पर्यावरण का करों ख्याल……..

पर्यावरण दिवस पर विशेष  दुनिया भर में 5 जून का दिन विश्व पर्यावरण दिवस के रूप में मनाया जाता है। 1973 में सबसे पहले अमेरिका में विश्व पर्यावरण दिवस के रूप में मनाया गया था। इस वर्ष भी हर वर्ष की तरह पर्यावरण दिवस पर दो-चार पेड़ लगाकर हम अपने दायित्व को पूरा कर लेंगे। लेकिन प्रकृति को समझने की कोशिश नहीं करेंगे। देखा जाए तो सृष्टि के निर्माण में प्रकृति की अहम भूमिका रही है। यहां हमने इतिहास →आगे पढ़ें ..

पतन की ओर अग्रसर भारतीय कृषि

कृषि खेती और वानिकी के माध्यम से खाद्य पदार्थों के उत्पादन से सम्बंधित है.मानव सभ्यता के इतिहास में कृषि की खोज को इतना महत्वपूर्ण माना जाता है कि इसे नवपाषाणकालीन क्रांति भी कहा जाता है.यह कृषि ही थी जो पूरी दुनिया में विभिन्न सभ्यताओं के जन्म लेने का कारण बनी.यह शुरू से ही पशुपालन से कुछ इस तरह जुड़ी रही है कि दोनों को एक-दूसरे का पूरक भी कहा जा सकता है.कृषि ने ही घनी आबादी वाली बस्तियों →आगे पढ़ें ..

रासायनिक खेती से उपज बढ़ने का झूठ !

56 से घटकर 30 क्विंटल रह गई यानि ये दावे पूरी तरह गलत हैं, झूठे हैं कि उपज बढ़ाने के लिए रासायनिक खेती की जरूरत है। सच तो यह है कि रासायनिक खेती से उपज घट रही है और देश में अनाज की कमी बढ़ रही है जबकि खेती को घाटे का सौदा बनाने के लिए खर्च जान बूझकर बढ़ाया जा रहा है। इस विदेशी प्रयास में स्वदेशी, सरलचित वैज्ञानिकों का इस्तेमाल किया जा रहा है। रासायनिक खेती से घटती उपज के प्रमाण हमने जितने किसानों →आगे पढ़ें ..

बन्दरों को भोजन न दें !

सरकार के आह्वान पर ध्यान देना चाहिए। खेती को खत्म करने की अनेक योजनाओं में से एक हैं बन्दरों का सदुपयोग। हजारों साल से किसान और बन्दर दोनों अपने-अपने अस्तित्व को बनाए हुए थे। अनायास बन्दर खेती के लिए मुसिबत बन गए। समस्या इतनी विकराल हो गई कि हजारों किसानों को खेती छोड़नी पड़ गई हैं। उनकी आर्थिक स्थिति पहले ही अच्छी नहीं थी, अब और बिगड़ गई। हिमाचल के हजारों एकड़ खेत खाली पड़े हैं जो किसानों →आगे पढ़ें ..

मोनसेंटो के विनाशकारी मक्का बीज

विनाशकारी ‘‘बीटी कॉटन ’’ बीज की निर्माता कम्पनी मौनसेण्टों ने हिमाचल में भी अपने पांव तेजी से पसारने शुरू कर दिये हैं। ‘‘डिकाल्ब’’ नामक मक्का बीज मण्डी, हमीरपुर के बाद अब प्रदेश के कई भागों में उगाने शुरू हो गए हैं। इन बीजों का मिट्टी, मनुष्यों और पर्यावरण पर कितना और कैसा बुरा प्रभाव होना है, यह तो आने वाला समय बतलाएगा। पर इस कम्पनी के पिछले कार्यों को देखकर ऐसी आंशका स्वाभाविक है →आगे पढ़ें ..

गंगा रक्षा, भारत रक्षा, अभी वक्त है चेतो भारतवासियो

पुण्य सलिला सुरसरी, पतितपावनी, जगउद्धारिणी गंगा जिसका हर भारतवासी से जन्म से लेकर मरण तक का अटूट नाता है।  जिसे श्रद्धा से  गंगा मैया कह कर बुलाते हैं और जो जाने कितनी संस्कृतियों की साक्षी और इतिहास की गवाह है। जिसके तट पर संस्कृतियां जन्मी, जिसने सदियों से जमाने का हर दर्द सहा फिर भी लोगों में बांटती रही अमृत। वह गंगा जिसके बारे में कहा जाता है-गंगा ही हिंदुस्तान, हिंदुस्तान है गंगा, →आगे पढ़ें ..

सरकारी जल नीति की हकीकत

। हम भीतर बाहर से जल ही से जुड़े हुए हैं। पीने के लिए, खाद्यान्न उत्पादन के लिए, उद्योग, बिजली उत्पादन इत्यादि के लिए भी जल ही चाहिए। जैसे जल के अनेक उपयोग हैं वैसे ही जल के स्त्रोत भी हैं। अनेक चिन्तनषीलों का मत है कि आने वाले समय जल-संकट का समय होगा और जल ही विभिन्न देशों में विवाद का कारण बनेगा। इन्ही सब विषयों पर समग्र दृष्टिकोण स्थापित करने के लिए सरकार ने 1987 में पहली जल-नीति की घोषणा →आगे पढ़ें ..

सोलर वेली के साथ गोबर वेली भी बने

भारत को गांवों का देश कहा जाता है. अर्थात भारत को पहचान देने वाली विशेषताओं एवं जीवनशक्ति प्रदान करने वाले कारकों की नींव ग्रामीण व्यवस्था पर टिकी होती है. भारत की जीवन दायिनी ग्रामीण ताने-बाने का आधार है कृषि , जो आज के आई टी युग में में भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ बनी हुई है . और भारत के रीढ़ की यह हड्डी को बचाए रखने में गौवंश का योगदान नकार पाना कठिन है . दरअसल भारत और गाय का सम्बंध आर्थिक, →आगे पढ़ें ..

अब नदियों का मिलन हुआ अधूरा

नदियाँ किसी भी देश की जीवनदायनी शक्ति होती है .भारत की 50 प्रतिशत से ज्यादा आबादी नदियों से ही अपनी अजीविका कमाने में सक्षम हो पाती है . वहीँ इस देश में नदियों को आपस में जोडने वाली महत्वाकांक्षी परियोजना अब ठंडे बस्ते में जा पहुंची है बिना आधार के और बिना तथ्य के इस परियोजना को बंद किया जाना औचित्य पूर्ण कार्य नहीं था। कम से कम इस घटना को नकारने से पहले इसके ठोस और तथ्यपरक कारण जरूर निश्चित →आगे पढ़ें ..
October 12, 2009

यमुना किनारे विचरने के बहाने

     नदियां हमेशा उस जगह को एक संस्कृति देती हैं जहां वो बह रही होती हैं। नदियों के साथ एक पूरा जीवन और उस जीवन के बरक्स लोगों की दैनिक जीवनचर्या भी नदियों से जुड़ जाती है। चाहे वो बनारस या हरिद्वार के घाट हों या किसी छोटे से गांव के किनारे बह रही अनजान से नाम वाली नदी के किनारे, नदी होने से उनका होना कुछ अलग ही अहमियत से सराबोर हो जाता है। उन घाटों, उन किनारों में होने वाली चहल पहल की →आगे पढ़ें ..