माओवाद की राजधानी ‘मनातू’ जहाँ सांसद भी जाने से डरते हैं |
2जनोक्ति की टीम झारखण्ड में माओवाद की जमीन तलाशने के लिए राजधानी रांची से होते हुए पलामू ( डाल्टेनगंज ) पहुंची | पलामू की जमीन पर कदम रखने से पहले
आज हमारे लिये सबसे जरूरी और महत्वपूर्ण है कि देश या समाज के लिये न सही, कम से कम अपने आपके और अपनी आने वाली पीढियों के सुखद एवं सुरक्षित
निशा दास की रिपोर्ट रांची से झारखंड में नक्सल समस्या एक जटिल समस्या बनी हुई है। लंबे समय से इस जंजाल से निकलने का यहां के राजनेताओं के साथ -साथ नौकरशाहों
POPULATION SHOULD BE CONTROLLED ANYWAY पिछली जनगणना के बाद जनसंख्या संबंधी आधिकारिक आँकड़े जारी किये गये, राजनीतिक दलों ने अपने-अपने नजरिये से इसे देखा और अपने हिसाब से व्याख्या की।
जनोक्ति की टीम झारखण्ड में माओवाद की जमीन तलाशने के लिए राजधानी रांची से होते हुए पलामू ( डाल्टेनगंज ) पहुंची | पलामू की जमीन पर कदम रखने से पहले
आज हमारे लिये सबसे जरूरी और महत्वपूर्ण है कि देश या समाज के लिये न सही, कम से कम अपने आपके और अपनी आने वाली पीढियों के सुखद एवं सुरक्षित
निशा दास की रिपोर्ट रांची से झारखंड में नक्सल समस्या एक जटिल समस्या बनी हुई है। लंबे समय से इस जंजाल से निकलने का यहां के राजनेताओं के साथ -साथ नौकरशाहों
POPULATION SHOULD BE CONTROLLED ANYWAY पिछली जनगणना के बाद जनसंख्या संबंधी आधिकारिक आँकड़े जारी किये गये, राजनीतिक दलों ने अपने-अपने नजरिये से इसे देखा और अपने हिसाब से व्याख्या की।
मुरारी सिंह कंडारी 1947 से 1975 तक बिहार में कांग्रेस की सत्ता रही, इसी बीच दलितों को सरकारी जमीन के पट्रेट तो दिए गए पर उस जमीन पर कोई दलित
यदि कार्ल मार्क्स अपनी कब्र से उठकर कभी भारत आ पहुंचें तो वे हक्के-बक्के रह जाएंगे| वे अपने भारतीय चेलों को चीनी चेलों से भी आगे-आगे दौड़ता हुआ पाएंगें| बंगाल
बिहार विधानसभा चुनाव को शांति से संपन्न कराने के लिए एक ओर चुनाव आयोग और राज्य सरकार अपनी तैयारियों में जुटा है वहीं दूसरी ओर राज्य विरोधी नक्सली भी चुनाव
[pullquote]देश में सब कुछ ठीक -ठाक चल रहा है | ठीक-ठाक का सही मतलब भारत में क्या होता है ये आप सभी जानते हैं | क्योंकि जब तक कोई कारगिल
बरांबकी उन 200 जिलों में से एक था जिसे साल 2006 में महात्मा गांधी नरेगा के तहत चुना गया। यहां योजना को लागू हुए चार साल से ज्यादा बीत चुके
राजेश त्रिपाठी फिल्म ‘पीपली लाइव’ का ‘नत्था’ भले ही न मरता हो और उसकी मौत का इंतजार करते मीडिया को भले ही निराशा हुई हो लेकिन हकीकत कुछ और ही