लोकमुद्दों के बिल में आरक्षण की राजनीति
142 वर्षीय प्रौढ़ लोकपाल अब सख्त लोकपाल बनने के मूड में अंततः आ ही गया है। इस उम्र में कुछ अड़ियलपन भीआ जाता है जो सभी देख भी रहे है
सिद्धार्थ शर्मा करीब पांच दशकों में नौवीं बार लोकपाल विधेयक संसद में पेश है | १९६८ से अबतक लोकपाल की अतीव आवश्यकता के बावजूद संसद में इसका aपारित नहीं होना
मित्रों,जब हम बचपने में थे तब हमारे घर के बड़े-बुजुर्ग हमें अक्सर गाँव के तालाब में नहाने से रोका करते थे.चूंकि मारने-डांटने का प्रभाव बच्चों के मन-मस्तिष्क पर बहुत ही
जान की कीमत लगा दी गई है, मात्र 27 रुपये, इससे सस्ती कीमत पर आपको जान इस महंगाई के युग में कही नहीं मिलेगी. यहाँ इस जूनून के बाज़ार में जान
42 वर्षीय प्रौढ़ लोकपाल अब सख्त लोकपाल बनने के मूड में अंततः आ ही गया है। इस उम्र में कुछ अड़ियलपन भीआ जाता है जो सभी देख भी रहे है
सिद्धार्थ शर्मा करीब पांच दशकों में नौवीं बार लोकपाल विधेयक संसद में पेश है | १९६८ से अबतक लोकपाल की अतीव आवश्यकता के बावजूद संसद में इसका aपारित नहीं होना
मित्रों,जब हम बचपने में थे तब हमारे घर के बड़े-बुजुर्ग हमें अक्सर गाँव के तालाब में नहाने से रोका करते थे.चूंकि मारने-डांटने का प्रभाव बच्चों के मन-मस्तिष्क पर बहुत ही
जान की कीमत लगा दी गई है, मात्र 27 रुपये, इससे सस्ती कीमत पर आपको जान इस महंगाई के युग में कही नहीं मिलेगी. यहाँ इस जूनून के बाज़ार में जान
भारतीय लोकतंत्र एक बड़े संक्रमणकाल से होकर गुजर है | एक ओर अरब देशों की जनता में तानाशाही को उखाड़ लोकतंत्र को बहाल करने की जिद है तो वहीँ भारतवर्ष
भारत सेन लोकतंत्र का चौथा स्तंभ होने के बावजूद समाचार पत्र और विधिक पत्रकारिता को नियंत्रित करने वाले कानून की श्रेणी में न्यायालय अवमानना कानून समझा जाता रहा है। विधि
भाकपा (माओवादी) हिंसा में विश्वास रखने वाले तथाकथित कम्युनिस्टों का एक संगठन है जिन्होंने बंगाल के नक्सलबाड़ी गांव से 1967 में सशस्त्र क्रांतिकारी गतिविधियों का रास्ता अपनाया | आज भारत
आज हमारे लिये सबसे जरूरी और महत्वपूर्ण है कि देश या समाज के लिये न सही, कम से कम अपने आपके और अपनी आने वाली पीढियों के सुखद एवं सुरक्षित
दीपावली का उल्लेख हो और दीपों की बात न हो, ये संभव नहीं है। अमावस की रात में आने वाली दीपावली को ये छोटे-छोटे दीप ही रोशन करते हैं और हमें प्रेरणा देते हैं कि जिस तरह एक छोटा-सा दीपक अँधेरे को दूर कर देता है, उसी तरह हमारा एक छोटा प्रयास भी एक दिन कोई बड़ा परिवर्तन ला सकता है। बस! मन में उत्साह और अपने संकल्प की पूर्ति के लिये लगन होनी चाहिये। दीपावली के इस अवसर पर दीपों की बात निकली, तो मुझे चाणक्य के जीवन का एक प्रसंग आ रहा है।
श्याम नारायण रंगा ’अभिमन्यु भारत एक लोकतांत्रिक देश है। विश्व के सबसे बडे इस लोकतंत्र मे तंत्र का निर्माण लोक द्वारा किया जाता है और जनता का जनता के द्वारा