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	<title>JANOKTI : जनोक्ति :  राज-समाज और जन की आवाज &#187; marks</title>
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		<title>बिनायक सेन,नक्सलवाद और पिछड़ेपन की वजह</title>
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		<pubDate>Sat, 22 Jan 2011 20:37:51 +0000</pubDate>
		<dc:creator>जयराम "विप्लव"</dc:creator>
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		<description><![CDATA[भाकपा (माओवादी) हिंसा में विश्वास रखने वाले तथाकथित कम्युनिस्टों का एक संगठन है जिन्होंने बंगाल के नक्सलबाड़ी गांव से 1967 में सशस्त्र क्रांतिकारी गतिविधियों का रास्ता अपनाया &#124; आज भारत के बीस राज्यों के 220 जिलों में नक्सलवादी सक्रिय हैं ]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;">भाकपा (माओवादी) हिंसा में विश्वास रखने वाले तथाकथित कम्युनिस्टों का एक संगठन है जिन्होंने बंगाल के नक्सलबाड़ी गांव से 1967 में सशस्त्र क्रांतिकारी गतिविधियों का रास्ता अपनाया | आज भारत के बीस राज्यों के 220 जिलों में नक्सलवादी सक्रिय हैं |  भारत के भौगोलिक क्षेत्र का लगभग 40 प्रतिशत भूभाग इनके आतंक से पीड़ित है  | इन तथाकथित नक्सलियों ने नक्सलवाद के पीछे की विचारधारा को खो दिया है और वे सिर्फ राज्य सत्ता से नाराज  बेरोजगार और आर्थिक रूप से पिछड़े लोगों को अपने मतलब के लिए हथियार बना कर परोक्ष सत्ता की मलाई मार रहे हैं |</p>
<p style="text-align: justify;"><a rel="attachment wp-att-12780" href="http://www.janokti.com/editorial-%e0%a4%b8%e0%a4%ae%e0%a5%8d%e0%a4%aa%e0%a4%be%e0%a4%a6%e0%a4%95-%e0%a4%89%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%9a/%e0%a4%ac%e0%a4%bf%e0%a4%a8%e0%a4%be%e0%a4%af%e0%a4%95-%e0%a4%b8%e0%a5%87%e0%a4%a8%e0%a4%a8%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b8%e0%a4%b2%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%a6-%e0%a4%94%e0%a4%b0-%e0%a4%aa%e0%a4%bf/attachment/binayak-sen-naxalites/"><img class="alignleft size-full wp-image-12780" title="binayak sen naxalites" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/binayak-sen-naxalites.jpg" alt="" width="316" height="212" /></a>नक्सलवाद भारत के लिए एक गंभीर समस्या है | हाल ही में, छत्तीसगढ़ की अदालत ने बिनायक सेन, राष्ट्रीय पीपुल्स यूनियन के उपाध्यक्ष (PUCL) को राज्य के खिलाफ लड़ाई में नक्सलियों की मदद करने के लिए राजद्रोह का दोषी पाया है | और सेन को आजीवन कारावास की सजा सुनाई है | अदालत के निर्णय को मीडिया में , सोशल नेटवर्किंग साइटों पर, ब्लोग्स पर कुछ एक नक्सल कार्यकर्त्ता बिनायक सेन को लेकर मानव अधिकारों की चिल्ल-पों मचाये हुए हैं |</p>
<p style="text-align: justify;">बिनायक सेन नक्सलियों का पदाधिकारी हो भी सकता है और नहीं भी , लेकिन किसी ना किसी रूप में नक्सलियों के सहयोग का अपराध साबित हुआ है |  वरना जो अदालतें हत्यारों को फाँसी नहीं चढ़ा पाती है वो इस प्रकार जबरिया फैसला नहीं सुना सकती |  एक हद तक सेन की गिरफ्तारी से सजा सुनाये जाने तक इन शौकिया नक्सलियों का बौद्धिक विलास नक्सलवाद की अग्नि में घी डालने का काम कर रहा  है |</p>
<p style="text-align: justify;">इन्हीं तथाकथित-बुद्धिजीवियों की बिरादरी ने नक्सलियों द्वारा  दंतेवाड़ा में हमारे 76 जवानों की शहादत पर जेएनयू में जश्न मनाया था | ये वही लोग हैं जो गाजा पट्टी की हिंसा पर घडियाली आंसू तो बहाते फ़िरते हैं लेकिन इनके मुंह से नक्सलवाद और  आतंकवाद की  लड़ाई में मारे जाने वाले आम भारतीयों के नाम पर जीभ तालू में सट जाती है और आँखों का समंदर सूख जाता है |</p>
<p style="text-align: justify;">भारत की बिकाऊ मीडिया भी अपने मानवतावाद को साबित करने के लिए ऐसे देशद्रोहियों को टीवी स्टूडियो बुलाकर मंच सौंपने का पुन्य कर्तव्य निभा रही है |</p>
<p style="text-align: justify;"><a rel="attachment wp-att-12781" href="http://www.janokti.com/editorial-%e0%a4%b8%e0%a4%ae%e0%a5%8d%e0%a4%aa%e0%a4%be%e0%a4%a6%e0%a4%95-%e0%a4%89%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%9a/%e0%a4%ac%e0%a4%bf%e0%a4%a8%e0%a4%be%e0%a4%af%e0%a4%95-%e0%a4%b8%e0%a5%87%e0%a4%a8%e0%a4%a8%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b8%e0%a4%b2%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%a6-%e0%a4%94%e0%a4%b0-%e0%a4%aa%e0%a4%bf/attachment/naxalites/"><img class="alignright size-full wp-image-12781" title="naxalites" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/naxalites.bmp" alt="" /></a>इन समर्थकों पता है कि उनके सशस्त्र साथी अपने कैडर  में स्कूली बच्चों तक को शामिल करते हैं , आम लोगों की लड़ाई के नाम पर सरकारी विकास कार्यों का क्रियान्वयन नहीं होने देते , ठेकेदारों से लेवी वसूल कर अपनी कोठियां भरते हैं , दुश्मन देशों, जो  भारत के शांति और सद्भाव को नष्ट करना चाहते हैं , उनसे मिलकर देश को बर्बाद करने में लगे हुए हैं |</p>
<p style="text-align: justify;">हम भी गरीब किसान-मजदूरों के माथे से टपकती पसीने की बूंदों की कीमत जानते हैं , लेकिन उनकी दशा में सुधार राजकीय विकास से ही संभव है ना कि हथियार उठा कर जंगलों की खाक छानने से और अपने जैसे अन्य निहंगों को भी अपना शिकार बनाने से  |  नक्सलियों द्वारा उन सरकारी अधिकारियों और कर्मचारियों को भी मौत के घाट उतार दिया जाता है जो शांति से क्षेत्र में सड़कों , विद्यालयों और स्वास्थ्य केन्द्रों की व्यवस्थित सेवा बहाल करना चाहते हैं |</p>
<p style="text-align: justify;"><a rel="attachment wp-att-12782" href="http://www.janokti.com/editorial-%e0%a4%b8%e0%a4%ae%e0%a5%8d%e0%a4%aa%e0%a4%be%e0%a4%a6%e0%a4%95-%e0%a4%89%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%9a/%e0%a4%ac%e0%a4%bf%e0%a4%a8%e0%a4%be%e0%a4%af%e0%a4%95-%e0%a4%b8%e0%a5%87%e0%a4%a8%e0%a4%a8%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b8%e0%a4%b2%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%a6-%e0%a4%94%e0%a4%b0-%e0%a4%aa%e0%a4%bf/attachment/child-in-naxal-areas/"><img class="alignleft size-medium wp-image-12782" title="child in naxal areas" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/child-in-naxal-areas-300x217.jpg" alt="" width="300" height="217" /></a>झारखण्ड के पलामू जिले का मनातु प्रखंड आज शोषित और  पिछड़ा है तो इसके पीछे कोई और कारण नहीं है | इनके  आतंक की वजह से किसी ठेकेदार ने सड़क बनाने का टेंडर नहीं भरा है | स्थानीय नागरिक आवाजाही के लिए एक मात्र बस का उपयोग कर पाते हैं क्योंकि वो बस भी नक्सल समर्थित रंगदार के द्वारा चलाई जाती है | प्रखंड विकास पदाधिकारी की हत्या जब से हुई है कोई नया अधिकारी प्रभार लेने नहीं आया है | नक्सली आतंक के नाम पर शिक्षक से लेकर डॉक्टर तक वहां जाने से कतराते हैं | शाम को चाहह बजे के बाद कोई नागरिक घर से बाहर नहीं निकलता क्योंकि ना जाने कब नक्सलियों और पुलिस के मुठभेड़ में वो मारे जाएँ | अस्पताल में एक अम्बुलेंस था उसका दुरूपयोग भी इन्होने करना शुरू कर दिया तो प्रशासन ने वह सुविधा भी समाप्त कर दी | हालात ये है कि बमुश्किल कोई मेट्रिक पास होता है | डॉक्टर के यहाँ पहुँचने से पहले हीं अक्सर रोगी की मौत हो जाती है |</p>
<p style="text-align: justify;">प्रशासनिक लापरवाहियों की वजह से एक समय में ऐसी परिस्थितियां जरुर बनी लेकिन आज बदलाव आया है | लेकिन उस बदलाव को महसूस करने और उसका लाभ उठान एक मौका जनता को तभी मिलेगा जब ये सामाजिक केंसर नक्सलवाद जड़ -मूल से समाप्त  हो जाए |</p>
<p style="text-align: justify;">लोकतंत्र ने हमें कई विशेषाधिकार दिया है लेकिन उन्हें दुरुपयोग कर राष्ट्र के प्रति नफरत के इस विचारधारा से  हम केवल तालिबानी  समाज ही पैदा कर रहे हैं |</p>
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		<title>कांग्रेस ,नक्सलवाद और गरीबी</title>
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		<pubDate>Tue, 02 Nov 2010 15:54:41 +0000</pubDate>
		<dc:creator>जनोक्ति डेस्क</dc:creator>
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		<description><![CDATA[मुरारी सिंह कंडारी 1947 से 1975 तक बिहार में कांग्रेस की सत्ता रही, इसी बीच दलितों को सरकारी जमीन के पट्रेट तो दिए गए पर उस जमीन पर कोई दलित कब्जा नहीं कर सका इस की वजह यह रही कि ]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: right;"><strong><span style="color: #333300;">मुरारी सिंह कंडारी</span></strong></p>
<p style="text-align: justify;"><a rel="attachment wp-att-9941" href="http://www.janokti.com/sansad-political-news-%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%82%e0%a4%b8%e0%a4%a6-%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%97/national-news-%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%b7%e0%a5%8d%e0%a4%9f%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a5%80%e0%a4%af/%e0%a4%95%e0%a4%be%e0%a4%82%e0%a4%97%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a5%87%e0%a4%b8-%e0%a4%a8%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b8%e0%a4%b2%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%a6-%e0%a4%94%e0%a4%b0-%e0%a4%97%e0%a4%b0%e0%a5%80/attachment/sonia_rahul_313894121-1/"><img class="alignright size-full wp-image-9941" title="sonia_rahul_313894121 (1)" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/sonia_rahul_313894121-1.jpg" alt="" width="332" height="239" /></a>1947 से 1975 तक बिहार में कांग्रेस की सत्ता रही, इसी बीच दलितों को सरकारी जमीन के पट्रेट तो दिए गए पर उस जमीन पर कोई दलित कब्जा नहीं कर सका इस की वजह यह रही कि मुख्यमंत्री व मंत्रिमंडल के दूसरे सदस्य उंची जाति के रहे। कुलमिलाकर कर्पूरी ठाकुर सरकार व उनका प्रशासन दलित विरोधी रहा।</p>
<p style="text-align: justify;">अगर बिहार में गरीब व दलितों के साथ इनसानी बरताव किया जाता तो नक्सलवाद बिहार में नहीं पनपता ना ही बेवजह पुलिस वाले और सवर्ण मारे जाते। बिहार, छत्तीसगढ़, आंध्रप्रदेश, ओड़िसा, कर्नाटक, महाराष्ट्र, पं बंगाल, उत्तर प्रदेश में भी इस आंदोलन की आग न लगती। इन राज्यों में भी नक्सलियों का जोर उन इलाकों में ज्यादा रहा जहां आदिवासी व दलित बहुल है, जो बहुत ज्यादा गरीब हैं और सरकारों के द्वारा सताए गए है।</p>
<p style="text-align: justify;">भारत की आजादी के 20 वर्ष बाद मई 1967 में पं बंगाल के गांव नक्सबाड़ी में गरीब आदिवासी, दलित व मजदूरों ने कम्युनिस्ट नेता स्व चारू मजूमदार व कानू सान्याल की अगुवाई में बड़े भूस्वामियों व सरकार के खिलाफ आंदोलन का बिगुल बजा दिया। इस समय आंदोलन की मुख्य वजह एक आदिवासी ने अपनी जमीन पर बोआई करने के लिए अदालत से आदेश ले लिया था। लेकिन बाहुबली भू-स्वामियों ने उसे अपनी जमीन पर बुआई नहीं करनी दी। शुरूआत में इस आंदोलन का मकसद गरीब लोगों को अपना हक दिलवाना था। नक्सलबाड़ी के बाद यह आंदोलन पं बंगाल के दूसरे गांवों व क्षेत्रों में भी पहुंच गया। गरीब आदिवासी दलित इस आंदोलन से बड़ी मात्रा में जुडते चले गए। पं बंगाल के दार्जलिंग जिले में बिहारी मजदूरों की संख्या बहुत ज्यादा थी। बिहार के दलित भी उंची जाति के सताए हुए थे।</p>
<p style="text-align: justify;">धीेरे-धीरे बिहार में भी इस आंदोलन में अपनी जड़े जमा ली बिहार का उत्तरी क्षेत्र आदिवासी क्षेत्र है। जल-जंगल और जमीन ही इनके पेट भरने के मुख्य साधन है। यहां कोयला, लोहा, अभ्रक के बड़े-बड़े भंडार है इसलिए यहां की जमीनों को नेताओं और बाहुबली उंची जाति के लोगों ने हड़प् ली और मालामाल हो गए आदिवासी गरीब से नंग हो गया।</p>
<p style="text-align: justify;">1973 के आसपास राजेन्द्र यादव व कल्याण मुखर्जी ने बिहार में नक्सलवादी आंदोलन के नाम से एक सर्वे किया जिस में गरीबों दलितों की दुर्दशा की हकीकत सामने आई। दबंग जाति के उत्पीड़न से पिछड़े वर्ग के लोग भी सताए जा रहे थे अगर इनके बच्चे उंची जाति के बच्चों के साथ पढ़ते तो उंची जाति के लड़के उनका उत्पीड़न करते और नंगा करके घुमाते थे गांव में, इसलिए पिछड़े वग्र के लोगों ने ‘‘त्रिवेणी संघ’’ बना लिया था इस संघ में दलितों के प्रति हमदर्दी दिखाई। नक्सलियों का बल पा कर दलित काम की मजदूरी मांगने लगे और जुल्मों के खिलाफ आवाज उठाने लगे।</p>
<p style="text-align: justify;">गरीबों द्वारा मजदूरी मांगने और आवाज उठाने पर उंची जाति के लोगों ने इन्हें वर्ग शत्रु यानि नक्सलवादी कहने लगे पुलिस व प्रशासन हमेशा उंची जाति वालों की मददगार रहे किसी गांव में कोई घटना होने पर पुलिस गरीबों को नक्सली कह कर गोलि मार देते है। और इन्हें मुठभेड़ का नाम देकर पल्ला छुड़ा देते हैं। गरीबों को सबक सिखाने के लिए राजपूतों ने ‘‘रणवीर सेना’’ और ब्रह्मणों ने ऋषि सेना बना ली, इन सेनाओं के नौजवानों को हथियारों से लैस करने केलए प्रशासन ने खुलकर हथियारों के लाईंसेंस दिए और प्रशिक्षण के लिए शहरों व गांवों में प्रशिक्षण केंद्र खोले गए।</p>
<p style="text-align: justify;">1976 में बिहार के मुख्यमंत्री जगन्नाथ मिश्र ने भोजपूर के फायरिंग संेटर का उदघाटन किया था इन्होंने बड़ी संख्या में निर्दोष दलितों का कत्ल किया। कांग्रेस सरकार ने इस का पुरा समर्थन किया था दलितों की झोपड़ियां जलाई गई दलित लड़कियों व महिलाओं का सामुहिक बलात्कार किया  और नौजवान दलित लड़कों को झुठे मुकदमों में जेल भिजवा दिया गया।</p>
<p style="text-align: justify;"><a rel="attachment wp-att-9942" href="http://www.janokti.com/sansad-political-news-%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%82%e0%a4%b8%e0%a4%a6-%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%97/national-news-%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%b7%e0%a5%8d%e0%a4%9f%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a5%80%e0%a4%af/%e0%a4%95%e0%a4%be%e0%a4%82%e0%a4%97%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a5%87%e0%a4%b8-%e0%a4%a8%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b8%e0%a4%b2%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%a6-%e0%a4%94%e0%a4%b0-%e0%a4%97%e0%a4%b0%e0%a5%80/attachment/naxalite_0609-1/"><img class="alignleft size-medium wp-image-9942" title="naxalite_0609 (1)" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/naxalite_0609-1-300x205.jpg" alt="" width="300" height="205" /></a>बिहार के लोगों को आज भी याद होगा कि 90 के दशक में इन सेनाओं ने ‘‘लक्ष्मण गुहा गांव के 139 दलितों को एक ही रात में मौत के घाट उतार दिया था। राजनीतिक दलों ने इस घटना का भरसक विरोध किया था। आरा जिले के सौनाटोला’’ गांव में दलितों मजदूरी द्वारा मजदूरी बढ़ाने के लिए आंदोलन किया स्वर्ण जाति के लोगों ने इसे नक्सली आंदोलन बता कर कई दलितों को जेल भिजवादीया। तत्कालिन डीएम कृष्णा सिंह ने गांव के राजदूतों को कहां ‘‘आप लोगों के लिए गर्व की बात है कि राजपूत हो कर भी आप मुट्ठीभर दलितों को शांत नहीं कर सकते।</p>
<p style="text-align: justify;">बिहार से यह आंदोलन छत्तीसगढ़ के बस्तर में पहुंचा बस्तर के आदिवासी बहुल गरीब होने के कारण कारोबारियों के शोषण के भी शिकार है आजादी से पहले तेंदुपत्ता, लाख, शोप, चिरोजी, महुआ आदि वस्तु पर आदिवासियों का हक था लेकिन अब जंगल की उपज पर दलालों व पूंजीपतियों का कब्जा है इन्हें मजदूरी नाम मात्र की दि जाती है। आदिवासियों की जिंदगी जंगल और उस से मिलने वाली संपदा पर ही निर्भर है। सब कुछ छिन जाने के बाद आदिवासी हिंसक हो गए और नक्सलवाद का रास्ता अपनाया।</p>
<p style="text-align: justify;">जो हाल बिहार, झारखण्ड, छत्तीसगढ़ का है वही हाल आंध्र प्रदेश, ओडिसा कर्नाटक, महाराष्ट्र, पं बंगाल और यूपी का है पूरी आदिवासी इलाकों को सरकार व पंूजीपति लोग लुट रहे है आदिवासियों की तरक्की के नाम पर राज्य व केन्द्र सरकारें हर साल अरबो-खरबों का घोटाला कर रही है। देश की सभी पार्टियां दलितों की उन्नती की बात तो करती है पर काम नहीं करती। सरकार भी हिंसा के बदले हिंसा का सहारा ले रही है न राज्य सरकारों व केन्द्र की सरकारों ने नक्सलवाद की जड़ तक जाने की रती भर कोशिश नहीं की वे केवल पाच सितारा होटलों से घोषणाए करती है और कुछ नहीं केन्द्र सरकार यानी मनमोहन सरकार डेड लाख अर्धसैनिक बलों को तैनात कर के सोचती है कि हम इस पर पार पा लेंगे? जितना पैसा इल बलों की तैनाती पर खर्च किया जा रहा है उतना पैसा इन आदिवासीयों के विकाश के लिए लगाया जाता तो समस्या का हल निकल जाता माओवादी व नक्सलवादी न तो विदेशी है न बंगलादेशी जो पांच करोड़ हमारे देश में भरे हुए है और न ही आतंकवादी वे इसी देश के वासी है जो केवल और केवल अपने हक के लिए लड़ रहे है। इनको मारने का मतलब है अपने ही लोगों को मारना जिसे उचित नहीं कहा जा सकता भले ही इन का रास्ता गलत हो। दरअसल दलित आदिवासियों के दिलों में जलालत, जल्म, सामाजिक व मानसिक असमानता की आग धधक रही है यह ज्वालामुखी बन कर नक्सलवाद के रूप में फुट रहा हैं</p>
<p style="text-align: justify;">आदिवासी दलितों को समान अधिकार दिया जाए, बेरोजगार युवकों को रोजगार दिया जाए। शिक्षा, स्वास्थ्य व बुनियादी जरूरते पूरी हो तो उनके दिलों में फुट रहे ज्वालामुखी शांत हो जाएगी और वे नक्सलवाद का रास्ता छोड़ देंगे।</p>
<p style="text-align: justify;">
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		<title>मार्क्सवादियों का दोहरा शीर्षासन</title>
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		<pubDate>Fri, 01 Oct 2010 15:32:17 +0000</pubDate>
		<dc:creator>डॉ. वेदप्रताप वैदिक</dc:creator>
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			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><span style="font-size: 13.3333px;"><a rel="attachment wp-att-8135" href="http://www.janokti.com/sansad-political-news-%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%82%e0%a4%b8%e0%a4%a6-%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%97/%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b8%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%a6%e0%a4%bf%e0%a4%af%e0%a5%8b%e0%a4%82-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%a6%e0%a5%8b%e0%a4%b9%e0%a4%b0%e0%a4%be/attachment/karl-marx/"><img class="alignright size-medium wp-image-8135" title="karl-marx" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/karl-marx-300x189.jpg" alt="" width="300" height="189" /></a>यदि<strong> <a href="http://www.janokti.com/tag/%e0%a4%86%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%a5%e0%a4%bf%e0%a4%95-%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%95%e0%a4%be%e0%a4%b8/">कार्ल मार्क्स</a> </strong>अपनी कब्र से उठकर कभी भारत आ पहुंचें तो वे हक्के-बक्के रह जाएंगे| वे अपने भारतीय चेलों को चीनी चेलों से भी आगे-आगे दौड़ता हुआ पाएंगें| बंगाल के हमारे कामरेडों ने पहले <strong>देसी और विदेशी पूंजीपतियों</strong> के आगे घुटने टेके, <strong><a href="http://www.janokti.com/tag/%e0%a4%86%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%a5%e0%a4%bf%e0%a4%95-%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%95%e0%a4%be%e0%a4%b8/">नंदीग्राम और सिंगुर</a> </strong>किया और अब वे वोट के खातिर उस मज़हब की शरण में जा रहे हैं, जिसे महात्मा मार्क्स &#8216;जनता की अफीम&#8217; कहते थे| <strong>प. बंगाल की सरकार</strong> ने अब <strong>पिछड़ों का आरक्षण</strong> सात प्रतिशत से बढ़ाकर 17 प्रतिशत कर दिया है ताकि <strong>बंगाली मुसलमानों</strong> के वोट खींचे जा सकें| यह मार्क्सवादियों का दोहरा शीर्षासन है|</span></p>
<p style="text-align: justify;"><span style="font-size: 13.3333px;">दोहरा इसलिए कि &#8216;वर्ग&#8217; की छाती पर पहले उन्होंने मज़हब को बिठाया और फिर मज़हब के सिर पर जात बिठा दी| वह वर्ग-संघर्ष दरकिनार हो गया, जो <strong><a href="http://www.janokti.com/tag/%e0%a4%a8%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b8%e0%a4%b2%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%a6%e0%a5%80-%e0%a4%86%e0%a4%82%e0%a4%a6%e0%a5%8b%e0%a4%b2%e0%a4%a8/">मार्क्सवाद </a></strong>की प्राणवायु है| कैसी विडंबना है कि भारत के <strong>कांग्रेसियों, भाजपाईयों और जातिवादी नेताओं </strong>की तरह हमारे <a href="http://www.janokti.com/tag/marks/">मार्क्सवादी</a> भी जात और मज़हब के नाम पर रेवाडि़यां बांटने में जुट गए हैं| आए थे, वे <strong>वर्गविहीन समाज </strong>की स्थापना करने और अब वे पाए जा रहे हैं, भारत में जातिवादी और मजहबवादी समाज को मजबूत बनाते हुए | सर्वहारा को संघर्ष की कला सिखाने के बदले <strong><a href="http://www.janokti.com/tag/%e0%a4%b2%e0%a4%be%e0%a4%b2-%e0%a4%9d%e0%a4%82%e0%a4%a1%e0%a4%be/">मार्क्सवादी उन्हें &#8216;अफीम&#8217; की गोलियां </a></strong>बाट रहे हैं| मान लिया कि सारे सर्वहारा एक-जैसे हैं| क्या <strong>हिंदू और क्या मुसलमान </strong>? यहां तक तो ठीक है लेकिन असली सवाल यह है कि जब सेंत-मेत में नौकरियां मिलेंगी तो क्या उनके दिलों में वर्ग-संघर्ष का जज़्बा मजबूत होगा ? दूसरों की दया पर जीनेवाले लोग क्या कभी न्याय के लिए लड़ सकते हैं ? नौकरियों में आरक्षण विपन्नों को संपन्नों का मौन अनुगत बनाने का षडयंत्र् है| इस वर्ग-चेतना के विनाश में अपने मार्क्सवादियों का भागीदार होना सचमुच आश्चर्यजनक है| नौकरियों में आरक्षण को प्रोत्साहित करना हमारे देश के सर्वहारा को अनंतकाल के लिए अपंग बना देना है|</span></p>
<p style="text-align: justify;"><span style="font-size: 13.3333px;">बंगाल की <strong>मार्क्सवादी सरकार</strong> इस आत्मघाती काम में  पीछे क्यों रहे ? यदि<strong> केरल, तमिलनाडु, </strong>कर्नाटक और आंध्र की सरकारें<strong> मुस्लिम वोटों </strong>पर हाथ साफ कर रही हैं तो बंगाल की सरकार के सिर पर तो चुनाव आए खड़े हैं| लगभग दो करोड़ बंगाली मुस्लिमों में से लगभग 83 प्रतिशत पिछड़े हैं| इन्हें मुसलमान होने के नाते आरक्षण नहीं दिया जा सकता| वह संविधान-विरोधी है| इसीलिए अनेक राज्यों ने मंडल आयोग के तहत जात का दरवाज़ा खोल दिया है| बंगाल अन्य राज्यों को पीछे छोड़ना चाहता है| वहां तो &#8216;क्रांति के अगि्रम दस्ते&#8217; का राज है न ! बुद्घदेव भट्रटाचार्य सरकार ने अभी-अभी 21000 नई नौकरियों की घोषणा की है| साथ में 17 प्रतिशत आरक्षण की गाजर भी लटका दी है| भला, वह ममता से मात कैसे खा सकती है ? ममता बनर्जी ने दो-टूक घोषणा की थी कि अगर वे मुख्यमंत्र्ी बनीं तो वे मुसलमानों को आरक्षण देंगी| भट्टाचार्य सरकार ने नहले पर दहला मार दिया| मुसलमानों को भी यह आरक्षण स्वीकार करने में ज़रा भी संकोच नहीं | इस्लाम में जात का क्या काम है ? जो जात को मानता है, वह मुसलमान कैसे हो सकता है ? यह जानते हुए भी कोई मुल्ला जातीय आरक्षण के खिलाफ फतवा जारी नहीं करता| लालच बड़ा कि ईमान ? अगर मार्क्सवादी ही अपने सिद्घांतों को कच्चा चबा रहे हैं तो क्या सिर्फ मुसलमानों ने ही इस्लाम के मुताबिक आचरण करने का ठेका ले रखा है ? आरक्षण का दांव मारकर यदि मार्क्सवादी अपने वोट पटाना चाहते हैं तो मुसलमान माले-मुफ्त से मना क्यों करें ? मुफ्त हाथ आए तो बुरा क्या है ?</span></p>
<p style="text-align: justify;"><span style="font-size: 13.3333px;">इस दांव-पेंच के मूल में क्या है ? क्या मुसलमानों का भला है ? यदि यही होता तो अपने सुदीर्घ शासन-काल में मार्क्सवादी सरकार बंगाल के मुसलमानों को उस मुकाम पर पहुंचा सकती थी, जिस पर भारत ही नहीं, सारे दक्षिण एशिया के मुसलमानों को गर्व होता| उसने कुछ जिलों में उर्दू को राजभाषा का दर्जा दे दिया| क्या खूब ? बंगाली मुसलमान को उर्दू से क्या लेना-देना ? उसने अपनी बांग्ला भाषा के खातिर पाकिस्तान तोड़ दिया| मुसलमानों की हालत बंगाल में जितनी खराब है, शायद किसी भी प्रांत में नहीं है| मुसलमान लोग जिन धंधों में हैं, क्या उनकी इज्जत और लज्जत बढ़ाने में मार्क्सवादी सरकार ने कोई छोटी-सी पहल भी की ? अब वह क्या करना चाहती है ? उनके कांम-धंधे छुड़वाकर उनके गले में सरकारी नौकरियां लटकाना चाहती है ? अगर नौकरियां भी थमानी थीं तो उन्हें पढ़ाने-लिखाने का कुछ इंतजाम किया होता| नौकरियों का लालच देकर मार्क्सवादी नेता अपनी हथेली में वोट की सरसों उगाना चाहते हैं| लोकसभा चुनावों में हुई उनकी दुर्गति से वे घबराए हुए हैं| लोकतंत्र् के झमेले में फंसे मार्क्सवादी अपने सिद्घांतों की बलि चढ़ाने में जरा भी संकोच नहीं कर रहे हैं| यदि ममता हिंसक माओवादियों और सत्ताप्रेमी कांग्रेसियों से हाथ मिला सकती है तो मार्क्सवादी मुल्ला और मार्क्स का &#8216;कॉकटेल&#8217; क्यों नहीं बना सकते ?</span></p>
<p style="text-align: justify;"><span style="font-size: 13.3333px;">यह तो वे पहले भी कर चुके हैं| कट्रटरपंथी मुल्लाओं की नाराज़गी से बचने के लिए हमारे बहादुर मार्क्सवादियों ने तसलीमा नसरीन के साथ कैसा बर्ताव किया था ? तसलीमा को सुरक्षा देने के बजाय बंगाल सरकार ने उसे भागने के लिए मजबूर कर दिया था| क्या मार्क्सवादी बंगाल के लिए यह गर्व की बात थी कि एक लोकपि्रय बांग्ला लेखिका अपनी जान बचाने के लिए दिल्ली के आस-पास छुपी रही ? इस घुटना-टेक नीति ने भी मार्क्सवादियों को मुसलमान वोट नहीं दिलवाए| अब आरक्षण की रेवड़ी उन्हें कुछ वोट शायद दिलवा देगी लेकिन उनके दम पर वे सरकार बना पाएंगे, यह संदेहास्पद है| बंगाल की हार हमारे मार्क्सवादियों के लिए प्रतिक्रांति-जैसा झटका सिद्घ होगी| मोह-भंग की उस वेला में मार्क्सवादी पार्टी जात और मजहब से ऊपर उठकर यदि सचमुच सर्वहारा का नेतृत्व करने के लिए कमर कस लेगी तो वह बंगाल से भी बड़ा मैदान मार सकती है| हमारे देश के गए-बीते जातिवादी और मजहबवादी दलों का वह सच्चा लोकतांत्र्िक विकल्प बन सकती है| उसके पास जितने विचारशील और स्वच्छ नेता हैं, उतने देश में किसी अन्य दल के पास नहीं हैं लेकिन वोटों की चकाचौंध ने उनकी भी मति हर ली है|</span></p>
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		<title>ठीक-ठाक चल रहा है भारत !</title>
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		<pubDate>Fri, 17 Sep 2010 11:12:51 +0000</pubDate>
		<dc:creator>डॉ. वेदप्रताप वैदिक</dc:creator>
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		<description><![CDATA[[pullquote]देश में सब कुछ ठीक -ठाक चल रहा है &#124; ठीक-ठाक का सही मतलब भारत में क्या होता है ये आप सभी जानते हैं &#124; क्योंकि जब तक कोई कारगिल , संसद , मुंबई आदि पर हमले या भोपाल गैस ]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;">[pullquote]<strong><em>देश में सब कुछ ठीक -ठाक चल रहा है | ठीक-ठाक का सही मतलब भारत में क्या होता है ये आप सभी जानते हैं | क्योंकि जब तक कोई कारगिल , संसद , मुंबई आदि पर हमले या भोपाल गैस कांड जैसा कोई बड़ा बबाल ना हो हम अपने हालात ठीक-ठाक ही समझते हैं !  और ऐसे ही ठीक -ठाक हालात का जायजा लिया गया है इस लेख में | </em>जनोक्ति डेस्क</strong> |[/pullquote]<span style="font-size: 13.3333px;">मोटे तौर पर देखें तो भारत में सब ठीक-ठाक ही चल रहा है। न हम किसी युद्ध में फंसे हैं, न कोई दंगे हो रहे हैं, न चीन और पाकिस्तान की तरह हजारों लोग बाढ़ में मर रहे हैं, न सरकार के गिरने की कोई नौबत है। विकास दर में बढ़ोतरी हो रही है, महंगाई थोड़ी घटी है, करोड़पतियों की संख्या बढ़ी है, श्रीलंका, नेपाल और पाकिस्तान जैसे देशों को हम करोड़ों रुपए यों ही दे देते हैं। हमारे दिल्ली जैसे शहर यूरोपीय शहरों से होड़ ले रहे हैं।</span></p>
<p style="text-align: justify;"><a rel="attachment wp-att-7240" href="http://www.janokti.com/%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%82%e0%a4%b8%e0%a4%a6-%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%97/%e0%a4%a0%e0%a5%80%e0%a4%95-%e0%a4%a0%e0%a4%be%e0%a4%95-%e0%a4%9a%e0%a4%b2-%e0%a4%b0%e0%a4%b9%e0%a4%be-%e0%a4%b9%e0%a5%88-%e0%a4%ad%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a4%a4/attachment/customer_indiamap/"><img class="alignright size-full wp-image-7240" title="Customer_IndiaMap" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2010/09/Customer_IndiaMap.jpg" alt="" width="361" height="400" /></a>हजारों करोड़ रुपए हम खेलों पर खर्च कर रहे हैं तो फिर रोना किस बात का है? देश में एक अजीब-सा माहौल क्यों बनता जा रहा है? खासतौर से तब जबकि देश के दो प्रमुख दल कांग्रेस और भाजपा पक्ष और विपक्ष की भूमिका निभाने की बजाय पक्ष और अनुपक्ष की तरह गड्ड-मड्ड हो रहे हैं?</p>
<p style="text-align: justify;">ऐसा क्या है, जो देश को दिख तो रहा है, लेकिन समझ में नहीं आ रहा है?,जो समझ में नहीं आ रहा, वह एक पहेली है। पहेली यह है कि देश में संसद है, सरकार है, राजनीतिक दल हैं, लेकिन कोई नेता नहीं है? सोनिया गांधी लगातार चौथी बार कांग्रेस अध्यक्ष चुनी गईं। रिकॉर्ड बना, लेकिन कोई लहर नहीं उठी। डॉ मनमोहन सिंह ने भी रिकॉर्ड कायम किया। नेहरू और इंदिरा के बाद तीसरे सबसे दीर्घकालीन प्रधानमंत्री हैं, लेकिन वे हैं या नहीं हैं, यह भी देश को पता नहीं चलता।</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">आध्यात्मिक दृष्टि से यह सर्वश्रेष्ठ स्थिति है। ऐसी स्थिति, जिसमें होना न होना एक बराबर ही होता है। इसमें जरा भी शक नहीं कि सोनिया गांधी और मनमोहन सिंह के बीच जैसा सहज संबंध है, वैसा सत्ता के गलियारों में लगभग असंभव होता है। भारत में सत्ता के ये दो केंद्र हैं या एक, यह भी पता नहीं चलता। न तो उनमें कोई तनाव है और न ही स्वामी-दास भाव है, जैसा कि हम व्लादिमीर पुतिन और दिमित्री मेदवेदेव के बीच मास्को में देखते हैं।</p>
<p style="text-align: justify;"><span style="font-size: 13.3333px;">इसी प्रकार सत्ता पक्ष और विपक्ष देश में है तो सही, लेकिन कहीं कोई चुनौती दिखाई नहीं पड़ती। छोटे-मोटे क्षेत्रीय दल जो कांग्रेस के साथ हैं, उनके नेता भ्रष्टाचार के ऐसे मुकदमों में फंसे हुए हैं कि कांग्रेस ने जरा स्क्रू कसा नहीं कि वे सीधे हो जाते हैं।</span></p>
<p style="text-align: justify;"><span style="font-size: 13.3333px;">जिस बात का वे निरंतर विरोध करते हैं, उसी पर दौड़कर समर्थन दे देते हैं। जैसा कि परमाणु सौदे पर पिछली संसद में हुआ था। कांग्रेस का हाल भी वही है। वह उनके ब्लैकमेल के आगे तुरंत घुटने टेक देती है। जिस जातीय गणना का कांग्रेस ने 1931 में और आजाद भारत में सदा विरोध किया, अब कुछ जातिवादी क्षेत्रीय दलों के दबाव में आकर उसने अपनी नेता की भूमिका तज दी और अब वह उन अपने समर्थक दलों की पिछलग्गू बन गई है।</span></p>
<p style="text-align: justify;"><span style="font-size: 13.3333px;">सत्तारूढ़ कांग्रेस सत्ता पर आरूढ़ जरूर है, लेकिन कई मुद्दों पर वह पत्ता भी नहीं हिला सकती। इससे भी ज्यादा दुर्दशा विपक्षी दलों की है। कम्युनिस्ट पार्टियां अभी भी मुखर हंै, लेकिन पिछले चुनाव में वे अपने गढ़ों में ही पिट गईं। उनका आपसी लत्तम-धत्तम इतना प्रखर हो गया है कि उनके मुखर होने पर देश का ध्यान ही नहीं जाता। जोशी-डांगे-मुखर्जी और नंबूदिरिपाद की कम्युनिस्ट पार्टियों में आज के जैसा संख्या-बल नहीं था, लेकिन वाणी-बल था, जो सारे देश में प्रतिध्वनित होता था।</span></p>
<p style="text-align: justify;">नेहरू जैसे नेता को भी उस पर प्रतिक्रिया करनी पड़ती थी। आजकल यही पता नहीं चलता कि वामपंथ का असली प्रवक्ता कौन है। मार्क्‍सवादी पार्टी के महासचिव प्रकाश करात ने परमाणु-हर्जाना विधेयक का विरोध जरूर किया, लेकिन वह नक्कारखाने में तूती की तरह डूब गया। वे दिन गए, जब लोहिया के पांच-सात लोग पूरी संसद को अपनी चिट्टी उंगली पर उठाए रखते थे। अब दिन में दीया लेकर ढूंढ़ने निकलो तो भी कोई समाजवादी नहीं मिलता।</p>
<p style="text-align: justify;"><span style="font-size: 13.3333px;">इतनी बड़ी संसद में क्या एक भी सांसद ऐसा है, जो लोहिया की तरह पूछ सके कि प्रधानमंत्रीजी, आप पर 25000 रुपए प्रतिमाह कैसे खर्च हो रहे हैं और आम आदमी तीन आने रोज पर कैसे गुजारा करेगा? अब तो पूंजीवादी, समाजवादी, साम्यवादी, दक्षिणपंथी और वामपंथी- सभी एक पथ के पथिक हो गए हैं।</span></p>
<p style="text-align: justify;"><span style="font-size: 13.3333px;">सबसे बड़े विपक्षी दल के तौर पर भाजपा जबर्दस्त भूमिका निभा सकती थी, लेकिन वह बिना पतवार की नाव बन गई है। उसका अध्यक्ष भी कांग्रेस अध्यक्ष की तरह आसमान से उतरने लगा है। वह अपने नेताओं के कंधों पर बैठा है, लेकिन उसके पांव नहीं हैं। उसे पांव की जरूरत भी क्या है?</span></p>
<p style="text-align: justify;">भाजपा में हाथ-पांव ही हाथ-पांव हैं। यह कार्यकर्ताओं की पार्टी ही तो है। इसमें गलती से एक नेता उभर आया था। उसे जिन्ना ले बैठा। अब कांग्रेस की तरह भाजपा के शिखर पर भी शून्य हो गया है। ये शून्य-शिखर आपस में जुगलबंदी करते रहते हैं। शून्य-शिखरों की इस जुगलबंदी में से कुछ समझौते निकलते हैं और कुछ शिष्टाचार निभते हैं, लेकिन कोई वैकल्पिक समाधान नहीं निकलते। भारत की राजनीति में से द्वंद्वात्मकता का तिरोधान हो गया है।</p>
<p style="text-align: justify;"><span style="font-size: 13.3333px;">यह एकायामी (वन डायमेंशनल) राजनीति नौकरशाहों और सरकारी बाबुओं के कंधों पर टिकी हुई है। इसमें पार्टियों की भूमिका गौण हो गई है। जनता और सरकार के बीच पार्टी नाम का सेतु लगभग अदृश्य हो गया है। जब पार्टी ही अप्रासंगिक हो गई है तो नेता की जरूरत कहां रह गई है? बिना नेता के ही यह देश चला जा रहा है। यह लोकतंत्र का सबसे बड़ा अजूबा है। बाबुओं के दम पर बाबुओं का राज चल रहा है। आम जनता के प्रति हमारे बाबुओं का जो रवैया होता है, वही आज हमारे नेताओं का है।</span></p>
<p style="text-align: justify;"><span style="font-size: 13.3333px;">देश में अगर आज कोई नेता होता तो क्या वह अनाज को सड़ने देता? यह ठीक है कि उच्चतम न्यायालय को ऐसे मामलों में टांग नहीं अड़ानी चाहिए, लेकिन भूखों को मुफ्त बांटने के विरुद्ध ऐसे तर्क वही दे सकता है, ‘जाके पांव फटी न बिवाई’! सरकार तो सरकार, विपक्ष क्या कर रहा है?</span></p>
<p style="text-align: justify;"><span style="font-size: 13.3333px;">वह उन गोदामों के ताले क्यों नहीं तुड़वा देता? धरने क्यों नहीं देता? सत्याग्रह क्यों नहीं करता? भ्रष्टाचार क्या सिर्फ केंद्र में है? क्या राज्य सरकारें दूध की धुली हुई हैं? भाजपा और जनता दल के राज्यों में कोई चमत्कारी कदम क्यों नहीं उठाया जाता? माओवादियों से पांच-सात राज्य ऐसे लड़ रहे हैं, जैसे वे पांच-सात स्वतंत्र राष्ट्र हों। क्यों हो रहा है, ऐसा? इसीलिए कि देश में कोई समग्र नेतृत्व नहीं है। चीनियों के आगे भारत को क्यों घिघियाना पड़ रहा है?</span></p>
<p style="text-align: justify;"><span style="font-size: 13.3333px;">कश्मीर में कोरे शब्दों की चाशनी क्यों घुल रही है? कोई बड़ी पहल क्यों नहीं हो रही है? इसीलिए कि भारत की राजनीति के बगीचे में सिर्फ गुलदस्ते सजे हुए हैं। इन गुलदस्तों में न कोई कली चटकती है और न फूल खिलते हैं। जो फूल सजे हुए हैं, उनमें खुशबू भी नहीं है। भारत का नागरिक समाज या चौथा खंभा भी इतना मजबूत नहीं है कि वह नेतृत्व कर सके। इसके बावजूद भारत है कि चल रहा है। अपनी गति से चल रहा है। शिखरों पर शून्य है तो क्या हुआ? मूलाधार में तो कोई न कोई कुंडलिनी लगी हुई है।</span></p>
<p style="text-align: justify;">
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		<title>भ्रष्टाचार जारी है</title>
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		<pubDate>Wed, 15 Sep 2010 08:13:37 +0000</pubDate>
		<dc:creator>रमेश भट्ट</dc:creator>
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			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><a rel="attachment wp-att-7074" href="http://www.janokti.com/%e0%a4%85%e0%a4%82%e0%a4%a7%e0%a5%87%e0%a4%b0-%e0%a4%a8%e0%a4%97%e0%a4%b0%e0%a5%80/%e0%a4%ad%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%b7%e0%a5%8d%e0%a4%9f%e0%a4%be%e0%a4%9a%e0%a4%be%e0%a4%b0-%e0%a4%9c%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a5%80-%e0%a4%b9%e0%a5%88/attachment/mgnrega-yojna/"><img class="alignright size-full wp-image-7074" title="MGNREGA YOJNA" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2010/09/MGNREGA-YOJNA.jpg" alt="" width="200" height="279" /></a>बरांबकी उन 200 जिलों में से एक था जिसे साल 2006 में महात्मा गांधी नरेगा के तहत चुना गया। यहां योजना को लागू हुए चार साल से ज्यादा बीत चुके हैं। इस दौरान यहां कई कार्य कराये गए है। योजना का जमीन में हाल जानने के लिए सबसे पहले हम पहुंचे नन्दकला गांव में। इस गांव की कुल आबादी 1241 है। जिसमें 15 फीसदी लोग अनुसूचित जाति के हैं। गांव पहुंचते ही हमारी मुलाकात यहां के प्रधान सूर्यप्रकाश सिंह वर्मा से हुई। प्रधान जी से जब हमने मनरेगा के तहत कराये गए निर्माण कार्यो से जुड़ा सवाल पूछा तो बिना रूके पिछले चार सालों में करोये गए सभी कामों को बयां कर दिया । कराये गए कामों की फेहरिस्त भी बड़ी लम्बी मसलन 4 तालाब, ढाई किलोमीटर सम्पर्क मार्ग, 2200 मीटर खड़ंजे का निर्माण, वृक्षारोपण और दलितों के खेत का समतलीकरण। प्रधान जी नरेगा की सान में एक के बाद एक कसीदे पढ़ते चले गए। मगर जैसे ही बात 60 और 40 के अनुपात की आई तो झठ से बोल दिया कि इसमें बदलाव की जरूरत है। यहां 60 और 40 के अनुपात से मतलब यह है कि येाजना के तहत कुल बजट का 40 फीसदी हिस्सा मजदूरी पर और बाकी सामग्री में खर्च करने का प्रावधान है। इसी गांव में हमारी बात हुई रेश्मावती, बालजती और ममता देवी से। वो इसी गांव में रहती है। खुश है कि इस योजना के कारण काम की तलाश में अब दर दर नही भटकना पड़ता है। आवेदन करने पर गांव में ही काम मिला जाता है। मगर जब हमने उनसे पूछा की क्या मजदूरी समय पर मिलती है। तो वह बिफर उठती हैं। ऐसा की कुछ कहना था इस गांव के ही रहने वाले सन्दीप का। उनकी मानें तो काम तो आसानी से मिला जाता है मगर मजदूरी पाने के लिए बैंकों के बार बार चक्कर लगाने पड़ते है। मजदूरी भुगतान में हो रही देरी का जिक्र जब हमने प्रधानजी से किया तो उन्होनें बिना देरी किये सारा ठीकरा बैंक के सर फोड़ दिया। योजना की हकीकत जानने के लिए हमारा अगला पड़ाव था टाण्डा ग्राम पंचायत। यहां हमें मालूम चला कि पास में ही मनरेगा के तहत खड़ंजे का निर्माण किया जा रहा है। पूछते पाछते आखिरकार हम उस जगह पर पहुंच गए। रमा कान्त मौर्य पिछले 24 सालों से इस गांव के प्रधान है। प्रधान जी ने कागजी काम पक्का कर रखा था। बकायदा वह यह भी कहते है कि पारदर्शिता के लिए हर ग्राम प्रधान केा इसी तरह अपनी फाइल तैयार करती चाहिए। सबूत के तौर पर हर काम की कई फोटों । अपने ग्रामसभा में कराये का सारे कामों की उन्होने एक एक कर सारी फोटो हमें दिखाई। योजना के तहत उन्होने गांव में सीवर लाइन भी डलवाई है। महात्मा गांधी नरेगा में  सबसे  ज्यादा तालाबों का निर्माण कराया गया है। जब हमने जानना चाहा की इतने सारे तालाब खुदवाने के पीछे क्या वहज है। जो सारे प्रधानों के जवाब अलग अलग थे। अब सवाल था कि मजदूरी भुगतान में देरी की क्या वजह है। इसका पता लगाने के लिए हमारी टीम पहुंची मोहम्दपुर खाला शाखा में। मालूम चला का मर्ज बडा़ गहरा है। कहानी एक अनार सौ बीमार वाली है। 53 गांवों का यह इकलौता बैंक अपनी कहानी खुद बयां कर रहा था। बैंक में काम करने वाले कर्मचारियों गिनती के चार। वुद्धास्था पेंशन योजना, स्कालरशिप के तहत मिलने वाली राशि, किसान क्रेडिट कार्ड और रोजाना के लेने देन से बैंक में पहले की बहुत काम था। ऊपर से मनरेगा येाजना के बाद हालात और खराब हो गए हैं। मनरेगा के तहत नए निर्माण कार्य के लिए योजना तैयार करने का जिम्मा पंचायत का होता है। इसके बाद ब्लॉक से इस काम की मंजूरी लेनी पड़ती है। इस दौरान योजना की लागत का आंकलन किया जाता है। इसके लिए बकायदा तकनीकी सहायक की जरूरत होती है। मगर ब्लाक स्तर पर तकनीकि सहायकों की भारी कमी है। यही कारण है कि कार्य की शुारूआत से मजदूरी मिलने तक भारी देरी हो रही है। अकेले बाराबंकी के फतेहपुर ब्लॉक के तहत 86 गांव आते है। बीते अप्रैल तक यहां केवल दो जेई और दो तकनीकी सहायक थे। लिहाजा कानून के मुताबिक न 15 दिन में रोजगार मिला पा रहा है और न ही समय से मजदूरी। मगर आज यहां हालात सुधरे है। अकेले फतेहपुर ब्लॉक में 17 तकनीकी सहायकों की नई नियुक्ति की गई है। एक दिलचस्प बात और जानने को मिली कि मनरेगा के तहत मिलने वाले पैसों से ज्यादातर लोगों ने मोबाइल खरीदे है। एक परिवार से मिलने पर मालूम चला की गरीबी के बावजूद घर में तीन मोबाइल है। महात्मा गांधी नरेगा देश की पहली ऐसी योजना है जिसमें सोशल आडिट का प्रावधान है। जिला स्तर पर योजना की पारदर्शिता की देखरेख के लिए स्थानीय सांसदों के नेतृत्व में एक समिति का गठन किया गया है। साल में राज्य और जिला स्तर में कितनी बैठकें होनी चाहिए इसके लिए केन्द्र ने बकायदा निर्देश जारी किए गए है। एक बात तय है अगर सांसद इस योजना के क्रियान्वयन में रूची ले तो येाजना में हो रहे भष्टाचार पर काफी हद तक रोक लगाई जा सकती हैं।</p>
<p style="text-align: justify;">
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		<title>फिल्मी नत्थे जैसा खुशनसीब नहीं हकीकत का नत्था</title>
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		<pubDate>Thu, 09 Sep 2010 03:24:44 +0000</pubDate>
		<dc:creator>राजेश त्रिपाठी</dc:creator>
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		<description><![CDATA[राजेश त्रिपाठी फिल्म ‘पीपली लाइव’ का ‘नत्था’ भले ही न मरता हो और उसकी मौत का इंतजार करते मीडिया को भले ही निराशा हुई हो लेकिन हकीकत कुछ और ही है। फिल्में अक्सर सुखांत होती हैं, इनमें करो़ड़ों रुपया लगा ]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><strong>राजेश त्रिपाठी</strong></p>
<p style="text-align: justify;"><a rel="attachment wp-att-6677" href="http://www.janokti.com/%e0%a4%85%e0%a4%82%e0%a4%a7%e0%a5%87%e0%a4%b0-%e0%a4%a8%e0%a4%97%e0%a4%b0%e0%a5%80/%e0%a4%ab%e0%a4%bf%e0%a4%b2%e0%a5%8d%e0%a4%ae%e0%a5%80-%e0%a4%a8%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%a5%e0%a5%87-%e0%a4%9c%e0%a5%88%e0%a4%b8%e0%a4%be-%e0%a4%96%e0%a5%81%e0%a4%b6%e0%a4%a8%e0%a4%b8%e0%a5%80/attachment/peepli-live-natta/"><img class="alignright size-medium wp-image-6677" title="peepli live natta" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2010/09/peepli-live-natta-300x214.jpg" alt="" width="300" height="214" /></a>फिल्म ‘पीपली लाइव’ का ‘नत्था’ भले ही न मरता हो और उसकी मौत का इंतजार करते मीडिया को भले ही निराशा हुई हो लेकिन हकीकत कुछ और ही है। फिल्में अक्सर सुखांत होती हैं, इनमें करो़ड़ों रुपया लगा होता है इसलिए ऐसा करना व्यावसायिक मजबूरी है लेकिन सच्चाई इससे परे है। भारत का हर वह ‘नत्था’ जो वर्षों से सूखे, अकाल की मार और ऋण का बोझ झेल रहा होता है, उसे एक न एक दिन मरना ही पड़ता है। ऐसी ही उसकी नियति है। फिल्म का नत्था एक प्रतीक है भारत के मेहनतकश किसानों के मुसलसल झेल जा रहे दर्द का जो एक दिन उन्हें तोड़ ही देता है। वर्षों से सूखा, महाजन के ऋण के बोझ के तले दबे इन नत्थाओं का जीना मुहाल हो जाता है उनके लिए बस एक ही रास्ता बचता है-आत्महत्या। साल दर साल सरकारी उपेक्षा और प्रकृति की बेरुखी की मार झेलते इन लोगों तक सरकारी मदद पहुंच ही नहीं पाती वह या तो उन लोगों के द्वार तक जा कर ठिठक जाती है जिनके जिम्मे उसके वितरण का भार है या फिर बिचौलिये उसका बंदरबांट कर लेते हैं। चाहे विदर्भ हो, आंध्रप्रदेश, मध्यप्रदेश, पश्चिम बंगाल, झारखंड या कोई और प्रदेश, पिछले कुछ वर्षों में वहां से किसानों की आत्महत्या की खबरें आती रही हैं। किसानों की हालत कितनी खराब है, सूखे के चलते वे कितने बेहाल हैं इसका पता हाल की एक खबर से चला जिसमें झारखंड के एक गांव के 2000 किसान परिवारों ने राष्ट्रपति से आत्महत्या की अनुमति मांगी थी। झारखंड के इस गांव के लोगों ने सचही लोकप्रियता पाने के लिए यह कदम नहीं उठाया। पिछले दो साल से पड़ रहे सूखे ने उनको इस स्थिति में ला दिया है कि इसके अलावा उनके पास कोई चारा ही नहीं बचा। राज्य में औसत से 42 प्रतिशत कम बारिश हुई है और सूखे के चलते खेत सूख गये हैं और फसलें नष्ट हो गयी हैं। किसानों के पास जो पूंजी थी वह उन्होंने बीज-खाद खरीदने में गंवा दी और वह भी मिट्टी में मिल गयी। उन लोगों ने सोचा था कि फसल होगी तो उनके पेट भरने का साधन भी हो जायेगा और लिया गया ऋण भी चुकता हो जायेगा। उनकी सारी उम्मीद आकाश के बादलों पर टिकी थी जिनकी बेरुखी से उनकी जान पर बन आयी है। अब उन्होंने राज्यपाल और राष्ट्रपति से आत्महत्या की अनुमित मांगी है। आजाद भारत में शायद ऐसा पहली बार हुआ है जब पूरे गांव ने आत्महत्या की अनुमित मांगी है। जाहिर है यह किसी भी आजाद देश के लिए गर्व की नहीं बल्कि शर्म की बात है जो अपने किसानों, गरीबी रेखा से नीचे जिंदगी बसर करने वाले नागरिकों को जिंदगी की आम सहूलियतें तक नहीं जुटा पाता। जहां देश को अन्न जुटाने वाले किसान भूखों मरने को विवश हों उस देश में विकास की बातें लोगों को मुंह चिढ़ाती नजर आती हैं। राष्ट्र में जाने कितनी जन कल्याण की योजनाएं टल रही हैं फिर ऐसी सहायता इन मुसीबत के मारे किसानों तक क्यों नहीं पहुंच पातीं। क्यों हिंदुस्तान के इन नत्थाओं को अपनी जिंदगी वक्त से पहले खत्म कर लेनी पड़ती है।</p>
<p style="text-align: justify;">ऋण के बोझ और सूखे की मार से देश में जितने किसानों ने आत्महत्या की है उन पर गौर करें तो सिहरन होती है। राष्ट्र के लिए हर नागरिक का जीवन बहुमूल्य होता है। सत्ता में चाहे कोई भी दल हो उसका यह परम कर्तव्य होता है कि वह अपने नागरिकों की चाहे वह किसी भी वर्ग के हों, जीवन की सुरक्षा की गारंटी दे और उनकी आम जरूरतों को पूरा करने की कोशिश करे। यह बड़े दुख के साथ कहना पड़ रहा है कि इसमें अब तक की सारी सरकारें असफल रही हैं। जब चुनाव आते हैं नेता गला फाड़-फाड़ कर विकास का राग अलापते नजर आते हैं और कुर्सी मिलते ही ठंड़े घरों में आरामदायक कुर्सियों में देश के विकास और जन कल्याण की वे योजनाएं बनाने में लग जाते हैं जिनका लाभ या तो पहुंचता ही नहीं या फिर पहुंचता भी है तो ऊंट के मुंह में जीरे की तरह।</p>
<p style="text-align: justify;">सरकार यों तो किसानों और गरीबी रेखा से नीचे के लोगों के लिए करोड़ों रुपये खर्च करने की बातें करती है लेकिन ये रुपये जिन लोगों के लिए होते हैं उन तक न पहुंच कर बीच में ही गायब हो जाते हैं। प्रभावशाली लोग ही यह धन हड़प लेते हैं और गरीब बेचारा सोचता रह जाता है कि दिल्ली की दरियादिली की गंगा उन तक क्यों नहीं पहुंची, बीच में ही क्यों सूख गयी। दरअसल हमारे यहां केंद्र से गरीबों के लिए राज्यों तक ऐसे सूखा पीड़ितों व गरीबों के लिए भेजे जानेवाली धनराशि के बंटन की निगरानी की कोई व्यवस्था नहीं है। केंद्र पैसा राज्य में भेज देता है और राज्य से उसके उपयोग का प्रमाणपत्र मांगता है जो राज्य दे भी देता है लेकिन सचमुच वह पैसा जरूरतमंदों तक पहुंचा या नहीं इस बात की निगरानी की कोई व्यवस्था नहीं है। ऐसे में यह पता लगाना मुश्किल हो जाता है कि धन का सही उपयोग हुआ या नहीं। रही बात राज्य सरकारों के उपयोग प्रमाणपत्र देने की तो वह कागजी कार्रवाई पूरा करने में हमारा देश पूर्ण दक्ष है। देश में ऐसे कई उदाहरण मिल जायेंगे कि नहर बनी नहीं, बोरिंग हुई नहीं और उसके मद में पैसा जरूर खर्च हो गया। जहां के नेता करोड़ों का घोटाला पलक झपकते कर लेते हों, भ्रष्टाचार जहां एड़ी से चोटी तक व्याप्त हो वहां ऐसा होना कोई अचरज की बात नहीं।</p>
<p style="text-align: justify;">वर्षों पहले एक कार्यक्रम ‘न्यूजलाइन’ टीवी पर आता था उसके एक एपीसो़ड में दिखाया गया था कि उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड में एक जगह नहर खोदी जानी थी जिसे सिर्फ कागज पर खोद दी गयी। बाद में जब पता चला कि सरकारी अधिकारी निरीक्षण को आ रहे हैं तो वह नहर भर दी गयी। इस बार कागज कुछ इस तरह तैयार किये गये जिनमें कहा गया कि नहर सही नहीं बनी थी इसलिए उसे बंद भर दिया गया। उस कार्यक्रम को जिस पत्रकार ने पेश किया था वे आज एक साप्ताहिक के संपादक हैं। जाहिर है सरकार की इस तरह से पोलपट्टी खोलने वाले कार्यक्रम की उम्र ज्यादा नहीं होनी थी और न्यूज लाइन जैसा लोकप्रिय और सार्थक कार्यक्रम भी अकाल मौत का शिकार हुआ। वैसा सुना है कि उसे पुनर्जीवित करने के प्रयास हो रहे हैं। जिस देश का यह हाल हों वहां के किसान और गरीब –गुरबा किसी भी सरकार से क्या उम्मीद कर सकते हैं। सरकार चाहे दक्षिणपंथियों की हो या वामपंथियों की या फिर किसी और पंथ या विचार को मानने वालों की अगर उनकी सत्ता में नागरिक गरीबी और भूख के चलते आत्महत्या करते हैं तो इस तरह की हर मौत उनके सिर पर कलंक का वह दाग है जो  वर्षों तक नहीं मिटेगा ऐसे में विकास की हर बात, जनकल्याण का हर नारा एक गाली लगता है।</p>
<p style="text-align: justify;">सरकार के लिए जरूरी है कि वह किसानों-जरूरतमंदों की हर मुमकिन सहायता करे। अनपढ़ गरीब अगर बैंक तक नहीं पहुंच पाते तो बैंक खुद उन तक जाये, उन्हें महाजनों के अनाप-शनाप ब्याज से बचाये। हमने गांवों में देखा है कि किसी गरीब किसान ने कभी महाजन या बड़े काश्तकार से मामूली सा कर्ज लिया तो वह बढ़ते-बढ़ते हजारों हो जाता है और वह बेचारा ब्याज भरता रहता है और मूल जैसा का तैसा रह जाता है। कर्ज के बोझ दबा वह बेचारा कर्ज अदा करने के लिए उस महाजन या काश्तकार के यहां बेगार खटने लगता है। उसकी पीढ़ी दर पीढ़ी वहां बेगार खटते-खटते मर-खप जाती है पर सौ-पांच सौ रुपये का कर्ज हजारों में पहुंच जाता है और कर्ज लेने वाले की कई पीढ़ियों की अमोल मेहनत तक उसे चुकाने के लिए कम पड़ जाती है। गांव का रुख बरसों से नहीं किया। गांव बदले हैं किसानों की हालत भी बदली है लेकिन आज भी कई गांव देश के ऐसे हैं जिनकी खुशहाली या बदहाली प्रकृति पर निर्भर है। देश में नहरों का अब भी वैसा जाल नहीं बिछाया जा सका कि इसका कण-कण पानी पाकर तृप्त हो और धरती सोना उगलने लगे। मौसम और महाजन के ऋण की मार सहने को आज भी हिंदुस्तान के हजारों नत्था मजबूर हैं। इनके लिए सरकारी विकास का हर दावा महज एक छलावा और भ्रम ही लगता है। सही मायने में हिंदुस्तान उस दिन आजाद होगा जब गांव-गांव तक खुशहाली पहुंचाने का गांधी का सपना पूरा होगा। गांधी जी ने जब देश के बारे में सोचा तो उनकी दृष्टि और दिमाग में सबसे पहले गांवों की ही बात आयी। उनकी इस सोच के चलते ही यह बात कही गयी कि असली भारत तो गांवों में बसता है। यह बात सौ फीसदी सच भी है। हिंदु्स्तान का किसान अगर अनाज न जुटाये तो कंकरीट के जंगल बने शहर श्मशान बन जायेंगे। देश के दो सुदृढ़ ध्रुव हैं –किसान और जवान। किसान देश का पेट भरता है, जवान अपनी जान तक देकर उसकी रक्षा करते हैं। ये दोनों प्रणम्य हैं और इनके ऋण से देश कभी उऋण नहीं हो सकता। इन दोनों वर्गों को सम्मान देते हुए हमारे पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय लालबहादुर शास्त्री ने जय जवान, जय किसान का नारा दिया था। आज वही किसान पीड़ित और सुविधाओं से वंचित है। जब तक विकास का लाभ उस सीमांत किसान या गरीब तक नहीं पहुंचता ऐसा हर विकास, हर योजना बेमानी और बेकार है।</p>
<p style="text-align: justify;">भारत में किसानों की बदहाली की क्या स्थिति है इसका अंदाजा पिछले कुछ सालों में होनेवाली किसानों की आत्महत्या से चलता है जिसके आंकड़े चौंकाने वाले हैं। आंध्रप्रदेश की 8 करोड़ की आबादी में 70 प्रतिशत लोगों की जीविका का साधन कृषि है। वहां इस साल अगस्त माह से पहले तक के छह सप्ताह में 25 किसानों के आत्महत्या करने की खबरें आयी थीं हालांकि विपक्षी राजनीतिक दल इस आंकड़े को और अधिक बताते हैं। भारत के कुछ किसानों की हालत यह है कि वे गले तक कर्ज में डूबे हैं। अगर आंकड़ो में यकीन करें तों 2002 से लेकर 2006 तक देश में 17500 किसानों के आत्महत्याएं की। सरकारी आंकड़ो का विश्लेषण करने वालों का कहना है कि 1997 से अब तक 160,000 किसानों ने आत्महत्याएं की। इनमें से अधिकांश ने वही कीटनाशक खाकर अपनी जिंदगी खत्म कर ली जो उनकी उन फसलों को कीड़ों से बचाने के लिए था जो उनकी जिंदगी थी। वह नष्ट हुई तो उनकी अपनी जिंदगी भी बरबाद हो गयी।</p>
<p style="text-align: justify;">आंध्रप्रदेश में इस साल 50 प्रतिशत वर्षा ही हुई है ऐसे में धान, गन्ना व कपास जैसी पानी पर आधारित फसलें चौपट हो रही हैं। किसान खाद, सिंचाई के उपकरण और महंगे बीज खरीदने के लिए महाजन के ऋण के भरोसे रहते हैं ऐसे में अगर फसल नहीं हुई तो उनके घर का तो पैसा गया ही कर्ज लिया पैसा भी उनके लिए वापस करना मुश्किल हो जाता है। जहां तक महाजन का सवाल है वह कभी-कभी दिये गये ऋण पर 30 प्रतिशत ब्याज तक वसूलते हैं। जो किसान आत्महत्या कर लेते हैं वे अपने पीछे छोड़ जाते हैं ऋण के बोझ में दबा परिवार जो बड़े काश्तकारों के खेतों में खेत मजदूर के रूप में काम करने को मजबूर हो जाता है। कई विशेषज्ञ मानते हैं कि किसानों की आसानी से बैंक तक पहुंच न होने के कारण ही वे महाजन के चंगुल में फंस जाते हैं जो उनका जी भर शोषण करता है। महाजन मूल नहीं लेना चाहता बस ब्याज भर लेता रहता है और कर्जदार ब्याज के एवज में ही लिये गये मूल धन से ज्यादा अदा कर देता है और मूल धन वैसा का वैसा बना रहता है । ऐसे में कर्ज कभी अदा होता ही नहीं है। ग्रामीण क्षेत्र के गरीबों को साल में 100 दिन के रोजगार की गारंटी दिलाने वाली योजना अगर सही ढंग से लागू की जा सके तो इससे बहुत से गरीबों का कल्याण हो सकता है और बहुत सी बहुमूल्य जिंदगियां वक्त से पहले खत्म होने से बच सकती हैं लेकिन ऐसा हो नहीं पाता। यह योजना भी कहीं-कहीं ही कारगर हो पायी है।</p>
<p style="text-align: justify;">महाराष्ट्र, कर्णाटक, केरल और पंजाब के किसानों तक को तंगहाली और कर्ज से ऊब कर आत्महत्या को मजबूर होना पड़ा। नेशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़ों के मुताबिक 2006 में अकेले महाराष्ट्र में 4453 किसानों ने आत्महत्या की। इस अवधि में देश में आत्महत्या करने वाले किसानों की संख्या 17060 थी। 2008 में देश भर में 16196 किसानों ने आत्महत्याएं कीं। सरकारी आंकड़ों के अनुसार 2005-2009 में महाराष्ट्र में 5000 किसानों ने आत्महत्याएं कीं। आंध्रप्रदेश में 2005-2007 में आत्महत्या करने वाले किसानों की संख्या थी 1313, कर्णाटक में 2005 से अगस्त 2009 तक यह संख्या थी 1003 ।केरल में पिछले साल यह संख्या 905, गुजरात में 387, पंजाब में 75 और तमिलनाडु में 26 थी।छत्तीसगढ़ में अप्रैल 2009 में कहते हैं कि ऋण के भार और फसल के बेकार होने के कारण 1500 किसानों ने आत्महताएं कीं। किसानो की आत्महत्या की घटनाएं सबसे पहले 1990 में प्रकाश में आयीं जब महाराष्ट्र में किसानों के आत्महत्या करने की खबरें आयीं। इसके बाद आंध्रप्रदेश और विदर्भ और फिर देश के कोने-कोने से किसानों की आत्महत्याओं की खबरें आने लगीं। हालांकि सरकारें अक्सर दावा करती रही हैं कि किसानों के हित के लिए कई कदम उठाये गये हैं लेकिन लगता है कि ये योजनाएं छोटे व सीमांत किसानों तक नहीं पहुंच पातीं तभी तो वे बेहाल और तंगहाल हैं। हम जब तक गांवों को आत्मनिर्भर इकाई नहीं बनायेंगे, उसे विकास की एक इकाई मान कर नहीं चलेंगे, गांव और गरीब बदहाल ही रहेंगे। गांवों में कृषि आधारित औद्योगिक इकाइयां स्थापित कर, वहां शिक्षा, स्वास्थ्य सुविधाएं सुचारू रूप से पहुंचा कर हम न सिर्फ गांवों बल्कि देश का भी भला कर रहे होंगे क्योंकि गांव बचेंगे तभी देश बचेगा। और गांधी का सपना भी उसी दिन सच होगा। देश को उसी दिन मिलेगी सच्ची आजादी जब किसी नत्था को भूखे से बिलबिला कर या ऋण के बोज से दब कर मरने को मजबूर नहीं होना पड़ेगा। उसकी सरकार उसके दुख के उसके पास नजर आयेगी और वह अपने को दीन-हीन और लाचार नहीं समझेगा। उसे महाजनों की मर्जी का गुलाम नहीं होना पड़ेगा। काश मेरा भारत ऐसा हो जाये। आइए उस सुनहली सुबह के स्वप्न बुने और सर्वशक्तिमान से प्रार्थना करें कि ऐसी सुबह जल्द आये। हजारों  किसानों को तो हम खो चुके अब और नहीं खोना चाहते।</p>
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		<title>भूख के पेट में मध्यप्रदेश के और 28 आदिवासी बच्चे</title>
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		<pubDate>Wed, 08 Sep 2010 14:34:38 +0000</pubDate>
		<dc:creator>शिरीष खरे</dc:creator>
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		<description><![CDATA[एएचआरसी यानी एशियन ह्यूमन राइटस् कमीशन के अनुसार मध्यप्रदेश में 28 बच्चों ने कुपोषण के चलते दम तोड़ दिया है. पीडित बच्चों के परिवार सरकारी योजनाओं के तहत भोजन और स्वास्थ्य के मद में दी जाने वाली सहायता से भी ]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><a rel="attachment wp-att-6662" href="http://www.janokti.com/%e0%a4%85%e0%a4%82%e0%a4%a7%e0%a5%87%e0%a4%b0-%e0%a4%a8%e0%a4%97%e0%a4%b0%e0%a5%80/%e0%a4%ad%e0%a5%82%e0%a4%96-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%aa%e0%a5%87%e0%a4%9f-%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%82-%e0%a4%ae%e0%a4%a7%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%a6%e0%a5%87%e0%a4%b6/attachment/poverty_children_pictures-640x425/"><img class="alignright size-medium wp-image-6662" title="poverty_children_pictures-640x425" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2010/09/poverty_children_pictures-640x425-300x199.png" alt="" width="300" height="199" /></a>एएचआरसी यानी एशियन ह्यूमन राइटस् कमीशन के अनुसार मध्यप्रदेश में 28 बच्चों ने कुपोषण के चलते दम तोड़ दिया है. पीडित बच्चों के परिवार सरकारी योजनाओं के तहत भोजन और स्वास्थ्य के मद में दी जाने वाली सहायता से भी दूर हैं.</p>
<p style="text-align: justify;">एएचआरसी ने अपनी सूचना का आधार मध्यप्रदेश की एक संस्था लोक &#8216;संघर्षमंच&#8217; और प्रदेश में चलाये जा रहे &#8216;भोजन के अधिकार अभियान&#8217; की एक मौका मुआयना पर आधारित रिपोर्ट को बनाया है. इस रिपोर्ट के आधार पर एएचआरसी ने आशंका जतायी है कि आने वाले दिनों में मध्यप्रदेश के आदिवासी इलाकों के कई और बच्चे भुखमरी के शिकार हो सकते हैं.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">एएचआरसी ने भुखमरी की चपेट में आएं बच्चों की स्थिति को बयान करते हुए भारत के मुख्य न्यायाधीश, संयुक्त राष्ट्रसंघ द्वारा भोजन के अधिकार के संदर्भ में नियुक्त विशेष प्रतिनिधि और बाल अधिकारों की समिति को पत्र लिखा है और उनसे तुरंत हस्तक्षेप की मांग की है.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">ज्यादातर मामलों के विवरणों से पता चला है कि बच्चे कुपोषण और चिकित्सीय देखरेख के अभाव में उन बीमारियों की चपेट में आएं हैं जिनका इलाज बहुत आसानी से हो सकता था. गौरतलब है कि प्रदेश में बीते दो महीने से कुपोषण से ज्यादातर आदिवासी बच्चों की मौतें हुई हैं. कुपोषण के शिकार ज्यादातर बच्चे आदिवासी बहुल जिले झाबुआ के मेघनगर प्रखंड से पाएं गए हैं.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">प्रशासनिक असंवेदनशीलता की हद यह है कि पीड़ित बच्चों के परिवारों को बीपीएल कार्ड तक हासिल नहीं हो पाएं हैं. जबकि यह सारे परिवार सीमांत किसान हैं और उन्हें खेती के लिए सिंचाई की सुविधा या कोई अन्य राजकीय मदद भी नहीं मिल रही है. इस इलाके में जिस परिवार के पास थोड़ी सी भी जमीन है उसे बीपीएल से ऊपर दिखाया गया है, भले ही वह जमीन कितनी भी कम और बंजर ही क्यों न हो. जाहिर है ऐसा परिवार अब भी भोजन और स्वास्थ्य सुविधा के मामले में सरकारी मदद का हकदार नहीं बन सका है.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">एएचआरसी के अनुसार पीड़ित बच्चों के परिवार वालों को काम के अभाव में गांव से पलायन करना पड़ा है और उन्हें मनरेगा के अधिकार से दूर रखा गया है. मनरेगा के तहत दिये जाने वाले जॉबकार्ड के हर धारक को गुजरे साल जहां बामुश्किल 15 दिनों का काम ही दिया गया है, वहीं ऐसे लोगों को अब भी उनकी मजदूरी नहीं मिली है. जबकि गांवों में सामाजिक अंकेक्षण की प्रकिया भी पूरी कर ली गई है. अजब है कि एक तरफ गांवों में बच्चों की कुपोषण से हो रही मौतें रुकती नहीं हैं और दूसरी तरफ मनरेगा के सामाजिक अंकेक्षण में एक भी कमी दिखाई नहीं देती है.</p>
<p style="text-align: justify;">
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		<title>नक्सलियों की कायरता ने लुकस टेटॆ की बलि ली</title>
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		<pubDate>Sun, 05 Sep 2010 07:11:35 +0000</pubDate>
		<dc:creator>अनिकेत प्रियदर्शी</dc:creator>
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		<description><![CDATA[लुकस टेटॆ अब हमारे बीच नही हैं, लेकिन लुकस टेटॆ अब हर उस भारतीय के दिल मे है जिसने भारत को प्यार किया है । नक्सलियों की कायरता एवं बर्बरतापूर्ण कृत्यों ने लुकस टेटॆ की बलि ली । जरूरी नही ]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><span style="font-size: small;"><strong><a rel="attachment wp-att-6553" href="http://www.janokti.com/%e0%a4%85%e0%a4%82%e0%a4%a7%e0%a5%87%e0%a4%b0-%e0%a4%a8%e0%a4%97%e0%a4%b0%e0%a5%80/%e0%a4%a8%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b8%e0%a4%b2%e0%a4%bf%e0%a4%af%e0%a5%8b%e0%a4%82-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a4%be%e0%a4%af%e0%a4%b0%e0%a4%a4%e0%a4%be-%e0%a4%a8%e0%a5%87-%e0%a4%b2%e0%a5%81/attachment/naxalite_0609/"><img class="alignright size-medium wp-image-6553" title="naxalite_0609" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2010/09/naxalite_0609-300x205.jpg" alt="" width="300" height="205" /></a>लुकस टेटॆ अब हमारे बीच नही हैं, लेकिन लुकस टेटॆ अब हर उस भारतीय के दिल मे है जिसने भारत को प्यार किया है । नक्सलियों की कायरता एवं बर्बरतापूर्ण कृत्यों ने लुकस टेटॆ<span style="font-family: 'Times New Roman';"> </span></strong><strong>की बलि ली । जरूरी नही है कि कोई साहस लेकर जन्मा हो </strong><strong><span style="font-family: 'Times New Roman';">, </span></strong><strong>लेकिन हरेक शक्ति लेकर जन्मता है । लुकस टेटॆ शक्ति और साहस दोनो के प्रतीक बने और देश पर अपने प्राणों को न्यौछावर किया&#8230; लुकस टेटॆ अमर हो गये । पर कहीं न कही ये बात दिल मे टीस बनकर उभर रही है कि क्या लुकस टेटॆ को बचाया नही जा सकता था ? टेटॆ की जगह अगर कोई मंत्री या बडी हस्ती को नक्सलियों ने बंधक बनाया होता तो भी क्या ऐसी ही स्थिती रहती ? पर शायद टॆटॆ आज की उस राजनीति का भी शिकार बन गये जिसमे विपत्तियों को खोजने </strong><strong><span style="font-family: 'Times New Roman';">, </span></strong><strong>उसे सर्वत्र प्राप्त करने </strong><strong><span style="font-family: 'Times New Roman';">,</span></strong><strong>गलत निदान करने और अनुपयुक्त चिकित्सा करने की कला होती है ।</strong></span></p>
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		<title>युवा श्रम और रोजगार</title>
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		<pubDate>Mon, 23 Aug 2010 17:32:15 +0000</pubDate>
		<dc:creator>रमेश भट्ट</dc:creator>
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		<description><![CDATA[श्रम और रोजगार मन्त्रालय भारत की एक बड़ी आबादी को ध्यान में रखकर अपनी नीतियां बनाता है। देश का असंगठित क्षेत्र मतलब 39 करोड़ से ज्यादा लोग इस मन्त्रालय के अधीन आता है। जिसके लिए सरकार 2008 में सामाजिक सुरक्षा ]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><span style="font-size: 13.3333px;"><img class="alignleft size-medium wp-image-6142" title="nokri-do" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2010/08/nokri-do-300x236.jpg" alt="" width="300" height="236" />श्रम और रोजगार मन्त्रालय भारत की एक बड़ी आबादी को ध्यान में रखकर अपनी नीतियां बनाता है। देश का असंगठित क्षेत्र मतलब 39 करोड़ से ज्यादा लोग इस मन्त्रालय के अधीन आता है। जिसके लिए सरकार 2008 में सामाजिक सुरक्षा विधेयक भी लेकर आई है। असंगठित क्षेत्र की स्थिति पर एक नज़र डालें तो मालूम चलता है कि लोग इसमें कितनी तादाद में किन कामों में लगे हुए है। मसलन 62 फीसदी खेती में, 16 फीसदी वेतन भोगी, 11 फीसदी उद्योगों से जुड़े है। एक दूसरा आंकड़ा यह कहता है कि देश में ज्यादातर आबादी यानि 53 फीसदी स्वरोजगार पर निर्भर है। असंगठित क्षेत्र में महिलाओं की तादाद पुरूषों से ज्यादा है। मन्त्रालय की रिपोर्ट के मुताबिक रोजगार के लिहाज से सालाना  2.5 फीसदी रोजगार में वृद्धि होनी चाहिए। मगर इसके लिए जरूरी है सालाना 9 फीसदी की विकास दर। सरकार ने हर साल 1 करोड़ 20 लाख के रोजगार सृजन का लक्ष्य रखा है। गौरतलब है कि 2001 में 15 से 59 वर्ष की आयु के कामगारों का प्रतिशत 58 फीसदी था जो 2021 में चलकर 64 फीसदी हो जायेगा। लिहाजा मन्त्रालय के सामने एक बड़ी आबादी के लिए रोजगार पैदा करने की चुनौति होगी। इतना ही नही 2020 में हर भारतीय की औसत उम्र 29 साल होगी जबकि चीन और अमेरिका में 37 जबकि जापान की बात करें तो यह होगी 48 साल। यानि भारत कहलायेगा विश्व का सबसे युवा प्रदेश। श्रम मन्त्रालय के सामने दूसरी बड़ी चुनौति 2022 में 50 करोड़ कामगारों को दक्ष बनना, जिसके लिए सरकार राष्ट्रीय कौशल विकास परिषद बनाने की घोषणा कर चुकी है। वह भी इस बात को ध्यान में रखकर की 97 फीसदी कामगारों के पास कोई तकनीकी शिक्षा उपलब्घ नही है। देखना दिलचस्प यह होगा कि क्या सरकार अपने इन लक्ष्यों को पूरा कर पाती है।</span></p>
<p style="text-align: justify;">
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		<title>क्या हुआ जो पीपली लाइव का नत्था नहीं मरा</title>
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		<pubDate>Sun, 22 Aug 2010 17:40:44 +0000</pubDate>
		<dc:creator>रमेश भट्ट</dc:creator>
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		<description><![CDATA[एक नत्था की कहानी ने इतना बबाल मचाया हुआ है लेकिन ये मत भूलिए इस देश में एक-दो नहीं करोड़ों नत्थाओं की जमात है &#124; क्या हुआ जो पीपली लाइव का नत्था नही मरा। इस देश में 1997-2007 यानि 10 ]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><span style="font-size: 13.3333px;"><img class="alignright size-medium wp-image-6143" title="peepli live nattha" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2010/08/peepli-live-nattha-300x225.jpg" alt="" width="300" height="225" />एक नत्था की कहानी ने इतना बबाल मचाया हुआ है लेकिन ये मत भूलिए इस देश में एक-दो नहीं करोड़ों नत्थाओं की जमात है | क्या हुआ जो पीपली लाइव का नत्था नही मरा। इस देश में 1997-2007 यानि 10 सालों में 187000 नत्था अपनी जीवन लीला समाप्त कर चुके है। यह तो सरकारी रिकार्ड में दर्ज नत्थाओं के आंकड़े है। ऐसे न जाने कितने नत्था होंगे जिनका नाम सरकारी फाइलों में नही होगा। दरअसल राजनीति और मीडिया के लिए नत्था जैसा मसाला संजीवनी की तरह होता है। एक पक्ष अपने वोट बढ़ने की आस को लेकर आनन्दित होता है तो दूसरा अपनी टीआरपी के खेल में मशगूल। नत्था की कहानी उन करोड़ों किसानों की कहानी है जो हर पल अपनी जिन्दगी को लेकर संघषर्रत है। यही कारण है कि पीपली लाइव फिल्म इन दिनों हर आमोखास के बीच चर्चा का विषय बन गई है। खासकर इससे जुड़े पात्र इसकी कहानी, बेहतर परिकल्पना ठेठ ग्रामीण परिवेश और इन सबसे उपर दुनिया के सबसे बड़े लोकतन्त्र में राजनीति का खेल वाकई देखने लायक है। इन सबके बीच वह किसान जो अपनी खेती से अजीज आकर विकल्प की तलाश में भटक रहा है।   किसानों की दुर्दशा पर फिल्माई गई यह फिल्म इस संवेदनशील मुददे पर सरकारी रूख की पोल खोलती है। किसानों की बढ़ती आत्महत्याओं ने सरकारों की नीन्द जरूर खुली मगर किसानों की आत्महत्या अब भी हो रही है। फिल्म से पहले यह जान लेना जरूरी है कि हमारी सरकार इस क्षेत्र में बदलाव लाने के लिए कितनी गम्भीर हैं। किसानों की आत्महत्या के मामले में कुख्यात राज्यों में महाराष्ट्र, आंध्रप्रदेश, कर्नाटक और केरल आगे रहे। इन सबके पीछे का कारण किसानों पर कर्ज का बड़ता बोझ था। आज भी हमारे देश में केवल 27 प्रतिशत किसानों की पहुंच बैंकों तक है। इससे साफ है कि किसानों की एक बड़ी आबादी आज भी साहूकारों से कर्ज लेती है। सरकार की 71 हजार करोड़ की कर्ज माफी योजना पर सबसे बड़ी आशंका इसी मुददे को लेकर थी। बहरहाल सरकार ने एक समिति गठित की है जो पता लगाएगी कि देश भर में कितने किसानों ने साहूकारों से कर्ज ले रखा है। बजट 2010-11 में कृषि ऋण बांटने का लक्ष्य 3.25 करोड़ से बढ़ाकर 3.75 करोड़ कर दिया है। साथ ही जो किसान समय से अपने ऋण बैंकों में चुकायेंगे उन्हें 2 प्रतिशत ब्याज दर की छूठ दी जायेगी। यह ऋण 7 प्रतिशत की ब्याज दर में 3 लाख तक लिया जा सकता है। यहां पर यह भी बताना जरूरी है कि खेती में सुधार पर बैठाये गए राष्ट्रीय  किसान आयोग ने कृषि ऋण 4 प्रतिशत की दर पर देने की सिफारिश की थी।  पीपली लाइव में कर्ज के बोझ तले दबे नत्था को अपनी जमीन खो जाने की चिन्ता में वह दरदर भटक रहा होता है। वह जमीन जिससे उसके परिवार की रोजी रोटी चलती है। घर में बूढ़ी मां बीमार है। उसके इलाज में पहले ही बहुत खर्च हो चुका है। उस पर जमीन का चले जाने का मतलब जीवन में हर तरफ अंधेरा आ जाना। फिल्म मे जो काबिलेगौर बात इस मुश्किल घड़ी में मद्यपान करना वह नही भूलता। जाहिर है यह सामाजिक  बुराई भी कोढ़ में खाज का काम करती है। किसान देश की राजनीति में अहम स्थान रखते है। एक आम आदमी की नज़र में वह अन्नदाता है। नेताओं की नज़र में वह वोट काटने की मशीन है। मगर सच मानिए उसकी खुद की नज़र में वह हाण्ड मांस का एक ऐसा इंसान है जो दिन रात खून पसीना एक करके भी परिवार की जरूरतों को पूरा नही कर पाता। मीडिया के लिए नत्था की खबर एक मसाला है जो हाथों हाथ बिकेगा। बस उसे सनसनी की तरह पेश करो और टीआरपी की सीढ़ी चड़ो। किसान वह भी कहकर आत्हत्या करे राजनेताओं के लिए इससे बड़ा कोई मुददा नही। यह मुददा जीत को हार में और हार को जीत में बदल सकता है। यानि जीत और हार के बीच एक महीन रेखा जो नत्था जैसे किसान के जीने या मरने पर निर्भर करती है। इस फिल्म का सन्देश यही है कि मीडिया को जिम्मेदार और नेताओं को वफादार बनना होगा। यह देश किसानों का है। खाद्य सुरक्षा का जिम्मा उनके कंधों पर है। लिहाजा उनके कल्याण के बिना देश के कल्याण के बारे में सोचना बेमानी होगी।</span></p>
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