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	<title>JANOKTI : जनोक्ति :  राज-समाज और जन की आवाज &#187; controversy</title>
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	<description>Daily news analysis , Hindi samachar ,Hindi magazine,Hindi website,a6V3sbK3z0d4m7JTOT6OQOVo1jQ</description>
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		<title>नक्सलियों के आय के प्रमुख स्रोत</title>
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		<pubDate>Wed, 10 Nov 2010 13:16:41 +0000</pubDate>
		<dc:creator>त्रिपुरारी कुमार</dc:creator>
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		<description><![CDATA[निशा दास की रिपोर्ट रांची से झारखंड में नक्सल समस्या एक जटिल समस्या बनी हुई है। लंबे समय से इस जंजाल से निकलने का यहां के राजनेताओं के साथ -साथ नौकरशाहों ने भी प्रयास किया ,पर अबतक कोई खास सफलता इसमें ]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><strong>निशा दास की रिपोर्ट रांची से</strong></p>
<p style="text-align: justify;"><a rel="attachment wp-att-10328" href="http://www.janokti.com/sansad-political-news-%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%82%e0%a4%b8%e0%a4%a6-%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%97/national-news-%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%b7%e0%a5%8d%e0%a4%9f%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a5%80%e0%a4%af/%e0%a4%a8%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b8%e0%a4%b2%e0%a4%bf%e0%a4%af%e0%a5%8b%e0%a4%82-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%86%e0%a4%af-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%ae%e0%a5%81%e0%a4%96/attachment/naxal11/"><img class="aligncenter size-full wp-image-10328" title="naxal11" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/naxal11.jpg" alt="" width="310" height="240" /></a></p>
<p style="text-align: justify;">झारखंड में नक्सल समस्या एक जटिल समस्या बनी हुई है। लंबे समय से इस जंजाल से निकलने का यहां के राजनेताओं के साथ -साथ नौकरशाहों ने भी प्रयास किया ,पर अबतक कोई खास सफलता इसमें उन्हें नहीं मिल पाई है। आईए एक नजर डालते हैं नक्सलियों के आय के मुख्य श्रोतों पर।</p>
<p style="text-align: justify;">नक्सलियों के दिन प्रतिदिन मजबूती से उभरने का सबसे बड़ा कारण है यहां के राजनेताओं के साथ -साथ नौकरशाहों के बीच कमजोर इच्छा शक्ति का होना। क्योंकि कोई चाहता है इसका सफाया तो कोई नक्सलियों के सफाये के नाम पर सिर्फ राजनीति करते हैं ना कि काम। किसी भी अपराधी गिरोह या और भी कोई दूसरा संगठन चलाने के लिए धन की काफी अहम भूमिका होती है। नक्सलियों को भी संगठन को मजबूती देने के लिए मोटे धन की आवश्यकता होती है। और ये धन झारखंड में चलने वाले सरकारी योजनाओं में काम करनेवाले ठेकेदारों और विभागों से मिलते हैं हालांकि इसका कोई रिकोर्ड नहीं है क्योंकि हर कोई चाहता है कि काम हो जाय और जान भी बच जाय। यानि की सुरक्षा के नाम पर हमारी पुलिस बौनी साबित हो रही है नक्सलियों के सामने तभी तो नक्सलियों के सामने ठेकेदार और विभागीय कर्मचारी घुटने टेकते हुए नजर आते हैं। और इसी का फायदा उठाते हैं नक्सली। झारखं डमें चलने वाले खानों से भी नक्सली लेवी वसूलते हैं इसके साथ -साथ विस्फोटक पदार्थ भी वहंीं से लेते हैं। जाहिर सी बात है कि जब सरकारी योजनाओं और खानों से नक्सलियों को सहज ही लेवी और धन उपलब्ध हो जाय तो वे मजबूती से उभरेंगे ही। हमारे ही हथियार और हमारे ही पैसे से हमारे ही लोगों को नक्सली मारते हैं और इस बात की तस्दीक करते हैं कि गरीबों और पीड़ितों के लिए नक्सलवाद का निर्माण किया गया। ये कैसा मरहम लगाने का तरीका है गरीबों पर ,जो आम इंसानों के खून से अपने हाथों को रंगता हो। और भ्रष्टाचार मिटाने के नाम पर गरीब लोगों के आंखों में धूल झोंकता हो। सवाल ये भी उठता है कि आखिर खानों से निकलने वाले विस्फोटक और पैसे का हिसाब कहां जाता है। क्योंकि जब इतने अधिक मात्रा में लेवी और सामानों की निकासी होती है तो इसका हिसाब किसी के पास क्यूं नहीं रहता है। मामला साफ है कि सबके सब इसमें आकंठ डूबे हुए हैं। ये अलग बात है कि नक्सलियों का डर ही इन्हें ऐसा करने पर मजबूर करता होगा पर सवाल ये भी उठता है कि आखिर हमारी पुलिसिया तंत्र क्या करती है जो अपने ही विभागों की रक्षा नहीं कर पाती है। एक कहावत है कि अगर सांप को मारना हो तो पहले उसके कमर पर वार करो उसके बाद कहीं दूसरे जगह। ठीक इसी तरह से नक्सलियों के उपर भी वार करना होगा तभी नक्सलियों के आतंक से मुक्ति मिल सकती है। क्योंकि जबतक वे पैसे से कमजोर नहीं होंगे तब तक ऐसे ही वे भी लड़ेंगे और हमारी पुलिस नक्सलियों से मुकाबला करती रहेगी।</p>
<p style="text-align: justify;">
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		<title>सड़ता अनाज सड़ता तंत्र</title>
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		<pubDate>Thu, 04 Nov 2010 12:26:03 +0000</pubDate>
		<dc:creator>शिरीष खरे</dc:creator>
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		<description><![CDATA[सरकार चंद पूंजीपतियों के लिए रियायतों का अंबार लगा रही है और करोड़ों लोगों की खाद्य सुरक्षा के लिए उसके पास न अनाज है और न पैसे का कोई बंदोबस्त. इंडिया शाइनिंग के इस दौर में सरकार को 50,000 करोड़ ]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><span style="font-size: 13.2px;"><a rel="attachment wp-att-10049" href="http://www.janokti.com/government-failure-%e0%a4%85%e0%a4%82%e0%a4%a7%e0%a5%87%e0%a4%b0-%e0%a4%a8%e0%a4%97%e0%a4%b0%e0%a5%80/%e0%a4%b8%e0%a4%a1%e0%a4%bc%e0%a4%a4%e0%a4%be-%e0%a4%85%e0%a4%a8%e0%a4%be%e0%a4%9c-%e0%a4%b8%e0%a4%a1%e0%a4%bc%e0%a4%a4%e0%a4%be-%e0%a4%a4%e0%a4%82%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0/attachment/spoil-food-grains/"><img class="alignright size-medium wp-image-10049" title="Spoil Food Grains" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/Spoil-Food-Grains-300x173.jpg" alt="" width="300" height="173" /></a>सरकार चंद पूंजीपतियों के लिए रियायतों का अंबार लगा रही है और करोड़ों लोगों की खाद्य सुरक्षा के लिए उसके पास न अनाज है और न पैसे का कोई बंदोबस्त. इंडिया शाइनिंग के इस दौर में सरकार को 50,000 करोड़ से अधिक का अनाज सड़ा देना मंजूर है. नहीं मंजूर है तो 8 करोड़ से ज्यादा लोगों की भूख को मिटाने के वास्ते उस सड़ते हुए अनाज में से गरीबों के लिए थोड़ा-सा हिस्सा बांटना. अकाल और कुपोषण के बीच पिसते किसी देश की जनता के लिए क्या उसकी सरकार इस तरह से भी अमानवीय हो सकती है ?</span></p>
<p style="text-align: justify;"><span style="font-size: 13.2px;">एक तरफ सरकार पूंजीपतियों के लिए 5 लाख करोड़ रूपए की रियायत देती है और दूसरी तरफ भूखे लोगों के लिए कोई इंतजाम नहीं करती है. उलटा भूखे देश की भूख पर परदे डालने के लिए उदाहरण के लिए मुंबई में 19 रूपए से ज्यादा रूपए कमाने वाले को गरीब नहीं मानती है. हकीकत यह है कि आजादी के 63 सालों में प्रति व्यक्ति अनाज की उपलब्धता बढ़नी चाहिए थी जो लगातार घटती ही जाती है. आजादी के समय से अबतक प्रति व्यक्ति अनाज की उपलब्धता 440 ग्राम से 436 ग्राम पर आ गई है और इसी तरह दाल की उपलब्धता भी आधी यानी 70 ग्राम से 35 ग्राम ही रह गई है.</span></p>
<p style="text-align: justify;"><span style="font-size: 13.2px;">दूसरी तरफ असुरक्षित परिस्थितियों में रखे अनाज के त्वरित वितरण से लाखों लोगों को राहत पहुंचाई जा सकती है. जबकि मौजूदा स्थिति यह है कि सर्वोच्च न्यायालय के 35 किलो अनाज वितरित करने के आदेश को भी एक तरफ रखते हुए फिलहाल देश के कई इलाकों में अधिकतम 20 से 25 किलो अनाज ही वितरित किया जा रहा है. सर्वोच्च न्यायालय के एक और आदेश की अनदेखी करते हुए कई इलाकों में जनवितरण प्रणाली की दुकानें महीने-महीने भर नहीं खुलतीं हैं. सर्वोच्च न्यायालय द्वारा हर राज्य में एक बड़े गोदाम और जिले में पृथक गोदाम बनाने के लिए भी कहा जा चुका है. मगर खाद्य भंडारणों की क्षमता को बढ़ाने और गोदामों की मरम्मत को लेकर सरकार कभी गंभीर नजर नहीं आई है. लिहाजा देश के कई इलाकों में अनाज के भंडारण की समस्या उपजती जा रही है.</span></p>
<p style="text-align: justify;"><span style="font-size: 13.2px;">जिस देश में सालाना 6 करोड़ टन गेंहूं और चावल की खरीददारी होती है और जिसकी सयुंक्त भंडारण क्षमता 4 करोड़ 80 लाख टन है, उस देश में 6 साल के भीतर गोदामों में 10 लाख 37 हजार 738 टन अनाज सड़ चुका है. 190 लाख टन अनाज प्लास्टिक सीटों के नीचे रामभरोसे पड़ा हुआ है. हर साल गोदामों की सफाई पर करोड़ों रूपए खर्च करने पर भी 2 लाख टन अनाज सड़ जाता है और जब देश का सर्वोच्च न्यायालय अनाज के एक दाने के बर्बाद होने को अपराध मानते हुए अनाज के सड़ने से पहले उसे निशुल्क बांटने का आदेश देता है तो हमारे केंद्र के कृषि मंत्री से लेकर प्रधानमंत्री तक 6,000 टन से भी ज्यादा अनाज के खराब होने के अपराध को नजरअंदाज बनाते हुए उल्टा सर्वोच्च न्यायालय के आदेश की गलत व्याख्या करते हैं और उसकी मर्यादाओं पर ही सवाल खड़े करते हैं.</span></p>
<p style="text-align: justify;"><span style="font-size: 13.2px;">1947 के बाद से अब तक अगर हम किसानों की अथक मेहनत से उपजे अनाज का सही इस्तेमाल नहीं कर पा रहे हैं और हर साल भारतीय खाद्य निगम की गोदामों में रखीं लाखों अनाज की बोरियां खुले में रखे जाने या बाढ़ आ जाने के चलते खराब हो रही हैं तो क्या सरकार को नहीं लगता कि भोजन से जुड़ी नीति, प्रबंधन और वितरण की व्यवस्थाओं पर नए सिरे से सोचे जाने की जरुरत है ?</span></p>
<p style="text-align: justify;"><span style="font-size: 13.2px;">देखा जाए तो खाद्य सुरक्षा दूसरा सवाल है. पहला सवाल पूंजीपतियों के लिए देश की आम जनता से उनके संसाधनों को छीने जाने से जुड़ा है. अगर संसाधनों को लगातार यूं ही छीना जाता रहा तो खाद्य के असुरक्षा की स्थितियां सुधरने की बजाय तेजी से बिगड़ती ही जाएंगी. जहां आदिवासियों को उनके जल, जंगल, जमीन से अलग करके उन्हें भूख और बेकारी की ओर ले जाया जा रहा है, वही सेज के नाम पर खुली लूट की जैसे छूट ही दे दी जा रही है. कहने का मतलब है नीतिगत और कानूनी तौर पर सभी लोगों को आजीविका की सुरक्षा को दिये बगैर भोजन के अधिकार की बात बेमतलब ही रहेगी. भोजन केअधिकार से जुड़े कार्यकर्ता मांग कर रहे हैं कि 5 सदस्यों के एक परिवार के लिए 50 किलो अनाज, 5.25 किलो दाल और 2.8 खाद्य तेल दिया जाए. बीपीएल और एपीएल को पात्रता का आधार नहीं बनाया जाए. सार्वजनिक वितरण की व्यवस्था के साथ-साथ सरकारी खरीदी और वितरण की विकेन्द्रीकृत व्यवस्था हो. व्यक्ति/एकल परिवार को इकाई माना जाए और राशन कार्ड महिलाओं के नाम पर हो. जल स्त्रोत पर पहला अधिकार खेती का हो. इसके साथ ही यह भी नहीं भुलाया जा सकता कि आजादी की बाद से अबतक विकास की विभिन्न परियोजनाओं और कारणों के चलते 6 करोड़ बच्चों का भी पलायन हुआ है. मगर बच्चों के मुद्दे अनदेखे ही रहे हैं और उनके लिए खाद्य सुरक्षा की गारंटी दिये बगैर विकास के तमाम दावे बेबुनियाद ही रहेंगे. इसे भी असंवेदनशीलता का चरम ही कहेंगे कि एक सेकेण्ड के भीतर 5 साल के नीचे का एक बच्चा कुपोषण की चपेट में आ जाने के बावजूद कोई नीतिगत फैसला लेने की बात तो दूर ठोस कार्यवाही की रूपरेखा तक नहीं बन पा रही है. अगर कुपोषण और भूख के चलते देश का आने वाला कल कहे जाने वाले 47 प्रतिशत बच्चों का अपनी उम्र के अनुपात में लंबाई और वजन नहीं बढ़ पाता है तो इसे किस विकास का सूचक समझा जाए ?</span></p>
<p style="text-align: justify;"><span style="font-size: 13.2px;">अंतत: अनाज का साद जाना एक अमानवीय और आपराधिक प्रवृति है और देश में अनाज भंडारण की उचित व्यवस्था और बेहतर विकल्प तलाशने लिए एक ऐसे संवेदनशील और पारदर्शी तंत्र विकसित करने की भी जरुरत है जो भूख से जुड़े विभिन्न पहलूओं पर कारगार ढ़ंग से शिनाख्त और कार्यवाही करने में सक्षम हो. अन्यथा हर साल लाखों टन अनाज खराब होने, अनाज की कीमत आसमान छूने, खेती के संकट, सूखे की मार और गरीबों के पेट खाली होने से जुड़े समाचारों पर परदे डालने के लिए हमारे पास आर्थिक शक्तियों का दिखावा करने वाली राष्ट्रमंडल खेलों की सुर्ख़ियों के अलावा कुछ नहीं होगा ?</span></p>
<p style="text-align: justify;"><span style="font-size: 13.2px;"><strong>- &#8211; - -</strong></span><span style="font-size: 13.2px;"><strong>क्राई-इंडिया के संचार विभाग से</strong></span></p>
]]></content:encoded>
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		<title>बोलने से पहले सोचा नहीं था (राहुल गांधी)</title>
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		<pubDate>Sun, 10 Oct 2010 04:49:41 +0000</pubDate>
		<dc:creator>पंकज मिश्रा</dc:creator>
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		<description><![CDATA[राहुल गांधी। इस समय कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव हैं और युवा कांग्रेस की देखरेख की जिम्मेदारी निभा रहे हैं। उन्हें भविष्य का प्रधानमंत्री कहा जाता है, हालांकि उन्होंने कभी नहीं कहा कि वे प्रधानमंत्री बनना चाहते हैं। दरअसल वे कुछ ]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><span style="font-size: 13.3333px;"><strong><a rel="attachment wp-att-9286" href="http://www.janokti.com/sansad-political-news-%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%82%e0%a4%b8%e0%a4%a6-%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%97/%e0%a4%ac%e0%a5%8b%e0%a4%b2%e0%a4%a8%e0%a5%87-%e0%a4%b8%e0%a5%87-%e0%a4%aa%e0%a4%b9%e0%a4%b2%e0%a5%87-%e0%a4%b8%e0%a5%8b%e0%a4%9a%e0%a4%be-%e0%a4%a8%e0%a4%b9%e0%a5%80%e0%a4%82-%e0%a4%a5%e0%a4%be/attachment/rahul-gandhi1-2/"><img class="alignleft size-medium wp-image-9286" title="rahul-gandhi1" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/rahul-gandhi1-300x240.jpg" alt="" width="300" height="240" /></a><a href="http://www.janokti.com/tag/%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%B9%E0%A5%81%E0%A4%B2-%E0%A4%97%E0%A4%BE%E0%A4%81%E0%A4%A7%E0%A5%80/">राहुल गांधी</a></strong>। इस समय कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव हैं और <strong><a href="http://www.janokti.com/tag/%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%B9%E0%A5%81%E0%A4%B2-%E0%A4%97%E0%A4%BE%E0%A4%81%E0%A4%A7%E0%A5%80/">युवा कांग्रेस</a></strong> की देखरेख की जिम्मेदारी निभा रहे हैं। उन्हें भविष्य का प्रधानमंत्री कहा जाता है, हालांकि उन्होंने कभी नहीं कहा कि वे प्रधानमंत्री बनना चाहते हैं। दरअसल वे कुछ और ही कह रहे हैं। वे कह रहे हैं कि<strong><a href="http://www.janokti.com/?s=+%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%98+&amp;x=0&amp;y=0"> संघ और सिमी </a></strong>एक ही थाली के चट्टे- बट्टे हैं। उन्हें दोनों में कोई फर्क दिखाई नहीं देता। उन्हें चमचागिरि और चापलूसी करने वाले लोग भी कतई पसंद नहीं। वे कहते हैं कि हर मर्ज की सिर्फ एक ही दवा है और वह है राजनीति।</span></p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">अपने मध्य प्रदेश के दौरे के दौरान राहुल गांधी ने कई बातें कहीं। कुछ ऐसी जो कहनी चाहिए थी और कुछ ऐसी जो मेरे ख्याल से नहीं कहनी चाहिए। राहुल ने कहा कि उन्हें चाटुकार और चमचे पसंद नहीं हैं। मुझे नहीं पता कि ये <strong><a href="http://www.janokti.com/tag/%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%B9%E0%A5%81%E0%A4%B2-%E0%A4%97%E0%A4%BE%E0%A4%81%E0%A4%A7%E0%A5%80/">राहुल </a></strong>के निजी विचार हैं या फिर पारिवारिक। राहुल को भले चाटुकार पसंद न हों पर उनकी मां को चाटुकार और चमचे ही पसंद हैं। अगर नहीं होते तो <strong><a href="http://www.janokti.com/sansad-political-news-%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%82%e0%a4%b8%e0%a4%a6-%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%97/%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%b9%e0%a5%81%e0%a4%b2-%e0%a4%ac%e0%a4%be%e0%a4%ac%e0%a4%be-%e0%a4%95%e0%a4%bf%e0%a4%b8-%e0%a4%ae%e0%a5%81%e0%a4%82%e0%a4%b9-%e0%a4%b8%e0%a5%87-%e0%a4%ad%e0%a4%be%e0%a4%b0/">प्रतिभादेवी सिंह पाटिल </a></strong>आज देश की राष्ट्रपति नहीं होतीं। हो सकता है कि मेरी इस बात की जमकर आलोचना की जाए पर मैं जानना चाहता हूं कि प्रतिभादेवी सिंह पाटिल में ऐसी कौन सी खूबी है जो वह राष्ट्रपति के उम्मीदवार हो गईं। अगर महिला होने की वजह से उन्हें राष्ट्रपति बनाया गया तो प्रधानमंत्री पद क्यों किसी पुरुष के सुपुर्द कर दिया गया। क्या पार्टी में कोई ऐसी योग्य महिला नहीं जो प्रधानमंत्री बन सके? या फिर ऐसी महिला नहीं जो <strong><a href="http://www.janokti.com/?s=%E0%A4%B8%E0%A5%8B%E0%A4%A8%E0%A4%BF%E0%A4%AF%E0%A4%BE+%E0%A4%97%E0%A4%BE%E0%A4%82%E0%A4%A7%E0%A5%80+&amp;x=-179&amp;y=3">सोनिया गांधी </a></strong>की बात को आंख पर पट्टी बांध कर मान ले। खुद के प्रधानमंत्री न बन पाने के बाद क्यों उन्होंने कठपुतली मनमोहन सिंह का चयन किया। क्या कांग्रेस में ऐसा कोई व्यक्ति नहीं है जो अपने दम पर लोकसभा चुनाव जीत सके और प्रधानमंत्री बन सके। दरअसल सोनिया अच्छी तरह जानती हैं कि जो नेता लोकसभा का चुनाव जीत सकता है उसका अपना अच्छा खासा जनाधार होता है। मनमोहन सिंह चूंकि लोकसभा से संसद में प्रवेश नहीं करते सो उनका जनाधार भी नहीं होगा। सोनिया सिर्फ उन्हीं लोगों को पद बख्श रहीं हैं जो उनके कहे पर चलें। वे कहेंं दिन तो दिन और कहें रात तो रात। ऐसे नामों में केवल राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री ही नहीं बल्कि कई नाम हैं। अगले लोकसभा चुनाव में जब <strong><a href="http://www.janokti.com/?s=%E0%A4%B8%E0%A5%8B%E0%A4%A8%E0%A4%BF%E0%A4%AF%E0%A4%BE+%E0%A4%97%E0%A4%BE%E0%A4%82%E0%A4%A7%E0%A5%80+&amp;x=-179&amp;y=3">राहुल प्रधानमंत्री पद के दावेदार</a></strong> होंगे उससे पहले ही मनमोहन सिंह को राष्ट्रपित भवन भेजने की पूरी तैयारी अभी से की जा रही है। राहुल को पहले अपने घर से चमचागिरि खत्म करनी होगी तब वे कार्यकर्ताओं को चमचागिरी न करने का पाठ पढ़ाएं तो ज्यादा अच्छा होगा।</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">राहुल कहते हैं कि देश की हर समस्या की खात्मा तभी होगा जब <strong><a href="http://www.janokti.com/sansad-political-news-%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%82%e0%a4%b8%e0%a4%a6-%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%97/%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%b9%e0%a5%81%e0%a4%b2-%e0%a4%ac%e0%a4%be%e0%a4%ac%e0%a4%be-%e0%a4%95%e0%a4%bf%e0%a4%b8-%e0%a4%ae%e0%a5%81%e0%a4%82%e0%a4%b9-%e0%a4%b8%e0%a5%87-%e0%a4%ad%e0%a4%be%e0%a4%b0/">युवा राजनीति </a></strong>में आएंगे। यानी हर मर्ज की एक ही दवा। <a href="http://www.janokti.com/sansad-political-news-%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%82%e0%a4%b8%e0%a4%a6-%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%97/%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%b9%e0%a5%81%e0%a4%b2-%e0%a4%ac%e0%a4%be%e0%a4%ac%e0%a4%be-%e0%a4%95%e0%a4%bf%e0%a4%b8-%e0%a4%ae%e0%a5%81%e0%a4%82%e0%a4%b9-%e0%a4%b8%e0%a5%87-%e0%a4%ad%e0%a4%be%e0%a4%b0/">राजनीति और सिर्फ राजनीति</a>। कोई कम अक्ल का व्यक्ति भी यह बता सकता है कि कभी भी हर मर्ज की एक ही दवा नहीं हुआ करती। अगर देश का हर व्यक्ति राजनीति करने लगेगा तो बाकी के काम कौन करेगा, यह भी राहुल को तय करना होगा। केवल राजनीति से देश नहीं चला करता। राजनीति पेट नहीं भरती। वे युवाओं को देश की राजनीति में लाना चाहते हैं। पहले उन्हें अपनी पार्टी में युवाओं को स्थान देना होगा। पहले वे अपनी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष के पद से अपनी मां को हटाकर किसी युवा नेता को इसकी जिम्मेदारी सौंपे और फिर किसी युवा को ही प्रधानमंत्री बनने की घोषणा करें। केवल युवा कांग्रेस को बदलकर देश की राजनीति नहीं बदली जा सकती। राहुल को यह बात भी समझनी होगी कि कहने और करने में बहुत फर्क होता है। देशभर में घूमने से, <strong><a href="http://www.janokti.com/sansad-political-news-%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%82%e0%a4%b8%e0%a4%a6-%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%97/%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%b9%e0%a5%81%e0%a4%b2-%e0%a4%ac%e0%a4%be%e0%a4%ac%e0%a4%be-%e0%a4%95%e0%a4%bf%e0%a4%b8-%e0%a4%ae%e0%a5%81%e0%a4%82%e0%a4%b9-%e0%a4%b8%e0%a5%87-%e0%a4%ad%e0%a4%be%e0%a4%b0/">दलित के घर जाकर रोटी खाने से </a></strong>और उसके घर सोने से दलित को अच्छा तो लग सकता है, लेकिन इससे उसके पेट की भूख कम नहीं हो सकती। देश भूख है, कराह रहा है। इसके लिए राहुल के पास क्या दवा है? राजनीति। देश घूमकर उसकी समस्याओं को समझना एक बात है और उसकी समस्याओं का निराकरण करना दूसरी बात।</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">राहुल कहते हैं कि वे प्रधानमंत्री नहीं बनना चाहते। राहुल को चाहिए कि वे पहले अपनी पार्टी के उन नेताओं को यह कहने से मना करें, जो उन्हें <strong><a href="http://www.janokti.com/?s=+%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%98+&amp;x=0&amp;y=0">भावी प्रधानमंत्री </a></strong>के रूप में देख रहे हैं। राहुल को यह पता है कि अगले लोकसभा चुनाव में अगर उनकी पार्टी को बहुमत मिला तो प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार वही होंगे सो अभी से ढोल-ताशे क्यों पीटे जाएं। हालांकि भीतर ही भीतर इसकी तैयारियां शुरू कर दी गई हैं। योजना तैयार की जा रही है।</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">मजे की बात यह रही कि राहुल यहीं तक नहीं रुके। बुधवार को तो उन्होंने गजब ही कर दिया। उन्होंने कह दिया कि <strong><a href="http://www.janokti.com/?s=+%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%98+&amp;x=0&amp;y=0">राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ </a></strong>और सिमी में उन्हें कोई फर्क नजर नहीं आता। सवाल यह है कि क्या राहुल ने कभी निष्पक्ष भाव से दोनों में कोई फर्क देखने की चेष्टा की है। नहीं की होगी, क्योंकि उनकी आंखों पर एक तरह का चश्मा लगा है और उन्हें जो कुछ भी दिखता है। उस चश्मे से ही दिखता है। अगर निष्पक्ष भाव से देखते तो उन्हें पता चल जाता कि संघ और सिमी में क्या फर्क है। सिमी जहां एक प्रतिबंधित आतंकी संगठन है, वहीं <strong><a href="http://www.janokti.com/?s=+%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%98+&amp;x=0&amp;y=0">संघ भारत भूमि की आत्मा </a></strong>से जुड़ा हुआ संगठन है। राहुल को अगर देशप्रेमी और देशद्रोही संगठनों में कोई फर्क नजर नहीं आता तो कोई क्या कर सकता है। बस उनकी बुद्धि पर मुस्कराया ही जा सकता है। वे जिस देश की राजनीति में युवाओं को लाने की बात कह रहे हैं क्या वे उस देश को समझ पा रहे हैं। इतने दिनों से देश भ्रमण के बाद भी अगर राहुल ऐसी बातें करते हैं तो लगता है कि लोग उन्हें यूं ही बच्चा नहीं समझते। वे वास्तव में अभी बड़े हो ही नहीं पाए हैं। बिना सोचे समझे बोलना उनकी आदत सी हो गई है। अंगे्रजी में पले बढ़े राहुल ने क्या थिंक बिफोर यू स्पीक की युक्ति नहीं सुनी होगी। सुनी होगी पर शायद उस पर अमल नहीं करना चाहते।</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">दरअसल राहुल की दिक्कत यही है कि वे अपने आप को बहुत बड़ा और विद्धान समझते हैं, वहीं अन्य लोग उन्हें बच्चा समझते हैं। राहुल को यह तक नहीं पता कि किसी के यहां जाते हैं तो कैसे पेश आते हैं। मध्यप्रदेश आगमन से एक दिन पहले ही यहां की सरकार ने उन्हें प्रदेश का अतिथि घोषित कर दिया था, लेकिन राहुल को शायद अतिथि भाव पसंद नहीं आया। उन्हें तो मायावती जैसे लोग ही पसंद आते हैं, जो उनके आने पर कोई व्यवस्था नहीं करती बल्कि प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से गाली ही देती हैं। राहुल की हर गलती को बच्चा समझकर माफ कर दिया जाता है, लेकिन कब तक? बच्चा जब कोई गलती करता है तो पहले उस पर हंसी आती है और जब बड़ा होकर भी वह ऐसा ही करता है तो सजा दी जाती है। राहुल को चाहिए कि वे ऐसी नौबत न आने दें और कोई भी बात बोलने से पहले सोचें।</p>
<p style="text-align: justify;">
]]></content:encoded>
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		<title>‘तोता-रटंत’ राहुल के निरर्थक बोल</title>
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		<pubDate>Fri, 08 Oct 2010 09:52:43 +0000</pubDate>
		<dc:creator>पवन कुमार अरविंद</dc:creator>
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		<description><![CDATA[कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव राहुल गांधी ने देशभक्त संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की तुलना प्रतिबंधित और कुख्यात आतंकी संगठन सिमी से करके अपने नासमझी और अपरिपक्वता का ठोस परिचय दिया है। अभी तक उनकी नासमझी व अपरिपक्वता को लेकर देश ]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><a rel="attachment wp-att-8544" href="http://www.janokti.com/sansad-political-news-%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%82%e0%a4%b8%e0%a4%a6-%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%97/%e2%80%98%e0%a4%a4%e0%a5%8b%e0%a4%a4%e0%a4%be-%e0%a4%b0%e0%a4%9f%e0%a4%82%e0%a4%a4%e2%80%99-%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%b9%e0%a5%81%e0%a4%b2-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%a8%e0%a4%bf%e0%a4%b0%e0%a4%b0/attachment/rahul-gandhi-photo1-2/"><img class="alignright size-medium wp-image-8544" title="rahul-gandhi-photo1" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/rahul-gandhi-photo11-300x196.jpg" alt="" width="300" height="196" /></a>कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव राहुल गांधी ने देशभक्त संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की तुलना प्रतिबंधित और कुख्यात आतंकी संगठन सिमी से करके अपने नासमझी और अपरिपक्वता का ठोस परिचय दिया है। अभी तक उनकी नासमझी व अपरिपक्वता को लेकर देश की जनता में कुछ संदेह था, लेकिन श्री गांधी ने इस प्रकार का बयान देकर उस संदेह को भी दूर कर दिया है।</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">हालांकि, 40 वर्षीय श्री गांधी ऐसा बचकाना बयान देंगे, यह किसी ने भी नहीं सोचा था। इसलिए उनका बयान हैरत में डालने वाला है। वह देश के लिए एक महत्वपूर्ण व्यक्ति हैं। केवल सांसद हैं इसलिए नहीं, बल्कि इसलिए भी, क्योंकि वह ऐसे खानदान का प्रतिनिधित्व करते हैं जिसने पंडित नेहरू सहित इस देश को तीन-तीन प्रधानमंत्री दिए हैं। इसलिए राहुल महत्वपूर्ण व्यक्ति हैं। संसदीय लोकतंत्र में ऐसे बयान को किसी भी सूरत में मर्यादापूर्ण नहीं कहा जा सकता है। यह हर स्थिति में लोकतंत्र की गरिमा को तार-तार करने वाला है।</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">अब प्रश्न यह उठता है कि जो व्यक्ति आतंकी संगठन और सामाजिक संगठन में अंतर न समझ पाता हो, उस व्यक्ति को भविष्य में यदि कभी देश का नेतृत्व करने का मौका मिले, तो वह देश की बागडोर ठीक से संभाल सकेगा, इस बारे में लोगों को सदैव संदेह बना रहेगा। ध्यातव्य है कि राहुल ने मध्य प्रदेश के त्रि-दिवसीय प्रवास के दौरान कहा था कि कांग्रेस के कार्यकर्ता सिमी और आरएसएस से दूर रहें, क्योंकि ये दोनों संगठन कट्टरवाद के समर्थक हैं और दोनों की विचारधार में कोई खास फर्क नहीं है।</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">राहुल ने टिप्पणी तो कर दी लेकिन उनको शायद ही आरएसएस का इतिहास पता हो। वह आरएसएस के संस्थापक का ही ठीक से पूरा नाम नहीं बता सकते। हालांकि, वह आरएसएस को कितना जानते हैं यह बताने के लिए उनका बयान ही काफी है। राहुल के इस प्रकार के ऊल-जुलूल बयान से यह स्पष्ट हो गया है कि उनको इस देश के इतिहास-भूगोल की भी कोई जानकारी नहीं है। राहुल की विशेषता अब केवल स्वर्गीय श्री राजीव गांधी का बेटा होना भर ही रह गया है।</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">राहुल को यह जानना चाहिए कि सिमी पर भाजपा नीत राजग सरकार ने प्रतिबंध लगाया था। उसके बाद उनकी कांग्रेस नीत यूपीए सरकार ने उस प्रतिबंध को आगे बढ़ा दिया। क्योंकि वह खूंखार आतंकी संगठन है और देश में हुए कई आतंकी विस्फोटों में उसका हाथ है। सिमी पर अमेरिका ने भी प्रतिबंध लगा रखा है। राहुल की नजर में आरएसएस यदि सिमी जैसा संगठन है तो उनको अपनी कांग्रेस नीत यूपीए सरकार से उस पर प्रतिबंध लगाने के लिए कहना चाहिए। यदि आरएसएस सचमुच में सिमी के समान है, तो उनकी सरकार ने आरएसएस पर बिना प्रतिबंध लगाए क्यों छोड़ रखा है, यह सोचने वाली बात है ?</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">दरअसल, राहुल को स्वयं नहीं पता होता है कि वह क्या बोल रहे हैं। वह हमेशा लिखा हुआ भाषण पढ़ते हैं और भाषण में जो कुछ भी लिखा होता है, उसी को वह पढ़ डालते हैं।</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">हालांकि, राहुल गांधी के बयान से आरएसएस की सेहत पर कोई असर नहीं पड़ने वाला। हां, इतना अवश्य है कि राहुल ऐसा बोलकर स्वयं ‘हल्के’ पड़ गए हैं। क्योंकि इस देश की जनता किसी भी राजनेता या श्रेष्ठ व्यक्तित्व से सदैव मर्यादित व संयमित व्यवहार तथा भाषा की अपेक्षा करती है।</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">कहा जाता है कि आदमी का बड़प्पन जीवन के किसी भी स्थिति, परिस्थित और मनःस्थिति में धैर्य व धीरज बनाए रखते हुए मर्यादापूर्ण आचरण व व्यवहार करने में होता है। लेकिन सामान्य स्थितियों में ही धैर्य खोकर विक्षिप्तावस्था में आ जाना और ऊल-जुलूल बातें करना, यह मनुष्य के व्यक्तित्व के एक वास्तविक पहलू को ही दर्शाता है। ऐसे व्यक्ति से देश के लिए और देशहित में किसी बड़े काम की उम्मीद नहीं की जा सकती।</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">
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		<title>बयानबाजी के बादशाह हैं सोनिया कांग्रेस के महासचिव राहुल</title>
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		<pubDate>Thu, 07 Oct 2010 17:41:11 +0000</pubDate>
		<dc:creator>जयराम "विप्लव"</dc:creator>
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		<description><![CDATA[मंगलवार को मध्यप्रदेश के टीकमगढ़ में कांग्रेस महासचिव और गाँधी परिवार के युवराज राहुल गाँधी ने कहा कि उनकी नजर में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) और प्रतिबंधित स्टूडेंट इस्लामिक मूवमेंट ऑफ इंडिया (सिमी) एक जैसे हैं &#124; इस बयान के ]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><a rel="attachment wp-att-8509" href="http://www.janokti.com/sansad-political-news-%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%82%e0%a4%b8%e0%a4%a6-%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%97/%e0%a4%ac%e0%a4%af%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a4%ac%e0%a4%be%e0%a4%9c%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%ac%e0%a4%be%e0%a4%a6%e0%a4%b6%e0%a4%be%e0%a4%b9-%e0%a4%b9%e0%a5%88%e0%a4%82-%e0%a4%b8%e0%a5%8b/attachment/rahul-gandhi-photo1/"><img class="alignleft size-medium wp-image-8509" title="rahul-gandhi-photo1" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/rahul-gandhi-photo1-300x196.jpg" alt="" width="300" height="196" /></a>मंगलवार को मध्यप्रदेश के टीकमगढ़ में कांग्रेस महासचिव और गाँधी परिवार के युवराज <strong><a href="http://www.janokti.com/page/2/?s=%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%B9%E0%A5%81%E0%A4%B2&amp;x=-181&amp;y=2">राहुल गाँधी</a></strong> ने कहा कि उनकी नजर में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) और प्रतिबंधित स्टूडेंट इस्लामिक मूवमेंट ऑफ इंडिया (सिमी) एक जैसे हैं | इस बयान के मद्देनज़र पत्रकारों द्वारा स्पष्टीकरण मांगे जाने पर राहुल गाँधी ने कहा कि उनकी नज़र में वैचारिक कट्टरता के मामले में दोनों में कोई अंतर नहीं है। <a href="http://www.janokti.com/page/2/?s=%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%B9%E0%A5%81%E0%A4%B2&amp;x=-181&amp;y=2">राहुल गाँधी</a> इससे पहले भी देश भर के दौरे पर जाते रहे हैं और अपनी सभाओं में युवाओं की भीड़ जुटाने में कामयाब रहे हैं हालाँकि यह बात और है कि भीड़ को कार्यकर्ताओं में बदलना नहीं हो पाता है | वैसे हाल के महीनों में राहुल का युवा फेक्टर औंधे मुंह गिरा है और इसकी शुरुआत बिहार के ललितनारायण मिथिला विश्वविद्यालय में हुई थी जब <strong><a href="http://www.janokti.com/sansad-political-news-%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%82%e0%a4%b8%e0%a4%a6-%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%97/%e0%a4%97%e0%a4%be%e0%a4%82%e0%a4%a7%e0%a5%80-%e0%a4%aa%e0%a4%b0%e0%a4%bf%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%b0-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%ac%e0%a4%aa%e0%a5%8c%e0%a4%a4%e0%a5%80-%e0%a4%ac%e0%a4%a8%e0%a5%80/">राहुल की गलतबयानी </a></strong>ने उनको माफ़ी मांगने पर मजबूर कर दिया था | 42 साल की उम्र में भी बाबा ( प्यार से बड़े लोग अपने सबसे छोटे बच्चे को पुकारते हैं ) कहे जाने वाले राहुल कितने परिपक्व है यह उनकी बातों से अंदाजा हो जाता है | संघ के ऊपर इस तरह की बयानबाजी राहुल ने एक योजना के तहत की थी जिसके जरिये मीडिया और पूरे संघ परिवार को खुद पर फोकस किया जा सके | और ठीक ऐसा ही हुआ |</p>
<p style="text-align: justify;"><span style="font-size: 13.3333px;">मीडिया में दिन भर संघ और भाजपा नेताओं के बयानों को दिखा -दिखा कर राहुल गुणगान किया जाता रहा | मीडिया को दिए साक्षात्कार में संघ की अखिल भारतीय कार्यकारिणी के सदस्य श्री राम माधव ने कहा कि आरएसएस जैसे देश भक्त और राष्ट्रवादी संगठन की तुलना स्टूडेंट इस्लामिक मूवमेंट आफ इडिया (सिमी) जैसे जिहादी और प्रतिबंधित आतंकी संगठन से करना अशोभनीय है। यह उनकी अपरिपक्वता और देश व समाज के बारे में कम जानकारी को ही दर्शाता है। श्री गांधी जैसे युवा नेता को राजनीति में आगे बढ़ना है, अतः उन्हें अपनी बात नाप तौल कर बोलनी चाहिये।</span></p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">भाजपा प्रवक्ता प्रकाश जावडेकर ने कहा कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ राष्ट्रवाद की पाठशाला है और वह पिछले 85 वर्षों से राष्ट्र के लिए तपस्या कर रहा है, जबकि सिमी एक प्रतिबंधित आतंकी संगठन है।जावडेकर ने कहा, &#8220;ऐसा बयान राहुल की राजनीतिक अज्ञानता, अपरिपक्वता और उद्दंडता को दर्शाता है। उन्हें सोच समझकर बोलना चाहिए। पिछले साल भर हुए विभिन्न चुनावों में कांग्रेस को मिली हार और अपना जादू न चलने से राहुल बौखलाए हुए हैं। इसलिए वह इस तरह की ऊल-जुलूल बयानबाज़ी कर रहे है।&#8221;</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">भाजपा के उत्तरप्रदेश अध्यक्ष सूर्य प्रताप शाही ने स्थानीय पत्रकारों से कहा कि श्री गांधी को चाहिए कि वह अपने महासचिव को राष्ट्रभक्त और राष्ट्रद्रोही में अन्तर समझाये । संघ का नाम हर समय राष्ट्रभक्त के रुप में लिया जाता है । पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने 1965 के युद्ध में संघ की भूमिका की सराहना की थी । संघ के कार्यकर्ता राष्ट्रीय आपदाओं से निपटने में बढ चढकर हिस्सा लेते हैं ।</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">वहीँ मध्यप्रदेश भाजपा के अध्यक्ष  प्रभात झा ने राहुल गांधी को उटपटांग बयानबाजी करने वाला गांधी करार दिया है। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा है कि संघ एक राष्ट्रवादी संगठन है और पूरा देश जानता है कि संघ देशभक्ति का पाठ पढ़ाने वाला संगठन है, नौजवानों का चरित्र निर्माण करता है।</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">ऊपर के बयानों को पढ़िये और आने वाले दो-तीन दिनों तक प्रिंट -इलेक्ट्रोनिक -वेब प्रत्येक मीडिया माध्यमों का निरिक्षण करिए तो साफ़ हो जायेगा कि किस प्रकार राहुल गाँधी ने युवाओं में अपनी आउट <a rel="attachment wp-att-8510" href="http://www.janokti.com/sansad-political-news-%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%82%e0%a4%b8%e0%a4%a6-%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%97/%e0%a4%ac%e0%a4%af%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a4%ac%e0%a4%be%e0%a4%9c%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%ac%e0%a4%be%e0%a4%a6%e0%a4%b6%e0%a4%be%e0%a4%b9-%e0%a4%b9%e0%a5%88%e0%a4%82-%e0%a4%b8%e0%a5%8b/attachment/rahul_gandhi_girls_20081124/"><img class="alignright size-full wp-image-8510" title="rahul_gandhi_girls_20081124" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/rahul_gandhi_girls_20081124.jpg" alt="" width="250" height="239" /></a>ऑफ़  फोकस होती छवि को फ़िर से चर्चा में ला दिया है | क्योंकि गौर करिए इससे पहले राहुल क्या बात करते रहे हैं ? यही ना कि</p>
<p style="text-align: justify;"><span style="font-size: 13.3333px;"><strong><span style="color: #0000ff;">केंद्र का पैसा 10 प्रतिशत ही जनता तक पहुंचता है |</span></strong></span></p>
<p style="text-align: justify;"><strong><span style="color: #0000ff;">राजनीति में युवाओं को आना चाहिए |</span></strong></p>
<p style="text-align: justify;"><strong><span style="color: #0000ff;">एक हिंदुस्तान हैं अमीरों का  हिंदुस्तान और दूसरा हिंदुस्तान गरीबों का हिंदुस्तान |</span></strong></p>
<p style="text-align: justify;"><strong><span style="color: #0000ff;">गरीबों का सिपाही हूं |</span></strong></p>
<p style="text-align: justify;"><span style="font-size: 13.3333px;">आदि-आदि वो तमाम बातें जो सुनने में अच्छी लगती हैं | ये सारी चीजें हर एक आम भारतीय समझता और महसूस करता है लेकिन राहुल बाबा इसे दूर करने का प्रयत्न भी तो करें | साठ सालों में रही अधिकांश सरकार इनकी ,हुकूमत इनकी फ़िर भी रोना क्यों रोते हैं ?</span></p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">बहरहाल , देश के  युवा फेसबुक -ऑरकुट -ब्लॉग आदि पर राहुल के संघ सम्बंधित बयान में उलझे पड़े हैं | चर्चा में बने रहने का शगल राहुल गाँधी ने बखूबी सीख लिया है अपने गुरु दिग्विजय से, जो जब देखो तब दूसरों के फटे में अपना मुंह घुसा कर कुछ भी बक देते हैं जैसे कांग्रेस महासचिव नहीं राष्ट्रीय सलाहकार हैं जिनकी राय अपरिहार्य है ! गुरु तो गोबड़ करने में लगे हुए हैं देश का लेकिन चेला चीनी सरीखी मीठी बातों से युवाओं का नब्ज पकड़ना चाहता है ! और इस काम में मीडिया के साथ-साथ देश के बड़े औद्योगिक समूहों को लगाया गया है | इसके दो बड़े  उदाहरण , लोकसभा चुनाव परिणाम  के दौरान इलेक्ट्रोनिक मीडिया  की की रिपोर्टिंग  और हाल ही में एसोचैम द्वारा कराए गए एक सर्वे को मीडिया में उछाला जाना है जिसमें यह कहा गया कि यदि राहुल को कॉमनवेल्थ गेम्स आयोजन का काम सौंपा जाता तो यह काम शानदार ढंग से पूरा हो गया होता |</p>
<p style="text-align: justify;">खैर, अपना यूथ लेंस आउट ऑफ़ फोकस होता देखकर राहुल ने सीधे विपक्ष की जड़ों पर वार कर ध्यान खींचने की जोरदार कोशिश की है और उसमें वो कामयाब होते दिख रहे हैं लेकिन विश्लेषकों की माने तो इससे विकास और युवाओं की बात करने वाले राहुल की बची-खुची छवि भी नकारात्मक हो जाएगी |</p>
<p style="text-align: justify;">
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		<title>मार्क्सवादियों का दोहरा शीर्षासन</title>
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		<pubDate>Fri, 01 Oct 2010 15:32:17 +0000</pubDate>
		<dc:creator>डॉ. वेदप्रताप वैदिक</dc:creator>
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		<description><![CDATA[यदि कार्ल मार्क्स अपनी कब्र से उठकर कभी भारत आ पहुंचें तो वे हक्के-बक्के रह जाएंगे&#124; वे अपने भारतीय चेलों को चीनी चेलों से भी आगे-आगे दौड़ता हुआ पाएंगें&#124; बंगाल के हमारे कामरेडों ने पहले देसी और विदेशी पूंजीपतियों के ]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><span style="font-size: 13.3333px;"><a rel="attachment wp-att-8135" href="http://www.janokti.com/sansad-political-news-%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%82%e0%a4%b8%e0%a4%a6-%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%97/%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b8%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%a6%e0%a4%bf%e0%a4%af%e0%a5%8b%e0%a4%82-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%a6%e0%a5%8b%e0%a4%b9%e0%a4%b0%e0%a4%be/attachment/karl-marx/"><img class="alignright size-medium wp-image-8135" title="karl-marx" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/karl-marx-300x189.jpg" alt="" width="300" height="189" /></a>यदि<strong> <a href="http://www.janokti.com/tag/%e0%a4%86%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%a5%e0%a4%bf%e0%a4%95-%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%95%e0%a4%be%e0%a4%b8/">कार्ल मार्क्स</a> </strong>अपनी कब्र से उठकर कभी भारत आ पहुंचें तो वे हक्के-बक्के रह जाएंगे| वे अपने भारतीय चेलों को चीनी चेलों से भी आगे-आगे दौड़ता हुआ पाएंगें| बंगाल के हमारे कामरेडों ने पहले <strong>देसी और विदेशी पूंजीपतियों</strong> के आगे घुटने टेके, <strong><a href="http://www.janokti.com/tag/%e0%a4%86%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%a5%e0%a4%bf%e0%a4%95-%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%95%e0%a4%be%e0%a4%b8/">नंदीग्राम और सिंगुर</a> </strong>किया और अब वे वोट के खातिर उस मज़हब की शरण में जा रहे हैं, जिसे महात्मा मार्क्स &#8216;जनता की अफीम&#8217; कहते थे| <strong>प. बंगाल की सरकार</strong> ने अब <strong>पिछड़ों का आरक्षण</strong> सात प्रतिशत से बढ़ाकर 17 प्रतिशत कर दिया है ताकि <strong>बंगाली मुसलमानों</strong> के वोट खींचे जा सकें| यह मार्क्सवादियों का दोहरा शीर्षासन है|</span></p>
<p style="text-align: justify;"><span style="font-size: 13.3333px;">दोहरा इसलिए कि &#8216;वर्ग&#8217; की छाती पर पहले उन्होंने मज़हब को बिठाया और फिर मज़हब के सिर पर जात बिठा दी| वह वर्ग-संघर्ष दरकिनार हो गया, जो <strong><a href="http://www.janokti.com/tag/%e0%a4%a8%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b8%e0%a4%b2%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%a6%e0%a5%80-%e0%a4%86%e0%a4%82%e0%a4%a6%e0%a5%8b%e0%a4%b2%e0%a4%a8/">मार्क्सवाद </a></strong>की प्राणवायु है| कैसी विडंबना है कि भारत के <strong>कांग्रेसियों, भाजपाईयों और जातिवादी नेताओं </strong>की तरह हमारे <a href="http://www.janokti.com/tag/marks/">मार्क्सवादी</a> भी जात और मज़हब के नाम पर रेवाडि़यां बांटने में जुट गए हैं| आए थे, वे <strong>वर्गविहीन समाज </strong>की स्थापना करने और अब वे पाए जा रहे हैं, भारत में जातिवादी और मजहबवादी समाज को मजबूत बनाते हुए | सर्वहारा को संघर्ष की कला सिखाने के बदले <strong><a href="http://www.janokti.com/tag/%e0%a4%b2%e0%a4%be%e0%a4%b2-%e0%a4%9d%e0%a4%82%e0%a4%a1%e0%a4%be/">मार्क्सवादी उन्हें &#8216;अफीम&#8217; की गोलियां </a></strong>बाट रहे हैं| मान लिया कि सारे सर्वहारा एक-जैसे हैं| क्या <strong>हिंदू और क्या मुसलमान </strong>? यहां तक तो ठीक है लेकिन असली सवाल यह है कि जब सेंत-मेत में नौकरियां मिलेंगी तो क्या उनके दिलों में वर्ग-संघर्ष का जज़्बा मजबूत होगा ? दूसरों की दया पर जीनेवाले लोग क्या कभी न्याय के लिए लड़ सकते हैं ? नौकरियों में आरक्षण विपन्नों को संपन्नों का मौन अनुगत बनाने का षडयंत्र् है| इस वर्ग-चेतना के विनाश में अपने मार्क्सवादियों का भागीदार होना सचमुच आश्चर्यजनक है| नौकरियों में आरक्षण को प्रोत्साहित करना हमारे देश के सर्वहारा को अनंतकाल के लिए अपंग बना देना है|</span></p>
<p style="text-align: justify;"><span style="font-size: 13.3333px;">बंगाल की <strong>मार्क्सवादी सरकार</strong> इस आत्मघाती काम में  पीछे क्यों रहे ? यदि<strong> केरल, तमिलनाडु, </strong>कर्नाटक और आंध्र की सरकारें<strong> मुस्लिम वोटों </strong>पर हाथ साफ कर रही हैं तो बंगाल की सरकार के सिर पर तो चुनाव आए खड़े हैं| लगभग दो करोड़ बंगाली मुस्लिमों में से लगभग 83 प्रतिशत पिछड़े हैं| इन्हें मुसलमान होने के नाते आरक्षण नहीं दिया जा सकता| वह संविधान-विरोधी है| इसीलिए अनेक राज्यों ने मंडल आयोग के तहत जात का दरवाज़ा खोल दिया है| बंगाल अन्य राज्यों को पीछे छोड़ना चाहता है| वहां तो &#8216;क्रांति के अगि्रम दस्ते&#8217; का राज है न ! बुद्घदेव भट्रटाचार्य सरकार ने अभी-अभी 21000 नई नौकरियों की घोषणा की है| साथ में 17 प्रतिशत आरक्षण की गाजर भी लटका दी है| भला, वह ममता से मात कैसे खा सकती है ? ममता बनर्जी ने दो-टूक घोषणा की थी कि अगर वे मुख्यमंत्र्ी बनीं तो वे मुसलमानों को आरक्षण देंगी| भट्टाचार्य सरकार ने नहले पर दहला मार दिया| मुसलमानों को भी यह आरक्षण स्वीकार करने में ज़रा भी संकोच नहीं | इस्लाम में जात का क्या काम है ? जो जात को मानता है, वह मुसलमान कैसे हो सकता है ? यह जानते हुए भी कोई मुल्ला जातीय आरक्षण के खिलाफ फतवा जारी नहीं करता| लालच बड़ा कि ईमान ? अगर मार्क्सवादी ही अपने सिद्घांतों को कच्चा चबा रहे हैं तो क्या सिर्फ मुसलमानों ने ही इस्लाम के मुताबिक आचरण करने का ठेका ले रखा है ? आरक्षण का दांव मारकर यदि मार्क्सवादी अपने वोट पटाना चाहते हैं तो मुसलमान माले-मुफ्त से मना क्यों करें ? मुफ्त हाथ आए तो बुरा क्या है ?</span></p>
<p style="text-align: justify;"><span style="font-size: 13.3333px;">इस दांव-पेंच के मूल में क्या है ? क्या मुसलमानों का भला है ? यदि यही होता तो अपने सुदीर्घ शासन-काल में मार्क्सवादी सरकार बंगाल के मुसलमानों को उस मुकाम पर पहुंचा सकती थी, जिस पर भारत ही नहीं, सारे दक्षिण एशिया के मुसलमानों को गर्व होता| उसने कुछ जिलों में उर्दू को राजभाषा का दर्जा दे दिया| क्या खूब ? बंगाली मुसलमान को उर्दू से क्या लेना-देना ? उसने अपनी बांग्ला भाषा के खातिर पाकिस्तान तोड़ दिया| मुसलमानों की हालत बंगाल में जितनी खराब है, शायद किसी भी प्रांत में नहीं है| मुसलमान लोग जिन धंधों में हैं, क्या उनकी इज्जत और लज्जत बढ़ाने में मार्क्सवादी सरकार ने कोई छोटी-सी पहल भी की ? अब वह क्या करना चाहती है ? उनके कांम-धंधे छुड़वाकर उनके गले में सरकारी नौकरियां लटकाना चाहती है ? अगर नौकरियां भी थमानी थीं तो उन्हें पढ़ाने-लिखाने का कुछ इंतजाम किया होता| नौकरियों का लालच देकर मार्क्सवादी नेता अपनी हथेली में वोट की सरसों उगाना चाहते हैं| लोकसभा चुनावों में हुई उनकी दुर्गति से वे घबराए हुए हैं| लोकतंत्र् के झमेले में फंसे मार्क्सवादी अपने सिद्घांतों की बलि चढ़ाने में जरा भी संकोच नहीं कर रहे हैं| यदि ममता हिंसक माओवादियों और सत्ताप्रेमी कांग्रेसियों से हाथ मिला सकती है तो मार्क्सवादी मुल्ला और मार्क्स का &#8216;कॉकटेल&#8217; क्यों नहीं बना सकते ?</span></p>
<p style="text-align: justify;"><span style="font-size: 13.3333px;">यह तो वे पहले भी कर चुके हैं| कट्रटरपंथी मुल्लाओं की नाराज़गी से बचने के लिए हमारे बहादुर मार्क्सवादियों ने तसलीमा नसरीन के साथ कैसा बर्ताव किया था ? तसलीमा को सुरक्षा देने के बजाय बंगाल सरकार ने उसे भागने के लिए मजबूर कर दिया था| क्या मार्क्सवादी बंगाल के लिए यह गर्व की बात थी कि एक लोकपि्रय बांग्ला लेखिका अपनी जान बचाने के लिए दिल्ली के आस-पास छुपी रही ? इस घुटना-टेक नीति ने भी मार्क्सवादियों को मुसलमान वोट नहीं दिलवाए| अब आरक्षण की रेवड़ी उन्हें कुछ वोट शायद दिलवा देगी लेकिन उनके दम पर वे सरकार बना पाएंगे, यह संदेहास्पद है| बंगाल की हार हमारे मार्क्सवादियों के लिए प्रतिक्रांति-जैसा झटका सिद्घ होगी| मोह-भंग की उस वेला में मार्क्सवादी पार्टी जात और मजहब से ऊपर उठकर यदि सचमुच सर्वहारा का नेतृत्व करने के लिए कमर कस लेगी तो वह बंगाल से भी बड़ा मैदान मार सकती है| हमारे देश के गए-बीते जातिवादी और मजहबवादी दलों का वह सच्चा लोकतांत्र्िक विकल्प बन सकती है| उसके पास जितने विचारशील और स्वच्छ नेता हैं, उतने देश में किसी अन्य दल के पास नहीं हैं लेकिन वोटों की चकाचौंध ने उनकी भी मति हर ली है|</span></p>
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		<title>राहुल बाबा किस मुंह से भारतीयता का पाठ पढ़ा रहे हैं ?</title>
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		<pubDate>Wed, 08 Sep 2010 15:16:23 +0000</pubDate>
		<dc:creator>जयराम "विप्लव"</dc:creator>
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		<description><![CDATA[आजकल लोकतान्त्रिक राजवंश के युवराज राहुल गांधी युवाओं को खुद से जोड़ने का अभियान जोर-शोर से सरकारी पैसे पर चला रहे हैं । इसी अभियान के तहत राहुल कभी बिहार तो कभी महाराष्ट्र के दौरे करते रहते हैं &#124; वैसे ]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><a rel="attachment wp-att-6667" href="http://www.janokti.com/sansad-political-news-%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%82%e0%a4%b8%e0%a4%a6-%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%97/%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%b9%e0%a5%81%e0%a4%b2-%e0%a4%ac%e0%a4%be%e0%a4%ac%e0%a4%be-%e0%a4%95%e0%a4%bf%e0%a4%b8-%e0%a4%ae%e0%a5%81%e0%a4%82%e0%a4%b9-%e0%a4%b8%e0%a5%87-%e0%a4%ad%e0%a4%be%e0%a4%b0/attachment/rahul-gandhi/"><img class="alignright size-medium wp-image-6667" title="RAHUL gandhi" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2010/09/RAHUL-gandhi-300x223.jpg" alt="" width="300" height="223" /></a>आजकल <a href="http://www.janokti.com/sansad-political-news-%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%82%E0%A4%B8%E0%A4%A6-%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%97/%E0%A4%97%E0%A4%BE%E0%A4%82%E0%A4%A7%E0%A5%80-%E0%A4%AA%E0%A4%B0%E0%A4%BF%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%B0-%E0%A4%95%E0%A5%80-%E0%A4%AC%E0%A4%AA%E0%A5%8C%E0%A4%A4%E0%A5%80-%E0%A4%AC%E0%A4%A8%E0%A5%80/"><strong>लोकतान्त्रिक राजवंश</strong></a> के युवराज <a href="http://www.janokti.com/bihar-election-up-election/%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%9C%E0%A4%A8%E0%A5%80%E0%A4%A4%E0%A4%BF-%E0%A4%94%E0%A4%B0-%E0%A4%B5%E0%A4%82%E0%A4%B6%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%A6/"><strong>राहुल गांधी</strong></a><strong> </strong>युवाओं को खुद से जोड़ने का अभियान जोर-शोर से सरकारी पैसे पर चला रहे हैं । इसी अभियान के तहत राहुल कभी बिहार तो कभी महाराष्ट्र के दौरे करते रहते हैं | वैसे तो मीडिया में राहुल के इस संपर्क अभियान को काफी बढा-चढ़ा कर दिखाया जाता रहा है लेकिन टीवी स्क्रीन के पीछे का सच कुछ और ही है | मंगलवार के दिन महाराष्ट्र के औरंगाबाद में आयोजित राहुल की एक सभा में सैकड़ों छात्रों को इस मकसद जुटाया गया था कि वो <strong><a href="http://www.janokti.com/bihar-election-up-election/%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%9C%E0%A4%A8%E0%A5%80%E0%A4%A4%E0%A4%BF-%E0%A4%94%E0%A4%B0-%E0%A4%B5%E0%A4%82%E0%A4%B6%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%A6/">राहुल ब्रिगेड</a></strong> से जुड़ेंगे लेकिन मामला पलट गया | राहुल की सुरक्षा इन्तेजामों की वजह से जहाँ छात्रों को काफी देर तक तलाशी के कारण परेशान होना पड़ा वहीँ राहुल खुद समय से दो घंटे देरी से आये | इन सब बातों से नाराज युवा छात्र मीडिया में मायूस दिखे खासकर जब राहुल गाँधी ने उनके प्रश्नों का संतोषजनक उत्तर नहीं दिया | एक छात्र ने तो एनडीटीवी को दिए बाईट में यहाँ तक कह डाला कि वो जिस उम्मीद से आये थे उनको बड़ा झटका लगा है | राहुल बाबा ने जो कुछ कहा वो किसी चुनावी सभा की भाषणबाजी लगी |</p>
<p style="text-align: justify;">सभा में <a href="http://www.janokti.com/?s=%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%B9%E0%A5%81%E0%A4%B2+%E0%A4%97%E0%A4%BE%E0%A4%82%E0%A4%A7%E0%A5%80&amp;x=-179&amp;y=5"><strong>राहुल गाँधी</strong></a> ने बोलते हुए छात्रों को बताया कि <strong><a href="http://www.google.co.in/search?hl=en&amp;q=%E0%A4%95%E0%A5%8B%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%AA%E0%A5%8B%E0%A4%B0%E0%A5%87%E0%A4%9F+%E0%A4%87%E0%A4%82%E0%A4%A1%E0%A4%BF%E0%A4%AF%E0%A4%BE+&amp;aq=f&amp;aqi=&amp;aql=&amp;oq=&amp;gs_rfai=">इंडिया दो तरह का है एक कोर्पोरेट इंडिया और दूसरा पुअर इंडिया </a></strong>! इस बात पर भी छात्रों ने राहुल की खूब पोल खोली और पूछा कि पुअर इंडिया के लोगों को उस सभा में क्यों नहीं बुलाया गया ?</p>
<p style="text-align: justify;">महाराष्ट्र में राहुल ने क्षेत्रवादी राजनीति करने वालों को पहले भारतीय होने की याद दिलाई। लेकिन <a href="http://www.janokti.com/?s=%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%B9%E0%A5%81%E0%A4%B2+%E0%A4%97%E0%A4%BE%E0%A4%82%E0%A4%A7%E0%A5%80&amp;x=-179&amp;y=5">राहुल गाँधी </a>और उनकी सरकारें उस वक्त कहाँ छिप जाती हैं जब बिहारियों को मनसे के गुंडों द्वारा बेरहमी से पीटा जाता है ?</p>
<p style="text-align: justify;">अफ़सोस तो ये है कि राहुल के <a href="http://www.janokti.com/sansad-political-news-%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%82%e0%a4%b8%e0%a4%a6-%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%97/%e0%a4%95%e0%a4%be%e0%a4%82%e0%a4%97%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a5%87%e0%a4%b8-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%a8%e0%a4%be%e0%a4%ae-%e0%a4%95%e0%a4%ac%e0%a5%8d%e0%a4%9c%e0%a4%be%e0%a4%8a-%e0%a4%b8%e0%a4%82/">ढोंगपूर्ण राजनीति </a>को आयना दिखाने की हिम्मत आज के पत्रकार खो चुके हैं और जो ऐसा करते हैं उनको तक़रीबन खरीद लिया जाता है | तभी तो बिहार के ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय में छात्रों के समक्ष गलतबयानी पर राहुल गाँधी द्वारा माफ़ी मांगने की घटना मुख्यधारा की मीडिया से गायब हो जाती है | औरंगाबाद में छात्रों की मायूसी को उलट कर &#8221; राहुल गाँधी से संतुष्ट दिखे युवा &#8221; कह कर दिखाया  और छापा जाता है !  जबकि राहुल गाँधी से हर समझदार युवा पूछना चाहता है कि कोर्पोरेट इंडिया और पुअर इंडिया की बात आप किसे सुना रहे हैं ? क्षेत्रवादियों को खाद -पानी देकर बड़ा करने वाले पार्टी के महासचिव होकर आप किस मुंह से उनको <a href="http://www.janokti.com/?s=%E0%A4%AD%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%A4%E0%A5%80%E0%A4%AF%E0%A4%A4%E0%A4%BE+&amp;x=10&amp;y=2">भारतीयता </a>का पाठ पढ़ा रहे हैं ?</p>
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		<title>देश की शिक्षा स्थिति : एक सच ?</title>
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		<pubDate>Wed, 08 Sep 2010 12:03:05 +0000</pubDate>
		<dc:creator>रोहित कश्यप</dc:creator>
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		<description><![CDATA[आज एक दफा फिर से कुछ लिखने की कोशिश करने बैठा हूँ &#124; हाथ कंप्यूटर के की बोर्ड पर चलने शुरू हो गएँ हैं तो लगता है थोड़ा बहुत लिख लूँगा &#124; हाँ क्यूँ न लिखूंगा कोशिश करने वाले की ]]></description>
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<p><a rel="attachment wp-att-6634" href="http://www.janokti.com/%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%ae%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%b6-%e0%a4%b8%e0%a5%81%e0%a4%9d%e0%a4%be%e0%a4%b5-%e0%a4%85%e0%a4%ad%e0%a4%bf%e0%a4%af%e0%a4%be%e0%a4%a8/%e0%a4%a6%e0%a5%87%e0%a4%b6-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%b6%e0%a4%bf%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b7%e0%a4%be-%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%a5%e0%a4%bf%e0%a4%a4%e0%a4%bf-%e0%a4%8f%e0%a4%95-%e0%a4%b8%e0%a4%9a/attachment/lumbini/"><img class="alignleft size-medium wp-image-6634" title="lumbini" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2010/09/lumbini-300x200.jpg" alt="" width="300" height="200" /></a>आज एक दफा फिर से कुछ लिखने की कोशिश करने बैठा हूँ | हाथ कंप्यूटर के की बोर्ड पर चलने शुरू हो गएँ हैं तो लगता है थोड़ा बहुत लिख लूँगा | हाँ क्यूँ न लिखूंगा कोशिश करने वाले की कभी हार नहीं होती यह बात सबने सुन रखी है | मैंने भी कई बार इस शब्द को सुना है और आज उसी को लागु कर रहा हूँ | आज मैं सुबह से सोच रहा था की आज क्या लिखूंगा और मैंने अंतत काफी  जद्दोजहद के बाद फैसला किया की आज शिक्षा पर ही कुछ लिखूंगा , आखिर हाल में हमने शिक्षक दिवस भी मनाया है | तो इससे बेहतर तो कुछ हो ही नहीं सकता है | शिक्षक दिवस तो हर वर्ष मानते हैं हम ,लेकिन जो वायदे और घोषणाएं उस दिन की जाती है वो फिर अमल में आ नहीं पाती है| आज देश के शिक्षा मंत्री जो अपने को बहुत कुलीन समझते हैं , और समझे भी क्यूँ नहीं आखिर विदेशों में शिक्षा ग्रहण की , हमेशा से बड़े लोगों के उठना बैठना हुआ है , देश में शिक्षा की दशा को सुधारना चाह रहे हैं | लगातार नए-नए बिल संसद में सुधार को लेकर पेश किये जा रहे हैं , सहमती चाहे एक पे भी न बने आखिर पेश तो हो रहा है | विदेशी शिक्षण संस्थानों को भी निमंत्रण दिया जा रहा है , की आप आयें और देश में अपनी शाखा खोलें | वो शिक्षा के उच्च स्तर को लेकर काफी चिंतित दिख रहे हैं और खास कर के अंग्रेजी शिक्षा को लेकर वे काफी परेशान हैं | सही भी है आप ही सोचिये अगर आज के समय में अंग्रेजी न आती हो तो क्या होगा | अच्छे  माहौल में आप बैठने के काबिल नहीं रहेंगे , तथाकथित बड़े और सभ्य लोगों के नजरों में आपकी खातिरदारी नहीं होगी , और  आजकल ऐसा कौन नहीं चाहता है | तो अब तो आपको समझ आ ही गया होगा की शिक्षा मंत्री जी क्यूँ परेशान हैं | लेकिन एक बात जो पूरे मज़े को ख़राब कर रही है , शिक्षा मंत्री जिसको जानकर भी अनजान बने हुए हैं वो है भारत की असली शिक्षा की स्थिति | अब आईये हम इस हकीकत पर भी नज़र डालतें हैं | आज भी हमारे देश  कुल मिलाकर 12  लाख शिक्षकों की कमी है | आज भी 42  मिलियन बच्चे ( 1  मिलियन = 1000 ,000 )   जिनकी उम्र 6 से 14 वर्ष के बीच है स्कूलों से महरूम हैं | यह दिन पर दिन सुधर रहा है इसपर एक काली लेकिर ही छाई है | स्थिति तो और भी भयावह है आप ही बताईये आज भी देश के 16  प्रतिशत गांवों में प्रायमरी स्कूल की सुविधा नहीं है , और 17  प्रतिशत स्कूलों में सिर्फ एक शिक्षक है | अब बताईये क्या देश में शिक्षा की स्थिति अच्छी हो  रही है, उत्तर में मुझे नहीं लगता है की कोई कहेगा की सुधार आ रहा है | आज भी बिहार में प्रायमरी स्तर पर 1  लाख शिक्षकों की कमी है | झारखण्ड में 42 टीचरों के पद खाली हैं | और तो और उत्तरप्रदेश में तो 1000 प्रायमरी स्कूलों में तो शिक्षक ही नहीं हैं | और बिहार , झारखण्ड और राजस्थान में प्रत्येक प्रायमरी स्कूलों का औसत लें तो यह 2  शिक्षक प्रति स्कूल निकलेगा | देश में शिक्षा की ऐसी भयावह स्थित है और हमारे मंत्री महोदय विदेशी संस्थानों को आमंत्रण दे रहे हैं | सही ही कहते हैं की देश की शिक्षा की डोर उस आदमी के हाथ में देनी चाहिए जिसके देश के बारे में पता हो | ऐसे आदमी के हाथ में अगर व्यवस्था आएगी तो सुधार की संभावना रहेगी लेकिन अगर कपिल सिब्बल जैसे लोगों के हाथ में रही तो सुधार की संभावना बहुत कम है | स्थिति नीचे से लेकर ऊपर तक ऐसी ही है | क्या आपको नहीं लगता की हमारे देश में शिक्षा को सिर्फ ऐसे लोगों तक सीमित किया जा रहा है जो पहले से जागरूक हैं | अभी हाल में ही एक खबर आयी थी की एक लड़की जो इंजीनियरिंग की छात्रा थी ने सिर्फ इसलिए आत्महत्या कर ली की वो अंग्रेजी में कमजोर थी और इसके लिए क्लास में उसका मजाक बनाया जाता था | लेकिन इस और धयान देना जरूरी है जहाँ शुरू से ही पढाई नहीं हो पा रही है उनकी स्थिति कैसी होगी |  आज देश में शिक्षा के कानून के तहत शिक्षक और विद्यार्थियों के बीच औसत 1 : 30  का होना चाहिए लेकिन यह औसत आज भी 1 : 42  का है और बिहार में तो यह 1 : 83  का है | आज हमारे देश में कई ऐसी स्कूली बच्चे हैं जिनको अंग्रेजी नहीं आती है , मैंने खुद इसका परीक्षण किया है | अंग्रेजी के नाम पे वो बिल्कुल शुन्य हो जाते हैं | और अगर हम पिछड़े इलाकों की बात करे तो स्थिति बहुत ही ख़राब है | हकीकत को नजरंदाज नहीं किया जा सकता , लेकिन हमारे देश में इसको नजरंदार किया जा रहा है | भविष्य के सपने देखने में कोई बुराई नहीं है , लेकिन उसके लिए काम भी करना होता है यह हमें नहीं भूलना चाहिए | स्थिति ऊपर से लेकर नीचे तक एक ही समान है , आज भी समय- समय पर आने वाली रिपोर्ट देश की शिक्षा की स्थिति से अवगत कराती है , और हमेशा खामी ही निकालती है | और इस रिपोर्ट को कुछ दिनों के बाद एक बक्से में बंद कर दिया जाता है और बक्से को  उफनती नदी में डाल दिया जाता  है | जिसका कोई ठिकाना नहीं रहता | यही स्थिति देश की है , आयोग बिठाया जाता है और उनसे रिपोर्ट मांगी जाती है ,लेकिन वह सिर्फ आयोग को ही पता रहता है की उसने रिपोर्ट क्या बनायीं है | तो यहाँ पर एक गंभीर प्रश्न उठता है की आखिर कैसे हमारे देश की स्थिति शिक्षा मामले में अच्छी होगी , क्या देश में जो स्थिति है शिक्षा की उसके आधार पर हम आगे सकते हैं | बात बिल्कुल  स्पष्ट है हमें यहाँ हकीकत को लेकर नीति बनानी होगी नहीं तो स्थिति ठीक नहीं हो सकता ? सुधार तो ऐसी स्थिति में हो ही नहीं सकता | एक सशक्त नीति बने होगी और उसके पालन करना होगा | और ऐसी नीति सिर्फ वातानुकूलित में बैठ कर नहीं बन सकता , इसके लिए हकीकत से रूबरू होना होगा , नहीं तो कुछ नहीं हो सकता | हम सिर्फ भोजन और कपडे देकर शिक्षा के प्रति लोगों को जागरूक नहीं कर सकते | हमें सही में एक ऐसी मानसिकता से काम करने की जरूरत है जो हर वर्ग को ध्यान में रख कर बनायीं गयी हो |यह देश की शिक्षा का एक सच है जिसे हम चाह कर भी नकार नहीं सकते हैं | स्थिति और भी ख़राब है अगर हम जाँच करे तो हमें पता चलेगा | सुधार अगर नहींहोगा को बाद के दिनों में खाई को पाटना मुश्किल होगा?</p>
</div>
<p><span style="font-size: large;"> </span></p>
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		<title>मनरेगा में सिर्फ पैसा बहाने से कुछ नही होगा</title>
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		<pubDate>Sat, 21 Aug 2010 12:05:43 +0000</pubDate>
		<dc:creator>रमेश भट्ट</dc:creator>
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		<description><![CDATA[आज से लगभग 4 साल पहले देश भर में रोजगार यात्राऐं निकाली जा रही थी। गीत गाया जा रहा था। हमारे लिए काम नही, हमें काम चाहिए। इसी समस्या को ध्यान में रखते हुए 2006 में महात्मा गांधी ग्रामीण रोजगार ]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><img class="alignright size-medium wp-image-6073" title="araria_nrega_work" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2010/08/araria_nrega_work-300x206.jpg" alt="" width="300" height="206" />आज से लगभग 4 साल पहले देश भर में रोजगार यात्राऐं निकाली जा रही थी। गीत गाया जा रहा था। हमारे लिए काम नही, हमें काम चाहिए। इसी समस्या को ध्यान में रखते हुए 2006 में महात्मा गांधी ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना की शुरूआत हुई। यह विश्व की अकेली ऐसी योजना है जो मांगने पर जरूरतमन्दों को रोजगार की गारंटी देती है। योजना का मकसद लोगों को गांव में ही काम मुहैया कराना है। गांव में न सिर्फ स्थाई परिसंपत्तियों का निर्माण हो बल्कि महिला और पुरूषों को समान मजदूरी मिल सके। बीते चार सालों में केन्द्र सरकार इस योजना पर भारी भरकम खर्चा कर रही है। काम का आवेदन करने पर 15 दिन में रोजगार देना अनिवार्य है। काम पूरा होने की तिथि से 15 दिन के भीतर मजदूरी देने का प्रावधान है। अगर मजदूरी समय पर नही मिलती तो मजदूरी मुआवजा अधिनियम 1936 के तहत मुआवजा देना होगा। मनरेगा योजना 16000 करोड़ के बजट के साथ शुरू हुई । आज यानि 2010-11 में इस योजना को 41100 करोड़ रूपये आवंटित किये है। यह मांग आधारित कार्यक्रम है लिहाजा सरकार को जरूरत पड़ने पर धन की उपलब्धता करवानी होगी। बीते तीन साल के औसत रोजगार के आंकड़ों पर अगर नज़र डाली जाए तो</p>
<p style="text-align: justify;">साल                 औसत काम दिनों में</p>
<p style="text-align: justify;">2007-08               42</p>
<p style="text-align: justify;">2008-09               48</p>
<p style="text-align: justify;">2009-10               52</p>
<p style="text-align: justify;">इससे एक बात तो स्पष्ट है कानून बनने के चार साल के बाद में 100 दिन का रोजगार उपल्ब्ध कराने में आज भी हम नकामयाब रहे हैं। 11वीं पंचवर्षीय योजना के अर्धवार्षिक समीक्षा में मनरेगा कार्यक्रम में क्रियान्यवयन में पिश्चम बंगाल का रिपोर्ट कार्ड सबसे खराब रहा है। पिश्चम बंगाल 28 दिन का ही औसत रोजगार उपलब्ध करा पाया है। जबकि काम मुहैया कराने का राष्ट्रीय औसत 48 दिन है। मगर 15 राज्य मसलन हिमांचल, महाराष्ट्र, हरियाणा, असम, मेघालय, तमिलनाडू जम्मू और कश्मीर, उत्तराखण्ड, उड़ीसा, कर्नाटक, पंजाब, पिश्चम बंगाल, बिहार, गुजरात और केरल जैसे राज्य सालाना 48 दिन का औसत रोजगार मुहैया कराने में नकामयाब रहे हैं। सालाना आधार में देश भर में कितने परिवारों को रोजगार मिला इन आंकड़ों पर अगर गौर करें तो</p>
<p style="text-align: justify;">साल                कितने परिवारों को रोजगार मिला  करोड़ों में</p>
<p style="text-align: justify;">2006-07             2.10</p>
<p style="text-align: justify;">2007-08             3.39</p>
<p style="text-align: justify;">2008-09             4.51</p>
<p style="text-align: justify;">2009-10             5.06</p>
<p style="text-align: justify;">नरेगा के तहत 60 फीसदी न्यूनतम राशि मजदूरी के लिए खर्च करनी आवश्यक है। राज्यों ने इस बात का ध्यान रखा है कि योजना के मुताबिक 60 फीसदी न्यूनतम हिस्सा मजदूरी के तौर पर प्रदान करना है। एक नज़र राज्यवार मजदूरी के औसत आंकड़ों पर</p>
<p style="text-align: justify;">साल                आवंटित राशि का मजदूरी पर खर्च</p>
<p style="text-align: justify;">2006-07             66</p>
<p style="text-align: justify;">2007-08             68</p>
<p style="text-align: justify;">2008-09             67</p>
<p style="text-align: justify;">2009-10             68</p>
<p style="text-align: justify;">नरेगा के तहत कानून के मुताबिक 100 दिन का रोजगार मुहैया कराना जरूरी है। मगर इस कार्य में ज्यादातर राज्यों का रिपोर्ट कार्ड निराश करने वाला है। 100 दिन रोजगार पाने वाले परिवारों की अगर बात की जाए को रोजगार गारंटी का सच खुद पर खुद सामने आ जायेगा। 2006-07 में 10.29 फीसदी, 2007-08 में 10.62 फीसदी, 2008-09 में 14.48 फीसदी और 2009-10 में 13.24 फीसदी परिवारों को 100 दिन का रोजगार मिला पाया। अरूणांचल प्रदेश, नागालैण्ड, मणीपुर और मिजोरम जैसे राज्यों में किसी भी परिवार को 100 दिन का रोजगार नही मिल पाया। फरवरी 2006 से सितम्बर 2009 के बीच 79 लाख कार्य चलाए गए जिनमे केवल 31 लाख ही पूरे हो पाये जो पूरे काम का 39 फीसदी है। 2009-10 में 40.98 लाख काम चलाए गए जिनमें 67 फीसदी काम जल संरक्षण से जुड़े है।</p>
<p style="text-align: justify;"><span style="font-size: 13.3333px;">महात्मा गांधी नरेगा में शिकायतों का अंबार है। यह बात दिगर है कि हमारी सरकारों के कानों तक कितनी शिकायतें पहुंच पाती है। जो शिकायतें आम है उनमें प्रमुख है जागरूकता का अभाव, समय से काम का न मिलना, मजदूरी का समय पर और पर्याप्त राशि का न मिलना, मस्टर रोल जैसे उचित रिकार्ड का ना रखा जाना, बैंक और पोस्ट आफिसों के बार बार चक्कर लगाना और योजना के तहज तैयार का की गुणवत्ता। सरकारी आंकड़ों के लिहाज से बीते तीन सालों में 1331 शिकायतें सरकार के संज्ञान में आई जिसमें सबसे ज्यादा 419 उत्तर प्रदेश से 235 मध्य प्रदेश 180 राजस्थान 125 बिहार और 87 झारखण्ड से है।</span></p>
<p style="text-align: justify;"><span style="font-size: 13.3333px;">महात्मा गाँधी नरेगा में महिलाओं की हिस्सेदारी में तमिलनाडू राज्य अव्वल रहा है। इस राज्य में मनरेगा में महिलाओं की हिस्सेदारी 79 फीसदी है जबकि 2008-09 साल में बिहार में 30 फीसदी झारखण्ड में 28 फीसदी और उत्तरप्रदेश में 18 फीसदी रही जो की कानून के प्रावधन जिसमें महिलाओं की न्यूनतम 33 फीसदी हिस्सेदारी होनी चाहिए से काफी नीचे है। नरेगा के तहत जारी किये जार्ब कार्ड की वैधानिकता 5 साल की होती है। पिछले साल सरकार के मजदूरी राशि को 100 रूपये तो कर दिया है मगर रोजगार की अवधि 100 दिन से ज्यादा करने पर हाथ खड़े कर दिये हैं। इसके पीछे सीधा सा तर्क है जब हम 100 दिन का रोजगार ही मुहैया नही कर पर रहे है तो काम के दिन बड़ाने से क्या फायदा। मनरेगा के काम का विस्तार किया गया है। इसके तहत सिंचाई सुविधा, बागवानी, पौंधा रोपण और वनीकरण जैसे कामों को लिया गया है। साथ ही इस बात पर जोर दिया गया है कि रोजगार देने में गरीब, अनुसूचित जाति, जनजाति को प्राथमिकता दी जाए। सरकार ने राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना का फायदा नरेगा कामगारों को देने का रास्ता साफ कर दिया है</span></p>
<p style="text-align: justify;"><span style="font-size: 13.3333px;">महात्मा गांधी रोजगार में सरकार हर स्तर पर निगरानी व्यवस्था को मजबूत करना चाहती है। इसके लिए हर जिले पर एक लोकपाल नियुक्त करने के दिशानिर्देश जानी किये गए मगर पंजाब को छोड़कर अब तक किसी राज्य ने इस पर अमल नही किया। समाज के जागरूक लोगों का एक पैनल गठित करने की बात कही गई है। सोशल आडिट को आवश्यक कर दिया गया है। पंचायतों को अपनी भूमिका प्रमुखता से निभानी है। इस योजना को सफल बनाने में सांसदों का भी योगदान अहम हो सकता है। दरअसल जिला स्तर में निगरानी समिति का अध्यक्ष सासन्दों को बनाया गया है। बकायदा सालाना कितनी बैठकें राज्य वार होनी है या जिले वार होनी है इसके दिश निर्देश केन्द्र ने जानी कर रखें हैं। मसलन सालान आधार में 28 राज्यों में 112 बैठकें होनी चाहिए मगर 2006-07 में 35, 2007-08 में 36 और 2008-09 में 35 बैठकें भी हो पायी। हरियाणा, जम्मू और कश्मीर, मिजोरम ,दादर और नागर हवेली में पिछले 2 सालों में एक भी बैठक नही हुई। वही 619 जिलों में कुल 2476 बैठकें होनी चाहिए। मगर 2006-07 में 619, 2007-08 में 912 और 2008-09 में 579 बैठकें ही हुई। इन बैठको की अध्यक्षता हमारे सासन्द महोदयों को करनी थी। इससे पता चलता है कि निगरानी व्यवस्था की स्तर क्या है। यहां सांसदों का यह भी कहना है कि महज अध्यक्ष बना दिया गया है उनके पास किसी तरह की कोई ताकत नही है।</span></p>
<p style="text-align: justify;">महात्मा गांधी नरेगा एक ऐतिहासिक योजना है। इसके लिए ग्रामीण विकास का एक बड़ा हिस्सा खर्च किया जा रहा है। मगर जरूरतमन्दों तक अभी भी योजना का सम्पूर्ण लाभ नही पहुंच पा रहा है। इसके लिए राज्य सरकारों को गम्भीरता से काम करना होगा। साथ ही केन्द्र सरकार को अच्छा प्रदर्शन करने वाले राज्यों को प्रोत्साहित करना चाहिए साथ ही खराब प्रदर्शन करने वाले राज्यों पर जुर्माना लगाना चाहिए। सिर्फ पैसा बहाने से कुछ नही होगा । मनरेगा के तहत कराये जा रहे कार्यो की समीक्षा करनी होगी। योजना जरूरत ऐतिहासिक है मगर इसे बेहतर बनाने के लिए हम सभी को मिलकर प्रयास करना पड़ेगा।</p>
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		<title>स्वतंत्रता बेमानी है !</title>
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		<pubDate>Sat, 21 Aug 2010 08:32:25 +0000</pubDate>
		<dc:creator>अमित कुमार मीत</dc:creator>
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		<description><![CDATA[63 साल बाद भी तिरंगा शान से लाल किले कि प्राचीर पर लहर रहा है.तिरंगे के लहरने का कारण वादियों में चलने वाली हवा है न कि हमारा जोश.वो निरंतर लहरता रहेगा जब तक फिजाओं में हवाऐं चलती रहेंगी.लेकिन आजादी ]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><img class="alignright size-medium wp-image-6067" title="Happy-independence-day-India" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2010/08/Happy-independence-day-India-300x199.jpg" alt="" width="300" height="199" />63 साल बाद भी तिरंगा शान से लाल किले कि प्राचीर पर लहर रहा है.तिरंगे के लहरने का कारण वादियों में चलने वाली हवा है न कि हमारा जोश.वो निरंतर लहरता रहेगा जब तक फिजाओं में हवाऐं चलती रहेंगी.लेकिन आजादी के 63 साल बाद एक प्रश्न उभर कर सामने आ रहा है कि क्या राष्ट्रीय ध्वज तिरंगे में वो शान बची है जो 63 साल पहले हुआ करती थी.आज हम एक गणतंत्र राष्ट्र में जी रहे हैं.लोकतांत्रिक देश होने के नाते यहाँ संविधान सर्वोच्च है. राष्ट्रवादी स्वतंत्रता सेनानियों ने भारत को उस परिस्थिति में पहुँचाया जब देश का प्रत्येक नागरिक ये कह सकता कि मैं पूर्ण स्वतंत्र हूँ.लेकिन क्या आज ऐसा  है? कुंठाओं ने मन में घर बना लिया है.15 अगस्त या 26 जनवरी हमारे लिए राष्ट्रीय पर्व  न रहकर महज छुट्टी का एक दिन बन गए हैं.दरअसल हमें आजादी तो मिली मगर हमें उसे संजोना नही आया.राष्ट्रवादियों और महापुरुषों द्वारा बताई गई बातें हमारे लिए महज किताबी हो गई है.लोकतंत्र को लोकधर्म होना चाहिए था मगर लोगों ने लोकतंत्र को अपने निजी धर्मों के अनुसार बदलना शुरु कर दिया.</p>
<p style="text-align: justify;">15 अगस्त 1947 को भारत की आजादी के प्रथम संबोधन में देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरु ने जय हिंद का नारा लगाते हुए कहा था कि देश में स्थिरता आएगी और गरीबी दूर होगी.लेकिन आज 63 साल की जवान आजादी के बाद भी गरीबी में मामूली कमी ही आ पाई है.इन 63 सालों के बीच देश में अस्थिरता भी बढी है.सांप्रदायिकता,आतंकवाद, नक्सलवाद,रंगभेद, वंशवाद, दलित उत्पीडन के रुप में भारत में अस्थिरता बढी है.गरीबी खत्म हो या न हो गरीब निश्चित रुप से खत्म हो रहा है.जय हिंद का मतलब होता है विजय या जीत.अब सवाल ये उठता है कि क्या जय हिंद का नारा अपनी प्रासंगिकता नही खो रहा है? सुभाष चंद्र बोस ने देश को स्वतंत्रता की सुबह का दर्शन कराने के लिए आजाद हिंद फौज की स्थापना की थी. तब ये नारा सभी देशवासियों की जुबाँ पर चढ गया था. नारा आज भी हमारे देश के प्रधानमंत्री लाल किले की प्राचीर से लगाते हैं मगर सिर्फ क्षणिक जोश जगाने के लिए.भारत की विजय अब सिर्फ कागजों तक सीमित रह गई है.भ्रष्टाचार, असमानता,अशिक्षा ये सभी वो विषय हैं जिन पर चर्चा तो खूब हो रही है मगर समाधान कुछ नही निकल पा रहा.</p>
<p style="text-align: justify;">दरअसल समस्या ये भी रही है कि देश के नागरिकों ने अपनी आजादी को गलत ढंग से अपनाया है.हमें अपने अधिकारों की तो चिंता है मगर अपने उत्तरदायित्वों को हमने पूर्णत भूला दिया है. हमें ये याद है कि हम सड़क पर चलने के लिए आजाद है लेकिन जब हम उस सडक पर कूडा फेंकते है या थूकते हैं तो हमें अपना कर्तव्य याद नही आता कि ये गलत है.स्वतंत्रता में हमारे अधिकारों का तो समावेश होता है उसके साथ हमारे कर्तव्य भी जुडे़ होते हैं.15 अगस्त पर  देशभक्ति के गीत सुने जाते है मगर जब बात आती है देश की रक्षा में बलिदान होने की तो हम पड़ोसी की तरफ नज़र उठाकर देखते हैं.वो कहते हैं न कि  “भगत सिंह पैदा तो हो मगर पड़ोसी के घर में” हमने अपने अंदर के भगत सिंह की हत्या कर दी है और दुर्भाग्य है कि हमें उस हत्या का पता भी नही है पश्चाताप तो दूर की बात है.</p>
<p style="text-align: justify;">आज देश दो भागों में विभाजित हो गया है एक तरफ तो इंडिया है जिसमें देश का संभ्रांत तबका निवास करता है और दूसरी तरफ है भारत, जिसकी आत्मा गाँवों में बसती है. दुख इस बात का है कि इंडिया को तो आजादी मिल गई मगर भारत अब भी अपनी आजादी के लिए संघर्ष कर रहा है.तकनीक का निरंतर विकास तो हो रहा है लेकिन उस तकनीक का फायदा देश के प्रत्येक तबके तक नही पहुँच पा रहा है. देश के ग्रामीण वर्ग के मन में शहरी क्षेत्रों के लोगों के प्रति हीन भावना भर गई है. राजनीतिक प्रयास भी गाँवों को वो तरक्की नही दिला सके जिनकी उन्हें सख्त दरकार थी.करोड़ों के हेर-फेर से हमारे देश के नेता देश को चलाने की कोशिश करने लगे हैं.गाँधी टोपी पहनना कभी शान हुआ करता था लेकिन अब बच्चे कहते हैं कि बेईमान नेता आ रहा है.हमारे देश के कई ऐसे राज्य हैं जो गंभीर आर्थिक और सामाजिक असमानताओं से गुजर रहे हैं. गाँवों तक विकास की गाड़ी पहुँच पाए इसके लिए पंचायतों का गठन किया गया मगर पंचायतों के क्रूर फैसलों ने इन्सान की आजादी को छीनने में भी कोई कसर नही छोडी.</p>
<p style="text-align: justify;">हमारे देश में समय-समय पर सरकारें बदलती रही मगर किसी भी सरकार ने निचले तबके के विकास के लिए पहल की हो ऐसा कहना मुश्किल है.देश के नेताओं ने सबसे पहले उन लोगों के घरों को खुशहाल करने की कोशिश की जो उन्हें चुनावों में फायदा पहुँचा पाएं.स्वतंत्र भारत में राजनीतिज्ञों और उच्च तबके के लोगों ने स्वतंत्रता को मनमाने ढंग से प्रयोग किया.मतदान के समय नोटों का खेल भी हमें देखने को मिल जाता है.लोकतंत्र हमें हमारी सरकार को स्वयं चुनने का विवेक प्रदान करता है मगर होता इसके ठीक विपरीत है. सत्ता तक वही लोग पहुँचते हैं जो चापलूसों की दुनिया में गहरी पकड़ रखते हैं.</p>
<p style="text-align: justify;">आजादी के 6 दशकों के बाद भी हमारे संकल्प संसद के गलियारों से निकलकर देश की सड़कों तक नही आ पाए.इसमें हमारी भी कमियाँ रही कि हम अपने अधिकारों का सही प्रयोग नही कर पाए और कर्तव्यों को भूल गए.देश के लिए प्रत्येक व्यक्ति को अपना सर्वस्व न्यौछावर करना चाहिए,ऐसी भावना हमारे मन में होनी आवश्यक है. हमारा देश विश्व का सबसे युवा देश है और ये सभी को पता है कि विश्व में जितनी भी क्रांति हुई है वो युवाओं के कंधों पर ही हुई है.हम चाहे तो राष्ट्र को एक नई दिशा दे सकते हैं। अपने गौरवमयी इतिहास के आसरे हम अपने वर्तमान और भविष्य को उज्जवल होता हुआ देख सकते हैं। बस आवश्यकता है एक प्रयास की। एक आंदोलन की। देश में एक समान नितियाँ सभी के लिए लागू हो, विकास का पैमाना सभी के लिए एक हो इसके लिए निश्चित तौर पर हमें संघर्ष की आवश्यकता होगी। हमें एक और आजादी की जरुरत है वो है आर्थिक आजादी.सरकार को ये सुनिश्चित करना चाहिए कि देश के प्रत्येक व्यक्ति का पेट भरा हो एक छोटे से लाभ के लिए लोगों के घरों को न उजाडा जाए.ये सब तभी संभव है जब हम अपने उत्तरदायित्वों को प्राथमिकता दें और अधिकार के साथ सवाल करना सीखें.ये सच्ची आजादी का पहला कदम है और ये निश्चित है कि हम जरुर आज़ाद होंगे.</p>
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