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खबरिया चैनलों की होड़ और गलाकाट स्पर्धा

0 संजय द्विवेदी / 2009/11/03 4:38 pm

खबरिया चैनलों की होड़ और गलाकाट स्पर्धा ने खबरों के मायने बदल दिए हैं। खबरें अब सिर्फ सूचनाएं नहीं देती, वे एक्सक्लूसिव में बदल रही हैं। हर खबर अब ब्रेकिंग न्यूज में बदल जाना सिर्फ खबर की कलरिंग भर का मामला नहीं है। दरअसल, यह उसके चरित्र और प्रस्तुति का भी बदलाव है । खबरें अब निर्दोष नहीं रहीं। वे अब सायास हैं, कुछ सतरंगी भी।

वर्तमान पत्र-अकारिता और माखनलाल चतुर्वेदी -3

0 जनोक्ति डेस्क / 2009/11/01 9:03 am

देश के अन्य पत्रों में जिनकी सेवाएं मूल्यवान ही रही हैं वे हैं अलमोड़ा की शक्ति और उसकी लगातार अपने क्षेत्र की राष्ट्रीय सेवाएं  बिहार के ‘देश’और ‘महावीर’आगरे का ‘आर्य

वर्तमान पत्र-अकारिता और माखनलाल चतुर्वेदी -2

0 जनोक्ति डेस्क / 2009/10/31 11:51 pm

महाशयों, हमारे देश के समाचार पत्र संगठित नहीं हो रहे । श्रीयुत नटराजन के सभापितत्व में बम्बई में श्रीमान रामस्वामी शास्त्री के सभापतित्व में मद्रास में, ‘फारवर्ड’ के एक भूतपूर्व

वर्तमान पत्र-अकारिता और माखनलाल चतुर्वेदी -1

वर्तमान पत्र-अकारिता और माखनलाल चतुर्वेदी -1

0 जनोक्ति डेस्क / 2009/10/29 8:34 am

देश के उपदेशक संपादक,सज्जनों एवं पत्रकार बंधुओं ! मेरी अपेक्षा ज्ञान-वद्ध वयोवृद्ध औत तपोवृद्ध व्यक्तियों के होते हुए, आपने मेरे जैसे अनुभवहीन व्यक्ति को, इस संस्था के सभापतित्व का गौरवपूर्ण

भावनाओं का संसार रचती दो उम्दा फिल्में

1 जनोक्ति डेस्क / 2009/10/08 8:01 am

    इस बीच माजिद माजिदी की दो फिल्में देखने को मिली। चिल्ड्रन आफ हैवन और कलर्स आफ पैराडाईस। माजिद माजिदी की फिल्में एक अलग संसार रचती हैं। गांवों का

मन्ना डे को 2007 का दादा साहब फाल्के पुरूस्कार

1 अभिषेक कुमार सिंह / 2009/10/06 7:12 pm

भारतीय सिनेमा में अपने आवाज़ से जीवनपर्यंत ही किवदंती बन चुके मन्ना डे को 2007 का दादा साहब फाल्के पुरूस्कार देने की घोषणा की गई है। सूचना व प्रसारण मंत्रालय

साहित्य के प्रस्तुतीकरण और वास्तविक जीवन में प्रयोग के द्वंद की कहानी

0 जनोक्ति डेस्क / 2009/10/03 7:22 pm

पार्टी कल्चर से बहुत ज्यादा ताल्लुक ना होने के बावजूद इस पार्टी ने लुभा लिया। 1984 में आई गोविन्’द निहिलानी की फिल्म पार्टी गर्मियों की पहाड़ी ठंडक का अहसास करते हुए देखी। फिल्म वर्तमान साहित्य जगत के पूरे गड़बड़झाले को उस दौर में भले ही कह गई हो पर आज भी सीन बाई सीन सच्चाई वही है। तल्ख ही सही।

कैमरा जब आंख बन जाता है : उमेश पन्त

0 जयराम "विप्लव" / 2009/09/23 4:49 pm

फिल्मों में रुचि रखने वाले लोगों के लिए मैन विद मूवी कैमरा एक कमाल की फिल्म है। जिस दौर में सिनेमा की शुरुआत होती है उस दौर में कैसे एक डाईरैक्ट हर सम्भव तकनीक अपनी फिल्म में प्रयोग कर लेता है और पूरी सफलता से, ये बात फिल्म देख लेने के बाद ही पता चलती है।