” भारत की जनगणना 2011 ” एक नज़र
0” भारत की जनगणना 2011 ” काफी चर्चा में है | जाती के आधार को लेकर राजनीतिक बबाल मचा हुआ है जबकि अभी तक कोई निश्चित फैसला सरकार की ओर
इस बात से कोई भी इनकार नहीं कर सकता कि कश्मीर का अन्तर्राष्ट्रीयकरण करने के लिये बहुत कुछ तत्कालीन प्रधानमन्त्री जवाहर लाल नेहरू की अपरिपक्वता एवं अन्तर्राष्ट्रीय मामलों में उनकी
हर दस साल बाद होने वाली जनगणना का कुछ अंश पूरा हो चुका है, जबकि मुख्य काम (संदर्भ बिन्दु) नौ से 28 फरवरी, 2011 तक होगा। इससे संबंधित दो विषय
हम भारत के लोग बडे ही हर्षोल्लास से १५ अगस्त को स्वाधीनता दिवस मनाते हैं, लेकिन हममें से बहुत कम लोगों को यह भान होगा कि इससे एक दिन पूर्व यानि १४ अगस्त १९४७ को
” भारत की जनगणना 2011 ” काफी चर्चा में है | जाती के आधार को लेकर राजनीतिक बबाल मचा हुआ है जबकि अभी तक कोई निश्चित फैसला सरकार की ओर
जातिगत जनगणना के बहाने इन दिनों जाति पर ही बहस छिड़ी है। अच्छी बात है। पर विरोध हो रहा है सिर्फ जातिगत जनगणना को लेकर। धरना प्रदर्शन हो रहे हैं,
फूलवा को यकीन नहीं हो रहा था, जब उसे पंचायत के गांव में सरकारी योजना मिड-डे-मील के लिए बच्चों का खाना बनाने वाले रसोईये के तौर पर सरकारी मुलाजिम बनाया
समाज की स्थापना के समय से ही जाति की अवधारणा किसी न किसी रूप में मौजूद रही थी, भल ही हम इसे वर्ग के रूप में स्वीकार करते हों। पूर्व
देश भर में जाति आधारित जनगणना पर जोरदार बहस चल रही है | समर्थन और विरोध के स्वर मुखर हो रहे हैं | एक ओर ” मेरी जात हिन्दुस्तानी ”
लेखक : - श्रीकांत ‘कहत भिखारी नाइ, कवन करी उपाई । मुंहवा के तोहरे दुलरवा हो बबुआ, कुतुबपुर हउवे ग्राम ,रामजी संवार काम , जाति के हजाम जिला छपरा हो बबुआ
कबीर का दोहा जाति न पूछो साधु की , पूंछ लीजिये ज्ञान अब पुराना हुआ . जमाना ज्ञान की पूंछ परख का नही है . जमाना नेता जी की पूंछ
आज के समय मे जाति की बात को हम भारतीयों से अलग कर के नही रखा जा सकता है । भारत में जाति आधारित जनगणना इस समय चर्चा में है।
सर्वप्रथम हमें यह समझना होगा कि हमारे देश के विभाजन के समय हमारे तत्कालीन नेतृत्व ने सभी धर्मावलम्बियों तथा आदिवासियों एवं दलितों को आश्वस्त किया था कि वे भारत में
जनगणना से जात हटाओ के नारे के साथ कुछ तथाकथित बिना जात के लोगों ने उपवास और धरना दिया है। चलिये, इस जनत्रंत में सबको कुछ भी कहने-करने की आजादी