Post Tagged with: "संस्कृति"

व्हाट इज इंडिया ?

व्हाट इज इंडिया ?

0 जनोक्ति डेस्क / 2011/10/01 12:14 pm

प्रियंका शर्मा ‘व्हाट इज  इंडिया’  (भारत के मूल परिचय) के नाम से विख्यात सलिल ज्ञवाली की पुस्तक, जो भारतीय सोच और व्यापकता से प्रेरित शीर्ष वैज्ञानिकों, दार्शनिकों, और संतों के

राष्ट्रवाद पर हावी राजनीति

राष्ट्रवाद पर हावी राजनीति

1 जनोक्ति डेस्क / 2010/11/12 5:54 pm

भरतचंद्र नायक संस्कृति समाज को ऐक्य भाव से जोड़ती है। वहीं राजनीति समाज के बीच अलगाववाद के बीज बोती है। जब-जब देश ने सांस्कृतिक एकता के तंतुओं को कमजोर किया

आप कैसे युवा हैं ?

आप कैसे युवा हैं ?

1 शंकर दत्त फुलारा / 2010/10/10 5:09 am

(जिन्हें भारत एक गड़रियों का देश था पढ़ाया गया है जिन्हें ये पढाया गया है कि हिन्दू धर्म ग्रंथों में केवल कहानिया हैं और कुछ नहीं, कैसे युवा हैं आप

राष्ट्रीय अस्मिता की अभिव्यक्ति है श्रीराम जन्मभूमि आन्दोलन

राष्ट्रीय अस्मिता की अभिव्यक्ति है श्रीराम जन्मभूमि आन्दोलन

2 पवन कुमार अरविंद / 2010/09/13 6:40 pm

:- विनायकराव देशपाण्डे श्रीराम जन्मभूमि आन्दोलन केवल हिन्दू मुस्लिम संघर्ष नहीं, मंदिर-मस्जिद विवाद नहीं यह राष्ट्रीयता बनाम अराष्ट्रीय का संघर्ष है। राष्ट्र माने केवल भूभाग, जमीन का टुकड़ा नहीं वरन्

विकास के विचार में शामिल हुआ सुख

विकास के विचार में शामिल हुआ सुख

0 amita neerav / 2010/08/10 9:56 am

उस दिन नए थिंकर पढ़ाए जाने वाले थे, जर्मी बैंथम। पहले दिन तो विद्यार्थियों की उपस्थिति ठीक ही रहती है। उस दिन भी अच्छी भीड़ थी। बैंथम का प्रारंभिक परिचय

क्या सोचेंगे तिलक जी

क्या सोचेंगे तिलक जी

0 नितिन देसाई / 2010/08/08 4:35 pm

“स्वतंत्रता हमारा जन्म सिद्धअधिकारहै.”उक्तवाक्यांश लोकमान्यबाल गंगाधर तिलक जी द्वारा कहे गए थे.अगस्त की पहली तारीख को उनकी नब्बेवी पुण्यतिथि थी. जिनका स्मरण विभिन्न समाचार पत्रों द्वाराकिया गया है,परन्तु मुझे ऐसा लगता है की वो भी शायद मित्रता दिवस की आंधी में उड़ गया. तिलक जी को स्वर्ग में बैठे- बैठे आत्मग्लानी हो रही होगी जब उन्होंने देखा होगा की उनके वाक्यांशों का आज अक्षरशः पालन किया जा रहा है, वो भी उनकी कर्मभूमि पुणे नगरी में जहाँ

दुनिया का महानाटक

दुनिया का महानाटक

1 जनोक्ति डेस्क / 2010/07/01 9:10 am

जैसे कोई ड्रामा है, वैसे ही यह भी ड्रामा है, लेकिन वे हद के ड्रामा होते हैं और यह तुम्हारा ५००० वर्षों का बेहद का ड्रामा है|” [शिवबाबा] सन १९३६-३७,

आधुनिकता बनाम पौराणिकता

आधुनिकता बनाम पौराणिकता

2 शंकर दत्त फुलारा / 2010/05/26 10:55 am

आज वैज्ञानिक जो भी शोध कर रहे हैं और उसके निष्कर्षों पर पहुँच रहे हैं, ‘वह सब हमारे पौराणिक शास्त्रों में पहले से ही वर्णित है’। पर; क्योंकि आज आसुरी

प्लीज़ , उसे मेरा बाप मत कहो….

प्लीज़ , उसे मेरा बाप मत कहो….

3 पूजा सिंह आदर्श / 2010/05/21 1:52 pm

उसे मेरा बाप मत कहो,वो हैवान है ,वो पापा कहलाने के लायक नहीं है ,उसने मुझे,अपनी बेटी को अपनी हवस का शिकार बनाना चाहा,अपनी इज्ज़त बचाने के लिए मेरे पास

अतिथियों का बलात्कार !

अतिथियों का बलात्कार !

0 अनिकेत प्रियदर्शी / 2010/04/19 9:33 am

भारत हमारी संपूर्ण (मानव) जाति की जननी है तथा संस्कृत यूरोप के सभी भाषाओं की जननी है : भारतमाता हमारे दर्शनशास्त्र की जननी है , अरबॊं के रास्ते हमारे अधिकांश