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	<title>JANOKTI : जनोक्ति :  राज-समाज और जन की आवाज &#187; सर्वहारा</title>
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		<title>अब युद्ध छेड़ना होगा</title>
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		<pubDate>Tue, 10 Aug 2010 17:32:58 +0000</pubDate>
		<dc:creator>विजय कुमार</dc:creator>
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		<description><![CDATA[&#8221; संघर्ष, मुठभेड़ और युद्ध &#8220; सामान्य रूप से ये तीनों शब्द लगभग एक से लगते हैं; पर इनमें बड़ा अंतर है। ये अलग-अलग संदर्भ में प्रयोग होते हैं और इसीलिए इनके नियम भी अलग-अलग ही हैं। खेल के मैदान में ]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><img class="alignright size-full wp-image-5726" title="Indian-army556" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2010/08/Indian-army556.jpg" alt="" width="370" height="278" />&#8221; संघर्ष, मुठभेड़ और युद्ध &#8220; सामान्य रूप से ये तीनों शब्द लगभग एक से लगते हैं; पर इनमें बड़ा अंतर है। ये अलग-अलग संदर्भ में प्रयोग होते हैं और इसीलिए इनके नियम भी अलग-अलग ही हैं।</p>
<p style="text-align: justify;">खेल के मैदान में दो खिलाड़ी या दल जीतने के लिए भिड़ते हैं। खेल में कई बार, और अंतिम समय में तो प्रायः चरम संघर्ष की स्थिति आ ही जाती है। खिलाड़ी अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करने का प्रयास करते हैं। अत्यधिक उत्साह के कारण कभी-कभी कुछ नियम विरुद्ध कार्य (फाउल) भी हो जाते हैं। ऐसे में निर्णायक (रेफरी) गलती करने वाले को चेतावनी देता है और कभी-कभी उसे मैदान से बाहर भी भेज देता है। कई बार तो खेल में हार-जीत भी इसी कारण हो जाती है।</p>
<p style="text-align: justify;">लेकिन संघर्ष के इस दौर के बाद भी खिलाड़ियों के मन में एक दूसरे के प्रति द्वेष या शत्रुता नहीं होती, क्योंकि वे खेल के नियम और अनुशासन से बंधे होते हैं। इसलिए कोई भी जीते या हारे; पर अंततः खेल भावना ही विजयी होती है।</p>
<p style="text-align: justify;">दूसरे शब्द मुठभेड़ की यदि व्याख्या करें, तो यह विरोधियों में होती है। इसका कारण वैचारिक भी हो सकता है और धन, धरती या अन्य कोई स्वार्थ भी। इसमे दोनों पक्ष एक-दूसरे को शारीरिक, मानसिक या आर्थिक हानि भी पहुंचाते हैं; लेकिन इन दोनों के ऊपर देश का संविधान है। यदि कोई न्यायालय की शरण ले, तो गलती करने वाले को दंड भुगतना पड़ता है। कहीं-कहीं लोग सरकार की शरण में जाने की बजाय अपनी जातीय या क्षेत्रीय पंचायत में चले जाते हैं। वह भी अर्थदंड, गांव या जाति बहिष्कार आदि सजा देकर मामले को निबटा देती है।</p>
<p style="text-align: justify;">लेकिन युद्ध इन सबसे बहुत बड़ी चीज है। युद्ध करने वाले न संविधान को मानते हैं और न ही नैतिकता या खेल भावना को। उनका उद्देश्य तो दूसरे पक्ष को अधिकाधिक शारीरिक, मानसिक और आर्थिक हानि पहुंचाकर उनका मनोबल तोड़ना और उनके जन-धन पर अधिकार करना होता है। दो देशों में होने वाले युद्ध इसी श्रेणी में आते हैं। सामान्यतः यदि कोई दूसरे की हत्या कर दे, तो उसे आजीवन कारावास या फांसी होती है, जबकि युद्ध में शत्रुओं को मारने वाले को सम्मानित किया जाता है।</p>
<p style="text-align: justify;">इस दृष्टि से हम अपने देश के वर्तमान घटनाक्रम को देखें। क्या नक्सलवादी कम्युनिस्टों द्वारा देश में मचाया जा रहा तांडव युद्ध से कम है; क्या मुस्लिम आतंकियों द्वारा किये जा रहे जेहादी विस्फोट युद्ध नहीं हैं; क्या घुसपैठ द्वारा जनसंख्या बढ़ाकर भारत को दारुल इस्लाम बनाने का षड्यन्त्र युद्ध नहीं है; क्या कश्मीर घाटी से सब हिन्दुओं को खाली हाथ भगाने के बाद उसे पूर्णतः पाकिस्तान बना देने का प्रयास युद्ध नहीं है; इनके पीछे चीन हो या पाकिस्तान या फिर अमरीका; क्या येन-केन-प्रकारेण इनका सिर कुचलना अपराध है ?</p>
<p style="text-align: justify;">दुनिया भर में इसका उत्तर चाहे जो हो; चाणक्य और भर्तृहरि के नीति श्लोक चाहे जो कहें; भगवान श्रीकृष्ण ने गीता और महाभारत में चाहे जो कहा और किया हो; पर हमारी परम सेक्यूलर सरकारों का दृष्टिकोण इस बारे में सदा आत्मघाती ही रहा है। इसीलिए ये समस्याएं घटने की बजाय तेजी से बढ़ रही हैं। यानि ‘मर्ज बढ़ता गया, ज्यों-ज्यों दवा की।’</p>
<p style="text-align: justify;">बात बिलकुल साफ है कि बंगलादेशी घुसपैठिये, पाक प्रेरित आतंकवादी और नक्सलवादी कम्युनिस्ट हमारे शत्रु हैं। वे लगातार भारतवासियों को मार रहे हैं। हमारी पुलिस, सी.आर.पी.एफ, बी.एस.एफ और सेना लड़ तो रही है; पर युद्ध घोषित न होने से उनके हाथ बंधे हैं। अतः हमें भी इनके विरुद्ध युद्ध घोषित कर सेना को खुली छूट देनी चाहिए। अब काम पुलिस या अर्धसैनिक बलों से नहीं चलेगा। यदि मौका मिले, तो 1965, 1971 या करगिल दोहराना सेना के लिए कठिन नहीं है। वह कुछ ही दिन में शत्रुओं को समूल नष्ट कर सकती है।</p>
<p style="text-align: justify;">एक बात और भी ध्यान देने योग्य है कि युद्ध के समय सीमावर्ती क्षेत्र को भी खाली करा लिया जाता है। इसके बाद भी यदि कोई वहां रहे, तो उसकी हानि की जिम्मेदार सेना नहीं होती। यही स्थिति इस युद्ध में भी है। जो लेखक, पत्रकार, वकील या साधुवेशी लोग शत्रुओं के लिए सहानुभूति या आर्थिक साधन जुटा रहे हैं, उन्हें समझना होगा कि इस युद्ध में अपने जानमाल की हानि के जिम्मेदार वही हैं, शासन या सेना नहीं।</p>
<p style="text-align: justify;">दिल्ली, मुंबई या कोलकाता के वातानुकूलित क्लब और होटलों में गोष्ठी करने वाले कुछ भ्रष्ट बुद्धिवादियों के मन भले ही अपने इन साथियों के लिए धड़कते हों; पर आम नागरिक के मन में इनके लिए कोई सहानुभूति नहीं है। उसकी दृष्टि में ये सब एक ही थैली के चट्ट-बट्टे हैं। उसका बस चले, तो अपराधियों के साथ इन तथाकथित बुद्धिवादियों का भी एनकाउंटर कर दे।</p>
<p style="text-align: justify;">लेकिन बलिहारी है भारत देश की, जहां देशभक्तों का अपमान और सेक्यूलरों का सम्मान होता है। कश्मीर घाटी में 32 दांतों के बीच जीभ की तरह काम कर रहे सैनिक एक ओर पत्थरबाजों और आतंकियों के निशाने पर हैं, तो दूसरी ओर शासन-प्रशासन के। वे गोली चलाएं, तो प्रदेश और देश का शासन उन्हें गरियाता है, और न चलाएं तो पत्थर और गोलीबाज उनकी जान ले लें। गुजरात को देखें, तो नापाक पाकिस्तान में बैठे आकाओं के निर्देश पर चलने वाले अपराधियों को मारकर राज्य को आतंक से मुक्त कराने वाले जेल में हैं, जबकि उन माफिया गिरोहों के समर्थक मंूछों पर ताव दे रहे हैं। ऐसे में कौन भविष्य में इन आतंकवादियों के विरुद्ध युद्ध करेगा ?</p>
<p style="text-align: justify;">इस पीड़ा को कोई पंजाब को पाकिस्तान प्रेरित खालिस्तानी आतंकवादियों से मुक्त कराने वाले पुलिस अधिकारी के.पी.एस गिल से पूछे। वे बताते हैं कि घोर अंधकार के उन काले दिनों में पंजाब के मुख्यमंत्री बेअंत सिंह का वरदहस्त उनकी पीठ पर था। उन्होंने खूंखार आतंकियों की हिट लिस्ट बनाकर अपने साथियों को खुली छूट दी; पर आतंक समाप्ति के बाद उन जांबाज पुलिस वालों पर ही मुकदमे ठोक दिये गये। मजबूरी में कुछ ने आत्महत्या कर ली और कुछ आज भी जेल में सड़ रहे हैं। यह युद्ध को संघर्ष या मुठभेड़ समझने का ही दुष्परिणाम है।</p>
<p style="text-align: justify;">इसलिए यदि हमें देश को इन घुसपैठियों, नक्सलवादी कम्युनिस्टों और इस्लामी आतंकियों से मुक्त कराना है, तो इनके विरुद्ध खुला युद्ध छेड़ना होगा। छुटपुट संघर्ष, मुठभेड़ या वार्ताओं से काम बनने वाला नहीं है। भारत की जनता हर बार की तरह इस बार भी तन, मन और धन से सहयोग करेगी; पर एक बार शासन वोट राजनीति की मानसिकता से ऊपर उठकर युद्ध घोषित तो करे।</p>
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		<title>गुलाममंडल खेल और नेहरू स्टेडियम</title>
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		<pubDate>Thu, 29 Jul 2010 15:22:19 +0000</pubDate>
		<dc:creator>विजय कुमार</dc:creator>
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			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><img class="aligncenter size-full wp-image-5442" title="MINOLTA DIGITAL CAMERA" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2010/07/Jawaharlal_Nehru_Stadium.jpg" alt="" width="520" height="383" />दिल्ली में होने वाले गुलाममंडल खेलों के उद्घाटन, समापन आदि के लिए बने जवाहर लाल नेहरू स्टेडियम का नाम बिल्कुल ठीक रखा गया है, क्योंकि अंग्रेजों के जाने के बाद भारत में गुलाम परम्पराओं को जीवित रखने के सबसे बड़े अपराधी नेहरू ही हैं।</p>
<p style="text-align: justify;">वे स्वयं को गर्वपूर्वक भारत में अंतिम अंग्रेज कहते थे। इसी प्रकार वे स्वयं को जन्म से हिन्दू, कर्म से मुसलमान और विचारों से ईसाई मानते थे। जो लोग इस तमाशे के समर्थक हैं, वे सब नेहरूवादी गुलाम मानसिकता के शिकार हैं। मणिशंकर अय्यर ने जीवन में बस यही अच्छा काम किया है कि वे इस सर्कस के विरोधी हैं।</p>
<p style="text-align: justify;">इस तमाशे पर कितना धन खर्च हो रहा है, यह ठीक-ठीक किसी को नहीं पता। 15 से लेकर 50 हजार करोड़ रु0 तक की बात लोग कह रहे हैं। इससे भारत के हर विकास खंड में एक चिकित्सालय और विद्यालय तथा हर जिले में एक खेल स्टेडियम बन सकता था; पर गांव और गरीब किसी की प्राथमिकता में तो हो&#8230;। पांच करोड़ रु0 तो केवल ए.आर.रहमान को ही दिया जा रहा है, जो उद्घाटन कार्यक्रम में कुछ देर गीत-संगीत प्रस्तुत करेंगे।</p>
<p style="text-align: justify;">दुर्भाग्यवश भारत के सभी बड़े नेता, राजनीतिक दल तथा संस्थाएं चुप हैं। उन्हें डर है कि इससे कहीं युवा शक्ति उनसे नाराज न हो जाए। वे भूलते हैं कि जींसधारी आधुनिक युवक भले ही कितने फैशनपरस्त हों; क्रिकेट, सिनेमा या कैरियर के लिए भले ही वे दीवाने हों; पर उनके मन में देशभक्ति की आग विद्यमान है। यदि उन्हें ठीक से बात समझाएं, तो यह आग शीघ्र ही दावानल बन सकती है।</p>
<p style="text-align: justify;">छह दिसम्बर, 1992 और अयोध्या को याद करें। जिन युवकों को बुजुर्ग लोग नालायक बताते नहीं थकते थे, उन्होंने कुछ घंटो में ही बाबरी गुलामी के उस कलंक को ढहा दिया था। यदि सही नेतृत्व द्वारा आह्नान किया जाए, तो यही फैशनपरस्त युवक बड़े से बड़ा बलिदान देने में पीछे नहीं हटेंगे।</p>
<p style="text-align: justify;">हर्ष की बात है कि स्वामी रामदेव जी ने इसके विरुद्ध आवाज उठाई है। यदि वे आह्नान करें, तो इस मुद्दे पर करोड़ों भारतवासी उनके साथ आ सकते हैं। क्या ही अच्छा हो यदि स्वामी जी के नेतृत्व में तीन अक्तूबर, 2010 (रविवार) को दिल्ली के देशभक्त नागरिक सत्याग्रह करें। वे सुबह से ही सड़कें जाम कर किसी खिलाड़ी, नेता या दर्शक को उद्घाटन कार्यक्रम में न जानें दें। विश्व भर का मीडिया उस दिन यहां होगा। उनके माध्यम से दुनिया देखेगी कि ‘हम भारत के लोग’ इस गुलामी के चोगे को उतार फेंकना चाहते हैं।</p>
<p style="text-align: justify;">यदि स्वामी रामदेव जी अभी से तीन अक्तूबर, 2010 को दिल्ली में रहकर इस सत्याग्रह का नेतृत्व करने की घोषणा कर दें, तो गुलाममंडल खेलों के विरुद्ध वातावरण बनने लगेगा। दिल्ली के आसपास के लाखों लोग भी उस दिन यहां आ जाएंगे। दो अक्तूबर गांधी जी का जन्मदिवस भी है, जिन्होंने सत्याग्रह रूपी शस्त्र का अंग्रेजों के विरुद्ध प्रयोग किया था। अंग्रेज रानी की गुलामी में सम्पन्न होने वाले ‘गुलाममंडल सर्कस’ के विरुद्ध इस शस्त्र को एक बार फिर आजमाने की जरूरत है।</p>
<p style="text-align: justify;">
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		<title>देश के दीमक भ्रष्टाचारियों पर कड़ी कार्यवाही हो</title>
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		<pubDate>Thu, 29 Jul 2010 15:19:42 +0000</pubDate>
		<dc:creator>अरविन्द विद्रोही</dc:creator>
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			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><img class="alignleft size-medium wp-image-5444" title="black-money-and-corruption2" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2010/07/black-money-and-corruption2-300x213.jpg" alt="" width="300" height="213" />ग्रामीण भारत ही असली भारत है। भारत की 80 प्रतिशत आबादी ग्रामीण अंचलों में निवास करती है तथा शेष 20 प्रतिशत आबादी भी अप्रत्यक्ष रूप से ग्राम्य जीवन से जुड़ी है। कृषि आधारित भारत के ग्राम्य विकास की महती जिम्मेदारी केन्द्रीय ग्रामीण मंत्रालय एवं प्रदेश स्तर पर ग्राम्य विकास विभाग की है। एक लोक कल्याणकारी राज्य की स्थापना निचले पायदान पर खड़े नागरिक के हितों की रक्षा व पूर्ति से होती है। ग्रामीण भारत के निवासियों के अधिकारों पर खुलेआम, निर्लज्जतापूर्वक डाली जा रही डकैतियों को और अधिक बर्दाश्त नहीं किया जा सकता है। ग्रामीण क्षेत्रों के विकास के लिए तमाम महत्वाकांक्षी योजनायें भारत सरकार-प्रदेश सरकार संचालित कर रहीं है ।इन योजनाओं के क्रियान्वयन की जिम्मेदारी ग्राम्य विकास विभाग के अधिकारियों-कर्मचारियों की होती है।पंचायती राज व्यवस्था लागू होने के बाद ग्राम्य विकास विभाग में बड़ी धनराशि,ग्राम्य जीवन स्तर को उच्च स्तर पर लाने की क्रान्तिकारी योजना के तहत् आवंटित होनी प्रारम्भ हुई।यह इस धरा का दुर्भाग्य है कि यहां के खेतों की मेंड़े ही खेत को चरने लगी हैं। आज दुनिया के सबसे भ्रष्ट देशों में हमारा 5वां स्थान है और हमारे भ्रष्ट सरकारी कर्मियों-भ्रष्ट जनप्रतिनिधियों को शर्म नहीं आ रही है।</p>
<p style="text-align: justify;">विकास कार्यों के लिए आवंटित धनराशि में बड़े पैमाने पर घोटाले की बात स्व0राजीव गाँधी -पूर्व प्रधानमंत्री से लेकर डा0 मनमोहन सिंह- प्रधानमंत्री, भारत सरकार, द्वारा स्वीकार की जा चुकी है। अभी बीते लोकसभा चुनावों में विकास के धन की लूट का मुद्दा प्रमुखता से कांग्रेस  पार्टी के राष्ट्रीय  महासचिव राहुल गाँधी ने उठाया। परिणाम स्वरूप भ्रष्टाचार से आजिज आ चुकी जनता ने जमकर कांग्रेस के प्रत्याशियों को आर्शिवाद रूपी मत देकर अपने विकास कार्यों की निगरानी के लिए,अपने हितों के रक्षार्थ अपना संसद रूपी चैकीदार चयनित करके जनहित के कार्यों को करने के लिए सर्वोच्च संस्था संसद भवन में भेजा है ।उ0प्र0 की मुखिया सुश्री मायावती ’अध्यक्ष‘बहुजन समाज पार्टी की छवि कानून व्यवस्था को नियंत्रित रखने में सफल प्रशासक के रूप में बरकरार है। मनरेगा तथा केन्द्र सरकार द्वारा स्वीकृत अन्य योजनाओं में उ0प्र0 सरकार की शिथिलता का आरोप कंाग्रेस के राहुल गांधी अक्सर लगाते रहते हैं। शायद इन्ही आरोपों को ईमानदारी पूर्वक संज्ञान में लेते हुए उ0प्र0सरकार की मुखिया सुश्री मायावती ने कड़े आदेशों को जारी किया है। विश्वस्त्र सूत्रों के अनुसार सर्वजन हिताय- सर्वजन सुखाय को चरितार्थ करने के लिए मायावती ने उच्च अधिकारियों को समस्त विभागों में शिकायतों,गडबड़ियों पर तत्काल प्रभावी कार्यवाही के आदेश दियें हैं। शासनादेशों का पालन न करने वालों को जो चेतावनी,प्रतिकूल प्रविष्टि व निलम्बन की कार्यवाही झेलनी पड़ रही है,वह उ0प्र0 की मुखिया सुश्री मायावती के भ्रष्टाचार के खिलाफ मुहिम की हनक ही है। आज मनुष्य नैतिकता-सदाचरण की बातों को बकवास मानता है। यह बड़े दुर्भाग्य की बात है कि तमाम् धर्मस्थलों पर ये भ्रष्टाचारी-पापी माथा टेकने,अपने पाप धोने की लालसा में सबसे आगे खड़े रहते हैं। ये भ्रष्ट गण मनुष्य को ही नहीं,सर्वशक्तिमान को भी अपने मिथ्या आडम्बर से छलने का दुश्प्रयास करते रहते हैं। अपनी काली कमाई से धार्मिक स्थलों के निर्माण,धार्मिक आयोजनों में धनराशि व्यय करके ये भ्रष्टाचारी अपने को समाज में श्रेष्ठतम् रूप में स्थापित करते हैं।</p>
<p style="text-align: justify;">विकास के धन की लूट को रोकने के लिए इसे मुद्दा बना कर जितना अच्छा कार्य राहुल गाँधी ने किया और इसका फायदा भी कांग्रेस को मिला, अब विकास के धन की लूट करने वालों को चिन्हित कर दण्डित करने की कार्यवाही से उ0प्र0 सरकार की मुखिया सुश्री मायावती को भी निःसन्देह फायदा मिलेगा।आम जनता जन सुविधाओं की प्राप्ति के लिए भीख मांगती है और उसके हक की लूट करने वाले मौज करते हैं। प्रशासनिक दृढ़ता और शासन की स्पष्ट नीति से वर्तमान समय में भ्रष्टाचार में लिप्त कर्मचारी-अधिकारी-जनप्रतिनिधि बौखला गयें हैं। कत्र्तव्य पालन करने में नाकाम &#8211; नाकारा व्यक्तियों का यह समूह नाना प्रकार के बहाने पेश कर रहा है। इनके भ्रमजाल व दबाव में आये बगैर प्रशासन-शासन को जनहित-राष्ट्हित के इस क्रान्तिकारी निर्णय को जारी रखना चाहिए। बेरोजगार,ईमानदार नवयुवकों की भारी संख्या इन भ्रष्ट कर्मियों के स्थान पर दायित्व निभाने के लिए तैयार खड़ी है।</p>
<p style="text-align: justify;">
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		<title>जनता के साथ हैं और महंगाई के विरोध में</title>
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		<pubDate>Thu, 29 Jul 2010 07:18:21 +0000</pubDate>
		<dc:creator>जयराम "विप्लव"</dc:creator>
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		<description><![CDATA[मॉनसून सत्र के तीसरे दिन भी संसद में हंगामा जारी है &#124; सारा विपक्ष एक स्वर में महंगाई के मुद्दे पर चर्चा और मतदान की मांग पर अड़ा हुआ है &#124; कांग्रेस सरकार की हवा निकलती हुई दिख रहा है ]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><img class="alignright size-full wp-image-5419" title="mehngai" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2010/07/mehngai.jpg" alt="" width="369" height="232" />मॉनसून सत्र के तीसरे दिन भी संसद में हंगामा जारी है | सारा विपक्ष एक स्वर में महंगाई के मुद्दे पर चर्चा और मतदान की मांग पर अड़ा हुआ है | कांग्रेस सरकार की हवा निकलती हुई दिख रहा है | जिस तरह से मॉनसून सत्र के ठीक पहले सोहराबुद्दीन फर्जी मुठभेड़ और हिन्दू आतंकवाद का जिन्न निकाला गया उससे सरकार के रणनीतिकार काफी निश्चिन्त थे कि मुख्य विपक्षी दल भाजपा को इन मुद्दों पर घेर कर महंगाई के मुद्दे को दबा दिया जायेगा | लेकिन , भाजपा नेतृत्व ने अमित शाह प्रकरण में सीबीआई को लेकर सरकार को घेरने के बजाय महंगाई के दर्द को उठाना उचित समझा और नतीजा सामने है कि वाम हो या दक्षिण या फ़िर समाजवादी ताकतें सभी एकजुट हैं | सरकार चारों ओर से सदन में कमजोर पद रही है | एक ओर जहाँ राज्यसभा में सत्तापक्ष की संख्या का संतुलन बिगड़ गया है वहीँ लोकसभा में सहयोगी दलों के ऊपर भरोसा ना होने से सरकार उहापोह की स्थिति का सामना कर रही है | और यही कारण है कि सरकार 184 के तहत चर्चा नहीं करवाना चाहती क्योंकि इस नियम में चर्चा के बाद मतदान का प्रावधान है | यदि मतदान की नौबत आई तो सरकार की हार तय है क्योंकि इस बार सीबीआई के भय से ना तो सपा मानने वाली है और ना ही बसपा ! वैसे भी मामला महंगाई का है और सबको अपनी चुनावी जमीन बचाए रखना है |</p>
<p style="text-align: justify;">कांग्रेस प्रवक्ता मनीष तिवारी कहते हैं सरकार बहस को तैयार है और विपक्ष भी बहस की मांग कर रही है फ़िर आखिर पेंच कहाँ है ? क्यों सदन हंगामे की भेंट चढ़ रहा है ?  पेंच तो है और वो भी क़ानूनी !  मामला १८४ और १९३ के बीच फंसा हुआ है | दरअसल कांग्रेस नेतृत्व को विपक्ष की समझदारी का अंदाजा ही नहीं था | खास कर भाजपा को उन्होंने रणनीति विहीन समझ लिया था |</p>
<p style="text-align: justify;">गौर किया जाए तो सरकार महंगाई के पाप को गुजरात सरकार को कटघरे में खड़ा कर छुपाना चाहती थी , विपक्ष ( जिसमें भाजपा को अछूत समझने वाले वामपंथी भी शामिल हैं ) को सांप्रदायिक मुद्दों में फंसा कर बाँटना चाहती थी | कुछ लोग इसे गलत आरोप कह सकते हैं लेकिन अमित शाह और हिन्दू आतंकवाद टेप प्रकरण में कुछ सवाल छुपे हैं जो सीधे सरकार की मंशा को स्पष्ट करते हैं | पहला बड़ा सवाल , बम ब्लास्ट के आरोपी दयानंद पण्डे के लेपटॉप से प्राप्त विडिओ मीडिया के पास कैसे पहुंचा जबकि वह लेपटोप तो सरकारी जांच एजेंसियों के पास था  ? दूसरा सवाल , अमित शाह से पूछताछ के पहले 30 हजार पन्नों का चार्जशीट पेश करना क्या सीबीआई की कार्यवाई को पूर्वनियोजित नहीं दर्शाती ? ( यहाँ पर मेरी कोशिश आरोपियों को सही या गलत साबित करने की कोशिश नहीं है , वो तो कानून का काम है| इन सवालों का मकसद सरकार द्वारा अपने हित में गलत समय पर इन मुद्दों को उछालने की साजिश का पर्दाफाश करना है )</p>
<p style="text-align: justify;">खैर , कांग्रेस के यह कोशिश उनके सपनों में ही दम तोड़ गयी | टूटे सपनों से दुखी मनीष तिवारी महंगाई के मुद्दे पर सरकार का बचाव करते हुए एनडीए सरकार में बढाई गयी कीमतों का ब्यौरा देने लग जाते हैं | लेकिन यह कोई बात हुई भला , तुमने बढ़ाई  तो हम भी बढ़ाएंगे !  अरे , तिवारी साहब भारत की जनता ने &#8221; हाथ &#8221; को आम आदमी के साथ मानकर ही तो आपको गद्दी सौंपी थी ! अब जब वही हाथ साथ छोड़ कर अपनी जेबें भरने लग जाए और जनता का गर्दन तक जा पहुंचे तो हंगामा होगा ही ! एक ओर , सरकार महंगाई बढ़ने के लिए वैश्विक परिस्थितियों को जिम्मेदार ठहराती है वहीँ दूसरी ओर सरकार की लापरवाही से लाखों टन अनाज सड़ रहे हैं ! लोग भूखों मर रहे हैं लेकिन सरकार ३ रूपये किलो पर अनाज बाँटने का ढोंग रचा रही है सपने दिखा रही है, उन आँखों को जिन्हें सिर्फ रोटी दिखाई देती है |</p>
<p style="text-align: justify;">बहरहाल , संसद में मुंह की खा रही कांग्रेस को बचाने के लिए लोकतंत्र का जर्जर खंभा मीडिया भी प्रयासरत है तभी तो महंगाई के मुद्दे के बीच-बीच में गुजरात , मोदी ,अमित शाह और सी बी आई के शिगूफा छेड़ना नहीं भूलती | दर्शकों में भ्रम पैदा करने का और उनका ध्यान महंगाई से हटा कर अल्पसंख्यक-बहुसंख्यक , सांप्रदायिक , दंगे  , फर्जी मुठभेड़  आदि की ओर मोड़ने का प्रयास भी किया जा रहा है | मीडिया का क्या कहें साहब , अभी -अभी संसद हंगामा और महंगाई के मुद्दे पर चल रही चर्चा में आईबीएन -७ पर आशुतोष वामपंथी नेता मोहम्मद सलीम से एक ही सवाल बार-बार पूछे जा रहे थे कि इस मुद्दे पर &#8221; भाजपा &#8221; के साथ खड़े रहेंगे ? वाह भाई वाह ! क्या पत्रकारीय दायित्व निभा रहे हैं साहब ! वैसे आशुतोष को जवाब भी खूब मिला ! मोहम्मद सलीम ने कहा -&#8221; हम भाजपा के साथ इसलिए खड़े हैं क्योंकि हम जनता के साथ हैं और महंगाई के विरोध में हैं &#8221; | लेकिन मुख्यधारा की मीडिया सरकार के साथ है और सत्ता की दलाली इनका कर्तव्य है !</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: center;"><strong>ये लेखनी कैसी कि जिसकी बिक गयी है आज स्याही ,</strong></p>
<p style="text-align: center;"><strong>ये कलम कैसा कि जो देता दलालों की गवाही !</strong></p>
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		<title>लोकतंत्र से आगे बौद्धिक लोकतंत्र – 23</title>
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		<pubDate>Fri, 16 Jul 2010 05:30:28 +0000</pubDate>
		<dc:creator>देवसूफी राम बंसल</dc:creator>
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		<description><![CDATA[शासन और व्यवस्था का अंतराल भारत में बौद्धिक जनतंत्र की स्थापना की दिशा में कदम रखने से पूर्व हम अपने बौद्धिक साथियों को शासन और व्यवस्था के शब्द जाल से परिचित करना चाहेंगे. बहुधा शासन-व्यवस्था शब्द-समूह का उपयोग सहज भाव ]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><strong>शासन और व्यवस्था का अंतराल<img class="aligncenter size-medium wp-image-4628" title="exploitation" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2010/07/exploitation-300x252.jpg" alt="" width="300" height="252" /></strong></p>
<p style="text-align: justify;">भारत में बौद्धिक जनतंत्र की स्थापना की दिशा में कदम रखने से पूर्व हम अपने बौद्धिक साथियों को शासन और व्यवस्था के शब्द जाल से परिचित करना चाहेंगे. बहुधा शासन-व्यवस्था शब्द-समूह का उपयोग सहज भाव से कर लिया जाता है किन्तु इस शब्द समूह में एक छल समाहित है. वस्तुतः शासन और व्यवस्था दो प्रथक विषय हैं और दोनों का कोई परस्पर सम्बन्ध नहीं है. शासन शोषण का पर्याय है जहां समाज को शासक और शासित वर्गों में विभाजित रखा जाता है. यह मानवता को सामंती युग की देन है और भारत में अभी-भी प्रचलित है. इस में अल्पसंख्यक शासक वर्ग अपने छल-बल से बहुसंख्यक शासित वर्ग का निरंतर शोषण करता रहता है ताकि शोषित वर्ग कदापि शोषण का विरोध करने में समर्थ ही न हो सके.</p>
<p style="text-align: justify;">शासक वर्ग कोई उत्पादक कार्य नहीं करता अपितु शासितों द्वारा किये गए उत्पादन का स्वामी बन बैठता है. किन्तु यह स्वामित्व वहीं तक सीमित रखा जाता है जहां तक कि शासित वर्ग जीवित रह सके क्योंकि शासक वर्ग को शासितों की सतत आवश्यकता होती है. भारतीय पांडित्य परंपरा में इसी को दरिद्र नारायण की पूजा कहा जाता है जिसमें दरिद्रों का अस्तित्व आवश्यक होता है.</p>
<p style="text-align: justify;"><img class="alignright size-full wp-image-4629" title="51w71QzF7JL._SL160_" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2010/07/51w71QzF7JL._SL160_.jpg" alt="" width="125" height="160" />संपदा का समुचित वितरण और सभी द्वारा इसका उपभोग किया जाना &#8216;व्यवस्था&#8217; कहलाता है. व्यवस्था में कोई स्वामी नहीं होता किन्तु सभी उत्पादक एवं उपभोक्ता होते हैं. इसमें प्रत्येक व्यक्ति को उसके उपभोग के अनुसार वस्तुएं उपलब्ध कराई जाती हैं. किसी वस्तु का अभाव होने पर सभी के उपभोग में कमी कर दी जाती है, तथा वस्तु की अधिकता होने पर सभी के उपभोग से शेष राशि भावी उपयोग हेतु सार्वजनिक संपदा के रूप में संचित कर दी जाती है. महाभारत पूर्व भारत में देवों द्वारा ऐसी ही व्यवस्था लागू की गयी थी. व्यवस्था में न कोई शासक होता है और न ही कोई शासित. समाज व्यवस्था हेतु कुछ नागरिकों को व्यवस्थापक नियुक्त कर देता है. लगभग २५०० वर्ष पूर्व एथेंस में स्थापित विश्व का प्रथम जनतंत्र ऐसी ही व्यवस्था थी जिसे देमोक्रितु ने प्रतिपादित किया था. शासन के पक्षधर प्लेटो और अरिस्तु इसके घोर विरोधी थे.</p>
<p style="text-align: justify;">आधुनिक स्वतंत्र समाजों में किसी शासन की आवश्यकता न होकर केवल व्यवस्था की आवश्यकता है. बौद्धिक जनतंत्र भी ऐसी ही व्यवस्था का पक्षधर है.</p>
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		<title>सीएम संग पीएम बोले</title>
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		<pubDate>Thu, 15 Jul 2010 18:06:07 +0000</pubDate>
		<dc:creator>त्रिपुरारी कुमार</dc:creator>
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		<description><![CDATA[नक्सली हिंसा से निपटने की ताजा रणनीति के तहत केन्द्र सरकार ने नक्सल प्रभावित राज्यों के सीएम ( मुख्यमंत्रियों) के साथ प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह के साथ एक बैठक आयोजित की। इस बैठक में सभी नक्सल प्रभावित राज्यों के मुख्यमंत्रियों ]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><img class="alignleft size-medium wp-image-4676" title="manmohan singh" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2010/07/manmohan-singh-300x300.jpg" alt="" width="300" height="300" />नक्सली हिंसा से निपटने की ताजा रणनीति के तहत केन्द्र सरकार ने नक्सल प्रभावित राज्यों के सीएम ( मुख्यमंत्रियों) के साथ प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह के साथ एक बैठक आयोजित की। इस बैठक में सभी नक्सल प्रभावित राज्यों के मुख्यमंत्रियों सहित गृह मंत्री पी चिदंबरम ने भी अपने सुझाव को शामिल किया।</p>
<p style="text-align: justify;">प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह की अध्यक्षता में हुई इस बैठक में सात राज्यों के मुख्यमंत्रियों और उनके प्रतिनधियों ने भाग लिया। बैठक में झारखंड का प्रतिनिधित्व प्रदेश  के राज्यपाल और पश्चिम बंगाल का प्रतिनिधित्व प्रान्त के एक वरिष्ठ मंत्री ने किया। सातों नक्सल प्रभावित राज्यों के प्रतिनिधियों को संबोधित करते हुए गृह मंत्री पी चिदंबरम ने कहा कि केन्द्र सरकार झारखंड, छत्तीसगढ़,,उड़ीसा,पश्चिम बंगाल की प्रदेश  सरकारों से आग्रह करेगी ,कि वे नक्सल विरोधी अभियान के लिए एक एकीकृत कमान बनाएं ,और इस कमान के सदस्य के तौर पर सेना के एक सेवानिवृत जनरल की नियुक्ति करें।</p>
<p style="text-align: justify;">साथ ही ये भी कहा कि उग्रवाद से निपटने के लिए इन प्रान्तों को साजो-सामान के सहयोग के तौर पर हेलिकोप्टर भी उपलब्ध कराएगी। केन्द्र सरकार वामपंथी उग्रवाद से प्रभावित प्रान्तों में दो साल की अवधि में 400 थानों की स्थापना ,और उन्हें सषक्त बनाने के लिए 80ः20 के अनुपात के आधार पर धन भी देगी। इस राशि  में प्रति थाने के हिसाब से दो करोड़ रू0 की वित्तीय व्यवस्था देने की बात कही है | जो बैठक आज बुलायी गयी ,ये बहुत पहले ही हो जानी चाहिए थी। क्योंकि नक्सली हिंसा से पिछले पांच सालों में लगभग 10 हजार नागरिकों और जवानों की मौत हो चुकी है।</p>
<p style="text-align: justify;">साल  2005 से मई 2010 के बीच नक्सली हिंसा से कुल 10,268 लोग हतातह हुए।साल  2009 में कुल 2,372,साल  2008 में 1,769और साल 2007 में कुल 1,737 लोग नक्सली हिंसा की वजह से मारे गए।</p>
<p style="text-align: justify;">इसके अलावे नक्सली केवल वर्श 2009 में 362 मोबाइल टावरों सहित कई स्कूल इमारतों और सड़कों को अपना निशाना बना चुके हैं।बिहार -झारखण्ड में तो अपने प्रभुत्व वाले इलाकों में नक्सलियों द्वारा  &#8221; लेवी&#8221; के नाम से विकास के बदले रंगदारी भी वसूली जाती है  | कोई भी ठेकेदार किसी भी तरह का कार्य बगैर इनको रंगदारी दिए पूरा नहीं कर सकता |</p>
<p style="text-align: justify;">फिलवक्त ,इस बैठक का परिणाम तो समय आने के बाद ही पता चलेगा । लेकिन इतना तो तय है ,कि अगर दृढ़ इच्छाशक्ति को अपनाकर राज्य सरकार और केन्द्र सरकार इस अभियान में उतरे ,तो वो दिन दूर नहीं ,जब देश से नक्सलवाद जैसे कोढ़ का सफाया संभव हो सकता है। बस जरूरत है इस ओर ठोस कदम उठाने की।</p>
<p style="text-align: justify;">
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		<title>एकछत्र शासन का घोषणापत्र- 25</title>
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		<pubDate>Thu, 15 Jul 2010 13:56:35 +0000</pubDate>
		<dc:creator>जयदीप शेखर</dc:creator>
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			<content:encoded><![CDATA[<h3>25. देह व्यापार</h3>
<p style="text-align: justify;"><img class="alignright size-medium wp-image-4441" title="India_flag" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2010/07/India_flag6-300x225.jpg" alt="" width="300" height="225" />25.1      देह-व्यापार उन्मूलन की दिशा में पहले से कार्यरत सामाजिक संगठनों को सरकार की ओर से इस कुप्रथा को समाप्त करने के लिये अधिकृत किया जायेगा और उन्हें हर प्रकार की सहायता उपलब्ध करायी जायेगी.</p>
<p style="text-align: justify;">25.2      इस व्यापार से जुड़ी महिलाओं के पुनर्वास के लिये सरकार कुछ विशेष उद्योग (जैसे- सेना, पुलिस, विद्यालय और अन्यान्य सरकारी विभागों के लिये वर्दियों का सिलाई केन्द्र) स्थापित करेगी और इनके बच्चों की शिक्षा-दीक्षा के लिये अलग से आवासीय विद्यालय तथा महाविद्यालय भी स्थापित करेगी. (हालाँकि देश के किसी भी विद्यालय/महाविद्यालय में दाखिला लेने के लिये वे स्वतंत्र होंगे.)</p>
<p style="text-align: justify;">25.3      जो महिलायें अपनी इच्छा से इस पेशे में रहना चाहे, उन्हें बाकायदे पंजीकृत कर (नगरवधू का) पहचानपत्र दिया जायेगा, जिसमें नियमित डॉक्टरी जाँच के ब्यौरे भी दर्ज होंगे.</p>
<p style="text-align: justify;">25.4       नगरवधू के अलावे किसी और के द्वारा देह-व्यापार करना इस देश में अपराध माना जायेगा.</p>
]]></content:encoded>
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		<title>लोकतंत्र से आगे बौद्धिक लोकतंत्र – 22</title>
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		<pubDate>Thu, 15 Jul 2010 06:07:48 +0000</pubDate>
		<dc:creator>देवसूफी राम बंसल</dc:creator>
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		<description><![CDATA[बौद्धिकता प्रतीक एवं परिचय बौद्धिक लोगों के सत्तारोहण हेतु उनका परस्पर समन्वय आवश्यक है, जिसके लिए परस्पर सहमत व्यक्तियों का एक दूसरे से परिचय भी आवश्यक है. ऐसे लोगों का प्रायः अकस्मात् आमना-सामना होता रहता है किन्तु वे एक दूसरे ]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><strong>बौद्धिकता प्रतीक एवं परिचय<img class="aligncenter size-medium wp-image-4624" title="philosophers" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2010/07/philosophers-234x300.jpg" alt="" width="234" height="300" /><br />
</strong></p>
<p style="text-align: justify;">बौद्धिक लोगों के सत्तारोहण हेतु उनका परस्पर समन्वय आवश्यक है, जिसके लिए परस्पर सहमत व्यक्तियों का एक दूसरे से परिचय भी आवश्यक है. ऐसे लोगों का प्रायः अकस्मात् आमना-सामना होता रहता है किन्तु वे एक दूसरे को पहचान नहीं पाते. हमें ऐसे उपाय विकसित एवं प्रचारित करने होंगे जिनसे ऐसे व्यक्ति एक दूसरे को देखते ही पहचान लें.</p>
<p style="text-align: justify;">ऐसे बहुत से औपचारिक संगठन हैं जो अपने सदस्यों से एक विशेष वेशभूषा अथवा कोई अन्य प्रतीक चिन्ह अपनाने का आग्रह करते हैं जिसके माध्यम से वे एक दूसरे को पहचान सकें. किन्तु बौद्धिक लोगों का अभी कोई संगठन नहीं है और न ही इसकी तुरंत आवश्यकता है. वास्तव में किसी औपचारिक संगठन की तभी आवश्यकता होती है जब उसके सदस्यों की संख्या को औपचारिक संगठन व्यवस्था की आवश्यकता अनुभव होने लगे. प्रायः कुछ स्वयंभू व्यक्ति अपने संगठन बनाते हैं, और स्वयं उसके पदाधिकारी बन बैठते हैं. इसके बाद वे अन्य लोगों से आग्रह करते हैं कि वे उनके संगठन में प्रवेश कर उनके अनुयायी बनें. ऐसे संगठन प्रायः असफल होते देखे गए हैं. हम बौद्धिक लोगों के संगठन की प्रक्रिया सदस्यता से आरम्भ करना चाहते हैं और उनकी संख्या पर्याप्त हो जाने के बाद ही उन सभी के सम्मलेन में संगठन के पदाधिकारियों का चुनाव किया जाना उचित मानते हैं.</p>
<p style="text-align: justify;">आरम्भ में जो आवश्यकता है, वह है किसी ऐसे प्रतीक की जो विचारधारा से सहमत सभी व्यक्ति धारण करें ताकि उनका परस्पर सामना होने पर वे एक दूसरे से परिचय कर सकें. यह प्रतीक किसी विशेष रंग का कोई वस्त्र हो सकता है, कोई लोकेट हो सकता है, अथवा अभिवादन की कोई विशेष शैली हो सकती है. इनमें से सर्वसुलभ और सर्वसुलभ एक छोटा विशेष रंग का वस्त्र हो सकता है जिसे सहमत व्यक्ति अपने गले की टाई के रूप में, रूमाल के रूप में, सिर पर टोपी के रूप में, अथवा गले के स्कार्फ के रूप में धारण करें. इस वस्त्र का रंग हम अपनी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि से प्राप्त कर सकते हैं.</p>
<p style="text-align: justify;">भारत के देव और ग्रीस के फिलोस्फर विश्व इतिहास के सर्वाधिक बुद्धिमान व्यक्ति रहे हैं, और वे सभी गहरे लाल-नारंगी रंग का उत्तरीय वस्त्र धारण करते थे. इसी रंग को अपनाना हमारे लिए भी उपयुक्त है.  इसी के माध्यम से हम एक दूसरे से वैचारिक निकटता को व्यक्त करते हुए भौतिक निकटता स्थापित कर सकते हैं</p>
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		<title>एकछत्र शासन का घोषणापत्र- 24</title>
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		<pubDate>Wed, 14 Jul 2010 13:52:16 +0000</pubDate>
		<dc:creator>जयदीप शेखर</dc:creator>
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		<description><![CDATA[24 जनसंख्या नियंत्रण सह महिला सशक्तिकरण 24.1      जनसंख्या वृद्धि के लिये जो सामाजिक तबके और भौगोलिक क्षेत्र मुख्य रुप से जिम्मेवार हैं, उन तबकों तथा क्षेत्रों को प्राथमिकता देते हुए बिना किसी शैक्षणिक योग्यता के बन्धन के 16 से 20 ]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<h3>24 जनसंख्या नियंत्रण सह महिला सशक्तिकरण</h3>
<p><img class="alignright size-medium wp-image-4442" title="India_flag" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2010/07/India_flag7-300x225.jpg" alt="" width="300" height="225" />24.1      जनसंख्या वृद्धि के लिये जो सामाजिक तबके और भौगोलिक क्षेत्र मुख्य रुप से जिम्मेवार हैं, उन तबकों तथा क्षेत्रों को प्राथमिकता देते हुए बिना किसी शैक्षणिक योग्यता के बन्धन के 16 से 20 वर्ष तक की अविवाहित महिलाओं को भर्ती करते हुए एक सम्पूर्ण महिला सैन्य टुकड़ी का गठन किया जायेगा. (इसे शक्ती सेना कह सकते हैं.)</p>
<p>24.2      इस सैन्य टुकड़ी में महिलाओं को 28 वर्ष की उम्र में नौकरी छोड़ने की विशेष छूट होगी, ताकि वे विवाह कर सामान्य गृहस्थ जीवन बिता सकें. (नौकरी न छोड़ने वाली महिलाओं को भी 28 वर्ष की उम्र के बाद ही विवाह की अनुमति दी जायेगी.)</p>
<p>24.3      नौकरी छोड़ते समय जितने वर्षों की सेवा किसी महिला ने की होगी, उतने ही वर्षों का अतिरिक्त वेतन उन्हें एकमुश्त धनराशी के रुप में दिया जायेगा.</p>
<p>24.4      इस सैन्य टुकड़ी के जिम्मे सेना के वे काम होंगे, जिन्हें सीमा से दूर रहकर भी अंजाम दिया जा सकता है (जैसे- सेना डाकघर); यहाँ महिला सैनिकों के लिये सामान्य शिक्षा-दीक्षा की भी व्यवस्था होगी.</p>
<p>24.5      अन्यान्य सरकारी नौकरियों में भी महिलाओं को 28 वर्ष की उम्र में नौकरी छोड़ने, एकमुश्त धनराशी (जितने वर्षों की सेवा उन्होंने की है, उतने ही वर्षों के वेतन के बराबर) प्राप्त करने की छूट होगी; साथ ही, नौकरी न छोड़ने की दशा में विवाह करने की अनुमति उन्हें 28 की उम्र के बाद ही प्रदान की जायेगी.</p>
<p>24.6      शक्ती सेना या नागरिक सरकारी सेवा की जो महिला 28 की उम्र से पहले विवाह कर लेती है, उन्हें भी 28 वर्ष की उम्र में नौकरी छोड़ते समय एकमुश्त धनराशि का लाभ दिया जायेगा- बशर्ते कि वे तब तक माँ नहीं बनी हों.</p>
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		<title>एकछत्र शासन का घोषणापत्र- 23</title>
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		<pubDate>Mon, 12 Jul 2010 13:47:23 +0000</pubDate>
		<dc:creator>जयदीप शेखर</dc:creator>
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		<description><![CDATA[23.स्वास्थ्य 23.1          ‘जन स्वच्छता’ (नाली, शौचालाय, स्नानागार इत्यादि) की जिम्मेवारी ग्राम पंचायतों, नगर/महानगर पालिकाओं को सौंपी जायेगी. 23.2          ‘जन स्वास्थ्य’ (टीकाकरण, मलेरिया की दवा का वितरण इत्यादि) की जिम्मेवारी राज्य सरकारों की होगी. (हालाँकि जरुरत पड़ने पर राष्ट्रीय सरकार मदद ]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<h3 style="text-align: justify;">23.स्वास्थ्य</h3>
<p style="text-align: justify;"><img class="alignright size-medium wp-image-4440" title="India_flag" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2010/07/India_flag5-300x225.jpg" alt="" width="300" height="225" />23.1          ‘जन स्वच्छता’ (नाली, शौचालाय, स्नानागार इत्यादि) की जिम्मेवारी ग्राम पंचायतों, नगर/महानगर पालिकाओं को सौंपी जायेगी.</p>
<p style="text-align: justify;">23.2          ‘जन स्वास्थ्य’ (टीकाकरण, मलेरिया की दवा का वितरण इत्यादि) की जिम्मेवारी राज्य सरकारों की होगी. (हालाँकि जरुरत पड़ने पर राष्ट्रीय सरकार मदद करेगी.)</p>
<p style="text-align: justify;">23.3          ‘जन चिकित्सा’ (बड़े ईलाज, ऑपरेशन इत्यादि) की जिम्मेवारी राष्ट्रीय सरकार उठायेगी. (राज्य सरकार चाहे, तो अपनी समांतर चिकित्सा व्यवस्था कायम कर सकती है.)</p>
<p style="text-align: justify;">23.4          जन चिकित्सा के अंतर्गत पंचायत/वार्ड स्तर पर &#8216;चिकित्सालय&#8217;, प्रखण्ड/नगर/उपमहानगर स्तर पर &#8216;अस्पताल&#8217; और जिला/महानगर स्तर पर &#8216;बड़े अस्पताल&#8217; स्थापित किये जायेंगे.</p>
<p style="text-align: justify;">23.5          इन चिकित्सालय और अस्पतालों में निम्न आयवर्ग के मरीजों से ईलाज का 5 प्रतिशत, मध्यम आयवर्ग वालों से 50 प्रतिशत और उच्च आयवर्ग वाले मरीजों से ईलाज का शत-प्रतिशत शुल्क वसूला जायेगा. (आयवर्ग की व्याख्या- क्रमांक 9.1)</p>
<p style="text-align: justify;">23.6          इन चिकित्सालय और अस्पतालों में आयुर्वेद, होम्योपैथ तथा अन्य चिकित्सा पद्धतियों के भी विभाग होंगे.</p>
<p style="text-align: justify;">23.7          योगासन, प्राकृतिक चिकित्सा, एक्यूप्रेशर- जैसी प्राकृतिक, सुरक्षित और सस्ती विधाओं से लोगों का ईलाज करने की जिम्मेवारी स्वयंसेवी संस्थाओं को सौंपी जायेगी- सरकार इन्हें पंजीकृत कर नियमित अनुदान देगी.</p>
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