जनगणना और जाति की जटिलताएं
0लेखक : - श्रीकांत ‘कहत भिखारी नाइ, कवन करी उपाई । मुंहवा के तोहरे दुलरवा हो बबुआ, कुतुबपुर हउवे ग्राम ,रामजी संवार काम , जाति के हजाम जिला छपरा हो बबुआ
” भारत की जनगणना 2011 ” काफी चर्चा में है | जाती के आधार को लेकर राजनीतिक बबाल मचा हुआ है जबकि अभी तक कोई निश्चित फैसला सरकार की ओर
जातिगत जनगणना के बहाने इन दिनों जाति पर ही बहस छिड़ी है। अच्छी बात है। पर विरोध हो रहा है सिर्फ जातिगत जनगणना को लेकर। धरना प्रदर्शन हो रहे हैं,
फूलवा को यकीन नहीं हो रहा था, जब उसे पंचायत के गांव में सरकारी योजना मिड-डे-मील के लिए बच्चों का खाना बनाने वाले रसोईये के तौर पर सरकारी मुलाजिम बनाया
लेखक : - श्रीकांत ‘कहत भिखारी नाइ, कवन करी उपाई । मुंहवा के तोहरे दुलरवा हो बबुआ, कुतुबपुर हउवे ग्राम ,रामजी संवार काम , जाति के हजाम जिला छपरा हो बबुआ
आज के समय मे जाति की बात को हम भारतीयों से अलग कर के नही रखा जा सकता है । भारत में जाति आधारित जनगणना इस समय चर्चा में है।
सर्वप्रथम हमें यह समझना होगा कि हमारे देश के विभाजन के समय हमारे तत्कालीन नेतृत्व ने सभी धर्मावलम्बियों तथा आदिवासियों एवं दलितों को आश्वस्त किया था कि वे भारत में
जनगणना से जात हटाओ के नारे के साथ कुछ तथाकथित बिना जात के लोगों ने उपवास और धरना दिया है। चलिये, इस जनत्रंत में सबको कुछ भी कहने-करने की आजादी