए?????????????एक गंभीर सवाल पूरे समाज के लिए&#8230;.???????<br />
जो महिला इस गंदगी से बाहर निकलना चाहती है&#8230;.क्या उसके पुनर्वास की कोई व्यवस्था नहीं होनी चाहिए&#8230;&#8230;क्या इस समाज में इनके लिए कोई जगह नहीं है।इनके मासूम बच्चों को इस गंदगी से निकालना क्या हमारा कर्त्तव्य नहीं है??हम क्या दे सकतें हैं इन्हें&#8230;.इन सब के उत्तर हमे खोजने हैं अभी&#8230;.लेकिन जल्द और समय रहते।</div>
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		<title>क्या गलत है सेक्स शिक्षा  ?</title>
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		<pubDate>Mon, 30 Aug 2010 15:20:02 +0000</pubDate>
		<dc:creator>रोहित कश्यप</dc:creator>
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		<description><![CDATA[आज लिखने तो बैठ गया हूँ, पर अपने को यह समझा नहीं पा रहा हूँ की आखिर आज का विषय क्या होगा ? कुछ सोचने की कोशिश करता हूँ तो लगता है अरे मेरे पास तो ढ़ेरों विषय हैं &#124; ]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><strong><img class="alignleft size-medium wp-image-6396" title="sex" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2010/08/sex-300x219.jpg" alt="" width="300" height="219" />आज लिखने तो  बैठ गया हूँ, पर अपने को यह समझा नहीं पा रहा हूँ की आखिर आज का विषय क्या  होगा ? कुछ सोचने की कोशिश करता हूँ तो लगता है अरे मेरे पास तो ढ़ेरों  विषय हैं | ज्यादा सोचना नहीं है , बस अब माउस हाथ में आ गया है और कीबोर्ड  भी कह रहा है की कुछ लिख ही दो भाई, ज्यादा सोचो विचारो नहीं ? मैं भी  आखिर में इनकी ही बात मान रहा हूँ और फिर से कुछ लिखने को प्रतिबद्ध हो रहा  हूँ ? पर कहा जाता हैं न डीजल इंजन को गर्माने में थोड़ा समय लगता है तो  वही मुझे भी लग रहा है | रोज की तरह  राजनीत और अर्थनीत पर लिखने से आज मैं  परहेज करने के मूड में हूँ | आज मैं सेक्स पर कुछ लिखने जा रहा हूँ | सही  में देखें तो अभी भी हमारे समाज में यह एक विचाराधीन मुद्दा ही है | लोग  अभी भी इसके बारे में खुल कर बात नहीं करते हैं , आखिर करें भी तो कैसे  अपने को सभ्य जो कहते हैं | इस तरह की बातों से उनकी असलियत बाहर आने का जो  डर लगा रहता है | पर जहाँ तक मेरा मानना है आज जितना लोग कहते फिर रहे हैं  की यह बड़ा ही ख़राब मुद्दा है उतनी तेजी से ही यह बढ़ता जा रहा है | पहले  अक्सर देखा जाता था की लोग शादी के बाद ही रतिक्रिया में भाग लेते थे | एक  दो प्रतिशत ही इसके अपवाद थे | फिर यह कॉलेज तक आ पहुंचा | अब कॉलेज के  विद्यार्थी इसमें भाग लेने लगे | समय बड़ी तेजी से घुमा और हायर सेकेन्ड्री  स्तर के स्टुडेंट इसमें शरीक होने लगे | पर कहते हैं न तकनीक ने सबको पीछे  छोड़ दिया है आज तो क्या बताएं बच्चे-बच्चे इसमें मशगुल हैं | तो कहिये  क्या यह छुपाने की बात है | अब इसका दूसरा पहलु लोग कहते हैं की आदमी एक  उम्र के बाद सेक्स की गतिविधि से दूर हो जाता है लेकिन मैं इस मान्यता के  बिल्कुल खिलाफ हूँ | अरे साहेब मैंने खुद देखा है की ऐसी उम्र में लोग और  रसिक हो जाते हैं | वो ऐसा खुलेआम करते हैं , क्यूंकि उनको तो इस चीज़ की  फ़िक्र रहती ही नहीं है की उनपर भी कोई शक करेगा | तो बतायिया जब बच्चे और  बूढ़े दोनों इस कम में पीछे नहीं हैं तो फिर इस तरह की बात छिपाना किससे| एक  वाक्य लिखने की चाहत है और लिख ही देता हूँ | मैं बिहार का रहने वाला हूँ |  हमारे यहाँ एक ठाकुर बाबा हैं | समाज में उनकी बड़ी ही इज्जत है , धार्मिक  कार्यों में सबसे आगे रहते हैं | लेकिन उनकी एक दूसरी स्थिति भी है , वो  बड़े ही सेक्सी विचारधारा के भी हैं | एक बार उन्होंने मुझे और मेरे  दोस्तों को एक लड़की की ओर  इशारा करके कहा का देखते क्या हो  ??????????????? अब आप समझ ही गए होंगे क्या बात कहना चाह रहे थे वो | एक  दिन मुझसे मिले जब मैं दिल्ल्ली से घर आया था तो कहा क्या बेटा वहां कुछ  हुआ की सब जगह मरुस्थल ही है | और तो और उन्होंने मुझसे यह भी मांग कर डाली  की मुझे ब्लू फिल्म दिखाओ |  अब आप ही बताओ क्या है ? यह दबी कुची भावना  है लेकिन सिर्फ डर से बाहर नहीं आती है | आज भी जब कोई जवान लड़की सड़क पे  मटक कर चलती है तो देखने वाले सबसे पहले उसे सेक्स की दृष्टी से ही देखते  हैं | कहना होता है उनका मस्त माल है , मज़ा आ जायेगा | आप ही बताओ क्या ऐसा  सही में नहीं होता है | मैं ज्यादातर की बात करता हूँ | मैंने कई लोगों को  देखा है जो दिन में तो इसके विरुद्ध आन्दोलन निकालते रहते हैं , समाज  सुधार के प्रणेता बनने का ढोंग रचते हैं ,लेकिन रात के अँधेरे में वही हरकत  कर बैठते हैं | दुनिया के बहुत से देशों में सेक्स की शिक्षा दी जाती है  और वह ठीक है | वैसे भी लोग जानकारी ले ही रहे हैं तो खुलेआम लेने में क्या  हर्ज़ है | मैं बतौब एक बार हमलोग सर्वे का रिजल्ट देख रहे थे , उस रिजल्ट  में था की प्रत्येक 4  में से 1 16  वर्ष की उम्र होते होते अपनी  कौमार्यता खो चूका था चाहे वो लड़का हो या लड़की | ताज्जुब हुआ पर वो हमारे  राष्ट्रीय राजधानी की स्थिति थी | अब बतायिया ? मैं पिछले बार घर गया था तो  पता चला की मेरा एक पडोसी जिसकी उम्र मुश्किल से 14 -15 वर्ष रही होगी एक  लड़की को लेकर फरार हो गया | आप ही कहो न यह क्या है ? तो मैं यहाँ पर यही  कहने की कोशिश कर रहा हूँ की इस चीज़ को हमर समाज में जीतन छुपाया जा रहा  है उसका कोई सार्थक परिणाम नहीं आ रहा है | आज छोटे- छोटे बच्चे जब हम उस  उम्र के थे तो इस चीज़ के बारे में अनजान थे लेकिन आज हामी से पूछते हैं की  क्या भैया लड़की-वडकी पटाई की नहीं | कुछ हुआ की नहीं , मैं तो इतना काम कर  चुका हूँ |</strong></p>
<p style="text-align: justify;"><strong>थोड़ा आश्चर्य होता है लेकिन फिर समझ जाता हूँ | आज इन्टनेट के  पोर्न साईट के बारे में सबको पता है | अकेला मौका देखा नही की लग गए , घर  मैं माँ- बाप नहीं हैं तो बाजार से पोर्न कैसेट लाकर ब्लू फिल्म देखने लगे |  यह सिर्फ लड़के ही नहीं लड़कियां भी करती हैं | तो बताओ क्या सेक्स की बात  करनी गलत है , क्या है समाज को बर्बाद कर देगा | आपका जवाब इसकी पुष्टि कर  सकता है |</strong></p>
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		<title>आप बच्चों के बाप हैं अथवा बच्चे आपके बाप — तय करें</title>
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		<pubDate>Sat, 26 Jun 2010 14:42:19 +0000</pubDate>
		<dc:creator>कुमारेन्द्र</dc:creator>
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		<description><![CDATA[खुशी मनाने के कुछ बिन्दु 1- आपके परिवार के बेटे-बेटी मानने लगें कि उनका जन्म आपके परिवार की अभिलाषा नहीं वरन् उन बच्चों के माता-पिता के शारीरिक सुखों की परिणति है। 2- आपके बच्चे मानते हों कि आपने उनके लिए ]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><strong>खुशी मनाने के कुछ बिन्दु</strong></p>
<p style="text-align: justify;"><img class="aligncenter size-full wp-image-3965" title="sex aur bachche" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2010/06/sex-aur-bachche.png" alt="" width="300" height="208" />1- आपके परिवार के बेटे-बेटी मानने लगें कि उनका जन्म आपके परिवार की अभिलाषा नहीं वरन् उन बच्चों के माता-पिता के शारीरिक सुखों की परिणति है।</p>
<p style="text-align: justify;">2- आपके बच्चे मानते हों कि आपने उनके लिए कभी कुछ किया ही नहीं जो कुछ किया है वो इस कारण से क्योंकि आपने अपने शारीरिक सुखों के एवज में उनको पैदा करने का अपराध जो किया था।</p>
<p style="text-align: justify;">3- इस अपराध की सजा के रूप में आपने अपने बच्चों की परवरिश की।</p>
<p style="text-align: justify;">4- खुशी मनाइये कि आपके बच्चे अब आपका कहा हुआ बिलकुल भी नहीं मानते।</p>
<p style="text-align: justify;">5- आपका कुछ भी कहना उनके ऊपर तानाशाही दिखाने जैसा लगने के कारण वे अब घर से बाहर रहना शुरू कर रहे हैं।</p>
<p style="text-align: justify;">6- जलसा मनाइये कि आपके बच्चे अब खुल्लमखुल्ला अपने विपरीतलिंगियों के साथ दिन गुजारने के साथ-साथ रातें भी गुजार रहे हैं।</p>
<p style="text-align: justify;">7- यह आपके लिए खुशी की बात है कि इतनी उम्र के बाद भी आपकी बेटी गर्भवती नहीं हुई है और न ही किसी लड़की ने आकर आपके बेटे से कहा है कि मैं तुम्हारे बच्चे की माँ बनने वाली हूँ, अर्थात दोनों सुरक्षित साधनों का प्रयोग कर रहे हैं।</p>
<p style="text-align: justify;">8- खुशी अब मनाइये कि आपके बच्चों ने आपको दादा-नाना बनाने वाली खुबर सुना दी, वह भी बिना शादी किये। इसका मतलब है कि आपके बच्चे उतने पिछड़े नहीं जितना कि मुहल्ले वाले समझ रहे थे।</p>
<p style="text-align: justify;">9- यह क्या कम खुशी की बात है कि आपके मना करने की स्थिति में आपके बच्चे घर से भाग सकते हैं। आप उनके भागने का नहीं उनके किसी भी ऐरे-गैरे से शादी करने का इंतजाम करिये।</p>
<p style="text-align: justify;">10- खुश होइये कि आपके ऊपर यह दोष नहीं आयेगा कि आपने अपनी बेटी को किसके पल्ले बाँध दिया अथवा बेटे के पल्ले किसको बाँध दिया।</p>
<p style="text-align: justify;">11- यह तो बहुत खुशी की बात है कि आपकी बेटी ने ऐसे व्यक्ति को अपना जीवनसाथी चुना है जो लगातार अपराध की दुनिया से जुड़ा रहा। आखिर आप ऐसा दामाद खोज सकते थे?</p>
<p style="text-align: justify;">12- यह भी खुश होने वाली खबर है कि आपका बेटा अब तक कइयों लड़कियों को झाँसा देकर गर्भवती बनाता रहा और अब तो शादी कर ही बैठा किसी शादीशुदा महिला से, उसको भगा कर।</p>
<p style="text-align: justify;">खुश होने के और भी बिन्दु हैं पर कृपया खुशी में ऑनर किलिंग जैसी हरकत नहीं कीजिए। आप स्वयं विचार करके देखें कि आपको इतनी इज्जत और कौन देगा? आपके बेटे और बेटी ही यदि इस तरह की इज्जत नहीं देंगे तो क्या समाज देगा? आप अपने बेटे और बेटी का बस यहीं तक अच्छा सोच सकते थे, इसके बाद तो सोचना उनका काम है कि किस लड़के अथवा लड़की के साथ वो सुखी रहेंगे।</p>
<p style="text-align: justify;">आप क्यों बिलावजह अपने आदेश को पारित करने का प्रयास करते हैं। याद रखिये एक उम्र के बाद आपके बेटे और बेटियाँ आपके बाप हो जाते हैं। इस अवस्था में आपको अपने इन दत्तक बापों का आदर करना चाहिए।</p>
<p style="text-align: justify;">ऐसे बेटे और बेटियों को ससम्मान समाज में प्रतिष्ठित करो जो अपने माता-पिता की गरिमा, उनकी भावनाओं का आदर नहीं कर सकते हैं।</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">सन्देश&#8212;<br />
ऊपर के संदेश का सार समझें और आइये समाज हित में किसी भी तरह की हिंसा को, किलिंग (जो कम से कम ऑनर जैसी तो नहीं है) को बन्द करें।</p>
]]></content:encoded>
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		<title>गाँधी का उन्मुक्त या नाटकीय सेक्स जीवन</title>
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		<pubDate>Thu, 06 May 2010 10:49:56 +0000</pubDate>
		<dc:creator>डा ० पुरुषोत्तम मीणा</dc:creator>
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		<description><![CDATA[भारत पर जबरन थोपे गये राष्ट्रपिता मोहनदास कर्मचन्द गाँधी के जीवन पर इंगलैण्ड के सुप्रसिद्ध इतिहासकार जेड ऐडम्स ने अपने पंद्रह वर्ष के लम्बे अध्ययन और गहन शोधों के आधार पर 288 पृष्ठ की एक किताब लिखी है। जिसे &#8220;Gandhi ]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><img class="alignright size-full wp-image-2785" title="गांधी सेक्स" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2010/05/गांधी-सेक्स2.jpg" alt="" width="298" height="341" />भारत पर जबरन थोपे गये राष्ट्रपिता मोहनदास कर्मचन्द गाँधी के जीवन पर इंगलैण्ड के सुप्रसिद्ध इतिहासकार जेड ऐडम्स ने अपने पंद्रह वर्ष के लम्बे अध्ययन और गहन शोधों के आधार पर 288 पृष्ठ की एक किताब लिखी है। जिसे &#8220;Gandhi : Naked Ambition&#8221; नाम दिया गया है। जिसका हिन्दी अनुवाद किया जाये तो इसे-&#8221;गाँधी की नग्न महत्वाकांक्षा&#8221; नाम दिया जा सकता है। इस किताब को आधार बनाकर अनेक भारतीय लेखकों ने भी गाँधी पर लिखने का साहस किया है, बल्कि यह कहना अधिक उचित होगा कि उक्त किताब के बहाने गाँधी के यौन जीवन पर उंगली उठाने का साहस जुटाया है। गाँधी को यौन कुण्ठाओं से ग्रस्त बताने वाले उक्त लेखक की पुस्तक की आड में अनेक भारतीय लेखक स्वयं भी अपनी अनेकों प्रकार की दमित कुण्ठाओं को बाहर निकालने का प्रयास कर रहे हैं। मैं भी इनमें से एक हूँ और उक्त पुस्तक के बहाने मैं भी गाँधी पर थोडा खुलकर लिखने का खतरा उठा रहा हूँ। आशा करता हूँ कि सुधिपाठक बिना पूर्वाग्रह अपनी अभिव्यक्तियाँ देंगे।</p>
<p style="text-align: justify;">उक्त पुस्तक में गाँधी के ब्रह्मचर्य के प्रयोगों और इन प्रयोगों में शामिल स्त्रियों के संक्षिप्त उद्‌गारों के आधार पर यह सिद्ध करने का प्रयास किया गया है कि गाँधी ब्रह्मचर्य के प्रयोगों के नाम पर 16 वर्ष की कमसिन लडकियों, युवतियों तथा अधेड भारतीय तथा विदेशी महिलाओं के साथ अन्तरंगता से संलिप्त थे। गाँधी स्वयं निर्वस्त्र होकर, इन स्त्रियों को नंगी होकर अपने साथ सोने एवं बन्द बाथरूम में अपने साथ नहाने को सहमत या विवश किया करते थे। गाँधी के आश्रम के कुछ लोगों ने इन गतिविधियों पर दबी जुबान में आपत्ति भी की थी, जिन्हें गाँधी एवं गाँधी के अनुयाईयों की असप्रसन्नता का शिकार होना पडा। यहाँ तक की गाँधी के समय के अनेक वरिष्ठ स्वतन्त्रता सैनानियों ने इसी कारण गाँधी से दूरियाँ बना ली थी और वे यदाकदा ही उनसे बहुत जरूरी होने पर, सार्वजनिक बैठकों या कार्यक्रमों में औपचारिक रूप से मिला करते थे। जिनमें सरदार वल्लभ भाई पटेल भी शामिल थे। मेरे पास जितनी जानकारी उपलब्ध है, उसके अनुसार इस किताब में ऐसा काफी मसाला है, जिसे आज की जिज्ञासु युवा पीढी आठ सौ रुपये में खरीदकर पढना चाहेगी!</p>
<p style="text-align: justify;">यद्यपि गाँधी के यौन जीवन पर उंगली उठाना आज के समय में उतना खतरनाक नहीं रहा है, जितना कि तीस वर्ष पहले हो सकता था। भारतीय राजनीति में बहुजन समाज पार्टी के संस्थापक कांशीराम के उदय के साथ-साथ गाँधी और काँग्रेस के बारे में बहुत कुछ आम जनता को ज्ञात हो चुका है। अतः वर्तमान में गाँधी पर लिखने में उतना खतरा नहीं है, बल्कि गाँधी पर लिखने में प्रचारित होने और माल कमाने का पूरा अवसर है। उक्त किताब के लेखक ने भी यही किया है। मात्र 288 पृष्ठ की पुस्तक की कीमत आठ सौ (800) रुपये देखकर कोई भी समझ सकता है कि किताब को लिखने के पीछे कमाई करना ही बडा लक्ष्य है।</p>
<p style="text-align: justify;">मेरा मानना है कि आज की युवा और पौढ पीढी बहुत संजीदा, जागरूक है और सच्चाई को जानने को उत्सुक है। इस देश में गाँधी को बेनकाब करने वालों को जानने के साथ-साथ और गाँधी को बेनकाब होते हुए देखने वालों की अच्छी-खासी तादाद है। इसलिये किताब भी बिकेगी और वर्ड की बेस्ट सेलर बुक्स में भी शामिल हो सकती है। इसके बावजूद भी मैं दावे के साथ कह सकता हूँ कि गाँधी को चाहे कितना ही बेनकाब किया जाये, अभी वह समय नहीं आया है, जबकि गाँधी की मूर्तियों को तोडने के लिये सरकारी आदेश जारी किये जायें। लेकिन एक दिन ऐसा अवश्य आयेगा, जबकि इस कथित ढोंगी महात्मा का सच इस देश की जनता के साथ-साथ इस देश की सरकार भी स्वीकारेगी! मुझे व्यक्तिगत रूप से गाँधी के &#8220;उन्मुक्त या नाटकीय सेक्स जीवन&#8221; या &#8220;ब्रह्मचर्य के प्रयोगों के बहाने सेक्स की तृप्ति&#8221; को लेकर उतनी आपत्ति नहीं है, जितनी कि गाँधी द्वारा अनेक महिलाओं के सेक्स एवं पारिवारिक जीवन को बर्बाद करने को लेकर है और इससे भी अधिक आपत्तिजनक तो गाँधी को इस देश पर &#8220;महात्मा एवं राष्ट्रपिता&#8221; के रूप में थोपे जाने पर है।</p>
<p style="text-align: justify;">जहाँ तक गाँधी या नेहरू या अन्य किसी भी ऐसे व्यक्ति के सेक्स जीवन को उजागर करने या सार्वजनिक रूप से उछालने की बात है, जो आज अपना पक्ष रखने के लिये दुनिया में जीवित नहीं है, ऐसा करना न तो नैतिक रूप से उचित है और न हीं कानूनी रूप से ऐसा करना न्यायसंगत! सेक्स किसी भी व्यक्ति के जीवन में नितान्त व्यक्तिगत और महत्वपूर्ण विषय है। जिसे न तो उघाडा जाना चाहिये और न हीं प्रचारित या प्रसारित किया जाना जरूरी है। उक्त पुस्तक के लेखक ने अपने शोध में गाँधी को दमित सेक्स कुण्ठाओं से ग्रस्त पाया है। यदि गुपचुप सेक्स करना कुण्ठाग्रस्त होना नहीं और ब्रह्मचर्य के प्रयोग के नाम पर अपनी मनपसन्द स्त्रियों के साथ यौन सुख पाना कुण्ठाग्रस्त होना है तो लेखक की बात से सहमत होने में किसी को आपत्ति नहीं होनी चाहिये, लेकिन यह सच नहीं है। क्योंकि यौन विषयों पर हमारे देश में सार्वजनिक रूप से चर्चा करना भी अश्लीलता माना जाता है, लेकिन आज का युवा थोडी हिम्मत दिखाने का प्रयास कर रहा है। परन्तु इस देश का ढाँचा इस प्रकार से बनाया गया है या कालान्तर में ऐसा बन गया है कि सार्वजनिक रूप से समाज अपने ढाँचे से बाहर किसी को निकलने की आजादी नहीं देता। बेशक चोरी-छुपे आप कुछ भी करो।</p>
<p style="text-align: justify;">इस सन्दर्भ में हाल ही में दक्षिण भारतीय फिल्मों की सुप्रसिद्ध अभिनेत्री खुश्बू के बयान (विवाह पूर्व सुरक्षित सेक्स अनुचित नहीं) मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा राधा-कृष्ण के बिना विवाह किये साथ रहने को लेकर की गयी टिप्पणी को पढकर अनेक लोगों ने स्वयं को प्रचारित करवाने के लिये या वास्तव में सुप्रीम कोर्ट को सबक सिखाने के लिये हंगाया किया था। म. प्र. हाई कोर्ट में रिट भी दायर की गयी। लेकिन कौन नहीं जानता कि आज या बिगत मानव इतिहास में अपवादों को छोडकर मनचाहा और ताजगीभरा सेक्स पाना, हर उम्र के स्त्री और पुरुष की मनोकामना रही है। हाँ सेक्स के मार्ग में भटकन एवं फिसलन हमेशा रही है। जिसमें कभी न कभी हमारे पूज्यनीय समझे जाने वाले ऋषियों से लेकर आज तक के युवा भटकते रहे हैं।</p>
<p style="text-align: justify;">जहाँ तक मोहनदास कर्मचन्द गाँधी के यौन-जीवन पर सार्वजनिक चर्चा का सवाल है तो हम सब जानते हैं कि गाँधी एक अत्यन्त तीक्ष्ण बुद्धि के स्वामी और धर्म का लबादा ओढकर लोगों को मूर्ख बनाने में दक्ष व चालाक किस्म के राजनीतिज्ञ थे। जिसने बडी आसानी से दस्तावेजों पर यह सिद्ध कर दिया कि अंग्रेजों की अदालत द्वारा सुनाई गयी फांसी की सजा से भगत सिंह एवं उसके साथियों को बचाने में उनका (गाँधी का) का भरसक प्रयास रहा, लेकिन इसके बावजूद भी भगत सिंह एवं उनके साथियों को नहीं बचाया जा सका।</p>
<p style="text-align: justify;">जबकि सच्चाई सभी जानते हैं कि गाँधी के कारण ही आजाद भारत को भगत सिंह एवं सुभाष चन्द्र बोस जैसे सच्चे सपूतों की सेवाएँ नहीं मिल पायी। गाँधी को भगत सिंह एवं सुभाष चन्द्र बोस तथा इनके सहयोगी फूटी आँख नहीं सुहाते थे। ऐसे व्यक्तित्व के धनी मोहनदास कर्मचन्द के बारे में उक्त किताब लिखी गयी है। जिसके बारे में बहुत सारे लोग जानते हैं कि गाँधी कभी भी अपनी पत्नी के साथ यौन सम्बन्धों से सन्तुष्ट नहीं थे (अधिकतर भारतीयों की भी यही दशा है), इसलिये उसने एक ऐसा बुद्धिमतापूर्ण, किन्तु चालाकी भरा रास्ता खोज निकाला, जिस पर गाँधी के तत्कालीन समकक्षों में भी दबी जुबान तक में विरोध में आवाज उठाने की हिम्मत नहीं थी और जीवन पर्यन्त गाँधी ऐसा ही ढोंगी बना रहा।</p>
<p style="text-align: justify;">आजादी के बाद भी गाँधी को ढोंगी कहने की हिम्मत जुटाने के बजाय, हमने स्वयं को ही ढोंगी बना लिया और गाँधी को इस देश के &#8220;राष्ट्रपिता&#8221; के रूप में थोप लिया। वैसे देखा जाये तो ठीक ही किया, क्योंकि इस देश के राष्ट्रपिता स्वामी विवेकानन्द या स्वामी दयानन्द सरस्वती तो हो नहीं सकते थे! क्योंकि जिस देश की संस्कृति ऋषियों की अवैध औलाद (वेदव्यास) की अवैध सन्तानों से (नियोग के बहाने) संचारित होकर महाभारत की गाथा को आज तक गर्व के साथ गाती और फिल्माती हो, उस देश की आधुनिक सन्तानों का सच्चा राष्ट्रपिता यौनेच्छाओं की खुलकर तृप्ति करने वाला मोहनदास कर्मचन्द गाँधी ही हो सकता था।</p>
<p style="text-align: justify;">अन्त में उपरोक्त के अलावा तीन बातें और कहना चाहूँगा-</p>
<p style="text-align: justify;">1. पहली गाँधी दमित सेक्स या यौन कुण्ठाओं से ग्रस्त नहीं था, बल्कि वह अन्त समय तक खुलकर यौनसुख भोगने वाला ऐसा नाटककार और मुखौटे पहने जीवन जीने वाला भोगी था, जिसने जीवनभर स्वयं की पत्नी या अपने परिवार की तनिक भी परवाह नहीं की और जिसने अपनी राजनैतिक इच्छा पूर्ति के लिये केवल इस राष्ट्र के टुकडे होना ही स्वीकार किया, बल्कि कूटनीतिक तरीके से ऐसी परिस्थितियाँ निर्मित कर दी कि भारत के टुकडे होकर ही रहें।</p>
<p style="text-align: justify;">2. दूसरी बात जिसे बहुत कम लोग जानते हैं कि गाँधी केवल अंग्रेज सरकार एवं अंग्रेजी प्रशासन के अन्याय या मनमानियों के विरुद्ध ही अनशन (उपवास) नहीं करता था, बल्कि उसने इस देश के 70 प्रतिशत दबे-कुचले और दमित लोगों के मूलभूत और जीवन जीने के लिये जरूरी हकों को छीनने के लिये भी अनशन का सफल नाटक किया। जिसके दुष्परिणाम इस देश को सदियों तक भुगतने पडेंगे। गाँधी के इसी षडयन्त्र की अवैध सन्तान है-अजा, अजजा एवं अन्य पिछडा वर्ग को नौकरियों में एवं अजा व अजजा को विधायिका में लुंजपुंज और कभी न खत्म होने वाला आरक्षण।</p>
<p style="text-align: justify;">3. अन्तिम और तीसरी बात-जहाँ तक भारत के इतिहास और वर्तमान को देख कर ईमानदारी से आकलन करने की बात है तो गाँधी से भी अधिक कामुक और यौन लालायित हर आम स्त्री-पुरुष होता है, लेकिन स्त्री को तो हमने अनेक प्रकार की बेडियों में जकड रखा है, जबकि आम साहसी पुरुष यौनसुख हेतु मिलने वाले अवसरों को भुनाने से कभी नहीं चूकता। चूँकि गाँधी, नेहरू, बिल क्लिण्टन या कृष्ण ऐसे बडे व्यक्तित्व हैं, जिनके निजी जीवन की अन्तरंग बातें भी गोपनीय नहीं रह पाती हैं। इसीलिये इन पर किताबें लिखी जायेंगी, बहसें होंगी, अदालतों में याचिकाएँ दायर होंगी और कुछ लोग सडकों पर आकर भी धमाल मचा सकते हैं, लेकिन इसमें कुछ भी अस्वाभाविक या अनहोनी बात नहीं है। यह सब प्राकृतिक है। किसी भी जीव का अध्ययन करके देखा जा सकता है-अनेक मादाओं के झुण्ड में कोई एक शेर, एक बन्दर, एक सियार, एक चीता, एक सांड, एक भैंसा, एक बकरा या एक कुत्ता पाया जाता है और सन्तति का क्रम बिना व्यवधान चलता रहता है। यह अलग बात है कि आधुनिक नारी भी पुरुष की ही भांति प्रत्येक यौन-संसर्ग के दौरान यौनचर्मोत्कर्स की उत्कट लालसा की अवास्तविक और असम्भव कल्पनाओं में विचरण करने लगी है। दुष्परिणामस्वरूप ऐसी राह भटकी महिलाओं में से लाखों को हिस्टीरया जैसी अनेक मानसिक बीमारियों से पीडित होकर, घुट-घुट कर मरते हुए देखा जा सकता है।</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">लेकिन सवाल उठता है कि ऐसा क्यों? इस सवाल पर विस्तार से लिखने की जरूरत है, लेकिन संक्षेप में इतना ही लिखना चाहूँगा कि सेक्स दो टांगों के बीच का खेल नहीं(जैसा कि समझा जाता है) , बल्कि यह स्वस्थ मनुष्य के दो कानों के बीच (दिमांग) का खेल है। यदि और भी सरलता से कहा जाये तो शारीरक रूप से पूरी तरह स्वस्थ स्त्री-पुरुष के बीच सेक्स 20 प्रतिशत शारीरिक और 80 प्रतिशत मानसिक होने पर ही सुख या चर्मोत्कर्स या चर्मबिन्दु पर पहुँचने का आनन्द लिया जा सकता है। अन्यथा तो सेक्स पुरुषों की क्षणिक कामाग्नि के उबाल को शान्त करने का साधन और स्त्रियों की कामाग्नि प्रज्वलित करने वाली एक आवश्यक बुराई के सिवा कुछ भी नहीं है।</p>
<p style="text-align: justify;">
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		<title>क्या बापू अर्ध-दमित सेक्स मैनियॉक थे ?</title>
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		<pubDate>Mon, 03 May 2010 13:28:49 +0000</pubDate>
		<dc:creator>के .पी. त्रिपाठी</dc:creator>
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		<description><![CDATA[क्या राष्ट्रपिता मोहनदास कर्मचंद गांधी असामान्य सेक्स व्यवहार वाले अर्द्ध.दमित सेक्स मैनियॉक थे ? जी हां, महात्मा गांधी के सेक्स.जीवन को केंद्र बनाकर लिखी गई किताब &#8220; Gandhi : Naked Ambition &#8221; में एक ब्रिटिश प्रधानमंत्री के हवाले से ऐसा ]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><img class="alignright size-full wp-image-2734" title="गांधी सेक्स" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2010/05/गांधी-सेक्स1.jpg" alt="" width="298" height="341" />क्या राष्ट्रपिता मोहनदास कर्मचंद गांधी असामान्य सेक्स व्यवहार वाले अर्द्ध.दमित सेक्स मैनियॉक थे ?  जी हां,  महात्मा गांधी के सेक्स.जीवन को केंद्र बनाकर लिखी गई किताब &#8220;<strong> Gandhi : Naked Ambition </strong>&#8221; में एक ब्रिटिश प्रधानमंत्री के हवाले से ऐसा ही कहा गया है । महात्मा गांधी पर लिखी यह  किताब आते ही विवाद के केंद्र में आ गई है जिसके चलते अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में उसकी मांग बढ़ गई है। मशहूर ब्रिटिश इतिहासकार जैड ऐडम्स ने पंद्रह साल के अध्ययन और शोध के बाद  <strong><em>Gandhi : Naked Ambition </em></strong>को किताब का रूप दिया है।</p>
<p style="text-align: justify;">वैसे तो किताब में  नया कुछ नहीं है। राष्ट्रपिता के जीवन में आने वाली महिलाओं और लड़कियों के साथ गांधी के आत्मीय और मधुर रिश्तों पर ख़ास प्रकाश डाला गया है। रिश्ते को सनसनीख़ेज़ बनाने की कोशिश की गई है। मसलन, जैड ऐडम्स ने लिखा है कि गांधी नग्न होकर लड़कियों और महिलाओं के साथ सोते ही नहीं थे बल्कि उनके साथ बाथरूम में नग्न स्नान  भी करते थे।</p>
<p style="text-align: justify;">महात्मा गांधी हत्या के साठ साल गुज़र जाने के बाद भी हमारे मानस.पटल पर किसी संत की तरह उभरते हैं। अब तक बापू की छवि गोल फ्रेम का चश्मा पहने लंगोटधारी बुजुर्ग की रही है जो दो युवा.स्त्रियों को लाठी के रूप में सहारे के लिए इस्तेमाल करता हुआ चलता.फिरता है। आख़िरी क्षण तक गांधी ऐसे ही राजसी माहौल में रहे। मगर किसी ने उन पर उंगली नहीं उठाई। ऐसे में इस किताब में लिखी बाते लोगों ख़ासकर, गांधीभक्तों को शायद ही हजम हों। दुनिया के लिए गांधी भारत के स्वतंत्रता आंदोलन के आध्यात्मिक नेता हैं। वह अहिंसा के प्रणेता और भारत के राष्ट्रपिता भी हैं। जो दुनिया को सविनय अवज्ञा और अहिंसा की राह पर चलने की प्रेरणा देता है।  कहना न होगा कि दुबली काया वाले उस पुतले ने दुनिया के कोने.कोने में मानव अधिकार आंदोलनों को ऊर्जा दीए उन्हें प्रेरित किया।</p>
<p style="text-align: justify;">नई किताब यह खुलासा करती है कि गांधी उन युवा महिलाओं के साथ ख़ुद को संतप्त किया जो उनकी पूजा करती थीं और अकसर उनके साथ बिस्तर शेयर करती थीं। बहरहाल, ऐडम्स का दावा है कि लंदन से क़ानून की पढ़ाई करने के बाद वकील से गुरु बने गांधी की छवि कठोर नेता की बनी जो अपने अनोखी सेक्सुअल डिमांड से अनुयायियों को वशीभूत कर लेता है। आमतौर पर लोग के लिए यह आचरण असहज हो सकता है पर गांधी के लिए सामान्य था। ऐडम्स ने किताब में लिखा है कि गांधी ने अपने आश्रमों में इतना कठोर अनुशासन बनाया था कि उनकी छवि 20वीं सदी के धर्मवादी नेताओं जैम्स वॉरेन जोन्स और डेविड कोरेश की तरह बन गई जो अपनी सम्मोहक सेक्स अपील से अनुयायियों को क़रीब.क़रीब ज्यों का त्यों वश में कर लेते थे। ब्रिटिश हिस्टोरियन के मुताबिक महात्मा गांधी सेक्स के बारे लिखना या बातें करना बेहद पसंद करते थे। किताब के मुताबिक हालांकि अन्य उच्चाकाक्षी पुरुषों की तरह गांधी कामुक भी थे और सेक्स से जुड़े तत्थों के बारे में आमतौर पर खुल कर लिखते थे। अपनी इच्छा को दमित करने के लिए ही उन्होंने कठोर परिश्रम का अनोखा स्वाभाव अपनाया जो कई लोगों को स्वीकार नहीं हो सकता।</p>
<p style="text-align: justify;">किताब की शुरुआत ही गांधी की उस स्वीकारोक्ति से हुई है जिसमें गांधी ख़ुद लिखा या कहा करते थे कि उनके अंदर सेक्स.ऑब्सेशन का बीजारोपण किशोरावस्था में हुआ और वह बहुत कामुक हो गए थे। 13 साल की उम्र में 12 साल की कस्तूरबा से विवाह होने के बाद गांधी अकसर बेडरूम में होते थे। यहां तक कि उनके पिता कर्मचंद उर्फ कबा गांधी जब मृत्यु.शैया पर पड़े मौत से जूझ रहे थे उस समय किशोर मोहनदास पत्नी कस्तूरबा के साथ अपने बेडरूम में सेक्स का आनंद ले रहे थे।</p>
<p style="text-align: justify;">किताब में कहा गया है कि विभाजन के दौरान नेहरू गांधी को अप्राकृतिक और असामान्य आदत वाला इंसान मानने लगे थे। सीनियर लीडर जेबी कृपलानी और वल्लभभाई पटेल ने गांधी के कामुक व्यवहार के चलते ही उनसे दूरी बना ली। यहां तक कि उनके परिवार के सदस्य और अन्य राजनीतिक साथी भी इससे ख़फ़ा थे। कई लोगों ने गांधी के प्रयोगों के चलते आश्रम छोड़ दिया। ऐडम ने गांधी और उनके क़रीबी लोगों के कथनों का हवाला देकर बापू को अत्यधिक कामुक साबित करने का पूरा प्रयास किया है। किताब में पंचगनी में ब्रह्मचर्य का प्रयोग का भी वर्णन किया हैए जहां गांधी की सहयोगी सुशीला नायर गांधी के साथ निर्वस्त्र होकर सोती थीं और उनके साथ निर्वस्त्र होकर नहाती भी थीं। किताब में गांधी के ही वक्तव्य को उद्धरित किया गया है। मसलन इस बारे में गांधी ने ख़ुद लिखा हैए नहाते समय जब सुशीला निर्वस्त्र मेरे सामने होती है तो मेरी आंखें कसकर बंद हो जाती हैं। मुझे कुछ भी नज़र नहीं आता। मुझे बस केवल साबुन लगाने की आहट सुनाई देती है। मुझे कतई पता नहीं चलता कि कब वह पूरी तरह से नग्न हो गई है और कब वह सिर्फ अंतःवस्त्र पहनी होती है।</p>
<p style="text-align: justify;">किताब के ही मुताबिक जब बंगाल में दंगे हो रहे थे गांधी ने 18 साल की मनु को बुलाया और कहा श्अगर तुम साथ नहीं होती तो मुस्लिम चरमपंथी हमारा क़त्ल कर देते। आओ आज से हम दोनों निर्वस्त्र होकर एक दूसरे के साथ सोएं और अपने शुद्ध होने और ब्रह्मचर्य का परीक्षण करें।श् ऐडम का दावा है कि गांधी के साथ सोने वाली सुशीला, मनु और आभा ने गांधी के साथ शारीरिक संबंधों के बारे हमेशा अस्पष्ट बात कही। जब भी पूछा गया तब केवल यही कहा कि वह ब्रह्मचर्य के प्रयोग के सिद्धांतों का अभिन्न अंग है।</p>
<p style="text-align: justify;">ऐडम्स के मुताबिक गांधी अपने लिए महात्मा संबोधन पसंद नहीं करते थे और वह अपने आध्यात्मिक कार्य में मशगूल रहे। गांधी की मृत्यु के बाद लंबे समय तक सेक्स को लेकर उनके प्रयोगों पर लीपापोती की जाती रही। हत्या के बाद गांधी को महिमामंडित करने और राष्ट्रपिता बनाने के लिए उन दस्तावेजोंए तथ्यों और सबूतों को नष्ट कर दियाए जिनसे साबित किया जा सकता था कि संत गांधी दरअसल सेक्स मैनियैक थे। कांग्रेस भी स्वार्थों के लिए अब तक गांधी और उनके सेक्स.एक्सपेरिमेंट से जुड़े सच को छुपाती रही है। गांधीजी की हत्या के बाद मनु को मुंह बंद रखने की सलाह दी गई। सुशीला भी इस मसले पर हमेशा चुप ही रहीं।</p>
<p style="text-align: justify;">किताब में ऐडम्स दावा करते हैं कि सेक्स के जरिए गांधी अपने को आध्यात्मिक रूप से शुद्ध और परिष्कृत करने की कोशिशों में लगे रहे। नवविवाहित जोड़ों को अलग.अलग सोकर ब्रह्मचर्य का उपदेश देते थे। ऐडम्स के अनुसार सुशीला नायरए मनु और आभा के अलावा बड़ी तादाद में महिलाएं गांधी के क़रीब आईं। कुछ उनकी बेहद ख़ास बन गईं। बंगाली परिवार की विद्वान और ख़ूबसूरत महिला सरलादेवी चौधरी से गांधी का संबंध जगज़ाहिर है। हालांकि गांधी केवल यही कहते रहे कि सरलादेवी उनकी श्आध्यात्मिक पत्नीश् हैं। गांधी जी डेनमार्क मिशनरी की महिला इस्टर फाइरिंग को प्रेमपत्र लिखते थे। इस्टर जब आश्रम में आती तो बाकी लोगों को जलन होती क्योंकि गांधी उनसे एकांत में बातचीत करते थे। किताब में ब्रिटिश एडमिरल की बेटी मैडलीन स्लैड से गांधी के मधुर रिश्ते का जिक्र किया गया है जो हिंदुस्तान में आकर रहने लगीं और गांधी ने उन्हें मीराबेन का नाम दिया।</p>
<p style="text-align: justify;">ऐडम्स ने कहा है कि नब्बे के दशक में उसे अपनी किताब &#8221; द डाइनैस्टीश&#8221; लिखते समय गांधी और नेहरू के रिश्ते के बारे में काफी कुछ जानने को मिला। इसके बाद लेखक की तमन्ना थी कि वह गांधी के जीवन को अन्य लोगों के नजरिए से किताब के जरिए उकेरे। यह किताब उसी कोशिश का नतीजा है। जैड दावा करते हैं कि उन्होंने ख़ुद गांधी और उन्हें बेहद क़रीब से जानने वालों की महात्मा के बारे में लिखे गए किताबों और अन्य दस्तावेजों का गहन अध्ययन और शोध किया है। उनके विचारों का जानने के लिए कई साल तक शोध किया। उसके बाद इस निष्कर्ष पर पहुंचे।</p>
<p style="text-align: justify;">इस बारे में ऐडम्स ने स्वीकार किया है कि यह किताब विवाद से घिरेगी। उन्होंने कहा, मैं  जानता हूं कि इस एक किताब को पढ़कर भारत के लोग मुझसे नाराज़ हो सकते हैं लेकिन जब मेरी किताब का लंदन विश्वविद्यालय में विमोचन हुआ तो तमाम भारतीय छात्रों ने मेरे प्रयास की सराहना की मुझे बधाई दी। 288 पेज की करीब आठ सौ रुपए मूल्य की यह किताब जल्द ही भारतीय बाज़ार में उपलब्ध होगी। <strong><em>Gandhi : Naked Ambition</em></strong> का लंदन यूनिवर्सिटी में विमोचन हो चुका है। किताब में गांधी की जीवन की तक़रीबन हर अहम घटना को समाहित करने की कोशिश की गई है। जैड ऐडम्स ने गांधी के महाव्यक्तित्व को महिमामंडित करने की पूरी कोशिश की है। हालांकि उनके सेक्स.जीवन की इस तरह व्याख्या की है कि गांधीवादियों और कांग्रेसियों को इस पर सख़्त ऐतराज़ हो सकता है।</p>
<p style="text-align: justify;">
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		<title>सेक्स चिंतन – 6</title>
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		<pubDate>Mon, 08 Feb 2010 17:53:13 +0000</pubDate>
		<dc:creator>जयराम "विप्लव"</dc:creator>
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		<description><![CDATA[सेक्स चिंतन की पिछली कड़ियों में सेक्स पर विमर्श के लायक भूमिका तैयार हो चुकी है . आगे सेक्स के विभिन्न सामाजिक सन्दर्भों और बुनियादी सवालों को केंद्र में रख कर चर्चा को आगे बढाने की कोशिश की जायेगी .इस ]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><img src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2010/02/सेक्स-चिंतन.jpg" alt="" title="सेक्स चिंतन" width="299" height="480" class="alignleft size-full wp-image-1546" />सेक्स चिंतन की पिछली कड़ियों में सेक्स पर विमर्श के लायक भूमिका तैयार हो चुकी है . आगे सेक्स के विभिन्न सामाजिक सन्दर्भों और बुनियादी सवालों को केंद्र में रख कर चर्चा को आगे बढाने की कोशिश की जायेगी .इस अंक में सेक्स और प्रेम के मध्य रिश्तों पर कुछ बातें आपके ध्यान में ला रहा हूँ जिन पर हम सभी अक्सर सोचते हैं ,बहस करते हैं और कहीं न कहीं हर किसी के जीवन में प्रेम और सेक्स द्वन्द काबिज रहता है . मानव समाज में सेक्स के साथ खुद-बखुद प्यार और प्यार के साथ सेक्स जुड़ जाता है और जहाँ सेक्स हो वहां पाप की उपस्थिति अनिवार्य हो जाती है . स्त्री-पुरुष के प्रेम संबंधों की ओर ऊँगली स्वतः उठ जाती है क्योंकि जहाँ भी स्त्री-पुरुष संबंध होगा वहां सेक्स का होना अवश्यंभावी समझा जाता है .और हजारों सालों से सेक्स को पाप ही माना गया है .और साहिबान इससे भी भीषण विडंबना यह है कि यही पाप इस चराचर संसार की उत्पत्ति का मूल आधार है ! इस हिसाब से तो प्रेम पवित्र व दैवीय वृत्ति और सेक्स पाप की जड़ है . अब ,आप ही बताइए गलत क्या है और सही क्या है ? या तो प्रेम में सेक्स का कोई स्थान नहीं होना चाहिए या फ़िर सेक्स पाप नहीं है . लेकिन इस जगत में अब तक कोई मतैक्य नहीं हो पाया है .<br />
 प्रेम के दो पहलू सामने आते हैं, एक आत्मिक और दूसरा शारीरिक। प्रेम को या तो केवल सेक्स का पर्याय मान लिया जाता है, या फिर उसके सेक्स  को नकारकर अथवा महत्वहीन बताकर प्रेम को मात्र एक ‘आत्मिक’ भावना का दर्जा दे दिया जाता है। अभी तक कुछेक लोगों ने बड़ी हिम्मत से इस द्वन्द पर निर्णय देने का साहस जरुर किया है . वो कहते है ; &#8221; देह से यानी शरीर से प्यार नहीं होता लेकिन प्यार या प्रेम में देह की अनिवार्यता स्वतः आ जाती है &#8220;.<br />
मुझे बड़ा अटपटा सा लगता है जब लोग कहते हैं,  मैं उससे प्यार करता हूँ . उसके साथ ये सब ( सेक्स) कभी सपने में भी नहीं सोच सकता हूँ . वाह भाई ,क्या प्यार हैं ? प्यार के लिए कोई और, देह की जरुरत के लिए कोई दूसरी ! सवाल यह है कि आखिर ऐसा क्यों है ? क्यों प्रेम के संग सेक्स को स्वीकार नहीं किया जाता है ? क्यों सेक्स को इतना सामाजिक तौर पर  घृणित बना दिया गया है जबकि व्यक्तिगत रूप से इससे पवित्र कुछ नहीं समझा जाता है और यह आप सभी जानते हैं . क्यों ज़माने भर की नैतिकता के नाम पर सेक्स को प्रेम से अलग करके मानव खुद उसी में उलझा हुआ है ? </p>
<p>सेक्स यह शब्द ही अत्यंत निंदित हो क्यों गया है ?  इस प्रश्न का उत्तर रजनीश &#8220;ओशो&#8221; ने अपने संबोधन में कुछ इस प्रकार दिया था : </p>
<p><em>&#8221; संसार का हर धर्म  तुम्हारे मन को किसी और दिशा में मोड़ना चाहते थे-परलोक की ओर। यदि तुम सच में ही यहां आनंदित हो-इसी लोक में, तो भला तुम क्यों किसी परलोक की चिंता करोगे? परलोक के अस्तित्व के लिए तुम्हारा दुखी होना अत्यंत आवश्यक है। उसका स्वयं अपने आप में कोई अस्तित्व नहीं है, उसका अस्तित्व है तुम्हारे दुख में, तुम्हारी पीड़ा में, तुम्हारे विषाद में।</p>
<p>दुनिया के सारे धर्म तुम्हारे अहित करते रहे हैं। वे ईश्वर के नाम पर, सुंदर और अच्छे शब्दों की आड़ में तुममें और अधिक पीड़ा और अधिक संताप, और अधिक घृणा, और अधिक क्रोध , और अधिक घाव पैदा करते रहे हैं। वे प्रेम की बातचीत करते हैं, मगर तुम्हारे प्रेमपूर्ण हो सकने की सारी संभावनाओं को मिटा देते हैं।</p>
<p>मैं काम का शत्रु नहीं हूं। मेरी दृष्टि में काम उतना ही पवित्र है, जितना जीवन में शेष सब पवित्र है। असल में न कुछ पवित्र है, न कुछ अपवित्र है; जीवन एक है-सब विभाजन झूठे हैं, और काम जीवन का केंद्र बिंदु है।</p>
<p>इसलिए तुम्हें समझना पड़ेगा कि सदियों-सदियों से क्या होता आ रहा है। जैसे ही तुम काम को दबाते हो, तुम्हारी ऊर्जा स्वयं को अभिव्यक्त करने के लिए नये-नये मार्ग खोजना प्रारंभ कर देती है। ऊर्जा स्थिर नहीं रह सकती। जीवन के आधारभूत नियमों में से एक है कि ऊर्जा सदैव गत्यात्मक होती है, गतिशीलता का नाम ही ऊर्जा है। वह रुक नहीं सकती, ठहर नहीं सकती। यदि उसके साथ जबरदस्ती की गई, एक द्वार बंद किया गया, तो वह दूसरे द्वारों को खोल लेगी, लेकिन उसे बांधकर नहीं रखा जा सकता। यदि ऊर्जा का स्वाभाविक प्रवाह अवरुद्ध किया गया, तो वह किसी अप्राकृतिक मार्ग से बहने लगेगी। यही कारण है कि जिन समाजों ने काम का दमन किया, वे अधिक संपन्न और समृद्ध हो गए। जब तुम काम का दमन करते हो, तो तुम्हें अपने प्रेम-पात्र को बदलना होगा। अब स्त्री से प्रेम करना तो खतरनाक है, वह तो नरक का द्वार है। चूंकि सारे शास्त्र पुरुषों ने लिखे हैं, इसलिए सिर्फ स्त्री ही नरक का मार्ग है। पुरुषों के बारे में क्या खयाल है?</p>
<p>मैं हिंदुओं, मुसलमानों, ईसाइयों से कहता रहा हूं कि अगर स्त्री नरक का मार्ग है, तब तो फिर केवल पुरुष ही नरक जा सकते हैं, स्त्री तो जा ही नहीं सकती। मार्ग तो सदा अपनी जगह रहता है, वह तो कहीं आवागमन नहीं करता। लोग ही उस पर आवागमन करते हैं। यूं कहने को तो हम कहते हैं कि यह रास्ता फलां जगह जाता है, लेकिन इसमें भाषा की भूल है। रास्ता तो कहीं आता-जाता नहीं, अपनी जगह आराम से पड़ा रहता है, लोग ही उस पर आते-जाते हैं। यदि स्त्रियां नरक का मार्ग हैं, तब तो निश्चित ही नरक में केवल पुरुष ही पुरुष भरे होंगे। नरक “सिर्फ पुरुषों का क्लब” होगा।</p>
<p>स्त्री नरक का मार्ग नहीं है। लेकिन एक बार तुम्हारे दिमाग में यह गलत संस्कार बैठ जाए, तो तुम किसी और वस्तु में स्त्री को प्रक्षेपित करने लगोगे; फिर तुम्हें कोई और प्रेम-पात्र चाहिए। धन तुम्हारा प्रेम-पात्र बन सकता है। लोग पागलों की तरह धन-दौलत से चिपके हैं, जोरों से पकड़े हैं, क्यों? इतना लोभ और लालच क्यों है? क्योंकि दौलत ही उनकी प्रेमिका बन गई। उन्होंने अपनी सारी जीवन ऊर्जा धन की ओर मोड़ ली।</p>
<p>अब यदि कोई उनसे धन त्यागने को कहे, तो वे बड़ी मुसीबत में पड़ जाएंगे। फिर राजनीति से उनका प्रेम-संबंध जुड़ जाएगा। राजनीति में सीढ़ी दर सीढ़ी ऊपर चढ़ते जाना ही उनका एकमात्र लक्ष्य हो जाएगा। प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति पद की ओर, राजनीतिज्ञ ठीक उसी लालसा से देखता है, जैसे कोई प्रेमी अपनी प्रेमिका की ओर देखता है। यह विकृति है।</p>
<p>कोई व्यक्ति किन्हीं और दिशाओं में जा सकता है, जैसे शिक्षा; तब पुस्तकें उसकी प्रेम की वस्तुएं हो जाती हैं। कोई आदमी धार्मिक बन सकता है, तब परमात्मा उसका प्रेम-पात्र बन जाता है&#8230;तुम अपने प्रेम को किसी भी काल्पनिक चीज पर प्रक्षेपित कर सकते हो, लेकिन स्मरण रहे, उससे तुम्हें परितृप्ति नहीं मिल सकती। &#8221;<br />
</em><br />
चिंतन की कड़ियों आगे चर्चा होती रहेगी &#8230;.. विभिन्न विद्वानों के विचार प्रस्तुत किये जाते रहेंगे &#8230;.. आप सभी अपने -अपने अनुसार सोचने और समझने के लिए स्वतंत्र हैं . ऐसा इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि कुछ पाठक हमारे इस विमर्श को ,चिंतन को , परिचर्चा को गलत समझ बैठे हैं . यहाँ किसी प्रकार के विचार थोपने की तैयारी नहीं है अपितु आप सबसे विचार जानने का एक प्रयास है ताकि हमारे ज्ञान में निरंतर वृद्धि हो सके . हाँ , उन लोगों के बारे में क्या कह सकता हूँ जो सेक्स शब्द से हीं चिढ़ते हैं या चिढने का स्वांग करते हैं !</p>
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		<title>सेक्स चिंतन &#8211; 5</title>
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		<pubDate>Wed, 21 Oct 2009 17:08:15 +0000</pubDate>
		<dc:creator>जयराम "विप्लव"</dc:creator>
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		<description><![CDATA[सेक्स और समाज की अब तक प्रकाशित कड़ियों को आप सुधीजनों की खूब सराहना मिली है . दरअसल ,प्रचलित धारणाओं से हटकर लिखने -बोलने पर बहुत कम प्रशंसा मिलती है ,अक्सर गालियाँ हीं खानी पड़ती हैं . सेक्स आज भी ]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;">
	<a href="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2009/10/sex-khajuraho.jpg"><img alt="sexy photo/ khajuraho/ sex in khajuraho " class="aligncenter size-medium wp-image-967" height="252" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2009/10/sex-khajuraho-300x252.jpg" title="sexy photo/ khajuraho/ sex in khajuraho " width="300" /></a>सेक्स और समाज की अब तक प्रकाशित कड़ियों को आप सुधीजनों की खूब सराहना मिली है . दरअसल ,प्रचलित धारणाओं से हटकर लिखने -बोलने पर बहुत कम प्रशंसा मिलती है ,अक्सर गालियाँ हीं खानी पड़ती हैं . सेक्स आज भी कौतुहल का विषय बना हुआ है , किसी रहस्य से कम नहीं है . और इस मुद्दे पर विभिन्न यौन आसनों के अलावा बहुत कम लिखा पढ़ा गया है .हालाँकि ओशो,फ्रायड जैसे दो चार तथाकथित सिरफिरे दार्शनिकों ने इसके इतर जरुर रौशनी डाली लेकिन अमेरिका जैसे खुले समाज में उसे जेल में डाल दिया गया .मैंने जब इस स्तम्भ का नाम सेक्स और समाज रखा तो मेरे एक मित्र ने सवाल उठाया था &#8211; &quot;सेक्स के साथ समाज का क्या सम्बन्ध ? यह तो बंद कमरे की चीज है !&quot;&nbsp; बात सही है अब तक हम यही तो सुनते आये हैं . पर क्या यही सच है अथवा यहाँ भी सच को खोजे जाने की आवश्यकता है . समाज मानव से बनता है और मानव सेक्स की हीं तो उत्पत्ति है .समस्त सृष्टि के सजीव प्राणियों की जन्मदात्री प्रक्रिया है सेक्स या सम्भोग .आज सेक्स के आध्यात्मिक और सामाजिक सन्दर्भों को समझने की नितांत आवश्यकता है .सेक्स की समकालीन दशा अब तक की सबसे दयनीय अवस्था में है .इस प्राकृतिक उपक्रम का हर दिन अवमूल्यन होता जा रहा है .<a href="http://www.janokti.com/?cat=61">पिछली कड़ियों में सेक्स की वास्तविक आवश्यकता और मानव जीवन में इसकी भूमिका की चर्चा की जा चुकी है .&nbsp; </a>सेक्स स्वस्थ और प्रसन्न मन से आनंद प्राप्ति की एक प्रक्रिया है जिसको सही सन्दर्भों में जान कर हीं जीवन का अंतिम लक्ष्य माने मोक्ष प्राप्त किया जा सकता है .जीवन में सेक्स की उपयोगिता महज संतानोत्पत्ति और दैहिक सुख प्राप्त करना नहीं है .सेक्स से मिलने वाले आत्मिक आनंद को जुटा कर हीं प्रेम का अनुभव किया जा सकता है .और जब तक प्रेम का जन्म नहीं होगा ईश्वर से मिलन संभव नहीं है .प्रेम को ईश्वर से साक्षात्कार में एकमात्र जरिए माना गया है .और सेक्स प्रेम की पहली सीढ़ी है .वैसे तो ईश्वर को पाने के कई मार्ग योग ,भजन , समाधी आदि बताये गये हैं लेकिन सामान्य मनुष्य के लिए इन रास्तों पर चलना सहज नहीं है . सेक्स से प्रेम और प्रेम के सहारे ईश्वर तक जाने की राह सहज और सुलभ&nbsp; है . जनसामान्य में आज सेक्स को लेकर रुझान तो बढा है लेकिन सही अर्थों को समझने के बजाय लोग विकृति की ओर बढ़ते जा रहे हैं .नित नए आविष्कारों ने मनुष्य को भौतिक सुख -सुविधा में इतना उलझा दिया है कि आँखें सत्य को देख नहीं पा रही हैं .&nbsp;&nbsp; जीवन के अंतिम लक्ष्य तक ले जाने का साधन और उसकी उर्जा को नकारात्मक रूप में देखा जाने लगा . काम बिस्तर तक हीं सिमट कर रह गया है जिसका लक्ष्य बस एक विपरीतलिंगी अथवा समलिंगी जोड़े की क्षणिक संतुष्टी भर रह गयी है .सेक्स मन बहलाने का खिलौना बन गया है . आज कल सुरक्षित सेक्स का प्रचार प्रसार जोरों पर है .सेक्स जनित रोगों और सामाजिक परम्पराओं को बचाने के नाम पर कंडोम जैसी वस्तु आ गयी है . जिसे करीब -करीब सामाजिक मान्यता भी मिल चुकी है .आज सेक्स टॉय जैसी कृत्रिम साधनों का उपयोग होने लगा है . ऐसे में मुझे एक दोस्त की बात याद आती है जो अक्सर कहता था &quot;वो दिन दूर नहीं है जब सेक्स के लिए आदमी की जरुरत ख़त्म हो जायेगी और यह काम भी माउस की एक क्लिक से संभव हो जायेगा &quot;.<br />
	जिन चीजों से बचने के नाम पर सुरक्षा के इन उपायों का उपयोग हो रहा है वो चीजें उतनी हीं फैलती जा रही है .आदमी को मालुम है कि कंडोम के प्रयोग से से उसका फायदा हीं फायदा है . { इसे नजदीक का फायदा कहना उचित होगा .वैसे हम इंसानों को दूर के हानि -लाभ की चिंता होती तो यह दिन नहीं देखना पड़ता } फायदा इस मायने में कि अपनी मनमानी करते हुए ना तो शारीरिक नुकसान का डर है और ना हीं चारित्रिक . तो हम बार- बार उसी अनैतिक सेक्स में उलझे हैं . शारीरिक नुकसान तो आप समझ गये होंगे . चारित्रिक हानि इसलिए कि हमारा चरित्र वही है जो समाज को दिखता है . और कंडोम का इस्तेमाल मर्द और औरत को सामाजिक लांछन से साफ बचा लेता है .कंडोम का इस्तेमाल वृहत पैमाने पर किस तरह के सेक्स में होता है यह भी आप बखूबी जानते हैं .आदमी गलत कामों से मुंह केवल इसीलिए मोड़ता है ताकि दूसरों की नज़र में सद्चरित्र बना रह सके .नहीं तो कुछ बातें गलत होने के बावजूद भी बने रहते हैं क्योंकि समाज में उसका चलन है . गलत या सही , पाप अथवा पुन्य व्यक्ति सापेक्ष होता है परन्तु सब समाज को दिखाने भर के लिए रह गया है . हम भौतिक सुख-सुविधाओं के अर्जन में समाज का ख्याल करते हैं अपना नहीं लेकिन आत्मिक /आध्यत्मिक&nbsp; सुख के लिए समाज की चिंता सताने लगती है .अधिक से अधिक सुविधाओं को जुटाने के समय मन को समाज के बहुसंख्यक लोगों का ख्याल नहीं आता है . दूसरो का हक़ छीनते समय हमें किसी बात का ख्याल नहीं रहता है जबकि आत्मिक सुख / आत्मिक ज्ञान / आत्मिक अनुभव के सम्बन्ध में समाज की याद जोर मारने लगती है .हम समाज के चलन की हर एक बात का ध्यान रखते हैं . क्यों हम अपने सच को नहीं ढूंढ़ पाते हैं और संसार के अब तक की गलतियों में&nbsp; फंस कर रह जाते हैं . (जारी &#8230;..)</p>
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		<title>सेक्स चिंतन – 4</title>
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		<pubDate>Fri, 18 Sep 2009 13:17:39 +0000</pubDate>
		<dc:creator>जयराम "विप्लव"</dc:creator>
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		<description><![CDATA[पिछले दिनों कई पोस्ट में मैंने सेक्स और समाज को मुद्दा बना कर लिखा .आम तौर पर लोगों ने मज़े लेने के लिए पढ़े और वाहवाही कर चलते बने . हाँ कुछेक साथियों ने बहस में भाग लेने की कोशिश जरुर की जो कामयाब न हो पाई . सेक्स की बात सुन कर हम मन ही मन रोमांचित होते हैं .जब भी मौका हो सेक्स की चर्चा में शामिल होने से नहीं चूकते .इंटरनेट पर सबसे अधिक सेक्स को हीं सर्च करते हैं . लेकिन हम इस पर स्वस्थ संवाद /चिंतन/ मंथन करने से सदैव घबराते रहे हैं और आज भी घबराते हैं ]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><a href="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2009/09/june-09-009.jpg"><img width="130" height="110" alt="june 09 009" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2009/09/june-09-009.jpg" title="june 09 009" class="alignleft size-full wp-image-654" /></a></p>
<div style="text-align: justify;">पिछले दिनों कई पोस्ट में मैंने सेक्स और समाज को मुद्दा बना कर लिखा .आम तौर पर लोगों ने मज़े लेने के लिए पढ़े    और वाहवाही कर चलते बने . हाँ कुछेक साथियों ने बहस में भाग लेने की कोशिश जरुर की जो कामयाब न हो पाई . सेक्स की बात सुन कर हम मन ही मन रोमांचित होते हैं .जब भी मौका हो सेक्स की चर्चा में शामिल होने से नहीं चूकते .इंटरनेट पर सबसे अधिक सेक्स को हीं सर्च करते हैं . लेकिन हम इस पर स्व स्थ संवाद /चिंतन/ मंथन करने से सदैव घबराते रहे हैं और आज भी घबराते हैं .आज ही एक पाठक स्वप्निल जी ने समलैंगिकता से सम्बंधित पोस्ट पर प्रतिक्रिया देते हुए इस संवाद को बढाया है.स्वप्निल जी के शंकाओं का समाधान &quot; law of reverse effect &quot; में छुपा हुआ है .अनेक विद्वानों ने सेक्स को जीवन का बाह्य आवरण बताया है जिसको भेदे बिना जीवन के अंतिम लक्ष्य अर्थात मोक्ष की प्राप्ति संभव नहीं है . सेक्स अर्थात काम जिन्दगी की ऐसी नदिया है जिसमें तैरकर हीं मन रूपी गोताखोर साहिल यानी परमात्मा तक पहुँचता है .</div>
<div style="text-align: justify;">&quot;एक बार ओशो अपने साथियों के संग खजुराहो घूमने गये . वहां मंदिर की बही दीवारों पर मैथुनरत चित्रों व काम-वासनाओं की मूर्तियों को देख कर सभी आश्चर्यचकित को पूछने लगे यह क्या है ? ओशो ने कहा ,जिन्होंने इन मंदिरों का निर्माण किया वो बड़े समझदार थे . उनकी मान्यता यह थी कि जीवन की बाहरी परिधि काम है . और जो लोग अभी काम से उलझे है ,उनको मंदिर के भीतर प्रवेश का कोई अधिकार नहीं है .फ़िर अपने मित्रों को लेकर मंदिर के भीतर पहुंचे .वहां कोई काम-प्रतिमा नहीं थी ,वहां भगवान् की मूर्ति विराजमान थी . वे कहने लगे ,जीवन के बाह्य परिधि,दीवाल पर काम-वासना है .मनुष्य को पहले बाहरी दीवार का हीं चक्कर लगाना पड़ेगा .पहले सेक्स को समझो जब उसे समझ जाओगे तब महसूस होगा कि हम उससे मुक्त हो गये हैं तो भीतर खुद बखुद आ जाओगे .तद्पश्चात परमात्मा से मिलन संभव हो सकता है . &quot;</div>
<div style="text-align: justify;">आदमी ने धर्म ,नैतिकता , आदि के नाम पर सेक्स को दबाना आरम्भ किया .हमने क्या -क्या सेक्स के नाम पर खाया इसका हिसाब लगाया है कभी ? सभ्य आदमी को छोड़ कर ,आदमी भी कहना गलत है ,सभी आदमी को छोड़ कर समलैंगिकता /होमोसेक्सुँलिटी जैसी कोई चीज है कहीं ? जंगल में रहने वाले आदिवासिओं ने कभी इस बात की कल्पना नहीं की होगी कि पुरुष और पुरुष ,स्त्री  और स्त्री आपस में सम्भोग कर सकते हैं ! लेकिन सभ्य समाज के आंकड़े कुछ और हीं कहते हैं .पश्चिम के देशों को जाने दीजिये अब तो विकासशील देश भारत में भी उनके&nbsp;क्लब / संगठन&nbsp; बनने लगे हैं जो समलैंगिकता को कानूनी और सामाजिक मान्यता देने की बात लडाई लड़ रहे&nbsp; है .होमोसेक्स के पक्षधर मानते हैं &#8211; &quot; यह ठीक है इसलिए उन्हें मान्यता मिलनी चाहिए . अगर नहीं मिलती है तो यह अल्पसंख्यकों के ऊपर हमला है हमारा .दो आदमी अपनी मर्जी से साथ रहना चाहते हैं तो किसी को कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए &quot; ऐसे लोग खुलापन लाने की बात करते हैं .अरे , भाई इस समाज में प्राकृतिक सेक्स को लेकर खुलापन नहीं आ पाया है तब गैर प्राकृतिक सेक्स के सन्दर्भ में खुलापन कैसा ?</div>
<div style="text-align: justify;">आप सोच नहीं सकते यह होमो का विचार कैसे जन्मा ! दरअसल यह सेक्स के प्रति मानव समाज की लड़ाई का परिणाम है . सेक्स को केवल चंद मिनटों के मज़े का उपक्रम समझने की भूल है .जितना सभ्य समाज उतनी वेश्याएं हैं ! किसी आदिवासी गाँव या कसबे में वेश्या खोज सकते हैं आप ? आदमी जितना सभ्य हुआ सेक्स विकृत होता गया . सेक्स को जितना नकारने की कोशिश हुई उतना हीं उल्टा नतीजा आता गया . इसका जिम्मा उन लोगों के कंधे पर है जिन्होंने सेक्स को समझने के बजे उससे लड़ना शुरू कर दिया . दमित सेक्स की भावना गलत रास्तों से बहने लगी .नदी अगर रास्ते की रुकावटों के कारण अपना पथ भूल कर गलत दिशा में जहाँ गाँव बसे हैं बहने लगे तो क्या उसे रोका नहीं जायेगा ?</div>
<div style="text-align: justify;">काम / सेक्स का हमारे वर्तमान जीवन मात्र से सम्बन्ध नहीं है अपितु जीवन के आरम्भ ,उसके अंत और उसके उपरांत भी बना हुआ है . सेक्स प्रेम का जनक है और प्रेम आत्मा से परमात्मा तक जाने का जरिया . ओशो ने कहा ; काम के आकर्षण का आधार क्या है इसे समझ लेना अत्यंत आवश्यक है और यदि उस आधार पर टिके रहा जाए तो काम का राम में परिवर्तन होते देर नहीं है . ओशो को लोग सेक्स का पक्षपाती मानते हैं जबकि ऐसा नहीं है . उन्होंने काम की उर्जा को सही दिशा में ले जाने की बात कही है .</div>
<p style="text-align: justify;">स्वप्निल जी समलैंगिकता को विकृति नहीं मानते मैं सेक्स को पाप नहीं मानता .राजेंद्र यादव और अरुंधती सरीखे काम के ज्ञाता होमो -हेट्रो सभी तरह के सेक्स को मानते हैं पर शादी को नहीं मानते .अब साहब हमारा आपका मानना कोई चिरंतन सत्य तो नहीं है .बाबा रामदेव जैसे योग गुरु और दुनिया के अनेक चिकित्सक लोगों का मानना है यह एक हार्मोनल डिसआर्डर है . रामदेव जी ने तो यहाँ तक कहा कि जब मेंटल डिसआर्डर ठीक हो सकता है ,कैंसर ठीक हो सकता है तब होमो डिसआर्डर क्यों नहीं ? खैर , ये तो चर्चा का विषय है . समाज अक्सर भटकाव का शिकार होता है . इसी देश में आज से ४-५ सौ साल पहले से अब तक का कालखंड अनेक कुरीतियों में फंसा रहा जिन्हें तत्कालीन समाज के लोग सही मानते थे .क्या तब कोई साधारण आदमी तमाम अंधविश्वासों को गलत मानने को तैयार था ? नहीं , छोटे वर्ग में फैली तमाम कुरीतियाँ/विकृतियाँ शनैः शनैः विस्तार लेती गयी .हो सकता है आज अल्पसंख्यक गे और लेस्बियन लोग कल को बहुसंख्यक हो जाएँ . वैसे भी गलत चीजों को फैलते देर नहीं लगती है . लेकिन याद रहे वो समय भी जब अपने समय से दूर भविष्य की सोचने वाले लोगों ने समाज को नई दिशा दी है . हमारा देश कई बार जगा है और अपनी निरंतरता को बनाये हुए है .  स्वप्निल जी बदलाव से हम डरे नहीं .चर्चा होनी चाहिए और होमो कोई विषय नहीं है . हमारा विषय तो सेक्स और समाज है जिसमें एक पैरा होमो को मान कर चलना चाहिए . सेक्स जिस चीज के लिए आतुरता पैदा करता है उसे पा लें तो सारी झंझट ही ख़त्म ! लेकिन उस शांति को हमने छिछोरेपन में मज़े का स्वरुप दे दिया है . अपने अन्दर के प्रेम को बाहर लाने की जरुरत है .पर कैसे होगा ? हम जमीन का बाहरी आवरण हटा कर&nbsp; इस आस में बैठे हैं कि बारिश होगी तब पानी जमा होगा फ़िर पियेंगे .जबकि जरा सा गड्डा और खोद कर अन्दर का जाल प्राप्त हो सकता है . ठीक उसी प्रकार मन में बसे प्रेम को बाहर तलाशने से क्या होगा ? प्रेम तभी प्रकटित हो पायेगा जब उसे जगह मिल पायेगी .खाली ग्लास को पानी से भरी हुई बाल्टी में उलट कर रखने पर एक बूंद पानी नहीं जा पाती है क्योंकि उसमें पहले से वायु भरा होता है .उसी प्रकार सेक्स के दमन ने दिल-दिमाग पर सेक्स का कब्जा करवा दिया है . जब तक दिमाग को सेक्स के कब्जे से मुक्त नहीं करेंगे प्रेम प्रकट नहीं हो पायेगा . और ऐसा तभी होगा जब सेक्स को समझा जाए ,उसे अनुभव किया जाए .उस अनुभव में समय की शुन्यता और अहम् भाव की शुन्यता का मिलन होते हीं स्वयं प्रेम का प्रस्फुटन हो जायेगा .</p>
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		<title>सेक्स चिंतन – 3</title>
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		<pubDate>Tue, 15 Sep 2009 09:57:04 +0000</pubDate>
		<dc:creator>जयराम "विप्लव"</dc:creator>
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		<description><![CDATA[सेक्स और समाज का सम्बन्ध ऐसा बन गया है जैसे समाज का काम सेक्स पर पहरा देने का है , सेक्स को मानव से दूर रखने का है . क्या वास्तव में समाज में सेक्स के लिए घृणा का भाव है ? क्या समाज आरम्भ से ऐसा था ? नहीं , ऐसा नहीं है . सेक्स यांनी काम घृणा का विषय नहीं होकर आनंद का और परमात्मा को पाने की ओर पहला कदम है . आप भी सोचते होंगे कि जब काम इतना घृणित क्रिया है ,भाव है तो पवित्र देवालयों , प्राचीन धरोहरों आदि की मंदिर के प्रवेश द्वार या बाहरी दीवारों पर काम भावना से ओत-प्रोत मैथुनरत मूर्तियाँ अथवा चित्र आदि क्यों हैं ]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<div style="color: blue; text-align: justify;">सेक्स और समाज का सम्बन्ध ऐसा बन गया है जैसे समाज का काम सेक्स पर पहरा देने का है , सेक्स को मानव से दूर रखने का है . क्या वास्तव में समाज में सेक्स के लिए घृणा का भाव है ? क्या समाज आरम्भ से ऐसा था ? नहीं , ऐसा नहीं है . सेक्स यांनी काम घृणा का विषय नहीं होकर आनंद का और परमात्मा को पाने की ओर पहला कदम है . आप भी सोचते होंगे कि जब काम इतना घृणित क्रिया है ,भाव है तो पवित्र देवालयों , प्राचीन धरोहरों आदि की मंदिर के प्रवेश द्वार या बाहरी दीवारों पर काम भावना से ओत-प्रोत मैथुनरत मूर्तियाँ अथवा चित्र आदि क्यों हैं ? इस पोस्ट में आपकी इस साधारण शंका का समाधान करने का प्रयास किया गया है . प्रस्तुत है <span style="color: black;">&#8221; राकेश सिंह जी &#8221; </span>का यह आलेख : -</div>
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<div style="text-align: justify;"><a rel="attachment wp-att-8778" href="http://www.janokti.com/sex-and-society-%e0%a4%b8%e0%a5%87%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b8/%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a4%be-%e0%a4%b8%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%9c-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%95%e0%a4%be%e0%a4%ae-%e0%a4%b8%e0%a5%87%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b8-%e0%a4%aa%e0%a4%b0-%e0%a4%aa/attachment/khajuraho-dance-festival/"><img class="alignright size-full wp-image-8778" title="khajuraho-dance-festival" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/khajuraho-dance-festival.jpg" alt="" width="270" height="277" /></a>आखिर हमारे देवालयों मैं अश्लील मूर्तियाँ/चित्र क्यों होते हैं? इधर-उधर बहुत छाना पर इसका वास्तविक और और सही उत्तर मिला मुझे महर्षि वात्सयायन रचित कामसूत्र में | वैसे तो बाजार में कामसूत्र पर सैकडों पुस्तक उपलब्ध हैं और लगभग सभी पुस्तकों में ढेर सारे लुभावने आसन चित्र भी मिलेंगे | पर उन पुस्तकों में कामसूत्र का वास्तविक तत्व गायब है | फिर ज्यादातर पाठक कामसूत्र को ६४ आसन के लिए ही तो खरीदता है, तो इसी हिसाब से लेखक भी आसन को खूब लुभावने चित्रों के साहरे पेश करता है | पर मुझे ऐसी कामसूत्र की पुस्तक हाथ लगी जिसमे एक भी चित्र नहीं है और इसे कामसूत्र की शायद सबसे प्रमाणिक पुस्तक मानी जाती है | महर्षि वात्सयायन रचित कामसूत्र के श्लोक थोड़े क्लिष्ट हैं, उनको सरल करने हेतु कई भारतीय विद्वानों ने इसपे टिका लिखी | पर सबसे प्रमाणिक टिका का सौभाग्य मंगला टिका को प्राप्त हुआ | और इस हिंदी पुस्तक में लेखक ने मंगला टिका के आधार पर व्याख्या की है | लेखक ने और भी अन्य विद्वानों की टीकाओं का भी सुन्दर समावेश किया है इस पुस्तक में | एक गृहस्थ के जीवन में संपूर्ण तृप्ति के बाद ही मोक्ष की कामना उत्पन्न होती है | संपूर्ण तृप्ति और उसके बाद मोक्ष, यही दो हमारे जीवन के लक्ष्य के सोपान हैं | कोणार्क, पूरी, खजुराहो, तिरुपति आदि के देवालयों मैं मिथुन मूर्तियों का अंकन मानव जीवन के लक्ष्य का प्रथम सोपान है | इसलिए इसे मंदिर के बहिर्द्वार पर ही अंकित/प्रतिष्ठित किया जाता है | द्वितीय सोपान मोक्ष की प्रतिष्ठा देव प्रतिमा के रूप मैं मंदिर के अंतर भाग मैं की जाती है | प्रवेश द्वार और देव प्रतिमा के मध्य जगमोहन बना रहता है, ये मोक्ष की छाया प्रतिक है | मंदिर के बाहरी द्वार या दीवारों पर उत्कीर्ण इन्द्रिय रस युक्त मिथुन मूर्तियाँ देव दर्शनार्थी को आनंद की अनुभूतियों को आत्मसात कर जीवन की प्रथम सीढ़ी &#8211; काम तृप्ति &#8211; को पार करने का संकेत कराती है | ये मिथुन मूर्तियाँ दर्शनार्थी को ये स्मरण कराती है की जिस व्यक्ती ने जीवन के इस प्रथम सोपान ( काम तृप्ति ) को पार नहीं किया है, वो देव दर्शन &#8211; मोक्ष के द्वितीय सोपान पर पैर रखने का अधिकारी नहीं | दुसरे शब्दों मैं कहें तो देवालयों मैं मिथुन मूर्तियाँ मंदिर मैं प्रवेश करने से पहले दर्शनार्थीयों से एक प्रश्न पूछती हैं &#8211; &#8220;क्या तुमने काम पे विजय पा लिया?&#8221; उत्तर यदि नहीं है, तो तुम सामने रखे मोक्ष ( देव प्रतिमा ) को पाने के अधिकारी नहीं हो | ये मनुष्य को हमेशा इश्वर या मोक्ष को प्राप्ति के लिए काम से ऊपर उठने की प्रेरणा देता है | मंदिर मैं अश्लील भावों की मूर्तियाँ भौतिक सुख, भौतिक कुंठाओं और घिर्णास्पद अश्लील वातावरण मैं भी आशायुक्त आनंदमय लक्ष्य प्रस्तुत करती है | भारतीय कला का यह उद्देश्य समस्त विश्व के कला आदर्शों , उद्देश्यों एवं व्याख्या मानदंड से भिन्न और मौलिक है | प्रश्न किया जा सकता है की मिथुन चित्र जैसे अश्लील , अशिव तत्वों के स्थान पर अन्य प्रतिक प्रस्तुत किये जा सकते थे/हैं ? &#8211; ये समझना नितांत भ्रम है की मिथुन मूर्तियाँ , मान्मथ भाव अशिव परक हैं | वस्तुतः शिवम् और सत्यम की साधना के ये सर्वोताम माध्यम हैं | हमारी संस्कृति और हमारा वाड्मय इसे परम तत्व मान कर इसकी साधना के लिए युग-युगांतर से हमें प्रेरित करता आ रहा है – <strong>मैथुनंग परमं तत्वं सृष्टी स्थित्यंत कारणम् मैथुनात जायते सिद्धिब्रह्म्ज्ञान सदुर्लाभम |</strong> देव मंदिरों के कमनीय कला प्रस्तरों मैं हम एक ओर जीवन की सच्ची व्याख्या और उच्च कोटि की कला का निर्देशन तो दूसरी ओर पुरुष प्रकृति के मिलन की आध्यात्मिक व्याख्या पाते हैं | इन कला मूर्तियों मैं हमारे जीवन की व्याख्या शिवम् है , कला की कमनीय अभिव्यक्ती सुन्दरम है , रस्यमय मान्मथ भाव सत्यम है | इन्ही भावों को दृष्टिगत रखते हुए महर्षि वात्सयायन मैथुन क्रिया, मान्मथ क्रिया या आसन ना कह कर इसे &#8216;योग&#8217; कहा है |</div>
<p>**********</p>
<div style="text-align: justify;">जीवन और काम के शाश्वत सम्बन्ध की उपरोक्त व्याख्या गौर करने लायक है . मानव समाज समाज की नीव जिस काम /सेक्स पर टिकी हुई है कालांतर में उसी काम को समाज ने प्रतिबंधित करने की दिशा में निरंतर प्रयास किये . परिणाम हमारे समक्ष हैं , जीवन के अंतिम लक्ष्य तक ले जाने का साधन और उसकी उर्जा को नकारात्मक रूप में देखा जाने लगा . आज काम बिस्तर पर सिमट आया है जिसका लक्ष्य बस एक विपरीतलिंगी अथवा समलिंगी जोड़े की क्षणिक संतुष्टी भर रह गयी है .सम्भोग को केवल भोग,भोग,भोग, और भोग तक सीमित नहीं किया जा सकता क्योंकि भोग से संपूर्ण तृप्त होकर आगे मोक्ष की ओर जाने का अवसर आते है लेकिन काम के प्रति अपनी नकारात्मक छवि के कारण हम इस रस्ते को छोड़ दूसरे -तीसरे रास्ते में भटकते रहते हैं . हमारा यह भटकाव केवल और केवल काम / सेक्स के प्रति गलत नजरिये की वजह से है . इस मंच पर हर आलेख में इसे दूर करने का  प्रमाणिक और तथ्यपूर्ण  प्रयत्न होता रहेगा .</div>
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