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संजय द्विवेदी / 2009/11/03 9:20 pm
देश के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने जब 15 सितंबर,2009 को दिल्ली में पुलिस अधिकारियों के सम्मेलन में नक्सलवाद को देश का सबसे बड़ा खतरा बताया तो वे कुछ नयी बात नहीं कह रहे थे। इसके पहले भी देश के गृहमंत्री और कई नक्सल प्रभवित राज्यों के मुख्यमंत्री यह बात कहते आए हैं। बावजूद इसके हमारी सरकारें न जाने क्यों नक्सलवाद के खिलाफ एक समन्वित और परिणाम केंद्रित अभियान छेड़ने में असफल साबित हो रही हैं। नक्सली देश में हिंसक अभियान चला रहे हैं निरीह जनता को अपना निशाना बना रहे हैं पर देश का गरीब, आदिवासी तबका अपने नेताओं की राजनीतिक इच्छाशक्ति के इंतजार में खड़ा है।
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डॉ०मधु लोमेश / 2009/11/02 1:32 pm
नक्सल आतंकवाद ,माओवादी हिंसा की घटनाएँ जो कभी छिट-पुट रूप में दिखाई देती थी आज तकरीबन देश के बीस राज्यों में पैर पसारे दिख रही है .राजनीतिक गलियारों में भले हीं इसे किसी आतंकवाद के सदृश घोषित कर दिया हो पर आम जनता इस सत्य को जान चुकी है कि वास्तव में ऐसी घटनाएँ सरकारी तंत्र की विफलता ,अव्यवस्था , भ्रष्टाचार ,सरकारी धन के दुरूपयोग , नीतियों के सही क्रियान्वयन ना होने से उत्पन्न आक्रोश ,असंतोष की ही परिचायक है जिसे हम सब जज्ब किये बैठे हैं . उनके हिंसक प्रदर्शनों ,हमलों पर रोक -थाम के लिए आवश्यक है कि सरकार अपनी कथनी और करनी के अंतर की समीक्षा करे .नक्सल प्रभावित संवेदनशील इलाकों में अंतर्विरोधों को समाप्त करने की पहल करें . रोटी ,कपडा ,मकान ,रोजगार समंधी ठोस कदम उठाये ना कि बल पूर्वक नाक्साली आन्दोलन को कुचलते हुए उन्हें अधिक उग्र बनने पर विवश करे
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जनोक्ति डेस्क / 2009/11/01 7:46 pm
सम्पूर्ण विश्व ने सदियों से भारत पर लगातार आक्रमण किए हैं किंतु मुख्यतः मुग़ल और ब्रिटिश लोगो को ही अधिक सफलता मिली है। मुग़ल और ब्रिटिश लोग भी इस
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जयराम "विप्लव" / 2009/10/15 3:16 pm
भारत की संसद को गाँधी ने 1909 ई० में हीं बाँझ और वेश्या बताया था .धीरे -धीरे वेश्यावृत्ति के पावन कर्म में अपनी राजनीति भी शामिल हो गयी जो अब
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जनोक्ति डेस्क / 2009/10/14 6:29 am
नक्सलवाद पर आज व्यापक बहस की जरुरत है . इसी विचार से विमर्श के इस स्तम्भ में पत्रकारिता के छात्र प्रणव का यह आलेख प्रस्तुत है :- नक्सलवाद और नक्सली
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जनोक्ति डेस्क / 2009/10/11 3:32 pm
१० अक्तूबर को भारत नीति संस्थान के द्वारा दीनदयाल शोध संस्थान, नई दिल्ली में ” वर्तमान सन्दर्भ में हिंद स्वराज की प्रासंगिकता ” विषय पर एक संगोष्ठी का आयोजन किया गया . इस संगोष्ठी में वरिष्ठ गांधीवादी चिन्तक और पूर्व सांसद राम जी सिंह , जेएनयु के प्राध्यापक अमित शर्मा , पांचजन्य के सम्पादक बलदेव भाई सिंह , आईबीएन -7 के पत्रकार आशुतोष , आचार्य गिरिराज किशोर , केदारनाथ साहनी , और भारत नीति संस्थान के संचालक राकेश सिन्हा समेत दर्जनों पत्रकार ,लेखक और छात्र शामिल हुए . इस अवसर पर प्रो ० अमित शर्मा ने कहा कि हिंद स्वराज की प्रासंगिकता पर विचार करने से पूर्व गाँधी को जानना आवश्यक है . गाँधी ने जीवन के दो लक्ष्य बताये हैं, एक आत्मसाक्षात्कार और दूसरा ब्रह्मसाक्षात्कार . गाँधी शास्त्र के नहीं लोक के जानकार थे
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जयराम "विप्लव" / 2009/10/07 8:29 am
वाह री बौद्धिकता ! जब से नक्सलियों / माओवादियों के सफाए के लिए वायु सेना की तैयारी से जुड़ी रपट और चिदंबरम का बयान मीडिया में उछाला गया है तभी से कुछ हिंदी चिट्ठों के स्वनामधन्य बौद्धिक लेखक इसे सत्ता का दमनकारी चरित्र और वर्तमान हालात को आपातकाल से भी बदतर बता रहे हैं . हिंदी के लेखकों को माओवादियों /नक्सलवादी/ उग्रवादी (तथाकथित क्रांतिकारी ) के मानवाधिकारों की रक्षा में खड़े होने का आह्वान किया जा रहा है
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जनोक्ति डेस्क / 2009/09/24 1:37 pm
नक्सलवादी अपने आप को वनवासियों का मसीहा बताते हैं। उनका दावा है कि वे वनवासियों की भलाई के लिए कार्य करते हैं। लेकिन यह उनका वास्तविक रुप नहीं है। वास्तविकता कुछ और ही है। अब यह किसी से छिपा नहीं है। नक्सलवादियों के बर्बर और अमानवीय चेहरे को सभी ने देखा है। नक्सलवाद पर नजर रखने वाले लोग जानते हैं कि वे इसके माध्यम से अपना वर्चस्व बनाये रखना चाहते हैं। उनकी विचारधारा से असहमत लोगों की सबके सामने गला काट कर हत्या कर दी जाती हैं।