भारत माता ग्रामवासिनी
0भारत माता ग्रामवासिनी, भारत माता ग्रामवासिनी, शस्य श्यामला सुखद सुहासिनी, हिम-किरीट सुशोभित भाल है, गंगा जमुना कंठ धार है, सागर पवित्र पांव चूमता, पा सुगंध समीर झूमता, शीतल मलयज मधुर
रात भर का वह गहरा अँधेरा, रात भर का वह गहरा अँधेरा, गहन अवसाद था बहुतेरा, रजनी चुपचाप अश्रु बहाती, तुहिन कणों से धरा नहलाती, अरुणिमा पूरब में छटी जब,
प्रात:प्रथम किरण, सुहावने चरण. हो रथारूड़, यात्रा सुदूर- अपनी राह छोड़, तारों गृहों की ओर. सोचा,लक्ष निकट , पर अति विकट. राह लम्बी लगी. दीक्षा-उलझन भरी, बिना विकल्प, दृढ़ संकल्प.
पवित्रता “मैं जन्म जन्मान्तरों तक स्वयं को पवित्र रखने का यत्न करता रहूँगा यह जानते हुए- कि मेरे सार्वंग पर तुम्हारा स्पर्श है. मैं अपने विचारों से असत्यों को निकालने
भारत माता ग्रामवासिनी, भारत माता ग्रामवासिनी, शस्य श्यामला सुखद सुहासिनी, हिम-किरीट सुशोभित भाल है, गंगा जमुना कंठ धार है, सागर पवित्र पांव चूमता, पा सुगंध समीर झूमता, शीतल मलयज मधुर
हिंदी की अपने ही घर में दुर्दशा पर चिंता जाहिर करने के पहले एक घटना का जिक्र करना जरूरी समझता हूं जो हिंदी दिवस नामक रस्मअदायगी या प्रहसन को तार-तार
सिर्फ मातम-पुर्सी से काम नहीं चलने वाला है।हिन्दी भारत वर्ष में राज-काज की भाषा है,हमारे सम्मान की प्रतीक है,तो सभी प्रांतीय व स्थानीय भाषायें हिन्दी की बहनें।भारत-वर्ष में बोली जाने
सितम्बर हिन्दी के वार्षिक श्राद्ध का महीना है। हर संस्था और संस्थान इस महीने में हिन्दी दिवस, सप्ताह या पखवाड़ा मनाते हैं और इसके लिए मिले बजट को खा पी
“चल रे मटकी टम्मक टू ….” को “जॉनी जॉनी यस पापा…..” के सामने न जाने कितनी दफा शर्मिंदा होना पड़ा , अ-अनार के सामने ए-ऐपल्ल का, हमेशा से ही भारी
संस्कृत मां, हिन्दी गृहिणी और अंग्रेजी नौकरानी है, ऐसा कथन डॉ. फादर कामिल बुल्के का है जो संस्कृत और हिन्दी की श्रेष्ठता को बताने के लिए सम्पूर्ण है। मगर आज
रपट : पल्लव कुमार ,उदयपुर मनुष्य ताड़ पत्र से छापाखाने तक आया है। सब कुछ वैसा ही नहीं है जैसा हजार या पांच हजार बरस पहले था फिर मुद्रित शब्द