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	<title>JANOKTI : जनोक्ति :  राज-समाज और जन की आवाज &#187; democracy</title>
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		<title>पत्रकारिता का समर्थक बना न्यायालय अवमान कानून का संशोधन</title>
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		<pubDate>Thu, 16 Jun 2011 05:26:21 +0000</pubDate>
		<dc:creator>जनोक्ति डेस्क</dc:creator>
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		<description><![CDATA[भारत सेन लोकतंत्र का चौथा स्तंभ होने के बावजूद समाचार पत्र और विधिक पत्रकारिता को नियंत्रित करने वाले कानून की श्रेणी में न्यायालय अवमानना कानून समझा जाता रहा है। विधि के समाचार और न्यायालय के फैसले, कुछ अपवादो को छोड़ ]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><a rel="attachment wp-att-17118" href="http://www.janokti.com/hindi-news-media-%e0%a4%9a%e0%a5%8c%e0%a4%a5%e0%a4%be-%e0%a4%96%e0%a4%82%e0%a4%ad%e0%a4%be-cinema-media-blog-fourth-pilar/hindi-media-%e0%a4%ae%e0%a5%80%e0%a4%a1%e0%a4%bf%e0%a4%af%e0%a4%be/%e0%a4%aa%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%95%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a4%bf%e0%a4%a4%e0%a4%be-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%b8%e0%a4%ae%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%a5%e0%a4%95-%e0%a4%ac%e0%a4%a8%e0%a4%be/attachment/jour-2/"><img class="alignleft size-medium wp-image-17118" title="jour" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/jour1-300x257.jpg" alt="" width="300" height="257" /></a>भारत सेन</p>
<p style="text-align: justify;">लोकतंत्र का चौथा स्तंभ होने के बावजूद समाचार पत्र और विधिक पत्रकारिता को नियंत्रित करने वाले कानून की श्रेणी में न्यायालय अवमानना कानून समझा जाता रहा है। विधि के समाचार और न्यायालय के फैसले, कुछ अपवादो को छोड़ कर समाचार पत्र मे बड़े ही उपेक्षित स्थान पर विज्ञापनो के बीच सूचनात्मक समाचार के रूप में अंतिम पृष्ठ मे प्रकाशित किए जाते रहे है। न्यायालय अवमानना कानून के चलते न्याय व्यवस्था हमेशा पत्रकारो तथा जनप्रतिनिधियो की आलोचनाओ से दूर रही। इसका सबसे खराब नतीजा भी सामने आया। न्यायालय भ्रष्टाचार की शिकार होती चली जा रही, न्यायिक अधिकारियो के आवास पर रिश्वत के पैकेज पहुंचाने की घटना हो चुकी है तथा आम आदमी के लिए न्याय बहुत महंगा होता चला जा रहा है। न्यायप्रक्रिया की आड़ में कानून और मनावअधिकारो का हनन होता चला जाता है। विचाराधीन बंदीयो के चहरे पर छाई अनिश्चितता और उदासीनता, पक्षकारों के लम्बे खिचते मामले और अदालत दर अदालत पलटते फैसलो ने न्याय व्यवस्था के प्रति असंतुष्टो की संख्या मे भारी वृद्धि कर दी है। समाचार पत्र आम आदमी कीआवाज को सरकार और प्रशासन के पास पहुंचाते रहे हैं लेकिन न्यायिक व्यवस्था से परेशान आम आदमी की आवाज को उठाने मे बहुत दूर रहे। न्यायालयकर्मियो को कानून और न्याय प्रक्रिया की आड़ मे अवैधानिक वसूली करते तो देखा जा सकता था लेकिन समाचार पत्र मे भ्रष्टाचार विरोधी नोटिस प्रत्येक न्यायालयपटल पर लगाए जाने की मांग नही की जा सकी। इलेक्ट्रानिक मीडिया ने न्यायिक अधिकारीयो और न्यायालय में व्याप्त अनियमितता और भ्रष्टाचार पर स्टिंग आपरेशन करने का साहस कभी नही दिखा सका। न्यायालय अवमान कानून ने सबसे बड़ा अहित विधिक पत्रकारिता का किया हैं जिसके चलते पत्रकारिता किसी विचाराधीन बंदी की तरह सुनवाई के इन्तजार में सजा काटती चली गई। विधिक पत्रकारिता का विकास नही हो सका और कानून और न्याय के विषय पर विधिक साक्षरता अभियान समाचार पत्रो मे नही चलाया जा सका। न्यायालय के फैसलो के प्रति आम जनता की विशेष रूची पैदा नही की जा सकी। इससे लोकतंत्र का सबसे बड़ा अहित हुआ, न्याय और कानून का महत्व कम हुआ और लोक तंत्र भीड़ तंत्र बनता चला जा रहा हैं।</p>
<p style="text-align: justify;">ब्रिटिश शासन की देन न्यायालय अवमान कानून की सबसे बड़ी विशेषता है कि इसमें अवमान की कोई परिभाषा नही दी गई है। अवमान का अपराध किस तरह गठित होगा या न्याय अनुक्रम पर क्या प्रतिकूल असर पड़ेगा या फिर किस तरह से दखल होगा? कौन सी स्थिति कलंकात्मक है और कौन सी कलंकात्मक नही है? यह स्पष्ट नही किया गया है। सबकुछ न्यायिक विवेक पर छोड दिया गया। विधिशास्त्र मे कानून का सबसे बड़ा गुण, कानून मे निश्चितता होना बताया गया हैं। न्यायालय अवमान विधि का सबसे बड़ा दोष विधि में अनिश्चितता का होना है। इसका दुष्परिणाम समाचार पत्र जगत और पत्रकार भुगतते चले गए जबकि पत्रकारिता की परिभाषा और पत्रकारिता का संबंध परिवर्तन और क्रांति से लगाया जाता हैं। आखिर न्यायिक अधिकारिगण पत्रकारिता और जनसंचार को किस सीमा तक कितना समझते है? यह पत्रकारिता जगत के लिए विचारणीय और महत्वपूर्ण सवाल हमेशा से रहा हैं।</p>
<p style="text-align: justify;">समाचार पत्र जगत और पत्रकारिता से जुड़े विधि संवाददाता के लिए यह जानना जरूरी है कि क्या न्यायालय में व्याप्त भ्रष्टाचार और अनियमितता पर पत्रकारिता करना अवमानना कानून के दायरे में एक दण्डनीय अपराध हैं? क्या न्यायालय के फैसले पर सवाल उठाना, न्यायिक कार्य मे हस्तक्षेप की कोटी मे आता है? न्यायिक अधिकारियो के गैर न्यायिक कृत्य पर समाचार लिखना न्यायालय को कलंकित करने की कोटी मे आने वाला कृत्य है? कानून और न्यायिक शक्ति के दुरूपयोग पर विधिक पत्रकारिता करना अवमान है? क्या न्यायिक प्रक्रिया की आड़ मे जारी मानवअधिकारो के हनन पर समाचार नही लिखे जा सकते है? विधिक पत्रकारिता के लिए इन सवालो के जवाब की पड़ताल करना आवश्यक है।</p>
<p style="text-align: justify;">न्यायालय अवमानना कानून ब्रिटिश शासन की देन है जबकि भारत के लोग गुलाम थे और ब्रिटिश हमारे शासक थे। उस समय अंग्रेज सरकार और उसकी व्यवस्था के खिलाफ आवाज उठाना दण्डनीय अपराध हुआ करता था। अदालत के फैसलो पर सवाल उठाना अदालत की गरिमा के खिलाफ हुआ समझा जाता रहा। यह ठीक उसी तरह से था जैसा किसी राजतंत्र मे राजा की इच्छा सर्वोपरी होती थी और जनता को उसके हर आदेश का पालन करना पडता था चाहे वह सही हो या फिर गलत हो। राजा के आदेश पर जनता को विचार करने अथवा सुझाव देने का अधिकारी नही था।</p>
<p style="text-align: justify;">आजादी के बाद भारत गणतंत्र बन गया। भारत के लोग शासक बन गए और सरकारी अधिकारी लोकसेवक बन गए। भारत के संविधान मे आम नागरिक के मौलिक अधिकार और कर्तव्य स्पष्ट बताए गए हैं। लोक सेवको मे न्यायिक अधिकारी भी शामिल है। मालिक सेवाओ से असंतुष्ट होगा तो वह अपने सेवक की आलोचना तो करेगा। इसमे सेवक के अवमान की बात कहां से आ गई? लेकिन क्या मालिक अपने सेवक के काम को कठिन या असंभव बनाकर सेवक की आलोचना कर सकेगा?</p>
<p style="text-align: justify;">भारत के संविधान में नागरिको को वाक् और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता अनुच्छेद 19(1)(क)मे दी गई है और वही देश की उच्चतर न्यायालयों को अनुच्छेद 129 एवं 215 मे अवामन शक्ति दी गई है जो कि वाक् और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को सीमित करती है। संविधान के इन दोनो प्रावधानो के बीच कैसे तालमेल बिठाया जा सकता है? विधिक पत्रकारिता के दृष्टिकोण से विचार किया जाए तो इसका जवाब भारतीय संविधान की प्रस्तावना मे है। भारत एक लोकतंत्र है और लोकतंत्र में जनता सर्वोच्च होती है। इसलिए जनता के मौलिक अधिकार सर्वोच्च होगे और वाक् और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता अनुच्छेद 19(1)(क) मे दी हैं जो कि सर्वोच्च स्थान पर होगी और अवमानना कानून का स्थान बाद मे होगा। इस स्थिति की व्याख्या इस तरह से हो सकेगी कि लोकतंत्र मे लोग स्वतंत्र है और लोगो को लोकसेवको जिनमे न्यायधीश भी शामिल है कि आलोचाना करने का अधिकार हैं लेकिन उनको न्यायपालिका के कार्यो को कठिन बनाने या असंभव बनाने की सीमा तक जाने का जोखिम नही उठाना चाहिए।</p>
<p style="text-align: justify;">विश्वगुरू होने का दावा करने वाला भारत तो वास्तव मे विश्वसमुदाय खासकर पश्चिम का सबसे बड़ा शिष्य हमेशा से साबित होता रहा हैं। पश्चिम की प्रशासनिक व्यवस्था को भारत मे लागू किया जाता रहा है। न्यायालय अवमानना कानून पश्चिमी देशो में प्रयोग मे लाया जाना अब बीते दिनो की बात बन गई है। पश्चिम के समाचार पत्र और भारतीय मीडिया के बीच सबसे बड़ा अन्तर योग्यता का हैं। पश्चिम के समाचार पत्रो मे ज्यादातर विधि स्नातक पत्रकार होते है और कोर्ट रिपोर्टिंग के लिए अलग से कोर्ट रिपोर्टर नियुक्त किए जाते है जिनके पास अदालत मे कामकाज का कम से कम अनुभव होता हैं। पश्चिम मे पत्रकार, विशेषज्ञो के विशेषज्ञ होते हैं। इसलिए पश्चिम मे समाचार पत्र, न्यायालय और न्यायधीश के कार्टून भी छापते है और कानून और न्याय से जुड़े सवाल भी उठाते हैं। न्यायिक अधिकारी समाचारो से विचलित नही होते हैं उनको वरिष्ठ न्यायधीशो के द्वारा सलाह दी जाती हैं कि अवमान कार्यवाही के विषय पर सोचने के बजाए यह तय करे कि आपका किया गया फैसला कानून और न्याय के मापदण्डो के अनुरूप हैं अथवा नहीं हैं? और अपील किए जाने की दशा में यह फैसला बड़ी अदालतो में यथावत् बना रहेगा अथवा नहीं। न्यायधीश समाचार पत्र मे उनके फैसलो को लेकर छपे समाचार से कभी विचलित भी नही होते है और उनके सही होने का आत्मविश्वास ही उनका सबसे बड़ा बल होता है। इसके सकारात्मक परिणाम भी आते हैं। वास्तव मे न्याय बंदकमरे का गुण नही हैं तथा उसका मूल्यांकन किया जाना चाहिए और नागरिको की टिप्पणी का समाना करना चाहिए। आलोचनाओ से न्यायपालिका कमजोर होने के बजाए मजबूत होती चली जाती है।</p>
<p style="text-align: justify;">भारतीय व्यवस्था मे यह देखने मे आता रहा हैं कि हमारे विधायक, सांसद और मंत्री तक अवमान कानून के डर से न्यायालय को उसकी आलोचना करना तो दूर की बात सुझाव देने से भी डरते रहे हैं। अवमान कानून को लेकर राजनीतिज्ञ एवं कानून विद् यह तर्क देते हैं कि न्यायपालिका मे बारे मे सत्य बताना महामूर्खता है और कभी कभी तो खुद को संकट मे डालने के समान है। इस सबसे बड़ी कमी को दूर कर दिया गया हैं। इस संबंध मे न्यायालय अवमान संशोधन अधिनियम, वर्ष 2006 जिसमें एक नई धारा 13(ख) को स्थापित किया गया है जिसके तहत सत्य अब प्रतिरक्षा बन गई है अगर वह लोकतंत्र के हित में है और वास्तविक है। अवमान कानून का यह संशोधन वास्तव मे नागरिको के हित मे है जो कि वाक् और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को प्रतिरक्षा प्रदान करता है। मीडिया के प्रति बेहत कमजोर समझ रखने वाले न्यायिक अधिकारियो को नए दृष्टिकोण अपनाने की जरूरत  हैं। समाचार पत्र जगत में इस संशोधन का स्वागत किया जाना चाहिए।</p>
<p style="text-align: justify;">&nbsp;</p>
<p style="text-align: justify;">&nbsp;</p>
]]></content:encoded>
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		<title>माओवाद की राजधानी ‘मनातू’ जहाँ सांसद भी जाने से डरते हैं &#124;</title>
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		<pubDate>Sat, 05 Feb 2011 11:22:36 +0000</pubDate>
		<dc:creator>जयराम "विप्लव"</dc:creator>
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		<description><![CDATA[जनोक्ति की टीम झारखण्ड में माओवाद की जमीन तलाशने के लिए राजधानी रांची से होते हुए पलामू ( डाल्टेनगंज ) पहुंची &#124; पलामू की जमीन पर कदम रखने से पहले जो सबसे बड़ा शब्द था &#8216; माओवाद &#8216; जिसके गहरे ]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><a rel="attachment wp-att-13324" href="http://www.janokti.com/government-failure-%e0%a4%85%e0%a4%82%e0%a4%a7%e0%a5%87%e0%a4%b0-%e0%a4%a8%e0%a4%97%e0%a4%b0%e0%a5%80/%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%93%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%a6-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%9c%e0%a4%a7%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a5%80-%e2%80%98%e0%a4%ae%e0%a4%a8%e0%a4%be%e0%a4%a4%e0%a5%82/attachment/mnaatu/"><img class="alignright size-medium wp-image-13324" title="mnaatu" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/mnaatu-300x225.jpg" alt="" width="300" height="225" /></a>जनोक्ति की टीम झारखण्ड में माओवाद की जमीन तलाशने के लिए राजधानी रांची से होते हुए पलामू ( डाल्टेनगंज ) पहुंची | पलामू की जमीन पर कदम रखने से पहले जो सबसे बड़ा शब्द था &#8216; माओवाद &#8216; जिसके गहरे निहितार्थ में हमें उतरना था |  रांची छोड़ने से पहले हमारे मन में आशंकाओं  के बादल उमड़ रहे थे लेकिन सच्चाई को जानने की जिद भी थी | रांची से पलामू पहुँचने के क्रम में कई ऐसे दृश्य नजरों से होकर गुजरे जो कल्पना से परे थे | एक -एक पुल की सुरक्षा में अर्ध-सैनिक बालों केदो दर्जन जवान गश्त लगा रहे थे | सडकों पर घुमती बख्तरबंद गाडियां इलाके में दहशत की कहानी को बयान कर रही थी | किसी प्रकार हम पलामू के अत्यंत पिछड़े और नक्सल प्रभावित प्रखंड मनातू पहुंचे | यहाँ जिला मुख्यालय से क्षेत्र के प्रखंडों को जोड़ने का एक मात्र माध्यम सालों पहले बनी जर्जर सड़कें जिसपर महज एक ही बस आवा-गमन करती है |  शिक्षा -स्वास्थ्य &#8211; सड़क -बिजली -पानी जैसी मुलभुत सुविधाओं से विहीन मनातू के लोगों से मिलकर हमने जो कुछ समझा उसको लेकर शासन तंत्र और जनप्रतिनिधियों के ऊपर अनेक सवाल उठ रहे थे |  इन्हीं सवालों को जानने के लिए हम पहुंचे क्षेत्र के सांसद &#8216;इन्दर सिंह नामधारी &#8216; के पास जो पूर्व में झारखण्ड विधानसभा के अध्यक्ष भी रह चुके हैं |  सम्बंधित मुद्दे पर झारखण्ड के सबसे शिक्षित और सजग कहे जाने वाले जनप्रतिनिधि इन्दर सिंह नामधारी से हमारी बातचीत पर आधारित रिपोर्ट प्रस्तुत है :</p>
<p style="text-align: justify;">भौगोलिक रूप से देश के सबसे बड़े लोकसभा क्षेत्र में से एक चतरा के सांसद इन्दर सिंह नामधारी ने बातचीत के दौरान मनातू को <strong>माओवादियों के अभ्यारण्य </strong><span style="font-size: 13.3333px;">की संज्ञा देते हुए हमारे सकुशल लौट आने पर आश्चर्य का भाव प्रकट किया | उन्होंने क्षेत्र में &#8216;भय&#8217; को रेखांकित करते हुए बताया कि मनातू ब्लोक का प्रखंड विकास पदाधिकारी वहां ना बैठ कर पड़ोस के &#8216; तरहस्सी &#8216; ब्लोक में बैठते हैं | उनसे जब हमने इलाके में नदारद मूलभूत सुविधाओं की बात छेड़ते हुए सड़क और बिजली की बदहाली की बात सामने रखी तो उन्होंने कहा कि माओवादियों के भय से कोई भी ठेकेदार टेंडर भरने को तैयार नहीं है | मोटी रकम  नक्सलियों को देने के बाद भी जान-माल की सलामती का सवाल बना रहता है | इसका एक ही उपाय है कि सुरक्षा बालों की कड़ी निगरानी में सड़क निर्माण का काम हो और यह कार्य केवल आर्मी के द्वारा ही संभव है | सड़क निर्माण में आर्मी की मदद की फ़रियाद लेकर वो केन्द्रीय गृहमंत्री चिदंबरम के पास भी पहुंचे थे | लेकिन चिदंबरम ने इस मामले में असमर्थता जाहिर की |</span></p>
<p style="text-align: justify;">सांसद महोदय के अनुसार बिजली के लिए लोडशेडिंग की सबसे बड़ी समस्या है | विकास कार्यों में आने वाली बाधाओं को गिनाते हुए उन्होंने सांसदों और विधायकों की लड़ाई को भी बहुत हद तक जिम्मेदार बताया | जनप्रतिनिधियों में आपसी ताल मेल के अभाव में नौकरशाहों की मनमानी की शिकार क्षेत्र की जनता हो रही है | विकास मद में होने वाले प्रत्येक कार्य यहाँ तक की नरेगा में भी ४० %  कमीशनखोरी यहाँ आम बात है | डाल्टेनगंज के वर्तमान डी डी सी के ऊपर कमीशनखोरी और आर्थिक अनियमितता के सिलसिले में रंगे हाथों पकडे जाने पर भी राज्य सरकार की कृपा दृष्टि उन पर बनी हुई है | डी डी सी को बर्खास्त किये जाने की मांग को लेकर सांसद महोदय ने प्रदेश के मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा को एक पत्र भी लिखा लेकिन अब तक कोई परिणाम सामने नहीं आया है |</p>
<p style="text-align: justify;">साथ-साथ पारा शिक्षकों और एनजीओ की मिलीभगत से मध्याह्न भोजन में होने वाली धांधलियों का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि योजनाओं का क्रियान्वयन जमीनी तौर पर दो फीसदी भी नहीं हो पा रहा है | माओवादियों के नाम पर सरकारी अफसरों और कर्मचारियों इलाके से गायब रहते हैं | स्थानीय जनप्रतिनिधि का भी इस ओर कोई ध्यान नहीं है | विधायक महाशय को भी क्षेत्र की जनता शोषक के रूप में ही देखती है | शैक्षिक रूप से पिछड़े लोग अपने अधिकारों से अनजान और आवाज उठाने में असमर्थ हैं | बार-बार चुनाव में ऐसे लोगों को जीता कर पांच सालों तक उनकी मेहरबानियों पर गुजर-बसर करते हैं |</p>
<p style="text-align: justify;">मनातू में स्वास्थ्य केन्द्रों में चिकित्सकों की गैर मौजूदगी और एम्बुलेंस सेवा के ना होने के सवाल पर उन्होंने कन्नी काटते हुए कहा कि ऐसे इलाके में एम्बुलेंस सेवा का उपयोग कम दुरूपयोग ज्यादा होगा | हालाँकि ऐसा होता भी इलाके के स्वस्थ्य केंद्र में सोलर सेवा का उपयोग मरीजो के इलाज में हो ना हो कर्मचारियों के मोबाइल चार्ज में जरुर होता है |</p>
<p style="text-align: justify;">सांसद महोदय ने दार्शनिक अंदाज में क्षेत्र की समस्याओं से अपना पल्ला झाड़ते हुए कहा कि &#8216; <strong>इंसान परिस्थितियों का गुलाम होता है &#8216;  |</strong></p>
<p style="text-align: justify;">
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		<title>आम लोगों की एकजुटता से झुकेगी सत्ता</title>
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		<pubDate>Mon, 29 Nov 2010 14:37:48 +0000</pubDate>
		<dc:creator>डा ० पुरुषोत्तम मीणा</dc:creator>
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		<description><![CDATA[आज हमारे लिये सबसे जरूरी और महत्वपूर्ण है कि देश या समाज के लिये न सही, कम से कम अपने आपके और अपनी आने वाली पीढियों के सुखद एवं सुरक्षित भविष्य के लिये तो हम अपने वर्तमान जीवन को सुधारें। ]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><a rel="attachment wp-att-11068" href="http://www.janokti.com/discussion-suggestions-%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%9a%e0%a4%be%e0%a4%b0-%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%ae%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%b6/%e0%a4%86%e0%a4%ae-%e0%a4%b2%e0%a5%8b%e0%a4%97%e0%a5%8b%e0%a4%82-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%8f%e0%a4%95%e0%a4%9c%e0%a5%81%e0%a4%9f%e0%a4%a4%e0%a4%be-%e0%a4%b8%e0%a5%87-%e0%a4%9d%e0%a5%81%e0%a4%95/attachment/3srs1/"><img class="alignright size-medium wp-image-11068" title="3srs1" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/3srs1-300x225.jpg" alt="" width="300" height="225" /></a>आज हमारे लिये सबसे जरूरी और महत्वपूर्ण है कि देश या समाज के लिये न सही, कम से कम अपने आपके और अपनी आने वाली पीढियों के सुखद एवं सुरक्षित भविष्य के लिये तो हम अपने वर्तमान जीवन को सुधारें। यदि हम सब लोग केवल अपने वर्तमान को सुधारने का ही दृढ निश्चय कर लें तो आने वाले कल का अच्छा होना तय है, लेकिन हमारे आज अर्थात् वर्तमान के हालात तो दिन-प्रतिदिन बिगडते ही जा रहे हैं। हम चुपचाप सबकुछ देखते और झेलते रहते हैं। जिसका दुष्परिणाम यह है कि आज हमारे देश में जिन लोगों के हाथों में सत्ता की ताकत हैं, उनमें से अधिकतर का सच्चाई, ईमानदारी एवं इंसाफ से दूर-दूर का भी नाता नहीं रह गया है। अधिकतर भ्रष्टाचार के दलदल में अन्दर तक धंसे हुए हैं और अब तो ये लोग अपराधियों को संरक्षण भी दे रहे हैं। ताकतवर लोग जब चाहें, जैसे चाहें देश के मान-सम्मान, कानून, व्यवस्था और संविधान के साथ बलात्कार करके चलते बनते हैं और सजा होना तो दूर इनके खिलाफ मुकदमे तक दर्ज नहीं होते! जबकि बच्चे की भूख मिटाने हेतु रोटी चुराने वाली अनेक माताएँ जेलों में बन्द हैं। इन भ्रष्ट एवं अत्याचारियों के खिलाफ यदि कोई आम व्यक्ति या ईमानदार अफसर या कर्मचारी आवाज उठाना चाहे, तो उसे तरह-तरह से प्रताड़ित एवं अपमानित करने का प्रयास किया जाता है और सबसे दु:खद तो ये है कि पूरी की पूरी व्यवस्था अंधी, बहरी और गूंगी बनी देखती रहती है।</p>
<p style="text-align: justify;"><span style="font-size: 13.3333px;">अब तो हालात इतने बिगडते चुके हैं कि मसाले, घी, तेल और दवाइयों तक में धडल्ले से मिलावट की जा रही है। ऐसे में कितनी माताओं की कोख मिलावट के कारण उजड जाती है और कितनी नव-प्रसूताओं की मांग का सिन्दूर नकली दवाईयों के चलते युवावस्था में ही धुल जाता है, कितने पिताओं को कन्धा देने वाले तक नहीं बचते, इस बात का अन्दाजा भी नहीं लगाया जा सकता। इस सबके उपरान्त भी इन भ्रष्ट एवं अत्याचारियों का एकजुट होकर सामना करने के बजाय हम चुप्पी साधकर, अपने कानूनी हकों तक के लिये भी गिडगिडाते रहते हैं।</span></p>
<p style="text-align: justify;"><span style="font-size: 13.3333px;">अधिकतर लोग तो इस डर से ही चुप्पी साध लेते हैं कि यदि वे किसी के खिलाफ बोलेंगे तो उन्हें भी फंसाया जा सकता है। इसलिये वे अपने घरों में दुबके रहते हैं! ऐसे लोगों से मेरा सीधा-सीधा सवाल है कि यदि ऐसा ही चलता रहा तो आने वाले समय में हमारे आसपास की गंदगी को साफ करने वाले यह कहकर सफाई करना बन्द कर देंगे, कि गन्दगी साफ करेंगे तो गन्दगी से बीमारी होने का खतरा है? खानों में होने वाली दुर्घटनाओं से भयभीत होकर खनन मजदूर यह कहकर कि खान गिरने से जीवन को खतरा है, खान में काम करना बंद कर दे, तो क्या हमें खनिज उपलब्ध हो पायेंगे? इलाज करते समय मरीजों से रोगाणुओं से ग्रसित होने के भय से डॉक्टर रोगियों का उपचार करना बन्द कर दें, तो बीमारों को कैसे बचाया जा सकेगा? आतंकियों, नक्सलियों एवं गुण्डों के हाथों आये दिन पुलिसवालों के मारे जाने के कारण यदि पुलिस यह सोचकर इनके खिलाफ कार्यवाही करना बन्द कर दें कि उनको और उनके परिवार को नुकसान पहुँचा सकता हैं, तो क्या सामाज की कानून व्यवस्था नियन्त्रित रह सकती है? पुलिस के बिना क्या हमारी जानमाल की सुरक्षा सम्भव है? आतंकियों तथा दुश्मनों के हाथों मारे जाने वाले फौजियों के शवों को देखकर, फौजी सरहद पर पहरा देना बंद कर दें, तो क्या हम अपने घरों में चैन की नींद सो पाएंगे?</span></p>
<p style="text-align: justify;"><span style="font-size: 13.3333px;">यदि नाइंसाफी के खिलाफ हमने अब भी अपनी चुप्पी नहीं तोडी और यदि आगे भी ऐसा ही चलता रहा तो आज नहीं तो कल जो कुछ भी शेष बचा है, वह सब कुछ नष्ट-भ्रष्ट हो जाने वाला है। आज आम व्यक्ति को लगता है कि उसकी रक्षा करने वाला कोई भी नहीं है! क्या इसका कारण ये नहीं है, कि आम व्यक्ति स्वयं ही अपने आप पर विश्वास खोता जा रहा है? ऐसे हालात में दो ही रास्ते हैं-या तो हम अत्याचारियों के जुल्म और मनमानी को सहते रहें या समाज के सभी अच्छे, सच्चे, देशभक्त, ईमानदार और न्यायप्रिय-सरकारी कर्मचारी, अफसर तथा आम लोग एकजुट होकर एक-दूसरे की ढाल बन जायें। क्योंकि लोकतन्त्र में समर्पित, संगठित एवं सच्चे लोगों की एकजुट ताकत के आगे झुकना सत्ता की मजबूरी है और सत्ता वो धुरी है, जिसके आगे सभी प्रशासनिक निकाय और बडे-बडे अफसर आदेश की मुद्रा में मौन खडे रहते हैं।</span></p>
<p style="text-align: justify;">
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		<title>पंचायत में महिलाओं की भूमिका</title>
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		<pubDate>Mon, 29 Nov 2010 09:23:49 +0000</pubDate>
		<dc:creator>जनोक्ति डेस्क</dc:creator>
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		<description><![CDATA[अभी हाल ही में उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनाव समाप्त हुआ है और झारखण्ड में पंचायत चुनाव चल रहे हैं । ऐसा देखने में आया है कि पंचायत चुनावों में महिलाओं की भूमिका तेजी से बढ़ रही है । महिलाओं ]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><span style="font-size: 13.3333px;"><a rel="attachment wp-att-11056" href="http://www.janokti.com/?attachment_id=11056"><img class="alignright size-medium wp-image-11056" title="panchayat1 (1)" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/panchayat1-1-300x177.jpg" alt="" width="300" height="177" /></a>अभी हाल ही में उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनाव समाप्त हुआ है और झारखण्ड में पंचायत चुनाव चल रहे हैं । ऐसा देखने में आया है कि पंचायत चुनावों में महिलाओं की भूमिका तेजी से बढ़ रही है ।  महिलाओं की भागीदारी पर चर्चा कर रहे हैं <strong>लोकेन्द्रसिंह कोट</strong>-</span></p>
<p style="text-align: justify;"><span style="font-size: 13.3333px;">लोकतंत्र की सबसे छोटी लेकिन महत्वपूर्ण इकाई हैं पंचायत। यह लोकतंत्र की पहली सीढ़ी है। पंचायत की बात प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रूप से सदियों से होती रही है। वर्ष 1955 में पंचायती राज व्यवस्था तो की गई पर कई कारणों से यह असफल सिद्ध हुई। एक बड़े अंतराल के बाद 1993 में 73वें एवं 74वें संशोधन में अभी तक हाशिए पर रही महिलाओं को पंचायतों में 33 प्रतिशत आरक्षण दिया गया।</span></p>
<p style="text-align: justify;">इस उल्लेखनीय आरक्षण का परिणाम यह रहा कि देश भर की पंचायतों में लगभग 163000 महिलाएं विभिन्न पदों पर नियुक्त हुईं तथा सरपंच के तौर पर लगभग 10000 महिलाएं आगे आईं। एक पुरुष प्रधान समाज में इतना बड़ा बदलाव एक बारगी तो खुश होने के लिये पर्याप्त था लेकिन बदलाव की इस प्रक्रिया में सिक्के का दूसरा पहलू भी विद्यमान रहा। कागजी आंकड़ों और व्यवहारिक सत्य में ज़मीन-आसमान का अंतर पाया गया।</p>
<p style="text-align: justify;">सच तो यह है कि महिला जनप्रतिधियों के पुरुष रिश्तेदार ही अधिकांश जगहों पर शासन करते रहे और महिलाओं को पर्दे के पीछे रखा गया। ताजा अध्ययन बताते हैं कि लगभग आधे से ज्यादा जगहों पर ऐसा खुले तौर पर हो रहा है। ग्रामीण समाज ने भी इसे मौन स्वीकृति दे रखी है। महिला जनप्रतिनिधियों के कंधों पर बंदूकें रख कर उनके पुरुश रिश्तेदार भ्रश्टाचार में लीन हैं और इल्जाम महिला जनप्रतिनिधियों के सर लग रहे हैं। इससे  ग्रामीण महिला को लोकतंत्र की इस निचली पाठशाला से यही सीखने को मिल रहा है कि पंचायत या सत्ता धन कमाने का एक स्रोत भर हैं। वास्तव में ग्रामीण महिलाओं की पंचायतों में भागीदारी को तो अपना लिया गया लेकिन उनकी सामाजिक-आर्थिक स्थितियों के मूल में जाकर नहीं देखा गया। महिलाओं को एक पूर्व निर्धारित ढ़ांचे में फिट कर दिया गया, बगैर यह देखे कि अनुकूल और प्रतिकूल परिस्थितियां क्या हैं। जबकि होना यह था कि इन ग्रामीण महिलाओं के ढांचे में व्यवस्था को फिट करना था। इसके पष्चात् कई शिकायतें जो हम कर पर रहे है, वे नहीं होती।</p>
<p style="text-align: justify;">शिक्षा का ही उदाहरण लें। शिक्षा की कमी उनके आत्म-विकास और आत्म-सम्मान में सबसे बाधक रही है। यद्यपि पिछले पांच दशकों में महिला साक्षरता कई गुना बढ़ी है फिर भी उनमें शिक्षा का स्तर निम्न है। इसके अलावा सिर्फ साक्षर होने भर से ही महिलाओं को जागरूक होना आ जाएगा, ऐसा सोचना सही नहीं है। साक्षर महिला जनप्रतिनिधियों को लेकर किये गये एक अध्ययन के अनुसार अभी भी वे ‘महिला समस्या’ को नहीं समझ पाई हैं उनमें महिला विकास जैसा कोई चिंतन ही नही हैं।</p>
<p style="text-align: justify;">ग्रामीण महिलाओं के संदर्भ में यह तथ्य भी चैंकाने वाला है कि लगभग पचपन से साठ प्रतिशत महिलाएं घरेलू हिंसा की शिकार हैं। इसका सीधा अर्थ यही है कि महिलाएं अपने घर में ही दमन चक्र झेलने को मजबूर हैं। ऐसे में इनसे आशा करना कि वे पंचायत के कार्यों एवं उनकी समस्याओं के लिए लड़ें तो यह सर्वथा बेमानी ही होगा।</p>
<p style="text-align: justify;">इसे विडम्बना ही कहेंगे कि जहां हम महिला उत्थान और उनकी सत्ता में भागीदारी के लिए लड़ते रहे, वहीं उसी के समानान्तर पुरूश और महिलाओं के अनुपात में देशव्यापी गिरावट आती रही। 972 प्रति हजार पुरुष से घटकर आज यह 934 प्रति हजार पुरुष तक पहुँच चुकी है। ऐसे में कभी-कभी लगता है कि दबाव के चलते सब कुछ अपना रहे हैं परन्तु मन से महिलाओं को आगे बढ़ाना हम नहीं चाहते। कुछ जागरूक महिला सरपंचों द्वारा लिए गए निर्णयों (चाहे वे कितने ही अच्छे क्यों न हो) को सरेआम पुरूश साथियों द्वारा नकारने की घटनाएं भी सामने आई हैं। कई स्थानों पर महिलाओं को तरह-तरह से अपमानित किया जाना हमारी उसी पुरूश आधारित मानसिकता का परिचायक है।</p>
<p style="text-align: justify;">वैसे देखा जाए तो ग्रामीण महिलाएं जब अपने घरेलू कार्यों के साथ-साथ कृषि कार्यों को भी सही प्रबंधन कर निपटा लेती हैं तथा अपने बच्चों का भी पालन-पोषण कर लेती हैं तो ऐसी कुशल प्रबंधक को पंचायत का पोषण करने में कहाँ समस्या आ सकती है। वे अपने उद्देश्यों के प्रति अपने संस्कारों की वजह से अधिक प्रतिबद्ध, ईमानदार और उत्साही रहती हैं। जरूरत इस बात की है कि संपूर्ण व्यवस्था उनके पक्ष को लेकर पुनर्व्यवस्थित हो और उन्हें पारिवारिक सहमति प्राप्त हो। हमें पंचायती राज में महिलाओं की भागीदारी के बारह-तेरह वर्षों बाद अनुभवों को महत्व देते हुए प्रत्येक पहलू की पुर्नव्यवस्था करना होगी।</p>
<p style="text-align: justify;"><span style="font-size: 13.3333px;"><strong><a href="http://charkha.org">चरखा</a></strong></span></p>
]]></content:encoded>
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		<title>बिहार का जनादेश</title>
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		<pubDate>Sat, 27 Nov 2010 16:26:59 +0000</pubDate>
		<dc:creator>रमेश भट्ट</dc:creator>
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		<description><![CDATA[बिहार का जनादेश क्या कहता है। सबके जेहन में यही बात है। क्या बिहारी अवाम ने जातिवाद को नकारकर सिर्फ और सिर्फ विकास के नाम पर वोट दिया है। या बिहार की जनता के पास एनडीए गठबंधन के अलावा कोई ]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><a rel="attachment wp-att-11027" href="http://www.janokti.com/?attachment_id=11027"><img class="alignright size-full wp-image-11027" title="bihar jai bihar" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/bihar-jai-bihar.jpg" alt="" width="310" height="253" /></a>बिहार का जनादेश क्या कहता है। सबके जेहन में यही बात है। क्या बिहारी अवाम ने जातिवाद को नकारकर सिर्फ और सिर्फ विकास के नाम पर वोट दिया है। या बिहार की जनता के पास एनडीए गठबंधन के अलावा कोई विकल्प नही था। या फिर लोगों को नीतीश में वह क्षमता दिखाई दी जो बिहार में विकास की नई कहानी लिखने का माददा रखता है। इस चुनाव में जो प्रचण्ड जनादेश एनडीए गठबंधन के पक्ष में आया उसने यह साफ कर दिया की भारतीय मतदाता के लिए विकास अब सबसे बड़ा मुददा है। यही कारण है कि लालू पासवान की जोड़ी को जनता ने आइना दिखा दिया। इस चुनाव ने एक बार फिर परिवारवाद को भी तमाचा मारा है। इसका जीता जागता उदाहरण राबड़ी देवी का दोनों विधानसभाओं राघोपुर और सोनपुर ने बुरी तरह आ गई। यह दोनों इलाके यादव बहुल और लालू के गड़ माने जाते हैं। मगर वोट को अपनी जागीर समझने वाले नेताओं को कौन समझाये कि जनता को ज्यादा दिन तक अंधेरे में नही रखा जा सकता। यह दूसरा सबसे बड़ा उदाहरण है। इससे पहले मुलायम सिंह की बहू को फिरोजाबाद से जनता नकार चुकी है। यह इलाका भी मुलायम सिंह का गड़ माना जाता है। सवाल यह कि क्या यह उन नेताओं के लिए सन्देश है जो परिवारवाद को बड़ावा दे रहे है। सबसे बुरी दशा कांग्रेस की हुई है। वह कांग्रेस जो केन्द्र में है जिसके पास सोनिया और राहुल है। दरअसल कांग्रेसी हमेशा इस गलत फहमी में रहते है की यह दोनों नेता उनकी जीत को हार में बदल देंगे। नतीजा यह रहा कि राहुल गांधी ने जिन 17 जगहों पर बिहार में प्रचार किया वहां एक दो जगह छोड़कर पार्टी को हार का सामना करना पड़ा। आजादी के इन 6 दशकों में बिहार में कांग्रेस राजद और एनडीए गठबंधन ने राज किया। इनमें लालू राज में बिहार की हालत बद से बदतर हो गई। कानून व्यवस्था को लेकर बिहार सुर्खियों में रहने लगा। नीतीश ने इसी नब्ज को दबाया और 50 हजार से ज्यादा अपराधियों को जेल में डाल दिया। नतीजा लोग अब देर सबेर कहीं भी आ जा सकते है। दूसरा काम सड़कों के निर्माण का। तीसरा दलितों और अकलियतों में अति दलितों का पहचान कर उनके विकास के लिए कार्यक्रम चलाना। महिलाओं को पंचायत और शहरी निकाय में 50 फीसदी आरक्षण प्रदान करना। आज बिहार में लोग प्राथमिक चिकित्सालय में इलाज के लिए आ रहे हैं। लोगों में विकास की एक नयी ललक जगी है। जरूरत है इस ललक को बनाये रखना। नीतीश कुमार 2015 में बिहार को विकसीत राज्या बनाने की बात कर रहें है। मगर इसके लिए उन्हें निवेश के लिए उद्योगपतियों को बिहार में बुलाना पड़ेगा। अपने वादे के मुताबिक सार्वजनिक वितरण प्रणाली को बेहतर बनाना होगा। पलायन रोकने के लिए कुछ बड़े कदम उठाने होंगे।</p>
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		<title>काम को इनाम (बिहार चुनाव परिणाम)</title>
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		<pubDate>Sat, 27 Nov 2010 14:20:35 +0000</pubDate>
		<dc:creator>अजय केशरी</dc:creator>
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		<description><![CDATA[बिहार विधान सभा चुनाव परिणाम में एनडीए को तीन चौथाई बहुमत का मिलना यह जताता है कि &#8220;जो सरकार काम करेगी वही राज करेगी&#8221;। पिचले पांच सालों में एनडीए कि सरकार ने बिहार में जो काम किया उसके एवज में ]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><a rel="attachment wp-att-11003" href="http://www.janokti.com/?attachment_id=11003"><img class="alignleft size-medium wp-image-11003" title="big bos" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/big-bos-300x206.jpg" alt="" width="270" height="185" /></a>बिहार  विधान सभा चुनाव परिणाम में एनडीए को तीन चौथाई बहुमत का मिलना यह जताता  है कि &#8220;जो सरकार काम करेगी वही राज करेगी&#8221;। पिचले पांच सालों में एनडीए कि  सरकार ने बिहार में जो काम किया उसके एवज में बिहार के लोगों ने जातिवाद की  रेखा को पार कर अपने मताधिकार का प्रयोग कर एक ऐसे गठबंधन पार्टी को पूर्ण  जनादेश दिया जो पिचले पांच वर्षो में काम कर बिहार को जंगल राज से उबार एक  ऐसे रास्ते पर अग्रसर किया जहाँ से बिहार की अपनी पहचान बनानी शुरू हुई।  आज बिहार की जो गरिमा बनी है वह पिछले एनडीए सरकार की देन है।<br />
अगर  हम पिछले पांच वर्षों को छोड़ दें और उसके पीछे के पंद्रह वर्षों के अतीत  में झांके तो एक बदहाल बिहार नज़र आता है। जहाँ उंच-नीच का वेदभाव,  जाति-जाति में टकराव, नक्सलवाद का बोलबाला, फलता-फूलता अपहरण उद्योग,  अपराधिक एवं राजनितिक सांठ-गाँठ, अपराधिक तत्वों का बोलबाला, ला एंड आडर का  बुरा हाल, जर्जर सड़कें, सरकारी हस्पतालों का बुरा हाल, शिच्छा के स्तर का  मटियामेट होना, बंद पड़े उद्योग धंधे, जीने का आधार ख़त्म (तभी तो हर तबके  का पलायन हुआ बिहार से) यानि पूरी तरह बर्बाद बिहार नज़र आता है।<br />
फिर आता  है २००५ का बिहार विधान सभा चुनाव। धन्य हो चुनाव आयोग की टीम धन्य हो  श्री के.जे.राव जिनकी सक्रियता के चलते बिहार में निष्पच्छ चुनाव हो सका और  एनडीए की सरकार सत्ता में आ सकी। अगर चुनाव आयोग के पहल में कही भी थोड़ी  सी भी त्रुटी होती तो फिर से आरजेडी की सरकार सत्ता पर काबिज़ होती और  बिहार में फिर वही सब होता जो पिछले पंद्रह सालों तक होता रहा था।<br />
बिहार  विधान सभा चुनाव २००५ में एनडीए की सरकार श्री नितीश कुमार की अगुवाई में  बनी। पूरी तरह से बर्बाद बिहार को एक नया आयाम देने के लिए नितीश कुमार ने  कमर कस ली। उन्होंने बिहार के लिए कुछ सपने पाल रखे थे और फिर उन सपनो को  साकार करने में जुट गए। वह पिछली सरकार की नीतियों पर न चल कर खुद की बनाई  नीतियों पर चलना शुरू किया। जिसमे शामिल था बिहार में कानून का राज, ताकि  लोग अमन चैन से जीवन बसर कर सके, सड़कें जो पूरी तरह बर्बाद हो चुकी थी उसे  ठीक करना, सरकारी हस्पतालों की जर्जर स्थिति से ऊपर उठाना, आधी आबादी  (महिला) को उनका हक देना, शिच्छा के स्तर को ऊपर उठाना, बिहार में बाहरी  उद्योगपतियों को आकर्षित करने के लिए एक अच्छा माहौल बनाना, बिजली उत्पादन  को बढ़ाना तथा आत्म निर्भर बनना, बिहार के लोगों को रोज़गार धंधे मुहैया  करना (ताकि बिहारियों का पलायन रुक सके), उच्च शिच्छा के लिए बिहार में  ज्यादा से ज्यादा कालेज एवं यूनिवर्सिटी का खुलवाना ताकि उच्च शिच्छा  प्राप्त करने के लिए बिहार से बिहारी लड़कों का पलायन रुक सके।<br />
श्री  नितीश कुमार ने पिछले पांच वर्षो में अपने बनाये सभी नीतियों पर पूरी तरह  अमल करते हुए एक पिछड़े राज्य को अग्रसर राज्य कि श्रेणी में लाये और बिहार  विकाश के राह पर पूरी तरह दौड़ने के लिए तैयार हो गया है।  इसीलिए बिहार कि  जनता ने भी उम्मीद से ज्यादा जनादेश (विश्वाश) देकर श्री नितीश कुमार के  हाथो में बिहार कि बाग डोर थमा दी क्यों कि अपने से ज्यादा उसे नितीश कुमार  पर विश्वाश है।<br />
अब मुख्यमंत्री श्री नितीश कुमार अपने गढ़े हुए सपनो का बिहार बनाने के लिए स्वतंत्र है क्यों कि उनके राह में अब विपच्छ भी नहीं है।</p>
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		<title>हकीम की दुकान पर राहुल-लालू-पासवान</title>
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		<pubDate>Thu, 25 Nov 2010 11:59:01 +0000</pubDate>
		<dc:creator>विजय कुमार</dc:creator>
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		<description><![CDATA[हकीम लुकमान ने दुकान खोली, तो आज हर दिन की अपेक्षा अधिक रोगी दिखाई दिये। इतना ही नहीं, कई अति विशिष्ट जन (वी.आई.पी) भी उनकी प्रतीक्षा में था। हकीम साहब ने पहले उन्हें निबटाना ठीक समझा। पहला नंबर लालू जी ]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><span style="font-size: 13.3333px;">हकीम लुकमान ने दुकान खोली, तो आज हर दिन की अपेक्षा अधिक रोगी दिखाई दिये। इतना ही नहीं, कई <a rel="attachment wp-att-10954" href="http://www.janokti.com/?attachment_id=10954"><img class="alignleft size-medium wp-image-10954" title="lalu" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/lalu-300x240.jpg" alt="" width="300" height="240" /></a>अति विशिष्ट जन (वी.आई.पी) भी उनकी प्रतीक्षा में था। हकीम साहब ने पहले उन्हें निबटाना ठीक समझा। पहला नंबर लालू जी का था।</span></p>
<p style="text-align: justify;">लालू &#8211; हकीम साहब, क्या बताऊं; दिल टांग टूटी भैंस जैसा बैठ गया है। आवाज नहीं निकल रही है। आंखें लालटेन की रोशनी में भी ठीक नहीं देख पा रहीं। सब ओर अंधेरा सा लगता है। माई समीकरण उड़न फ्लाई हो गया।</p>
<p style="text-align: justify;">हकीम &#8211; सुबह नंगे पांव हरी घास में टहलिये; पर इससे आगे न बढ़ें। सुना है घास देखते ही आपकी पूर्वजन्म की आदतें जाग जाती हैं। मैं नुस्खा देता हूं। राबड़ी जी इसे बनाकर प्यार से खिलाएंगी, तो कुछ दिन में ठीक लगने लगेगा।</p>
<p style="text-align: justify;">लालू &#8211; उसकी बात न कहें। खाना बनाने को कहते ही वह खाने को दौड़ती है। दोनों सीटों से क्या हारीं, दोनों हाथ और पांव सुन्न हो गये हैं। दोनों भाई भी हार गये। जनता ने मुंह दिखाने लायक नहीं छोड़ा। मुझसे भी घूंघट की ओट से बात करने लगी है।</p>
<p style="text-align: justify;"><a rel="attachment wp-att-10955" href="http://www.janokti.com/?attachment_id=10955"><img class="alignright size-medium wp-image-10955" title="ramvilas paswan" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/ramvilas-paswan-269x300.jpg" alt="" width="269" height="300" /></a>अगला नंबर पासवान जी का था &#8211; मेरी हालत तो और भी खराब है हकीम साहब ! मुंह कुएं सा सूख रहा है। मुसलमानों के लिए मैंने क्या नहीं किया ? पिछले चुनाव में ओसामा बिन लादेन जैसा आदमी साथ लेकर घूमा; पर तब की तरह इस बार भी वे दगा दे गये। मेरे भाई, भतीजे, दामाद सब हार गये। फोन करता हूं, तो काट देते हैं। मेरी मेल गाड़ी तो पैसेंजर से भी पीछे चल रही है। जनता ने घर से बेघर कर दिया।</p>
<p style="text-align: justify;">हकीम &#8211; मैं दवा देता हूं; पर इसके साथ आपको अगले पांच साल आगे की बजाय, पीछे की ओर मुंह कर टहलना होगा।</p>
<p style="text-align: justify;">पासवान &#8211; पर यह देखकर लोग क्या कहेंगे ?</p>
<p style="text-align: justify;">हकीम &#8211; लोगों की तुम चिन्ता न करो। यदि लोग तुम्हारे साथ होते, तो तुम्हारी यह हालत क्यों होती ?</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">तभी गाड़ियों के शोर के बीच राहुल बाबा का प्रवेश हुआ।</p>
<p style="text-align: justify;"><a rel="attachment wp-att-10956" href="http://www.janokti.com/?attachment_id=10956"><img class="alignleft size-full wp-image-10956" title="rahul-gandhi" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/rahul-gandhi.jpg" alt="" width="256" height="320" /></a>राहुल &#8211; हकीम साहब ! कुछ दवा मुझे भी दें। मेरा तो सारा भविष्य ही बिहार ने चैपट कर दिया। जहां-जहां मैंने प्रचार किया, वहां जीत तो दूर, कांगे्रस चैथे नंबर पर पहुंच गयी। लोग मुझे देखते ही ‘जहां-जहां चरण पड़े राहुल के, वहां-वहां बंटाधार’ गाने लगते हैं। मम्मी ने बिहार में शून्य से शुरू करने की बात कही थी, तो जनता ने उसके पास ही पहुंच दिया। पैरों पर खड़े होने के लालच में हाथ भी गंवा बैठे। युवक और युवतियों के चक्कर में क१लिजों में धक्के खाये; पर अब वे मुझे देखते ही ऐसे मुंह फेर लेते हैं, मानो मैं कोई बूढ़ा हूं। जिस विदेशी लड़की से बात चल रही थी, उसने भी कई दिन से फोन नहीं किया।</p>
<p style="text-align: justify;">हकीम &#8211; आप युवा है, जल्दी ठीक हो जाएंगे। टहलना आपको भी जरूरी है; पर पैर की बजाय हाथ के बल चलने से लाभ जल्दी होगा। इससे आपके हाथ मजबूत होंगे। सोचिये, यदि आपके हाथ ताकतवर होते, तो आपको राजा, कलमाड़ी या अशोक चव्हाण को हटाने की जरूरत नहीं पड़ती।</p>
<p style="text-align: justify;">राहुल &#8211; क्या मम्मी के लिए भी कोई नुस्खा है ? उनके चेहरे की तो प१लिश ही उतर गयी है।</p>
<p style="text-align: justify;">हकीम &#8211; बिना देखे मैं दवा नहीं देता, चूंकि ऐसे रोगों का इलाज लम्बा चलता है। वैसे उनका इलाज भारत की बजाय इटली में हो, तो अधिक अच्छा रहेगा। तब तक बाजार में उपलब्ध किसी भी प१लिश से काम चला लें। मैं तो सदा बिल्ली शू प१लिश इस्तेमाल करता हूं। चाहे तो उसे ही आजमा लें।</p>
<p style="text-align: justify;">तभी हकीम साहब के पुत्र ने आकर कहा कि नीतीश जी आपसे फोन पर बात करना चाहते हैं।</p>
<p style="text-align: justify;">हकीम &#8211; उन्हें क्या परेशानी हो सकती है। वे तो खुद इन सबकी परेशानी का कारण हैं। फिर भी बात कराओ।</p>
<p style="text-align: justify;">नीतीश &#8211; हकीम साहब ! इतनी भारी जीत, बधाई और मिठाई के बावजूद दिल में धुकधुकी सी हो रही है। मेरी इच्छा थी कि भाजपा का ग्राफ कुछ गिरे, जिससे वे काबू में रहें। इसके लिए नरेन्द्र मोदी तक का अपमान किया; पर उन्होंने तो 90 प्रतिशत सीट जीतकर मुझे भी पछाड़ दिया। उनके वोट भी खूब बढ़े हैं। अब तो तीर की चुभन औरों के साथ मुझे भी महसूस हो रही है।</p>
<p style="text-align: justify;">हकीम &#8211; देखो भाई, भारत और भारतीय जनता के मूड का कुछ पता नहीं लगता। धूल भी लात खाकर दाढ़ी में उलझ जाती है।  भाजपा वालों ने दिल बड़ा रखकर जो पाठ पढ़ाया है, इसे समझने का प्रयास करो।</p>
<p style="text-align: justify;">नीतीश &#8211; पर इसकी दवा.. ?</p>
<p style="text-align: justify;">हकीम &#8211; इसके लिए दवा की जरूरत नहीं है। एक शेर सुनो, इसे हर दिन सुबह-शाम दोहराना ही काफी है।</p>
<p style="text-align: justify;">मोहब्बत में सियासत की गंदगी न मिला</p>
<p style="text-align: justify;">गर गले मिल नहीं सकता, तो हाथ भी न मिला।।</p>
<p style="text-align: justify;">
]]></content:encoded>
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		<title>बिहार मेँ राहुल का युवा फेक्टर फुस्स !</title>
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		<pubDate>Wed, 24 Nov 2010 18:36:17 +0000</pubDate>
		<dc:creator>जनोक्ति डेस्क</dc:creator>
				<category><![CDATA[यूपी-बिहार]]></category>
		<category><![CDATA[bihar congress]]></category>
		<category><![CDATA[bihar politics]]></category>
		<category><![CDATA[congress]]></category>
		<category><![CDATA[democracy]]></category>
		<category><![CDATA[politics]]></category>
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		<category><![CDATA[बिहार में विकास जीता]]></category>
		<category><![CDATA[लोकतान्त्रिक भारत]]></category>
		<category><![CDATA[शासन प्रणाली]]></category>

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		<description><![CDATA[34 साल में बिहार को 17 मुख्यमंत्री देने वाली कांग्रेस की सीटों का आंकड़ा आज दहाई तक भी नहीं पहुंच सका है। कांग्रेस महज 5 सीटें ही जीत सकी हैं। पिछले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को 9 सीटें मिली थीं।बिहार चुनाव राहुल गांधी के इम्तहान माना जा रहा था बिहार की जनता पर पार्टी अध्‍यक्ष सोनिया गांधी और महासचिव राहुल गांधी की रैलियों का असर भी नहीं हुआ। राहुल गांधी ने 17 और सोनिया गांधी ने 5 सीटों परसभाएं की थीं। कांग्रेस को केवल कहलगांव और किशनगंज सीट पर जीत नसीब हुई। कहलगांव से सदानंद सिंह और किशनगंज से मोहम्मद जावेद चुनाव जीते हैं। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष चौधरी महबूब अली कैसर भी सिमरी बख्तियारपुर से चुनाव हार गए हैं। राहुल गांधी ने इन सीटों पर चुनावी रैलियां की- केवल कहलगांव सीट पर कांग्रेस के सदानंद सिंह विजयी हुए हैं. पहले बरबीघा सीट पर कांग्रेस आगे चल रही थी लेकिन उसके उम्मीदवार अशोक चौधरी को निर्दलीय प्रत्याशी ]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><a rel="attachment wp-att-10944" href="http://www.janokti.com/bihar-election-up-election/%e0%a4%ac%e0%a4%bf%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%b0-%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%81-%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%b9%e0%a5%81%e0%a4%b2-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%af%e0%a5%81%e0%a4%b5%e0%a4%be-%e0%a4%ab%e0%a5%87/attachment/m_id_124677_rahul_gandhi/"><img class="aligncenter size-full wp-image-10944" title="M_Id_124677_rahul_gandhi" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/M_Id_124677_rahul_gandhi.jpg" alt="" width="300" height="250" /></a>34 साल में बिहार को 17 मुख्यमंत्री देने वाली कांग्रेस की सीटों का आंकड़ा आज दहाई तक भी नहीं पहुंच सका है। कांग्रेस महज 5 सीटें ही जीत सकी हैं। पिछले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को 9 सीटें मिली थीं।<span style="font-size: 13.3333px;">बिहार चुनाव राहुल गांधी के इम्तहान माना जा रहा था बिहार की जनता पर पार्टी अध्‍यक्ष सोनिया गांधी और महासचिव राहुल गांधी की रैलियों का असर भी नहीं हुआ। राहुल गांधी ने 17 और सोनिया गांधी ने 5 सीटों परसभाएं की थीं। कांग्रेस को केवल कहलगांव और किशनगंज सीट पर जीत नसीब हुई। कहलगांव से सदानंद सिंह और किशनगंज से मोहम्मद जावेद चुनाव जीते हैं।</span></p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष चौधरी महबूब अली कैसर भी सिमरी बख्तियारपुर से चुनाव हार गए हैं।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>राहुल गांधी ने इन सीटों पर चुनावी रैलियां की-</strong></p>
<p style="text-align: justify;">केवल कहलगांव सीट पर कांग्रेस के सदानंद सिंह विजयी हुए हैं. पहले बरबीघा सीट पर कांग्रेस आगे चल रही थी लेकिन उसके उम्मीदवार अशोक चौधरी को निर्दलीय प्रत्याशी त्रिशूलधारी सिंह ने 3000वोटों से हरा दिया।</p>
<p style="text-align: justify;"><span style="text-decoration: underline;"> </span><span style="text-decoration: underline;">अपडेटेड –</span><span style="text-decoration: underline;"> 4.30 PM</span></p>
<p style="text-align: justify;">सीट /    कौन आगे है</p>
<ol style="text-align: justify;">
<li>बछव़ाडा / अवधेश कुमार राय सीपीआई (कांग्रेस चौथे स्थान पर)</li>
<li>जमालपुर / शैलेष कुमार जनता दल यूनाइटेड (कांग्रेस तीसरे पर)</li>
<li>कहलगांव/ सदानंद सिंह- कांग्रेस -जीत गए।</li>
<li>बेगुसराय/ सुरेंद्र मेहता- भारतीय जनता पार्टी (कांग्रेस चौथे पर)</li>
<li>सासाराम/ जवाहर प्रसाद – भारतीय जनता पार्टी (कांग्रेस छठें स्थान पर)</li>
<li>औरंगाबाद/ रामाधार सिंह- भारतीय जनता पार्टी (कांग्रेस पांचवें स्थान पर)</li>
<li>शेखपुरा/ रणधीर कुमार सोनी- जनता दल यूनाइटेड (कांग्रेस की सुनिला देवी दूसरे स्थान पर रहीं)</li>
<li>जहानाबाद/ अभिराम शर्मा- जनता दल यूनाइटेड (कांग्रेस के रामजतन सिन्हा तीसरे पर)</li>
<li>बरबीघा/ अशोक चौधरी – कांग्रेस -हार गए (निर्दलीय त्रिशूलधारी सिंह 3000 वोट से जीते)</li>
<li>हिसुआ/ अनिल सिंह- भारतीय जनता पार्टी (कांग्रेस की नीतू कुमारी तीसरे स्थान पर)</li>
<li>मुज़्ज़फ़रपुर/ सुरेश कुमार शर्मा – भारतीय जनता पार्टी (कांग्रेस चौथे स्थान पर)</li>
<li>सीतामढ़ी/ सुनील कुमार पिंटू- भारतीय जनता पार्टी (कांग्रेस की रूपम कुमारी पांचवें स्थान पर)</li>
<li>समस्तीपुर/ इस्लाम सहीम – आरजेडी (कांग्रेस तीसरे स्थान पर)</li>
<li>रामनगर/ भागीरथी देवी- भारतीय जनता पार्टी (कांग्रेस के नरेश राम दूसरे स्थान पर)</li>
<li>कुचईकोट/ अमरेन्द्र कुमार पांडे- जनता दल यूनाइटेड (कांग्रेस चौथे स्थान पर)</li>
<li>मांझी/ गौतम सिंह – जेडीयू (कांग्रेस पांचवे स्थान पर)</li>
<li>ओबेरा/ प्रमोद सिंह चंद्रवंशी- जनता दल यूनाइटेड (कांग्रेस पाचवें स्थान पर)</li>
</ol>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;"><strong>इन सीटों पर सोनिया गांधी ने रैलियां की-</strong></p>
<ol style="text-align: justify;">
<li>भभुआ/ डा. प्रमोद कुमार सिंह – एल जे पी  (कांग्रेस चौथा स्थान पर)</li>
<li>बक्सर/ सुखड़ा पांडेय – बीजेपी – (कांग्रेस छठे स्थान पर)</li>
<li>भागलपुर/अश्विनी कुमार चौबे – भारतीय जनता पार्टी (कांग्रेस के अजीत शर्मा दूसरे स्थान पर)</li>
<li>बेगुसराय/ सुरेंद्र मेहता- भारतीय जनता पार्टी (कांग्रेस चौथे पर)</li>
<li>किशनगंज/ मोहम्मद जावेद – कांग्रेस जीत गए (बीजेपी की स्वीटी सिंह हारीं)</li>
</ol>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">सिमरी बख्तियारपुर सीट से बिहार कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष चौधरी महबूब अली कैसर जनता दल यूनाइटेड के डॉ. अरुण कुमार से हारे।</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">Source: <a href="http://eciresults.nic.in/" target="_blank">http://eciresults.nic.in/ </a></p>
<p style="text-align: justify;"><strong>इसके अलावा मज़ेदार रिजल्ट यहां रहा.. केवल 31 वोटों से बीजेपी की जीत हुई.. केवटी सीट पर पूर्व केंद्रीय मंत्री एम ए फ़ातमी के बेटे को अशोक यादव ने हराया। यहां ध्रुवीकरण विश्लेषण के लायक हो सकता है। </strong><br />
<strong>तभी लालू कह रहे हैं- नतीजे रहस्यपूर्ण है </strong></p>
<table style="text-align: justify;" border="1">
<tbody>
<tr>
<td colspan="3" align="center">Bihar &#8211; Keoti</td>
</tr>
<tr>
<td colspan="3" align="center">Result Declared</td>
</tr>
<tr>
<th align="left">Candidate</th>
<th align="left">Party</th>
<th align="right">Votes</th>
</tr>
<tr>
<td align="left">ASHOK KUMAR YADAV</td>
<td align="left">Bharatiya Janata Party</td>
<td align="right">45791</td>
</tr>
<tr>
<td align="left">FARAZ FATMI</td>
<td align="left">Rashtriya Janata Dal</td>
<td align="right"><strong>45762</strong></td>
</tr>
<tr>
<td align="left">MD. MOHASIN</td>
<td align="left">Indian National Congress</td>
<td align="right">5679</td>
</tr>
<tr>
<td align="left">SADRE ALAM</td>
<td align="left">Independent</td>
<td align="right">2833</td>
</tr>
<tr>
<td align="left">MADHURANJAN PRASAD</td>
<td align="left">Bahujan Samaj Party</td>
<td align="right">1985</td>
</tr>
<tr>
<td align="left">RAMBABU SAHU</td>
<td align="left">Communist Party of India (Marxist-Leninist) (Liberation)</td>
<td align="right">1917</td>
</tr>
<tr>
<td align="left">BALKRISHNA JHA</td>
<td align="left">Independent</td>
<td align="right">1546</td>
</tr>
<tr>
<td align="left">NESAR AHMAD</td>
<td align="left">Independent</td>
<td align="right">991</td>
</tr>
<tr>
<td align="left">MD.MOJAHIDUL ISLAM</td>
<td align="left">Janata Dal (Secular)</td>
<td align="right">636</td>
</tr>
<tr>
<td align="left">WASI AHMED KHAN</td>
<td align="left">Samajwadi Party</td>
<td align="right">606</td>
</tr>
<tr>
<td align="left">NAZRE ALAM</td>
<td align="left">Independent</td>
<td align="right">584</td>
</tr>
<tr>
<td align="left">MD.JUNAID SATTAR</td>
<td align="left">Muslim League Kerala State Committee</td>
<td align="right">415</td>
</tr>
</tbody>
</table>
<table style="text-align: justify;">
<tbody>
<tr>
<td colspan="3"></td>
<td></td>
</tr>
</tbody>
</table>
<p style="text-align: justify;">: Neeraj Diwan</p>
]]></content:encoded>
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		<item>
		<title>बिहार में विकास जीता,जाति हारी</title>
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		<pubDate>Wed, 24 Nov 2010 18:24:48 +0000</pubDate>
		<dc:creator>ब्रज किशोर सिंह</dc:creator>
				<category><![CDATA[यूपी-बिहार]]></category>
		<category><![CDATA[राष्ट्रीय]]></category>
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		<category><![CDATA[democracy]]></category>
		<category><![CDATA[politics]]></category>
		<category><![CDATA[religion]]></category>
		<category><![CDATA[अंधेर नगरी]]></category>
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		<category><![CDATA[लोकतान्त्रिक भारत]]></category>
		<category><![CDATA[शासन प्रणाली]]></category>

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		<description><![CDATA[बिहार विधानसभा चुनाव के नतीजे आ चुके हैं.बिहार की जनता ने जातिवादी शक्तियों को एक सिरे से नकारते हुए एनडीए के विकास की राजनीति पर मुहर लगा दी है वो भी तीन चौथाई के आशातीत बहुमत के साथ.एक बात तो ]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><a rel="attachment wp-att-10927" href="http://www.janokti.com/bihar-election-up-election/%e0%a4%ac%e0%a4%bf%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%b0-%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%82-%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%95%e0%a4%be%e0%a4%b8-%e0%a4%9c%e0%a5%80%e0%a4%a4%e0%a4%be%e0%a4%9c%e0%a4%be%e0%a4%a4%e0%a4%bf/attachment/nitish/"><img class="alignleft size-full wp-image-10927" title="nitish" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/nitish.png" alt="" width="163" height="128" /></a>बिहार  विधानसभा चुनाव के नतीजे आ चुके हैं.बिहार की जनता ने जातिवादी शक्तियों  को एक सिरे से नकारते हुए एनडीए के विकास की राजनीति पर मुहर लगा दी है वो  भी तीन चौथाई के आशातीत बहुमत के साथ.एक बात तो तय है कि राजग को सभी  जातियों और धर्मों के लोगों का वोट मिला है अन्यथा उसे इतना प्रचंड बहुमत  नहीं मिलता.जो लालू फ़िर से बिहार का राजा बनने का सपना देख रहे थे उनके  विपक्ष का नेता बनने के भी लाले पड़ गए हैं.८ साल तक बिहार की मुख्यमंत्री  रही उनकी पत्नी और भारत के इतिहास में एकमात्र अनपढ़ मुख्यमंत्री रही  श्रीमती राबड़ी देवी कथित ससुराल और मायका यानी सोनपुर और राघोपुर दोनों  जगहों से हार गई हैं.यह भारत के किसी भी राज्य में किसी भी गठबंधन की सबसे  बड़ी जीत है.इतनी बड़ी जीत की उम्मीद न तो एन.डी.ए. के नेताओं को थी और न  ही मीडिया को.बिहार भूतकाल में भी भारत की राजनीति को दिशा देता रहा  है.१९७४ का आन्दोलन इसी पवित्र भूमि से उठा था जिसके परिणामस्वरूप इंदिरा  गांधी की तानाशाही का अंत हुआ था.उसी पिछड़े और गरीब बिहार ने एक बार फ़िर  देश को विकास की राजनीति अपनाने के लिए प्रेरित किया है.साथ ही पूरे<br />
भारत में जाति-धर्म के नाम पर जनता को मूर्ख बना रहे नेताओं को अपना एजेंडा  बदल लेने की चेतावनी दे दी है.कोई ज्यादा समय नहीं हुआ यही कोई ५ साल पहले  बिहार और बिहारी को बांकी भारत के लोग ही दृष्टि से देखते थे.आज बिहारी  शब्द गाली का नहीं गर्व की अनुभूति देता है.नीतीश कुमार भले ही ५ साल के  अपने शासन में बिहार को विकसित राज्यों की श्रेणी में शामिल नहीं करा  पाए.लेकिन उन्होंने बिहार के लोगों की आँखों में विकास और विकसित बिहार के  सपने जरूर पैदा कर दिया.यहाँ तक कि विपक्ष के लोग भी कहीं-न-कहीं सीमित  सन्दर्भ में ही सही विकास के वादे करने के लिए बाध्य हो गए.उनकी सबसे बड़ी  उपलब्धि जो एक बिहारी होने के नाते मैं मानता हूँ वह रही है जंगल राज वाले  राज्य में कानून के शासन की स्थापना.आधारभूत संरचना का भी बिहार में  पर्याप्त विकास हुआ है.सड़कों से लेकर पुल निर्माण तक काम धरातल पर नज़र आ  रहा है.बिहार की जो जनता ५ साल पहले अपने बच्चों को अपहरणकर्ता बना रही थी  वही जनता अब अपने बेटे-बेटियों को डॉक्टर-इंजिनियर बनाने का सपना देखने लगी  है.नीतीश सरकार ने उच्च विद्यालयों में पढनेवाले बच्चों को सरकार की तरफ  से साईकिल उपलब्ध कराई जिससे लड़कियां भी दूर-दूर तक पढने के लिए जाने  लगीं.हालांकि जवाब में लालू ने बच्चों को मोटरसाईकिल देने का वादा किया  लेकिन लोगों ने इसे लालू का मजाक मान लिया.वैसे भी लालू इस बार के चुनाव  प्रचार में भी कभी गंभीर होते नहीं दिखे.प्रत्येक जनसभा में लोगों को  चुटकुले सुनाते  रहे.उनकी सभाओं में लोगों की भीड़ जरूर जमा होती रही लेकिन  उसका उद्देश्य लालू की हँसानेवाली बातों का मजा लेना मात्र था.कुल मिलाकर  जो लोग राजग सरकार से खुश नहीं थे उनके सामने भी विकल्पहीनता की स्थिति  थी.लालू को वे वोट दे नहीं सकते थे और लालू के अलावा राज्य में दूसरा कोई  सशक्त विकल्प था ही नहीं.इसलिए थक-हारकर उन्होंने भी राजग को मत दे  दिया.चुनाव प्रचार के समय राजग ने बड़ी ही चतुराई से लोजपा और राजद को दो  परिवारों की पार्टी बताना शुरू कर दिया था.इसका परिणाम यह हुआ कि यादव और  पासवान जाति के लोग भी इस बात को समझ गए कि ये लोग वोट बैंक के रूप में  सिर्फ उनका इस्तेमाल कर रहे हैं.लगभग सभी चरणों में जिस तरह पिछले चुनावों  से कहीं ज्यादा % मतदान हो रहा था इससे लोग कयास लगा रहे थे कि जैसा कि  होता आया है इस स्थिति में जनता ने कहीं सरकार के खिलाफ तो वोट नहीं दिया  है.लेकिन हुआ उल्टा.इसका सीधा मतलब यह है कि जो भी मत % बढ़ा वह मत सरकार  के समर्थकों का था.हद तो यह हो गई कि राजग को मुस्लिम-यादव बहुल क्षेत्रों  में भी अप्रत्याशित सफलता हाथ लगी और मई समीकरण का नामो-निशान मिट  गया.चुनाव में जदयू और भाजपा दोनों को ही लगभग ३०-३० सीटों का लाभ हुआ  है.अभी तक तो तमाम वैचारिक मतभेदों के बावजूद गठबंधन सफल रहा है.लेकिन जिस  तरह जदयू को साधारण बहुमत से कुछ ही कम सीटें आई हैं उससे नीतीश कुमार के  लिए भाजपा की जरुरत निश्चित रूप से कम हो जाएगी.इसलिए भाजपा के लिए नीतीश  को संभालना अब और भी मुश्किल साबित होने जा रहा है.हालांकि इन चुनावों में  राजग को मात्र ४१-४२ % जनता का वोट मिला है लेकिन इसी अल्पमत के बल पर उसने  तीन चौथाई सीटें जीत ली हैं.यह शुरू से ही हमारे लोकतंत्र की बिडम्बना रही  है कि देश में हमेशा अल्पमत क़ी सरकार बांटी रही है.देखना है कि सरकार  जनता को किए गए वादों में से कितने को पूरा कर पाती है.प्रचार अभियान के  दौरान राजग ने बिजली,रोजगार सृजन और भ्रष्टाचार सम्बन्धी नए कानून के  क्रियान्वयन का वादा किया था.डगर आसान नहीं है.खासकर भ्रष्टाचार ने जिस तरह  से शासन-प्रशासन के रग-रग में अपनी पैठ बना ली है.उससे ऐसा नहीं लगता कि  नीतीश भ्रष्टाचारियों खासकर बड़ी मछलियों की संपत्ति पर आसानी से सरकारी  कब्ज़ा कर उसमें स्कूल खोल पाएँगे जैसा कि उन्होंने अपने भाषणों में वादा  किया था.पिछली बार से कहीं ज्यादा आपराधिक पृष्ठभूमि के लोग राजग की तरफ से  जीत कर विधानसभा में पहुंचे हैं.इन पर नियंत्रण रखना और इन पर मुकदमा  चलाकर इन्हें सजा दिलवाना भी सरकार के लिए एक बड़ी चुनौती रहेगी.अगले साल  बिहार में पंचायत चुनाव होनेवाले हैं.राजग सरकार इसे दलीय आधार पर करवाना  चाहती है.अगर ऐसा हुआ तो निश्चित रूप से इन चुनावों में भी राजग जीतेगा और  सरकार की जिम्मेदारी और भी बढ़ जाएगी.राज्य में पंचायत स्तर पर और जन वितरण  प्रणाली में जो व्यापक भ्रष्टाचार है वह किसी से भी छुपा हुआ नहीं  है.हालांकि गांवों में शिक्षामित्रों की बहाली कर दी गई है लेकिन शिक्षा की  गुणवत्ता में विद्यालय से लेकर विश्वविद्यालय तक में अभी भी गुणात्मक  सुधार आना बांकी है.बिहार में १५ सालों के जंगल राज में उपजी हुई और भी  बहुत-सी समस्याएं हैं जिनका समाधान नीतीश को अगले पांच सालों में ढूंढ  निकालना होगा.बिहार की २१वीं सदी की जनता ज्यादा दिनों तक इंतज़ार करने के  मूड में नहीं है.जनता को न तो उसको रीझते और न ही खीझते देर लगती है.राजग  को यह समझते हुए राज्य को समस्याविहीन राज्य बनाने की दिशा में अग्रसर करना  होगा.नहीं तो राजग का भी राज्य में वही हश्र होगा जो इस चुनाव में  लालू-पासवान और कांग्रेस का हुआ है.</p>
]]></content:encoded>
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		<title>जदयू-भाजपा गठबंधन विशाल बहुमत की ओर</title>
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		<pubDate>Wed, 24 Nov 2010 15:17:24 +0000</pubDate>
		<dc:creator>नरेन्द्र निर्मल</dc:creator>
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			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><span style="font-size: 13.2px;"><a rel="attachment wp-att-10917" href="http://www.janokti.com/bihar-election-up-election/%e0%a4%9c%e0%a4%a6%e0%a4%af%e0%a5%82-%e0%a4%ad%e0%a4%be%e0%a4%9c%e0%a4%aa%e0%a4%be-%e0%a4%97%e0%a4%a0%e0%a4%ac%e0%a4%82%e0%a4%a7%e0%a4%a8-%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%b6%e0%a4%be%e0%a4%b2-%e0%a4%ac/attachment/sushil-modi-and-nitish-kumar11-2/"><img class="alignright size-medium wp-image-10917" title="Sushil-Modi-and-Nitish-Kumar11" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/Sushil-Modi-and-Nitish-Kumar111-300x201.jpg" alt="" width="300" height="201" /></a>नीतीश कुमार ने इस चुनाव में विकास का मुद्दा क्या बनाया जातिवाद और सम्प्रदायवाद से घिरा बिहार का नजारा ही बदल गया. आज पहली बार दिखा कि बिहार की जनता ने ना तो वंशवाद को चलाने वाले को बिहार की जमीन पर टिकने दिया ना ही भाई भतीजावाद करने वाले पार्टियों को बिहार की सत्ता पर काबिज होने का मौका दिया. इस बार महिलाओ ने बिहार के कमान संभाला है. ऐसा </span><span style="font-size: 13.2px;">माना जा रहा है. इस बार नए समीकरण उभरकर सामने आये है. एमएमएम अर्थात महिला-मध्यम वर्ग-मुसलमान| इससे यही साफ हो गया है कि नितीश </span><span style="font-size: 13.2px;">और सुशिल मोदी की गठबंधन सरकार बिहार के जनता की उम्मीदों पर खरे उतरे है.</span></p>
<p style="text-align: justify;"><strong>बिहार विधानसभा में मुख्यमंत्री नीतिश कुमार का जदयू-भाजपा गठबंधन विशाल बहुमत से वापस सत्ता में लौट रहा है.</strong></p>
<p style="text-align: justify;"><span style="font-size: 13.2px;">कुल 243 में से 206 सीटों पर जनता दल यूनाइटेड और भारतीय जनता पार्टी गठबंधन नए रिकॉर्ड जीत कायम </span><span style="font-size: 13.2px;">करना </span><span style="font-size: 13.2px;">तय </span><span style="font-size: 13.2px;">हो चूका है.</span></p>
<p style="text-align: justify;"><span style="font-size: 13.2px;">लालू-पासवान के साथ कोंग्रेस के युवराज को भी करारा जवाब दिया है, बिहार की जनता ने इतने बड़े मतों में अंत</span><span style="font-size: 13.2px;">र से जीताकर.</span></p>
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