लोकतंत्र से आगे बौद्धिक लोकतंत्र – 7
0न्याय तीसरी प्राथमिकता बौद्धिक लोकतंत्र की तीसरी प्राथमिकता सभी को निःशुल्क त्वरित न्यायप्रदान करना है जो स्वस्थ एवं शिक्षित नागरिकों के सुखी जीवन के लिए अनिवार्य है. स्वतंत्र भारत के के
‘अयोध्या में मंदिर वहीं, मस्जिद नहीं, बाबरी ढांचा कहीं नहीं।’ ठीक है, ठीक है, इस देश के बहुसंख्यक लोग भी यही चाहते हैं कि राम-मंदिर बने लेकिन साहब किस-किस को
बिहार में विधान सभा चुनाव की घोषणा हो गई है। इसे देख कर कुछ दिनों से बिहार में हर दिन राजनीति में कुछ-न-कुछ हो रहा है। वोट की राजनीति करने
कृषि खेती और वानिकी के माध्यम से खाद्य पदार्थों के उत्पादन से सम्बंधित है.मानव सभ्यता के इतिहास में कृषि की खोज को इतना महत्वपूर्ण माना जाता है कि इसे नवपाषाणकालीन क्रांति
न्याय तीसरी प्राथमिकता बौद्धिक लोकतंत्र की तीसरी प्राथमिकता सभी को निःशुल्क त्वरित न्यायप्रदान करना है जो स्वस्थ एवं शिक्षित नागरिकों के सुखी जीवन के लिए अनिवार्य है. स्वतंत्र भारत के के
शिक्षा दूसरी प्राथमिकता बौद्धिक लोकतंत्र जन-शिक्षा को जन-स्वास्थ के बाद सर्वाधिक महत्वपूर्ण मानता है, और इसके लिए समुचित व्यवस्था करता है. इन व्यवस्थाओं के पीछे लक्ष्य है – सभी को निह्शुक
स्वास्थ पहली प्राथमिकता प्रत्येक प्राणी के लिए स्वास्थ सर्वोपरि होता है और यह स्वस्थ समाज के निर्माण के लिए भी एक अनिवार्यता है. चूंकि बौद्धिक जनतंत्र स्वस्थ समाज के लिए लक्ष्यित
भूमि प्रबंधन उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार मनुष्य जाति भूमि का केवल ३ प्रतिशत भाग बस्तियों के लिए उपयोग करती है, इस पर भी विश्व में लगभग ३० प्रतिशत जनसँख्या घरविहीन
मताधिकार बौद्धिक जनतंत्र सभी वयस्क नागरिकों को एक समान मताधिकार नहीं देता अपितु यह अधिकार नागरिकों की शैक्षिक योग्यता एवं अनुभव पर निर्भर करता है. इस विषय में सर्व प्रथम
बौद्धिक जनतंत्र में राज्यकर्मी जनता के सच्चे सेवक बना दिए जाते हैं – उनपर नियंत्रण से. इसके लिए विविध प्रावधान निम्नांकित हैं – १. मताधिकार राज्यकर्मी शासन-प्रशासन का अभिन्न अंग
पाठक बंधुओं , भारतीय लोकतंत्र की वर्तमान दशा -दिशा को देखते हुए भविष्य को लेकर जनोक्ति.कॉम पर इस कॉलम के माध्यम से ” लोकतंत्र से आगे बौद्धिक लोकतंत्र “ नाम से
प्रमुख अवधारणायें : – बौद्धिक लोकतंत्र अर्थात जनतंत्र में बौद्धिक तत्वों का समावेश जिसका अर्थ है शासन में बुद्धिमान लोगों का वर्चस्व जिससे कि शासन और प्रशासन में कौशल दिखाई
लगभग २,००० वर्षों से गुलामी की जंजीरों से जकड़ा भारत और इसके लोग आज बहुत बुरी दशा में हैं – शारीरिक और मानसिक दोनों दृष्टियों से. १९४७ में बलिदानों, सत्य