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	<title>JANOKTI : जनोक्ति :  राज-समाज और जन की आवाज &#187; india</title>
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		<title>देश को अशांत करने का मसौदा है ये बिल</title>
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		<pubDate>Wed, 08 Jun 2011 16:13:20 +0000</pubDate>
		<dc:creator>saurabh chauhan</dc:creator>
				<category><![CDATA[दो-टूक]]></category>
		<category><![CDATA[Communal violenc Bill]]></category>
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		<description><![CDATA[वातावरण को देखिये बहुत हलचल है! कही पुलिस का डंडा है तो कही आम आदमी का आंदोलन या अनशन! क्या जरुरत है आम जनता को आज डेल्ही के दरबार में जा कर अपना हक मांगने की? काया देश में ऐसी ]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><a rel="attachment wp-att-16781" href="http://www.janokti.com/%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b5%e0%a4%b0%e0%a4%bf%e0%a4%a4-%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%a4%e0%a4%bf%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%bf%e0%a4%af%e0%a4%be/%e0%a4%a6%e0%a5%87%e0%a4%b6-%e0%a4%95%e0%a5%8b-%e0%a4%85%e0%a4%b6%e0%a4%be%e0%a4%82%e0%a4%a4-%e0%a4%95%e0%a4%b0%e0%a4%a8%e0%a5%87-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%ae%e0%a4%b8%e0%a5%8c%e0%a4%a6%e0%a4%be/attachment/communal-violance-bill-by-nac4-300x1873/"><img class="alignleft size-full wp-image-16781" title="COMMUNAL-VIOLANCE-BILL-BY-NAC4-300x1873" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/COMMUNAL-VIOLANCE-BILL-BY-NAC4-300x18731.jpg" alt="" width="300" height="187" /></a>वातावरण को देखिये बहुत हलचल है! कही पुलिस  का डंडा  है तो कही आम आदमी का आंदोलन या अनशन! क्या जरुरत है आम जनता को आज डेल्ही के दरबार में जा कर अपना हक मांगने की? काया देश में ऐसी स्थिति आ गयी है या यू कहे कि व्यवस्था ने ऐसी राह में हमें धकेल दिया है जहा हर कदम विद्रोह है! कोई शौक नही है शायद देश कि जनता को कि महंगाई के इस दौर में अपना घर परिवार को छोड़ कर या साथ लेकर दिल्ली में धरना दे! फिर भी लोग गये! क्यों? कोई नेता का भाषण नही था या कोई ओहदा नही मिल रहा था! फिर भी लाखो लोग भूखे प्यासे जा रहे है मतलब कुछ तो सुगबुगाहट है देश में!</p>
<p style="text-align: justify;">ऐसा क्या होता  है जो लोग सडको पर उतर आते है?  क्या ये सत्ता की असफलता है? या सत्ता का अहंकार और वोट की राजनीति? ये चर्चा का विषय है!</p>
<p style="text-align: justify;">भ्रष्टाचार का मुद्दा गरमाया है सारा देश आज सरकार की तरफ गुस्से और सवाल के साथ देख रहा है! लेकिन सरकार को कोई डर जनता से नही जान पड़ता  है! एक और कारनामा सरकार ने किया राष्ट्रीय सलाहकार परिषद् को काम दिया  कि दंगो पर कार्यवाही करने के लिए   एक कानून  बनाया   जाये! सरकार क्या जाताना चाहती है  राष्ट्रीय सलाहकार परिषद् को शामिल कर  पहले तो ये विषय है! क्या सोनिया गाँधी का महिमामंडन सरकार का लक्ष्य है? क्या अल्पसंख्यको   को एक और झुनझुना थमाने कि तैयारी   चल   रही है?</p>
<p style="text-align: justify;">सांप्रदायिक एवं लक्षित हिंसा विधेयक  भारत का कानून नही बन सकता! इसमें तो हिंसा को जाति और धर्म से जोड़ा गया है! तुष्टिकरण कि राजनीति में कांग्रेस ने एक और मेडल लिया है ये कहा जा सकता है! उत्तरप्रदेश के चुनाव नज़दीक है तभी कांग्रेस बाबा साधू संतो और देश को डरा रही है ! इस बिल में तो बलात्कार कि भी परिभाषा बदल कर रख दी है! यदि बलात्कार कि घटना अल्पसंख्यक महिला के साथ होती है तो ये कानून काम करेगा लेकिन यदि महिला बहुसंख्यक है या यू कहे कि हिन्दू है तो ये बिल  किसी काम का नही! क्यों कांग्रेस अपनी तरफ से परिभाषाए बदलने  में लगी है? शंका है कि ये कानून हिंसा रोकने को नही बल्कि हिंसा करने के लिए बनाया जा रहा है! इसका दुरूपयोग होने कि प्रबल सम्भावना है! इसके पैरोकार कहते है कि ये बिल  गुजरात जेसे दंगो को रोकने के लिए बनाया है आप अंदाज़ा लगा सकते है जब तीस्ता सीतलवाड़ बिल की ड्राफ्ट कमिटी में हो तो ड्राफ्ट केसा बनेगा! लेकिन इस बिल में गुजरात दंगे तो याद दिला दिए लेकिन ये नही कहा कि जो रेल में लोगो को जला कर मारा गया उसके लिए किसको सजा मिलेगी है तो वो भी लक्षित हिंसा! क्या हिंसा को भी कांग्रेस आतंकवाद कि तरह मज़हबी रंग देना चाहती है! मन कि ड्राफ्ट में शब्दों का इस्तेमाल चुन चुन के हुआ है लेकिन सच्चाई सब के सामने है!</p>
<p style="text-align: justify;">कांग्रेस मान के चल रही है कि हिंसा केवल बहुसंख्यक हे करेंगे! इसकी गारेंटी कांग्रेस देने को तैयार दिख रही है! इसकी आड़ में यदि अल्पसंख्यक हिंसा करे तो क्या होगा ये बिल नही बता सकता ! तो इसे सांप्रदायिक ड्राफ्ट कहे तो क्या गलत होगा! धर्मनिरपेक्षता कि क्या परिभाषा है? क्या बहुसंख्यक समुदाय को हाशिये पर डालना धर्मनिरपेक्षता है ? इस बिल के माध्यम से सरकार क्या सन्देश देना छाती है कि हे भारत के मुसलमानों या दुसरे अल्पसंख्यको देखो हम हिन्दुओ को भी हाशिये पर डाल सकते है  ! इस तुष्टिकारन की नीति से कांग्रेस को छोड़ कर किसी को फायदा नही होने वाला!</p>
<p style="text-align: justify;">इस बिल के ड्राफ्ट को देख कर  ऐसा लगता है की ये देश को बांटने का कांग्रेस का कोई एजेंडा है! क्या कांग्रेस साम्प्रदायिक नही है? क्या केवल एक समुदाय को गलत नीतिया बना कर खुश करना धर्मनिरपेक्षता है? इतने वर्षो में अकलियत का शोषण करने वाली कांग्रेस अब एक ऐसा कानून लाना चाहती है जो छोटी सी बात पर राज्य की सरकार को बर्खास्त कर सकती है? जिसका दुरूपयोग किया जाना संभव है!</p>
<p style="text-align: justify;">तो क्या ये समझा जाए कि कांग्रेस का विशवास ये है कि हिन्दू ही दंगे कराएगा! ऐसी अदूरदर्शिता या वोट दर्शिता देश को केसे चला सकती है! एक बात देखे कि कौन  लोग बना रहे है इस बिल को! सोनिया गाँधी जो कि इस देश को मुश्किल से ३० वर्षो से जानती है! और जो भी लोग है वो हमेशा कांग्रेस के लिए &#8220;धर्मनिरपेक्ष&#8221; और देश के लिए साम्प्रदायिक है! तो क्या देश हित का कानून बन सकता है? कोई कहता है कि कंधमाल में दंगे हुए और इसाई मारे गये! रिपोर्ट जो भी हो लेकिन स्वामी लक्ष्मानंद को मारा गया उसको क्यों भूल गये ये लोग? दंगे कोन कर रहा है ? क्या दंगा तभी कहलायेगा जब हिन्दू पर आरोप होगा बाकी समुदाय द्वारा किया गया कृत्य दंगा नही होगा यदि ऐसी लकीर खींची जा रही है तो में समझता हु कि इस बिल को लाने वाले लोग अदूरदर्शी और राष्ट्रद्रोही है ऐसी विभाजनकारी सोच के लोगो को जिम्मेदार व्यक्ति नही कहा जा सकता और न ही त्यागी और सन्यासी कहा जा सकता है!</p>
<p style="text-align: justify;">अनुरोध इतना ही कि हम देश में शान्ति चाहते है दंगा न हो ऐसा चाहते है आतंक न हो ऐसा चाहते है कानून बने ये भी चाहते है लेकिन कानून की आड़ में देश को वोट कि राजनीति कि सुरंग में धकेलना और धर्म के नाम पर बांटना साम्प्रदायिकता है! इसका विरोध होना चाहिए!</p>
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		<title>क्रिकेट का भारतीयकरण या भारतीयों का क्रिकेटीकरण?</title>
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		<pubDate>Tue, 05 Apr 2011 16:22:55 +0000</pubDate>
		<dc:creator>पवन कुमार अरविंद</dc:creator>
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		<description><![CDATA[मुम्बई के वानखेड़े स्टेडियम में 49वें ओवर की दूसरी गेंद पर महेंद्र सिंह धोनी के छक्का मारते ही देश भर में ‘इंडिया-इंडिया’ के नारे गूंजने लगे। चक दे इंडिया। कुछ लोगों ने ‘भारत माता की जय’ के नारे लगाए और ]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><strong>मुम्बई के वानखेड़े </strong>स्टेडियम में 49वें ओवर की दूसरी गेंद पर महेंद्र सिंह धोनी के छक्का मारते ही देश भर में ‘इंडिया-इंडिया’ के नारे गूंजने लगे। चक दे इंडिया। कुछ लोगों ने ‘भारत माता की जय’ के नारे लगाए और कुछ ने ‘वंदेमातरम्’ की धुन भी गुनगुनाईं, और भी कई प्रकार के नारे लगाए जा रहे थे। ‘वंदेमातरम्’ और ‘भारत माता की जय’ के नारे उन लोगों ने भी लगाए जो इसके पहले तक इन नारों को साम्प्रदायिक कहा करते थे। भई लगाएं भी क्यों न; देशभक्ति का भाव जो पैदा हो गया था। भारतीय क्रिकेट टीम ने 28 वर्षों बाद एक बार पुनः विश्वकप जीतकर देश का सिर जो ऊंचा कर दिया था। भारतीय टीम के माथे पर विश्वविजेता का सेहरा जो बंध चुका था।</p>
<p style="text-align: justify;">राजधानी दिल्ली सहित देश के कई प्रमुख शहरों के मुख्य रास्ते जाम हो गए थे। इस कारण सभी दो पहिया व चार पहिया वाहन, और यहां तक कि पैदल यात्री भी, रेंग-रेंग कर चलने को मजबूर थे। इसके बावजूद जाम में फंसे हर किसी के चेहरे पर जश्न का भाव साफ झलक रहा था। मस्ती में डूबे लोगों को नियंत्रित करने के लिए कई जगहों पर पुलिसिया सख्ती भी करनी पड़ी। लेकिन किसी भी यात्री के चेहरे पर गुस्से का भाव नहीं था। सभी प्रसन्न थे। क्योंकि देशभक्ति का भाव जो हिलोरें ले रहा था। भारतीयता का भाव उफान ले रहा था।</p>
<p style="text-align: justify;">खेल खत्म होने के बाद मैं भी सहसा सड़क पर निकल पड़ा। सड़क पर जश्न का ऐसा माहौल था कि दीवाली के दिये भी मात खा रहे थे, यानी इस जश्न के खुशनुमा माहौल को यदि महादीवाली की संज्ञा दे दें तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। अभी मैं इधर-उधर देख ही रहा था कि अचानक पांच-छह हम-उम्र युवा हाथ में तिरंगा लिये हमसे गले मिलने को आतुर दिखे। मैं उनको जानता-पहचानता तक नहीं था, फिर भी वे मुझसे गले मिलने लगे। जीत की इस खुशी के कारण वे अपने आप को रोक नहीं पा रहे थे। भावविह्वल भी हो रहे थे। कुछ की आंखों में आंसू भी मैंने देखे। उनके अंदर जोश, उमंग था और एक अलग प्रकार का जुनून भी दिख रहा था।</p>
<p style="text-align: justify;">सच में यह क्रिकेट की नहीं बल्कि भारतीय टीम की विजय है। भारतीय खिलाड़ियों की योग्यता, प्रतिभा, श्रम और कौशल की विजय है। यह विजय उनके द्वारा तपस्या सदृश किए गए प्रयास का प्रतिफल है। इस विजय को अंग्रेजी खेल की विजय कहना किसी भी प्रकार से उचित नहीं होगा। सच कहें तो अग्रेजों का दिया क्रिकेट आज के अधिकांश युवाओं में देशभक्ति के प्रकटीकरण का एक साधन बनता हुआ दिखाई दे रहा है। जो कुछ भी है उसका होना सत्य है, और जो कुछ नहीं है उसका न होना ही सत्य है। कभी-कभी जो दिखता है वो सत्य नहीं होता। हर पीली दिखने वाली वस्तु सोना नहीं होती। वर्तमान में क्रिकेट प्रेमियों का बहुमत है और आप लोकतंत्र में बहुमत को नकार नहीं सकते।</p>
<p style="text-align: justify;"><a rel="attachment wp-att-14803" href="http://www.janokti.com/right-wing-%e0%a4%a6%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b7%e0%a4%bf%e0%a4%a3%e0%a4%be%e0%a4%b5%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%a4/%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%bf%e0%a4%95%e0%a5%87%e0%a4%9f-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%ad%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a4%a4%e0%a5%80%e0%a4%af%e0%a4%95%e0%a4%b0%e0%a4%a3-%e0%a4%af%e0%a4%be-%e0%a4%ad/attachment/india-won-world-cup-2011/"><img class="aligncenter size-full wp-image-14803" title="india won world cup 2011" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/india-won-world-cup-2011.jpg" alt="" width="556" height="468" /></a>लेकिन इतना सब कुछ होने के बावजूद आप यह अंदाजा नहीं लगा सकते कि ये सब क्रिकेट का भारतीयकरण है या भारतीयों का क्रिकेटीकरण? ये सच में देशभक्ति है या कुछ और? क्या ये देशभक्ति सचमुच स्थाई है? दरअसल; हर्षातिरेक, हर्षातिशय, हर्षोल्लास, हर्षोत्फुल्ल, हर्षोन्माद, हर्षाश्रु, ये सारी अवस्थाएं क्षणिक होती हैं। इनमें स्थायित्व नहीं होता। खेत को सिंचाई के लिए जल की आवश्यकता होती है लेकिन बाढ़ के जल से खेत की सिंचाई नहीं हुआ करती। बाढ़ तो सब कुछ बहा ले जाती है। सबको तबाह कर देती है। उसके प्रवाह में रचनात्मकता नहीं होती।</p>
<p style="text-align: justify;">अब तक का सबसे बड़ा घोटाला करके 2जी स्पेक्ट्रम के प्रतीक बन चुके तत्कालीन दूरसंचार मंत्री ए. राजा और उनके पूर्व सहयोगियों- शाहिद उस्मान बलवा, सिद्धार्थ बेहुरा, आर.के. चंदोलिया तथा विदेशों में करोड़ों का काला धन जमा करने वाले हसन अली खान भी क्रिकेट देखते हैं। भारत के विजयी होने पर प्रसन्न होते हैं। भावविह्वल और हर्षोन्मत्त हो जाते हैं। क्या इसी को देशभक्ति मान लिया जाए? क्या क्रिकेट देखना भर ही देशभक्ति के लिए पर्याप्त है? क्या देश के विजयी होने के बाद नाच-गाकर खुशियां मनाना ही देशभक्ति का पर्याय है? क्या यही सब देश की समस्याओं के समाधान के लिए उपयुक्त है?</p>
<p style="text-align: justify;">कुछ समय पहले साफ्टवेयर कंपनी माइक्रोसाफ्ट के संस्थापक बिल गेट्स भारत आये थे तो उनके बारे में यहां के समाचार पत्र, पत्रिकाओं ने लिखा था कि यदि गेट्स के कुछ करोड़ रूपए गिर जाएं तो उनको उठाने की भी फुर्सत नहीं है। क्योंकि जब तक वह उसे उठायेंगे तब तक उस गिरे धन का कई गुना नुकसान हो चुका होगा। दरअसल, बिल गेट्स वहुत व्यस्त आदमी हैं और उनका हर क्षण कीमती है। लेकिन क्या भारत के प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह बिल गेट्स से भी गये-गुजरे हैं कि उनका समय और पैसा नष्ट नहीं होता? क्या डॉ. सिंह अपने को सामान्य व्यक्ति मानते हैं? लेकिन वह सामान्य कैसे हो सकते हैं? वह तो भारत जैसे देश के प्रधानमंत्री हैं और उनके ऊपर 121 करोड़ लोगों के नेतृत्व का भार है। इसलिए उनका हर क्षण महत्वपूर्ण है, बिल गेट्स से भी ज्यादा।</p>
<p style="text-align: justify;">क्या बिल गेट्स मैच देखते हैं और वह भी पूरे आठ घंटे समय खर्च करके? नहीं, उनके लिए यह संभव ही नहीं है। देश का और अपना किसी भी प्रकार का नुकसान करके क्रिकेट देखना देशभक्ति कैसे कही जा सकती है? भई देखिये, खूब देखिए, आप भी तो आदमी ही हैं। आपके पास भी मन और मस्तिष्क है। आपको भी दिमागी थकान मिटाने की आवश्यकता होती है। लेकिन पाकिस्तानी प्रधानमंत्री को बगल में बैठाकर क्या यह संभव है?</p>
<p style="text-align: justify;">पाकिस्तान के बीच क्रिकेट के साथ-साथ दुनिया की कोई भी कूटनीति सफल नहीं हो सकती। क्योंकि उसका स्वयं पर नियंत्रण ही नहीं है। वह अमेरिका, आर्मी, आतंकवाद, उलेमा और चीन; इन पांच के चंगुल में बुरी तरह से जकड़ा हुआ है। बिना इन पांचों के एक पत्ता भी नहीं हिल सकता, तो फिर कोई यूसुफ रजा गिलानी या आसिफ अली जरदारी वार्ता की मेज पर क्या कर सकेगा? इसलिए उसके साथ क्रिकेट कूटनीति भी एक तरह से समय की बर्बादी ही है। इस संदर्भ में मुख्य विपक्षी दल भारतीय जनता पार्टी की बातों में दम है, जो ये बातें दुहराती रही है कि बिना आतंकी ढ़ांचा समाप्त किये पाकिस्तान से कोई वार्ता नहीं होनी चाहिए। समस्या को बिना समझे उसका समाधान नहीं हो सकता। दरअसल, मनमोहन सिंह सब जानते हैं; पर वह तो गिलानी को बुलाकर भ्रष्टाचार में आकंठ डूबी यू.पी.ए. सरकार के खिलाफ देश भर में चल रही चर्चा को दूसरी दिशा में मोड़ने का असफल प्रयास भर कर रहे थे। यह अजीब कूटनीतिक प्रयास है जो यही मानकर किया जा रहा था कि इससे हासिल कुछ नहीं होगा।</p>
<p style="text-align: justify;">भारत और किसी अन्य देश के साथ क्रिकेट के समय जैसे सामान्य लोग अपने काम-धंधे की छुट्टी करके पूरे व्यस्त हो जाते हैं, उसी तरह मनमोहन भी पाकिस्तान का बहाना बनाकर पूरे आठ-दस घंटे तक व्यस्त हो गए। यह किसी भी प्रकार से न तो देश-हित में कही जाएगी और न ही देशभक्ति। डॉ. सिंह ने जो किया उनसे प्रेरणा लेकर देश भर के कई अधिकारियों, कर्मचारियों ने भी कार्य से अपने को विरत रखा। इसके अतिरिक्त भी करोड़ों लोगों ने क्रिकेट देखने के लिए अपने को खाली रखा। इससे देश के करोड़ों घंटे का मानव श्रम बर्बाद हुए और होते ही रहते हैं, जिसकी भरपाई फिर कभी भी नहीं की जा सकती।</p>
<p style="text-align: justify;">दिल्ली सरकार के आबकारी विभाग के आंकड़ों के मुताबिक, मोहाली और वानखेड़े में भारतीय टीम की जीत की खुशी में दिल्ली के ‘कथित उत्साही लोगों’ ने 26 करोड़ रुपये से अधिक की शराब पी। इन आंकड़ों में अधिकांश युवा शामिल हैं। ये कैसी देशभक्ति है? कैसा हर्षोदय है? देशभक्ति के प्रकटीकरण का कैसा तरीका है? दरअसल, ये सब बातें हर्ष का क्षणिक उन्माद है, जिसमें तनिक भी स्थायित्व नहीं होती। इससे मिलता कम और नुकसान ज्यादा होता है। तो इस ‘क्रिकेटिया जुनून’ को देशभक्ति कैसे कहा जा सकता है?</p>
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		<title>आम लोगों की एकजुटता से झुकेगी सत्ता</title>
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		<pubDate>Mon, 29 Nov 2010 14:37:48 +0000</pubDate>
		<dc:creator>डा ० पुरुषोत्तम मीणा</dc:creator>
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		<description><![CDATA[आज हमारे लिये सबसे जरूरी और महत्वपूर्ण है कि देश या समाज के लिये न सही, कम से कम अपने आपके और अपनी आने वाली पीढियों के सुखद एवं सुरक्षित भविष्य के लिये तो हम अपने वर्तमान जीवन को सुधारें। ]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><a rel="attachment wp-att-11068" href="http://www.janokti.com/discussion-suggestions-%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%9a%e0%a4%be%e0%a4%b0-%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%ae%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%b6/%e0%a4%86%e0%a4%ae-%e0%a4%b2%e0%a5%8b%e0%a4%97%e0%a5%8b%e0%a4%82-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%8f%e0%a4%95%e0%a4%9c%e0%a5%81%e0%a4%9f%e0%a4%a4%e0%a4%be-%e0%a4%b8%e0%a5%87-%e0%a4%9d%e0%a5%81%e0%a4%95/attachment/3srs1/"><img class="alignright size-medium wp-image-11068" title="3srs1" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/3srs1-300x225.jpg" alt="" width="300" height="225" /></a>आज हमारे लिये सबसे जरूरी और महत्वपूर्ण है कि देश या समाज के लिये न सही, कम से कम अपने आपके और अपनी आने वाली पीढियों के सुखद एवं सुरक्षित भविष्य के लिये तो हम अपने वर्तमान जीवन को सुधारें। यदि हम सब लोग केवल अपने वर्तमान को सुधारने का ही दृढ निश्चय कर लें तो आने वाले कल का अच्छा होना तय है, लेकिन हमारे आज अर्थात् वर्तमान के हालात तो दिन-प्रतिदिन बिगडते ही जा रहे हैं। हम चुपचाप सबकुछ देखते और झेलते रहते हैं। जिसका दुष्परिणाम यह है कि आज हमारे देश में जिन लोगों के हाथों में सत्ता की ताकत हैं, उनमें से अधिकतर का सच्चाई, ईमानदारी एवं इंसाफ से दूर-दूर का भी नाता नहीं रह गया है। अधिकतर भ्रष्टाचार के दलदल में अन्दर तक धंसे हुए हैं और अब तो ये लोग अपराधियों को संरक्षण भी दे रहे हैं। ताकतवर लोग जब चाहें, जैसे चाहें देश के मान-सम्मान, कानून, व्यवस्था और संविधान के साथ बलात्कार करके चलते बनते हैं और सजा होना तो दूर इनके खिलाफ मुकदमे तक दर्ज नहीं होते! जबकि बच्चे की भूख मिटाने हेतु रोटी चुराने वाली अनेक माताएँ जेलों में बन्द हैं। इन भ्रष्ट एवं अत्याचारियों के खिलाफ यदि कोई आम व्यक्ति या ईमानदार अफसर या कर्मचारी आवाज उठाना चाहे, तो उसे तरह-तरह से प्रताड़ित एवं अपमानित करने का प्रयास किया जाता है और सबसे दु:खद तो ये है कि पूरी की पूरी व्यवस्था अंधी, बहरी और गूंगी बनी देखती रहती है।</p>
<p style="text-align: justify;"><span style="font-size: 13.3333px;">अब तो हालात इतने बिगडते चुके हैं कि मसाले, घी, तेल और दवाइयों तक में धडल्ले से मिलावट की जा रही है। ऐसे में कितनी माताओं की कोख मिलावट के कारण उजड जाती है और कितनी नव-प्रसूताओं की मांग का सिन्दूर नकली दवाईयों के चलते युवावस्था में ही धुल जाता है, कितने पिताओं को कन्धा देने वाले तक नहीं बचते, इस बात का अन्दाजा भी नहीं लगाया जा सकता। इस सबके उपरान्त भी इन भ्रष्ट एवं अत्याचारियों का एकजुट होकर सामना करने के बजाय हम चुप्पी साधकर, अपने कानूनी हकों तक के लिये भी गिडगिडाते रहते हैं।</span></p>
<p style="text-align: justify;"><span style="font-size: 13.3333px;">अधिकतर लोग तो इस डर से ही चुप्पी साध लेते हैं कि यदि वे किसी के खिलाफ बोलेंगे तो उन्हें भी फंसाया जा सकता है। इसलिये वे अपने घरों में दुबके रहते हैं! ऐसे लोगों से मेरा सीधा-सीधा सवाल है कि यदि ऐसा ही चलता रहा तो आने वाले समय में हमारे आसपास की गंदगी को साफ करने वाले यह कहकर सफाई करना बन्द कर देंगे, कि गन्दगी साफ करेंगे तो गन्दगी से बीमारी होने का खतरा है? खानों में होने वाली दुर्घटनाओं से भयभीत होकर खनन मजदूर यह कहकर कि खान गिरने से जीवन को खतरा है, खान में काम करना बंद कर दे, तो क्या हमें खनिज उपलब्ध हो पायेंगे? इलाज करते समय मरीजों से रोगाणुओं से ग्रसित होने के भय से डॉक्टर रोगियों का उपचार करना बन्द कर दें, तो बीमारों को कैसे बचाया जा सकेगा? आतंकियों, नक्सलियों एवं गुण्डों के हाथों आये दिन पुलिसवालों के मारे जाने के कारण यदि पुलिस यह सोचकर इनके खिलाफ कार्यवाही करना बन्द कर दें कि उनको और उनके परिवार को नुकसान पहुँचा सकता हैं, तो क्या सामाज की कानून व्यवस्था नियन्त्रित रह सकती है? पुलिस के बिना क्या हमारी जानमाल की सुरक्षा सम्भव है? आतंकियों तथा दुश्मनों के हाथों मारे जाने वाले फौजियों के शवों को देखकर, फौजी सरहद पर पहरा देना बंद कर दें, तो क्या हम अपने घरों में चैन की नींद सो पाएंगे?</span></p>
<p style="text-align: justify;"><span style="font-size: 13.3333px;">यदि नाइंसाफी के खिलाफ हमने अब भी अपनी चुप्पी नहीं तोडी और यदि आगे भी ऐसा ही चलता रहा तो आज नहीं तो कल जो कुछ भी शेष बचा है, वह सब कुछ नष्ट-भ्रष्ट हो जाने वाला है। आज आम व्यक्ति को लगता है कि उसकी रक्षा करने वाला कोई भी नहीं है! क्या इसका कारण ये नहीं है, कि आम व्यक्ति स्वयं ही अपने आप पर विश्वास खोता जा रहा है? ऐसे हालात में दो ही रास्ते हैं-या तो हम अत्याचारियों के जुल्म और मनमानी को सहते रहें या समाज के सभी अच्छे, सच्चे, देशभक्त, ईमानदार और न्यायप्रिय-सरकारी कर्मचारी, अफसर तथा आम लोग एकजुट होकर एक-दूसरे की ढाल बन जायें। क्योंकि लोकतन्त्र में समर्पित, संगठित एवं सच्चे लोगों की एकजुट ताकत के आगे झुकना सत्ता की मजबूरी है और सत्ता वो धुरी है, जिसके आगे सभी प्रशासनिक निकाय और बडे-बडे अफसर आदेश की मुद्रा में मौन खडे रहते हैं।</span></p>
<p style="text-align: justify;">
]]></content:encoded>
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		<title>सड़ता अनाज सड़ता तंत्र</title>
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		<pubDate>Thu, 04 Nov 2010 12:26:03 +0000</pubDate>
		<dc:creator>शिरीष खरे</dc:creator>
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		<description><![CDATA[सरकार चंद पूंजीपतियों के लिए रियायतों का अंबार लगा रही है और करोड़ों लोगों की खाद्य सुरक्षा के लिए उसके पास न अनाज है और न पैसे का कोई बंदोबस्त. इंडिया शाइनिंग के इस दौर में सरकार को 50,000 करोड़ ]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><span style="font-size: 13.2px;"><a rel="attachment wp-att-10049" href="http://www.janokti.com/government-failure-%e0%a4%85%e0%a4%82%e0%a4%a7%e0%a5%87%e0%a4%b0-%e0%a4%a8%e0%a4%97%e0%a4%b0%e0%a5%80/%e0%a4%b8%e0%a4%a1%e0%a4%bc%e0%a4%a4%e0%a4%be-%e0%a4%85%e0%a4%a8%e0%a4%be%e0%a4%9c-%e0%a4%b8%e0%a4%a1%e0%a4%bc%e0%a4%a4%e0%a4%be-%e0%a4%a4%e0%a4%82%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0/attachment/spoil-food-grains/"><img class="alignright size-medium wp-image-10049" title="Spoil Food Grains" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/Spoil-Food-Grains-300x173.jpg" alt="" width="300" height="173" /></a>सरकार चंद पूंजीपतियों के लिए रियायतों का अंबार लगा रही है और करोड़ों लोगों की खाद्य सुरक्षा के लिए उसके पास न अनाज है और न पैसे का कोई बंदोबस्त. इंडिया शाइनिंग के इस दौर में सरकार को 50,000 करोड़ से अधिक का अनाज सड़ा देना मंजूर है. नहीं मंजूर है तो 8 करोड़ से ज्यादा लोगों की भूख को मिटाने के वास्ते उस सड़ते हुए अनाज में से गरीबों के लिए थोड़ा-सा हिस्सा बांटना. अकाल और कुपोषण के बीच पिसते किसी देश की जनता के लिए क्या उसकी सरकार इस तरह से भी अमानवीय हो सकती है ?</span></p>
<p style="text-align: justify;"><span style="font-size: 13.2px;">एक तरफ सरकार पूंजीपतियों के लिए 5 लाख करोड़ रूपए की रियायत देती है और दूसरी तरफ भूखे लोगों के लिए कोई इंतजाम नहीं करती है. उलटा भूखे देश की भूख पर परदे डालने के लिए उदाहरण के लिए मुंबई में 19 रूपए से ज्यादा रूपए कमाने वाले को गरीब नहीं मानती है. हकीकत यह है कि आजादी के 63 सालों में प्रति व्यक्ति अनाज की उपलब्धता बढ़नी चाहिए थी जो लगातार घटती ही जाती है. आजादी के समय से अबतक प्रति व्यक्ति अनाज की उपलब्धता 440 ग्राम से 436 ग्राम पर आ गई है और इसी तरह दाल की उपलब्धता भी आधी यानी 70 ग्राम से 35 ग्राम ही रह गई है.</span></p>
<p style="text-align: justify;"><span style="font-size: 13.2px;">दूसरी तरफ असुरक्षित परिस्थितियों में रखे अनाज के त्वरित वितरण से लाखों लोगों को राहत पहुंचाई जा सकती है. जबकि मौजूदा स्थिति यह है कि सर्वोच्च न्यायालय के 35 किलो अनाज वितरित करने के आदेश को भी एक तरफ रखते हुए फिलहाल देश के कई इलाकों में अधिकतम 20 से 25 किलो अनाज ही वितरित किया जा रहा है. सर्वोच्च न्यायालय के एक और आदेश की अनदेखी करते हुए कई इलाकों में जनवितरण प्रणाली की दुकानें महीने-महीने भर नहीं खुलतीं हैं. सर्वोच्च न्यायालय द्वारा हर राज्य में एक बड़े गोदाम और जिले में पृथक गोदाम बनाने के लिए भी कहा जा चुका है. मगर खाद्य भंडारणों की क्षमता को बढ़ाने और गोदामों की मरम्मत को लेकर सरकार कभी गंभीर नजर नहीं आई है. लिहाजा देश के कई इलाकों में अनाज के भंडारण की समस्या उपजती जा रही है.</span></p>
<p style="text-align: justify;"><span style="font-size: 13.2px;">जिस देश में सालाना 6 करोड़ टन गेंहूं और चावल की खरीददारी होती है और जिसकी सयुंक्त भंडारण क्षमता 4 करोड़ 80 लाख टन है, उस देश में 6 साल के भीतर गोदामों में 10 लाख 37 हजार 738 टन अनाज सड़ चुका है. 190 लाख टन अनाज प्लास्टिक सीटों के नीचे रामभरोसे पड़ा हुआ है. हर साल गोदामों की सफाई पर करोड़ों रूपए खर्च करने पर भी 2 लाख टन अनाज सड़ जाता है और जब देश का सर्वोच्च न्यायालय अनाज के एक दाने के बर्बाद होने को अपराध मानते हुए अनाज के सड़ने से पहले उसे निशुल्क बांटने का आदेश देता है तो हमारे केंद्र के कृषि मंत्री से लेकर प्रधानमंत्री तक 6,000 टन से भी ज्यादा अनाज के खराब होने के अपराध को नजरअंदाज बनाते हुए उल्टा सर्वोच्च न्यायालय के आदेश की गलत व्याख्या करते हैं और उसकी मर्यादाओं पर ही सवाल खड़े करते हैं.</span></p>
<p style="text-align: justify;"><span style="font-size: 13.2px;">1947 के बाद से अब तक अगर हम किसानों की अथक मेहनत से उपजे अनाज का सही इस्तेमाल नहीं कर पा रहे हैं और हर साल भारतीय खाद्य निगम की गोदामों में रखीं लाखों अनाज की बोरियां खुले में रखे जाने या बाढ़ आ जाने के चलते खराब हो रही हैं तो क्या सरकार को नहीं लगता कि भोजन से जुड़ी नीति, प्रबंधन और वितरण की व्यवस्थाओं पर नए सिरे से सोचे जाने की जरुरत है ?</span></p>
<p style="text-align: justify;"><span style="font-size: 13.2px;">देखा जाए तो खाद्य सुरक्षा दूसरा सवाल है. पहला सवाल पूंजीपतियों के लिए देश की आम जनता से उनके संसाधनों को छीने जाने से जुड़ा है. अगर संसाधनों को लगातार यूं ही छीना जाता रहा तो खाद्य के असुरक्षा की स्थितियां सुधरने की बजाय तेजी से बिगड़ती ही जाएंगी. जहां आदिवासियों को उनके जल, जंगल, जमीन से अलग करके उन्हें भूख और बेकारी की ओर ले जाया जा रहा है, वही सेज के नाम पर खुली लूट की जैसे छूट ही दे दी जा रही है. कहने का मतलब है नीतिगत और कानूनी तौर पर सभी लोगों को आजीविका की सुरक्षा को दिये बगैर भोजन के अधिकार की बात बेमतलब ही रहेगी. भोजन केअधिकार से जुड़े कार्यकर्ता मांग कर रहे हैं कि 5 सदस्यों के एक परिवार के लिए 50 किलो अनाज, 5.25 किलो दाल और 2.8 खाद्य तेल दिया जाए. बीपीएल और एपीएल को पात्रता का आधार नहीं बनाया जाए. सार्वजनिक वितरण की व्यवस्था के साथ-साथ सरकारी खरीदी और वितरण की विकेन्द्रीकृत व्यवस्था हो. व्यक्ति/एकल परिवार को इकाई माना जाए और राशन कार्ड महिलाओं के नाम पर हो. जल स्त्रोत पर पहला अधिकार खेती का हो. इसके साथ ही यह भी नहीं भुलाया जा सकता कि आजादी की बाद से अबतक विकास की विभिन्न परियोजनाओं और कारणों के चलते 6 करोड़ बच्चों का भी पलायन हुआ है. मगर बच्चों के मुद्दे अनदेखे ही रहे हैं और उनके लिए खाद्य सुरक्षा की गारंटी दिये बगैर विकास के तमाम दावे बेबुनियाद ही रहेंगे. इसे भी असंवेदनशीलता का चरम ही कहेंगे कि एक सेकेण्ड के भीतर 5 साल के नीचे का एक बच्चा कुपोषण की चपेट में आ जाने के बावजूद कोई नीतिगत फैसला लेने की बात तो दूर ठोस कार्यवाही की रूपरेखा तक नहीं बन पा रही है. अगर कुपोषण और भूख के चलते देश का आने वाला कल कहे जाने वाले 47 प्रतिशत बच्चों का अपनी उम्र के अनुपात में लंबाई और वजन नहीं बढ़ पाता है तो इसे किस विकास का सूचक समझा जाए ?</span></p>
<p style="text-align: justify;"><span style="font-size: 13.2px;">अंतत: अनाज का साद जाना एक अमानवीय और आपराधिक प्रवृति है और देश में अनाज भंडारण की उचित व्यवस्था और बेहतर विकल्प तलाशने लिए एक ऐसे संवेदनशील और पारदर्शी तंत्र विकसित करने की भी जरुरत है जो भूख से जुड़े विभिन्न पहलूओं पर कारगार ढ़ंग से शिनाख्त और कार्यवाही करने में सक्षम हो. अन्यथा हर साल लाखों टन अनाज खराब होने, अनाज की कीमत आसमान छूने, खेती के संकट, सूखे की मार और गरीबों के पेट खाली होने से जुड़े समाचारों पर परदे डालने के लिए हमारे पास आर्थिक शक्तियों का दिखावा करने वाली राष्ट्रमंडल खेलों की सुर्ख़ियों के अलावा कुछ नहीं होगा ?</span></p>
<p style="text-align: justify;"><span style="font-size: 13.2px;"><strong>- &#8211; - -</strong></span><span style="font-size: 13.2px;"><strong>क्राई-इंडिया के संचार विभाग से</strong></span></p>
]]></content:encoded>
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		<title>उच्च न्यायालय का फैसला और विवाहित बेटियां</title>
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		<pubDate>Thu, 04 Nov 2010 12:12:39 +0000</pubDate>
		<dc:creator>प्रीति श्रीवास्तव</dc:creator>
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		<description><![CDATA[- प्रीति वैसे तो ये पढ़ कर सचमुच बहुत अच्छा लगा की अब विवाहित बेटियां भी अपने पिता की ज़गह अपने घर को चला सकती है और अपने कर्तव्यों का अधिक अच्छे तरीके से निर्वाह कर सकती हैं..या फिर यूँ ]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><strong>- प्रीति</strong></p>
<p style="text-align: justify;"><a rel="attachment wp-att-10045" href="http://www.janokti.com/discussion-suggestions-%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%9a%e0%a4%be%e0%a4%b0-%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%ae%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%b6/%e0%a4%89%e0%a4%9a%e0%a5%8d%e0%a4%9a-%e0%a4%a8%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a4%be%e0%a4%af%e0%a4%b2%e0%a4%af-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%ab%e0%a5%88%e0%a4%b8%e0%a4%b2%e0%a4%be-%e0%a4%94%e0%a4%b0-%e0%a4%b5/attachment/girls-right-for-mother-father-2/"><img class="alignleft size-full wp-image-10045" title="girls right for mother father" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/girls-right-for-mother-father1.jpg" alt="" width="300" height="245" /></a>वैसे तो ये पढ़ कर सचमुच बहुत अच्छा लगा की अब विवाहित बेटियां  भी अपने पिता की ज़गह अपने घर को चला सकती है और अपने कर्तव्यों का अधिक अच्छे तरीके से निर्वाह कर सकती हैं..या फिर यूँ कहा जाए तो ज्यादा नहीं होअगा की शादी के बाद बेटियों के मन में मातापिता के प्रति प्यार और अपने मायके के लिए करने की इच्छा और बढ़ जाती है.ऐसे में बम्बई उच्च न्यायलय का ये फैसला सच में स्वागत योग्य लगा  की ना सिर्फ अविवाहित बल्कि विवाहित बेटियां भी अनुकम्पा के आधार पर अपने पिता की जगह नौकरी पाने की अधिकारी हैं.</p>
<p style="text-align: justify;"><span style="font-size: 13.2px;">पर क्या प्यार और अधिकार सिर्फ यही तक सिमित हो जाता है की विवाहित बेटियां सिर्फ लेने की अधिकारी है?उसे पिता की संपत्ति में हिस्सा भी मिल गया और अब एक नया अधिकार की पिता की मृत्यु के बाद उसकी नौकरी भी.क्या इसके अलावा भी बहुत कुछ नहीं है जिसके लिए अभी भी मन में एक चुभन सी हो रही है की ये अधिकार भी उतना ही जरूरी है.</span></p>
<p style="text-align: justify;"><span style="font-size: 13.2px;">मैं भी अपने पिता की बहुत प्यारी बेटी रही हूँ..स्कूल से लेकर कॉलेज तक और उसके बाद शादी के बाद तक भी मुझे अपने पिताजी से जिद कर के थोरा रूठ  कर के पैसे,गिफ्ट्स या फिर कुछ ऐसी चीज़े तक भी जिसे देने में पिताजी थोड़ी तकलीफ  महसूस कर रहे हो लेने में बहुत अच्छा लगता था.इसमें मेरा अधिकार और उनका प्यार दीखता था.</span></p>
<p style="text-align: justify;">समय के साथ सबकुछ बदला.जिम्मेदारियां भी और पैसे देने वाले हाँथ भी.पिताजी को नौकरी से अवकाश मिल गया.पेंसन मिलती नहीं थी.जो भी रहा मकान  का किराया.एक दिन ऐसा लगा की अब समय है जिस तरह से पिताजी से जिद करके इतना कुछ लेती रही हूँ उन्हें  भी कुछ ऐसा दूँ जिसमे उन्हें भी खुसी हो और मैं भी कह सकू की मुझे भी आपकी चिंता है.बस जिस दिन ये निर्णय लिया उसी दिन से सारे भरम टूटने शुरू हो गए की मैं अपने भाई की तरह या यूँ कह लीजिये की उससे ज्यादा अपने पिताजी का ख्याल रख सकती हूँ.जिस दिन बैंक में लोन के लिए apply किया बस उसी दिन समझ में आ गया की लेना कितना आसान है और देना कितना मुश्किल&#8230;</p>
<p style="text-align: justify;"><span style="font-size: 13.2px;">बैंक के नियमो में ही पता चला की विवाहित बेटियां अपने पिता की जगह या यूँ कहिये की पिता के लिए लोन नहीं ले सकती.काफी दिनों तक इस सिलसिले के चलने और फिर हर जगह से यही जबाब सुना  विवाहित बेटियां co-applicant  नहीं हो सकती पिता के लिए..मतलब सीधा सा है अगर मैं चाहूँ भी तो अपने पिता के लिए बैंक लोन से कुछ भी (जो मैं उनके नाम पर खरीदना चाहती हूँ) नहीं ले सकती मुझे और मेरे पिताजी को कोई लोन नहीं मिल सकता एक साथ क्यूंकि मैं विवाहित हूँ.इसलिए बैंक ये मानती है की विवाहित बेटियां घर की सदस्य नहीं होती.उस पिता के लिए जिसकी संपत्ति में मेरा अधिकार है और जिसकी मृत्यु के बाद मैं उसकी नौकरी की अधिकारी भी हूँ क्यूंकि कोर्ट ये मानती है की बेटियां भी घर चला सकती है बेटों की तरह या उससे भी अच्छे से?</span></p>
<p style="text-align: justify;">जब हम थक चुके थे और हार कर बैठ चुके थे की अब मेरे प्रयास से ये लोन नहीं मिलेगा अब अपने भाई को इसमें शामिल करना ही होगा.मेरे पिताजी ने  एक सवाल किया की आज अगर मेरा एक बेटा नहीं होता तो?और इस सवाल ने अब तक बनाये सभी खुसफहमी की दीवार  को  गिरा दिया की मैं बेटों से कैसी भी कम नहीं अगर बेटा नहीं  तो क्या हुआ मैं तो हूँ ना अक्सर बेटा पैदा करने के चक्कर में परेशान उन सभी लोगो को देखकर बहुत हसी आती थी जिन्होंने या तो ३-३ ४-४ बेटियां हो गई है और फिर भी बेटे के लिए अभी भी प्रयास कररहे हैं या फिर गर्भ में ही उन बेटियों की हत्या कर रहे हैं..सरकार भी कहती है की बेटा या बेटी सब एक सामान..बेटियां वो सभी काम कर सकती है जो एक बेटा कर सकता है ..इंजीनियर बन   सकती हैं डॉ बन सकती</p>
<p style="text-align: justify;">हैं और अभी बहुत कुछ बन सकती है जिसपर माँ बाप को फक्र हो सकता है..पर ये सब तो तभी तक ना जब तक आपने बेटी की शादी <span style="font-size: 13.2px;">नहीं की है .एक बार आपने बेटी की शादी कर दी तो फिर उसके बाद वो आपके लिए क्या कर सकती है ..हाँ आपकी संपत्ति में उसका पूरा हिस्सा है और आपके मरने के बाद शायद आपकी नौकरी पर भी..लेकिन अगर आपके जीते जी वो आपके लिए कुछ करना चाहे तो?</span></p>
<p style="text-align: justify;"><span style="font-size: 13.2px;">क्या विवाहित बेटियों को ये हक नहीं मिलने  चाहिए की वो भी बेटो की तरह ये कह सके की हाँ हम भी अपने माँ बाप की ज़िम्मेदारी उठाने के लिए तैयार हैं.हमें यहाँ भी पूरी पूरी बराबरी का हक चाहिए.हम अपने माबाप के लिए हर तरह के ऋण लेने और चुकाने के लिए उतने ही सक्षम  हैं जितना की बेटे..ये दुःख उस खुशी से कहीं ज्यादा बड़ी  है जो अभी अभी बम्बई उच्च न्यायलय के फैसले से मिले है..अगर मैं उनके जीते जी उनके काम ना आ सकी तो उनके मरने के बाद उनके(?) घर की ज़िम्मेदारी उठा सकुंगी इसकी कितनी संभावना है.</span></p>
]]></content:encoded>
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		<title>लोकत्रंत्र के आगे बौद्धिक लोकतंत्र -27</title>
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		<pubDate>Mon, 18 Oct 2010 23:18:05 +0000</pubDate>
		<dc:creator>देवसूफी राम बंसल</dc:creator>
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		<description><![CDATA[भारत की वर्तमान स्थिति ऐसी है जिसे राजनेताओं द्वारा जनता की लूट कहा जा सकता है, इसी लूट को भारत की वर्तमान &#8216;राजनीति&#8216; कहा जा सकता है. ऐसी स्थिति में बौद्धिक जनतंत्र की स्थापना हेतु इस राजनीति से बौद्धिक नैतिकता ]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><a rel="attachment wp-att-9156" href="http://www.janokti.com/sansad-political-news-%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%82%e0%a4%b8%e0%a4%a6-%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%97/%e0%a4%b2%e0%a5%8b%e0%a4%95%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%82%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%86%e0%a4%97%e0%a5%87-%e0%a4%ac%e0%a5%8c%e0%a4%a6%e0%a5%8d%e0%a4%a7%e0%a4%bf/attachment/paliament-house-2/"><img class="alignright size-medium wp-image-9156" title="paliament house" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/paliament-house-300x183.png" alt="" width="300" height="183" /></a>भारत की वर्तमान स्थिति ऐसी है जिसे राजनेताओं द्वारा जनता की लूट कहा जा सकता है, इसी लूट को भारत की वर्तमान &#8216;<strong><a href="http://www.janokti.com/sansad-political-news-%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%82%E0%A4%B8%E0%A4%A6-%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%97/%E0%A4%B2%E0%A5%8B%E0%A4%95%E0%A4%A4%E0%A4%82%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0-%E0%A4%B8%E0%A5%87-%E0%A4%86%E0%A4%97%E0%A5%87-%E0%A4%AC%E0%A5%8C%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%A7%E0%A4%BF%E0%A4%95-%E0%A4%B2-27/">राजनीति</a></strong>&#8216; कहा जा सकता है. ऐसी स्थिति में <a href="http://www.janokti.com/?s=%E0%A4%B2%E0%A5%8B%E0%A4%95%E0%A4%A4%E0%A4%82%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0+%E0%A4%B8%E0%A5%87+%E0%A4%86%E0%A4%97%E0%A5%87+%E0%A4%AC%E0%A5%8C%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%A7%E0%A4%BF%E0%A4%95+%E0%A4%B2%E0%A5%8B%E0%A4%95%E0%A4%A4%E0%A4%82%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0&amp;x=-180&amp;y=6">बौद्धिक जनतंत्र </a>की स्थापना हेतु इस राजनीति से बौद्धिक नैतिकता को कड़ा संघर्ष करना होगा. वस्तुतः यह संघर्ष छुट-पुट अवस्था में चारों ओर दिखाई भी देने लगा है, आवश्यकता बस इन संघर्षों के समन्वय की है, जिसमें अनेक कठिनाइयाँ हैं. इनके निराकरण के लिए निम्नांकित विचारणीय बिंदु हैं -</p>
<p style="text-align: justify;"><strong><a href="http://www.janokti.com/?s=%E0%A4%B2%E0%A5%8B%E0%A4%95%E0%A4%A4%E0%A4%82%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0+%E0%A4%B8%E0%A5%87+%E0%A4%86%E0%A4%97%E0%A5%87+%E0%A4%AC%E0%A5%8C%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%A7%E0%A4%BF%E0%A4%95+%E0%A4%B2%E0%A5%8B%E0%A4%95%E0%A4%A4%E0%A4%82%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0&amp;x=-180&amp;y=6">उद्येश्य और प्रक्रिया</a></strong></p>
<p style="text-align: justify;">भारत को वस्तुतः दूसरे स्वतन्त्रता संग्राम की आवश्यकता है ताकि देश की व्यवस्थाओं को सुधार जा सके. इस उद्येश्य पर सभी सहमत हैं किन्तु इसके लिए क्या प्रक्रिया अपनाई जाये इस पर कुछ मतभेद हो सकते हैं. इस बारे में मेरा सुविचारित मत यह है कि भारत की वर्तमान राजनैतिक स्थिति इतनी दूषित हो चुकी है कि इसमें छुट-पुट परिवर्तनों से कोई अपेक्षित लाभ प्राप्त नहीं हो सकता, इसलिए हमें आमूल-चूल परिवर्तनों के लिए संघर्ष करना होगा. तथापि मेरी यह जिद न होकर मात्र आग्रह है. इस पर गहन विचार विमर्श की आवश्यकता है.</p>
<p style="text-align: justify;"><span style="font-size: 13.3333px;"><strong>अपना संगठन</strong></span></p>
<p style="text-align: justify;">भारत में किसी प्रकार की पुनर्व्यवस्था लागू करने के लिए अथवा इस हेतु संघर्ष के लिए बौद्धिक वर्ग के एक समन्वित संगठन की आवश्यकता है, इस पर कोई मतभेद नहीं है. इसी पवित्र उद्येश्य हेतु अनेक <strong><a href="http://www.janokti.com/?s=%E0%A4%B2%E0%A5%8B%E0%A4%95%E0%A4%A4%E0%A4%82%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0+%E0%A4%B8%E0%A5%87+%E0%A4%86%E0%A4%97%E0%A5%87+%E0%A4%AC%E0%A5%8C%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%A7%E0%A4%BF%E0%A4%95+%E0%A4%B2%E0%A5%8B%E0%A4%95%E0%A4%A4%E0%A4%82%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0&amp;x=-180&amp;y=6">बुद्धिवादियों ने संगठनों के निर्माण </a></strong>भी किये हुए हैं. किन्तु दुःख इस बात का है कि ऐसे अधिकाँश संगठन वर्तमान राजनैतिक दलों की भांति व्यक्तिगत जमींदारियों की तरह बनाए गए और संचालित किये जा रहे हैं, जिनमें अन्य व्यक्तियों को अपनत्व का बोध नहीं मिल पाता. होता यह है कि कुछ विचारक मिलते हैं और एक संगठन का नामकरण कर स्वयं के मध्य उसके पदों का वितरण कर लेते हैं. इसके बाद अन्य व्यक्तियों को अनुयायियों के रूप में भर्ती होने के लिए आमंत्रित किये जाते हैं. इस प्रक्रिया से संगठन को न तो जन-समर्थन प्राप्त हो पाता है और न ही उसका आगे विकास हो पाता है.</p>
<p style="text-align: justify;"><span style="font-size: 13.3333px;">वस्तुतः होना यह चाहिए कि <a href="http://www.janokti.com/?s=%E0%A4%B2%E0%A5%8B%E0%A4%95%E0%A4%A4%E0%A4%82%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0+%E0%A4%B8%E0%A5%87+%E0%A4%86%E0%A4%97%E0%A5%87+%E0%A4%AC%E0%A5%8C%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%A7%E0%A4%BF%E0%A4%95+%E0%A4%B2%E0%A5%8B%E0%A4%95%E0%A4%A4%E0%A4%82%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0&amp;x=-180&amp;y=6">आरंभिक विचारक संगठन </a>की रूपरेखा तो बनाएं किन्तु उसके पदों का वितरण न करें और मुक्त भाव से उसके सदस्यों की संख्या बढ़ाएं, जिनकी संख्या पर्याप्त होने पर ही उनमें से जनतांत्रिक प्रक्रिया द्वारा सीमित अवधि के लिए संगठन के पदाधिकारी चुनें. इस प्रकार के संगटन पर किसी व्यक्ति अथवा समूह का एकाधिकार नहीं होगा और सभी लोगों को उसमें रूचि बनी रहेगी.</span></p>
<p style="text-align: justify;"><span style="font-size: 13.3333px;"><strong><a href="http://www.janokti.com/?s=%E0%A4%B2%E0%A5%8B%E0%A4%95%E0%A4%A4%E0%A4%82%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0+%E0%A4%B8%E0%A5%87+%E0%A4%86%E0%A4%97%E0%A5%87+%E0%A4%AC%E0%A5%8C%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%A7%E0%A4%BF%E0%A4%95+%E0%A4%B2%E0%A5%8B%E0%A4%95%E0%A4%A4%E0%A4%82%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0&amp;x=-180&amp;y=6">संविधान की पुनर्रचना</a></strong></span></p>
<p style="text-align: justify;"><span style="font-size: 13.3333px;">प्रायः प्रत्येक <a href="http://www.janokti.com/?s=%E0%A4%B2%E0%A5%8B%E0%A4%95%E0%A4%A4%E0%A4%82%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0+%E0%A4%B8%E0%A5%87+%E0%A4%86%E0%A4%97%E0%A5%87+%E0%A4%AC%E0%A5%8C%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%A7%E0%A4%BF%E0%A4%95+%E0%A4%B2%E0%A5%8B%E0%A4%95%E0%A4%A4%E0%A4%82%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0&amp;x=-180&amp;y=6">भारतीय बुद्धिवादी देश</a> की वर्तमान राजनैतिक स्थिति पर चिंतित है, और सभी परिवर्तन चाहते हैं. किन्तु यह परिवर्तन कैसे हो इस पर गहन मतभेद हैं. इस दृष्टि से बुद्धिवादियों को अनेक वर्गों में रखा जा सकता है. एक वर्ग ऐसा है जो वर्तमान संविधान को सही मानता है किन्तु इसके कार्यान्वयन में दोष देखता है. दूसरा वर्ग वह है जो संविधान को ही दोषी मानता है जिसके कारण ही उसका सही कार्यान्वयन नहीं हो सका है. इस के समर्थन में तर्क यह है कि जो अपेक्षित परिणाम न दे सके, उसमें दोष है अतः उसे बदला जाना चाहिए. संविधान के दोषपूर्ण होने का एक संकेत यह भी है कि इसके विभिन्न प्रावधानों में बार बार संशोधन करने पड़े हैं. ऐसे अनेक संशोधन भी राजनैतिक विकृति के परिणाम हैं जिनसे कुछ लाभ होने के स्थान पर हानि ही हो रही है. उदाहरण के लिए एक नौसिखिया प्रधान मंत्री ने मताधिकार की न्यूनतम आयु २१ वर्ष से घटाकर १८ वर्ष कर दी, जबकि सभी मानते हैं कि १८ वर्ष का बालक राष्ट्रीय दायित्व वहन करने योग्य नहीं होता. यहाँ तक कि उसे अपनी वैवाहिक दायित्व के लिए भी अयोग्य मानते हुए उसके विवाह की न्यूनतम आयु २१ वर्ष रखी गयी है. राष्ट्रीय दायित्व के निर्वाह हेतु व्यक्ति में वैचारिक परिपक्वता की अनिवार्यता होती है जो २५ वर्ष आयु से पूर्व अपेक्षित नहीं है. इसी प्रकार देश में प्रचलित आरक्षण व्यवस्था पर गहन मतभेद हैं और इससे देश को हानि ही हो रही है. इस प्रकार हम देखते हैं कि भारत का वर्तमान संविधान में इस प्रकार की अनेक विसंगतियां हैं.</span></p>
<p style="text-align: justify;"><strong><a href="http://www.janokti.com/?s=%E0%A4%B2%E0%A5%8B%E0%A4%95%E0%A4%A4%E0%A4%82%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0+%E0%A4%B8%E0%A5%87+%E0%A4%86%E0%A4%97%E0%A5%87+%E0%A4%AC%E0%A5%8C%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%A7%E0%A4%BF%E0%A4%95+%E0%A4%B2%E0%A5%8B%E0%A4%95%E0%A4%A4%E0%A4%82%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0&amp;x=-180&amp;y=6">संवैधानिक विसंगतियों </a></strong>का एक विशेष कारण यह है कि <a href="http://www.janokti.com/?s=%E0%A4%B2%E0%A5%8B%E0%A4%95%E0%A4%A4%E0%A4%82%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0+%E0%A4%B8%E0%A5%87+%E0%A4%86%E0%A4%97%E0%A5%87+%E0%A4%AC%E0%A5%8C%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%A7%E0%A4%BF%E0%A4%95+%E0%A4%B2%E0%A5%8B%E0%A4%95%E0%A4%A4%E0%A4%82%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0&amp;x=-180&amp;y=6">स्वतन्त्रता संग्राम </a>के समय यह कभी विचार नहीं किया गया कि हम स्वतन्त्रता प्राप्ति के बाद देश की व्यवस्था कैसे करेंगे. इस कारण से स्वतन्त्रता प्राप्ति पर कुछ इधर-उधर से और अधिकांशतः गुलाम देशों के लिए प्रचलित ब्रिटिश संविधान की नक़ल कर डाली गयी जिसमें बार-बार राजनैतिक स्वार्थों के लिए संशोधन किये गए. अतः भारत की कुशल व्यवस्था के लिए एक नवीन संविधान की आवश्यकता है. इस नए संविधान के रूप रेखा के रूप में इस संलेख में बौद्धिक जनतंत्र हेतु सुझाये गए विविध प्रावधानों पर विचार किया जा सकता है</p>
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		<title>हिंदी सिनेमा का सफ़र -4</title>
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		<pubDate>Sat, 16 Oct 2010 03:49:43 +0000</pubDate>
		<dc:creator>राजेश त्रिपाठी</dc:creator>
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		<description><![CDATA[हिंदी सिनेमा के इतिहास में अब तक आपने पढ़ा (पिछली पोस्ट पढ़ें ) सामाजिक-पारिवारिक समस्याओं पर बनीं फिल्में 1930-1940 तक के बड़े बैनर थे न्यू थिएटर्स, प्रभात, बांबे टॉकीज, मिनर्वा मूवीटोन’, फिल्मिस्तान, वाडिया ब्रादर्स तथा राजकमल। इन सबने सामाजिक समस्याओं ]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><a href="http://www.janokti.com/hindi-news-media-%E0%A4%9A%E0%A5%8C%E0%A4%A5%E0%A4%BE-%E0%A4%96%E0%A4%82%E0%A4%AD%E0%A4%BE-cinema-media-blog-fourth-pilar/cinema-film-tv-%E0%A4%B8%E0%A4%BF%E0%A4%A8%E0%A5%87%E0%A4%AE%E0%A4%BE-%E0%A4%AB%E0%A4%BF%E0%A4%B2%E0%A5%8D%E0%A4%AE%E0%A4%9F%E0%A5%80%E0%A4%B5%E0%A5%80/%E0%A4%B9%E0%A4%BF%E0%A4%82%E0%A4%A6%E0%A5%80-%E0%A4%B8%E0%A4%BF%E0%A4%A8%E0%A5%87%E0%A4%AE%E0%A4%BE-%E0%A4%95%E0%A4%BE-%E0%A4%B8%E0%A4%AB%E0%A4%BC%E0%A4%B0-%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%AE/"><strong>हिंदी सिनेमा के इतिहास</strong></a><a href="http://www.janokti.com/hindi-news-media-%E0%A4%9A%E0%A5%8C%E0%A4%A5%E0%A4%BE-%E0%A4%96%E0%A4%82%E0%A4%AD%E0%A4%BE-cinema-media-blog-fourth-pilar/cinema-film-tv-%E0%A4%B8%E0%A4%BF%E0%A4%A8%E0%A5%87%E0%A4%AE%E0%A4%BE-%E0%A4%AB%E0%A4%BF%E0%A4%B2%E0%A5%8D%E0%A4%AE%E0%A4%9F%E0%A5%80%E0%A4%B5%E0%A5%80/%E0%A4%B9%E0%A4%BF%E0%A4%82%E0%A4%A6%E0%A5%80-%E0%A4%B8%E0%A4%BF%E0%A4%A8%E0%A5%87%E0%A4%AE%E0%A4%BE-%E0%A4%95%E0%A4%BE-%E0%A4%B8%E0%A4%AB%E0%A4%BC%E0%A4%B0-%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%AE/"><strong> </strong></a><strong>में अब तक आपने पढ़ा <a href="http://www.janokti.com/hindi-news-media-%e0%a4%9a%e0%a5%8c%e0%a4%a5%e0%a4%be-%e0%a4%96%e0%a4%82%e0%a4%ad%e0%a4%be-cinema-media-blog-fourth-pilar/cinema-film-tv-%e0%a4%b8%e0%a4%bf%e0%a4%a8%e0%a5%87%e0%a4%ae%e0%a4%be-%e0%a4%ab%e0%a4%bf%e0%a4%b2%e0%a5%8d%e0%a4%ae%e0%a4%9f%e0%a5%80%e0%a4%b5%e0%a5%80/%e0%a4%b9%e0%a4%bf%e0%a4%82%e0%a4%a6%e0%a5%80-%e0%a4%b8%e0%a4%bf%e0%a4%a8%e0%a5%87%e0%a4%ae%e0%a4%be-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%b8%e0%a4%ab%e0%a4%bc%e0%a4%b0-3/">(पिछली पोस्ट पढ़ें </a>)</strong></p>
<p style="text-align: justify;"><strong>सामाजिक-पारिवारिक समस्याओं पर बनीं फिल्में</strong></p>
<p style="text-align: justify;"><a rel="attachment wp-att-8013" href="http://www.janokti.com/?attachment_id=8013"><img class="alignright size-full wp-image-8013" title="Devdas - 1955" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/Devdas-1955.jpg" alt="" width="252" height="250" /></a>1930-1940 तक के बड़े बैनर थे <strong>न्यू थिएटर्स, प्रभात, बांबे टॉकीज, मिनर्वा मूवीटोन’, फिल्मिस्तान, वाडिया ब्रादर्स तथा राजकम</strong>ल। इन सबने <strong>सामाजिक समस्याओं</strong> से जुड़ी कई फिल्में बनायीं। उन दिनों औरतों को घर तोड़नेवाली के रूप में भी चित्रित किया जाता था। ‘देवदास’, बी.आर. इशारा की ‘चेतना’, बी.आर. चोपड़ा की ‘साधना’, गुरुदत्त की ‘प्यासा’ इसी दिशा में एक प्रयास था। ‘ चेतना’ नयी धारा की फिल्म बनी और उसके बाद इस तरह की कई फिल्में आयीं। एक फिल्म निर्माता की उपेक्षित जिंदगी पर गुरुदत्त ने ‘कागज के फूल’ बनायी। यह भारत की पहली सिनेमास्कोप फिल्म थी। जिसके लिए यंत्र विदेश से मंगाये गये थे। फिल्म की प्रोसेसिंग भी विदेश में हुई थी। दुर्भाग्य से यह फिल्म बुरी तरह से फ्लाप रही। एक फिल्म ‘सोने की चिडि़या’ बनी, जिसमें एक युवा अभिनेत्री की जिंदगी दिखायी गयी थी। हृषिकेश मुखर्जी की ‘गुड्डी’ (एक किशोरी की फिल्म अभिनेताओं के प्रति दीवानगी पर) ,श्याम बनेगल की स्मिता पाटील अभिनीत ‘भूमिका’ (प्रसिद्ध मराठी अभिनेत्री हंसा वाडकर की जिंदगी से प्रेरित), सत्यजित राय की बंगला फिल्म ‘नायक’ (उत्तम कुमार अभिनीत एक फिल्मी नायक की जीवनगाथा) भी अपने वक्त की उल्लेखनीय फिल्में रहीं।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>महिलाओं पर केंद्रित कथाओं पर हृषिकेश मुखर्जी</strong> की ‘ अनुपमा’, ‘अनुराधा’, सत्यजित राय की ‘चारुलता’, वी. शांताराम की ‘ अमर ज्योति’ (1936) उल्लेखनीय फिल्में कही जायेंगी। ‘बॉबी’ (किशोर प्रेम की किशोर वय कलाकार जोड़ी की फिल्म), ‘तराना’ (एक बनजारन और एक रईस युवक की प्रेमकथा), नासिर हुसेन की ‘ जब प्यार किसी से होता है’, ‘हम किसी से कम नहीं’(1978), बाल विवाह पर कारदार की ‘शारदा’ (1942), वी. शांताराम की 1937 में बनी ‘दुनिया न माने’ (वृद्ध व्यक्ति से युवा लड़की के विवाह के कथानक पर),अज्ञातयौवना की कहानी ‘बालिका वधू’, ‘उपहार’, दहेज प्रथा पर वी. शांताराम की ‘दहेज’ (1950) भी यादगार फिल्में हैं। इसके अलावा बी. आर. चोपड़ा की गीतविहीन फिल्में ‘कानून’, और ‘इत्तिफाक’ सस्पेंस फिल्म के रूप में व राजश्री प्रोडक्शंस की ‘तपस्या’ बड़ी बहन के त्याग की कहानी के लिए याद की जाती रहेंगी। राज कपूर की ‘श्री 420’ में चार्ली चैपलिन की तर्ज पर व्यंग्य करने की कोशिश की गयी थी। 1947 में बनी ‘दूसरी शादी’ दूसरी पत्नी की सांसत झेलती पहली पत्नी की व्यथा-कथा थी। ‘बूटपालिश’ राज कपूर द्वारा निर्मित सफल बाल फिल्म थी। ‘मैं तुलसी तेरे आंगन की’ और ‘सौतन’ बलिदान होनेवाली दूसरी औरत की कहानी थी। अवैध संतान की कहानी पर 1959 में बी.आर. चोपड़ा की यश चोपड़ा निर्देशित फिल्म ‘धूल का फूल’ आयी , जिसका मोहम्मद रफी द्वारा गाया गीत- तू हिंदू बनेगा न मुसलमान बनेगा, इनसान की औलाद है इनसान बनेगा’ काफी लोकप्रिय हआ था। ‘कुआंरा बाप’ और ‘मस्ताना’ में भी यही कथानक दोहराया गया।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong><a href="http://www.google.co.in/search?hl=en&amp;biw=1280&amp;bih=642&amp;q=%E0%A4%B8%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%82%E0%A4%A4%E0%A4%B0+%E0%A4%B8%E0%A4%BF%E0%A4%A8%E0%A5%87%E0%A4%AE%E0%A4%BE&amp;btnG=Search&amp;aq=f&amp;aqi=&amp;aql=&amp;oq=&amp;gs_rfai=">समांतर सिनेमा</a> की मौत</strong></p>
<p style="text-align: justify;"><a rel="attachment wp-att-8014" href="http://www.janokti.com/hindi-news-media-%e0%a4%9a%e0%a5%8c%e0%a4%a5%e0%a4%be-%e0%a4%96%e0%a4%82%e0%a4%ad%e0%a4%be-cinema-media-blog-fourth-pilar/cinema-film-tv-%e0%a4%b8%e0%a4%bf%e0%a4%a8%e0%a5%87%e0%a4%ae%e0%a4%be-%e0%a4%ab%e0%a4%bf%e0%a4%b2%e0%a5%8d%e0%a4%ae%e0%a4%9f%e0%a5%80%e0%a4%b5%e0%a5%80/hindi-cinema-%e0%a4%b9%e0%a4%bf%e0%a4%82%e0%a4%a6%e0%a5%80-%e0%a4%b8%e0%a4%bf%e0%a4%a8%e0%a5%87%e0%a4%ae%e0%a4%be-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%b8%e0%a4%ab%e0%a4%bc%e0%a4%b0-4/attachment/mere-apne/"><img class="alignleft size-medium wp-image-8014" title="Mere Apne" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/Mere-Apne-300x225.jpg" alt="" width="300" height="225" /></a>सफल बाल फिल्मों में ‘मुन्ना’ , ‘अब दिल्ली दूर नहीं’, ‘बाप बेटी’, ‘किताब’ (1970, निर्देशक गुलजार) और ‘जागृति’ (निर्देशक सत्येन बोस) का नाम लिया जा सकता है। गुलजार ने जहां एक ओर ‘परिचय’ जैसी साफ-सुथरी फिल्म दी, वहीं उन्होंने ‘कोशिश’ में गूंगे-बहरों की समस्या को उभारने की ईमानदार कोशिश की। इस फिल्म में संजीव कुमार और जया भादुड़ी का अभिनय बहुत ही प्रशंसनीय रहा। गुलजार ने युवा-विद्यार्थी असंतोष पर ‘ मेरे अपने’ फिल्म बनायी। इसी कथानक पर पहले तपन सिन्हा बंगला में ‘अपनजन’ के नाम से फिल्म बनायी थी।</p>
<p style="text-align: justify;">नशीली चीजों की तस्करी और इनके इस्तेमाल पर <strong>रामानंद सागर की फिल्म ‘चरस’ और देव आनंद की ‘हरे राम हरे कृष्ण</strong>’ का नाम लिया जा सकता है। सेक्स की थीम पर वी. शांतराम की ‘पर्वत पर अपना डेरा’, देवकी बोस की ‘नर्तकी’ (1940), केदार शर्मा ‘जोगन’ (1950) और बाद में उनकी ही ‘चित्रलेखा’ (1941, 1964), न्यू थिएटर्स की ‘मुक्ति’ आदि फिल्में बनीं। सेक्स शिक्षा के नाम पर बी. के. आदर्श ने ‘गुप्त ज्ञान’, ‘गुप्त शास्त्र‘ जैसी फूहड़ फिल्में पेश कीं, तो पैसा कमाने के लिए ऐसी फिल्मों का सिलसिला शुरू हो गया, जिनकी कड़ी थीं ‘कामशास्त्र’ , ‘स्त्री पुरुष’ और ‘मन का आंगन’ आदि।</p>
<p style="text-align: justify;">ग्रामीण समाज में व्याप्त सूदखोरों के जुल्म पर महबूब खान की ‘औरत’, ‘रोटी’ और ‘मदर इंडिया’ बनी। निहित स्वार्थों के खिलाफ एक पत्रकार के संघर्ष की गाथा बांबे टॉकीज की ‘नया संसार’ में देखने को मिली।</p>
<p style="text-align: justify;">मृणाल सेन की ‘भुवन शोम’ और मणि कौल की ‘उसकी रोटी’ ने फिल्मों को एक नयी लीक दी। इस लीक को नाम दिया गया कला फिल्म या समांतर सिनेमा। इन फिल्मों ने फिल्म के सशक्त माध्यम के सही उपयोग का रास्ता खोल दिया। फिल्में सम-सामयिक समाज की जुबान बन गयीं। अब वह सिर्फ मनोरंजन तक ही सीमित नहीं रह गयीं। वे सामाजिक संदेश भी देने लगीं। इन फिल्मों में फंतासी के बजाय वास्तविकता पर ज्यादा जोर दिया जाने लगा। दर्शकों को लगने लगा कि फिल्म के रूप में वे अपने गिर्द घिरी समस्याओं, कुरीतियों और भ्रष्टाचार से साक्षात्कार कर रहे हैं। अब फिल्म उनके लिए महज मनोरंजन का जरिया भर नहीं, बल्कि उस समाज का आईना बन गयी जिसमें वे रहते हैं। इस आईने ने उन्हें श्याम बेनेगल की ‘अंकुर’ , ‘मंथन’, गोविंद निहलानी की ‘आक्रोश’, ‘अर्धसत्य’ से समाज की कई ज्वलंत समस्याओं से रूबरू कराया। इस लिहाज से स्मिता पाटील अभिनीत ‘चक्र’ (निर्देशक-रवींद्र धर्मराज) भी मील का पत्थर साबित हुई।इस तरह के सिनेमा को समांतर सिनेमा का नाम दिया गया जहां वास्तविकता को ज्यादा महत्व दिया गया। जीवन के काफी करीब लगने वाली और समय से सही तादात्म्य स्थापित करने वाली इन फिल्मों का दौर लंबं समय तक नहीं चल पाया। तड़क-भड़क, नाच-गाने और ढिशुंग-ढिशंग से भरी फिल्मों के आगे ये असमय ही मृत्यु को प्राप्त हुईं। जीवंत सिनेमा कही जाने वाली इन फिल्मों की वित्तीय मदद के लिए राष्ट्रीय फिल्म वित्त निगम आगे आया, जो बाद में फिल्म विकास निगम बन गया।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong><a href="http://www.google.co.in/search?hl=en&amp;biw=1280&amp;bih=642&amp;q=3d+films+in+india&amp;aq=1&amp;aqi=g10&amp;aql=&amp;oq=3d+films+&amp;gs_rfai=">थ्री डी (त्रिआयामी) फिल्मों तक पहुंचा हिंदी सिनेमा</a></strong></p>
<p style="text-align: justify;"><strong><a rel="attachment wp-att-8015" href="http://www.janokti.com/hindi-news-media-%e0%a4%9a%e0%a5%8c%e0%a4%a5%e0%a4%be-%e0%a4%96%e0%a4%82%e0%a4%ad%e0%a4%be-cinema-media-blog-fourth-pilar/cinema-film-tv-%e0%a4%b8%e0%a4%bf%e0%a4%a8%e0%a5%87%e0%a4%ae%e0%a4%be-%e0%a4%ab%e0%a4%bf%e0%a4%b2%e0%a5%8d%e0%a4%ae%e0%a4%9f%e0%a5%80%e0%a4%b5%e0%a5%80/hindi-cinema-%e0%a4%b9%e0%a4%bf%e0%a4%82%e0%a4%a6%e0%a5%80-%e0%a4%b8%e0%a4%bf%e0%a4%a8%e0%a5%87%e0%a4%ae%e0%a4%be-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%b8%e0%a4%ab%e0%a4%bc%e0%a4%b0-4/attachment/chhota-chetan-movie/"><img class="alignright size-medium wp-image-8015" title="chhota chetan movie" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/chhota-chetan-movie-210x300.jpg" alt="" width="210" height="300" /></a>कई पड़ावों से गुजरता भारतीय सिनेमा ‘छोटा चेतन’ और ‘शिवा का इंसाफ’ में थ्री डी (त्रिआयामी) पद्धति को भी आजमा चुका है। इनमें ‘छोटा चेतन’ ने कामयाबी पायी और ‘शिवा का इंसाफ’ की विफलता ने इन फिल्मों की राह रोक दी।</strong> बहरहाल , आज एक फिल्म को बनाने में एक वर्ष से भी अधिक वक्त लग जाता है। बहुचर्चित फिल्म ‘मुगले आजम’ को पूरा होने में 12 वर्ष से भी अधिक वक्त लग गया था। जब यह फिल्म पूरी होने को आयी, तब तक रंगीन फिल्मों की धूम मच गयी थी। मजबूरन के. आसिफ को इसका शीशमहलवाला दृश्य रंगीन करना पड़ा था। ‘पाकीजा’ भी 10 साल आसानी से खींच ले गयी। लेकिन पहले के दिनों में साल में तीन-चार फिल्में बन जाती थीं। कारण न तो रिटेक ही ज्यादा होते थे न डबिंग के लिए सितारों का इंतजार ही करना पड़ता था। दर्शक किसी फिल्म को बार-बार देखने के बजाय नयी फिल्म देखना पसंद करते थे। उन दिनों सबसे कम समय में बननेवाली फिल्म थी मोहन स्टूडियो की ‘ ईद का चांद’, जिसके निर्देशक ए.एम. खान थे।</p>
<p style="text-align: justify;">फिल्मों के निर्माण में प्रतिस्पर्धा तब से शुरू हुई जब से स्टूडियो पद्धति समाप्त हुई।पहले वही फिल्में बनाने के धंधा करते थे, जिनके पास अपने स्टूडियो होते थे। कलाकार और तकनीशियन उस स्टूडियो के वेतनभोगी कर्मचारी हुआ करते थे। इस पद्धति को तब धक्का लगा, जब सी.एन. त्रिवेदी नाम के एक निर्माता ने अभिनेता मोतीलाल को अनुबंधित किया और स्टूडियो भाड़े पर लेकर फिल्म बनाना शुरू कर दिया। त्रिवेदी से प्रेरणा पाकर ऐसे और लोग भी इस धंधे में आ गये, जिनके पास पैसे तो थो, पर अपने स्टूडियो नहीं थे। ये लोग कलाकारों का चयन करते, स्टूडियो भाड़े पर लेते और फिल्म बना डालते। इसका प्रभाव अन्य निर्माताओं पर भी पड़ा। कलाकारों के लिए फ्रीलांसिंग का सिलसिला शुरू करने का श्रेय पृथ्वीराज कपूर को जाता है। उसके बाद से कलाकार एक फिल्म कंपनी के बंधे हुए कर्मचारी न होकर बाहरी पिल्म कंपनियों की फिल्मों में भी काम करने लगे। वे जितनी चाहे पिल्में करने को स्वतंत्र हो गये। इसका प्रभाव फिल्मों के स्तर पर भी पड़ा। तभी से कहानी गौण हो गयी और मनोरंजन प्रधान हो गया।</p>
<p style="text-align: justify;">स्वाधीनता संग्राम के वक्त भी फिल्मों में कुछ बदलाव आया था। अंग्रेजी शासन के कारण पहले फिल्मों में शराबखोरी तथा पथभ्रष्ट करने वाले जो दृश्य दिखाये जाते थे, वे बंद हो गये थे। यह देश में नव जागरण के परिप्रेक्ष्य में जनाक्रोश उमड़ने की आशंका से हुआ था। 1942 के आंदोलन का प्रभाव भी फिल्मों पर पड़े बगैर नहीं रहा। दूसरा परिवर्तन आजादी के बाद देखा गया। 1947 के आसपास निर्माताओं ने देश भक्ति पर जितनी फिल्में बनायीं थीं, उतनी फिर कभी नहीं बनीं।</p>
<p style="text-align: justify;">आजादी के पहले तक देश की फिल्मों मे जहां अपनी संस्कृति, सभ्यता और परंपरा की छाप थी, वहीं बाद की फिल्मों में यह सब गायब हो गयी। हमारी फिल्मों में पाश्चात्य सभ्यता और संस्कृति ऐसी हावी हो गयी कि अब तो फिल्में पूरी तरह से उसी रंग में रंग गयी हैं।</p>
<p style="text-align: justify;">श्वेत-श्याम फिल्मों के बाद 1937 में पहली रंगीन फिल्म ‘किसान कन्या’ बनी। इसके निर्माता निर्देशक अर्देशिर ईरानी इसके बाद सोहराब मोदी ने टेक्नीकलर में ‘झांसी की रानी’ का निर्माण किया। यह फिल्म बुरी तरह से फ्लाप हुई। भारत की तीसरी रंगीन फिल्म महबूब खान की ‘आन’ थी, जो काफी हिट रही। इन दोनों फिल्मों की प्रोसेसिंग विदेश में हुई थी। इसके बाद गेवाकलर , फूजीकलर और इस्टमैनकलर आया।</p>
<p style="text-align: justify;">इन पड़ावों से गुजरता वयस्क होता भारतीय सिनेमा अब एक उद्योग का रूप धारण कर चुका है और इसके लिए उद्योग के दर्जे की मांग भी की जा रही है। यह मांग वर्षों से की जा रही है क्योंकि अगर यह मांग मान ली जाती है तो इसकी समस्याओं को देखने के लिए एक अलग मंत्रालय की व्यवस्था हो सकेगी। केंद्रीय फिल्म सेंसर बोर्ड अब केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड हो गया है। कई फिल्में अब यहां भी अटकती हैं ।आज फिल्म उद्योग चौतरफा मुसीबत से घिरा है। एक ओर फिल्म का बढ़ता व्यय उसकी रीढ़ तोड़ रहा है तो दूसरी ओर वीडियो कैसेट की तस्करी और वीडियो के प्रसार के चलते मल्टीस्टारर फिल्में तक बाक्स आफिस में मुंह की खा रही हैं। टेलीविजन चैनलों के प्रसार से भी फिल्मों के व्यवसाय को फर्क पड़ा है लेकिन सच यह भी है कि 51 सेंटीमीटर का</p>
<p style="text-align: justify;">परदा सिनेमाघरों का विकल्प नहीं हो सकता। फिल्में आज भी हैं और आने वाले दिनों में भी इनका वजूद रहेगा। अब तो मल्टीप्लेक्सों का चलन है जहां आप एक जगह एक साथ कई फिल्में देख सकते हैं। फिल्मों में भी अब नयी तकनीक का दिनोंदिन प्रचलन होने लगा है।</p>
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		<title>हिंदी सिनेमा का सफ़र -3</title>
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		<pubDate>Wed, 13 Oct 2010 03:30:16 +0000</pubDate>
		<dc:creator>राजेश त्रिपाठी</dc:creator>
				<category><![CDATA[सिनेमा-संसार]]></category>
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		<description><![CDATA[हिंदी सिनेमा के इतिहास में अब तक आपने पढ़ा (पिछली पोस्ट पढ़ें ) पुराने जमाने में भी हिट थीं जोड़ियां पुराने जमाने में फिल्मों के प्रमुख कलाकारों के चयन के वक्त इस बात का ध्यान रखा जाता था कि वह ]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><strong><a href="http://www.janokti.com/hindi-news-media-%e0%a4%9a%e0%a5%8c%e0%a4%a5%e0%a4%be-%e0%a4%96%e0%a4%82%e0%a4%ad%e0%a4%be-cinema-media-blog-fourth-pilar/cinema-film-tv-%e0%a4%b8%e0%a4%bf%e0%a4%a8%e0%a5%87%e0%a4%ae%e0%a4%be-%e0%a4%ab%e0%a4%bf%e0%a4%b2%e0%a5%8d%e0%a4%ae%e0%a4%9f%e0%a5%80%e0%a4%b5%e0%a5%80/7960/">हिंदी सिनेमा के इतिहास </a>में अब तक आपने पढ़ा (<a href="http://www.janokti.com/hindi-news-media-%e0%a4%9a%e0%a5%8c%e0%a4%a5%e0%a4%be-%e0%a4%96%e0%a4%82%e0%a4%ad%e0%a4%be-cinema-media-blog-fourth-pilar/cinema-film-tv-%e0%a4%b8%e0%a4%bf%e0%a4%a8%e0%a5%87%e0%a4%ae%e0%a4%be-%e0%a4%ab%e0%a4%bf%e0%a4%b2%e0%a5%8d%e0%a4%ae%e0%a4%9f%e0%a5%80%e0%a4%b5%e0%a5%80/%e0%a4%b9%e0%a4%bf%e0%a4%82%e0%a4%a6%e0%a5%80-%e0%a4%b8%e0%a4%bf%e0%a4%a8%e0%a5%87%e0%a4%ae%e0%a4%be-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%b8%e0%a4%ab%e0%a4%bc%e0%a4%b0-%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%ae/">पिछली पोस्ट पढ़ें</a> )</strong></p>
<p style="text-align: justify;"><strong>पुराने जमाने में भी  हिट थीं जोड़ियां</strong></p>
<p style="text-align: justify;">पुराने जमाने में फिल्मों के प्रमुख कलाकारों के चयन के वक्त इस बात का ध्यान रखा जाता था कि वह घुड़सवारी, तैरना, गाना और कार चलाना अच्छी तरह से जानता हो। क्योंकि शुरू-शुरू में न तो खतरनाक दृश्यों के लिए ‘डमी’ या स्टंट आर्टिस्ट की व्यवस्था थी और न ही पार्श्व गायक-गायिका की। मारधाड़ और घुड़सवारी के दृश्यों में खुद हीरो को जोखिम उठाना पड़ता था। तब फाइट कंपोजर भी नहीं थे। मारपीट और घुड़सवारी के दृश्य हीरो फिल्म के निर्देशक के निर्देशानुसार करते थे। ऐसे दृश्यों में वे चोट भी खा जाते थे। फिल्म ‘शबिस्तान’ की शूटिंग के दौरान तो उस जमाने के सुपरस्टार श्याम घोड़े से गिर कर अपनी जान ही गंवा बैठे थे।</p>
<p style="text-align: justify;">उस जमाने की सबसे महंगी अभिनेत्री सागर मूवीटोन की सविता देवी थीं, जिन्हें चार हजार रुपये मासिक वेतन मिलता था। नायकों में सर्वाधिक वेतन पानेवाले थे उस जमाने के लोकप्रिय अभिनेता मोतीलाल, उन्हें ढाई हजार रुपये मासिक वेतन के रूप में मिलते थे। फिल्मी कलाकारों से मिलने के लियए उस जमाने में भी लोग लालायित रहते थे।</p>
<p style="text-align: justify;"><a rel="attachment wp-att-7987" href="http://www.janokti.com/hindi-news-media-%e0%a4%9a%e0%a5%8c%e0%a4%a5%e0%a4%be-%e0%a4%96%e0%a4%82%e0%a4%ad%e0%a4%be-cinema-media-blog-fourth-pilar/cinema-film-tv-%e0%a4%b8%e0%a4%bf%e0%a4%a8%e0%a5%87%e0%a4%ae%e0%a4%be-%e0%a4%ab%e0%a4%bf%e0%a4%b2%e0%a5%8d%e0%a4%ae%e0%a4%9f%e0%a5%80%e0%a4%b5%e0%a5%80/hindi-cinema-%e0%a4%b9%e0%a4%bf%e0%a4%82%e0%a4%a6%e0%a5%80-%e0%a4%b8%e0%a4%bf%e0%a4%a8%e0%a5%87%e0%a4%ae%e0%a4%be-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%b8%e0%a4%ab%e0%a4%bc%e0%a4%b0-3/attachment/1962_ashok_kumar/"><img class="alignright size-full wp-image-7987" title="1962_Ashok_Kumar" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/1962_Ashok_Kumar.jpg" alt="" width="292" height="358" /></a>आजकल हिट फिल्मी जोड़ियों की धूम है लेकिन उस समय भी ऐसी जोड़ियों की कमी नहीं थी। गायिका-अभिनेत्री बिब्बो और मास्टर निसार के गाने सुनने के लिए लोग उनकी फिल्में बार-बार देखते थे। सुरेंद्र-बिब्बो की जोड़ी भी खूब चली थी। इनकी हिट फिल्में थीं-रंगीला राजपूत, मायाजाल, सैरे परिस्तान, जागीरदार, मनमोहन,डायनामाइट, लेडीज ओनली, ग्रामोफोन सिंगर और सेवा समाज आदि। 1942 तक यह जोड़ी खूब चली थी। लीला चिटणीस और अशोक कुमार की जोड़ी हिट सामाजिक फिल्मों की पर्याय मानी जाती थी। ‘झूला’, ‘कंगन’, ‘बंधन’ इस जोड़ी की बेहतरीन फिल्में थीं। ‘मदर इंडिया’, ‘महामाया’, ‘सहेली’, ‘डार्लिंग डाटर’ आदि फिल्मों की प्रमिला और कुमार की जोड़ी 1937 से 1939 तक खूब चली थी। अभिनेत्री नंदा के पिता मास्टर विनायक भी जवानी में फिल्मों में नायक हुआ करते थे। 1938 के आसपास उनकी जोड़ी मीनाक्षी के साथ बनी। मीनाक्षी बहुत खूबसूरत थी। उसका असली नाम रतन शिरोड़कर था। मीनाक्षी की पहली फिल्म थी ‘ब्रह्मचारी’ जिसमें उसने स्वीमिंग कास्ट्यूम पहना था। उसके इस रूप को देखने के लिए दर्शकों ने ‘ब्रह्मचारी’ फिल्म बार-बार देखी थी। यही नहीं उसने फिल्म में दो चोटियां कीं, तो सारे देश में दो चोटियों का रिवाज चल गया। इस जोड़ी की हिट फिल्में थीं-‘ब्रांडी की बोतल’, ‘अमृत’, ‘संगम’, ‘मेरी अमानत’ , ‘पन्ना दाई’, ‘देवता’, ‘बड़ी मां’, ‘सुभद्रा’ आदि।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong> बोलती फिल्मों का युग अपने साथ विविधता भी लाया</strong></p>
<p style="text-align: justify;">फिल्मी दुनिया में रोमांस और बाद में शादी नये युग की देन नहीं है। 1931 में ‘वसंत सेना’ में पहली बार नायिका की भूमिका करनेवाली दक्षिण भारत की एम ए पास एनाक्षी रामराव निर्माता-निर्देशक एम भवनानी को दिल दे बैठीं और बाद में दोनो ने शादी कर ली। संभ्रांत घराने से आयी एनाक्षी मद्रास के एक पूर्व न्यायाधीश की बेटी थीं। इतिहास की स्नातक प्रमिला ने 1937 में प्रदर्शित फिल्म ‘मेरे लाल’ में नायिका की भूमिका की थी। वह 1939 में ‘मिस इंडिया’ चुनी गयी थीं। वे अपनी फिल्मों के नायक कुमार को प्रेम करने लगीं और बाद में उन्हीं से शादी कर ली। 1934 में कलकत्ता में एक फिल्म बनी थी ‘रूपलेखा’ (बंगला) इसमें देश में पहली बार फ्लैश बैक का प्रयोग किया गया था। प्रमथेशचंद्र बरुआ के निर्देशन में बनी इस फिल्म में एक छोटी-सी भूमिका थी जमुना दास नाम की एक किशोरी ने, जो बाद में कुंदनलाल सहगल अभिनीत ‘देवदास’ की नायिका के रूप में चर्चित हुई। बरुआ के साथ उसका रोमांस भी खूब चला, जो बाद में शादी में बदल गया।</p>
<p style="text-align: justify;"><a rel="attachment wp-att-7988" href="http://www.janokti.com/hindi-news-media-%e0%a4%9a%e0%a5%8c%e0%a4%a5%e0%a4%be-%e0%a4%96%e0%a4%82%e0%a4%ad%e0%a4%be-cinema-media-blog-fourth-pilar/cinema-film-tv-%e0%a4%b8%e0%a4%bf%e0%a4%a8%e0%a5%87%e0%a4%ae%e0%a4%be-%e0%a4%ab%e0%a4%bf%e0%a4%b2%e0%a5%8d%e0%a4%ae%e0%a4%9f%e0%a5%80%e0%a4%b5%e0%a5%80/hindi-cinema-%e0%a4%b9%e0%a4%bf%e0%a4%82%e0%a4%a6%e0%a5%80-%e0%a4%b8%e0%a4%bf%e0%a4%a8%e0%a5%87%e0%a4%ae%e0%a4%be-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%b8%e0%a4%ab%e0%a4%bc%e0%a4%b0-3/attachment/laila-majnu-film/"><img class="alignleft size-medium wp-image-7988" title="laila majnu film" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/laila-majnu-film-300x225.jpg" alt="" width="300" height="225" /></a>बोलती फिल्मों का युग आया तो फिल्मों के विषय में भी विविधता आयी। प्रेमकथाओं पर ‘हीर रांझा’, ‘सोहनी महिवाल’, ‘मिर्जा साहिबां’, ‘ढोला मारूं’ और ‘लैला मजनूं’ जैसी फिल्में बनीं। पैरामाउंट मूवीटोन के कीकूभाई देसाई ने शुरू-शुरू में कई फंतासी और जादुई फिल्में बनायीं। बाद में उनके उत्तराधिकारी सुभाष देसाई और मनमोहन देसाई ने मल्टीस्टारर फिल्में बनायीं। अलीबाबा, अलादीन, सिकंदर द सेलर तथा थीफ आफ बगदाद जैसी फंतासी फिल्मे कापी लोकप्रिय हुई थीं। 1948 में आयी जेमिनी स्टूडियो मद्रास की कास्ट्यूम फिल्म ‘चंद्रलेखा’ भी काफी सफल रही।</p>
<p style="text-align: justify;">जीवनीमूलक फिल्मों में संत तुकाराम, संत ज्ञानेश्वर, संत तुलसीदास आदि प्रमुख हैं। बंगला भाषा में ऐसी अनेक फिल्में बनीं, जिनमें अधिकांश सुभाष बोस, रामकृष्ण परमहंस, विद्यासागर, भगिनी निवेदिता, राजा राममोहन राय तथा खुदीराम पर थीं। देशभक्ति की विषयवस्तु पर- हकीकत, शहीद (फिल्मिस्तान की) चंद्रशेखर आजाद, भगत सिंह, आनंदमठ, अंजनगढ़, पहला आदमी, हिंदुस्तान की कसम आदि फिल्में बनायी गयीं। इसके बाद आधुनिक रोमांटिक फिल्मों का युग आया और ऐंग्री यंग मैन का प्रवेश हुआ।</p>
<p style="text-align: justify;">विफल प्रेम के कथानक पर ‘मेला’, ‘रतन’, ‘आर पार’, ‘दीदार’,‘अनमोल घड़ी’, ‘बरसात’, ‘ बैजू बावरा’, ‘लव स्टोरी’, ‘अंखियों के झरोखे से’, ‘आनंद’ तथा ‘मिली’ बनी और काफी सफल भी रहीं। पूर्व जन्म के कथानक पर ‘ मधुमती’ बनी और बहुत सफल रही। सुनील दत्त की ‘यादें’ भारतीय फिल्म के इतिहास में हमेशा याद की जाती रहेगी। यह अकेली ऐसी फिल्म है जिसमें केवल एक पात्र (सुनील दत्त) था। फ्रैंकफर्ट के फिल्म समारोह में इसे श्रेष्ठ फिल्म के रूप में पुरस्कृत किया गया था। इसी तरह ‘नया दिन नयी रात’ को लोग भूल नहीं पायेंगे क्योंकि इसमें संजीव कुमार ने नौ भूमिकाएं निभायी थीं। इस फिल्म में सरोश मोदी ने अपने मेकअप का चमत्कार दिखाया था।</p>
<p style="text-align: justify;">ऐसे तो फिल्मों में जानवरों की भूमिकाएं पहले भी होती थीं ( इस संदर्भ में फिल्म ‘इनसानियत’ उल्लेखनीय है), पर फिल्मों में पशुओं की भूमिका को प्रमुखता देने का श्रेय दक्षिण भारत के फिल्म निर्माता सैंडो एम एम चिनप्पा देवर (अब स्वर्गीय) को है। उनकी फिल्मों ‘हाथी मेरे साथी’, ‘गाय और गोरी’, ‘मां’ के बाद तो यह सिलसिला ही शुरू हो गया। कुत्ते, बंदर और सांप भी स्टार बनने लगे। ‘शुभ दिन’, ‘कर्तव्य’, ‘तेरी मेहरबानियां’, ‘परिवार’ फिल्में इसकी उदाहरण हैं और यह क्रम जारी है।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>मानवीय रिश्ते भी बने फिल्मों के कथानक का आधार</strong></p>
<p style="text-align: justify;">नृत्य पर आधारित फिल्मों में उदयशंकर की ‘कल्पना’ और वी. शांताराम की ‘झनक झनक पायल बाजे’ काफी चर्चित रहीं। पारिवारिक समस्याओं को लेकर बनी फिल्मों में गजानन जागीरदार द्वारा निर्देशित फिल्म ‘ चरणों की दासी सास-बहू के बीच तकरार पर आधारित थी तो बासु चटर्जी निर्देशित फिल्म ‘सारा आकाश’ में एक नव वधू अपने पति के साथ, जो अपने परिवार से बुरी तरह बंधा-जकड़ा है, तादाम्य स्थापित करने की कोशिश करती है। मां, बहन के रिश्तों और घर-परिवार के कथानक पर अनेक फिल्में बनीं। इनमें 1948 में बनी एस एम यूसुफ की ‘गृहस्थी’ भी एक थी। अवाक फिल्मों के युग में चंदूलाल शाह ने ‘गुण सुंदरी’ बनायी। वी. शांताराम की ‘नवरंग’ (सवाक), बी.आर चोपड़ा की ‘गुमराह’ ( एक युवती के वृद्ध से ब्याहे जाने की समस्या पर), ‘ये रास्ते हैं प्यार के’, ‘अनुभव’, ‘अविष्कार’ तथा ‘गृहप्रवेश’ आदि के नाम भी इस संदर्भ में उल्लेखनीय हैं।</p>
<p style="text-align: justify;"><a rel="attachment wp-att-7995" href="http://www.janokti.com/hindi-news-media-%e0%a4%9a%e0%a5%8c%e0%a4%a5%e0%a4%be-%e0%a4%96%e0%a4%82%e0%a4%ad%e0%a4%be-cinema-media-blog-fourth-pilar/cinema-film-tv-%e0%a4%b8%e0%a4%bf%e0%a4%a8%e0%a5%87%e0%a4%ae%e0%a4%be-%e0%a4%ab%e0%a4%bf%e0%a4%b2%e0%a5%8d%e0%a4%ae%e0%a4%9f%e0%a5%80%e0%a4%b5%e0%a5%80/hindi-cinema-%e0%a4%b9%e0%a4%bf%e0%a4%82%e0%a4%a6%e0%a5%80-%e0%a4%b8%e0%a4%bf%e0%a4%a8%e0%a5%87%e0%a4%ae%e0%a4%be-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%b8%e0%a4%ab%e0%a4%bc%e0%a4%b0-3/attachment/do-ankhen-barah-haath/"><img class="alignright size-full wp-image-7995" title="Do Ankhen Barah Haath" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/Do-Ankhen-Barah-Haath.jpg" alt="" width="224" height="320" /></a>अपराध की पृष्ठभूमि पर आधारित फिल्मों का दौर अवाक फिल्मों के युग से ‘काला नाग’ से शुरू हो गया था। इसके निर्देशक थे होमी मास्टर, जिन्होंने इस फिल्म में मुख्य भूमिका भी निभायी थी। सवाक युग में ‘किस्मत’ ( हीरो अशोक कुमार, हीरोइन मुमताज शांति। यह फिल्म कलकत्ता में तकरीबन चार साल तक चली थी, जो एक रिकार्ड है) के गीत भी बहुत हिट हुए थे। ‘दुनिया क्या है’, ‘बाजी’, ‘आर पार’, ‘सीआईडी’, ‘दो आंखे बारह हाथ’ (वी. शांताराम), ‘गंगा यमुना’, ‘मुझे जीने दो’ (डाकुओं की समस्या पर), ‘डॉन’, ‘शोले’ (70 एम. एम. स्टीरियोफोनिक साउंड में बनी भारत की पहली फिल्म।</p>
<p style="text-align: justify;">जी. पी. सिप्पी की रमेश सिप्पी द्वारा निर्देशित इस फिल्म ने कामयाबी के नये कीर्तिमान बनाये) आदि फिल्मों का एक सिलसिला ही चल पड़ा जो आज तक बरकरार है।</p>
<p style="text-align: justify;">फिल्मों ने हिंदू-मुसलिम एकता के विषय को भी आधार बनाया। इस दृष्टि से वी.शांताराम की ‘पड़ोसी’ एक उल्लेखनीय फिल्म थी। इसमें मुसलिम कलाकार को हिंदू की और गजानन जागीरदार को मुसलिम पात्र की भूमिका देकर एक नया प्रयोग किया गया था। सामाजिक समस्याओं भी फिल्मों ने मुंह नहीं चुराया। 1941 में बनी ‘आदमी’ में वेश्यावृत्ति के पेशे को मानवीय नजरिये से देखने का पहला प्रयास किया गया। इसके बाद भी समाज की कुछ ज्वलंत समस्याओं पर फिल्में बनाने का सिलसिला जारी रहा।</p>
<p style="text-align: justify;">
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		<title>हिंदी सिनेमा का सफ़र -2</title>
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		<pubDate>Sun, 10 Oct 2010 08:51:31 +0000</pubDate>
		<dc:creator>राजेश त्रिपाठी</dc:creator>
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		<description><![CDATA[हिंदी सिनेमा के इतिहास में अब तक आपने पढ़ा (पिछली पोस्ट पढ़ें ) फिल्मों ने जब बोलना शुरू किया तो दर्शकों को बड़ा अचरज हुआ। चलती-फिरती तस्वीरें बोलने भी लगीं, यह उनके लिए दुनिया का नया आश्चर्य था। फिल्में ‘हाउसफुल’ ]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><strong><a href="http://www.janokti.com/hindi-news-media-%E0%A4%9A%E0%A5%8C%E0%A4%A5%E0%A4%BE-%E0%A4%96%E0%A4%82%E0%A4%AD%E0%A4%BE-cinema-media-blog-fourth-pilar/cinema-film-tv-%E0%A4%B8%E0%A4%BF%E0%A4%A8%E0%A5%87%E0%A4%AE%E0%A4%BE-%E0%A4%AB%E0%A4%BF%E0%A4%B2%E0%A5%8D%E0%A4%AE%E0%A4%9F%E0%A5%80%E0%A4%B5%E0%A5%80/%E0%A4%B9%E0%A4%BF%E0%A4%82%E0%A4%A6%E0%A5%80-%E0%A4%B8%E0%A4%BF%E0%A4%A8%E0%A5%87%E0%A4%AE%E0%A4%BE-%E0%A4%95%E0%A4%BE-%E0%A4%B8%E0%A4%AB%E0%A4%BC%E0%A4%B0-%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%AE/">हिंदी सिनेमा के इतिहास</a></strong><a href="http://www.janokti.com/hindi-news-media-%E0%A4%9A%E0%A5%8C%E0%A4%A5%E0%A4%BE-%E0%A4%96%E0%A4%82%E0%A4%AD%E0%A4%BE-cinema-media-blog-fourth-pilar/cinema-film-tv-%E0%A4%B8%E0%A4%BF%E0%A4%A8%E0%A5%87%E0%A4%AE%E0%A4%BE-%E0%A4%AB%E0%A4%BF%E0%A4%B2%E0%A5%8D%E0%A4%AE%E0%A4%9F%E0%A5%80%E0%A4%B5%E0%A5%80/%E0%A4%B9%E0%A4%BF%E0%A4%82%E0%A4%A6%E0%A5%80-%E0%A4%B8%E0%A4%BF%E0%A4%A8%E0%A5%87%E0%A4%AE%E0%A4%BE-%E0%A4%95%E0%A4%BE-%E0%A4%B8%E0%A4%AB%E0%A4%BC%E0%A4%B0-%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%AE/"> </a>में अब तक आपने पढ़ा (<strong>पिछली पोस्ट पढ़ें</strong> )</p>
<p style="text-align: justify;"><span style="font-size: 13.3333px;">फिल्मों ने जब बोलना शुरू किया तो दर्शकों को बड़ा अचरज हुआ। <strong>चलती-फिरती तस्वीरें </strong>बोलने भी लगीं, यह उनके लिए दुनिया का नया आश्चर्य था। फिल्में ‘हाउसफुल’ जानें लगीं। दर्शकों की लंबी क। तारें सिनेमाघरों के सामने लगने लगीं। चलते-फिरते सिनेमा के मालिकों को अब विश्वास हो गया था कि धंधा चल जायेगा इसलिए स्थायी पक्के सिनेमाघरों का निर्माण होने लगा और फिल्म को बिना रोके लगातार सुचारु रूप से रील खत्म होते ही दूसरे प्रोजेक्टर से अगली रील चलायी जा सके।</span></p>
<p style="text-align: justify;"><a rel="attachment wp-att-7978" href="http://www.janokti.com/hindi-news-media-%e0%a4%9a%e0%a5%8c%e0%a4%a5%e0%a4%be-%e0%a4%96%e0%a4%82%e0%a4%ad%e0%a4%be-cinema-media-blog-fourth-pilar/cinema-film-tv-%e0%a4%b8%e0%a4%bf%e0%a4%a8%e0%a5%87%e0%a4%ae%e0%a4%be-%e0%a4%ab%e0%a4%bf%e0%a4%b2%e0%a5%8d%e0%a4%ae%e0%a4%9f%e0%a5%80%e0%a4%b5%e0%a5%80/%e0%a4%b9%e0%a4%bf%e0%a4%82%e0%a4%a6%e0%a5%80-%e0%a4%b8%e0%a4%bf%e0%a4%a8%e0%a5%87%e0%a4%ae%e0%a4%be-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%b8%e0%a4%ab%e0%a4%bc%e0%a4%b0-2-hindi-cinema-ka-itihaas/attachment/eena_meena_deeka_the_story_of_hindi_film_comedy_idf124/"><img class="alignright size-full wp-image-7978" title="eena_meena_deeka_the_story_of_hindi_film_comedy_idf124" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/eena_meena_deeka_the_story_of_hindi_film_comedy_idf124.jpg" alt="" width="304" height="500" /></a>शुरू-शुरू में तस्वीरों को चलते-फिरते और बोलते देख कर अनपढ़ और बोलते देक कर अनपढ़ भोले-भाले देहाती मुंह फाड़ कर रह जाते। परदे पर रेलगाड़ी, सांप या शेर को देख उसको वास्तविक मान बैठते। इस संदर्भ में एक दिलचस्प घटना का जिक्र अप्रासंगिक नहीं होगा। एक फिल्म बनी थीं ‘पंजाब मेल’। इसमें नायिका सुलोचना (रूबी मेयर्स) एक तालाब में नहाने जाती है और एक-एक कर कपड़े खोलने लगती है। तभी पंजाब मेल धड़धड़ाती हुई आ जाती है, जिससे वह दिखाई नहीं देती। इस दृश्य को देखने के लिए कुछ दर्शक बार-बार <strong><a href="http://www.google.co.in/search?sourceid=chrome&amp;ie=UTF-8&amp;q=%E0%A4%B8%E0%A4%BF%E0%A4%A8%E0%A5%87%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%B9%E0%A4%BE%E0%A4%B2">सिनेमाहाल </a></strong>में यह सोच कर जाते थे कि किसी न किसी दिन तो गाड़ी अवश्य लेट होगी। किंतु सैकड़ों ‘शो’ देखने के बाद भी गाड़ी लेट नहीं हुई और न ही सुलोचना को नग्न देखने की दर्शकों की लालसा ही पूरी हुई।</p>
<p style="text-align: justify;">पुराने दिनों में देश में पारसी थिएटर और नायक-नौटंकी की धूम थी। यही वजह है कि वर्षों तक तब की फिल्मों में ऐसी नाटकीयता देखने को मिलती थी, जैसे कोई नाटक या नौटंकी देख रहे हों। संवादों और अभिनय में नाटकों की छाप स्पष्ट नजर आती। शायद उस जमाने में निर्माता-निर्देशक दर्शकों के दिल-दिमाग में बसी अभिनय शैली से हट कर कुछ ‘नया’ करने का जोखिम नहीं उठाना चाहते थे या फिर वे फिल्मों में मौलिकता-स्वाभाविकता लाने की बात सोच भी नहीं पाते थे। संवाद ही नहीं , फिल्म के गाने भी ऐसे गाये जाते थे, जैसे नाटकों में गाये जाते थे। आर्केस्ट्रा के नाम पर तब तबला, हारमोनियम, सारंगी, मंजीरा और बांसुरी ही हुआ करते थे और संगीत को कम तथा गायक-गायिका के स्वर को अधिक उभारा जाता था।</p>
<p style="text-align: justify;">तब कलाकार वेतनभोगी होते थे और दोपहर में शूटिंग पैक-अप होने के बाद मिल-जुल कर स्वयं स्टूडियो में ही खाना बनाते थे। उन्हें यह चिंता नहीं थी कि लोग यह सब सुनेंगे, तो क्या कहेंगे क्योंकि वे सब ग्लैमर की दुनिया और व्यक्तिगत प्रचार से दूर, अच्छी फिल्में बनाने के लिए पूर्णतः समर्पित थे।</p>
<p style="text-align: justify;">उन दिनों अखबारों में फिल्म के समाचारों को ज्यादा महत्व नहीं दिया जाता था। चित्र छपने की भी गुंजाइश नहीं थी। फिर भी कलाकारों के रोमांस के चर्चे गाहे-बगाहे पढ़ने-सुनने को मिल ही जाते थे। इन्हें लोग चटखारे लेकर पढ़ते-सुनते और दूसरों को सुनाते। अशोक कुमार के साथ देविका रानी, लीला चिटणीस ओर नलिनी जयवंत के रोमांस के चर्चे उन दिनों आम थे।</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">पहले सम्मानित घराने की युवतियां फिल्मों में नहीं आती थीं। इस पेशे को बहुत बुरा माना जाता था। तब नाचने गाने वालियां ही फिल्मों में काम करती थीं। बाद में इसमें बदलाव आया और देविका रानी, दुर्गा खोटे, लीला चिटणीस, ललिता पवार, शांता आप्टे जैसी कुलीन घराने की युवतियां फिल्मों में आयीं। इसके बाद धीरे-धीरे फिल्मों-फिल्म कलाकारों को इज्जत मिलने लगी, जो आज बुलंदी पर है। आज हर नगर, हर कस्बे में फिल्मी कलाकारों के भक्त-दीवाने मिल जायेंगे। युवा पीढ़ी ने तो जैसे फिल्मी हाव-भाव को अपनी जीवन-शैली बना लिया है।</p>
<p style="text-align: justify;">फिल्मों की शुरुआत के काफी अरसे बाद तक उनके प्रचार के लिए न तो आज जैसे बड़े-बड़े पोस्टर या बैनर थे और न ही अखबारों में विज्ञापन ही छपते थे। शहरों और कस्बों में इक्का या तांगा के अगल-बगल फिल्म, सिनेमाघर का नाम तथा शो का समय लिखा बोर्ड लटका दिया जाता था। जोकर के मेकअप में बैठा प्रचारक भोंपू के चिल्ला-चिल्ला कर लोगों का ध्यान आकृष्ट करने के लिए वह सब सुनाता, जो बोर्ड पर लिखा होता था, इसके अलावा दीवारों पर पैंफलेट चिपकाये जाते थे।</p>
<p style="text-align: justify;">तकीनीकी कुशलता के क्षेत्र में भी तब की फिल्में बहुत-बहुत पीछे थीं। तब की फिल्मों की फोटोग्राफी देख कर ऐसा लगता है, जैसे कैमरा एक स्थान पर स्थिर कर दिया जाता था और उसके सामने कलाकार अपने संवाद उपदेशात्मक शैली में वैसे ही बोल कर छुट्टी पा जाते थे, जैसे पारसी रंगमंचके कलाकार करते थे। कैमरा जैसे एक दर्शक की तरह सब कुछ देखता और सिर्फ फिल्म पर आंकता जाता। तब तरह-तरह के लेंस नहीं बने थे, इसलिए क्लोज-अप शाट आदि लेने में बड़ी दिक्कत होती थी। तब कैमरे के सुविधाजनक संचालन के लिए ट्राली भी नहीं थी। ट्रिक फोटोग्राफी में भी आज जैसी उन्नति नहीं हुई थी और न ही मल्टीमीडिया का सहारा था। तब ऐसे किसी दृश्य के लिए फोटोग्राफर को बड़ी मेहनत करनी पड़ती थी। किसी कलाकार को आकाश में उड़ते दिखाने के लिए फर्श पर आसमान का दृश्य रंग-रोगन से बनाया जाता था। उसमें बादल और चांद-सितारे आंके जाते थे और कलाकार उस पर पेट के बल फिसलता था। कैमरा ऊंचाई पर किसी मचान पर चला जाता था और वहां से उस कलाकार की तस्वीरें लेता रहता था। जब यह दृश्य परदे पर आता तो लगता जैसे कलाकार वाकई आसमान में उड़ रहा है।</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">सेट की जगह पर शुरू-शुरू में नाटकवाले परदों का इस्तेमाल किया जाता था। बाद में काठ, टाट, बांस की खपच्चियों और रंग-रोगन के माध्यम से भव्य भवनों का निर्माण किया जाने लगा। आज बंबई के स्टूडियो में ऐसे सेट कम ही नजर आते हैं। अब इसकी जगह काठ या प्लाईवुड ने ले ली है। वैसे तो आजकल निजी बंगलों में शूटिंग होने लगी है इसलिए सेट वगैरह का झमेला भी खत्म होता जा रहा है। जब ट्राली आयी तो , तो ट्राली पर घूमता कैमरा फोटोग्राफी के नये-नये गुल खिलाने लगा। बाद में तरह-तरह के लेंस आये, क्लोज य्प शाट, हाई एंगल शाट, लांग शाट, लो एंगल शाट, जूम शाट, पैन साट, हाई शाट, मीडियम शाट, मीडियम क्लोज शाट, मीडियम लांग शाट, लो शाट आदि आसानी से लिये जाने लगे और फिल्म के दृश्य और भी प्रभावी होने लगे। पोर्टेबल कैमरे आने के बाद फिल्म की आउटडोर शूटिंग में भी आसानी होने लगी। फिल्म निर्माण मुनाफे का धंधा माना जाने लगा। शिक्षित युवक विदेश से फिल्म कला की नयी जानकारी लेकर फिल्मों में नवीनता लाने लगे। धीरे-धीरे फिल्मों से पारसी रंगमंच की छाप मिट गयी और संवाद सहजता से आम बोलचाल के लहजे में बोले जाने लगे। पहले कलाकार खुद ही गाते थे। बाद में पार्श्वगायन शुरू होने के बाद कुंदनलाल सहगल,नूरजहां, सुरैया, सुरेंद्र जैसे गायक-कलाकारों की मांग बढ़ी।</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">आरंभ से ही हिंदी फिल्मों के निर्माण में अहिंदीभाषी क्षेत्रों के लोगों का वर्चस्व रहा। मिसाल के तौर पर दादा साहब फालके, चंदूलाल सेठ, भवनानी, वी. शांताराम, वाडिया ब्रादर्स, विजय भट्ट, शशिधर मुखर्जी, सोहराब मोदी, महबूब खान, एस.एस. वासन, श्रीधर, एल वी प्रसाद, शक्ति सामंत, राज कपूर, जी.पी. सिप्पी, नाडियाडवाला आदि। शुरू-शुरू में दर्शकों की भावनाओं को ध्यान में रखते हुए सीता, अनुसूया, सावित्री आदि सन्नारियों के जीवन चरित्र पर फिल्में बनायी जाती थीं। श्रेष्ठ कहानियों पर शिक्षाप्रद साफ-सुथरी सामाजिक फिल्में भी बनने लगी थीं, जो खूब सराही जाती थीं किंतु जैसे ही सिनेमा दर्शकों पर हावी हो गया और वेतनभोगी कलाकारों की जगह लाखों रुपये लेने वाले कलाकारों का बोलबाला हो गया, फिल्में मौलिक और अच्छी कहानियों से वंचित होने लगीं। पैसे कमाने के लिए निर्माता हालीवुड फिल्मों की अंधाधुंध नकल करने लगे। ढिशुंग-ढिशुंग कैबरे और नायिका के अंग-प्रदर्शन को फिल्म की कामयाबी की कसौटी माना जाने लगा और इस तरह से शुरू हुआ फार्मूला फिल्मों का अंतहीन सिलसिला। वक्त ने ऐसा मोड़ लिया कि पहले जहां लोग फिल्मों में काम करना बेइज्जती समझते थे, वहीं फिल्मी कलाकारों की एक झलक पाने के लिए बेताब रहने लगे। फिल्मी ‘स्टार’ देवताओं की तरह पूजे जाने लगे। आज स्थिति यह है कि सभ्य और संपन्न घराने के युवक-युवतियां भी ‘स्टार’ बनने ख्वाब आंखों में संजो कर चोरी-छिपे बंबई (अब मुंबई) भाग जाते हैं और वहां ठोकरे खाते हैं और जिंदगी तबाह कर लेते हैं, तब कहीं जाकर सिर पर चढ़ा फिल्मी भूत उतरता है।</p>
<p style="text-align: justify;">शुरू-शुरू की भारतीय ऐक्शन फिल्में विदेशी फिल्मों से ज्यादा प्रभावित थीं। सेक्सी और ऐक्शन फिल्मों में आलिंगन, चुंबन तथा अंग प्रदर्शन की भरमार होती थी। इस तरह के दृश्यों को निर्माता बड़े शौक से रखते थे। आर.एस. चौधरी द्वारा निर्देशित ‘सच है’ कि नायिका मिस रोजी थी, जो अछूत कन्या बनी थी। एक दृश्य में वह जांघ तक कपड़ा उतार कर पूछती है-‘बोलो तुम्हारी और मेरी चमड़ी में क्या फर्क है? इस दृश्य की वजह से यह फिल्म खूब चली। उन दिनों भारत में अंग्रेजों का शासन था। उन्हें फिल्मों मे सेक्सी दृश्य दिखाने में कोई आपत्ति नहीं थी। स्वाधीनता के पूर्व तक सेंसर की उदारता, उस समय के निर्माताओं के लिए वरदान थी और उसका उन लोगों ने भरपूर फायदा उठाया। सुलोचना (रूबी मेयर्स) ऐसी पहली भारतीय अभिनेत्री थीं, जिन्होंने परदे पर अपने हीरो जाल मर्चेंट का चुंबन लिया था। यह चुंबन दृश्य अर्देशिर इरानी की फिल्म ‘हमरा हिंदुस्तान के लिए फिल्माया गया था। हिमांशु राय और देविका रानी के बीच फिल्माया गया चुंबन दृश्य भी काफी मशहूर हुआ था। 1947 में आजादी के बाद कांग्रेस की सरकार बनी, तो चुंबन और अश्लील दृश्यों पर अंकुश लगाने के बारे में सोचा जाने लगा। 1952 में केंद्रीय सेंसर बोर्ड के गठन के बाद इस पर कारगर ढंग से रोक लगायी जा सकी।</p>
<p style="text-align: justify;">तकनीकी दृष्टि में तब की फिल्में, आज की फिल्मों की तुलना में उन्नीस बैठती हैं। शुरू-शुरू में शूटिंग के लिए जिस कैमरे का प्रयोग किया जाता था, वह हाथ से चलाया जाता था इसलिए फिल्म की गति में एकरूपता नहीं रह पाती थी। बाद मे बिजली से चलनेवाले कैमरे आये और फिल्मों की गति भी सामान्य होने लगी। बोलती फिल्मों का युग आने पर पहले दृश्य और ध्वनि एक साथ निगेटिव फिल्म में ही लेने की व्यवस्था थी। ऐसी स्थिति में फिल्म संपादक को बड़ी परेशानी उठानी पड़ती थी। खासतौर से गानेवाले दृश्यों को कैंची छू नहीं पाती थी। कारण, जरा-सा अंश कटने से गाने के बोल या संगीत की लय में विघ्न पड़ने का अंदेशा रहता था। यदि कलाकारों के संवाद उच्चारण में गड़बड़ी हो जाती तो उस दृश्य को फिर से फिल्माया जाता था, क्योंकि तब डबिंग की व्यवस्था नहीं थी। आजकल आउटडोर शूटिंग में बोले गये संवाद बाद में डबिंग थिएटर में डब कर लिये जाते हैं। <strong>( क्रमशः </strong>)</p>
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		<title>हिंदी सिनेमा का सफ़र- 1</title>
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		<pubDate>Tue, 05 Oct 2010 08:20:58 +0000</pubDate>
		<dc:creator>राजेश त्रिपाठी</dc:creator>
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		<description><![CDATA[आज भारत विश्व में सर्वाधिक फिल्में निर्मित करनेवाला देश है लेकिन देश में सिनेमा की शुरुआत आसान नहीं रही। आज हमारा सिनेमा जिस मुकाम पर है, उसे वहां तक पहुंचने के लिए जाने कितनी मुश्किलों का सामना करना पड़ा है ]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><a rel="attachment wp-att-7961" href="http://www.janokti.com/hindi-news-media-%e0%a4%9a%e0%a5%8c%e0%a4%a5%e0%a4%be-%e0%a4%96%e0%a4%82%e0%a4%ad%e0%a4%be-cinema-media-blog-fourth-pilar/cinema-film-tv-%e0%a4%b8%e0%a4%bf%e0%a4%a8%e0%a5%87%e0%a4%ae%e0%a4%be-%e0%a4%ab%e0%a4%bf%e0%a4%b2%e0%a5%8d%e0%a4%ae%e0%a4%9f%e0%a5%80%e0%a4%b5%e0%a5%80/%e0%a4%b9%e0%a4%bf%e0%a4%82%e0%a4%a6%e0%a5%80-%e0%a4%b8%e0%a4%bf%e0%a4%a8%e0%a5%87%e0%a4%ae%e0%a4%be-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%b8%e0%a4%ab%e0%a4%bc%e0%a4%b0-hindi-cinema-ka-itihaas/attachment/cinema-bollywood/"><img class="alignright size-medium wp-image-7961" title="cinema bollywood" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/cinema-bollywood-300x203.jpg" alt="" width="300" height="203" /></a><strong>आज भारत विश्व में सर्वाधिक फिल्में निर्मित करनेवाला देश है </strong>लेकिन देश में <a href="http://www.janokti.com/category/hindi-news-media-%E0%A4%9A%E0%A5%8C%E0%A4%A5%E0%A4%BE-%E0%A4%96%E0%A4%82%E0%A4%AD%E0%A4%BE-cinema-media-blog-fourth-pilar/cinema-film-tv-%E0%A4%B8%E0%A4%BF%E0%A4%A8%E0%A5%87%E0%A4%AE%E0%A4%BE-%E0%A4%AB%E0%A4%BF%E0%A4%B2%E0%A5%8D%E0%A4%AE%E0%A4%9F%E0%A5%80%E0%A4%B5%E0%A5%80/">सिनेमा </a>की शुरुआत आसान नहीं रही। आज हमारा सिनेमा जिस मुकाम पर है, उसे वहां तक पहुंचने के लिए जाने कितनी मुश्किलों का सामना करना पड़ा है और कितना प्रयास करना पड़ा है। <strong><a href="http://hi.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%AD%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%A4%E0%A5%80%E0%A4%AF_%E0%A4%B8%E0%A4%BF%E0%A4%A8%E0%A5%87%E0%A4%AE%E0%A4%BE_%E0%A4%95%E0%A4%BE_%E0%A4%87%E0%A4%A4%E0%A4%BF%E0%A4%B9%E0%A4%BE%E0%A4%B8">भारत में फिल्मों के जन्म</a></strong> से लेकर उसके निरंतर क्रमिक विकास की कहानी जानने के लिए बहुत पीछे जाना होगा।</p>
<p style="text-align: justify;">7 जुलाई 1896,बंबई का वाटसन थिएटर। <strong><a href="http://www.google.co.in/search?hl=en&amp;q=%E0%A4%B2%E0%A5%81%E0%A4%AE%E0%A5%80%E0%A4%AF%E0%A4%B0+%E0%A4%AC%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%A6%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%B8&amp;aq=f&amp;aqi=&amp;aql=&amp;oq=&amp;gs_rfai=">लुमीयर ब्रादर्स </a></strong>नामक दो फ्रांसीसी अपनी फिल्में लेकर भारत आये। उक्त थिएटर में उनका प्रीमियर हुआ। प्रीमियर करीब 200 लोगों ने देखा। टिकट दर थी दो रुपये प्रति व्यक्ति। यह उन दिनों एक बड़ी रकम थी। एक सप्ताह बाद इनकी ये फिल्में बाकायादा नावेल्टी थिएटर में प्रदर्शित की गयीं। बंबई का यह थिएटर बाद में एक्सेल्सियर सिनेमा के नाम से मशहूर हुआ। रोज इन फिल्मों के दो से तीन शो किये जाते थे, टिकट दर थी दो आना से लेकर दो रुपये तक। इनमें 12 लघु फिल्में दिखायी जाती थीं। इनमें ‘<strong>अराइवल आफ ए ट्रेन’, ‘द सी बाथ’ तथा ‘ले़डीज एंड सोल्जर्स आन ह्वील’ </strong>प्रमुख थीं। <strong>लुमीयर बंधुओं </strong>ने जब भारतीयों को पहली बार सिनेमा से परिचित कराया तो लोग बेजान तसवीरों को चलता-फिरता देख दंग रह गये। हालांकि उन दिनों इन फिल्मों के लिए जो टिकट दर रखी गयी थी, वह काफी थी लेकिन फिर भी लोगों ने इस अजूबे को अपार संख्या में देखा। पत्र-पत्रिकाओं ने भी इस नयी चीज की तारीफों के पुल बांध दिये। एक बार इन <strong>फिल्मो को लोकप्रियता मिली ,</strong> तो भारत में बाहर से फिल्में आने और प्रदर्शित होने लगीं। 1904 में मणि सेठना ने भारत का पहला सिनेमाघर बमाया, जो विशेष रूप से फिल्मों के प्रदर्शन के लिए ही बनाया गया था। इसमें नियमित फिल्मों का प्रदर्शन होने लगा। उसमें सबसे पहले विदेश से आयी दो भागों मे बनी फिल्म ‘द लाइफ आफ क्राइस्ट’ प्रदर्शित की गयी। यही वह फिल्म थी जिसने भारतीय सिनेमा के पितामह दादा साहब फालके को भारत में सिनेमा की नींव रखने को प्रेरित किया।</p>
<p style="text-align: justify;">हालांकि स्वर्गीय <strong><a href="http://rgurbaxani.blogspot.com/2010/02/phalke.html">दादा साहब फालके को भारतीय सिनेमा का जनक </a></strong>होने और पूरी लंबाई के कथाचित्र बनाने का गौरव हासिल है लेकिन उनसे पहले भी महाराष्ट्र में फिल्म निर्माण के कई प्रयास हुए। लुमीयर बंधुओं की फिल्मों के प्रदर्शन के एक वर्ष के भीतर सखाराम भाटवाडेकर उर्फ सवे दादा ने फिल्म बनाने की कोशिश की। उन्होंने पुंडलीक और कृष्ण नाहवी के बीच कुश्ती फिल्मायी थी। यह कुश्ती इसी उद्देश्य से विशेष रूप से बंबई के हैंगिंग गार्डन में आयोजित की गयी थी। शूटिंग के बाद फिल्म को प्रोसेसिंग के लिए इंग्लैंड भेजा गया। वहां से जब वह फिल्म प्रोसेस होकर आयी तो सवे दादा अपने काम का नतीजा देख कर बहुत खुश हुए। पहली बार यह फिल्म रात के वक्त बंबई के खुले मैदान में दिखायी गयी। उसके बाद उन्होंने अपनी यह फिल्म पेरी थिएटर में प्रदर्शित की । टिकट की दर थी आठ आना से तीन रुपये तक। अकसर हर शो में उनको 300 रुपये तक मिल जाते थे। उन्होने भगवान कृष्ण के जीवन पर भी एक फिल्म बनाने का निश्चय किया था लेकिन भाई की मौत ने उन्हें तोड़ दिया। उन्होंने अपना कैमरा बेच दिया और फिल्म निर्माण बंद कर दिया।</p>
<p style="text-align: justify;"><span style="font-size: 13.3333px;">इसके बाद 1911 में अनंतराम परशुराम कशंडीकर, एस एन पाटंकर और वी पी दिवाकर ने यह कोशिश जारी रखी। 1920 में इन्होंने बालगंगाधर तिलक की अंत्येष्टि की फिल्म बनायी। 1912 में उन्होंने 1000 फुट की एक फिल्म ‘ सावित्री’ बनायी। यह धार्मिक फिल्में बनाने की शुरुआत थी। नारायण गोविंद चित्रे और आर पी टिपणीस ने दादा साहब तोर्ने के निर्देशन में नाटक ‘ पुंडलीक ’ फिल्मा डाला और इसे 1909 में कोरोनेशन थिएटर बंबई में प्रदर्शित किया गया। कलकत्ता में हीरालाल सेन, धीरेन गांगुली, मद्रास में नटराज मुदलियार, महाराष्ट्र में बाबूराव पेंटर तथा अन्य लोग भी इस दिशा में सक्रिय थे।</span></p>
<p style="text-align: justify;">तसवीरें चलती-फिरती हैं, हंसती तथा इशारे करती हैं , सुन कर लोगों को बड़ा आश्चर्य हुआ। न बोलनेवाली उन तसवीरों को देखने के लिए लोग उतावले हो उठे। पांच दशक पूर्व ‘ टूरिंग टाकीज’ यानी चलते-फिरते सिनेमा अधिक थे। किसी बड़ी आबादी वाले शहर या कस्बे में तंबू तान दिया , दीवार कि जगह टीन लगा दी और सिनेमा शुरू । उस जमाने में एक ही प्रोज्क्टर होता था इसलिए फिल्म जितने रीलों की होती थी, उतनी बार प्रोजेक्टर रोकना पड़ता था और उतने ही मध्यांतर हुआ करते थे । परदे के पास बैठनेवाले दर्शकों के लिए काठ की फोल्डिंग कुर्सियां हुआ करती थीं। फिल्म में आवाज के सिवा सब कुछ होता था- बातचीत का हावभाव, मारपीट, घुड़सवारी वगैरह। सिनेमा की लोकप्रियता बढ़ी, तो धीरे-धीरे कुछ सिनेमाघर भी बनने लगे। चूंकि वह अवाक फिल्मों का युग था इसलिए कहीं-कहीं पर सिनेमा प्रोजेक्टर का आपरेटर दर्शकों को समझाने के लिए फिल्म की कहानी उसी तरह बताता जाता था, जिस तरह आजकल कमेंटेटर खेल का आंखों देखा हाल बताता है। जब खलनायक के चंगुल में फंसी नायिका सहायता के लिए चिल्लाती और नायक घोड़ा दौड़ाता हुआ आता, तो आपरेटर घोड़ों की टापों की आवाज सुनाते हुए बताता-अब आ रहा है नायिका का बहादुर प्रेमी, जो खलनायक को मार-मार कर भुरता बना देगा। कभी-कभी फिल्म के संवाद परदे पर लिखे दिखते थे। अगर फिल्म की कहानी आगे छलांग लगवानी होती तो बीच की घटनाएं लिख कर बता दी जाती थीं।</p>
<p style="text-align: justify;"><a rel="attachment wp-att-7962" href="http://www.janokti.com/hindi-news-media-%e0%a4%9a%e0%a5%8c%e0%a4%a5%e0%a4%be-%e0%a4%96%e0%a4%82%e0%a4%ad%e0%a4%be-cinema-media-blog-fourth-pilar/cinema-film-tv-%e0%a4%b8%e0%a4%bf%e0%a4%a8%e0%a5%87%e0%a4%ae%e0%a4%be-%e0%a4%ab%e0%a4%bf%e0%a4%b2%e0%a5%8d%e0%a4%ae%e0%a4%9f%e0%a5%80%e0%a4%b5%e0%a5%80/%e0%a4%b9%e0%a4%bf%e0%a4%82%e0%a4%a6%e0%a5%80-%e0%a4%b8%e0%a4%bf%e0%a4%a8%e0%a5%87%e0%a4%ae%e0%a4%be-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%b8%e0%a4%ab%e0%a4%bc%e0%a4%b0-hindi-cinema-ka-itihaas/attachment/kalyamardan2/"><img class="alignright size-medium wp-image-7962" title="kalyamardan2" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/kalyamardan2-300x227.jpg" alt="" width="300" height="227" /></a>अवाक फिल्मों के जमाने में लोग चलती-फिरती तसवीरों का आनंद लेने जाते थे। फिल्म में कौन काम कर रहा है, इसके प्रति उनका विशेष आकर्षण नहीं था। कलाकारों की लोकप्रियता तो तब बढ़ी , जब फिल्में बोलने लगीं । प्रारंभ में धार्मिक फिल्में ही ज्यादा बनती थीं। भारत की पहली फिल्म ‘राजा हरिश्चंद्र ’ भी धार्मिक फिल्म थी। उस समय की कुछ प्रमुख अवाक धार्मिक फिल्में थीं फालके फिल्म कंपनी की- <strong>राजा हरिश्चंद्र, भस्मासुर मोहनी, सत्यवान-सावित्री और लंका दहन, हिंदुस्तान फिल्म कंपनी की –कृष्ण जन्म, कालिया मर्दन, बालि-सुग्रीव, नल-दमयंती, परशुराम, दक्ष प्रजापति, सत्यभामा विवाह, द्रौपदी वस्त्रहरण, जरासंध वध, शिशुपाल वध, लव-कुश, सती महानंदा और सेतुबंधन,</strong> महाराष्ट्र फिल्म कंपनी की-<strong> वत्सला हरण, गज गौरी, कृष्णावतार, सती पद्मिनी, सावित्री, मुरलीवाला तथा लंका, </strong>प्रभात फिल्म कंपनी की-गोपालकृष्ण। इसके अलावा कुछ और प्रयास हुए, जिनमें दादा साहब फालके की 1932 में बनी अवाक फिल्म ‘ श्यामसुंदर’।</p>
<p style="text-align: justify;">उस वक्त धार्मिक फिल्मों की एक तरह से बाढ़ आ गयी थी। इसकी वजह यह <span style="font-size: 13.3333px;">कि उन दिनों भारतीय मानस में धर्म बड़े गहरे तक पैठा था और उसके प्रति लोगों में गहरी आस्था थी।<strong> नाटकों और रामलीला </strong>में धार्मिक कथाएं दिखायी जाती थीं, धार्मिक कथाओं से लोगों ने एक तादाम्य-सा स्थापित कर लिया था,इसलिए ऐसी फिल्में समझने में दिक्कत नहीं होती थी। उन दिनों धार्मिक –पौराणिक फिल्में कामयाब भी होती थीं। ऐसा नहीं है कि तब अन्य किस्म की फिल्में नहीं बनती थीं, लेकिन प्रधानता धार्मिक फिल्मों की थी। यहां यह जिक्र करना जरूरी है कि महिला पात्र की भूमिका निभाने के लिए महिलाएं काफी अरसे तक नहीं मिलीं। हिंदुस्तान फिल्म कंपनी की ‘कीचक वध’ तक यह स्थिति बरकरार रही। इस फिल्म में भी कीचक की पत्नी की भूमिका सखाराम जाधव नामक एक युवक ने की थी। इन सारी मुसीबतों और अड़चनों के बावजूद धार्मिक फिल्मों की यात्रा जारी रही और बोलती फिल्मों के युग तक इनका सिलसिला चलता रहा। इनके कथानक का आधार मूलतः रामायण व महाभारत जैसे महाकाव्य होते थे। राम-कृष्ण की जीवनलीला पर फिल्में बनीं , हनुमान जी पर और संतो-देवताओं पर फिल्में बनीं।</span></p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">बाद में मां की भूमिकाओं के लिए मशहूर निरुपा राय कभी धार्मिक फिल्मों की मशहूर अभिनेत्री थीं। उन्होंने कुल मिला कर तकरीबन 40 धार्मिक-पौराणिक फिल्मों में काम किया। वे चार फिल्मों में पार्वती और तीन में सीता की भूमिका में आयी थीं। परदे की देवी के रूप में वे इतना ख्यात हो गयी थीं कि जब उन्होंने ‘सिंदबाद द सेलर’, ‘चालबाज’ और ‘बाजीगर’ जैसी स्टंट फिल्मों में काम किया , तो दर्शकों का उनकी इन फिल्मों के प्रति रुख अच्छा नहीं रहा। धार्मिक फिल्मों में उनकी कितनी धूम थी , इसका पता इससे चलता है कि लोग जिन सिनेमाघरों में उनकी धार्मिक फिल्में देखने जाते, वहां पूजा करते थे। उनकी धार्मिक फिल्में थीं-महासती सावित्री, सती मदालसा, नवरात्रि, चक्रधारी, रामस्वामी, वामन अवतार,गौरी पूजा, शेषनाग, अप्सरा, चंडी पूजा, जय हनुमान, राम हनुमान युद्ध, नागमणि, श्री रामभक्त विभीषण, नरसी भगत, हर हर महादेव, द्वारकाधीश आदि। इसके बाद उन्होंने कई सामाजिक फिल्मों में भूमिकाएं निभायीं और बाद में चरित्र भूमिकाएं करने लगीं। जयश्री गड़कर भी धार्मिक फिल्मों की होरोइन के रूप में काफी ख्यात हुईं। अपने जमाने में शोभना समर्थ भी धार्मिक फिल्म ‘रामराज्य’ की सीता के रूप में बहुत ख्यात हुईं। बाद के दिनों में अनिता गुहा, कानन कौशल आदि काफी लोकप्रिय हुईं।</p>
<p style="text-align: justify;">बहरहाल, फिल्मों के निर्माण के शुरू के दौर में 60 प्रतिशत से भी अधिक फिल्में धार्मिक-पौराणिक कथानक पर बनती थीं। बाद के वक्त में बेरोजगारी से पीड़ित युवा वर्ग की रुचि धर्म में नहीं रह गयी। वह रोजी-रोटी की जुगाड़ में तबाह रहने लगा। ऐसे में धार्मिक फंतासी से उसे खुशी नहीं मिलती थी। वह हलकी-फुलकी मनोरंजक फिल्मों की ओर मुड़ गया। <strong>धार्मिक फिल्मों से युवा वर्ग विमुख हुआ,</strong> तो ऐसी फिल्में महज पुरानी पीढ़ी के लोगों तक सीमित रह गयीं।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>धार्मिक फिल्मों के बाद <a href="http://www.google.co.in/search?sourceid=chrome&amp;ie=UTF-8&amp;q=%E0%A4%90%E0%A4%A4%E0%A4%BF%E0%A4%B9%E0%A4%BE%E0%A4%B8%E0%A4%BF%E0%A4%95+%E0%A4%AB%E0%A4%BF%E0%A4%B2%E0%A5%8D%E0%A4%AE%E0%A5%8B%E0%A4%82">ऐतिहासिक फिल्मों </a>का दौर आया</strong>। यह भी काफी लंबा खिंचा। रंजीत स्टूडियो ने 1934 में ‘राजपूतानी’ पेश की। इतिहास के प्रसिद्ध चरित्रों और घटनाओं पर फिल्में बनने लगीं। उस वक्त देश का माहौल ऐसा था , जिसमें ऐसी फिल्में महत्वपूर्ण भूमिकाएं निभा सकती थीं।<strong><a href="http://www.google.co.in/search?sourceid=chrome&amp;ie=UTF-8&amp;q=%E0%A4%B5%E0%A5%80.+%E0%A4%B6%E0%A4%BE%E0%A4%82%E0%A4%A4%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%AE"> वी. शांताराम </a></strong>ने एक फिल्म निर्देशित की ‘उदय काल’ जिसका नाम उन्होंने ‘फ्लैग आफ फ्रीडम’ (स्वराज्य तोरण) रखा। भला अंग्रेज सरकार को यह नाम क्यों भाने लगा। इस नाम पर एतराज हुआ और यह फिल्म ‘थंडर आफ हिल्स’ बन गयी। यह फिल्म वी. शांताराम ने प्रभात फिल्म कंपनी के बैनर में बनायी थी और इसमें उनकी शिवाजी की भूमिका की बड़ी प्रशंसा हुई थी। 18 नवंबर 1901 को महाराष्ट्र के कोल्हापुर में जन्में वणकुद्रे शांताराम ने 12 वर्ष की अल्पायु में गंधर्व नाटक मंडली कोल्हापुर में छोटी-छोटी भूमिकाओं से अपना कैरियर शुरू किया। धीरे-धीरे अपनी मेहनत और लगन से आगे बढ़ते गये। 1929 में उन्होंने कोल्हापुर में प्रभात फिल्म कंपनी चार अन्य लोगों की मदद से स्थापित की। इसके अंतर्गत उन्होंने ‘माई क्वीन’ (रानी साहिबा) , ‘फाइटिंग ब्लेड (खूनी खंजर), चंद्रसेना और स्टोलन ब्राइड (जुल्म) बनायी। उनकी ये सभी फिल्में अवाक थीं।1931 में ‘आलमआरा’ से नयी क्रांति आयी। फिल्मों ने बोलना सीख लिया। अब तक फिल्में शैशव को पीछे छोड़ किशोरावस्था में पहुंच चुकी थीं। बोलती फिल्मों का युग आया , तो शांताराम की फिल्मों का भी नया दौर आया। उनकी पहली बोलती फिल्म थी ‘अयोध्या का राजा’ (1932)। 1942 में उन्होंने बंबई में राजकमल कलामंदिर की स्थापना की। प्रभात फिल्म कंपनी के बैनर में ‘<strong>जलती निशानी’, ‘सैरंध्री’, ‘अमृत मंथन’, ‘धर्मात्मा’, ‘अमर ज्योति’, के अलावा ‘दुनिया न माने’, ‘आदमी’ और ‘पड़ोसी’ जैसी सोद्देश्य फिल्में देने के बाद उन्होंने राजकमल कलामंदिर के बैनर तले ‘शकुंतला’, ‘माली’, ‘पर्वत पर अपना डेरा’, ‘डाक्टर कोटणीस की अमर कहानी’, ‘मतवाला शायर’, ‘अंधों की दुनिया’, ‘बनवासी’, ‘भूल’, ‘अपना देश’, ‘दहेज’, ‘परछाईं’, ‘अमर भोपाली’, ‘सुंरग’, ‘सुबह का तारा’, ‘झनक झनक पायल बाजे’, ‘तूफान और दिया’, ‘दो आंखें और बारह हाथ’, ‘नवरग’, ‘फूल और कलियां’, ‘स्त्री’, ‘सेहरा’, ‘गीत गाया पत्थरों ने’, ‘लड़की सहयाद्री की’,‘बूंद जो बन गयी मोती’, ‘जल बिन मछली नृत्य बिन बिजली’ </strong>बनायी। शांताराम की फिल्मों की एक विशेषता रही है कि वे हर मायने में औरों से अलग होतीं। प्रस्तुतीकरण में नवीनता, संगीत में नवीनता और गायन में भी नवीनता |</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">रामशास्त्री’ प्रभात चित्र ने उस वक्त बनायी थी, जब वी. शांताराम प्रभात को छोड़ चुके थे। यह फिल्म पेशवाओं के युग के इतिहास पर आधारित भारत की श्रेष्ठ ऐतिहासिक फिल्म थी। इतने ऊंचे स्तर की ऐतिहासिक फिल्म उसके बाद नहीं बनायी जा सकी। इस फिल्म को देख कर ही सत्यजित राय फिल्म निर्माण के लिए प्रेरित हुए। पेशवाओं के शासन के वक्त की सही स्थिति को फिल्म में पेश करने का पूरी ईमानदारी से प्रयास किया गया था। कहते हैं कि निर्माता एस फत्तेहलाल ने इसकी शूटिंग की हुई कई हजार फुट फिल्म रद्द करने की जिद की थी, क्योंकि उनका विश्वास था कि यह फिल्म उतनी व्यावसायिक नहीं बन पायी, जितना वे चाहते थे। इसकी पटकथा और संवाद शिवराम वासीकर ने लिखे थे। कोई ऐतिहासिक चूक न रह जाये , इसके लिए पटकथा लेखन के वक्त प्रख्यात इतिहासकारों तक से सलाह ली गयी थी। इस फिल्म में संस्कृत के विद्वान रामशास्त्री द्वारा सत्तालोलुप पेशवा को सन्मार्ग पर लाने के प्रयास की कहानी कही गयी थी। इस फिल्म के तीन निर्देशक थे। इसकी शुरुआती शूटिंग के कुछ अरसा बाद ही राजा नेने ने प्रभात छोड़ दिया। इसके बाद विश्राम बेड़कर ने निर्देशन संभाला, लेकिन उन्होंने भी यह कंपनी छोड़ दी। अंततः गजानन जागीरदार के निर्देशन में यह फिल्म पूरी हुई। गजानन जागीरदार ने इसमें रामशास्त्री की भूमिका भी की थी। ललिता पवार आनंदीबाई बनी थीं । रामशास्त्री के बचपन की भूमिका में अनंत मराठे ने और पत्नी की भूमिका बेबी शकुंतला ने निभायी थी। सप्रू पेशवा माधवराव बने थे।</p>
<p style="text-align: justify;">वैसे भारत की पहली ऐतिहासिक फिल्म ‘नूरजहां’ 1932 में बनायी गयी थी। इसका निर्माण अर्देशीर ईरानी ने किया था। इस फिल्म का निर्देशन हालीवुड में फिल्म निर्माण का व्यावहारिक ज्ञान प्राप्त करने वाले एजरा मीर ने किया था। यह पहले अवाक फिल्म के रूप में बनायी गयी थी। बाद में बोलती फिल्मों का युग आते ही इसके कुछ खास हिस्से हिंदी और अंग्रेजी भाषा में डब कर दिये गये। इसके मुख्य कलाकार थे –मजहर खान (पुराने) जमशेदजी , जिल्लू न्यामपल्ली, मुबारक और विमला। इस फिल्म के दोनों संस्करण (हिंदी-अंग्रेजी) बाक्स आफिस पर पिट गये। इसके बाद रमाशंकर चौधरी की फिल्म ‘अनारकली’ आयी। यह भी कोई प्रभाव नहीं छोड़ सकी।हालांकि अवाक ‘अनारकली’ खूब चली थी। ऐतिहासिक फिल्मों को नयी जान दी सोहराब मोदी की फिल्म ‘पुकार’ (1939)ने । यह फिल्म बेहद कामयाब रही। और इसने ऐतिहासिक फिल्मों के लिए नयी राह खोल दी। मिनर्वा मूवीटोन की इस फिल्म में चंद्रशेखर, नसीम बानो, सोहराब मोदी और सरदार अख्तर ने प्रमुख भूमिकाएं निभायी थीं। यह फिल्म जहांगीर की इंसाफपरस्ती को दरसाती थी। सोहराब मोदी ने सर्वाधिक ऐतिहासिक फिल्में बनायीं। इनमें –सिकंदर, पृथ्वीवल्लभ, झांसी की रानी, मिर्जा गालिब, एक दिन का सुलतान, शीशमहल तथा राजहठ शामिल हैं।</p>
<p style="text-align: justify;"><a rel="attachment wp-att-7963" href="http://www.janokti.com/hindi-news-media-%e0%a4%9a%e0%a5%8c%e0%a4%a5%e0%a4%be-%e0%a4%96%e0%a4%82%e0%a4%ad%e0%a4%be-cinema-media-blog-fourth-pilar/cinema-film-tv-%e0%a4%b8%e0%a4%bf%e0%a4%a8%e0%a5%87%e0%a4%ae%e0%a4%be-%e0%a4%ab%e0%a4%bf%e0%a4%b2%e0%a5%8d%e0%a4%ae%e0%a4%9f%e0%a5%80%e0%a4%b5%e0%a5%80/%e0%a4%b9%e0%a4%bf%e0%a4%82%e0%a4%a6%e0%a5%80-%e0%a4%b8%e0%a4%bf%e0%a4%a8%e0%a5%87%e0%a4%ae%e0%a4%be-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%b8%e0%a4%ab%e0%a4%bc%e0%a4%b0-hindi-cinema-ka-itihaas/attachment/mughle-ajam/"><img class="alignleft size-medium wp-image-7963" title="mughle ajam" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/mughle-ajam-300x300.jpg" alt="" width="300" height="300" /></a>अन्य उल्लेखनीय ऐतिहासिक फिल्में हैं-के आसिफ कृत स्टर्लिंग इन्वेस्टमेंट कारपोरेशन लिमिटेड की अविस्मरणीय फिल्म<strong> ‘मुगले आजम’।</strong> इसमें दिलीप कुमार , मधुबाला, पृथ्वीराज कपूर और दुर्गा खोटे की प्रमुख भूमिकाएं थीं। संगीतकार नौशाद ने इसका बड़ा ही पुरअसर और कर्णप्रिय संगीत दिया था। सलीम और अनारकली की प्रेमकथा पर आधारित कई फिल्में बनीं, जिनमें एक फिल्मिस्तान की ‘अनारकली’ भी थी। इसमें प्रदीप कुमार और वीणा राय की प्रमुख भूमिकाएं थीं। संगीतकार सी. रामचंद्र ने इसका बड़ा सुरीला संगीत दिया था। इसके गीत बहुत लोकप्रिय हुए थे। यह फिल्म भी बहुत सफल हुई थी। इस जोड़ी की एक और सफल फिल्म थी ‘ताजमहल’। इसके अलावा ऐतिहासिक कथानक पर कई फिल्में बनती रहीं। यहां तक कि सत्यजित राय की ‘शतरंज का खिलाड़ी’ तक यह सिलसिला चलता रहा। कमाल अमरोही ने ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर ‘ रजिया सुलतान’ बनायी जिसमें धर्मेंद्र और हेमा मालिनी की प्रमुख भूमिकाएं थीं। संवादों के कठिन होने के चलते यह फिल्म दर्शकों के सिर के ऊपर से गुजर गयी। किसी को समझ न आने के कारण यह बाक्स आफिस पर पिट गयी हालांकि इसके भव्य सेटों की काफी प्रशंसा हुई। नायकों में प्रदीप कुमार ऐतिहासिक फिल्मों के काफी लोकप्रिय नायक थे। धीरे-धीरे फार्मूला फिल्मों की भीड़ में ऐतिहासिक फिल्में कहीं दब गयीं।</p>
<p style="text-align: justify;">अवाक फिल्मों के जमाने में लोग चलती-फिरती तस्वीरों का आनंद लेते थे। फिल्म में कौन-कौन काम रहा है, इसके प्रति उनका कोई आकर्षण नहीं था। कलाकारों की लोकप्रियता तब बढ़ी , जब फिल्में बोलने लगीं। आरंभ से ही दो तरह की फिल्में ज्यादा बनती थीं। धार्मिक-ऐतिहासिक या मारधाड़वाली स्टंट फिल्में, ऐतिहासिक फिल्में। ऐतिहासिक फिल्मों के लोकप्रिय होने का कारण यह था कि एक तो इनके सेट भव्य होते थे और युद्ध के दृश्य होते थे। सबसे बड़ा आकर्षण यह था कि दर्शक को यह पता होता था कि वह सच्ची कहानी देख रहा है। मारधाड़वाली फिल्मों की सबसे लोकप्रिय जोड़ी थी-नाडिया-जानकावस की। ये तो उन दिनों स्टंट फिल्मों के सुपर स्टार माने ही जाने जाते थे, इनके साथ काम करने वाला घोड़ा पंजाब का बेटा भी किसी सुपर स्टार से कम नहीं था। जिस फिल्म में ये तीनों होते थे वह फिल्म सुपर हिट होती थी। नाडिया वह नायिका थी जिसके हाव-भाव, अभिनय और आचरण पुरुषों जैसे थे। काले रंग का जैकेट और नकाब , हाथ में लपलपाता हंटर या चमचमाती तलवार, यही पोशाक थी उसकी। वह ऊंची जगह पर खड़ी होकर मुंह में दो उंगलियां डाल कर सीटी बजाती , तो घोड़ा पंजाब का बेटा भागता हुआ वहां आ खड़ा होता, जहां से कूद कर नाडिया को उसकी पीठ पर बैठना था, दूसरी सीटी बजते ही घोड़ा सतर्क हो जाता और नाडिया के कूद कर बैठते ही भाग खड़ा होता। ये तीनों उस जमाने में उतने लोकप्रिय थे , जितने आज के नामी कलाकार । वाडिया ब्रदर्स की फिल्मों में यह जोड़ी पेश की गयी। इस जोड़ी की सर्वाधिक हिट फिल्म थी ‘हंटरवाली’। ( क्रमशः )</p>
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