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	<title>JANOKTI : जनोक्ति :  राज-समाज और जन की आवाज &#187; class-struggle</title>
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	<description>Daily news analysis , Hindi samachar ,Hindi magazine,Hindi website,a6V3sbK3z0d4m7JTOT6OQOVo1jQ</description>
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		<title>माओवाद की राजधानी ‘मनातू’ जहाँ सांसद भी जाने से डरते हैं &#124;</title>
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		<pubDate>Sat, 05 Feb 2011 11:22:36 +0000</pubDate>
		<dc:creator>जयराम "विप्लव"</dc:creator>
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		<description><![CDATA[जनोक्ति की टीम झारखण्ड में माओवाद की जमीन तलाशने के लिए राजधानी रांची से होते हुए पलामू ( डाल्टेनगंज ) पहुंची &#124; पलामू की जमीन पर कदम रखने से पहले जो सबसे बड़ा शब्द था &#8216; माओवाद &#8216; जिसके गहरे ]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><a rel="attachment wp-att-13324" href="http://www.janokti.com/government-failure-%e0%a4%85%e0%a4%82%e0%a4%a7%e0%a5%87%e0%a4%b0-%e0%a4%a8%e0%a4%97%e0%a4%b0%e0%a5%80/%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%93%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%a6-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%9c%e0%a4%a7%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a5%80-%e2%80%98%e0%a4%ae%e0%a4%a8%e0%a4%be%e0%a4%a4%e0%a5%82/attachment/mnaatu/"><img class="alignright size-medium wp-image-13324" title="mnaatu" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/mnaatu-300x225.jpg" alt="" width="300" height="225" /></a>जनोक्ति की टीम झारखण्ड में माओवाद की जमीन तलाशने के लिए राजधानी रांची से होते हुए पलामू ( डाल्टेनगंज ) पहुंची | पलामू की जमीन पर कदम रखने से पहले जो सबसे बड़ा शब्द था &#8216; माओवाद &#8216; जिसके गहरे निहितार्थ में हमें उतरना था |  रांची छोड़ने से पहले हमारे मन में आशंकाओं  के बादल उमड़ रहे थे लेकिन सच्चाई को जानने की जिद भी थी | रांची से पलामू पहुँचने के क्रम में कई ऐसे दृश्य नजरों से होकर गुजरे जो कल्पना से परे थे | एक -एक पुल की सुरक्षा में अर्ध-सैनिक बालों केदो दर्जन जवान गश्त लगा रहे थे | सडकों पर घुमती बख्तरबंद गाडियां इलाके में दहशत की कहानी को बयान कर रही थी | किसी प्रकार हम पलामू के अत्यंत पिछड़े और नक्सल प्रभावित प्रखंड मनातू पहुंचे | यहाँ जिला मुख्यालय से क्षेत्र के प्रखंडों को जोड़ने का एक मात्र माध्यम सालों पहले बनी जर्जर सड़कें जिसपर महज एक ही बस आवा-गमन करती है |  शिक्षा -स्वास्थ्य &#8211; सड़क -बिजली -पानी जैसी मुलभुत सुविधाओं से विहीन मनातू के लोगों से मिलकर हमने जो कुछ समझा उसको लेकर शासन तंत्र और जनप्रतिनिधियों के ऊपर अनेक सवाल उठ रहे थे |  इन्हीं सवालों को जानने के लिए हम पहुंचे क्षेत्र के सांसद &#8216;इन्दर सिंह नामधारी &#8216; के पास जो पूर्व में झारखण्ड विधानसभा के अध्यक्ष भी रह चुके हैं |  सम्बंधित मुद्दे पर झारखण्ड के सबसे शिक्षित और सजग कहे जाने वाले जनप्रतिनिधि इन्दर सिंह नामधारी से हमारी बातचीत पर आधारित रिपोर्ट प्रस्तुत है :</p>
<p style="text-align: justify;">भौगोलिक रूप से देश के सबसे बड़े लोकसभा क्षेत्र में से एक चतरा के सांसद इन्दर सिंह नामधारी ने बातचीत के दौरान मनातू को <strong>माओवादियों के अभ्यारण्य </strong><span style="font-size: 13.3333px;">की संज्ञा देते हुए हमारे सकुशल लौट आने पर आश्चर्य का भाव प्रकट किया | उन्होंने क्षेत्र में &#8216;भय&#8217; को रेखांकित करते हुए बताया कि मनातू ब्लोक का प्रखंड विकास पदाधिकारी वहां ना बैठ कर पड़ोस के &#8216; तरहस्सी &#8216; ब्लोक में बैठते हैं | उनसे जब हमने इलाके में नदारद मूलभूत सुविधाओं की बात छेड़ते हुए सड़क और बिजली की बदहाली की बात सामने रखी तो उन्होंने कहा कि माओवादियों के भय से कोई भी ठेकेदार टेंडर भरने को तैयार नहीं है | मोटी रकम  नक्सलियों को देने के बाद भी जान-माल की सलामती का सवाल बना रहता है | इसका एक ही उपाय है कि सुरक्षा बालों की कड़ी निगरानी में सड़क निर्माण का काम हो और यह कार्य केवल आर्मी के द्वारा ही संभव है | सड़क निर्माण में आर्मी की मदद की फ़रियाद लेकर वो केन्द्रीय गृहमंत्री चिदंबरम के पास भी पहुंचे थे | लेकिन चिदंबरम ने इस मामले में असमर्थता जाहिर की |</span></p>
<p style="text-align: justify;">सांसद महोदय के अनुसार बिजली के लिए लोडशेडिंग की सबसे बड़ी समस्या है | विकास कार्यों में आने वाली बाधाओं को गिनाते हुए उन्होंने सांसदों और विधायकों की लड़ाई को भी बहुत हद तक जिम्मेदार बताया | जनप्रतिनिधियों में आपसी ताल मेल के अभाव में नौकरशाहों की मनमानी की शिकार क्षेत्र की जनता हो रही है | विकास मद में होने वाले प्रत्येक कार्य यहाँ तक की नरेगा में भी ४० %  कमीशनखोरी यहाँ आम बात है | डाल्टेनगंज के वर्तमान डी डी सी के ऊपर कमीशनखोरी और आर्थिक अनियमितता के सिलसिले में रंगे हाथों पकडे जाने पर भी राज्य सरकार की कृपा दृष्टि उन पर बनी हुई है | डी डी सी को बर्खास्त किये जाने की मांग को लेकर सांसद महोदय ने प्रदेश के मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा को एक पत्र भी लिखा लेकिन अब तक कोई परिणाम सामने नहीं आया है |</p>
<p style="text-align: justify;">साथ-साथ पारा शिक्षकों और एनजीओ की मिलीभगत से मध्याह्न भोजन में होने वाली धांधलियों का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि योजनाओं का क्रियान्वयन जमीनी तौर पर दो फीसदी भी नहीं हो पा रहा है | माओवादियों के नाम पर सरकारी अफसरों और कर्मचारियों इलाके से गायब रहते हैं | स्थानीय जनप्रतिनिधि का भी इस ओर कोई ध्यान नहीं है | विधायक महाशय को भी क्षेत्र की जनता शोषक के रूप में ही देखती है | शैक्षिक रूप से पिछड़े लोग अपने अधिकारों से अनजान और आवाज उठाने में असमर्थ हैं | बार-बार चुनाव में ऐसे लोगों को जीता कर पांच सालों तक उनकी मेहरबानियों पर गुजर-बसर करते हैं |</p>
<p style="text-align: justify;">मनातू में स्वास्थ्य केन्द्रों में चिकित्सकों की गैर मौजूदगी और एम्बुलेंस सेवा के ना होने के सवाल पर उन्होंने कन्नी काटते हुए कहा कि ऐसे इलाके में एम्बुलेंस सेवा का उपयोग कम दुरूपयोग ज्यादा होगा | हालाँकि ऐसा होता भी इलाके के स्वस्थ्य केंद्र में सोलर सेवा का उपयोग मरीजो के इलाज में हो ना हो कर्मचारियों के मोबाइल चार्ज में जरुर होता है |</p>
<p style="text-align: justify;">सांसद महोदय ने दार्शनिक अंदाज में क्षेत्र की समस्याओं से अपना पल्ला झाड़ते हुए कहा कि &#8216; <strong>इंसान परिस्थितियों का गुलाम होता है &#8216;  |</strong></p>
<p style="text-align: justify;">
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		<title>आम लोगों की एकजुटता से झुकेगी सत्ता</title>
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		<pubDate>Mon, 29 Nov 2010 14:37:48 +0000</pubDate>
		<dc:creator>डा ० पुरुषोत्तम मीणा</dc:creator>
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		<description><![CDATA[आज हमारे लिये सबसे जरूरी और महत्वपूर्ण है कि देश या समाज के लिये न सही, कम से कम अपने आपके और अपनी आने वाली पीढियों के सुखद एवं सुरक्षित भविष्य के लिये तो हम अपने वर्तमान जीवन को सुधारें। ]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><a rel="attachment wp-att-11068" href="http://www.janokti.com/discussion-suggestions-%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%9a%e0%a4%be%e0%a4%b0-%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%ae%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%b6/%e0%a4%86%e0%a4%ae-%e0%a4%b2%e0%a5%8b%e0%a4%97%e0%a5%8b%e0%a4%82-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%8f%e0%a4%95%e0%a4%9c%e0%a5%81%e0%a4%9f%e0%a4%a4%e0%a4%be-%e0%a4%b8%e0%a5%87-%e0%a4%9d%e0%a5%81%e0%a4%95/attachment/3srs1/"><img class="alignright size-medium wp-image-11068" title="3srs1" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/3srs1-300x225.jpg" alt="" width="300" height="225" /></a>आज हमारे लिये सबसे जरूरी और महत्वपूर्ण है कि देश या समाज के लिये न सही, कम से कम अपने आपके और अपनी आने वाली पीढियों के सुखद एवं सुरक्षित भविष्य के लिये तो हम अपने वर्तमान जीवन को सुधारें। यदि हम सब लोग केवल अपने वर्तमान को सुधारने का ही दृढ निश्चय कर लें तो आने वाले कल का अच्छा होना तय है, लेकिन हमारे आज अर्थात् वर्तमान के हालात तो दिन-प्रतिदिन बिगडते ही जा रहे हैं। हम चुपचाप सबकुछ देखते और झेलते रहते हैं। जिसका दुष्परिणाम यह है कि आज हमारे देश में जिन लोगों के हाथों में सत्ता की ताकत हैं, उनमें से अधिकतर का सच्चाई, ईमानदारी एवं इंसाफ से दूर-दूर का भी नाता नहीं रह गया है। अधिकतर भ्रष्टाचार के दलदल में अन्दर तक धंसे हुए हैं और अब तो ये लोग अपराधियों को संरक्षण भी दे रहे हैं। ताकतवर लोग जब चाहें, जैसे चाहें देश के मान-सम्मान, कानून, व्यवस्था और संविधान के साथ बलात्कार करके चलते बनते हैं और सजा होना तो दूर इनके खिलाफ मुकदमे तक दर्ज नहीं होते! जबकि बच्चे की भूख मिटाने हेतु रोटी चुराने वाली अनेक माताएँ जेलों में बन्द हैं। इन भ्रष्ट एवं अत्याचारियों के खिलाफ यदि कोई आम व्यक्ति या ईमानदार अफसर या कर्मचारी आवाज उठाना चाहे, तो उसे तरह-तरह से प्रताड़ित एवं अपमानित करने का प्रयास किया जाता है और सबसे दु:खद तो ये है कि पूरी की पूरी व्यवस्था अंधी, बहरी और गूंगी बनी देखती रहती है।</p>
<p style="text-align: justify;"><span style="font-size: 13.3333px;">अब तो हालात इतने बिगडते चुके हैं कि मसाले, घी, तेल और दवाइयों तक में धडल्ले से मिलावट की जा रही है। ऐसे में कितनी माताओं की कोख मिलावट के कारण उजड जाती है और कितनी नव-प्रसूताओं की मांग का सिन्दूर नकली दवाईयों के चलते युवावस्था में ही धुल जाता है, कितने पिताओं को कन्धा देने वाले तक नहीं बचते, इस बात का अन्दाजा भी नहीं लगाया जा सकता। इस सबके उपरान्त भी इन भ्रष्ट एवं अत्याचारियों का एकजुट होकर सामना करने के बजाय हम चुप्पी साधकर, अपने कानूनी हकों तक के लिये भी गिडगिडाते रहते हैं।</span></p>
<p style="text-align: justify;"><span style="font-size: 13.3333px;">अधिकतर लोग तो इस डर से ही चुप्पी साध लेते हैं कि यदि वे किसी के खिलाफ बोलेंगे तो उन्हें भी फंसाया जा सकता है। इसलिये वे अपने घरों में दुबके रहते हैं! ऐसे लोगों से मेरा सीधा-सीधा सवाल है कि यदि ऐसा ही चलता रहा तो आने वाले समय में हमारे आसपास की गंदगी को साफ करने वाले यह कहकर सफाई करना बन्द कर देंगे, कि गन्दगी साफ करेंगे तो गन्दगी से बीमारी होने का खतरा है? खानों में होने वाली दुर्घटनाओं से भयभीत होकर खनन मजदूर यह कहकर कि खान गिरने से जीवन को खतरा है, खान में काम करना बंद कर दे, तो क्या हमें खनिज उपलब्ध हो पायेंगे? इलाज करते समय मरीजों से रोगाणुओं से ग्रसित होने के भय से डॉक्टर रोगियों का उपचार करना बन्द कर दें, तो बीमारों को कैसे बचाया जा सकेगा? आतंकियों, नक्सलियों एवं गुण्डों के हाथों आये दिन पुलिसवालों के मारे जाने के कारण यदि पुलिस यह सोचकर इनके खिलाफ कार्यवाही करना बन्द कर दें कि उनको और उनके परिवार को नुकसान पहुँचा सकता हैं, तो क्या सामाज की कानून व्यवस्था नियन्त्रित रह सकती है? पुलिस के बिना क्या हमारी जानमाल की सुरक्षा सम्भव है? आतंकियों तथा दुश्मनों के हाथों मारे जाने वाले फौजियों के शवों को देखकर, फौजी सरहद पर पहरा देना बंद कर दें, तो क्या हम अपने घरों में चैन की नींद सो पाएंगे?</span></p>
<p style="text-align: justify;"><span style="font-size: 13.3333px;">यदि नाइंसाफी के खिलाफ हमने अब भी अपनी चुप्पी नहीं तोडी और यदि आगे भी ऐसा ही चलता रहा तो आज नहीं तो कल जो कुछ भी शेष बचा है, वह सब कुछ नष्ट-भ्रष्ट हो जाने वाला है। आज आम व्यक्ति को लगता है कि उसकी रक्षा करने वाला कोई भी नहीं है! क्या इसका कारण ये नहीं है, कि आम व्यक्ति स्वयं ही अपने आप पर विश्वास खोता जा रहा है? ऐसे हालात में दो ही रास्ते हैं-या तो हम अत्याचारियों के जुल्म और मनमानी को सहते रहें या समाज के सभी अच्छे, सच्चे, देशभक्त, ईमानदार और न्यायप्रिय-सरकारी कर्मचारी, अफसर तथा आम लोग एकजुट होकर एक-दूसरे की ढाल बन जायें। क्योंकि लोकतन्त्र में समर्पित, संगठित एवं सच्चे लोगों की एकजुट ताकत के आगे झुकना सत्ता की मजबूरी है और सत्ता वो धुरी है, जिसके आगे सभी प्रशासनिक निकाय और बडे-बडे अफसर आदेश की मुद्रा में मौन खडे रहते हैं।</span></p>
<p style="text-align: justify;">
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		<title>नक्सलियों के आय के प्रमुख स्रोत</title>
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		<pubDate>Wed, 10 Nov 2010 13:16:41 +0000</pubDate>
		<dc:creator>त्रिपुरारी कुमार</dc:creator>
				<category><![CDATA[राष्ट्रीय]]></category>
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		<description><![CDATA[निशा दास की रिपोर्ट रांची से झारखंड में नक्सल समस्या एक जटिल समस्या बनी हुई है। लंबे समय से इस जंजाल से निकलने का यहां के राजनेताओं के साथ -साथ नौकरशाहों ने भी प्रयास किया ,पर अबतक कोई खास सफलता इसमें ]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><strong>निशा दास की रिपोर्ट रांची से</strong></p>
<p style="text-align: justify;"><a rel="attachment wp-att-10328" href="http://www.janokti.com/sansad-political-news-%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%82%e0%a4%b8%e0%a4%a6-%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%97/national-news-%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%b7%e0%a5%8d%e0%a4%9f%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a5%80%e0%a4%af/%e0%a4%a8%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b8%e0%a4%b2%e0%a4%bf%e0%a4%af%e0%a5%8b%e0%a4%82-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%86%e0%a4%af-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%ae%e0%a5%81%e0%a4%96/attachment/naxal11/"><img class="aligncenter size-full wp-image-10328" title="naxal11" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/naxal11.jpg" alt="" width="310" height="240" /></a></p>
<p style="text-align: justify;">झारखंड में नक्सल समस्या एक जटिल समस्या बनी हुई है। लंबे समय से इस जंजाल से निकलने का यहां के राजनेताओं के साथ -साथ नौकरशाहों ने भी प्रयास किया ,पर अबतक कोई खास सफलता इसमें उन्हें नहीं मिल पाई है। आईए एक नजर डालते हैं नक्सलियों के आय के मुख्य श्रोतों पर।</p>
<p style="text-align: justify;">नक्सलियों के दिन प्रतिदिन मजबूती से उभरने का सबसे बड़ा कारण है यहां के राजनेताओं के साथ -साथ नौकरशाहों के बीच कमजोर इच्छा शक्ति का होना। क्योंकि कोई चाहता है इसका सफाया तो कोई नक्सलियों के सफाये के नाम पर सिर्फ राजनीति करते हैं ना कि काम। किसी भी अपराधी गिरोह या और भी कोई दूसरा संगठन चलाने के लिए धन की काफी अहम भूमिका होती है। नक्सलियों को भी संगठन को मजबूती देने के लिए मोटे धन की आवश्यकता होती है। और ये धन झारखंड में चलने वाले सरकारी योजनाओं में काम करनेवाले ठेकेदारों और विभागों से मिलते हैं हालांकि इसका कोई रिकोर्ड नहीं है क्योंकि हर कोई चाहता है कि काम हो जाय और जान भी बच जाय। यानि की सुरक्षा के नाम पर हमारी पुलिस बौनी साबित हो रही है नक्सलियों के सामने तभी तो नक्सलियों के सामने ठेकेदार और विभागीय कर्मचारी घुटने टेकते हुए नजर आते हैं। और इसी का फायदा उठाते हैं नक्सली। झारखं डमें चलने वाले खानों से भी नक्सली लेवी वसूलते हैं इसके साथ -साथ विस्फोटक पदार्थ भी वहंीं से लेते हैं। जाहिर सी बात है कि जब सरकारी योजनाओं और खानों से नक्सलियों को सहज ही लेवी और धन उपलब्ध हो जाय तो वे मजबूती से उभरेंगे ही। हमारे ही हथियार और हमारे ही पैसे से हमारे ही लोगों को नक्सली मारते हैं और इस बात की तस्दीक करते हैं कि गरीबों और पीड़ितों के लिए नक्सलवाद का निर्माण किया गया। ये कैसा मरहम लगाने का तरीका है गरीबों पर ,जो आम इंसानों के खून से अपने हाथों को रंगता हो। और भ्रष्टाचार मिटाने के नाम पर गरीब लोगों के आंखों में धूल झोंकता हो। सवाल ये भी उठता है कि आखिर खानों से निकलने वाले विस्फोटक और पैसे का हिसाब कहां जाता है। क्योंकि जब इतने अधिक मात्रा में लेवी और सामानों की निकासी होती है तो इसका हिसाब किसी के पास क्यूं नहीं रहता है। मामला साफ है कि सबके सब इसमें आकंठ डूबे हुए हैं। ये अलग बात है कि नक्सलियों का डर ही इन्हें ऐसा करने पर मजबूर करता होगा पर सवाल ये भी उठता है कि आखिर हमारी पुलिसिया तंत्र क्या करती है जो अपने ही विभागों की रक्षा नहीं कर पाती है। एक कहावत है कि अगर सांप को मारना हो तो पहले उसके कमर पर वार करो उसके बाद कहीं दूसरे जगह। ठीक इसी तरह से नक्सलियों के उपर भी वार करना होगा तभी नक्सलियों के आतंक से मुक्ति मिल सकती है। क्योंकि जबतक वे पैसे से कमजोर नहीं होंगे तब तक ऐसे ही वे भी लड़ेंगे और हमारी पुलिस नक्सलियों से मुकाबला करती रहेगी।</p>
<p style="text-align: justify;">
]]></content:encoded>
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		<title>हहाती जनसँख्या पर चुप्पी ठीक नहीं</title>
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		<pubDate>Wed, 03 Nov 2010 05:36:45 +0000</pubDate>
		<dc:creator>आम आदमी</dc:creator>
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		<description><![CDATA[POPULATION SHOULD BE CONTROLLED ANYWAY पिछली जनगणना के बाद जनसंख्या संबंधी आधिकारिक आँकड़े जारी किये गये, राजनीतिक दलों ने अपने-अपने नजरिये से इसे देखा और अपने हिसाब से व्याख्या की। ज्ञातव्य है कि भारत का क्षेत्रफल पूरे विश्व का लगभग ]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><a rel="attachment wp-att-9959" href="http://www.janokti.com/discussion-suggestions-%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%9a%e0%a4%be%e0%a4%b0-%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%ae%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%b6/society-%e0%a4%b8%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%9c/%e0%a4%b9%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%a4%e0%a5%80-%e0%a4%9c%e0%a4%a8%e0%a4%b8%e0%a4%81%e0%a4%96%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a4%be-%e0%a4%aa%e0%a4%b0-%e0%a4%9a%e0%a5%81%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%aa%e0%a5%80/attachment/specialreports_2edb-pop-increase-pred-2002-to-2050/"><img class="alignright size-full wp-image-9959" title="specialreports_2edb.Pop Increase Pred 2002 to 2050" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/specialreports_2edb.Pop-Increase-Pred-2002-to-2050.gif" alt="" width="457" height="526" /></a></p>
<p style="text-align: justify;"><strong>POPULATION SHOULD BE CONTROLLED ANYWAY </strong></p>
<p style="text-align: justify;">पिछली जनगणना के बाद जनसंख्या संबंधी आधिकारिक आँकड़े जारी किये गये, राजनीतिक दलों ने अपने-अपने नजरिये से इसे देखा और अपने हिसाब से व्याख्या की। ज्ञातव्य है कि भारत का क्षेत्रफल पूरे विश्व का लगभग सवा दो प्रतिशत हिस्सा है और आबादी में बीस प्रतिशत, सम्पूर्ण विश्व की जनसंख्या 6.6 अरब है जिसमें से 1.16 अरब से ज्यादा हमारे देश में निवास करती है। एक नजर आँकड़ों पर डाले जाने पर मालूम चलता है कि 20वीं शताब्दी के शुरुआत में अविभाजित भारत की जनसंख्या लगभग 24 करोड़ थी जो विभाजन के उपरान्त सन 1951 में बढ़कर 36 करोड़ हो गयी और सन 2000 में 100 करोड़ को पार कर गयी।  सन 1901 में जहाँ एक वर्ग किमी में 77 लोग रहते थे वहीं सन 2000 में यह संख्या लगभग पाँच गुना अर्थात 324 व्यक्ति प्रति वर्ग किमी पर पहुँच गयी। एक अनुमान के अनुसार भारत की 40 प्रतिशत जनसंख्या गरीबी की रेखा के नीचे रह रहे हैं तथा अभी भी 35 प्रतिशत लोग निरक्षर हैं। शिशु मृत्युदर लगभग 70 प्रति हजार है, और औसत प्रति व्यक्ति सालाना आय 15000/- रुपये है और 2300 व्यक्तियों पर मात्र एक चिकित्सक ही उपलब्ध है।</p>
<p style="text-align: justify;">विगत सौ वर्षों में जनसंख्या मे चार गुना से अधिक वृद्धि हुई है जिसके विषय में कोई व्यक्ति गंभीरतापूर्वक विचार करना नहीं चाहता, प्रत्येक व्यक्ति अपनी जिम्मेदारी सरकार पर थोप देना चाहता है, यह बात सही है कि सरकार की भी इसमें एक महती भूमिका है और सरकार ने इस वृद्धि को रोकने हेतु कई योजनायें भी चलाई हैं, किन्तु अधिकतर योजनायें स्वैच्छिक प्रवृत्ति की होने के कारण ये योजनाएँ अपेक्षित सफलता प्राप्त नहीं कर पा सकीं। जनसंख्या की इस असाधारण वृद्धि का कुपरिणाम यह हो रहा है कि लोग बढ़ते जा रहे हैं, कृषि योग्य भूमि <a rel="attachment wp-att-9958" href="http://www.janokti.com/discussion-suggestions-%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%9a%e0%a4%be%e0%a4%b0-%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%ae%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%b6/society-%e0%a4%b8%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%9c/%e0%a4%b9%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%a4%e0%a5%80-%e0%a4%9c%e0%a4%a8%e0%a4%b8%e0%a4%81%e0%a4%96%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a4%be-%e0%a4%aa%e0%a4%b0-%e0%a4%9a%e0%a5%81%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%aa%e0%a5%80/attachment/india-rising-population/"><img class="alignleft size-full wp-image-9958" title="India-rising-population" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/India-rising-population.jpg" alt="" width="201" height="250" /></a>कम होती जा रही है, जंगल कम होते जा रहे हैं, जहाँ कभी जंगल हुआ करते थे, जहाँ खेती होती थी, वहाँ सीमेन्ट और लोहे के जंगल खड़े हो रहे हैं। प्राकृतिक संसाधनों का अंधाधुंध दोहन किया जा रहा है। जोतें कम होती जा रही हैं, गरीब और गरीब होता जा रहा है।</p>
<p style="text-align: justify;">जल-स्तर तेजी से नीचे गिरता जा रहा है, प्रदूषण की समस्या विकराल होती जा रही है। करोड़ों लोगों को पीने के शुद्ध पानी और सैनिटेशन जैसी मूलभूत सुविधाएँ तक उपलब्ध नहीं हैं। यह बढ़ती हुई जनसंख्या का ही दुष्परिणाम है कि लोग रेलवे लाइनों, सड़कों के किनारे झुग्गियों में रहने को मजबूर हैं। बेरोजगारी इसी वृद्धि का एक और सर्वाधिक कुख्यात परिणाम है, क्या कोई भी सरकार इतनी बड़ी संख्या में सभी बेरोजगारों को रोजगार उपलब्ध करा सकती है? कदापि नहीं। साथ ही अबाध रूप से बढ़ती जनसंख्या मँहगाई, भ्रष्टाचार, अनैतिकता, अपराध और अपराधियों को भी जन्म देती है। एक अरब से ज्यादा जनसंख्या को मूलभूत सुविधाएँ उपलब्ध कराना, रोजगार प्रदान करना, उन्हें सुरक्षा मुहैया कराना कोई हँसी-खेल नहीं है। बढ़ती हुई जनसंख्या का भयावह रूप कहीं भी देखा जा सकता है, किसी भी एक्सप्रेस ट्रेन में हजारों ऐसे यात्रियों को, जो टिकट लेकर एक सीट पाने के अधिकारी होते हैं, भेड़-बकरियों की तरह यात्रा करते हुए देखा जा सकता है।</p>
<p style="text-align: justify;">लोकल ट्रेनों में, रिजर्वेशन काउन्टरों पर, रोजगार के लिये भर्ती दफ्तरों पर लगी हुई कतारें, महानगरों में पीने के पानी के लिये लगी हुई लाइनें, राशन की दुकानों पर लगी हुई कतारें, बेरोजगारों की संख्या में भयावह वृद्धि, अमीर और गरीब के बीच बढ़ता हुआ अंतर, मामूली रकम के लिये होने वाली हत्यायें, भ्रूण हत्या, भ्रष्टाचार की घटनाओं में इजाफा, बेरोजगारों का शोषण, अनैतिक व्यापार को बढ़ावा, मँहगाई में असामान्य वृद्धि, पर्यावरण में प्रदूषण, भूख से लोगों का मरना, करोड़ों लोगों का बेघर होना इत्यादि इसी अविश्वसनीय जनसंख्या वृद्धि का ही दुष्परिणाम है।चूँकि हमारे यहाँ की अधिकतर जनता हर काम के लिये स्वत: आगे न बढ़कर हर काम के लिये सरकार का मुँह ताकती है और उसके पास किसी भी नीति को बनाने का न तो कोई हक है और न लागू कराने के लिये कोई हथियार, अत: सरकार को अब जनसंख्या वृद्धि पर नियंत्रण के लिये कुछ कठोर कदम उठाने होंगे।</p>
<p style="text-align: justify;"><span style="font-size: 13.3333px;">जनसंख्या नियंत्रण के परिणाम भी तुरन्त प्रकट नहीं होंगे, यदि वर्तमान समय में जनसंख्या नियंत्रण हेतु प्रभावी कदम उठाये जाते हैं व जनसंख्या वृद्धि को नकारात्मक दिशा में लाने के प्रयास किये जाते हैं तो उनका सुफल 20-25 साल बाद ही दिखाई देगा। रही बात स्वैच्छिक रूप से जनसंख्या को नियन्त्रित करने की तो स्वैच्छिक रूप से यहाँ वी0डी0आई0एस0 जैसी योजनाएँ ही सफल हो सकती हैं, न कि जनसंख्या नियन्त्रण की। रामचरित मानस में एक <a rel="attachment wp-att-9960" href="http://www.janokti.com/discussion-suggestions-%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%9a%e0%a4%be%e0%a4%b0-%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%ae%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%b6/society-%e0%a4%b8%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%9c/%e0%a4%b9%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%a4%e0%a5%80-%e0%a4%9c%e0%a4%a8%e0%a4%b8%e0%a4%81%e0%a4%96%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a4%be-%e0%a4%aa%e0%a4%b0-%e0%a4%9a%e0%a5%81%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%aa%e0%a5%80/attachment/ind2543b-jpg/"><img class="alignright size-full wp-image-9960" title="IND2543B.JPG" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/population.jpg" alt="" width="450" height="314" /></a>जगह कहा भी गया है कि &#8220;भय बिन होय न प्रीत&#8217;, और यह उक्ति आज भी प्रासंगिक है। कोई भी नियम, कानून, प्रथा, परम्परा तब तक अपने उद्देश्यों में सफल नहीं हो सकती जब तक कि उसमें दण्डात्मक प्रावधान न हो, यदि ऐसा होता तो शायद &#8216;राज्य&#8217; नामक संस्था की स्थापना ही नहीं होती। जनसंख्या नियन्त्रण के लिए एक प्रभावी कानून बनाना अत्यन्त आवश्यक है, जिसमें लोगों को स्वैच्छिक रूप से अपने परिवार को सीमित रखने के लिए प्रोत्साहित किया जाये, परिवार के आकार का निर्धारण किया जाये, इस निर्धारित सीमा से अधिक बड़ा परिवार होने पर उस परिवार पर कुछ कर लगाने का, कुछ शास्ति लगाने का और कुछ दंडात्मक प्रावधानों को लागू करने का विकल्प कानून में रखना चाहिए।</span></p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;"><span style="font-size: 13.3333px;">सीमित परिवार रखने वालों को बस-रेल किराये में छूट, बैंकों में जमा धनराशि पर अतिरिक्त ब्याज, कर्ज लेने पर वरीयता व वापसी में ब्याज में रियायत, व्यापार-उद्योगों के लाइसेंसों में प्राथमिकता, उच्च शिक्षा में छात्र-वृत्ति इत्यादि जैसे कदम उठाए जा सकते हैं, जबकि इसके विपरीत परिवार के बड़ा होने पर सरकार द्वारा दी जाने वाली सुविधाओं में कटौती की जा सकती है, कुछ कर लगाये जा सकते हैं तथा इसी प्रकार के कुछ अन्य कदम उठाए जा सकते हैं। प्रथम दृष्टया ये कदम कुछ कठोर व अलोकप्रिय लग सकते हैं, लेकिन भारत के समग्र हित को ध्यान में रखते हुये ऐसे कदम उठाना नितान्त अपरिहार्य हो गया है।</span></p>
<p style="text-align: justify;"><span style="font-size: 13.3333px;">सरकार को यह भी चाहिए कि परिवार नियोजन के विरुद्ध कतिपय वर्गों में फैली हुई भ्रान्तियों, पूर्वाग्रहों को दूर करे। एक छोटी सी बात जो लोगों को समझ में नहीं आती कि किसी विशेष जाति या धर्म में पैदा होना किसी भी व्यक्ति के बस की बात नहीं है, जाति या धर्म का निर्धारण पैदा होने वाला शिशु नहीं करता, बल्कि उस की जाति या धर्म का निर्धारण इस से होता है कि उसके माता-पिता किस जाति या किस धर्म के हैं या मानने वाले हैं। अत: किसी धर्म विशेष से संबंधित होने के कारण परिवार का विरोध करना तर्क-संगत नहीं है, हालाँकि इन समुदायों के अत्यल्प लोगों ने परिवार नियोजन को इस विरोध के बावजूद भी अपनाया है।</span></p>
<p style="text-align: justify;">अत: भारत की बेरोजगारी, गरीबी, भ्रष्टाचार जैसी विकराल समस्याओं के प्रभावी निराकरण हेतु यह आवश्यक हो जाता है कि जनसंख्या की बेतहाशा वृद्धि को काबू किया जाये, और इस के लिये ऐसा कानून बनाया जाये जिसमें जातीय या धार्मिक आधार पर किसी भेदभाव की संभावना न हो। इसके साथ ही स्वयंसेवी गैर-सरकारी संस्थानों की मदद से &#8220;पल्स पोलियो अभियान&#8217; की तरह एक जन चेतना अभियान चलाया जाये जिससे कि सामान्य जनता इस जनसंख्या वृद्धि के दुष्परिणामों को समझ सके व जागरुक होकर स्वयं को और भारत को समृद्ध बना सके।</p>
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		<title>कांग्रेस ,नक्सलवाद और गरीबी</title>
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		<pubDate>Tue, 02 Nov 2010 15:54:41 +0000</pubDate>
		<dc:creator>जनोक्ति डेस्क</dc:creator>
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		<description><![CDATA[मुरारी सिंह कंडारी 1947 से 1975 तक बिहार में कांग्रेस की सत्ता रही, इसी बीच दलितों को सरकारी जमीन के पट्रेट तो दिए गए पर उस जमीन पर कोई दलित कब्जा नहीं कर सका इस की वजह यह रही कि ]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: right;"><strong><span style="color: #333300;">मुरारी सिंह कंडारी</span></strong></p>
<p style="text-align: justify;"><a rel="attachment wp-att-9941" href="http://www.janokti.com/sansad-political-news-%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%82%e0%a4%b8%e0%a4%a6-%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%97/national-news-%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%b7%e0%a5%8d%e0%a4%9f%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a5%80%e0%a4%af/%e0%a4%95%e0%a4%be%e0%a4%82%e0%a4%97%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a5%87%e0%a4%b8-%e0%a4%a8%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b8%e0%a4%b2%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%a6-%e0%a4%94%e0%a4%b0-%e0%a4%97%e0%a4%b0%e0%a5%80/attachment/sonia_rahul_313894121-1/"><img class="alignright size-full wp-image-9941" title="sonia_rahul_313894121 (1)" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/sonia_rahul_313894121-1.jpg" alt="" width="332" height="239" /></a>1947 से 1975 तक बिहार में कांग्रेस की सत्ता रही, इसी बीच दलितों को सरकारी जमीन के पट्रेट तो दिए गए पर उस जमीन पर कोई दलित कब्जा नहीं कर सका इस की वजह यह रही कि मुख्यमंत्री व मंत्रिमंडल के दूसरे सदस्य उंची जाति के रहे। कुलमिलाकर कर्पूरी ठाकुर सरकार व उनका प्रशासन दलित विरोधी रहा।</p>
<p style="text-align: justify;">अगर बिहार में गरीब व दलितों के साथ इनसानी बरताव किया जाता तो नक्सलवाद बिहार में नहीं पनपता ना ही बेवजह पुलिस वाले और सवर्ण मारे जाते। बिहार, छत्तीसगढ़, आंध्रप्रदेश, ओड़िसा, कर्नाटक, महाराष्ट्र, पं बंगाल, उत्तर प्रदेश में भी इस आंदोलन की आग न लगती। इन राज्यों में भी नक्सलियों का जोर उन इलाकों में ज्यादा रहा जहां आदिवासी व दलित बहुल है, जो बहुत ज्यादा गरीब हैं और सरकारों के द्वारा सताए गए है।</p>
<p style="text-align: justify;">भारत की आजादी के 20 वर्ष बाद मई 1967 में पं बंगाल के गांव नक्सबाड़ी में गरीब आदिवासी, दलित व मजदूरों ने कम्युनिस्ट नेता स्व चारू मजूमदार व कानू सान्याल की अगुवाई में बड़े भूस्वामियों व सरकार के खिलाफ आंदोलन का बिगुल बजा दिया। इस समय आंदोलन की मुख्य वजह एक आदिवासी ने अपनी जमीन पर बोआई करने के लिए अदालत से आदेश ले लिया था। लेकिन बाहुबली भू-स्वामियों ने उसे अपनी जमीन पर बुआई नहीं करनी दी। शुरूआत में इस आंदोलन का मकसद गरीब लोगों को अपना हक दिलवाना था। नक्सलबाड़ी के बाद यह आंदोलन पं बंगाल के दूसरे गांवों व क्षेत्रों में भी पहुंच गया। गरीब आदिवासी दलित इस आंदोलन से बड़ी मात्रा में जुडते चले गए। पं बंगाल के दार्जलिंग जिले में बिहारी मजदूरों की संख्या बहुत ज्यादा थी। बिहार के दलित भी उंची जाति के सताए हुए थे।</p>
<p style="text-align: justify;">धीेरे-धीरे बिहार में भी इस आंदोलन में अपनी जड़े जमा ली बिहार का उत्तरी क्षेत्र आदिवासी क्षेत्र है। जल-जंगल और जमीन ही इनके पेट भरने के मुख्य साधन है। यहां कोयला, लोहा, अभ्रक के बड़े-बड़े भंडार है इसलिए यहां की जमीनों को नेताओं और बाहुबली उंची जाति के लोगों ने हड़प् ली और मालामाल हो गए आदिवासी गरीब से नंग हो गया।</p>
<p style="text-align: justify;">1973 के आसपास राजेन्द्र यादव व कल्याण मुखर्जी ने बिहार में नक्सलवादी आंदोलन के नाम से एक सर्वे किया जिस में गरीबों दलितों की दुर्दशा की हकीकत सामने आई। दबंग जाति के उत्पीड़न से पिछड़े वर्ग के लोग भी सताए जा रहे थे अगर इनके बच्चे उंची जाति के बच्चों के साथ पढ़ते तो उंची जाति के लड़के उनका उत्पीड़न करते और नंगा करके घुमाते थे गांव में, इसलिए पिछड़े वग्र के लोगों ने ‘‘त्रिवेणी संघ’’ बना लिया था इस संघ में दलितों के प्रति हमदर्दी दिखाई। नक्सलियों का बल पा कर दलित काम की मजदूरी मांगने लगे और जुल्मों के खिलाफ आवाज उठाने लगे।</p>
<p style="text-align: justify;">गरीबों द्वारा मजदूरी मांगने और आवाज उठाने पर उंची जाति के लोगों ने इन्हें वर्ग शत्रु यानि नक्सलवादी कहने लगे पुलिस व प्रशासन हमेशा उंची जाति वालों की मददगार रहे किसी गांव में कोई घटना होने पर पुलिस गरीबों को नक्सली कह कर गोलि मार देते है। और इन्हें मुठभेड़ का नाम देकर पल्ला छुड़ा देते हैं। गरीबों को सबक सिखाने के लिए राजपूतों ने ‘‘रणवीर सेना’’ और ब्रह्मणों ने ऋषि सेना बना ली, इन सेनाओं के नौजवानों को हथियारों से लैस करने केलए प्रशासन ने खुलकर हथियारों के लाईंसेंस दिए और प्रशिक्षण के लिए शहरों व गांवों में प्रशिक्षण केंद्र खोले गए।</p>
<p style="text-align: justify;">1976 में बिहार के मुख्यमंत्री जगन्नाथ मिश्र ने भोजपूर के फायरिंग संेटर का उदघाटन किया था इन्होंने बड़ी संख्या में निर्दोष दलितों का कत्ल किया। कांग्रेस सरकार ने इस का पुरा समर्थन किया था दलितों की झोपड़ियां जलाई गई दलित लड़कियों व महिलाओं का सामुहिक बलात्कार किया  और नौजवान दलित लड़कों को झुठे मुकदमों में जेल भिजवा दिया गया।</p>
<p style="text-align: justify;"><a rel="attachment wp-att-9942" href="http://www.janokti.com/sansad-political-news-%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%82%e0%a4%b8%e0%a4%a6-%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%97/national-news-%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%b7%e0%a5%8d%e0%a4%9f%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a5%80%e0%a4%af/%e0%a4%95%e0%a4%be%e0%a4%82%e0%a4%97%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a5%87%e0%a4%b8-%e0%a4%a8%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b8%e0%a4%b2%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%a6-%e0%a4%94%e0%a4%b0-%e0%a4%97%e0%a4%b0%e0%a5%80/attachment/naxalite_0609-1/"><img class="alignleft size-medium wp-image-9942" title="naxalite_0609 (1)" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/naxalite_0609-1-300x205.jpg" alt="" width="300" height="205" /></a>बिहार के लोगों को आज भी याद होगा कि 90 के दशक में इन सेनाओं ने ‘‘लक्ष्मण गुहा गांव के 139 दलितों को एक ही रात में मौत के घाट उतार दिया था। राजनीतिक दलों ने इस घटना का भरसक विरोध किया था। आरा जिले के सौनाटोला’’ गांव में दलितों मजदूरी द्वारा मजदूरी बढ़ाने के लिए आंदोलन किया स्वर्ण जाति के लोगों ने इसे नक्सली आंदोलन बता कर कई दलितों को जेल भिजवादीया। तत्कालिन डीएम कृष्णा सिंह ने गांव के राजदूतों को कहां ‘‘आप लोगों के लिए गर्व की बात है कि राजपूत हो कर भी आप मुट्ठीभर दलितों को शांत नहीं कर सकते।</p>
<p style="text-align: justify;">बिहार से यह आंदोलन छत्तीसगढ़ के बस्तर में पहुंचा बस्तर के आदिवासी बहुल गरीब होने के कारण कारोबारियों के शोषण के भी शिकार है आजादी से पहले तेंदुपत्ता, लाख, शोप, चिरोजी, महुआ आदि वस्तु पर आदिवासियों का हक था लेकिन अब जंगल की उपज पर दलालों व पूंजीपतियों का कब्जा है इन्हें मजदूरी नाम मात्र की दि जाती है। आदिवासियों की जिंदगी जंगल और उस से मिलने वाली संपदा पर ही निर्भर है। सब कुछ छिन जाने के बाद आदिवासी हिंसक हो गए और नक्सलवाद का रास्ता अपनाया।</p>
<p style="text-align: justify;">जो हाल बिहार, झारखण्ड, छत्तीसगढ़ का है वही हाल आंध्र प्रदेश, ओडिसा कर्नाटक, महाराष्ट्र, पं बंगाल और यूपी का है पूरी आदिवासी इलाकों को सरकार व पंूजीपति लोग लुट रहे है आदिवासियों की तरक्की के नाम पर राज्य व केन्द्र सरकारें हर साल अरबो-खरबों का घोटाला कर रही है। देश की सभी पार्टियां दलितों की उन्नती की बात तो करती है पर काम नहीं करती। सरकार भी हिंसा के बदले हिंसा का सहारा ले रही है न राज्य सरकारों व केन्द्र की सरकारों ने नक्सलवाद की जड़ तक जाने की रती भर कोशिश नहीं की वे केवल पाच सितारा होटलों से घोषणाए करती है और कुछ नहीं केन्द्र सरकार यानी मनमोहन सरकार डेड लाख अर्धसैनिक बलों को तैनात कर के सोचती है कि हम इस पर पार पा लेंगे? जितना पैसा इल बलों की तैनाती पर खर्च किया जा रहा है उतना पैसा इन आदिवासीयों के विकाश के लिए लगाया जाता तो समस्या का हल निकल जाता माओवादी व नक्सलवादी न तो विदेशी है न बंगलादेशी जो पांच करोड़ हमारे देश में भरे हुए है और न ही आतंकवादी वे इसी देश के वासी है जो केवल और केवल अपने हक के लिए लड़ रहे है। इनको मारने का मतलब है अपने ही लोगों को मारना जिसे उचित नहीं कहा जा सकता भले ही इन का रास्ता गलत हो। दरअसल दलित आदिवासियों के दिलों में जलालत, जल्म, सामाजिक व मानसिक असमानता की आग धधक रही है यह ज्वालामुखी बन कर नक्सलवाद के रूप में फुट रहा हैं</p>
<p style="text-align: justify;">आदिवासी दलितों को समान अधिकार दिया जाए, बेरोजगार युवकों को रोजगार दिया जाए। शिक्षा, स्वास्थ्य व बुनियादी जरूरते पूरी हो तो उनके दिलों में फुट रहे ज्वालामुखी शांत हो जाएगी और वे नक्सलवाद का रास्ता छोड़ देंगे।</p>
<p style="text-align: justify;">
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		<title>मार्क्सवादियों का दोहरा शीर्षासन</title>
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		<pubDate>Fri, 01 Oct 2010 15:32:17 +0000</pubDate>
		<dc:creator>डॉ. वेदप्रताप वैदिक</dc:creator>
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		<description><![CDATA[यदि कार्ल मार्क्स अपनी कब्र से उठकर कभी भारत आ पहुंचें तो वे हक्के-बक्के रह जाएंगे&#124; वे अपने भारतीय चेलों को चीनी चेलों से भी आगे-आगे दौड़ता हुआ पाएंगें&#124; बंगाल के हमारे कामरेडों ने पहले देसी और विदेशी पूंजीपतियों के ]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><span style="font-size: 13.3333px;"><a rel="attachment wp-att-8135" href="http://www.janokti.com/sansad-political-news-%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%82%e0%a4%b8%e0%a4%a6-%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%97/%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b8%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%a6%e0%a4%bf%e0%a4%af%e0%a5%8b%e0%a4%82-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%a6%e0%a5%8b%e0%a4%b9%e0%a4%b0%e0%a4%be/attachment/karl-marx/"><img class="alignright size-medium wp-image-8135" title="karl-marx" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/karl-marx-300x189.jpg" alt="" width="300" height="189" /></a>यदि<strong> <a href="http://www.janokti.com/tag/%e0%a4%86%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%a5%e0%a4%bf%e0%a4%95-%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%95%e0%a4%be%e0%a4%b8/">कार्ल मार्क्स</a> </strong>अपनी कब्र से उठकर कभी भारत आ पहुंचें तो वे हक्के-बक्के रह जाएंगे| वे अपने भारतीय चेलों को चीनी चेलों से भी आगे-आगे दौड़ता हुआ पाएंगें| बंगाल के हमारे कामरेडों ने पहले <strong>देसी और विदेशी पूंजीपतियों</strong> के आगे घुटने टेके, <strong><a href="http://www.janokti.com/tag/%e0%a4%86%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%a5%e0%a4%bf%e0%a4%95-%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%95%e0%a4%be%e0%a4%b8/">नंदीग्राम और सिंगुर</a> </strong>किया और अब वे वोट के खातिर उस मज़हब की शरण में जा रहे हैं, जिसे महात्मा मार्क्स &#8216;जनता की अफीम&#8217; कहते थे| <strong>प. बंगाल की सरकार</strong> ने अब <strong>पिछड़ों का आरक्षण</strong> सात प्रतिशत से बढ़ाकर 17 प्रतिशत कर दिया है ताकि <strong>बंगाली मुसलमानों</strong> के वोट खींचे जा सकें| यह मार्क्सवादियों का दोहरा शीर्षासन है|</span></p>
<p style="text-align: justify;"><span style="font-size: 13.3333px;">दोहरा इसलिए कि &#8216;वर्ग&#8217; की छाती पर पहले उन्होंने मज़हब को बिठाया और फिर मज़हब के सिर पर जात बिठा दी| वह वर्ग-संघर्ष दरकिनार हो गया, जो <strong><a href="http://www.janokti.com/tag/%e0%a4%a8%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b8%e0%a4%b2%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%a6%e0%a5%80-%e0%a4%86%e0%a4%82%e0%a4%a6%e0%a5%8b%e0%a4%b2%e0%a4%a8/">मार्क्सवाद </a></strong>की प्राणवायु है| कैसी विडंबना है कि भारत के <strong>कांग्रेसियों, भाजपाईयों और जातिवादी नेताओं </strong>की तरह हमारे <a href="http://www.janokti.com/tag/marks/">मार्क्सवादी</a> भी जात और मज़हब के नाम पर रेवाडि़यां बांटने में जुट गए हैं| आए थे, वे <strong>वर्गविहीन समाज </strong>की स्थापना करने और अब वे पाए जा रहे हैं, भारत में जातिवादी और मजहबवादी समाज को मजबूत बनाते हुए | सर्वहारा को संघर्ष की कला सिखाने के बदले <strong><a href="http://www.janokti.com/tag/%e0%a4%b2%e0%a4%be%e0%a4%b2-%e0%a4%9d%e0%a4%82%e0%a4%a1%e0%a4%be/">मार्क्सवादी उन्हें &#8216;अफीम&#8217; की गोलियां </a></strong>बाट रहे हैं| मान लिया कि सारे सर्वहारा एक-जैसे हैं| क्या <strong>हिंदू और क्या मुसलमान </strong>? यहां तक तो ठीक है लेकिन असली सवाल यह है कि जब सेंत-मेत में नौकरियां मिलेंगी तो क्या उनके दिलों में वर्ग-संघर्ष का जज़्बा मजबूत होगा ? दूसरों की दया पर जीनेवाले लोग क्या कभी न्याय के लिए लड़ सकते हैं ? नौकरियों में आरक्षण विपन्नों को संपन्नों का मौन अनुगत बनाने का षडयंत्र् है| इस वर्ग-चेतना के विनाश में अपने मार्क्सवादियों का भागीदार होना सचमुच आश्चर्यजनक है| नौकरियों में आरक्षण को प्रोत्साहित करना हमारे देश के सर्वहारा को अनंतकाल के लिए अपंग बना देना है|</span></p>
<p style="text-align: justify;"><span style="font-size: 13.3333px;">बंगाल की <strong>मार्क्सवादी सरकार</strong> इस आत्मघाती काम में  पीछे क्यों रहे ? यदि<strong> केरल, तमिलनाडु, </strong>कर्नाटक और आंध्र की सरकारें<strong> मुस्लिम वोटों </strong>पर हाथ साफ कर रही हैं तो बंगाल की सरकार के सिर पर तो चुनाव आए खड़े हैं| लगभग दो करोड़ बंगाली मुस्लिमों में से लगभग 83 प्रतिशत पिछड़े हैं| इन्हें मुसलमान होने के नाते आरक्षण नहीं दिया जा सकता| वह संविधान-विरोधी है| इसीलिए अनेक राज्यों ने मंडल आयोग के तहत जात का दरवाज़ा खोल दिया है| बंगाल अन्य राज्यों को पीछे छोड़ना चाहता है| वहां तो &#8216;क्रांति के अगि्रम दस्ते&#8217; का राज है न ! बुद्घदेव भट्रटाचार्य सरकार ने अभी-अभी 21000 नई नौकरियों की घोषणा की है| साथ में 17 प्रतिशत आरक्षण की गाजर भी लटका दी है| भला, वह ममता से मात कैसे खा सकती है ? ममता बनर्जी ने दो-टूक घोषणा की थी कि अगर वे मुख्यमंत्र्ी बनीं तो वे मुसलमानों को आरक्षण देंगी| भट्टाचार्य सरकार ने नहले पर दहला मार दिया| मुसलमानों को भी यह आरक्षण स्वीकार करने में ज़रा भी संकोच नहीं | इस्लाम में जात का क्या काम है ? जो जात को मानता है, वह मुसलमान कैसे हो सकता है ? यह जानते हुए भी कोई मुल्ला जातीय आरक्षण के खिलाफ फतवा जारी नहीं करता| लालच बड़ा कि ईमान ? अगर मार्क्सवादी ही अपने सिद्घांतों को कच्चा चबा रहे हैं तो क्या सिर्फ मुसलमानों ने ही इस्लाम के मुताबिक आचरण करने का ठेका ले रखा है ? आरक्षण का दांव मारकर यदि मार्क्सवादी अपने वोट पटाना चाहते हैं तो मुसलमान माले-मुफ्त से मना क्यों करें ? मुफ्त हाथ आए तो बुरा क्या है ?</span></p>
<p style="text-align: justify;"><span style="font-size: 13.3333px;">इस दांव-पेंच के मूल में क्या है ? क्या मुसलमानों का भला है ? यदि यही होता तो अपने सुदीर्घ शासन-काल में मार्क्सवादी सरकार बंगाल के मुसलमानों को उस मुकाम पर पहुंचा सकती थी, जिस पर भारत ही नहीं, सारे दक्षिण एशिया के मुसलमानों को गर्व होता| उसने कुछ जिलों में उर्दू को राजभाषा का दर्जा दे दिया| क्या खूब ? बंगाली मुसलमान को उर्दू से क्या लेना-देना ? उसने अपनी बांग्ला भाषा के खातिर पाकिस्तान तोड़ दिया| मुसलमानों की हालत बंगाल में जितनी खराब है, शायद किसी भी प्रांत में नहीं है| मुसलमान लोग जिन धंधों में हैं, क्या उनकी इज्जत और लज्जत बढ़ाने में मार्क्सवादी सरकार ने कोई छोटी-सी पहल भी की ? अब वह क्या करना चाहती है ? उनके कांम-धंधे छुड़वाकर उनके गले में सरकारी नौकरियां लटकाना चाहती है ? अगर नौकरियां भी थमानी थीं तो उन्हें पढ़ाने-लिखाने का कुछ इंतजाम किया होता| नौकरियों का लालच देकर मार्क्सवादी नेता अपनी हथेली में वोट की सरसों उगाना चाहते हैं| लोकसभा चुनावों में हुई उनकी दुर्गति से वे घबराए हुए हैं| लोकतंत्र् के झमेले में फंसे मार्क्सवादी अपने सिद्घांतों की बलि चढ़ाने में जरा भी संकोच नहीं कर रहे हैं| यदि ममता हिंसक माओवादियों और सत्ताप्रेमी कांग्रेसियों से हाथ मिला सकती है तो मार्क्सवादी मुल्ला और मार्क्स का &#8216;कॉकटेल&#8217; क्यों नहीं बना सकते ?</span></p>
<p style="text-align: justify;"><span style="font-size: 13.3333px;">यह तो वे पहले भी कर चुके हैं| कट्रटरपंथी मुल्लाओं की नाराज़गी से बचने के लिए हमारे बहादुर मार्क्सवादियों ने तसलीमा नसरीन के साथ कैसा बर्ताव किया था ? तसलीमा को सुरक्षा देने के बजाय बंगाल सरकार ने उसे भागने के लिए मजबूर कर दिया था| क्या मार्क्सवादी बंगाल के लिए यह गर्व की बात थी कि एक लोकपि्रय बांग्ला लेखिका अपनी जान बचाने के लिए दिल्ली के आस-पास छुपी रही ? इस घुटना-टेक नीति ने भी मार्क्सवादियों को मुसलमान वोट नहीं दिलवाए| अब आरक्षण की रेवड़ी उन्हें कुछ वोट शायद दिलवा देगी लेकिन उनके दम पर वे सरकार बना पाएंगे, यह संदेहास्पद है| बंगाल की हार हमारे मार्क्सवादियों के लिए प्रतिक्रांति-जैसा झटका सिद्घ होगी| मोह-भंग की उस वेला में मार्क्सवादी पार्टी जात और मजहब से ऊपर उठकर यदि सचमुच सर्वहारा का नेतृत्व करने के लिए कमर कस लेगी तो वह बंगाल से भी बड़ा मैदान मार सकती है| हमारे देश के गए-बीते जातिवादी और मजहबवादी दलों का वह सच्चा लोकतांत्र्िक विकल्प बन सकती है| उसके पास जितने विचारशील और स्वच्छ नेता हैं, उतने देश में किसी अन्य दल के पास नहीं हैं लेकिन वोटों की चकाचौंध ने उनकी भी मति हर ली है|</span></p>
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		<title>बिहार चुनाव में नक्सली भी आजमाएंगे अपनी किस्मत</title>
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		<pubDate>Sun, 26 Sep 2010 12:34:28 +0000</pubDate>
		<dc:creator>जनोक्ति डेस्क</dc:creator>
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		<description><![CDATA[बिहार विधानसभा चुनाव को शांति से संपन्न कराने के लिए एक ओर चुनाव आयोग और राज्य सरकार अपनी तैयारियों में जुटा है वहीं दूसरी ओर राज्य विरोधी नक्सली भी चुनाव में जोर-आजमाइश के लिए खुद को तैयार कर रहे हैं ]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><span style="font-size: 13.3333px;"><strong><a rel="attachment wp-att-7737" href="http://www.janokti.com/bihar-election-up-election/naxalite-bihar-assambley-electin-%e0%a4%ac%e0%a4%bf%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%b0-%e0%a4%9a%e0%a5%81%e0%a4%a8%e0%a4%be%e0%a4%b5-%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%82-%e0%a4%a8%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b8%e0%a4%b2/attachment/naxalite-leaders/"><img class="alignright size-full wp-image-7737" title="naxalite leaders" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/naxalite-leaders.jpg" alt="" width="351" height="261" /></a><a href="http://www.janokti.com/category/bihar-election-up-election/">बिहार विधानसभा चुनाव</a></strong> को शांति से संपन्न कराने के लिए एक ओर <strong>चुनाव आयोग और राज्य सरकार </strong>अपनी तैयारियों में जुटा है वहीं दूसरी ओर राज्य विरोधी <strong><a href="http://www.janokti.com/hindi-news-media-%E0%A4%9A%E0%A5%8C%E0%A4%A5%E0%A4%BE-%E0%A4%96%E0%A4%82%E0%A4%AD%E0%A4%BE-cinema-media-blog-fourth-pilar/7370/">नक्सली </a></strong>भी चुनाव में जोर-आजमाइश के लिए खुद को तैयार कर रहे हैं | संगठनात्मक रूप से तो कोई <a href="http://www.janokti.com/hindi-news-media-%E0%A4%9A%E0%A5%8C%E0%A4%A5%E0%A4%BE-%E0%A4%96%E0%A4%82%E0%A4%AD%E0%A4%BE-cinema-media-blog-fourth-pilar/7370/">नक्सली</a> संगठन इस चुनाव रूपी लोकतान्त्रिक प्रक्रिया से दूरी बनाये हुए हैं | <strong>प्रतिबंधित नक्सली  संगठन भाकपा (माओवादी)</strong> ने तो अपने पुराने  ढर्रे को कायम रखते हुए <strong>चुनाव बहिष्कार</strong> करने की घोषणा कर दी है | लेकिन कई नक्सली नेता इस बहती गंगा में नहाने की तैयारी कर रहे हैं | लगता है अब नक्सली भी <strong>बिहार के बाहुबलियों</strong> के नक्से-कदम पर चलकर मुख्यधारा से जुड़ना चाहते हैं |</span></p>
<p style="text-align: justify;"><span style="font-size: 13.3333px;">मीडिया में आई ख़बरों के मुताबिक कई नामी-गिरामी और इनामी नक्सली चुनावी समर में उतरने की तैयारी कर चुके हैं | गौरतलब है कि इससे पूर्व कई नक्सली नेता चुनाव में अपनी किस्मत आजमा  चुके हैं। <strong><a href="http://www.janokti.com/sansad-political-news-%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%82%e0%a4%b8%e0%a4%a6-%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%97/%e0%a4%8f%e0%a4%95-%e0%a4%a6%e0%a5%87%e0%a4%b6-%e0%a4%a6%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a5%8b%e0%a4%b9%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%aa%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0-%e0%a4%9d%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a4%96/">झारखण्ड </a></strong>की पलामू लोकसभा सीट  से नक्सली नेता कामेश्वर बैठा न चुनाव जीत कर संसद पहुँच चुका है | हालाँकि सांसद बनने के बाद भी कामेश्वर को <strong>लोकसभा </strong>में बैठने का सौभाग्य नहीं मिल सका है क्योंकि वो अभी तक जेल में बंद है | झारखण्ड की तरह बिहार में भी लोकतान्त्रिक सरकारों की खिलाफत करने वाले नक्सलियों ने लोकतंत्र की मुख्यधारा से जुड़ने का काम किया है। कुख्यात नक्सली रामाधार सिंह ने विधानसभा चुनाव 1990 में गुरूआ विधानसभा क्षेत्र से चुनाव लड़ कर जीत हासिल की थी।</span></p>
<p style="text-align: justify;"><span style="font-size: 13.3333px;">नक्सलियों के इस कदम को दो तरह से देखा जाना चाहिए | एक तो कि यदि वो इमानदार <strong><a href="http://www.janokti.com/sansad-political-news-%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%82%E0%A4%B8%E0%A4%A6-%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%97/%E0%A4%AA%E0%A4%82%E0%A4%9A%E0%A4%BE%E0%A4%AF%E0%A4%A4%E0%A5%80-%E0%A4%9A%E0%A5%81%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%B5-%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%B6%E0%A5%80/">जनप्रतिनिधि</a></strong> निकला तो यह लोकतंत्र के भविष्य में अच्छा होगा और इससे नक्सलियों के एक बड़े वर्ग को मुख्यधारा में आने की प्रेरणा मिलेगी | दूसरा , यदि वो भी वर्तमान नेताओं के सुझाए रस्ते पर चल पड़ा तो यह लोकतंत्र के लिए और भी घातक होगा और राजनीति का नक्सलीकरण हो जायेगा |</span></p>
]]></content:encoded>
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		<title>ठीक-ठाक चल रहा है भारत !</title>
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		<pubDate>Fri, 17 Sep 2010 11:12:51 +0000</pubDate>
		<dc:creator>डॉ. वेदप्रताप वैदिक</dc:creator>
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		<description><![CDATA[[pullquote]देश में सब कुछ ठीक -ठाक चल रहा है &#124; ठीक-ठाक का सही मतलब भारत में क्या होता है ये आप सभी जानते हैं &#124; क्योंकि जब तक कोई कारगिल , संसद , मुंबई आदि पर हमले या भोपाल गैस ]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;">[pullquote]<strong><em>देश में सब कुछ ठीक -ठाक चल रहा है | ठीक-ठाक का सही मतलब भारत में क्या होता है ये आप सभी जानते हैं | क्योंकि जब तक कोई कारगिल , संसद , मुंबई आदि पर हमले या भोपाल गैस कांड जैसा कोई बड़ा बबाल ना हो हम अपने हालात ठीक-ठाक ही समझते हैं !  और ऐसे ही ठीक -ठाक हालात का जायजा लिया गया है इस लेख में | </em>जनोक्ति डेस्क</strong> |[/pullquote]<span style="font-size: 13.3333px;">मोटे तौर पर देखें तो भारत में सब ठीक-ठाक ही चल रहा है। न हम किसी युद्ध में फंसे हैं, न कोई दंगे हो रहे हैं, न चीन और पाकिस्तान की तरह हजारों लोग बाढ़ में मर रहे हैं, न सरकार के गिरने की कोई नौबत है। विकास दर में बढ़ोतरी हो रही है, महंगाई थोड़ी घटी है, करोड़पतियों की संख्या बढ़ी है, श्रीलंका, नेपाल और पाकिस्तान जैसे देशों को हम करोड़ों रुपए यों ही दे देते हैं। हमारे दिल्ली जैसे शहर यूरोपीय शहरों से होड़ ले रहे हैं।</span></p>
<p style="text-align: justify;"><a rel="attachment wp-att-7240" href="http://www.janokti.com/%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%82%e0%a4%b8%e0%a4%a6-%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%97/%e0%a4%a0%e0%a5%80%e0%a4%95-%e0%a4%a0%e0%a4%be%e0%a4%95-%e0%a4%9a%e0%a4%b2-%e0%a4%b0%e0%a4%b9%e0%a4%be-%e0%a4%b9%e0%a5%88-%e0%a4%ad%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a4%a4/attachment/customer_indiamap/"><img class="alignright size-full wp-image-7240" title="Customer_IndiaMap" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2010/09/Customer_IndiaMap.jpg" alt="" width="361" height="400" /></a>हजारों करोड़ रुपए हम खेलों पर खर्च कर रहे हैं तो फिर रोना किस बात का है? देश में एक अजीब-सा माहौल क्यों बनता जा रहा है? खासतौर से तब जबकि देश के दो प्रमुख दल कांग्रेस और भाजपा पक्ष और विपक्ष की भूमिका निभाने की बजाय पक्ष और अनुपक्ष की तरह गड्ड-मड्ड हो रहे हैं?</p>
<p style="text-align: justify;">ऐसा क्या है, जो देश को दिख तो रहा है, लेकिन समझ में नहीं आ रहा है?,जो समझ में नहीं आ रहा, वह एक पहेली है। पहेली यह है कि देश में संसद है, सरकार है, राजनीतिक दल हैं, लेकिन कोई नेता नहीं है? सोनिया गांधी लगातार चौथी बार कांग्रेस अध्यक्ष चुनी गईं। रिकॉर्ड बना, लेकिन कोई लहर नहीं उठी। डॉ मनमोहन सिंह ने भी रिकॉर्ड कायम किया। नेहरू और इंदिरा के बाद तीसरे सबसे दीर्घकालीन प्रधानमंत्री हैं, लेकिन वे हैं या नहीं हैं, यह भी देश को पता नहीं चलता।</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">आध्यात्मिक दृष्टि से यह सर्वश्रेष्ठ स्थिति है। ऐसी स्थिति, जिसमें होना न होना एक बराबर ही होता है। इसमें जरा भी शक नहीं कि सोनिया गांधी और मनमोहन सिंह के बीच जैसा सहज संबंध है, वैसा सत्ता के गलियारों में लगभग असंभव होता है। भारत में सत्ता के ये दो केंद्र हैं या एक, यह भी पता नहीं चलता। न तो उनमें कोई तनाव है और न ही स्वामी-दास भाव है, जैसा कि हम व्लादिमीर पुतिन और दिमित्री मेदवेदेव के बीच मास्को में देखते हैं।</p>
<p style="text-align: justify;"><span style="font-size: 13.3333px;">इसी प्रकार सत्ता पक्ष और विपक्ष देश में है तो सही, लेकिन कहीं कोई चुनौती दिखाई नहीं पड़ती। छोटे-मोटे क्षेत्रीय दल जो कांग्रेस के साथ हैं, उनके नेता भ्रष्टाचार के ऐसे मुकदमों में फंसे हुए हैं कि कांग्रेस ने जरा स्क्रू कसा नहीं कि वे सीधे हो जाते हैं।</span></p>
<p style="text-align: justify;"><span style="font-size: 13.3333px;">जिस बात का वे निरंतर विरोध करते हैं, उसी पर दौड़कर समर्थन दे देते हैं। जैसा कि परमाणु सौदे पर पिछली संसद में हुआ था। कांग्रेस का हाल भी वही है। वह उनके ब्लैकमेल के आगे तुरंत घुटने टेक देती है। जिस जातीय गणना का कांग्रेस ने 1931 में और आजाद भारत में सदा विरोध किया, अब कुछ जातिवादी क्षेत्रीय दलों के दबाव में आकर उसने अपनी नेता की भूमिका तज दी और अब वह उन अपने समर्थक दलों की पिछलग्गू बन गई है।</span></p>
<p style="text-align: justify;"><span style="font-size: 13.3333px;">सत्तारूढ़ कांग्रेस सत्ता पर आरूढ़ जरूर है, लेकिन कई मुद्दों पर वह पत्ता भी नहीं हिला सकती। इससे भी ज्यादा दुर्दशा विपक्षी दलों की है। कम्युनिस्ट पार्टियां अभी भी मुखर हंै, लेकिन पिछले चुनाव में वे अपने गढ़ों में ही पिट गईं। उनका आपसी लत्तम-धत्तम इतना प्रखर हो गया है कि उनके मुखर होने पर देश का ध्यान ही नहीं जाता। जोशी-डांगे-मुखर्जी और नंबूदिरिपाद की कम्युनिस्ट पार्टियों में आज के जैसा संख्या-बल नहीं था, लेकिन वाणी-बल था, जो सारे देश में प्रतिध्वनित होता था।</span></p>
<p style="text-align: justify;">नेहरू जैसे नेता को भी उस पर प्रतिक्रिया करनी पड़ती थी। आजकल यही पता नहीं चलता कि वामपंथ का असली प्रवक्ता कौन है। मार्क्‍सवादी पार्टी के महासचिव प्रकाश करात ने परमाणु-हर्जाना विधेयक का विरोध जरूर किया, लेकिन वह नक्कारखाने में तूती की तरह डूब गया। वे दिन गए, जब लोहिया के पांच-सात लोग पूरी संसद को अपनी चिट्टी उंगली पर उठाए रखते थे। अब दिन में दीया लेकर ढूंढ़ने निकलो तो भी कोई समाजवादी नहीं मिलता।</p>
<p style="text-align: justify;"><span style="font-size: 13.3333px;">इतनी बड़ी संसद में क्या एक भी सांसद ऐसा है, जो लोहिया की तरह पूछ सके कि प्रधानमंत्रीजी, आप पर 25000 रुपए प्रतिमाह कैसे खर्च हो रहे हैं और आम आदमी तीन आने रोज पर कैसे गुजारा करेगा? अब तो पूंजीवादी, समाजवादी, साम्यवादी, दक्षिणपंथी और वामपंथी- सभी एक पथ के पथिक हो गए हैं।</span></p>
<p style="text-align: justify;"><span style="font-size: 13.3333px;">सबसे बड़े विपक्षी दल के तौर पर भाजपा जबर्दस्त भूमिका निभा सकती थी, लेकिन वह बिना पतवार की नाव बन गई है। उसका अध्यक्ष भी कांग्रेस अध्यक्ष की तरह आसमान से उतरने लगा है। वह अपने नेताओं के कंधों पर बैठा है, लेकिन उसके पांव नहीं हैं। उसे पांव की जरूरत भी क्या है?</span></p>
<p style="text-align: justify;">भाजपा में हाथ-पांव ही हाथ-पांव हैं। यह कार्यकर्ताओं की पार्टी ही तो है। इसमें गलती से एक नेता उभर आया था। उसे जिन्ना ले बैठा। अब कांग्रेस की तरह भाजपा के शिखर पर भी शून्य हो गया है। ये शून्य-शिखर आपस में जुगलबंदी करते रहते हैं। शून्य-शिखरों की इस जुगलबंदी में से कुछ समझौते निकलते हैं और कुछ शिष्टाचार निभते हैं, लेकिन कोई वैकल्पिक समाधान नहीं निकलते। भारत की राजनीति में से द्वंद्वात्मकता का तिरोधान हो गया है।</p>
<p style="text-align: justify;"><span style="font-size: 13.3333px;">यह एकायामी (वन डायमेंशनल) राजनीति नौकरशाहों और सरकारी बाबुओं के कंधों पर टिकी हुई है। इसमें पार्टियों की भूमिका गौण हो गई है। जनता और सरकार के बीच पार्टी नाम का सेतु लगभग अदृश्य हो गया है। जब पार्टी ही अप्रासंगिक हो गई है तो नेता की जरूरत कहां रह गई है? बिना नेता के ही यह देश चला जा रहा है। यह लोकतंत्र का सबसे बड़ा अजूबा है। बाबुओं के दम पर बाबुओं का राज चल रहा है। आम जनता के प्रति हमारे बाबुओं का जो रवैया होता है, वही आज हमारे नेताओं का है।</span></p>
<p style="text-align: justify;"><span style="font-size: 13.3333px;">देश में अगर आज कोई नेता होता तो क्या वह अनाज को सड़ने देता? यह ठीक है कि उच्चतम न्यायालय को ऐसे मामलों में टांग नहीं अड़ानी चाहिए, लेकिन भूखों को मुफ्त बांटने के विरुद्ध ऐसे तर्क वही दे सकता है, ‘जाके पांव फटी न बिवाई’! सरकार तो सरकार, विपक्ष क्या कर रहा है?</span></p>
<p style="text-align: justify;"><span style="font-size: 13.3333px;">वह उन गोदामों के ताले क्यों नहीं तुड़वा देता? धरने क्यों नहीं देता? सत्याग्रह क्यों नहीं करता? भ्रष्टाचार क्या सिर्फ केंद्र में है? क्या राज्य सरकारें दूध की धुली हुई हैं? भाजपा और जनता दल के राज्यों में कोई चमत्कारी कदम क्यों नहीं उठाया जाता? माओवादियों से पांच-सात राज्य ऐसे लड़ रहे हैं, जैसे वे पांच-सात स्वतंत्र राष्ट्र हों। क्यों हो रहा है, ऐसा? इसीलिए कि देश में कोई समग्र नेतृत्व नहीं है। चीनियों के आगे भारत को क्यों घिघियाना पड़ रहा है?</span></p>
<p style="text-align: justify;"><span style="font-size: 13.3333px;">कश्मीर में कोरे शब्दों की चाशनी क्यों घुल रही है? कोई बड़ी पहल क्यों नहीं हो रही है? इसीलिए कि भारत की राजनीति के बगीचे में सिर्फ गुलदस्ते सजे हुए हैं। इन गुलदस्तों में न कोई कली चटकती है और न फूल खिलते हैं। जो फूल सजे हुए हैं, उनमें खुशबू भी नहीं है। भारत का नागरिक समाज या चौथा खंभा भी इतना मजबूत नहीं है कि वह नेतृत्व कर सके। इसके बावजूद भारत है कि चल रहा है। अपनी गति से चल रहा है। शिखरों पर शून्य है तो क्या हुआ? मूलाधार में तो कोई न कोई कुंडलिनी लगी हुई है।</span></p>
<p style="text-align: justify;">
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		<title>भ्रष्टाचार जारी है</title>
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		<pubDate>Wed, 15 Sep 2010 08:13:37 +0000</pubDate>
		<dc:creator>रमेश भट्ट</dc:creator>
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			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><a rel="attachment wp-att-7074" href="http://www.janokti.com/%e0%a4%85%e0%a4%82%e0%a4%a7%e0%a5%87%e0%a4%b0-%e0%a4%a8%e0%a4%97%e0%a4%b0%e0%a5%80/%e0%a4%ad%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%b7%e0%a5%8d%e0%a4%9f%e0%a4%be%e0%a4%9a%e0%a4%be%e0%a4%b0-%e0%a4%9c%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a5%80-%e0%a4%b9%e0%a5%88/attachment/mgnrega-yojna/"><img class="alignright size-full wp-image-7074" title="MGNREGA YOJNA" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2010/09/MGNREGA-YOJNA.jpg" alt="" width="200" height="279" /></a>बरांबकी उन 200 जिलों में से एक था जिसे साल 2006 में महात्मा गांधी नरेगा के तहत चुना गया। यहां योजना को लागू हुए चार साल से ज्यादा बीत चुके हैं। इस दौरान यहां कई कार्य कराये गए है। योजना का जमीन में हाल जानने के लिए सबसे पहले हम पहुंचे नन्दकला गांव में। इस गांव की कुल आबादी 1241 है। जिसमें 15 फीसदी लोग अनुसूचित जाति के हैं। गांव पहुंचते ही हमारी मुलाकात यहां के प्रधान सूर्यप्रकाश सिंह वर्मा से हुई। प्रधान जी से जब हमने मनरेगा के तहत कराये गए निर्माण कार्यो से जुड़ा सवाल पूछा तो बिना रूके पिछले चार सालों में करोये गए सभी कामों को बयां कर दिया । कराये गए कामों की फेहरिस्त भी बड़ी लम्बी मसलन 4 तालाब, ढाई किलोमीटर सम्पर्क मार्ग, 2200 मीटर खड़ंजे का निर्माण, वृक्षारोपण और दलितों के खेत का समतलीकरण। प्रधान जी नरेगा की सान में एक के बाद एक कसीदे पढ़ते चले गए। मगर जैसे ही बात 60 और 40 के अनुपात की आई तो झठ से बोल दिया कि इसमें बदलाव की जरूरत है। यहां 60 और 40 के अनुपात से मतलब यह है कि येाजना के तहत कुल बजट का 40 फीसदी हिस्सा मजदूरी पर और बाकी सामग्री में खर्च करने का प्रावधान है। इसी गांव में हमारी बात हुई रेश्मावती, बालजती और ममता देवी से। वो इसी गांव में रहती है। खुश है कि इस योजना के कारण काम की तलाश में अब दर दर नही भटकना पड़ता है। आवेदन करने पर गांव में ही काम मिला जाता है। मगर जब हमने उनसे पूछा की क्या मजदूरी समय पर मिलती है। तो वह बिफर उठती हैं। ऐसा की कुछ कहना था इस गांव के ही रहने वाले सन्दीप का। उनकी मानें तो काम तो आसानी से मिला जाता है मगर मजदूरी पाने के लिए बैंकों के बार बार चक्कर लगाने पड़ते है। मजदूरी भुगतान में हो रही देरी का जिक्र जब हमने प्रधानजी से किया तो उन्होनें बिना देरी किये सारा ठीकरा बैंक के सर फोड़ दिया। योजना की हकीकत जानने के लिए हमारा अगला पड़ाव था टाण्डा ग्राम पंचायत। यहां हमें मालूम चला कि पास में ही मनरेगा के तहत खड़ंजे का निर्माण किया जा रहा है। पूछते पाछते आखिरकार हम उस जगह पर पहुंच गए। रमा कान्त मौर्य पिछले 24 सालों से इस गांव के प्रधान है। प्रधान जी ने कागजी काम पक्का कर रखा था। बकायदा वह यह भी कहते है कि पारदर्शिता के लिए हर ग्राम प्रधान केा इसी तरह अपनी फाइल तैयार करती चाहिए। सबूत के तौर पर हर काम की कई फोटों । अपने ग्रामसभा में कराये का सारे कामों की उन्होने एक एक कर सारी फोटो हमें दिखाई। योजना के तहत उन्होने गांव में सीवर लाइन भी डलवाई है। महात्मा गांधी नरेगा में  सबसे  ज्यादा तालाबों का निर्माण कराया गया है। जब हमने जानना चाहा की इतने सारे तालाब खुदवाने के पीछे क्या वहज है। जो सारे प्रधानों के जवाब अलग अलग थे। अब सवाल था कि मजदूरी भुगतान में देरी की क्या वजह है। इसका पता लगाने के लिए हमारी टीम पहुंची मोहम्दपुर खाला शाखा में। मालूम चला का मर्ज बडा़ गहरा है। कहानी एक अनार सौ बीमार वाली है। 53 गांवों का यह इकलौता बैंक अपनी कहानी खुद बयां कर रहा था। बैंक में काम करने वाले कर्मचारियों गिनती के चार। वुद्धास्था पेंशन योजना, स्कालरशिप के तहत मिलने वाली राशि, किसान क्रेडिट कार्ड और रोजाना के लेने देन से बैंक में पहले की बहुत काम था। ऊपर से मनरेगा येाजना के बाद हालात और खराब हो गए हैं। मनरेगा के तहत नए निर्माण कार्य के लिए योजना तैयार करने का जिम्मा पंचायत का होता है। इसके बाद ब्लॉक से इस काम की मंजूरी लेनी पड़ती है। इस दौरान योजना की लागत का आंकलन किया जाता है। इसके लिए बकायदा तकनीकी सहायक की जरूरत होती है। मगर ब्लाक स्तर पर तकनीकि सहायकों की भारी कमी है। यही कारण है कि कार्य की शुारूआत से मजदूरी मिलने तक भारी देरी हो रही है। अकेले बाराबंकी के फतेहपुर ब्लॉक के तहत 86 गांव आते है। बीते अप्रैल तक यहां केवल दो जेई और दो तकनीकी सहायक थे। लिहाजा कानून के मुताबिक न 15 दिन में रोजगार मिला पा रहा है और न ही समय से मजदूरी। मगर आज यहां हालात सुधरे है। अकेले फतेहपुर ब्लॉक में 17 तकनीकी सहायकों की नई नियुक्ति की गई है। एक दिलचस्प बात और जानने को मिली कि मनरेगा के तहत मिलने वाले पैसों से ज्यादातर लोगों ने मोबाइल खरीदे है। एक परिवार से मिलने पर मालूम चला की गरीबी के बावजूद घर में तीन मोबाइल है। महात्मा गांधी नरेगा देश की पहली ऐसी योजना है जिसमें सोशल आडिट का प्रावधान है। जिला स्तर पर योजना की पारदर्शिता की देखरेख के लिए स्थानीय सांसदों के नेतृत्व में एक समिति का गठन किया गया है। साल में राज्य और जिला स्तर में कितनी बैठकें होनी चाहिए इसके लिए केन्द्र ने बकायदा निर्देश जारी किए गए है। एक बात तय है अगर सांसद इस योजना के क्रियान्वयन में रूची ले तो येाजना में हो रहे भष्टाचार पर काफी हद तक रोक लगाई जा सकती हैं।</p>
<p style="text-align: justify;">
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		<title>फिल्मी नत्थे जैसा खुशनसीब नहीं हकीकत का नत्था</title>
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		<pubDate>Thu, 09 Sep 2010 03:24:44 +0000</pubDate>
		<dc:creator>राजेश त्रिपाठी</dc:creator>
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		<description><![CDATA[राजेश त्रिपाठी फिल्म ‘पीपली लाइव’ का ‘नत्था’ भले ही न मरता हो और उसकी मौत का इंतजार करते मीडिया को भले ही निराशा हुई हो लेकिन हकीकत कुछ और ही है। फिल्में अक्सर सुखांत होती हैं, इनमें करो़ड़ों रुपया लगा ]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><strong>राजेश त्रिपाठी</strong></p>
<p style="text-align: justify;"><a rel="attachment wp-att-6677" href="http://www.janokti.com/%e0%a4%85%e0%a4%82%e0%a4%a7%e0%a5%87%e0%a4%b0-%e0%a4%a8%e0%a4%97%e0%a4%b0%e0%a5%80/%e0%a4%ab%e0%a4%bf%e0%a4%b2%e0%a5%8d%e0%a4%ae%e0%a5%80-%e0%a4%a8%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%a5%e0%a5%87-%e0%a4%9c%e0%a5%88%e0%a4%b8%e0%a4%be-%e0%a4%96%e0%a5%81%e0%a4%b6%e0%a4%a8%e0%a4%b8%e0%a5%80/attachment/peepli-live-natta/"><img class="alignright size-medium wp-image-6677" title="peepli live natta" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2010/09/peepli-live-natta-300x214.jpg" alt="" width="300" height="214" /></a>फिल्म ‘पीपली लाइव’ का ‘नत्था’ भले ही न मरता हो और उसकी मौत का इंतजार करते मीडिया को भले ही निराशा हुई हो लेकिन हकीकत कुछ और ही है। फिल्में अक्सर सुखांत होती हैं, इनमें करो़ड़ों रुपया लगा होता है इसलिए ऐसा करना व्यावसायिक मजबूरी है लेकिन सच्चाई इससे परे है। भारत का हर वह ‘नत्था’ जो वर्षों से सूखे, अकाल की मार और ऋण का बोझ झेल रहा होता है, उसे एक न एक दिन मरना ही पड़ता है। ऐसी ही उसकी नियति है। फिल्म का नत्था एक प्रतीक है भारत के मेहनतकश किसानों के मुसलसल झेल जा रहे दर्द का जो एक दिन उन्हें तोड़ ही देता है। वर्षों से सूखा, महाजन के ऋण के बोझ के तले दबे इन नत्थाओं का जीना मुहाल हो जाता है उनके लिए बस एक ही रास्ता बचता है-आत्महत्या। साल दर साल सरकारी उपेक्षा और प्रकृति की बेरुखी की मार झेलते इन लोगों तक सरकारी मदद पहुंच ही नहीं पाती वह या तो उन लोगों के द्वार तक जा कर ठिठक जाती है जिनके जिम्मे उसके वितरण का भार है या फिर बिचौलिये उसका बंदरबांट कर लेते हैं। चाहे विदर्भ हो, आंध्रप्रदेश, मध्यप्रदेश, पश्चिम बंगाल, झारखंड या कोई और प्रदेश, पिछले कुछ वर्षों में वहां से किसानों की आत्महत्या की खबरें आती रही हैं। किसानों की हालत कितनी खराब है, सूखे के चलते वे कितने बेहाल हैं इसका पता हाल की एक खबर से चला जिसमें झारखंड के एक गांव के 2000 किसान परिवारों ने राष्ट्रपति से आत्महत्या की अनुमति मांगी थी। झारखंड के इस गांव के लोगों ने सचही लोकप्रियता पाने के लिए यह कदम नहीं उठाया। पिछले दो साल से पड़ रहे सूखे ने उनको इस स्थिति में ला दिया है कि इसके अलावा उनके पास कोई चारा ही नहीं बचा। राज्य में औसत से 42 प्रतिशत कम बारिश हुई है और सूखे के चलते खेत सूख गये हैं और फसलें नष्ट हो गयी हैं। किसानों के पास जो पूंजी थी वह उन्होंने बीज-खाद खरीदने में गंवा दी और वह भी मिट्टी में मिल गयी। उन लोगों ने सोचा था कि फसल होगी तो उनके पेट भरने का साधन भी हो जायेगा और लिया गया ऋण भी चुकता हो जायेगा। उनकी सारी उम्मीद आकाश के बादलों पर टिकी थी जिनकी बेरुखी से उनकी जान पर बन आयी है। अब उन्होंने राज्यपाल और राष्ट्रपति से आत्महत्या की अनुमित मांगी है। आजाद भारत में शायद ऐसा पहली बार हुआ है जब पूरे गांव ने आत्महत्या की अनुमित मांगी है। जाहिर है यह किसी भी आजाद देश के लिए गर्व की नहीं बल्कि शर्म की बात है जो अपने किसानों, गरीबी रेखा से नीचे जिंदगी बसर करने वाले नागरिकों को जिंदगी की आम सहूलियतें तक नहीं जुटा पाता। जहां देश को अन्न जुटाने वाले किसान भूखों मरने को विवश हों उस देश में विकास की बातें लोगों को मुंह चिढ़ाती नजर आती हैं। राष्ट्र में जाने कितनी जन कल्याण की योजनाएं टल रही हैं फिर ऐसी सहायता इन मुसीबत के मारे किसानों तक क्यों नहीं पहुंच पातीं। क्यों हिंदुस्तान के इन नत्थाओं को अपनी जिंदगी वक्त से पहले खत्म कर लेनी पड़ती है।</p>
<p style="text-align: justify;">ऋण के बोझ और सूखे की मार से देश में जितने किसानों ने आत्महत्या की है उन पर गौर करें तो सिहरन होती है। राष्ट्र के लिए हर नागरिक का जीवन बहुमूल्य होता है। सत्ता में चाहे कोई भी दल हो उसका यह परम कर्तव्य होता है कि वह अपने नागरिकों की चाहे वह किसी भी वर्ग के हों, जीवन की सुरक्षा की गारंटी दे और उनकी आम जरूरतों को पूरा करने की कोशिश करे। यह बड़े दुख के साथ कहना पड़ रहा है कि इसमें अब तक की सारी सरकारें असफल रही हैं। जब चुनाव आते हैं नेता गला फाड़-फाड़ कर विकास का राग अलापते नजर आते हैं और कुर्सी मिलते ही ठंड़े घरों में आरामदायक कुर्सियों में देश के विकास और जन कल्याण की वे योजनाएं बनाने में लग जाते हैं जिनका लाभ या तो पहुंचता ही नहीं या फिर पहुंचता भी है तो ऊंट के मुंह में जीरे की तरह।</p>
<p style="text-align: justify;">सरकार यों तो किसानों और गरीबी रेखा से नीचे के लोगों के लिए करोड़ों रुपये खर्च करने की बातें करती है लेकिन ये रुपये जिन लोगों के लिए होते हैं उन तक न पहुंच कर बीच में ही गायब हो जाते हैं। प्रभावशाली लोग ही यह धन हड़प लेते हैं और गरीब बेचारा सोचता रह जाता है कि दिल्ली की दरियादिली की गंगा उन तक क्यों नहीं पहुंची, बीच में ही क्यों सूख गयी। दरअसल हमारे यहां केंद्र से गरीबों के लिए राज्यों तक ऐसे सूखा पीड़ितों व गरीबों के लिए भेजे जानेवाली धनराशि के बंटन की निगरानी की कोई व्यवस्था नहीं है। केंद्र पैसा राज्य में भेज देता है और राज्य से उसके उपयोग का प्रमाणपत्र मांगता है जो राज्य दे भी देता है लेकिन सचमुच वह पैसा जरूरतमंदों तक पहुंचा या नहीं इस बात की निगरानी की कोई व्यवस्था नहीं है। ऐसे में यह पता लगाना मुश्किल हो जाता है कि धन का सही उपयोग हुआ या नहीं। रही बात राज्य सरकारों के उपयोग प्रमाणपत्र देने की तो वह कागजी कार्रवाई पूरा करने में हमारा देश पूर्ण दक्ष है। देश में ऐसे कई उदाहरण मिल जायेंगे कि नहर बनी नहीं, बोरिंग हुई नहीं और उसके मद में पैसा जरूर खर्च हो गया। जहां के नेता करोड़ों का घोटाला पलक झपकते कर लेते हों, भ्रष्टाचार जहां एड़ी से चोटी तक व्याप्त हो वहां ऐसा होना कोई अचरज की बात नहीं।</p>
<p style="text-align: justify;">वर्षों पहले एक कार्यक्रम ‘न्यूजलाइन’ टीवी पर आता था उसके एक एपीसो़ड में दिखाया गया था कि उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड में एक जगह नहर खोदी जानी थी जिसे सिर्फ कागज पर खोद दी गयी। बाद में जब पता चला कि सरकारी अधिकारी निरीक्षण को आ रहे हैं तो वह नहर भर दी गयी। इस बार कागज कुछ इस तरह तैयार किये गये जिनमें कहा गया कि नहर सही नहीं बनी थी इसलिए उसे बंद भर दिया गया। उस कार्यक्रम को जिस पत्रकार ने पेश किया था वे आज एक साप्ताहिक के संपादक हैं। जाहिर है सरकार की इस तरह से पोलपट्टी खोलने वाले कार्यक्रम की उम्र ज्यादा नहीं होनी थी और न्यूज लाइन जैसा लोकप्रिय और सार्थक कार्यक्रम भी अकाल मौत का शिकार हुआ। वैसा सुना है कि उसे पुनर्जीवित करने के प्रयास हो रहे हैं। जिस देश का यह हाल हों वहां के किसान और गरीब –गुरबा किसी भी सरकार से क्या उम्मीद कर सकते हैं। सरकार चाहे दक्षिणपंथियों की हो या वामपंथियों की या फिर किसी और पंथ या विचार को मानने वालों की अगर उनकी सत्ता में नागरिक गरीबी और भूख के चलते आत्महत्या करते हैं तो इस तरह की हर मौत उनके सिर पर कलंक का वह दाग है जो  वर्षों तक नहीं मिटेगा ऐसे में विकास की हर बात, जनकल्याण का हर नारा एक गाली लगता है।</p>
<p style="text-align: justify;">सरकार के लिए जरूरी है कि वह किसानों-जरूरतमंदों की हर मुमकिन सहायता करे। अनपढ़ गरीब अगर बैंक तक नहीं पहुंच पाते तो बैंक खुद उन तक जाये, उन्हें महाजनों के अनाप-शनाप ब्याज से बचाये। हमने गांवों में देखा है कि किसी गरीब किसान ने कभी महाजन या बड़े काश्तकार से मामूली सा कर्ज लिया तो वह बढ़ते-बढ़ते हजारों हो जाता है और वह बेचारा ब्याज भरता रहता है और मूल जैसा का तैसा रह जाता है। कर्ज के बोझ दबा वह बेचारा कर्ज अदा करने के लिए उस महाजन या काश्तकार के यहां बेगार खटने लगता है। उसकी पीढ़ी दर पीढ़ी वहां बेगार खटते-खटते मर-खप जाती है पर सौ-पांच सौ रुपये का कर्ज हजारों में पहुंच जाता है और कर्ज लेने वाले की कई पीढ़ियों की अमोल मेहनत तक उसे चुकाने के लिए कम पड़ जाती है। गांव का रुख बरसों से नहीं किया। गांव बदले हैं किसानों की हालत भी बदली है लेकिन आज भी कई गांव देश के ऐसे हैं जिनकी खुशहाली या बदहाली प्रकृति पर निर्भर है। देश में नहरों का अब भी वैसा जाल नहीं बिछाया जा सका कि इसका कण-कण पानी पाकर तृप्त हो और धरती सोना उगलने लगे। मौसम और महाजन के ऋण की मार सहने को आज भी हिंदुस्तान के हजारों नत्था मजबूर हैं। इनके लिए सरकारी विकास का हर दावा महज एक छलावा और भ्रम ही लगता है। सही मायने में हिंदुस्तान उस दिन आजाद होगा जब गांव-गांव तक खुशहाली पहुंचाने का गांधी का सपना पूरा होगा। गांधी जी ने जब देश के बारे में सोचा तो उनकी दृष्टि और दिमाग में सबसे पहले गांवों की ही बात आयी। उनकी इस सोच के चलते ही यह बात कही गयी कि असली भारत तो गांवों में बसता है। यह बात सौ फीसदी सच भी है। हिंदु्स्तान का किसान अगर अनाज न जुटाये तो कंकरीट के जंगल बने शहर श्मशान बन जायेंगे। देश के दो सुदृढ़ ध्रुव हैं –किसान और जवान। किसान देश का पेट भरता है, जवान अपनी जान तक देकर उसकी रक्षा करते हैं। ये दोनों प्रणम्य हैं और इनके ऋण से देश कभी उऋण नहीं हो सकता। इन दोनों वर्गों को सम्मान देते हुए हमारे पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय लालबहादुर शास्त्री ने जय जवान, जय किसान का नारा दिया था। आज वही किसान पीड़ित और सुविधाओं से वंचित है। जब तक विकास का लाभ उस सीमांत किसान या गरीब तक नहीं पहुंचता ऐसा हर विकास, हर योजना बेमानी और बेकार है।</p>
<p style="text-align: justify;">भारत में किसानों की बदहाली की क्या स्थिति है इसका अंदाजा पिछले कुछ सालों में होनेवाली किसानों की आत्महत्या से चलता है जिसके आंकड़े चौंकाने वाले हैं। आंध्रप्रदेश की 8 करोड़ की आबादी में 70 प्रतिशत लोगों की जीविका का साधन कृषि है। वहां इस साल अगस्त माह से पहले तक के छह सप्ताह में 25 किसानों के आत्महत्या करने की खबरें आयी थीं हालांकि विपक्षी राजनीतिक दल इस आंकड़े को और अधिक बताते हैं। भारत के कुछ किसानों की हालत यह है कि वे गले तक कर्ज में डूबे हैं। अगर आंकड़ो में यकीन करें तों 2002 से लेकर 2006 तक देश में 17500 किसानों के आत्महत्याएं की। सरकारी आंकड़ो का विश्लेषण करने वालों का कहना है कि 1997 से अब तक 160,000 किसानों ने आत्महत्याएं की। इनमें से अधिकांश ने वही कीटनाशक खाकर अपनी जिंदगी खत्म कर ली जो उनकी उन फसलों को कीड़ों से बचाने के लिए था जो उनकी जिंदगी थी। वह नष्ट हुई तो उनकी अपनी जिंदगी भी बरबाद हो गयी।</p>
<p style="text-align: justify;">आंध्रप्रदेश में इस साल 50 प्रतिशत वर्षा ही हुई है ऐसे में धान, गन्ना व कपास जैसी पानी पर आधारित फसलें चौपट हो रही हैं। किसान खाद, सिंचाई के उपकरण और महंगे बीज खरीदने के लिए महाजन के ऋण के भरोसे रहते हैं ऐसे में अगर फसल नहीं हुई तो उनके घर का तो पैसा गया ही कर्ज लिया पैसा भी उनके लिए वापस करना मुश्किल हो जाता है। जहां तक महाजन का सवाल है वह कभी-कभी दिये गये ऋण पर 30 प्रतिशत ब्याज तक वसूलते हैं। जो किसान आत्महत्या कर लेते हैं वे अपने पीछे छोड़ जाते हैं ऋण के बोझ में दबा परिवार जो बड़े काश्तकारों के खेतों में खेत मजदूर के रूप में काम करने को मजबूर हो जाता है। कई विशेषज्ञ मानते हैं कि किसानों की आसानी से बैंक तक पहुंच न होने के कारण ही वे महाजन के चंगुल में फंस जाते हैं जो उनका जी भर शोषण करता है। महाजन मूल नहीं लेना चाहता बस ब्याज भर लेता रहता है और कर्जदार ब्याज के एवज में ही लिये गये मूल धन से ज्यादा अदा कर देता है और मूल धन वैसा का वैसा बना रहता है । ऐसे में कर्ज कभी अदा होता ही नहीं है। ग्रामीण क्षेत्र के गरीबों को साल में 100 दिन के रोजगार की गारंटी दिलाने वाली योजना अगर सही ढंग से लागू की जा सके तो इससे बहुत से गरीबों का कल्याण हो सकता है और बहुत सी बहुमूल्य जिंदगियां वक्त से पहले खत्म होने से बच सकती हैं लेकिन ऐसा हो नहीं पाता। यह योजना भी कहीं-कहीं ही कारगर हो पायी है।</p>
<p style="text-align: justify;">महाराष्ट्र, कर्णाटक, केरल और पंजाब के किसानों तक को तंगहाली और कर्ज से ऊब कर आत्महत्या को मजबूर होना पड़ा। नेशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़ों के मुताबिक 2006 में अकेले महाराष्ट्र में 4453 किसानों ने आत्महत्या की। इस अवधि में देश में आत्महत्या करने वाले किसानों की संख्या 17060 थी। 2008 में देश भर में 16196 किसानों ने आत्महत्याएं कीं। सरकारी आंकड़ों के अनुसार 2005-2009 में महाराष्ट्र में 5000 किसानों ने आत्महत्याएं कीं। आंध्रप्रदेश में 2005-2007 में आत्महत्या करने वाले किसानों की संख्या थी 1313, कर्णाटक में 2005 से अगस्त 2009 तक यह संख्या थी 1003 ।केरल में पिछले साल यह संख्या 905, गुजरात में 387, पंजाब में 75 और तमिलनाडु में 26 थी।छत्तीसगढ़ में अप्रैल 2009 में कहते हैं कि ऋण के भार और फसल के बेकार होने के कारण 1500 किसानों ने आत्महताएं कीं। किसानो की आत्महत्या की घटनाएं सबसे पहले 1990 में प्रकाश में आयीं जब महाराष्ट्र में किसानों के आत्महत्या करने की खबरें आयीं। इसके बाद आंध्रप्रदेश और विदर्भ और फिर देश के कोने-कोने से किसानों की आत्महत्याओं की खबरें आने लगीं। हालांकि सरकारें अक्सर दावा करती रही हैं कि किसानों के हित के लिए कई कदम उठाये गये हैं लेकिन लगता है कि ये योजनाएं छोटे व सीमांत किसानों तक नहीं पहुंच पातीं तभी तो वे बेहाल और तंगहाल हैं। हम जब तक गांवों को आत्मनिर्भर इकाई नहीं बनायेंगे, उसे विकास की एक इकाई मान कर नहीं चलेंगे, गांव और गरीब बदहाल ही रहेंगे। गांवों में कृषि आधारित औद्योगिक इकाइयां स्थापित कर, वहां शिक्षा, स्वास्थ्य सुविधाएं सुचारू रूप से पहुंचा कर हम न सिर्फ गांवों बल्कि देश का भी भला कर रहे होंगे क्योंकि गांव बचेंगे तभी देश बचेगा। और गांधी का सपना भी उसी दिन सच होगा। देश को उसी दिन मिलेगी सच्ची आजादी जब किसी नत्था को भूखे से बिलबिला कर या ऋण के बोज से दब कर मरने को मजबूर नहीं होना पड़ेगा। उसकी सरकार उसके दुख के उसके पास नजर आयेगी और वह अपने को दीन-हीन और लाचार नहीं समझेगा। उसे महाजनों की मर्जी का गुलाम नहीं होना पड़ेगा। काश मेरा भारत ऐसा हो जाये। आइए उस सुनहली सुबह के स्वप्न बुने और सर्वशक्तिमान से प्रार्थना करें कि ऐसी सुबह जल्द आये। हजारों  किसानों को तो हम खो चुके अब और नहीं खोना चाहते।</p>
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