Post Tagged with: "वर्ग संघर्ष"

जमी है महफिल…

0 शारदा मोंगा / 2011/05/02 8:20 pm

जमी है महफिल शेरों की, शेरों  से डर लगता है, बड़े बड़े घाघों के डर से,  भगने को मन करता है. कभी सामना  किया  न हमने, पर हिम्मत जुटाई  है, इसही लिए लिखने को हमे अपनी कलम उठाई

माओवाद की राजधानी ‘मनातू’ जहाँ सांसद भी जाने से डरते हैं |

माओवाद की राजधानी ‘मनातू’ जहाँ सांसद भी जाने से डरते हैं |

2 जयराम "विप्लव" / 2011/02/05 4:52 pm

जनोक्ति की टीम झारखण्ड में माओवाद की जमीन तलाशने के लिए राजधानी रांची से होते हुए पलामू ( डाल्टेनगंज ) पहुंची | पलामू की जमीन पर कदम रखने से पहले

बिनायक सेन,नक्सलवाद और पिछड़ेपन की वजह

बिनायक सेन,नक्सलवाद और पिछड़ेपन की वजह

2 जयराम "विप्लव" / 2011/01/23 2:07 am

भाकपा (माओवादी) हिंसा में विश्वास रखने वाले तथाकथित कम्युनिस्टों का एक संगठन है जिन्होंने बंगाल के नक्सलबाड़ी गांव से 1967 में सशस्त्र क्रांतिकारी गतिविधियों का रास्ता अपनाया | आज भारत

नक्सलियों के आय के प्रमुख स्रोत

नक्सलियों के आय के प्रमुख स्रोत

1 त्रिपुरारी कुमार / 2010/11/10 6:46 pm

निशा दास की रिपोर्ट रांची से झारखंड में नक्सल समस्या एक जटिल समस्या बनी हुई है। लंबे समय से इस जंजाल से निकलने का यहां के राजनेताओं के साथ -साथ नौकरशाहों

बिहार चुनाव में नक्सली भी आजमाएंगे अपनी किस्मत

बिहार चुनाव में नक्सली भी आजमाएंगे अपनी किस्मत

0 जनोक्ति डेस्क / 2010/09/26 12:34 pm

बिहार विधानसभा चुनाव को शांति से संपन्न कराने के लिए एक ओर चुनाव आयोग और राज्य सरकार अपनी तैयारियों में जुटा है वहीं दूसरी ओर राज्य विरोधी नक्सली भी चुनाव

जाति आधारित जनगणना पर कुछ विचार

जाति आधारित जनगणना पर कुछ विचार

5 दीपाली पाण्डेय / 2010/08/20 9:58 pm

जाति आधारित जनगणना को लेकर बुद्धिजीवी वर्ग भले ही दो भागों में बंट गया हो लेकिन हमारे नेता लगभग एकजुट ही हैं | और मंत्रिमंडल की हरी झंडी भी मिल

जनगणना और जाति का विषय

जनगणना और जाति का विषय

0 विजय कुमार / 2010/08/17 6:59 pm

हर दस साल बाद होने वाली जनगणना का कुछ अंश पूरा हो चुका है, जबकि मुख्य काम (संदर्भ बिन्दु) नौ से 28 फरवरी, 2011 तक होगा। इससे संबंधित दो विषय

बुद्धिजीवियों से एक सवाल

बुद्धिजीवियों से एक सवाल

0 डा ० पुरुषोत्तम मीणा / 2010/08/12 11:27 pm

इस देश में जाति के आधार पर जनगणना करने और नहीं करने पर काफी समय से बहस चल रही है। अनेक विद्वान लेखकों ने जाति के आधार पर जनगणना करवाने

किसी देश में क्या ऐसी भी आजादी होती है!

किसी देश में क्या ऐसी भी आजादी होती है!

0 राजेश त्रिपाठी / 2010/08/12 11:54 am

हजारों लाखों बलिदानी शहीदों की कुरबानियों ने हमें परतंत्रता की बेड़ियों से मुक्त कर स्वच्छंद वातावरण में सांस लेने की आजादी दी। बरसों की गुलामी के बाद हमने आजादी पायी।

अब युद्ध छेड़ना होगा

अब युद्ध छेड़ना होगा

0 विजय कुमार / 2010/08/10 11:02 pm

” संघर्ष, मुठभेड़ और युद्ध “ सामान्य रूप से ये तीनों शब्द लगभग एक से लगते हैं; पर इनमें बड़ा अंतर है। ये अलग-अलग संदर्भ में प्रयोग होते हैं और इसीलिए