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आखिर मीडिया.. संजीव भट्ट की सच्चाई देश को क्यों नहीं बताती ??

आखिर मीडिया.. संजीव भट्ट की सच्चाई देश को क्यों नहीं बताती ??

7 जितेन्द्र प्रताप सिंह / 2011/10/04 7:15 am

मित्रों कांग्रेस और विदेशी ताकतों के फेके टुकड़े पर पलने वाली मिडिया आखिर संजीव भट्ट के बारे मे इस देश के सामने सिर्फ आधी सच्चाई ही क्यों दिखा रही है

ओबामा को लेकर कितने टन अख़बार छपे ?

ओबामा को लेकर कितने टन अख़बार छपे ?

2 आत्मानंद / 2010/11/07 8:16 pm

रविश कुमार (जाने -माने पत्रकार हैं ) अमेरिका में ओबामा कम हो रहे हैं। भारत में ओबामा अत्यधिक हुए जा रहे हैं। पांच दिनों से ओबामा के बारे में हर

धर्मनिरपेक्ष मीडिया और नेताओं का दोगलापन

धर्मनिरपेक्ष मीडिया और नेताओं का दोगलापन

0 शंकर दत्त फुलारा / 2010/10/17 6:19 am

एक सेकुलर का प्रलाप अरे !। बुखारी जी तुमने ये क्या किया ? पत्रकार की छाती पर नहीं.. तुमने तो हमारे मुहं पर लातमार दी !अब मुहं कैसे खोलें ?

सूखती स्याही और कुन्द होती खबरों की धार

सूखती स्याही और कुन्द होती खबरों की धार

0 के .पी. त्रिपाठी / 2010/09/10 10:46 pm

“मत कहो, आकाश में कुहरा घना है, यह किसी की व्यक्तिगत आलोचना है ” दुष्यंत कुमार की यह पंक्ति वर्तमान मीडिया परिवेश में अक्षरतः सटीक बैठती हैं। कलम की स्याही सूख रही

इलैक्ट्रॉनिक मीडिया नया विलन

इलैक्ट्रॉनिक मीडिया नया विलन

0 अखिलेश शर्मा / 2010/08/24 9:58 am

80 के दशक की यादें ताज़ा हो गईं. तब गांव में एक बड़े हॉल में एक टीवी पर वीडियो फिल्में देखने जाता था. चाहे शक्ति कपूर हो, अमरीश पुरी या फिर

मनोरंजक  खबरिया चैनल

मनोरंजक खबरिया चैनल

0 संजय कुमार / 2010/08/23 9:51 pm

तेजी से दर्शकों के मानसपटल पर छा जाने वाले संचार क्रांति के सशक्त माध्यम, खबरिया चैनल मनोरंजन चैनलों में तब्दील होते जा रहे हैं। राजनीतिक खबरों को पीछे धकेलते हुए

अभिव्यक्ति की आज़ादी और मर्यादा

अभिव्यक्ति की आज़ादी और मर्यादा

0 विजय कुमार / 2010/08/14 11:30 am

किसी भी लोकतान्त्रिक देश में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता होना ही चाहिए। फिर भी इस विषय पर बार-बार विवाद खड़े होते हैं। प्रायः लोग इसे राजनीति में घसीटकर इस या उस

दस टकिये पत्रकारों का दर्द

दस टकिये पत्रकारों का दर्द

0 संजय कुमार / 2010/07/31 1:47 pm

दूसरों के दुखःदर्द व जुल्म सितम के लिए रोजाना लड़ाई लड़ने वाले कलम के सिपाहियों के हक के लिए कोई खड़ा नहीं दिखता है। समाज में व्याप्त बराबरी-गैरबराबरी से पत्रकारों

बाबाओ का मायाजाल टीवी पर बनाये माला-माल

बाबाओ का मायाजाल टीवी पर बनाये माला-माल

0 अनिकेत प्रियदर्शी / 2010/07/25 5:19 pm

आज कल टेलीविजन पर प्रतिदिन ज्‍योतिषों का मेला लगा रहता है और उनकी बातें कुछ अजीब तरह का सनक मन में पैदा कर देती है। आपका शनि चौथे घर मे

महिला हॉकी कोच कौशिक के लिए अलग कानून

महिला हॉकी कोच कौशिक के लिए अलग कानून

1 डा ० पुरुषोत्तम मीणा / 2010/07/25 11:07 am

सवाल यह उठता है कि यदि यही आरोप महिला हॉकी टीम की खिलाडी ने हॉकी संघ के बाहर के किसी व्यक्ति पर लगाया होता, मसलन किसी दर्शक पर, क्या तब