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	<title>JANOKTI : जनोक्ति :  राज-समाज और जन की आवाज &#187; osho</title>
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		<title>आत्ममुग्धता की बढ़ती भावना खतरनाक है</title>
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		<pubDate>Wed, 28 Oct 2009 17:10:26 +0000</pubDate>
		<dc:creator>दीपाली पाण्डेय</dc:creator>
				<category><![CDATA[जीवन]]></category>
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		<category><![CDATA[प्रसिद्द मनोवैज्ञानिक फ्रायड]]></category>

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		<description><![CDATA[&#160; मानव स्वयं के होने के बोध यानि अहम् के साथ नहीं जन्म लेता हैं। अहं का भाव समय के की धारा के संग-संग दिलोदिमाग पर छा जाता है। यह बाहरी दुनिया से हमारे मन के संसार का मिलन होने ]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;">
	<a href="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2009/10/Man-Mirror.jpg"><img alt="Man-Mirror/janokti /sexual man / " class="aligncenter size-medium wp-image-996" height="300" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2009/10/Man-Mirror-287x300.jpg" title="Man-Mirror/janokti /sexual man / " width="287" /></a>&nbsp; मानव स्वयं के होने के बोध यानि अहम् के साथ नहीं जन्म लेता हैं। अहं का भाव समय के की धारा के संग-संग दिलोदिमाग पर छा जाता है। यह बाहरी दुनिया से हमारे मन के संसार का मिलन होने से आता है। माता-पिता ,भाई-बंधू ,परिवार -समाज के नियंत्रण, उनकी अपेक्षाओं, सामाजिक व पारिवारिक परिवेश का मन के ऊपर प्रभाव होना स्वाभाविक हीं है।<br />
	प्रसिद्द मनोवैज्ञानिक <strong>फ्रायड</strong> इसे ईगो लिबिडो यानी आत्मरति कहते हैं।&nbsp; आत्मरति या आत्ममोह अर्थात खुद के लिए और प्रशंसा में एक असाधारण मनोभाव ।जब कोई माँ -बाप,परिजन ,शिक्षक आदि बच्चों से यह कहते हैं कि तुम बहुत खूबसूरत हो, मेधावी हो और दूसरों से अलग हो, तो आपको इसका तनिक भी बहन नहीं हो होता कि वो बच्चे में विशिष्टता का एक ऐसा भाव पैदा कर रहे हैं जो भविष्य में उसके व्यक्तित्व को बुरी तरह प्रभावित कर सकता है। बच्चों की एक सीमा तक तारीफ ही अच्छी है । तुलना की यह प्रक्रिया जब बहुत बढ जाती है और व्यक्ति कई स्थितियों में स्वयं को हीन महसूस करने लगता है । मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि जिन बच्चों को विशिष्ट करार दिया जाता है, वे आगे चल कर आत्मकेंद्रित, अहमवादी और अक्खड़ बन जाते हैं। ऐसे बच्चे अपने गलत कार्य को भी सही मानने लगते हैं। बड़े होकर उनमें सहानुभूति की भावना बेहद कमजोर पड़ जाती है और वे धोखेबाज व बेवफाई जैसे कदमों को भी अपना बड़प्पन मानने लगते हैं जिन बच्चों को विशिष्ट करार दिया जाता है, वे आगे चल कर आत्मकेंद्रित, अहमवादी और अक्खड़ बन जाते हैं। ऐसे बच्चे अपने गलत कार्य को भी सही मानने लगते हैं। बड़े होकर उनमें सहानुभूति की भावना बेहद कमजोर पड़ जाती है और वे धोखेबाज व बेवफाई जैसे कदमों को भी अपना बड़प्पन मानने लगते हैं।<br />
	बचपन में पनपी आत्ममुग्धता की भावना धीरे-धीरे अति ओर बढ़ती हुई मनुष्य की मनोस्थिति को ऐसे स्तर पर ले जाता है जहाँ वह स्वयं को किसी की तुलना में हीन समझता है या फ़िर औरों को अपने समक्ष नगण्य ।&nbsp; दोनों हीं स्थिति में मनुष्य की मनुष्यता का ह्रास होता है । यदि मानव के अन्दर हीनता का भाव पैठ जाए तो वह समाज से बचने का प्रयत्न करता है और इसी क्रम में अपने ऊपर एक छद्म आवरण बना लेता है ताकि दूसरो को उसकी वास्तविकता का ज्ञान न हो ।जब उसे लगता है कि उसकी असलियत जाहिर हो सकती है, वह रक्षात्मक हो जाता है। व्यक्ति यदि शक्तिसंपन्न हुआ तो रक्षा का यह तरीका डांट-फटकार और कमजोर हुआ तो उलाहनों, रोने व नकारात्मक सोच के रूप में सामने आता है। इस अवस्था में व्यक्ति को यदि चाटुकारों से पाला पड़ जाए तो इससे निकल पाना बेहद मुश्किल हो जाता है ।<br />
	मनुष्य के मनोविज्ञान पर शोध कर रहे <strong>ट्वेंजे</strong> मुताबिक पूर्ववर्ती पीढ़ियों की तुलना में आज बच्चे इसलिए अधिक आत्मकेंद्रित हो गए हैं, क्योंकि माता-पिता उनके दोष को भुला कर उनकी हद से ज्यादा तारीफ करते हैं। बच्चों पर &lsquo;आत्मसम्मान संवर्द्घन अभियान&rsquo; जैसी मुहिम का भी असर पड़ा है। वे अपने को अधिक विशिष्ट समझने लगे हैं। बच्चे को यह बताना बंद किया जाना चाहिए कि &lsquo;तुम खास हो&rsquo;।</p>
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		<title>डिस्कसन कोई नया लफड़ा नहीं है</title>
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		<pubDate>Sun, 18 Oct 2009 05:31:11 +0000</pubDate>
		<dc:creator>जनोक्ति डेस्क</dc:creator>
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			<content:encoded><![CDATA[<p><a href="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2009/10/discussion-group.jpg"><img width="300" height="225" class="aligncenter size-medium wp-image-930" title="discussion-group" alt="discussion-group" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2009/10/discussion-group-300x225.jpg" /></a></p>
<p style="text-align: justify;">&nbsp;आज एक हिंदी ब्लॉग पर छपे पोस्ट में डिस्कसन की चर्चा पढ़ी .जिसमें हिंदी मीडिया वाले ग्लोबल वार्मिंग को लेकर प्रसारित होने वाले कार्यक्रम के लिए पैनल बना रहे हैं . अब ,इन ससुरों को कौन समझाए दिन भर ए ०सी० में रहने वाले लोग जिन्हें स्वच्छ हवा लग जाए तो सर्दी हो जाती है . वो ग्लोबल वार्मिंग पर डिस्कस करेंगे ? वैसे यार बुराई नहीं है डिस्कस तो कोई भी कर सकता है . डिस्कस हीं तो करना है .दुनिया को ग्लोबल वार्मिंग का वरदान देने वाले देश अमेरिका आदि भी तो डिस्कस ही कर रहे है . डिस्कस एक ऐसा तरीका है जिससे मानव हर समस्या का समाधान खोजने का अभिनय करके मन को संतुष्ट करता है . दुनिया भी उसके इस स्वांग में मज़े लेती है . अरे ,भारत में तो लगभग सारे काम डिस्कसन पर हीं टिके हैं  . नक्सलियों से डिस्कस होती रहती है . अभी चीन से १२वे चरण के डिस्कस की तैयारी चल रही है . जब भी कुछ बड़ा धमाका होता है घुसपैठ होती है तो पाकिस्तान से डिस्कस करने की तैयारी शुरू हो जाती है .पानी के बटवारे को लेकर कर्णाटक तमिलनाडु से डिस्कस करता है . मायावती सर्वोच्च न्यायलय में डिस्कस कर रही है आखिर उसने अपनी मूर्ति जनता के पैसों से क्यों लगवाई ? कोई पार्टी आम चुनाव हारती है तब भी डिस्कसन होता है . जसवंत पार्टी से निकले जाते हैं तब भी डिस्कसन होता है . सार्वजनिक सन्दर्भों से अलग व्यक्तिगत जिन्दगी में भी डिस्कसन का महत्व बढ़ता जा रहा है .भाई -भाई , पति-पत्नी , बाप-बेटे की आपस की लड़ाई में भी डिस्कस के रामबाण से अचूक कोई इलाज नहीं है . अरबों के भारत में कुछ एक हज़ार न्यायालय इस बात की तस्दीक करते हैं कि यहाँ डिस्कस यानी बातचीत का कितना क्रेज है . यही नहीं पौराणिक कथाओं में भी डिस्कसन अर्थात शास्त्रार्थ की परंपरा का जिक्र मिलता है . मंडन मिश्र और शंकराचार्य का डिस्कसन जग जाहिर है .मध्यकाल में भी कुछ राजाओं के दरबार में डिस्कसन की चर्चा देखने को मिलती है .&nbsp; दक्षिण भारत के प्रतापी राजा कृष्णदेव राय&nbsp; और सम्राट अकबर के दरबार में बुद्धिजीवों के बीच होने वाले डिस्कसन आज भी मशहूर हैं और कहावतों के रूप में लोकप्रचलित भी . राजा महाराजाओं के अलावा सबसे महत्वपूर्ण डिस्कसन गुरुकुल में हुआ करता था जहाँ गुरु-शिष्य ब्रह्माण्ड के विभिन्न विषयों पर डिस्कस किया करते थे .आम आदमी चौपाल पर अपनी घर-गृहस्थी की बातें डिस्कस किया करते थे . अब ना तो चौपाल रहे , ना हीं गुरुकुल और ना हीं राजदरबार धीरे -धीरे डिस्कसन की स्वस्थ परंपरा बदल रही है .आज निरुद्देश्य, पक्षपातपूर्ण और दिखावे के डिस्कसन का चलन बढ़ गया है .राजदरबारों से निकल कर पान की दुकानों पर , गुरुकुल से निकल कर कॉलेज केंटिन में ,और चौपालों से हटकर दफ्तरों /सत्संग स्थलों / पार्कों आदि सार्वजनिक जगहों पर डिस्कसन का निवास स्थान हो गया है .आज कल राउंड टेबल डिस्कसन बड़े जोरों पर है . पर कोई बात नहीं जल्द हीं डिस्कसन को यहाँ से भी बगैर किसी नोटिस के निकाल दिया जायेगा तब वह चल देगा एक नए आशियाने की तलाश में &#8230;..</p>
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		<title>आइये खोजें मानव जीवन के रहस्य को {भाग -१}</title>
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		<pubDate>Sat, 17 Oct 2009 18:45:53 +0000</pubDate>
		<dc:creator>जयराम "विप्लव"</dc:creator>
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		<category><![CDATA[मानव जीवन]]></category>

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		<description><![CDATA[जीवन एक दौड़ है . वह&#160; बेतहाशा भाग रहा है बगैर यह जाने कि किस ओर जा रहा है ? कुछ पा लेने की ख्वाहिश मन की उत्कंठा को बढ़ा रही है . क्या पा लेना चाहता है वह ? ]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><a href="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2009/10/internet1.jpg"><img width="300" height="199" class="aligncenter size-medium wp-image-924" title="internet" alt="internet" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2009/10/internet1-300x199.jpg" /></a>जीवन एक दौड़ है . वह&nbsp; बेतहाशा भाग रहा है बगैर यह जाने कि किस ओर जा रहा है ? कुछ पा लेने की ख्वाहिश मन की उत्कंठा को बढ़ा रही है . क्या पा लेना चाहता है वह ? क्या उसे मालुम है उसकी मंजिल कहाँ है ? शायद नहीं भी और हाँ भी . वह असमंजस की स्थिति में यूँ ही आगे चला जा रहा है . इस बिना ट्राफी वाली दौड़ में वह अकेला नहीं है . इस संसार के अरबों इंसान इसी मुफलिसी के शिकार है . जीवन मानव सभ्यता की सबसे बड़ी पहेली बनकर रह गयी है .आज मानव के पास भौतिक सुख-सुविधा की हर वस्तु मौजूद है . पर इंसान बेचैन क्यों है ? क्या यह बेचैनी जीवन को ना समझ पाने की वजह से है ? मानव इतिहास में जिन चंद लोगों को दुनिया में सर्वमान्यता मिली हुई है क्या उन्होंने&nbsp; जिन्दगी के पहलुओं में छुपे रहस्यों को समझ लिया था ? आखिर क्या है जीवन का रहस्य ? एक समय संसार के सबसे प्राचीन धर्म {जीवन पद्धति } की रुढियों को चुनौती देने वाले&nbsp; महात्मा बुद्ध का आगमन हुआ था . भोगविलास की सुविधा संपन्न राजकुमार को आखिर किस बात की कमी खटक रही थी ? वह कौन सा कंटक मन को चुभ रहा था जिसने उसे महल -अटारी त्याग कर भिक्षुक बन यत्र-तत्र विचरने पर मजबूर कर दिया ? क्या जीवन को समझने का लक्ष्य सिद्धार्थ को महात्मा बुद्ध की ओर ले गया ? बुद्ध को स्वीकार्यता मिलना क्या सिद्धार्थ होने की देन है ?गृहस्थाश्रम छोड़ कर संन्यास ग्रहण करने के अनेक उदाहरण बिखरे पड़े हैं . ऐसे में समाज द्वारा बुद्ध को अपनाने पर भी प्रश्न उठाया जा सकता है . मानव सभ्यता की तमाम उपलब्धियां एक छोटे कालखंड में अपने सार्थक हैं और समकालीन मानव समाज उसे हीं अंतिम&nbsp; सत्य मानने की भूल&nbsp; करता आया है . यह बात राजनैतिक ,सामाजिक ,आध्यात्मिक ,सांस्कृतिक सभी आयामों में हुबहू प्रयुक्त होता है .प्रथम&nbsp; दृष्टि में बुद्ध को समझने पर ऐसा हीं मालुम होता है कि ज्ञान प्राप्ति हीं मनुष्य का अंतिम लक्ष्य है .लेकिन क्या बुद्ध ने जो कुछ अनुभव किया वह मानव जीवन का अंतिम सत्य है ? बुद्ध स्वयं अपने शिष्यों को कहते हैं &quot; मैंने जो कुछ कहा वह अंतिम सत्य नहीं है .आपकी ज्ञानेन्द्रियाँ जागृत है .खुद से सोचें ,समझें और अपने -अपने सत्य का संधान करें &quot; .अब तक ज्ञात&nbsp; मानव जीवन दर्शन अथवा विज्ञान&nbsp; में&nbsp; कोई अंतिम बात नहीं सिद्ध हो पाई है . चाहे आर्कमिडीज ,न्यूटन ,आइन्स्टीन ,सुकरात ,प्लेटो ,मनु, बुद्ध ,महावीर, ओशो ,या मुहम्मद सल्ल&nbsp; को देखें सबके तो एक तथ्य सामान दिखाई पड़ता है कि सबके अनुयायियों की अभीप्सा आज भी जस की तस बनी हुई है . सच तो यह है कि सत्य किसी से सुनकर आत्मसात करने की चीज नहीं है . सत्य किसी खोज नहीं हो सकता . सत्य को दर्ह्स्य नहीं जा सकता . सत्य अनुभव से परे और अनुभूति से दूर है . ठीक उसी प्रकार जैसे किसी को तैरना सीखना है तो इसके लिए तैरना जरुरी है और तैरने के लिए नदी में उतरना जरुई है . नदी के किनारे बैठकर सोचने मात्र से तैरने की विद्या नहीं आ सकती है . सत्य को जानना भी इसी से मिलती जुलती प्रक्रिया है . हम किनारे बैठ कर तैरने के सिद्धांत और नियम बना सकते हैं पर वाकई में तैरने के लिए नदी में&nbsp; गहरे पैठने की आवश्यकता होती है . किसी का अनुशरण करना और अनुयायी बन उसके हिस्से के सत्य को सबका सच मान लेने जैसा है .क्या सत्य का सच कभी मानव जान पायेगा ? प्रकृति में इतनी विविधता है कि समस्त ब्रह्माण्ड में नित नए &#8211; नए सिद्धांतों का आगमन होता रहता हैं . स्थिरता नाम की किसी चीज का अस्तित्व इस जगत में संभव नहीं दिखता . प्रत्येक हिस्सा चलायमान और क्षण भंगुर है .भौतिक जगत में मृत्यु जीवन का अंतिम सत्य होते हुए&nbsp; भी मनुष्य को सर्वाधिक अस्वीकार्य है .मानव स्वभाव में अपने अस्तित्व की समाप्ति को सहन कर पाना सहज नहीं होता . मृत्यु को झुठलाने का साधन भी मनुष्य ने इहलोक से परलोक की ओर आवागमन की कल्पना करके जुटा लिया है . { आगे जारी &#8230;&#8230;&#8230;}</p>
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