﻿						
<?xml version="1.0" encoding="UTF-8"?>
<rss version="2.0"
	xmlns:content="http://purl.org/rss/1.0/modules/content/"
	xmlns:wfw="http://wellformedweb.org/CommentAPI/"
	xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/"
	xmlns:atom="http://www.w3.org/2005/Atom"
	xmlns:sy="http://purl.org/rss/1.0/modules/syndication/"
	xmlns:slash="http://purl.org/rss/1.0/modules/slash/"
	>

<channel>
	<title>JANOKTI : जनोक्ति :  राज-समाज और जन की आवाज &#187; human being</title>
	<atom:link href="http://www.janokti.com/tag/human-being/feed/" rel="self" type="application/rss+xml" />
	<link>http://www.janokti.com</link>
	<description>Daily news analysis , Hindi samachar ,Hindi magazine,Hindi website,a6V3sbK3z0d4m7JTOT6OQOVo1jQ</description>
	<lastBuildDate>Mon, 06 Feb 2012 20:00:01 +0000</lastBuildDate>
	<language>en</language>
	<sy:updatePeriod>hourly</sy:updatePeriod>
	<sy:updateFrequency>1</sy:updateFrequency>
	<generator>http://wordpress.org/?v=3.1.4</generator>
		<item>
		<title>कब मिलेगा आधी आबादी को पूरा हक़ ?</title>
		<link>http://www.janokti.com/discussion-suggestions-%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%9a%e0%a4%be%e0%a4%b0-%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%ae%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%b6/%e0%a4%95%e0%a4%ac-%e0%a4%ae%e0%a4%bf%e0%a4%b2%e0%a5%87%e0%a4%97%e0%a4%be-%e0%a4%86%e0%a4%a7%e0%a5%80-%e0%a4%86%e0%a4%ac%e0%a4%be%e0%a4%a6%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a5%8b-%e0%a4%aa%e0%a5%82%e0%a4%b0/</link>
		<comments>http://www.janokti.com/discussion-suggestions-%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%9a%e0%a4%be%e0%a4%b0-%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%ae%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%b6/%e0%a4%95%e0%a4%ac-%e0%a4%ae%e0%a4%bf%e0%a4%b2%e0%a5%87%e0%a4%97%e0%a4%be-%e0%a4%86%e0%a4%a7%e0%a5%80-%e0%a4%86%e0%a4%ac%e0%a4%be%e0%a4%a6%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a5%8b-%e0%a4%aa%e0%a5%82%e0%a4%b0/#comments</comments>
		<pubDate>Tue, 27 Apr 2010 13:26:24 +0000</pubDate>
		<dc:creator>कीर्ति सिंह</dc:creator>
				<category><![CDATA[नारी]]></category>
		<category><![CDATA[विचार -विमर्श]]></category>
		<category><![CDATA[democracy]]></category>
		<category><![CDATA[human being]]></category>
		<category><![CDATA[india]]></category>
		<category><![CDATA[indian culture]]></category>
		<category><![CDATA[indian heritage]]></category>
		<category><![CDATA[indian mythology]]></category>
		<category><![CDATA[politics]]></category>
		<category><![CDATA[women reservation bill]]></category>
		<category><![CDATA[महिला आरक्षण बिल]]></category>
		<category><![CDATA[महिला सशक्तिकरण]]></category>

		<guid isPermaLink="false">http://www.janokti.com/?p=2669</guid>
		<description><![CDATA[आलेख : &#8211; कीर्ति सिंह , सहायक संपादक मीडियामोर्चा , पटना आधी आबादी का सच यह है कि आज भी आजादी के वर्षों बाद पूरी तरह से सशक्तिकरण नहीं हो पाया है। महिला सशक्तिकरण, कितना हकीकत, कितना फसाना है बन ]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><strong>आलेख : &#8211; <em><span style="color: #0000ff;">कीर्ति सिंह</span></em><span style="color: #0000ff;"> </span>, सहायक संपादक मीडियामोर्चा , पटना</strong></p>
<p style="text-align: justify;"><strong><span style="font-weight: normal;"><img class="alignright size-full wp-image-2671" title="indianwomen-300x206" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2010/04/indianwomen-300x2061.jpg" alt="" width="300" height="206" />आधी आबादी का सच यह है कि आज भी आजादी के वर्षों बाद पूरी तरह से सशक्तिकरण नहीं हो पाया है। महिला सशक्तिकरण, कितना हकीकत, कितना फसाना है बन कर रह गया है। इसे खुली आंखों से देखा, समझा जा सकता है।</span></strong></p>
<p style="text-align: justify;">पिछले ही दिनों संसद में तैंतीस प्रतिशत महिला आरक्षण विधेयक के पेश होने से देश भर में महिला सशक्तिकरण को मुकाम दिलाने में सक्रिय संगठनों/लोगों में उत्साहमयी माहौल देखने को मिला। लेकिन सवाल भी उठा कि इससे क्या आधी आबादी का पूरा सशक्तिकरण होगा ? महाराष्ट्र, बिहार, पंजाब या फिर देश का वह हिस्सा जहां आधी आबादी अभी भी गांव में रहती है, जो सुबह उठते ही गौशाला से गोबार निकालकर उपले ठोंकती है, घरवालों और पशुओं को खाना खिलाती है और फिर खेत-खलिहान का रूख लेती है या फिर मनरेगा के तहत पोखर खोदने वाली, सड़क निर्माण कार्य में लगी या फिर शहरों में सड़क निमार्ण के लिए तपती धूप में गिट्टी तोड़ती, वह आधी आबादी क्या सशक्तिकरण की भागीदारी उस मायने में बन सकती है ? जिस मायने में शहर की आधी आबादी बनती है ? या फिर नेताओं, अफसरों और समाज के सभ्य आधी आबादी ही हर बार की तरह फायदा उठायेंगी ? हालांकि होता यही है।</p>
<p style="text-align: justify;">देश में आज भी आधी आबादी सबसे ज्यादा गांवों में रहती है, जो सुबह से लेकर देर शाम तक सिर्फ काम ही काम करती है। उनका सशक्तिकरण बस मनरेगा में सौ दिन रोजगार या फिर थोड़ा सा सरकारी सहायता भर से ही होता रहता है। हकीकत यह है कि आज भी शहरी और ग्रामीण आधी आबादी में सशक्तिकरण की बागडोर मजबूत नहीं है। बराबरी नहीं है। आधी आबादी की सशक्तिकरण पर थोड़ा जोर दें, तो आज जो महिलाएं शिखर पर हैं, उन्होंने अपने बलबूते एक नई दिशा दी है। किरण बेदी, सानिया मिर्जा, संतोष यादव, पी.टी. उषा, सरीखे आधी आबादी की संख्या अंगुलियों पर है। ये सच है कि आज हर क्षेत्र में आधी आबादी ने जोरदार ढंग से कब्जा जमाया है। लेकिन आज भी गांव की कजरी ओपले ही ठोंक रही है और धनिया जी.टी. रोड के किनारे सड़क निर्माण में लगने वाले गिट्टी तोड़ने का काम चिलचिलाती धूप में कर रही है। उनकी बेटियां भी पास में ही गोबर और गिट्टी से खेलती नजर आती हैं। उनके सामने उनका सशक्तिकरण सबसे बड़ा सवाल है। कहने के लिए तो महिला सशक्तिकरण शिक्षा का अधिकार और न जाने कितने मौलिक अधिकार है, जो हमें बेहतर दिशा देते हुए चमकते हुए सूरज की तरह दिखते है लेकिन उसकी रोशनी कजरी और धनिया क्या उसकी बेटी तक भी नहीं पहुंच पाती है। ऐसे में महिला आरक्षण विधेयक का सबसे ज्यादा फायदा किससे होगा, यह एक सवाल है। क्या इससे महिला सशक्तिकरण और मजबूत होगा? और महिला सशक्तिकरण अगर मजबूत होगा तो इसके दायरे में क्या कजरी या धनिया आयेंगी ? या फिर नेताजी/अफसर और सभ्रांत परिवार की बेटी-पत्नी-बहु का ही केवल महिला आरक्षण विधेयक से महिला सशक्तिकरण होगा। मौजूदा संसद में लोकसभा में 59 महिलाएं है। इनमें चालीस सांसद करोड़पति हैं, जाहिर है राजनीति मंें जो महिलाएं आ रही है अधिकतर सम्पन्न वर्ग से। निचले तबके की जो महिलाएं राजनीति में है वह अंतिम कतार में आज भी खड़ी हैं। भूले भटके से एकाध महिलाएं आरक्षित सीट के तहत आ भी गयी तो बहुत बड़ी बात है।</p>
<p style="text-align: justify;">बात महिला आरक्षण विधेयक की नहीं है। बात है आधी आबादी में सभी को बराबरी का दर्जा मिलने की। हक मिलने की। जो महिलाओं के बीच वर्ग संधर्ष , ,गैरबराबरी  है, नीच उच्च  है, गरीब- अमीर , दलित-पिछड़ा-सवर्ण का वर्ग है। उसकी दीवारें ढहनी चाहिए और आधी आबादी में अंतिम कतार में खड़ी कजरी और धनिया को भी इसका फायदा मिलना चाहिए। उसे भी उन महिलाओं के बराबर खड़ा होना चाहिए जो शिखर पर हैं। आरक्षण ही सही अगर महिला विधेयक आरक्षण से महिला सशक्तिकरण को मजबूती मिलती है, खासकर अंतिम कतार में खड़ी विकास से दूर आधी आबादी इसे जुड़ती है तो यकीनन एक बहुत बड़ा बदलाव होगा और जब यह बदलाव राजनीतिक स्तर पर होगा तो, स्वतः शेष स्तर  पर अपने आप बदलाव होने लगेगा। गांव की कजरी या फिर झुग्गी-झोपड़ी में रहने वाली धनिया संसद पहुंचेगी तो उसके अंदर की टीस अपनी ही तरह आधी आबादी को आगे लाने के लिए महिला सशक्तिकरण को और मजबूत करेगी।</p>
]]></content:encoded>
			<wfw:commentRss>http://www.janokti.com/discussion-suggestions-%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%9a%e0%a4%be%e0%a4%b0-%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%ae%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%b6/%e0%a4%95%e0%a4%ac-%e0%a4%ae%e0%a4%bf%e0%a4%b2%e0%a5%87%e0%a4%97%e0%a4%be-%e0%a4%86%e0%a4%a7%e0%a5%80-%e0%a4%86%e0%a4%ac%e0%a4%be%e0%a4%a6%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a5%8b-%e0%a4%aa%e0%a5%82%e0%a4%b0/feed/</wfw:commentRss>
		<slash:comments>0</slash:comments>
		</item>
		<item>
		<title>नारी की आज़ादी</title>
		<link>http://www.janokti.com/discussion-suggestions-%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%9a%e0%a4%be%e0%a4%b0-%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%ae%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%b6/women-%e0%a4%a8%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a5%80/%e0%a4%a8%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%86%e0%a5%9b%e0%a4%be%e0%a4%a6%e0%a5%80/</link>
		<comments>http://www.janokti.com/discussion-suggestions-%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%9a%e0%a4%be%e0%a4%b0-%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%ae%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%b6/women-%e0%a4%a8%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a5%80/%e0%a4%a8%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%86%e0%a5%9b%e0%a4%be%e0%a4%a6%e0%a5%80/#comments</comments>
		<pubDate>Tue, 06 Apr 2010 17:02:30 +0000</pubDate>
		<dc:creator>जनोक्ति डेस्क</dc:creator>
				<category><![CDATA[नारी]]></category>
		<category><![CDATA[democracy]]></category>
		<category><![CDATA[human being]]></category>
		<category><![CDATA[india]]></category>
		<category><![CDATA[indian culture]]></category>
		<category><![CDATA[indian heritage]]></category>
		<category><![CDATA[indian mythology]]></category>
		<category><![CDATA[politics]]></category>
		<category><![CDATA[women reservation bill]]></category>
		<category><![CDATA[महिला आरक्षण बिल]]></category>
		<category><![CDATA[महिला सशक्तिकरण]]></category>

		<guid isPermaLink="false">http://www.janokti.com/?p=2380</guid>
		<description><![CDATA[पिछले कई दशक से हमारे समाज में महिलाओं को पुरुषों के बराबर का दर्जा देने के सम्बन्ध में एक निर्थक सी बहस चल रही है. जिसे कभी महिला वर्ष मना कर तो कभी विभिन्न संगठनो द्वारा नारी मुक्ति मंच बनाकर ]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<blockquote>
<p style="text-align: center;">पिछले कई दशक से हमारे समाज में महिलाओं को पुरुषों के बराबर का दर्जा देने के सम्बन्ध में एक निर्थक सी बहस चल रही है. जिसे कभी महिला वर्ष मना कर तो कभी विभिन्न संगठनो द्वारा नारी मुक्ति मंच बनाकर पुनर्जीवित करने का प्रयास किया जाता रहा है. समय समय पर बिभिन्न राजनैतिक, सामाजिक और यहाँ तक की धार्मिक  संगठन भी अपने विवादास्पद बयानों के द्वारा खुद को लाइम लाएट में बनाए रखने के लोभ से कुछ को नहीं बचा पाते. पर इस आन्दोलन के खोखलेपन से कोई भी अनभिज्ञ नहीं है शायद तभी यह हर साल किसी न किसी विवादास्पद बयान के बाद कुछ दिन के लिए ये मुद्दा गरमा जाता है. और फिर एक आध हफ्ते सुर्खिओं से रह कर अपनी शीत निद्रा ने चला जाता है. हद तो तब  हुई जब स्वतंत्र भारत की सब से कमज़ोर सरकार ने बहुत ही पिलपिले ढंग से सदां में महिला विधेयक पेश करने की तथा कथित मर्दानगी दिखाई. नतीजा फिर वही १५ दिन तक तो भूनते हुए मक्का के दानो की तरह सभी राजनैतिक दल खूब उछले पर अब १५ दिन से इस वारे ने कोई भी वयान बाजी सामने नहीं आयी. क्या अपने आप में यह सन्नाटा इस मुद्दे के खोखलेपन का परिचायक नहीं है?  इसी  मुद्दे पर <a href="http://dixitajayk.blogspot.com/search?updated-min=2010-01-01T00%3A00%3A00-08%3A00&amp;updated-max=2011-01-01T00%3A00%3A00-08%3A00&amp;max-results=6 "><strong>अजय दीक्षित</strong> </a>जी ने जनोक्ति .कॉम को अपने  सर्वेक्षण पर आधारित आलेख भेजा है . जिस में विभिन्न आर्थिक, समाजिक, राजनैतिक, शैक्षिक और धार्मिक वर्ग के लोगो को शामिल करने का पुरी इमानदारी से प्रयास किया .  २-४०० लोगों से बातचीत पर आधारित यह तथ्य सम्पूर्ण समाज का पतिनिधित्व नहीं कर सकते फिर भी सोचने के लिए एक नई दिशा तो दे ही सकते हैं.</p>
</blockquote>
<div> <img class="alignright size-medium wp-image-2381" title="indianwomen" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2010/04/indianwomen-300x206.jpg" alt="" width="300" height="206" />आज कल समाज में एक मानसिकता सी चल पड़ी है कि  नारी और पुरुष को बराबरी का अधिकार मिलना चाहिए. अपनी स्वार्थपूर्ति के लिए सभी राजनीतिक पार्टी के नेता लोग भी जवानी जमा खर्च करने में पीछे नहीं रहते यह बात अलग है की किसी को महिला वोटों की चिंता है तो किसी को चूल्हे चोके की. पर दिल से न तो कोई इस बात को मानता है और ना ही प्रत्यक्ष समर्थन करने को तय्यार होगा की महिलाओं को समानता का अधिकार मिले. यही कारण है की इतने साल गुजर जाने की बाद भी महिला सशक्ती करण, तथाकथित नारी मुक्ती आन्दोलन और अब महिला विधेयक की गाढ़ी पंचर पढ़ी है. और आगे वक़्त बताएगा की यह खटारा आगे जाय गी भी या अभी कितने साल और इस राजनेतिक चक्रवात में फँसी रहे गी. पर इतना तो तय है की नारी भक्त राज नीतिज्ञ न तो इस आग को जलने हे देंगे और न ही बुझने। क्यों की उन की स्वार्थसिद्धि इस आग के जलने या बुझने में नहीं केवल सुलगते रहने में है क्योंकी इसी सुलगती आग में ही राजनेतिक रोटी करारी सिकती है। दयनीय स्थिती तो समाज के उस वर्ग (केवल नारियां) की है जिस का उपयोग इस आग को सुलगाए रखने के लिए किया जा रहा है। यहाँ सब से बढ़ी बिडम्बना यह है की महिला समाज का एक प्रमुख वर्ग जिस से अपेक्षा की जाती है की वो महिला समाज का नेत्रत्व करे खुद अपनी रोटियां सकने में व्यस्त है। वेह वर्ग विशेष करे भी क्या? यह हकीकत तो पूरा नेत्रत्व जानता है की मिलना तो कुछ है नहीं तो क्यों ना अपनी रोटियां ही सेक ली जायं ? वास्तव में दयनीय स्थिति तो तब आती है जब ५०-५० रूपए के लालच में औरतें महिला सशक्ती करण, तथाकथित नारी मुक्ती आन्दोलन और महिला विधेयक की मर्ग मारीचिका के समर्थन में सारे दिन धुप में नारे लगाते हुए इस झूंठ को जीती हैं की अब वो पुरुष के बराबर होने योग्य हो गयीं हैं। इन से भी अद्किहा दया की पात्र वे हैं को अपनी कार से, घर की बालकनी से या टेलीविज़न के परदे पर ही इस आन्दोलन को देख कर खुश हो जाती हैं।</div>
<p>हम एक समाजिक प्राणी हैं और हमारे समाज ने जो हमारे लिए हजारों साल के अनुभव के आधार पर नियम बनाए हैं, यहाँ समाज ने &#8220;नियम बनाए हैं &#8221; कहना गलत होगा बल्की कहना तो यह चाहिए की प्रकर्ती के बनाए नियमो का समाज ने तो मात्र अनुमोदन ही किया है की पुरुष हर हाल में नारी से श्रेष्ठ है। अब बेकार की बहस के लिए आप चाहे तो पुरुष और नारी की तुलना शारीरिक रूप से कर ले, मानसिक रूप से या तुलना का अगर आप के पास कोई दूसरा पैमाना हो तो उस से कर ले. जब इश्वर ने ही पुरुष को नारी से हर लिहाज़ में श्रेष्ठ बनाया है तो कुछ लोग पता नहीं क्यों खामखाँ ही नारी को सर पे बिठा कर प्राकर्तिक संतुलन को बिगारना चाहते हैं. इन में कोई दो राय नहीं हैं की प्राकर्ति की सुंदरतम रचनाओं में नारी प्रमुख है. हमारे समाज की शत प्रतिशत नारीओं की यह तो हार्दिक अभिलाषा हो सकती है की पुरुष उन की इज्ज़त करे और उन दो दिल में बसाए, पर पुरुष की बराबरी की या उस के सर पर चढ़ने की अभिलाषी खुद नारी समाज की ही अधिक से अधिक २-४ या ६ % ही होंगी. पुरुष पर राज करने या उस की बराबरी करने के लिए पति को परमेश्वर मानने वाली नारी न तो सांस्कारिक तोर पर ही तैयार है ना मानसिक या शारीरिक तौर पर. किन्ही कारणों से यदि कोई औरत पुरुष पर हावी हो भी जाय तो इस से उस को कुछ क्षणिक संतोष तो मिल सकता है किन्तु इस से उस का जीवन एक रिक्तता से भर भर जाता है और वो रिक्तता तब तक ख़तम नहीं हो सकती जब तक वो किसी पुरुष के समक्ष खुद को समर्पित न कर दे. इन परिस्थितिओं के विरुद्ध नारी भक्त समाज के पास सिवाय कुतर्कों के कोई भी पुख्ता दलील तो है नहीं। लगभग सभी धर्मो में भी पुरुष को ही श्रेष्ठ बताया गया है तभी अनेकों धार्मिक कर्मकांडों पर पुरुष का ही एकाधिकार माना जाता है, और तो और कई धार्मिक अनुष्ठानो में तो स्त्री का प्रवेश तक वर्जित होता है। इसी प्रकार कानून भी कई क्षत्रों में पुरुष को ही सक्षम मानता है स्त्रिओं को उन क्षत्रों के लिए अयोग्य माना जाता है। समाज ने भी नारी को कई क्षत्रों में प्रतिबंधित कर रखा है। धर्म, कानून और समाज तीनो एक मत हो कर जब पुरुष को श्रेष्ठ बताते तो अपने आप को कानून धर्म और समाज से उपर साबित करने की चाह में नारी भक्त अपना कोंन सा स्वार्थ सिद्ध करना चाहते हैं, यह एक शोध का विषय हो सकता है । वास्तव में आज नारी को संरक्षण के आवश्यकता है जिसे कुछ स्वार्थी लोग समानता का नाम दे कर पुरे समाज को गुमराह करना चाह रहे हैं।</p>
<p>नारी सदां से पुरुष की आश्रिता रही है. पुरुष का आदि काल से यह कर्त्तव्य रहा है की वो उस का पालन करे और उस की रक्षा करे. उस पर किसी भी प्रकार का अत्याचार या अन्याय न तो पुरुष श्रेष्ठ को शोभा ही देता है और ना ही किसी भी परिस्थिती स्वीकार्य हो सकता है. संकट के समय सदां ही नारी, चाहे वो सीता हो या द्रोपदी या सूर्पनखा या फिर आज की कोई भी तथा कथित आधुनिका, पुरुष से ही रक्षा की अपेक्षा करती है. खुद को इस भरम में रखने के लिए के वो भी पुरुष से कम नहीं है कभी कभी बो भी पुरुष के साथ मैदान में कूद तो परती हैं पर जब वास्तविकता से सामना होता है तो वे भी पुरुष सत्ता को स्वीकार कर या तो समर्पण कर देती हैं या सहयोग की याचना करने लगती हैं जब की उन ही परिस्थितिओं में पुरुष खुद लाढ़ता है और अपनी बुधी, विवेक और बल से विजय भी पाता है.<br />
यहाँ नारी भक्त रानी लक्ष्मी बाई, इन्द्रा गांधी और भी इसी तरह की सेंकरो औरतों का उदाहरण देने में पीछे नहीं रहे गे. यहाँ वे यह भूल जाते हैं या नारीभाक्ती में याद ही नहीं करना चाहते की exemption सब जगह होते हैं समाज में जो काम केवल एक या दो नारियां ही कर पाती हैं उन को तो नारीभाक्तों ने महिमामंडित कर दिया पर उस से भी हीन परिस्थतियों में कोई पुरुष वो ही काम करता है तो &#8221; ये तो उस का फ़र्ज़ है&#8221; कह कर पल्ला झाढ़ लेते हैं. क्यों ? यहाँ समानता वाला उन का माप दंड कहाँ चला जाता. वैसे यहाँ समानता वाली बात है भी नहीं यह बिलकुल सत्या है की पुरुष का तो &#8220;यह फ़र्ज़ है ही&#8221; पर यदि कोई नारी भी &#8220;इसे &#8221; कर ले तो उसे शाबाशी तो मिलनी ही चाहिए उस के उत्साहवर्धन के लिए प्रशंशा और शाबाशी ज़रूरी है. पर इस का नारीभाक्तों द्वारा यह मतलब निकालना की इतने मात्र से ही वो पुरुष के बराबर हो गई उन के मानसिक दिवालियापन का परिचायक नहीं तो क्या है?</p>
<p>आदि काल से ही हमारे पूर्वजों ने पुरी तरह से सोच विचार कर ही एक पुरुष प्रधान समाज की रचना की है, उस की दूरदर्शिता के कारण ही आज भी हमारी सामाजिक व्यवस्थाएं उन परम्पराओं का पालन करते हुए फल फुल रहीं हैं. क्या कभी आप ने कल्पना की है की अगर हजारो साल पहले इस बराबरी का मुर्खता पूर्ण विचार हमारे पूर्वजो को आ जाता तो आज समाज की क्या स्थिति होती. नहीं सोचा ना? तो अब सोच कर देखे, दिमाग का फालूदा बन जाय गा और वेह काम करना बंद कर देगा. फिर भी अगर और सोचने का प्रयास किया तो दिमाग का फ्युस उढ जाय गा, कोई नतीज़ा नहीं निकले गा और अगर निकला भी तो कितना विनाशकारी होगा यह लिख पाना तो मुश्किल है आप खुद ही सोचें.</p>
<p>पहले हमारे समाज को महिलाओं की चिंता नहीं थी या उन के प्रति प्रेम या सम्मान में कोई कमी थी<br />
एसा नहीं है. जितनी चिंता आज महिलाओं की करी जाती है शायाद उतनी ही चिंता हमारे प्राचीन समाज को भी थी. शायद इसी सोच के चलते महिलाओं की सुरक्षा के लिए बाल विवाह तथा सती प्रथा का विकास हुआथा। बचपन से ही नारी की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए ही उन की बागडोर पुरुष को सोंप दी जाती थी तथा पति की म्रत्यु के बाद उसे इस कदर निराश्रित मान लिया जाता था की अब उस का कोई रक्षक नहीं है अतः उसे मर जाना चाहिए। अब यह सोच निर्विवाद रूप से मुर्खता की परिचायक मानी जाती है, पर उस समय अगर लोगों की मानसिकता का अध्यन किया जाय तो यह स्पस्ट हो जाता है की इन सब पाशविक और मुर्खता पूर्ण सोच के पीछे पुरुष वर्ग की कोई दंडात्मक या प्रतिशोधात्मक भावना नहीं रही होगी अपितु उस ने इस प्रकार के नियम नारी की सुरक्षा को द्रस्ती गत रख कर ही किया होगा।प्राचीन समय में पर्दा प्रथा का चलन भी नारी की सुरक्षा को सर्वोपरि मान कर किया गया होगा। हमारे शास्त्रों में भी नारी को लक्ष्मी के स्वरुप में प्रतिस्था दी गई है और यह निर्विवाद सत्य है की लक्ष्मी की सुरक्षा का दायित्व सदां से पुरुष पर रहा है। समाज में प्रतिष्ठा और विवाद के मुख्य मान दंड ज़र (धन) जनीन और नारी ही हैं। यह तीनो ही स्वयं अपनी सुरक्षा करने में सक्षम नहीं होते अतः इन की सुरक्षा का पूरा दायित्व सदां से ही मर्द का रहा है। इन से कभी भी समाज ने यह अपेक्षा नहीं की की वे अपनी रक्षा खुद करे।</p>
<p>आज भी पुरे संसार का एक बरा वर्ग इस सोच का ही हामी है की नारी का आजीवन पुरुष के आश्रय में रहना ही खुद नारी के लिए ही नहीं समाज के लिए भी जरूरी है। इसी व्यवस्था के अन्तरगत नारी का बचपन पिता के, यौवन पति के तथा वृधा वस्था पुत्र के आधीन सुरक्षित मानी जाती है। कुछ अपवादों के अलावा खुद नारी भी इस व्यवस्था के बाहर अपने को अ सुरक्षित समझती है। जितनी चिंतित नारी खुद अपनी सुरक्षा से नहिः होती उस से अधिक पुरुष उस की रक्षा को ले कर चिंतित रहता है । नारी की इस निश्चिंतता के मूल में यह ही है की उस ने खुद को पुरुष के आधीन मान कर समर्पण कर दिया है । और पुरुष को भी गर्व है की वो नारी के स्वभेमान, सम्मान और नारीत्व की रक्षा करने ने न केवल पुरी तरह से सक्षम है अपितु इस समभंद में उसे नारी का भी पूरा विशवास प्राप्त है ।</p>
<p>हमारे समाज का एक सर्वे मान्य नियम है की नारी को पुरुष के बराबर में नहीं उस के पीछे चलना है इस नियम का सख्ती से पालन करने और करवाने में भी नारी ही प्रमुख भूमिका निभाती है. इस नियम को तोढ़ने पर भी सब से तीक्खी प्रतिक्रया भी समाज के इसी वर्गे से ही आती है. क्यों की हज़ारों वर्षों के अनुभव ने आज नारी को इतना समझदार बना दिया है की अब खुद नारी को उस की इस सोच से डिगाना असंभव सा लगता है की वो कभी पुरुष की बराबरी कर सकेगी.</p>
<p>इतना सब होने के बाद भी महज़ कुछ वोटों की खातिर मुठी भर लोग बेचारी नारी को बरगला कर, उस की इक्षा के विरुद्ध पथ भ्रस्त कर अपना उल्लू सीधा करना चाहते हैं । अतः मेरा परम पूज्य माताओं और बहनों से करबद्ध निवेदन है की वो इन मौका परस्त लोगों के बहकावे में ना आये और अपनी बुधि, विवेक, संसकार, अंतर आत्मा की आवाज़ और वास्तविक शुभ चिंतकों के परामर्श से ही कोई निर्णय ले क्यों की यह बहुत ही ज्वलंत सामाजिक प्रशन है जिस का अगर आज ही कोई उचित समाधान हम नहीं खोज पाए तो कल शायद यह विष बेल हमारे पुरी सामाजिक व्यवस्था को छिन्न भिन्न कर देगी। इस सामाजिक विघटन का मुझे अच्छी तरह से मालुम है की मेरे विचार पढ़ने के बाद आप का मन भी आंदोलित हो रहा और आप अपनी प्रतिक्रया देने के इक्षुक होंगे, अब चाहे वो मेरे समर्थन में हो या विरुद्ध पर में आप का स्वागत करूँ गा । यहाँ मेरा आप से करबद्ध निवेदन है की आप अपनी प्रतिक्रया ज़रूर दे चाहे वो कैसी भी हो पर प्रतिक्रया देने से पहले अपने दिल परहाथ रखें और मुझ से वायदा करें की आप की प्रतिक्रया आप के दिल की आवाज़ है जो किसी व्यक्तिगत, राजनीतिक, लैगिक, धार्मिक या सामाजिक पुर्वाग्रह्ह से ग्रसित नहीं है.</p>
]]></content:encoded>
			<wfw:commentRss>http://www.janokti.com/discussion-suggestions-%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%9a%e0%a4%be%e0%a4%b0-%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%ae%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%b6/women-%e0%a4%a8%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a5%80/%e0%a4%a8%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%86%e0%a5%9b%e0%a4%be%e0%a4%a6%e0%a5%80/feed/</wfw:commentRss>
		<slash:comments>1</slash:comments>
		</item>
		<item>
		<title>प्राचीन भारतवर्ष में नारी</title>
		<link>http://www.janokti.com/bharatnama-%e0%a4%ad%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a4%a4%e0%a4%a8%e0%a4%be%e0%a4%ae%e0%a4%be/art-culture-%e0%a4%95%e0%a4%b2%e0%a4%be-%e0%a4%b8%e0%a4%82%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%95%e0%a5%83%e0%a4%a4%e0%a4%bf/%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%9a%e0%a5%80%e0%a4%a8-%e0%a4%ad%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a4%a4%e0%a4%b5%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%b7-%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%82-%e0%a4%a8%e0%a4%be%e0%a4%b0/</link>
		<comments>http://www.janokti.com/bharatnama-%e0%a4%ad%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a4%a4%e0%a4%a8%e0%a4%be%e0%a4%ae%e0%a4%be/art-culture-%e0%a4%95%e0%a4%b2%e0%a4%be-%e0%a4%b8%e0%a4%82%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%95%e0%a5%83%e0%a4%a4%e0%a4%bf/%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%9a%e0%a5%80%e0%a4%a8-%e0%a4%ad%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a4%a4%e0%a4%b5%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%b7-%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%82-%e0%a4%a8%e0%a4%be%e0%a4%b0/#comments</comments>
		<pubDate>Mon, 22 Mar 2010 18:28:23 +0000</pubDate>
		<dc:creator>जनोक्ति डेस्क</dc:creator>
				<category><![CDATA[कला-संस्कृति]]></category>
		<category><![CDATA[human being]]></category>
		<category><![CDATA[india]]></category>
		<category><![CDATA[indian culture]]></category>
		<category><![CDATA[indian heritage]]></category>
		<category><![CDATA[indian mythology]]></category>

		<guid isPermaLink="false">http://www.janokti.com/?p=2251</guid>
		<description><![CDATA[भारतवर्ष में सदा से स्त्रियों का समुचित मान रहा है। उन्हें पुरुषों की अपेक्षा अधिक पवित्र माना जाता रहा है। स्त्रियों को बहुधा ‘देवी’ संबोधन से संबोधित किया जाता है। नाम के पीछे उनकी जन्म-जात उपाधि ‘देवी’ प्रायः जुडी रहती ]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<div id="main"><strong><img class="alignright size-full wp-image-2252" title="भारतीय नारी" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2010/03/mahratti-lady.jpg" alt="" width="292" height="482" />भा</strong>रतवर्ष में सदा से स्त्रियों का समुचित मान रहा है।  उन्हें पुरुषों की अपेक्षा अधिक पवित्र माना जाता रहा है। स्त्रियों को बहुधा ‘देवी’ संबोधन से संबोधित किया जाता है। नाम के पीछे उनकी जन्म-जात उपाधि ‘देवी’ प्रायः  जुडी रहती है। शांति देवी, गंगादेवी, दया देवी आदि ‘देवी’ शब्द पर कन्याओं के नाम रखे जाते हैं। जैसे पुरुष बी.ए. शास्त्री, साहित्यरत्न आदि उपाधियाँ उत्तीर्ण करने पर अपने नाम के पीछे उस पदवी को लिखते हैं वैसे ही कन्याएँ अपने जन्मजात ईश्वर की प्रदत्त दैवी गुणों, दैवी विचारों, दिव्य विशेषताओं के कारण अलंकृत  होती हैं।</p>
<p>देवताओं और महापुरुषों के साथ उनकी अर्धांगिनियों के नाम भी जुड़े हैं सीताराम, राधेश्याम, गौरीशंकर, लक्ष्मीनारायण, उमामहेश, मायाब्रह्म, सावित्री सत्यवान आदि नामों में नारी का पहला और नर का दूसरा स्थान है। पतिव्रता, दया, करुणा, सेवा, सहानुभूति, स्नेह, वात्सल्य, उदारता, भक्ति-भावना, आदि गुणों में नर की अपेक्षा नारी को सभी विचारवानों ने बढ़ा-चढ़ा माना है।</p>
<p>इसलिए धार्मिक, आध्यात्मिक और ईश्वर-प्राप्ति संबंधी कार्यों में नारी का सर्वत्र स्वागत किया गया है और उसे उनकी महानता के अनुकूल प्रतिष्ठा दी गई है। वेदों पर दृष्टिपात करने से स्पष्ट हो जाता है कि वेदों के मंत्रदृष्टा जिस प्रकार अनेक ऋषि हैं वैसे ही अनेक ऋषिकाएँ भी हैं। ईश्वरीय-ज्ञान वेद, महान आत्मा वाले व्यक्तियों पर प्रकट हुआ है और उनने उन मंत्रों को प्रकट किया। इस प्रकार जिन पर वेद प्रकट हुए उन मंत्रों को दृष्टाओं को ‘ऋषि’ कहते हैं। ऋषि केवल पुरुष ही नहीं हुए हैं, ऋषि अनेक नारियाँ भी हुई हैं। ईश्वर ने नारियों के अंतःकरण में उसी प्रकार वेद-ज्ञान प्रकाशित किया जैसे कि पुरुष के अंतःकरण में, क्योंकि प्रभु के लिए दोनों ही संतान समान हैं। महान् दयालु, न्यायकारी और निष्पक्ष प्रभु भला अपनी ही संतान में नर-नारी का पक्षपात करके अनुचित भेद-भाव कैसे कर सकते हैं ?</p>
<p>ऋग्वेद 10।85 के संपूर्ण मंत्रों की ऋषिकाएँ ‘‘सूर्या सावित्री’’ है। ऋषि का अर्थ निरुत्तर में इस प्रकार किया है ‘‘ऋषिदर्शनात् स्तोमान् ददर्शेति ऋषियो मन्त्र दृष्टारः।’’ अर्थात् मंत्रों का दृष्टा उनके रहस्यों को समझकर प्रचार करने वाला ऋषि होता है।<br />
ऋग्वेद की ऋषिकाओं की सूची ब्रह्म देवता के 24 अध्याय में इस प्रकार है—</p></div>
<p><strong> घोषा गोधा विश्ववारा अपालोपनिषन्नित्।</strong></p>
<div id="doha" style="text-align: center;"><strong> ब्रह्म जाया जहुर्नाम अगस्त्यस्य स्वसादिति।।84।।<br />
इन्द्राणी चेन्द्र माता चा सरमा रोमशोर्वशी।<br />
लोपामुद्रा च नद्यश्च यमी नारी च शाश्वती।।85।।<br />
श्रीलछमीः सार्पराज्ञी वाकश्रद्धा मेधाचदक्षिण।<br />
रात्रि सूर्या च सावित्री ब्रह्मवादिन्य ईरितः।।86।।</strong></div>
<p>अर्थात्—घोषा, गोधा, विश्ववारा, अपाला, उपनिषद्, जुहू, आदिति, इन्द्राणी, सरमा, रोमशा, उर्वशी, लोपामुद्रा, यमी, शाश्वती, सूर्या, सावित्री आदि ब्रह्मवादिनी हैं।</p>
<div id="main">ऋग्वेद के 10-134, 10-39, 19-40, 8-91, 10-5, 10-107, 10-109, 10-154, 10-159, 10-189, 5-28, 9-91 आदि सूक्तों की मंत्र दृष्टा यह ऋषिकाएँ हैं।<br />
ऐसे अनेक प्रमाण मिलते हैं, जिनसे स्पष्ट होता है कि स्त्रियाँ भी पुरुषों की तरह यज्ञ करती और कराती थीं। वे यज्ञ-विद्या, ब्रह्म-विद्या में पारंगत थीं। कई नारियाँ तो इस संबंध में अपने पिता तथा पति का मार्ग दर्शन करती थीं।<br />
तैत्तिरीय ब्राह्मण में सोम द्वारा ‘सीता सावित्री’ ऋषिका को तीन वेद देने का वर्ण विस्तारपूर्वक आता है।</div>
<div id="doha" style="text-align: center;">..<strong>&#8230;.तं त्रयो वेदा अन्य सृज्यन्त अथह सीतां सावित्री सोम राजान चक्रमे&#8230;.तस्या उहत्रीन वेदान प्रददौ।</strong></div>
<p style="text-align: center;"><strong>-तैत्तिराय. 2।3।10</strong></p>
<p>इस मंत्र में बताया गया है कि किस प्रकार सोम ने सीता सावित्री को तीन वेद दिए।</p>
<div id="main">मनु की पुत्री ‘इडा’ का वर्णन करते हुए तैत्तिरीय 1-1-4 में उसे ‘यज्ञान्काशिनी’ बताया है यज्ञान्काशीनी का अर्थ सायणाचार्य ने ‘यज्ञ तत्त्व प्रकाशन समर्था’ किया है। इडा ने अपने पिता को यज्ञा संबंधी सलाह देते हुए कहा—</div>
<p style="text-align: center;"><strong>साऽब्रवीदिड़ा मनुम्। तथावाऽएं तवाग्नि माधास्यामि यथा प्रजथा पशुभिर्मिथुनैजनिष्यसे। प्रत्यस्मिंलोकेस्थास्यासि। असि स्वर्ग लोके जेष्यसोति।</strong></p>
<p style="text-align: center;"><strong>-तैत्तिरीय ब्रा।1।4</strong></p>
<p>इडा ने मनु से कहा-तुम्हारी अग्नि का ऐसा अवधान करूँगी जिससे तुम्हें भोग, प्रतिष्ठा और स्वर्ग प्राप्त हो। प्राचीन समय में स्त्रियाँ गृहस्थाश्रम चलाने वाली भी थीं और ब्रह्मपरायण भी। वे दोनों ही अपने–अपने कार्य-क्षेत्र में कार्य करती थीं। जो गृहस्थ संचालन करती थीं उन्हें ‘सद्योबधू’ कहते थे और जो वेदाध्ययन, ब्रह्म-उपासना आदि के पारमार्थिक कार्यों में प्रवृत्त रहती थीं उन्हें ‘ब्रह्मवादिनी’ कहते थे। ब्रह्मवादिनी और सद्योवधु के कार्यक्रम तो अलग-अलग थे, पर उनके मौलिक धर्माधिकारियों में कोई अंतर न था, देखिए—</p>
<p style="text-align: center;"><strong>द्विविधा स्त्रियो ब्रह्मवादिन्यः सद्योवध्वश्च। तत्र ब्रह्मवादिनी नामुण्यानाम अग्नोन्धनं स्वगृहे भिक्षाचर्या च। सद्योवधूनां तूपस्थते विवाहकाले विदुपनयन कृत्वा विवाह कार्यः।</strong></p>
<p style="text-align: center;"><strong>-हरीत धर्मसूत्र 21।20।24</strong></p>
<p>ब्रह्मवादिनी और सद्योवधू ये दो स्त्रियाँ होती हैं। इनमें से ब्रह्मवादिनी यज्ञोपवीत, अग्निहोत्र, वेदाध्ययन तथा स्वगृह में भिक्षा करती हैं। सद्योवधुओं भी यज्ञोपवीत आवश्यक है। वह विवाह काल उपस्थित होने पर करा देते हैं।</p>
<div id="main">शतपथ ब्राह्मण में याज्ञवल्क्य ऋषि की धर्मपत्नि मैत्रेयी को ब्रह्मवादिनी कहा है।</div>
<p style="text-align: center;"><strong>तयोर्हू मैत्रेयी ब्रह्वादिनी बभूवः।</strong></p>
<p>अर्थात्—मैत्रेयी ब्रह्मवादिनी थी। ब्रह्मवादिनी का अर्थ बृहदारण्यक उपनिषद् का भाष्य करते हुए श्री</p>
<div>शंकराचार्य जी ने ‘ब्रह्मवादन शीला’ किया है। ब्रह्म का अर्थ है—वेद ब्रह्मवादन शील अर्थात् वेद का प्रवचन करने वाली।<br />
यदि ब्रह्म का अर्थ ईश्वर लिया जाए तो भी ब्रह्म प्राप्ति, बिना वेद ज्ञान के नहीं हो सकती। इसलिए ब्रह्म को वही जान सकता है जो वेद पढ़ता है देखिए—</div>
<p style="text-align: center;"><strong>ना वेद विन्मनुते तं वृहन्तम्।      तैत्तिरीय.</strong></p>
<div id="doha" style="text-align: center;"><strong> एतं वेदानुवचनेन ब्राह्मणा विवदिषन्ति यज्ञेन दानेन तपसाऽनाशकेन।</strong></div>
<p style="text-align: center;"><strong>-वृहदारण्यक 4।4।2</strong></p>
<p>जिस प्रकार पुरुष ब्रह्मचारी रहकर तप, स्वाध्याय, योग द्वारा ब्रह्म को प्राप्त करते थे, वैसे ही कितनी ही स्त्रियाँ ब्रह्मचारिणी रहकर आत्म-निर्माण एवं परमार्थ का संपादन करती थीं।</p>
<div id="main">पूर्वकाल में अनेक सुप्रसिद्ध ब्रह्मचारिणी हुई हैं, जिनकी प्रतिभा और विद्वता की चारों ओर कीर्ति फैली हुई थी। महाभारत में ऐसी अनेक ब्रह्यचारिणियों का वर्णन आया है।</div>
<p style="text-align: center;"><strong>भरद्वाजस्य दुहिता रूपेण प्रतिमा भुवि।</strong></p>
<div id="doha" style="text-align: center;"><strong> श्रुतावती नाम विभोकुमारी ब्रह्मचारिणी।।</strong></div>
<p style="text-align: center;"><strong>-महाभारत शल्य पर्व 47।2</strong></p>
<p>भारद्वाज की श्रुतावती नामक कन्या थी, जो ब्रह्मचारिणी थी। कुमारी के साथ-साथ ब्रह्मचारिणी शब्द लगाने का तात्पर्य यह है कि वह अविवाहित और वेदाध्ययन करने वाली थी।</p>
<p style="text-align: center;"><strong>अत्रैव ब्राह्माणी सिद्धा कौमार ब्रह्मचारिणी।</strong></p>
<div id="doha" style="text-align: center;"><strong> योग युक्तादिव भाता, तपः सिद्धा तपस्विनी।।</strong></div>
<p style="text-align: center;"><strong>महाभारत शल्य पर्व 54।6</strong></p>
<p>योग सिद्धि को प्राप्त कुमार आस्था से ही वेदाध्ययन करने वाली तपस्विनी, सिद्धा नाम की ब्रह्मणी मुक्ति को प्राप्त हुई।</p>
<p style="text-align: center;"><strong>वभूव श्रीमती राजन् शांडिल्यस्य महात्मनः।<br />
सुता धृतव्रता साध्वी, नियता ब्रह्मचारिणी।।<br />
साधु तप्त्वा तपो घोरे दुश्चरं स्त्री जनेन ह।<br />
गता स्वर्ग महाभागा देव ब्राह्मण पूजिता।</strong></p>
<p style="text-align: left;"><a href="http://pustak.org/bs/home.php?bookid=4127">साभार : पुस्तक.ओआरजी</a></p>
]]></content:encoded>
			<wfw:commentRss>http://www.janokti.com/bharatnama-%e0%a4%ad%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a4%a4%e0%a4%a8%e0%a4%be%e0%a4%ae%e0%a4%be/art-culture-%e0%a4%95%e0%a4%b2%e0%a4%be-%e0%a4%b8%e0%a4%82%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%95%e0%a5%83%e0%a4%a4%e0%a4%bf/%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%9a%e0%a5%80%e0%a4%a8-%e0%a4%ad%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a4%a4%e0%a4%b5%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%b7-%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%82-%e0%a4%a8%e0%a4%be%e0%a4%b0/feed/</wfw:commentRss>
		<slash:comments>0</slash:comments>
		</item>
		<item>
		<title>आत्ममुग्धता की बढ़ती भावना खतरनाक है</title>
		<link>http://www.janokti.com/religion-%e0%a4%a7%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%ae-spritualism-%e0%a4%85%e0%a4%a7%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a4%be%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%ae/life-%e0%a4%9c%e0%a5%80%e0%a4%b5%e0%a4%a8/%e0%a4%86%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%ae%e0%a4%ae%e0%a5%81%e0%a4%97%e0%a5%8d%e0%a4%a7%e0%a4%a4%e0%a4%be-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%ac%e0%a4%a2%e0%a4%bc%e0%a4%a4%e0%a5%80-%e0%a4%ad%e0%a4%be%e0%a4%b5/</link>
		<comments>http://www.janokti.com/religion-%e0%a4%a7%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%ae-spritualism-%e0%a4%85%e0%a4%a7%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a4%be%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%ae/life-%e0%a4%9c%e0%a5%80%e0%a4%b5%e0%a4%a8/%e0%a4%86%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%ae%e0%a4%ae%e0%a5%81%e0%a4%97%e0%a5%8d%e0%a4%a7%e0%a4%a4%e0%a4%be-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%ac%e0%a4%a2%e0%a4%bc%e0%a4%a4%e0%a5%80-%e0%a4%ad%e0%a4%be%e0%a4%b5/#comments</comments>
		<pubDate>Wed, 28 Oct 2009 17:10:26 +0000</pubDate>
		<dc:creator>दीपाली पाण्डेय</dc:creator>
				<category><![CDATA[जीवन]]></category>
		<category><![CDATA[human being]]></category>
		<category><![CDATA[indian philosophy]]></category>
		<category><![CDATA[osho]]></category>
		<category><![CDATA[religion]]></category>
		<category><![CDATA[sex in life]]></category>
		<category><![CDATA[प्रसिद्द मनोवैज्ञानिक फ्रायड]]></category>

		<guid isPermaLink="false">http://www.janokti.com/?p=995</guid>
		<description><![CDATA[&#160; मानव स्वयं के होने के बोध यानि अहम् के साथ नहीं जन्म लेता हैं। अहं का भाव समय के की धारा के संग-संग दिलोदिमाग पर छा जाता है। यह बाहरी दुनिया से हमारे मन के संसार का मिलन होने ]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;">
	<a href="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2009/10/Man-Mirror.jpg"><img alt="Man-Mirror/janokti /sexual man / " class="aligncenter size-medium wp-image-996" height="300" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2009/10/Man-Mirror-287x300.jpg" title="Man-Mirror/janokti /sexual man / " width="287" /></a>&nbsp; मानव स्वयं के होने के बोध यानि अहम् के साथ नहीं जन्म लेता हैं। अहं का भाव समय के की धारा के संग-संग दिलोदिमाग पर छा जाता है। यह बाहरी दुनिया से हमारे मन के संसार का मिलन होने से आता है। माता-पिता ,भाई-बंधू ,परिवार -समाज के नियंत्रण, उनकी अपेक्षाओं, सामाजिक व पारिवारिक परिवेश का मन के ऊपर प्रभाव होना स्वाभाविक हीं है।<br />
	प्रसिद्द मनोवैज्ञानिक <strong>फ्रायड</strong> इसे ईगो लिबिडो यानी आत्मरति कहते हैं।&nbsp; आत्मरति या आत्ममोह अर्थात खुद के लिए और प्रशंसा में एक असाधारण मनोभाव ।जब कोई माँ -बाप,परिजन ,शिक्षक आदि बच्चों से यह कहते हैं कि तुम बहुत खूबसूरत हो, मेधावी हो और दूसरों से अलग हो, तो आपको इसका तनिक भी बहन नहीं हो होता कि वो बच्चे में विशिष्टता का एक ऐसा भाव पैदा कर रहे हैं जो भविष्य में उसके व्यक्तित्व को बुरी तरह प्रभावित कर सकता है। बच्चों की एक सीमा तक तारीफ ही अच्छी है । तुलना की यह प्रक्रिया जब बहुत बढ जाती है और व्यक्ति कई स्थितियों में स्वयं को हीन महसूस करने लगता है । मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि जिन बच्चों को विशिष्ट करार दिया जाता है, वे आगे चल कर आत्मकेंद्रित, अहमवादी और अक्खड़ बन जाते हैं। ऐसे बच्चे अपने गलत कार्य को भी सही मानने लगते हैं। बड़े होकर उनमें सहानुभूति की भावना बेहद कमजोर पड़ जाती है और वे धोखेबाज व बेवफाई जैसे कदमों को भी अपना बड़प्पन मानने लगते हैं जिन बच्चों को विशिष्ट करार दिया जाता है, वे आगे चल कर आत्मकेंद्रित, अहमवादी और अक्खड़ बन जाते हैं। ऐसे बच्चे अपने गलत कार्य को भी सही मानने लगते हैं। बड़े होकर उनमें सहानुभूति की भावना बेहद कमजोर पड़ जाती है और वे धोखेबाज व बेवफाई जैसे कदमों को भी अपना बड़प्पन मानने लगते हैं।<br />
	बचपन में पनपी आत्ममुग्धता की भावना धीरे-धीरे अति ओर बढ़ती हुई मनुष्य की मनोस्थिति को ऐसे स्तर पर ले जाता है जहाँ वह स्वयं को किसी की तुलना में हीन समझता है या फ़िर औरों को अपने समक्ष नगण्य ।&nbsp; दोनों हीं स्थिति में मनुष्य की मनुष्यता का ह्रास होता है । यदि मानव के अन्दर हीनता का भाव पैठ जाए तो वह समाज से बचने का प्रयत्न करता है और इसी क्रम में अपने ऊपर एक छद्म आवरण बना लेता है ताकि दूसरो को उसकी वास्तविकता का ज्ञान न हो ।जब उसे लगता है कि उसकी असलियत जाहिर हो सकती है, वह रक्षात्मक हो जाता है। व्यक्ति यदि शक्तिसंपन्न हुआ तो रक्षा का यह तरीका डांट-फटकार और कमजोर हुआ तो उलाहनों, रोने व नकारात्मक सोच के रूप में सामने आता है। इस अवस्था में व्यक्ति को यदि चाटुकारों से पाला पड़ जाए तो इससे निकल पाना बेहद मुश्किल हो जाता है ।<br />
	मनुष्य के मनोविज्ञान पर शोध कर रहे <strong>ट्वेंजे</strong> मुताबिक पूर्ववर्ती पीढ़ियों की तुलना में आज बच्चे इसलिए अधिक आत्मकेंद्रित हो गए हैं, क्योंकि माता-पिता उनके दोष को भुला कर उनकी हद से ज्यादा तारीफ करते हैं। बच्चों पर &lsquo;आत्मसम्मान संवर्द्घन अभियान&rsquo; जैसी मुहिम का भी असर पड़ा है। वे अपने को अधिक विशिष्ट समझने लगे हैं। बच्चे को यह बताना बंद किया जाना चाहिए कि &lsquo;तुम खास हो&rsquo;।</p>
]]></content:encoded>
			<wfw:commentRss>http://www.janokti.com/religion-%e0%a4%a7%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%ae-spritualism-%e0%a4%85%e0%a4%a7%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a4%be%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%ae/life-%e0%a4%9c%e0%a5%80%e0%a4%b5%e0%a4%a8/%e0%a4%86%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%ae%e0%a4%ae%e0%a5%81%e0%a4%97%e0%a5%8d%e0%a4%a7%e0%a4%a4%e0%a4%be-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%ac%e0%a4%a2%e0%a4%bc%e0%a4%a4%e0%a5%80-%e0%a4%ad%e0%a4%be%e0%a4%b5/feed/</wfw:commentRss>
		<slash:comments>0</slash:comments>
		</item>
		<item>
		<title>डिस्कसन कोई नया लफड़ा नहीं है</title>
		<link>http://www.janokti.com/art-literature-%e0%a4%95%e0%a4%b2%e0%a4%be-%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%b9%e0%a4%bf%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%af/satire-%e0%a4%b5%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a4%82%e0%a4%97/%e0%a4%a1%e0%a4%bf%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%95%e0%a4%b8%e0%a4%a8-%e0%a4%95%e0%a5%8b%e0%a4%88-%e0%a4%a8%e0%a4%af%e0%a4%be-%e0%a4%b2%e0%a4%ab%e0%a5%9c%e0%a4%be-%e0%a4%a8%e0%a4%b9%e0%a5%80%e0%a4%82/</link>
		<comments>http://www.janokti.com/art-literature-%e0%a4%95%e0%a4%b2%e0%a4%be-%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%b9%e0%a4%bf%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%af/satire-%e0%a4%b5%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a4%82%e0%a4%97/%e0%a4%a1%e0%a4%bf%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%95%e0%a4%b8%e0%a4%a8-%e0%a4%95%e0%a5%8b%e0%a4%88-%e0%a4%a8%e0%a4%af%e0%a4%be-%e0%a4%b2%e0%a4%ab%e0%a5%9c%e0%a4%be-%e0%a4%a8%e0%a4%b9%e0%a5%80%e0%a4%82/#comments</comments>
		<pubDate>Sun, 18 Oct 2009 05:31:11 +0000</pubDate>
		<dc:creator>जनोक्ति डेस्क</dc:creator>
				<category><![CDATA[व्यंग]]></category>
		<category><![CDATA[america 's nuclear deal]]></category>
		<category><![CDATA[china waar]]></category>
		<category><![CDATA[human being]]></category>
		<category><![CDATA[indian philosophy]]></category>
		<category><![CDATA[indo-pak discussion]]></category>
		<category><![CDATA[osho]]></category>
		<category><![CDATA[दर्शन]]></category>
		<category><![CDATA[भारतीय दर्शन]]></category>

		<guid isPermaLink="false">http://www.janokti.com/?p=926</guid>
		<description><![CDATA[&#160;आज एक हिंदी ब्लॉग पर छपे पोस्ट में डिस्कसन की चर्चा पढ़ी .जिसमें हिंदी मीडिया वाले ग्लोबल वार्मिंग को लेकर प्रसारित होने वाले कार्यक्रम के लिए पैनल बना रहे हैं . अब ,इन ससुरों को कौन समझाए दिन भर ए ]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><a href="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2009/10/discussion-group.jpg"><img width="300" height="225" class="aligncenter size-medium wp-image-930" title="discussion-group" alt="discussion-group" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2009/10/discussion-group-300x225.jpg" /></a></p>
<p style="text-align: justify;">&nbsp;आज एक हिंदी ब्लॉग पर छपे पोस्ट में डिस्कसन की चर्चा पढ़ी .जिसमें हिंदी मीडिया वाले ग्लोबल वार्मिंग को लेकर प्रसारित होने वाले कार्यक्रम के लिए पैनल बना रहे हैं . अब ,इन ससुरों को कौन समझाए दिन भर ए ०सी० में रहने वाले लोग जिन्हें स्वच्छ हवा लग जाए तो सर्दी हो जाती है . वो ग्लोबल वार्मिंग पर डिस्कस करेंगे ? वैसे यार बुराई नहीं है डिस्कस तो कोई भी कर सकता है . डिस्कस हीं तो करना है .दुनिया को ग्लोबल वार्मिंग का वरदान देने वाले देश अमेरिका आदि भी तो डिस्कस ही कर रहे है . डिस्कस एक ऐसा तरीका है जिससे मानव हर समस्या का समाधान खोजने का अभिनय करके मन को संतुष्ट करता है . दुनिया भी उसके इस स्वांग में मज़े लेती है . अरे ,भारत में तो लगभग सारे काम डिस्कसन पर हीं टिके हैं  . नक्सलियों से डिस्कस होती रहती है . अभी चीन से १२वे चरण के डिस्कस की तैयारी चल रही है . जब भी कुछ बड़ा धमाका होता है घुसपैठ होती है तो पाकिस्तान से डिस्कस करने की तैयारी शुरू हो जाती है .पानी के बटवारे को लेकर कर्णाटक तमिलनाडु से डिस्कस करता है . मायावती सर्वोच्च न्यायलय में डिस्कस कर रही है आखिर उसने अपनी मूर्ति जनता के पैसों से क्यों लगवाई ? कोई पार्टी आम चुनाव हारती है तब भी डिस्कसन होता है . जसवंत पार्टी से निकले जाते हैं तब भी डिस्कसन होता है . सार्वजनिक सन्दर्भों से अलग व्यक्तिगत जिन्दगी में भी डिस्कसन का महत्व बढ़ता जा रहा है .भाई -भाई , पति-पत्नी , बाप-बेटे की आपस की लड़ाई में भी डिस्कस के रामबाण से अचूक कोई इलाज नहीं है . अरबों के भारत में कुछ एक हज़ार न्यायालय इस बात की तस्दीक करते हैं कि यहाँ डिस्कस यानी बातचीत का कितना क्रेज है . यही नहीं पौराणिक कथाओं में भी डिस्कसन अर्थात शास्त्रार्थ की परंपरा का जिक्र मिलता है . मंडन मिश्र और शंकराचार्य का डिस्कसन जग जाहिर है .मध्यकाल में भी कुछ राजाओं के दरबार में डिस्कसन की चर्चा देखने को मिलती है .&nbsp; दक्षिण भारत के प्रतापी राजा कृष्णदेव राय&nbsp; और सम्राट अकबर के दरबार में बुद्धिजीवों के बीच होने वाले डिस्कसन आज भी मशहूर हैं और कहावतों के रूप में लोकप्रचलित भी . राजा महाराजाओं के अलावा सबसे महत्वपूर्ण डिस्कसन गुरुकुल में हुआ करता था जहाँ गुरु-शिष्य ब्रह्माण्ड के विभिन्न विषयों पर डिस्कस किया करते थे .आम आदमी चौपाल पर अपनी घर-गृहस्थी की बातें डिस्कस किया करते थे . अब ना तो चौपाल रहे , ना हीं गुरुकुल और ना हीं राजदरबार धीरे -धीरे डिस्कसन की स्वस्थ परंपरा बदल रही है .आज निरुद्देश्य, पक्षपातपूर्ण और दिखावे के डिस्कसन का चलन बढ़ गया है .राजदरबारों से निकल कर पान की दुकानों पर , गुरुकुल से निकल कर कॉलेज केंटिन में ,और चौपालों से हटकर दफ्तरों /सत्संग स्थलों / पार्कों आदि सार्वजनिक जगहों पर डिस्कसन का निवास स्थान हो गया है .आज कल राउंड टेबल डिस्कसन बड़े जोरों पर है . पर कोई बात नहीं जल्द हीं डिस्कसन को यहाँ से भी बगैर किसी नोटिस के निकाल दिया जायेगा तब वह चल देगा एक नए आशियाने की तलाश में &#8230;..</p>
]]></content:encoded>
			<wfw:commentRss>http://www.janokti.com/art-literature-%e0%a4%95%e0%a4%b2%e0%a4%be-%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%b9%e0%a4%bf%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%af/satire-%e0%a4%b5%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a4%82%e0%a4%97/%e0%a4%a1%e0%a4%bf%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%95%e0%a4%b8%e0%a4%a8-%e0%a4%95%e0%a5%8b%e0%a4%88-%e0%a4%a8%e0%a4%af%e0%a4%be-%e0%a4%b2%e0%a4%ab%e0%a5%9c%e0%a4%be-%e0%a4%a8%e0%a4%b9%e0%a5%80%e0%a4%82/feed/</wfw:commentRss>
		<slash:comments>3</slash:comments>
		</item>
		<item>
		<title>आइये खोजें मानव जीवन के रहस्य को {भाग -१}</title>
		<link>http://www.janokti.com/religion-%e0%a4%a7%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%ae-spritualism-%e0%a4%85%e0%a4%a7%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a4%be%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%ae/philosophy-%e0%a4%9c%e0%a5%80%e0%a4%b5%e0%a4%a8-%e0%a4%a6%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%b6%e0%a4%a8/%e0%a4%86%e0%a4%87%e0%a4%af%e0%a5%87-%e0%a4%96%e0%a5%8b%e0%a4%9c%e0%a5%87%e0%a4%82-%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a4%b5-%e0%a4%9c%e0%a5%80%e0%a4%b5%e0%a4%a8-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%b0%e0%a4%b9/</link>
		<comments>http://www.janokti.com/religion-%e0%a4%a7%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%ae-spritualism-%e0%a4%85%e0%a4%a7%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a4%be%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%ae/philosophy-%e0%a4%9c%e0%a5%80%e0%a4%b5%e0%a4%a8-%e0%a4%a6%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%b6%e0%a4%a8/%e0%a4%86%e0%a4%87%e0%a4%af%e0%a5%87-%e0%a4%96%e0%a5%8b%e0%a4%9c%e0%a5%87%e0%a4%82-%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a4%b5-%e0%a4%9c%e0%a5%80%e0%a4%b5%e0%a4%a8-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%b0%e0%a4%b9/#comments</comments>
		<pubDate>Sat, 17 Oct 2009 18:45:53 +0000</pubDate>
		<dc:creator>जयराम "विप्लव"</dc:creator>
				<category><![CDATA[दर्शन]]></category>
		<category><![CDATA[human being]]></category>
		<category><![CDATA[indian philosophy]]></category>
		<category><![CDATA[osho]]></category>
		<category><![CDATA[ओशो दर्शन]]></category>
		<category><![CDATA[भारतीय दर्शन]]></category>
		<category><![CDATA[मानव जीवन]]></category>

		<guid isPermaLink="false">http://www.janokti.com/?p=921</guid>
		<description><![CDATA[जीवन एक दौड़ है . वह&#160; बेतहाशा भाग रहा है बगैर यह जाने कि किस ओर जा रहा है ? कुछ पा लेने की ख्वाहिश मन की उत्कंठा को बढ़ा रही है . क्या पा लेना चाहता है वह ? ]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><a href="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2009/10/internet1.jpg"><img width="300" height="199" class="aligncenter size-medium wp-image-924" title="internet" alt="internet" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2009/10/internet1-300x199.jpg" /></a>जीवन एक दौड़ है . वह&nbsp; बेतहाशा भाग रहा है बगैर यह जाने कि किस ओर जा रहा है ? कुछ पा लेने की ख्वाहिश मन की उत्कंठा को बढ़ा रही है . क्या पा लेना चाहता है वह ? क्या उसे मालुम है उसकी मंजिल कहाँ है ? शायद नहीं भी और हाँ भी . वह असमंजस की स्थिति में यूँ ही आगे चला जा रहा है . इस बिना ट्राफी वाली दौड़ में वह अकेला नहीं है . इस संसार के अरबों इंसान इसी मुफलिसी के शिकार है . जीवन मानव सभ्यता की सबसे बड़ी पहेली बनकर रह गयी है .आज मानव के पास भौतिक सुख-सुविधा की हर वस्तु मौजूद है . पर इंसान बेचैन क्यों है ? क्या यह बेचैनी जीवन को ना समझ पाने की वजह से है ? मानव इतिहास में जिन चंद लोगों को दुनिया में सर्वमान्यता मिली हुई है क्या उन्होंने&nbsp; जिन्दगी के पहलुओं में छुपे रहस्यों को समझ लिया था ? आखिर क्या है जीवन का रहस्य ? एक समय संसार के सबसे प्राचीन धर्म {जीवन पद्धति } की रुढियों को चुनौती देने वाले&nbsp; महात्मा बुद्ध का आगमन हुआ था . भोगविलास की सुविधा संपन्न राजकुमार को आखिर किस बात की कमी खटक रही थी ? वह कौन सा कंटक मन को चुभ रहा था जिसने उसे महल -अटारी त्याग कर भिक्षुक बन यत्र-तत्र विचरने पर मजबूर कर दिया ? क्या जीवन को समझने का लक्ष्य सिद्धार्थ को महात्मा बुद्ध की ओर ले गया ? बुद्ध को स्वीकार्यता मिलना क्या सिद्धार्थ होने की देन है ?गृहस्थाश्रम छोड़ कर संन्यास ग्रहण करने के अनेक उदाहरण बिखरे पड़े हैं . ऐसे में समाज द्वारा बुद्ध को अपनाने पर भी प्रश्न उठाया जा सकता है . मानव सभ्यता की तमाम उपलब्धियां एक छोटे कालखंड में अपने सार्थक हैं और समकालीन मानव समाज उसे हीं अंतिम&nbsp; सत्य मानने की भूल&nbsp; करता आया है . यह बात राजनैतिक ,सामाजिक ,आध्यात्मिक ,सांस्कृतिक सभी आयामों में हुबहू प्रयुक्त होता है .प्रथम&nbsp; दृष्टि में बुद्ध को समझने पर ऐसा हीं मालुम होता है कि ज्ञान प्राप्ति हीं मनुष्य का अंतिम लक्ष्य है .लेकिन क्या बुद्ध ने जो कुछ अनुभव किया वह मानव जीवन का अंतिम सत्य है ? बुद्ध स्वयं अपने शिष्यों को कहते हैं &quot; मैंने जो कुछ कहा वह अंतिम सत्य नहीं है .आपकी ज्ञानेन्द्रियाँ जागृत है .खुद से सोचें ,समझें और अपने -अपने सत्य का संधान करें &quot; .अब तक ज्ञात&nbsp; मानव जीवन दर्शन अथवा विज्ञान&nbsp; में&nbsp; कोई अंतिम बात नहीं सिद्ध हो पाई है . चाहे आर्कमिडीज ,न्यूटन ,आइन्स्टीन ,सुकरात ,प्लेटो ,मनु, बुद्ध ,महावीर, ओशो ,या मुहम्मद सल्ल&nbsp; को देखें सबके तो एक तथ्य सामान दिखाई पड़ता है कि सबके अनुयायियों की अभीप्सा आज भी जस की तस बनी हुई है . सच तो यह है कि सत्य किसी से सुनकर आत्मसात करने की चीज नहीं है . सत्य किसी खोज नहीं हो सकता . सत्य को दर्ह्स्य नहीं जा सकता . सत्य अनुभव से परे और अनुभूति से दूर है . ठीक उसी प्रकार जैसे किसी को तैरना सीखना है तो इसके लिए तैरना जरुरी है और तैरने के लिए नदी में उतरना जरुई है . नदी के किनारे बैठकर सोचने मात्र से तैरने की विद्या नहीं आ सकती है . सत्य को जानना भी इसी से मिलती जुलती प्रक्रिया है . हम किनारे बैठ कर तैरने के सिद्धांत और नियम बना सकते हैं पर वाकई में तैरने के लिए नदी में&nbsp; गहरे पैठने की आवश्यकता होती है . किसी का अनुशरण करना और अनुयायी बन उसके हिस्से के सत्य को सबका सच मान लेने जैसा है .क्या सत्य का सच कभी मानव जान पायेगा ? प्रकृति में इतनी विविधता है कि समस्त ब्रह्माण्ड में नित नए &#8211; नए सिद्धांतों का आगमन होता रहता हैं . स्थिरता नाम की किसी चीज का अस्तित्व इस जगत में संभव नहीं दिखता . प्रत्येक हिस्सा चलायमान और क्षण भंगुर है .भौतिक जगत में मृत्यु जीवन का अंतिम सत्य होते हुए&nbsp; भी मनुष्य को सर्वाधिक अस्वीकार्य है .मानव स्वभाव में अपने अस्तित्व की समाप्ति को सहन कर पाना सहज नहीं होता . मृत्यु को झुठलाने का साधन भी मनुष्य ने इहलोक से परलोक की ओर आवागमन की कल्पना करके जुटा लिया है . { आगे जारी &#8230;&#8230;&#8230;}</p>
]]></content:encoded>
			<wfw:commentRss>http://www.janokti.com/religion-%e0%a4%a7%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%ae-spritualism-%e0%a4%85%e0%a4%a7%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a4%be%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%ae/philosophy-%e0%a4%9c%e0%a5%80%e0%a4%b5%e0%a4%a8-%e0%a4%a6%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%b6%e0%a4%a8/%e0%a4%86%e0%a4%87%e0%a4%af%e0%a5%87-%e0%a4%96%e0%a5%8b%e0%a4%9c%e0%a5%87%e0%a4%82-%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a4%b5-%e0%a4%9c%e0%a5%80%e0%a4%b5%e0%a4%a8-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%b0%e0%a4%b9/feed/</wfw:commentRss>
		<slash:comments>1</slash:comments>
		</item>
	</channel>
</rss>

