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	<title>JANOKTI : जनोक्ति :  राज-समाज और जन की आवाज &#187; मीडिया</title>
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		<title>राजनीति की भेंट चढ़ गया लोकपाल विधेयक</title>
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		<pubDate>Thu, 05 Jan 2012 16:08:33 +0000</pubDate>
		<dc:creator>तेजवानी गिरिधर</dc:creator>
				<category><![CDATA[राष्ट्रीय]]></category>
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		<description><![CDATA[हर बार किसी न किसी कारण से पारित होने से रुका लोकपाल विधेयक इस बार देशभर में कथित रूप से उठे बड़े जनआंदोलन के बावजूद राजनीति की भेंट चढ़ गया। राजनीतिज्ञों ने तो राजनीति की ही, एक पवित्र उद्देश्य के ]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<h3 style="text-align: justify;"><a href="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2012/01/17-anna-hazare-202.jpg"><img class="alignleft size-full wp-image-25404" title="17-anna-hazare-202" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2012/01/17-anna-hazare-202.jpg" alt="लोकपाल विधेयक"width="200" height="150" /></a>हर बार किसी न किसी कारण से पारित होने से रुका लोकपाल विधेयक इस बार देशभर में कथित रूप से उठे बड़े जनआंदोलन के बावजूद राजनीति की भेंट चढ़ गया। राजनीतिज्ञों ने तो राजनीति की ही, एक पवित्र उद्देश्य के लिए आवाज उठाने के बाद राजनीति के दलदल में फंसी टीम अन्ना भी पटरी से उतर गई। असल में लोकपाल के लिए दबाव बनाने की जिम्मेदारी का निर्वाह कर पाने में जब प्रमुख विपक्षी दल भाजपा विफल हुआ तो इसकी जिम्मेदारी टीम अन्ना ने ली और आमजन में भी आशा की किरण जागी, मगर वह भी अपने आंदोलन को निष्पक्ष नहीं रख पाई और  सरकार पर दबाव बनाने की निष्पक्ष पहल के नाम पर सीधे कांग्रेस पर ही हमला बोलने लगी। पर्दे के पीछे से संघ और भाजपा से सहयोग लेने के कारण पूरा आंदोलन राजनीतिक हो गया। ऐसे में जाहिर तौर पर कांग्रेस सहित सभी दलों ने खुल कर राजनीति की और लोकपाल विधेयक लोकसभा में पारित होने के बाद राज्यसभा में अटक गया।<br />
भले ही गांधीवादी विचारधारा के कहे जाने वाले अन्ना को देश का दूसरा गांधी कहने पर विवाद हो, मगर यह सच है कि पहली बार पूरा देश व्यवस्था परिवर्तन के साथ खड़ा दिखाई दिया। दुनिया के अन्य देशों में हुई क्रांति से तुलना करते हुए लोगों को लग रहा था कि हम भी सुधार की दिशा में बढ़ रहे हैं। मीडिया की ओर से मसीहा बनाए गए अन्ना में लोगों ने अपूर्व विश्वास जताया, मगर उनकी टीम को लेकर उठे विवादों से आंदोलन की दिशा बदलने लगी। जाहिर तौर पर सत्तारूढ़ दल कांग्रेस पर सीधे हमलों की वजह से प्रतिक्रिया में विवाद खड़े किए जाने लगे, मगर टीम अन्ना के लोग उससे विचलित हो गए और उन्होंने सीधे कांग्रेस पर हमले तेज कर दिए। देश हित की खातिर चल रहा आंदोलन कांग्रेस बनाम टीम अन्ना हो गया। इसके लिए जाहिर तौर पर दोनों ही जिम्मेदार थे। रहा सवाल भाजपा व अन्य दलों का, तो उन्हें मजा आ गया। वे इस बात खुश थे कि कांगे्रस की हालत पतली हो रही है और इसका फायदा उन्हें आगामी विधानसभा और लोकसभा चुनावों में मिलेगा। आंदोलन के राजनीतिक होने के साथ ही उनकी दिलचस्पी इसमें नहीं थी कि एक सशक्त लोकपाल  कायम हो जाए, बल्कि वे इसमें ज्यादा रुचि लेने लगे कि कैसे कांग्रेस को और घेरा जाए। रही सही कसर टीम अन्ना ने हिसार के उप चुनाव में खुल कर कांग्रेस का विरोध करके पूरी कर दी। वे मौखिक तौर पर तो यही कहते रहे कि उनकी किसी दल विशेष से कोई दुश्मनी नहीं है, मगर धरातल पर कांग्रेस से सीधे टकराव मोल लेने लगे। यहां तक कि अन्ना ने आगामी विधानसभा चुनावों में कांग्रेस को हराने का ऐलान कर दिया। खुद को राजनीति से सर्वथा दूर बताने वाली टीम अन्ना ने, जो कि पहले राजनेताओं से दूरी कायम रख रही थी, बाद में अपने मंच पर ही राजनीतिक दलों को बहस करने का न्यौता दे दिया। स्वाभाविक रूप से उनके मंच पर कांग्रेस नहीं गई, लेकिन अन्य दलों ने जा कर टीम अन्ना के  लिए अपनी प्रतिबद्धता को जाहिर किया। यद्यपि इससे अन्ना का आंदोलन पूरी तरह से राजनीतिक हो गया, मगर इससे यह उम्मीद जगी कि अब सत्तारूढ़ दल और दबाव में आएगा और इस बार लोकपाल विधेयक पारित हो जाएगा। मगर अफसोस कि जैसे ही विधेयक संसद में चर्चा को पहुंचा, कांग्रेस के नेतृत्व वाले सत्ताधारी गठबन्धन यूपीए और भाजपा के नेतृत्व वाले मुख्य विपक्षी गठबन्धन एनडीए सहित सभी छोटे-बड़े विपक्षी दलों ने खुल कर राजनीति शुरू कर दी। लोकसभा में तो कांग्रेस ने अपने संख्या बल से उसे पारित करवा लिया, मगर राज्यसभा में कमजोर होने के कारण मात खा गई। कई स्वतंत्र विश्लेषकों सहित भाजपा व अन्य दलों ने कांग्रेस के फ्लोर मैनेजमेंट में असफल रहने की दुहाई दी। सवाल उठता है कि जब संख्या बल कम था तो विधेयक के पारित न हो पाने के लिए सीधे तौर पर कांग्रेस कैसे जिम्मेदार हो गई। लोकसभा में लोकपाल को संवैधानिक दर्जा देने का संशोधन भी विपक्ष के असहयोग के कारण गिरा तो राज्यसभा में भी इसी वजह से विधेयक लटक गया। निष्कर्ष यही निकला कि यह कांग्रेस का नाटक था, मगर यह नाटक करने का मौका विपक्ष ने ही दिया। विपक्ष की ओर से इतने अधिक संशोधन प्रस्ताव रख दिए गए कि नियत समय में उन पर चर्चा होना ही असंभव था। यहां तक कि कांग्रेस का सहयोगी संगठन तृणमूल कांग्रेस भी पसर गया। मजेदार बात ये रही कि इसे भी कांग्रेस की ही असफलता करार दिया गया। कुल मिला कर इसे कांग्रेस का कुचक्र करार दे दिया गया है, जब कि सच्चाई ये है कि हमाम में सभी नंगे हैं। कांग्रेस ज्यादा है तो विपक्ष भी कम नहीं है। अन्ना के मंच पर ऊंची-ऊंची बातें करने वाले संसद में आ कर पलट गए। ऐसे में यदि यह कहा जाए कि जो लोग भ्रष्टाचार की गंगोत्री में डुबकी लगाते रहे हैं, वे संसद में भ्रष्टाचार को समाप्त करने के लिये घडिय़ाली आंसू बहाते नजर आये, तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। संसद में सभी दल अपने-अपने राग अलापते रहे, लेकिन किसी ने भी सच्चे मन से इस कानून को पारित कराने का प्रयास नहीं किया। सशक्त और स्वतन्त्र लोकपाल पारित करवाने का दावा करने वाले यूपीए एवं एनडीए की ईमानदारी तथा सत्यनिष्ठा की पोल खुल गयी।  भाजपा और उसके सहयोगी संगठन एक ओर तो अन्ना को उकसाते और सहयोग देते नजर आये, वहीं दूसरी ओर गांधीजी द्वारा इस देश पर थोपे गये आरक्षण को येन-केन समाप्त करने के कुचक्र भी चलते नजर आये।<br />
कांग्रेस और भाजपा, दोनों ने अन्दरूनी तौर पर यह तय कर लिया था कि लोकपाल को किसी भी कीमत पर पारित नहीं होने देना है और देश के लोगों के समक्ष यह सिद्ध करना है कि दोनों ही दल एक सशक्त और स्वतन्त्र लोकपाल कानून बनाना चाहते हैं, वहीं दूसरी और सपा-बसपा जैसे दलों ने भी विधेयक पारित नहीं होने देने के लिये संसद में फालतू हंगामा किया। अलबत्ता वामपंथी जरूर कुछ गंभीर नजर आए, मगर वे इतने कमजोर हैं, उनकी आवाज नक्कारखाने में तूती के समान नजर आई। कुल मिला कर देश में पहली बार जितनी तेजी से लोकपाल की मांग उठी, वह भी फिलहाल फिस्स हो गई, यह देश के लिए दुर्भाग्यपूर्ण है। उससे भी अधिक दुर्भाग्यपूर्ण ये है कि इस मांग की झंडाबरदार टीम अन्ना की साख भी कुछ कम हो गई और दिल्ली व मुंबई में आयोजित अनशन विफल हो गए व जेल भरो आंदोलन भी स्थगित हो गया। अब देखना ये है कि टीम अन्ना फिर से माहौल खड़ा कर पाती है या नहीं और यह भी कि कांग्रेस का अगले सत्र में परित करवाने का दावा कितना सही निकलता है।<br />
-tejwanig@gmail.com</h3>
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		<title>व्यक्तिगत राय व्यक्ति तक ही सीमित होनी चाहिए</title>
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		<pubDate>Sat, 15 Oct 2011 01:45:14 +0000</pubDate>
		<dc:creator>राजीव गुप्ता</dc:creator>
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			<content:encoded><![CDATA[<h3><a href="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2011/10/prashant-bhushan-beaten12Oct1318443109_storyimage.jpg"><img class="alignleft size-full wp-image-20155" title="prashant-bhushan-beaten12Oct1318443109_storyimage" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2011/10/prashant-bhushan-beaten12Oct1318443109_storyimage.jpg" alt="व्यक्ति"width="332" height="237" /></a>अरे  प्रशांत भूषण की पिटाई वाला समाचार आपने सुना ? बड़ी उत्सुकता से एक अधेड़ उम्र के व्यक्ति ने अपने एक अधेड़ उम्र के साथी से दिल्ली  की लाइफ लाइन कही जाने वाली मैट्रो में सफ़र करते हुए  पूछा !  हाँ देखा भी और सुना भी , परन्तु कुछ अच्छा नहीं लगा ! मुझे लगता है कि अगर थोड़ी बहुत  शर्म और इज्ज़त प्रशांत भूषण जी में बची है तो अब घर बैठे !  अब बहुत वाह &#8211; वाही लूट ली !  कल तक जो युवा अन्ना टोपी पहने इनके साथ सरकार के खिलाफ हुंकार भर रहा था , इन्हें सर &#8211; आँखों पर बैठा रखा था आज वही इनको अपने लात &#8211;  घूंसों  से पीट  रहा है ? कैसा  दुर्भाग्य  है अन्ना जी का ? पहले  अग्निवेश  जी का असली  चेहरा  जनता  के सामने  आया  जो अब तक सफाई देते फिर रहे है और अब इनके एक और साथी  का ? दूसरे साथी ने थोडा दुखी होकर जबाब दिया !  अरे तुम्हारा कहना तो सही है पर वो भी तो गुंडों की तरह इनको आकर मारने लगा ! भारत एक लोकतान्त्रिक देश है सभी को अपनी बात रखने का हक है ! ऐसे थोड़ी ही है कि अगर आपको कोई मेरी बात नागवार गुजरी तो आप मुझे मारने लगेगे ? अच्छा हुआ जो  प्रशांत भूषण जी  ने खुद भी उस गुंडे को पहले पीटा फिर पुलिस के हवाले कर दिया ! उस गुंडे की अब सारी हेकड़ी निकल जायेगी !  पहले दोस्त ने अपने दोस्त को कानून का पाठ पढ़ते हुए अपनी बात कही ! संविधान ने क्या बोलना है और विरोध कैसे करना है इसकी सीमाए बना रखा  है ! आज तो अन्ना जी ने भी कह दिया कि कश्मीर को लेकर प्रशांत जी का निजी बयान था इससे अन्ना-टीम का कोई सरोकार  नहीं है ! अन्ना &#8211; टीम सिर्फ भ्रष्टाचार मिटाने के लिए बनी है , इसके आलावा अगर कोई कुछ कहता है तो सबकी अपनी व्यक्तिगत राय होगी ! अरे भाई अगर व्यक्तिगत राय है तो अपने तक ही सीमित रखो न ,  मीडिया  के सामने अपनी राय रखकर करोडो  लोगो को दु:खी , हैरान और स्तब्ध क्यों करते हो ? प्रशांत जी की इस हरकत से अन्ना जी को भी आने वाले समय में दो-चार होना पड़ेगा ! मुझे तो डर है कि इनके साथियों के बडबोलेपन के करण कही जनता ही भ्रष्टाचार के मुद्दे पर भी  इनसे मुह न मोड़ ले ? दूसरे साथी ने अपने दोस्त को जबाब  दिया !</h3>
<h3>मैट्रो की ये बातचीत सुनकर मै भी सोचने पर विवश हो गया ! बहरहाल दोनों तरफ से जो भी क्रिया-प्रतिक्रिया हुई , बेहद खेदजनक है ! और होता भी ऐसे है बिना समाने वाले की भावनाओ को समझे हम अपनी व्यक्तिगत राय रख देते है या बना लेते है  और जब उसका कोई जबाब आ जाता है तो हम दु:खी हो जाते है , और फिर उसे सबक सिखाने की सोच लेते है जो यहाँ पर भी देखने को मिल रहा है ! होना यह चाहिए की समस्या की तह में जकार उसका निदान करने की कोशिश की जाय , क्योंकि गलत तो दोनों ही है बस अंतर केवल इतना है कि कोई कम है  और कोई ज्यादा है  !  जम्मू-कश्मीर भारत का था और है ! आजादी के बाद अभी तक पाकिस्तान  ने अपने नापक इरादे से कई बार भारत पर हमला किया और मुह की खाई ! आज भी वह भारत को अस्थिर करने के लिए आतंकवाद के सहारे अपनी नाकाम कोशिशे लगातार कर रहा है ! ऐसे सुप्रीम कोर्ट के वकील प्रशांत जी का ऐसा ओछा बयान पाकिस्तान की ही भाषा बोलता है जो कि पाकिस्तान के नाकाम इरादों को ही हवा देगा !  ऐसे में पाकिस्तान के लिए तो यही बात हो जायेगी कि - &#8217; मुफ्त का चन्दन , घिस मेरे नंदन &#8217; !   पाकिस्तान भी तो यही चाहता है कि भारत के अन्दर ही कश्मीर को लेकर फूट पड़ जाय !  जैसा कि अरुंधती राय , जिन्होंने कश्मीर की आज़ादी को ही इस समस्या का एकमात्र हल बताया है,  दूसरे पत्रकार दिलीप पडगांवकर जिन्होंने कश्मीर को विवाद का मुद्दा मानते हुए इसे सुलझाने में पाकिस्तान की भूमिका पर ज़ोर दिया है ! दिलीप पडगांवकर कश्मीर के सभी पक्षों का मत जानने के लिए भारत सरकार द्वारा नियुक्त तीन वार्ताकारों में से एक हैं !</h3>
<h3>जहा तक प्रशांत जी जम्मू-कश्मीर से सेना हटाने की बात करते  है  तो मुझे समझ नहीं आया कि वकील साहब यह कैसे भूल गए कि  जम्मू &#8211; कश्मीर भारत का एक सीमावर्ती राज्य के साथ साथ आतंकवाद से प्रभावित  राज्य है ?  सुरक्षा की दृष्टि से जम्मू-कश्मीर ही नहीं बल्कि देश के किसी भी सीमावर्ती राज्य को सेना से मुक्त करना न केवल घातक है, अपितु अव्यवहारिक भी है । बहरहाल ! २६ अक्टूबर १९४७ को जम्मू-कश्मीर राज्य के महाराजा हरिसिंह जी द्वारा अपनी रियासत को भारत में विलीन करने के पश्चात कश्मीर का मसला सदा के लिए हल हो जाना चाहिए था !  परन्तु यह सर्वविदित है कि स्वतंत्र भारत के प्रथम प्रधानमंत्री  पंडित जवाहर लाल नेहरू ने भारत के अंग्रेज गवर्नर जनरल लार्ड माउन्टबेटन की सलाह मानकर भारत की विजयी सेना को रोका और पूरे मामले को राष्ट्रसंघ के राजनीतिक मंच पर पेश कर दिया !  १ जनवरी १९४८ को हुए इस महान प्रमाद को हम आज तक भोग रहे है ! स्वतंत्र भारत के प्रथम प्रधानमंत्री  पंडित जवाहर लाल नेहरू की  गलती और अदूरदर्शिता  के  कारण जम्मू-कश्मीर का एक हिस्सा पाकिस्तान के कब्जे में पहले से  ही चला गया और यह भी  उल्लेखनीय है कि जम्मू-कश्मीर के जम्मू क्षेत्र का लगभग 10 हजार वर्ग किमी. और कश्मीर क्षेत्र का लगभग 06 हजार वर्ग किमी. पाकिस्तान के कब्जे में है। 1962 में  चीन ने भारत पर आक्रमण करके लद्दाख के लगभग 36,500 वर्ग किमी. पर अवैध कब्जा कर लिया। बाद में पाकिस्तान ने भी चीन को 5500 वर्ग किमी. जमीन भेंटस्वरूप दे दी, ताकि चीन उसकी  सदैव रक्षा और मदद करता रहे !</h3>
<h3>प्रशांत जी की जहां तक जनमत-संग्रह की बात है, तो संयुक्त राष्ट्र के दो महासचिवों के साथ साथ बहुत लोग ऐसे हैं जो यह मानते हैं कि कश्मीर समस्या के समाधान के रूप में जनतम-संग्रह की मांग एकदम व्यर्थ है। यहां तक कि उन  दोनों संयुक्त राष्ट्र के महासचिवों का ये भी मानना था कि जनमत-संग्रह की मांग अब अप्रासंगिक हो गया है। पाकिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति  जनरल परवेज मुशर्रफ ने भी जनमत-संग्रह की बात को खारिज करते हुए कश्मीर समस्या के समाधान के लिए एक अलग ही फॉर्मूला पेश किया था। लेकिन पाकिस्तानी खर्चे पर पलने वाले कश्मीरी अलगाववादी व प्रशांत जी जैसे उनके समर्थक अब भी जनमत-संग्रह और आत्म-निर्णय का राग अलाप कर अपनी व्यक्तिगत राय दे रहे है यह बेहद खेदजनक है ! ऐसे में जो हमारी  सुरक्षा के लिए रात दिन बम और गोलियों के बीच अपनी जान की बाजी लगाकर देश की रक्षा करते करते शहीद हो जाते है  उन लाखो सैनिकों की शहादत का क्या अर्थ रह जायेगा ?  प्रशांत जी आज कश्मीर के बारे आप अपनी व्यक्तिगत राय दे रहे है कल को चीन अरुणाचल प्रदेश को चीन का हिस्सा बताने लगेगा तो कभी नागालैंड अपनी आजादी की बात करने लगेगा ऐसे में आप अपनी व्यक्तिगत राय दे देकर देश की एकता और अखंडता को ही खतरा पहुचायेगे !</h3>
<h3></h3>
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		<title>मीडिया मे नीचता और लालच की एक हद होती है</title>
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		<pubDate>Sun, 02 Oct 2011 15:01:58 +0000</pubDate>
		<dc:creator>जितेन्द्र प्रताप सिंह</dc:creator>
				<category><![CDATA[चौथा खंभा]]></category>
		<category><![CDATA[मीडिया-संसार]]></category>
		<category><![CDATA[Bhartiya janta dal]]></category>
		<category><![CDATA[congress party]]></category>
		<category><![CDATA[our media]]></category>
		<category><![CDATA[बाबा रामदेवweb media]]></category>
		<category><![CDATA[मीडिया]]></category>

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		<description><![CDATA[जरा आपलोग हमारे देश मीडिया की हेडलाइन का विरोधाभास सुनिए :&#160; १- शिव सेना या बीजेपी अगर पुणे मे मारे गए किसानो के पक्ष मे कोंग्रेसी सरकार की बख़ियाँ उधेड़ते है तो मीडिया मे हेडलाइन होती है “अब इस मुद्दे ]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<h3><a href="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2011/10/images.jpg"><img class="alignright size-full wp-image-20017" title="images" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2011/10/images.jpg" alt="मीडिया"width="160" height="160" /></a>जरा आपलोग हमारे देश मीडिया की हेडलाइन का विरोधाभास सुनिए :&nbsp;</p>
<p>१- शिव सेना या बीजेपी अगर पुणे मे मारे गए किसानो के पक्ष मे कोंग्रेसी सरकार की बख़ियाँ उधेड़ते है<br />
तो मीडिया मे हेडलाइन होती है “अब इस मुद्दे पर राजनीति शुरू हो गई है“</p>
<p>वही रौल विंची भट्टा पारसौल मे नौटंकी करने जाता है तो उसे बार बार केन्द्रित किया जाता है और हेडलाइन होती है</p>
<p>“आज राहुल गांधी ने पीड़ित किसानो का हाल चाल पूछा और मृतको के प्रति संवेदना व्यक्त की…<br />
और माया सरकार पर जमकर बरसे” ऐसी महा हरामखोर मीडिया है हमारी .</p>
<p>सभी चर्च द्वारा पोषित और देश द्रोहीयों कश्मीरी अलगाववादियों के समर्थित इन चेनलों का यही हाल है भाई …. बीजेपी के नेताओ को राजनीति से प्रेरित करना, अपने डिबेट कार्यक्रमों मे बीजेपी का एक नेता और मुक़ाबले मे 2-3 कोंग्रेसी + उनके सहयोगी वामपंथि कुत्तो से लडवाकर मुद्दो को गुमराह करना, लक्ष्य होता है बीजेपी को अराष्ट्र पार्टी के रूप मे चित्रित करना, ताकि हर युवा के मुख से यही निकले बीजेपी एक नकारा पार्टी है सांप्रदायिक पार्टी है ।</p>
<p>इनके लिए कॉंग्रेस ने अगर 10 किलो का भ्रष्टाचार किया तो उसके सामने बीजेपी का 30 ग्राम का भ्रष्टाचार 20 किलो का हो जाएगा ….</p>
<p>२- अगर १० महीने से डियूटी से अनुपस्थित और हिरासत मे दो मौत के अभियुक्त तथा जबरन फर्जी एफिडेविट बनाने के आरोपी संजीव भट्ट को पुलिस गिरफ्तार करती है तो मिडिया की हेडलाईन होती है &#8221; मोदी का बदला &#8221; या &#8221; यही है मोदी की असली सद्भावना &#8221;</p>
<p>लेकिन अगर कांग्रेस शासित राज्यों मे किरण बेदी का प्रोमोशन सरकार रोक दे या बाबा रामदेव और आचार्य बल्क्रिशन के पीछे बदले के लिए पूरी सीबीआई लगा दे या महाराष्ट्र मे पांच पुलिस अधिकारियो को गिरफ्तार कार लिया जाये या केन्द्र सरकार &#8220;नोट फार वोट &#8221; मे उल्टे बीजेपी के सांसदों को गिरफ्तार कर ले तो फिर इस नीच मीडिया की सनसनी खेज हेडलाईन क्यों नहीं होती ?</p>
<p>३- आज बाबा रामदेव के सम्पति के पीछे पूरी मीडिया पड़ी है जो उन्होंने योग या दवाओ से अर्जित की है .. इसमें कोई अपराध नहीं है ..</p>
<p>लेकिन आज की मीडिया राबर्ट वढेरा के साम्राज्य के पीछे क्यों नहीं पड़ती ? उसने सिर्फ १० साल मे खरबो की सम्पति कैसे बनाई ? उसने कौन सा जादू किया ?</p>
<p>मीडिया सोनिया से क्यों डरती है ? क्या उसे अपनी बोटी और हड्डी खोने का डर है ?</p>
<p>४- यदुरप्पा के पीछे पूरी मीडिया कई महीनो तक जैसे एक सोचा समझा आन्दोलन चलाया .. वो धार और वो मीडिया का पैनापन शीला दिछित और अशोक गहलोत के भ्रष्टाचार पर खामोश क्यों हों जाता है ??</p>
<p>५- गुजरात दंगो के १० साल बीत जाने के बाद भी मीडिया जाकिया जाफरी , जाहिरा शेख , और दूसरे मुस्लिम पीडितो के लिए बहुत सद्भावना दिखाती है .. वो सद्भावना राजबाला के लिए क्यों नहीं ???</p>
<p>६- गुजरात दंगो के लिए आज मिडिया मोदी के लिए जिन शब्दों का उपयोग करती है वही शब्द और वही धार वो कांग्रेस के लिए सिख्ख विरोधी दंगे और भागलपुर दंगे और मुंबई दंगे के लिए क्यों नहीं इस्तेमाल करती ?</p>
<p>७- अभी भरतपुर दंगे के लिए गहलोत को मिडिया &#8220;मुसलमानों का कातिल &#8221; क्यों नहीं कहती ?</p>
<p>आज की इस मीडिया के प्रमुख कार्य है :</p>
<p>1. आरएसएस को सिम्मी के कतार मे खड़ा करना</p>
<p>2. भगवा मे आतंकवाद ढूँढना, डिग्गी के बयानो को जानबूझकर हवा देना ताकि हिंदुओं की वाणी उसी मे बहकर हिन हो जाये….</p>
<p>3. हिन्दू संस्कृति मे दोष ढूँढना, अमरनाथ यात्रा को ढोंघ करार देना – फर्जी विज्ञानी को बुलाकर के अमरनाथ यात्रा का वैज्ञानिक बिन्दु देखना ताकि हिन्दू यह समझे की यह एक ढोंग है.</p>
<p>4. लंदन मे 4 लोग मारे तो उसे रोज दवाई की तरह दर्शकों को पिलानाऔर ठीक उसी समय मे मुरादाबाद मे भगवान शिव की यात्रा मे शामिल 4-5 हिन्दू मरे दंगो मे तो उसे बिलकुल भी नहीं बताना</p>
<p>5. केरल मे सत्ताधारी पार्टी के जिहादी युवक पाकिस्तानी पर्चे बांटे तो बड़ी बात नहीं है, लेकिन सुब्रमण्यम स्वामी के बयान बड़ी बात है…..</p>
<p>6. मुहम्मद के डेन्मार्क मे बने कार्टून का गुस्सा यहाँ के मुस्लिम कोल्हापुर और हुबली मे सरकारी संपत्ति और मुर्दे हिंदुओं पर हाथ साफ करें तो इस मीडिया की हेडलाइन होती है“इनका गुस्सा जायज है किसी के धर्म की भावनाओ के साथ खिलवाड़ उचित नहीं है “वही एक सांस्कृतिक आतंकवादी एम एफ हुसेन बहुसंख्यक (?) हिंदुओं के देवी देवताओ के नग्न चित्र बनाए और उसके प्रतिकृया मे बहुसंख्यक हिंदुओं के देश मे मुट्ठी भर संगठन विरोध करें तो मीडिया उन पर तो गड़िया टेग लगाकर हुसेन के प्रति अपनी हमदर्दी बताती है….</p>
<p>7. गोवा मे मंदिर की मूर्तियों पर पैशाब करके “ईसा की ताकत बताना” और मूर्तियाँ ईसाई तोड़े तो कोई बात नहीं….</p>
<p>केरल के मुस्लिम बहुल इलाकों मे मिशनरी के गुजरने मात्र से मौत मिले तो मीडिया मे कोई हेडलाइन / बात नहीं …..क्योंकि दोनों “मित्र समुंह″ का टकराव है</p>
<p>8. लेकिन एक मर्द हिन्दू उड़ीसा मे ईसाई मिशनरियों को उनके कुकृत्य पर जिंदा जलाए …..तो इस मीडिया की हेडलाइन होती है”देश मे हिन्दू कट्टरपंथ बढ़ रहा है“</p>
<p>9. हमेशा इन्हे व्यवस्था परिवर्तन करने निकले स्वामी रामदेव मे एक चोर, पाखंडी नजर आता है<br />
10. हर रोज कम से कम 4-5 खबरे ऐसी होती है जहां कोई पुजारी किसी मंदिर मे बलात्कार करता है, कोई हिन्दू संत ढोंगी निकलता है, आसाराम हत्यारा निकलता है आरएसएस के खिलाफ स्टिंग ऑपरेशन होता है, ऐसी मीडिया जिसे सिर्फ हिन्दू के अंदर ही बलात्कारी, पाखंडी, चोर नजर आता हो वो कैसे लोगो को जगाएगी ? जब कोई देश की मीडिया किसी निजी संस्थानो के हाथो मे हो तो उससे किसी भी तरह की आशा रखना व्यर्थ है ….. वह तो सिर्फ अपने आकाओ के कहने पर अपने स्वार्थ सिद्धि के लिए बहुसंख्यकों को बरगलाएगी…. ताकि हिन्दू ये खबरे पढ़ पढ़ कर के अपने आप को हीन समझने लगे और मिशनरियों के लिए धर्म परिवर्तन के लिए पहली सीढी तैयार हो जाये ….<br />
११- यदि कोई मुस्लिम या ईसाई कोई हिंदू विरोधी किताब लिखे तो वो &#8220;अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता&#8221; और यदि कोई हिंदू लिखे तो अपराध</p>
<p>महानगरो मे “हिन्दू नास्तिको” की तादात बढ़ रही है गले मे क्रॉस शोभायमान है…. वाणी मे आधुनिक कंपनीतंत्र से प्रेरित सेकुलरवाद- -</p>
<p>अब तो यह कहने मे भी शर्म आती है की जागो हिंदुओं जागो । क्योंकि एक भाषण मात्र से ही यदा कडा सिर्फ एक हिन्दू की आँख खुलती है लेकिन बाकी जागते हुए भी अंदर सोये रहते है … जयचंदी का जिन कहीं न कहीं उनमे हिलोरे लेता है ….</p>
<p>इस बात का आप कभी घमंड न करें की आपकी संख्या 8० % हैं….. इसमे से आधे तो सेकुलर की औलादे हैबाकी वे जो मौन विरोध करतेहै लेकिन वोट नहीं देते है क्योंकि उन्हे अपना व्यापारिक समय प्यारा है ….</p>
<p>और जिस तरह से इस देश मे मुस्लिम जनसंख्या तेजी से बढ़ रही है उस हिसाब से २०६० तक हिंदू इस देश मे अल्पसंख्यक हों जायेंगे ..</p>
<p>जागो हिंदू जागो अपने वोट की कीमत समझो !! अपने जाति और छेत्र को भूल कर एक नई सुबह के लिए तैयार हों जाओ ..</p>
<p>मीडिया को समझो बंधु मीडिया को … हमारे देश की मीडिया दुनिया की की सबसे बड़ी नीच मिडिया है !!</h3>
]]></content:encoded>
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		<title>नारी-सशक्तिकरण</title>
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		<pubDate>Wed, 28 Sep 2011 09:17:07 +0000</pubDate>
		<dc:creator>ब्रजेश कुमार</dc:creator>
				<category><![CDATA[नारी]]></category>
		<category><![CDATA[विचार -विमर्श]]></category>
		<category><![CDATA[female Fotecied]]></category>
		<category><![CDATA[नारी सशक्तिकरण]]></category>
		<category><![CDATA[बाँलीवुड]]></category>
		<category><![CDATA[मीडिया]]></category>

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		<description><![CDATA[ब्रजेश कुमार शर्मा जिस दिन वास्तव में नारी सशक्त हो जाएगी उस दिन से पुरूष सशक्तिकरण अभियान का दौर भी आरम्भ हो जाएगा।क्योंकि मैंने बहुत-से ऐसे विवाहित पुरूषों की दुर्दशाओं को नजदीकी से देखा हैं,जिनकी जिंदगी नारी के साए में ]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><strong><span style="text-decoration: underline;"><a href="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2011/09/2-265_12994391041.jpg"><img class="alignleft size-medium wp-image-19964" title="2-265_1299439104" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2011/09/2-265_12994391041-100x86.jpg" alt="नारी"width="100" height="86" /></a>ब्रजेश कुमार शर्मा</span></strong></p>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-size: medium;">जिस दिन वास्तव में नारी सशक्त हो जाएगी उस दिन से पुरूष सशक्तिकरण अभियान का दौर भी आरम्भ हो जाएगा।क्योंकि मैंने बहुत-से ऐसे विवाहित पुरूषों की दुर्दशाओं को नजदीकी से देखा हैं,जिनकी जिंदगी नारी के साए में रहकर एक जानवर से भी बदतर जिंदगी हो गई हैं। वे अपनी स्त्री पर हाथ नहीं उठा सकते क्योंकि कानून ने उनके दोनों हाथ बाँध दिए हैं। वे अपने दर्द की दास्तां किसी को सुना भी नहीं सकते वरना यह समाज उनकी मर्दानगी को लेकर मजाक उङाएगा,वे घर भी नहीं छोङ सकते क्योंकि अपने बच्चों के मासूम-सा चेहरा उन्हें ऐसा करने की इजाजत भी नहीं देता और वे चाहकर भी अपने प्राण को नहीं त्याग सकते। वे अपनी स्त्री को तलाक नहीं दे सकते क्योंकि कानून के मुताबिक तलाक के लिए मियाँ-बीबी की आपसी रजामंदी का होना आवश्यक हैं, दूसरी बात यह हैं कि हमारे समाज में तलाकशुदा व्यक्ति को हेय-भरी दृष्टि से देखा जाता हैं। ऐसे में अपनी पत्नी से पीङित पति या किसी लङकी के द्वारा प्रताङित व्यक्ति जाएँ तो जाएँ कहाँ ???अधिकांश नारियाँ लालची और अहंकार किस्म की होती हैं,ऐसे में सरकार और अदालत दोनों ही भविष्य में भयावह परिणाम की परवाह किए बगैंर महिलाओं के हाथों में एक-से-एक अस्त्र थमा रही हैं, जिनका वे धङल्ले-से दुरूपयोग करती जा रही हैं। दहेज-प्रथा के विरूद्ध जो कानून बना हैं,उसका 60 प्रतिशत दुरूपयोग हुआ हैं। इसका इस्तेमाल पत्नी अपने स्व-विवेक से नहीं बल्कि अपने माता-पिता,भाई-बहन के कहने पर करती हैं। बलात्कार के विरूद्ध कानून तो ऐसा अस्त्र हैं जिसको महिलाएँ किसी भी पुरूषों से अपना बदला लेने के लिए ही प्रयोग में लाती हैं क्योंकि जिसका वास्तव में बलात्कार होता हैं या जिन लङकियों के साथ छेङछाङ होता हैं, वे अपने समाज और अपने परिवार के दबाव में दोषी व्यक्तियों के विरूद्ध थाना में रपट लिखाने जाती ही नहीं हैं। अखबारों में बलात्कार से जुङे जितने मामले पढने को मिलते हैं, दरअसल में वे 70 प्रतिशत फर्जी ही होते हैं। अर्थात् 30 प्रतिशत महिलाएँ ही अपने खिलाफ होनेवाले अत्याचार के खिलाफ थाना में रपट लिखाने जाती हैं। घरेलू हिंसा कानून तो अपने पति सहित ससुरालवालों को अपने अधीन में रखने के लिए ही इस्तेमाल में आ रही हैं। मेरा कहने का मतलब कदापि यह नहीं हैं कि पुरूष सर्वथा निर्दोष ही होते हैं या फिर महिलाओं पर अत्याचार नहीं होते हैं। महिलाओं पर जूल्म नित्य-प्रतिदिन बढते ही जा रहे हैं। हमसब पुरूषों ने नारियों को महज भोग-वस्तु की सामग्री समझ रखा हैं। अपनी माँ,अपनी बहन को इज्जत तो देते हैं परन्तु जब दूसरी महिलाओं को इज्जत देने की बात आती हैं,तब हम ऐसा नहीं कर पाते हैं,जोकि गलत बात हैं। इसके लिए महिलाएँ भी इस रूप में दोषी हैं कि उन्होंने जाने-अनजाने में पाश्चात्य देशों के प्रसाधन क्षेत्रों में अपने-आप को ढकेल दिया हैं,रही-सही कसर आधुनिकता के नाम पर अश्लीलता को फैला रहा बाँलीवुड ने पूरा कर दिया हैं, यही कारण हैं कि आज का नवयुवक नारियों को उस रूप में नहीं देख पा रहा हैं जिस रूप में प्राचीन समाज के लोग देखा करते थे। रामायण,महाभारत में भी नारियों के प्रति उत्पीडन को दिखाया गया हैं लेकिन उसमें अंततः उद्दंड पात्रों (खलनायक) को नायक के हाथों दण्डित करते हुए दिखाया गया हैं। लेकिन आज के साहित्य में ऐसा कुछ भी नहीं हो रहा हैं। कहानी अश्लीलता से प्रारम्भ होती हैं और अन्त भी अश्लीलता से ही होता हैं। हम साथ-साथ हैं,हम आपके हैं कौन,नदिया के पार,विवाह जैसी कितने पारिवारिक सिनेमा आज के दौर में देखने को मिल रहे हैं??????????</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-size: medium;">आज का नवयुवक जब इन्हीं चीजों को देखकर और पढकर बङा होगा तब आप उससे यह अपेक्षा नहीं कर सकते कि वह नारियों का सम्मान करेगा???? यह तो उसकी संस्कृति का हिस्सा ही कहलाएगा। जैसा वो देखेगा और पढेगा,वैसा ही तो वह करेगा। यह एक कङवी सच्चाई हैं जिसको एक-न-एक दिन सबको स्वीकार करना होगा।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-size: medium;">नारियों के प्रति जो यौन-शोषण बढते जा रहा हैं,उसकी रोक-थाम किसी कानून के द्वारा नहीं हो सकता क्योंकि अब तो किसी को भी कानून के प्रति ज्यादा खौफ नहीं रह गया हैं। कानून ज्यादा-से-ज्यादा किसी को शारीरिक पीङा ही प्रदान कर सकता हैं लेकिन किसी व्यक्ति के विचारों को नहीं बदल सकता हैं। केवल कानून बना देने से और नारी-सशक्तिकरण अभियान चलाने से और अंतर्राष्ट्रीय महिला-दिवस मनाने से नारियों का उत्थान नहीं होनेवाला हैं , इसके लिए हमसब समाज को आगे आना होगा। इस क्षेत्र में मीडिया,बाँलीवुड चाहे तो सभी अपना-अपना योगदान दे सकते हैं। फिर देखिए हमारे देश में महिलाएँ ही नहीं बल्कि महिलाओं से आतंकित पुरूष भी अपने-आप को कितना सुकून महसूस करेंगे?????????? हमारा दृढ-विश्वास हैं कि जिस दिन ऐसा होना प्रारम्भ होगा उस दिन से भारत में सभी प्रकार के अपराधों में बिना किसी कानून की सहायता लिए बगैर अस्सी (80) फीसदी (प्रतिशत) तक गिरावट दर्ज होगी। बाकी 20 प्रतिशत जो नहीं सुधरे तो फिर उनके लिए तो कानून हैं ही।</span></h3>
]]></content:encoded>
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		<title>नीतीश सरकार ‘हिन्दुस्तान’ पटना पर मेहरबान क्यों  ?</title>
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		<pubDate>Tue, 23 Aug 2011 17:10:52 +0000</pubDate>
		<dc:creator>लीना</dc:creator>
				<category><![CDATA[चौथा खंभा]]></category>
		<category><![CDATA[मीडिया-संसार]]></category>
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		<category><![CDATA[नीतीश सरकार]]></category>
		<category><![CDATA[बिहार]]></category>
		<category><![CDATA[मीडिया]]></category>
		<category><![CDATA[सूचना के अधिकार]]></category>

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		<description><![CDATA[पटना / बिहार की मीडिया पर आरोप लगता रहा है कि वह नीतीश सरकार के सुशासन में घटने वाली घटनाओं को उस तेवर के साथ नहीं उठाती जिस तेवर से उठाना चाहिए। इन सबके पीछे नीतीश सरकार का मीडिया मैनेजमेंट ]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><strong><a rel="attachment wp-att-18809" href="http://www.janokti.com/hindi-news-media-%e0%a4%9a%e0%a5%8c%e0%a4%a5%e0%a4%be-%e0%a4%96%e0%a4%82%e0%a4%ad%e0%a4%be-cinema-media-blog-fourth-pilar/hindi-media-%e0%a4%ae%e0%a5%80%e0%a4%a1%e0%a4%bf%e0%a4%af%e0%a4%be/%e0%a4%a8%e0%a5%80%e0%a4%a4%e0%a5%80%e0%a4%b6-%e0%a4%b8%e0%a4%b0%e0%a4%95%e0%a4%be%e0%a4%b0-%e2%80%98%e0%a4%b9%e0%a4%bf%e0%a4%a8%e0%a5%8d%e0%a4%a6%e0%a5%81%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%a4%e0%a4%be%e0%a4%a8/attachment/news-clipart-2/"><img class="alignleft size-medium wp-image-18809" title="news-clipart" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2011/08/news-clipart-100x90.jpg" alt="" width="100" height="90" /></a>पटना / बिहार</strong> की मीडिया पर आरोप लगता रहा है कि वह नीतीश सरकार के सुशासन में घटने वाली घटनाओं को उस तेवर के साथ नहीं उठाती जिस तेवर से उठाना चाहिए। इन सबके पीछे नीतीश सरकार का मीडिया मैनेजमेंट सवालों के घेरे में है। किस तरह सरकारी विज्ञापन देकर बिहार की मीडिया को अपनी ओर कर लेने और सरकार के खिलाफ खबरों पर विराम लगा देना या अपनी केवल सकारात्मक खबरें ही छपवाना- सवालों के घेरे में आ चुका है।</p>
<p>सरकारी विज्ञापनों का मीडिया पर मेहरमान होने की दास्ता, सूचना के अधिकार के तहत पहले ही सामने आ चुका है और तब जनता और राजनीतिक पार्टियों को पता चला था कि किस तरह विज्ञापन देकर मीडिया के मुंह पर ताला जड़ने की कोशिश की गयी। विपक्षी राजनीतिक पार्टियों ने इस मुद्दे को जमकर उछाला भी।</p>
<p>एक बार फिर नीतीश सरकार मीडिया को विज्ञापन देने को लेकर चर्चे में है। किसी अख़बार के 25 वर्ष पूरे होने पर सरकार कई कई पन्नों का विज्ञापन बिहार के 25 कदम कहते हुए आखिर कैसे दे सकती है ? क्या एक अख़बार के 25 वर्ष राज्य के 25 वर्ष है ? यह तो सिर्फ अख़बार पर मेहरबानी करना ही है।</p>
<p>इस बार मामला सिर्फ और सिर्फ एक अखबार का है वह अखबार दैनिक हिन्दुस्तान, पटना। दैनिक हिन्दुस्तान, पटना के पच्चीस वर्ष पूरे होने पर नीतीश सरकार ने मेहरबान होकर, पटना के दूसरे अखबारों को दरकिनार करते हुए 20 अगस्त 2011 के अखबार के लिए पृष्ठ संख्या-7, 9, 18, 19, 21पर पूरे पृष्ठ का विज्ञापन दे डाला। यह विज्ञापन IPRD-5308 s (notice)-11.12 के तहत छापा गया। मजेदार बात यह है कि 20 अगस्त के हिन्दुस्तान, पटना में स्वास्थ्य, पंचायती राज, नगर विकास, कानून व्यवस्था, शिक्षा, विषय पर अलग-अलग पृष्ठ पर सरकार की विकास कार्यों की चर्चा करते हुए तरक्की के 25 कदम से जो कि वास्तव में इस अख़बार के 25 वर्ष पर, छापा गया। गौर करने वाली बात यह है कि यह 25 कदम भले ही सरकार के दर्शाते हो लेकिन यह तरक्की के 25 कदम यानी हिन्दुस्तान पटना के 25 वर्ष के पोषक लगते हैं। 20 अगस्त को प्रकाशित होने वाले पटना के हिन्दुस्तान को छोड़कर किसी भी दूसरे अखबार में यह नहीं छपा ? पूरा का पूरा विज्ञापन पेज  को समाचार के रूप में छापा गया। नीचे केवल IPRD-5308 s (notice)-11.12 छाप दिया गया ताकि नियमतः यह विज्ञापन प्रतीत हो। इसका दोहराव 21 अगस्त के दैनिक हिन्दुस्तान, पटना में पुनः किया गया। पृष्ठ संख्या-21 पर IPRD-5312 s (विजिलेंस)11-12 के तहत विभाग का लेखा जोखा पेश किया गया। पूरा का पूरा मैटर आलेखनुमा प्रकाशित कर पाठकों को भ्रमित किया गया। यह इस तरह से छापा गया कि लगे कि आलेख हो। इसमें सरकार के विकास के विभागीय बातों को समेटा गया।यह पूरा मामला अख़बार के प्रबंधन के फाड़े से जुड़ा है। इस तरह के विज्ञापन को छापने के लिए विज्ञापनदाता अख़बार को पूरा मैटर देता है और उसे समाचार या आलेख की शक्ल में छपवाता है ताकि पाठक को ऐसा लगे कि यह विज्ञापन नहीं समाचार या आलेख हो। इसके लिए विज्ञापन देनेवाला अख़बार प्रबंधन को विज्ञापन कि दर से भुगतान करता है। लेकिन इसे लिखनेवाले पत्रकार को अलग से कुछ भी नहीं दिया जाता है। सवाल ये उठता है कि हिन्दुस्तान अखबार को ही यह मौका क्यों दिया गया ? अगर यह विज्ञापन नहीं होता तो नीचे  id p r का जिक्र नहीं होता। सिर्फ एक अखबार को इतना विज्ञापन देना और दूसरे को एक पेज का भी विज्ञापन नहीं देना आखिर क्या दर्शाता है ?</p>
<p>विज्ञापन को लेकर हमेशा से सवाल उठते रहे है 15 अगस्त के विज्ञापन को लेकर सूचना और जनसंपर्क विभाग में भी उर्दू समाचार पत्रों ने भी हल्का-पुल्का विरोध जताया था। उन्हें हिन्दी अखबारों की तरह विज्ञापन पूरी तरह से नहीं मिल पाया था। चर्चा तो ये भी है कि ऐसे ऐसे पत्र-पत्रिकाओं को विज्ञापन दिया जाता है जो जमीन पर तो है ही नहीं बस कागजों पर नजर आते हैं। बहरहाल, एक बार फिर मीडिया के गलियारे में सवाल उठा है कि नीतीश सरकार हिन्दुस्तान पटना पर इतना मेहरबान क्यों है।</p>
<p>&nbsp;</p>
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		<title>बाबा रामदेव की कार्यशैली</title>
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		<pubDate>Thu, 21 Jul 2011 01:31:49 +0000</pubDate>
		<dc:creator>जनोक्ति डेस्क</dc:creator>
				<category><![CDATA[अंधेर नगरी]]></category>
		<category><![CDATA[काला धन]]></category>
		<category><![CDATA[बाबा रामदेव]]></category>
		<category><![CDATA[भ्रष्ट तंत्र में कालेधन]]></category>
		<category><![CDATA[मीडिया]]></category>
		<category><![CDATA[रामलीला मैदान]]></category>

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		<description><![CDATA[मनीष वत्स बाबा रामदेव को बधाई मिलनी चाहिये क्योंकि उनका अभियान एक हद तक सफल हुआ &#8212;&#8211; (१) अधिकाधिक मात्रा में भीड जुटा कर रामलीला मैदान को पाटने का (२) सरकार को एक हद तक झुकाने का (३) मीडिया जगत में ]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><span style="text-decoration: underline;"><strong><a rel="attachment wp-att-17907" href="http://www.janokti.com/government-failure-%e0%a4%85%e0%a4%82%e0%a4%a7%e0%a5%87%e0%a4%b0-%e0%a4%a8%e0%a4%97%e0%a4%b0%e0%a5%80/%e0%a4%ac%e0%a4%be%e0%a4%ac%e0%a4%be-%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%ae%e0%a4%a6%e0%a5%87%e0%a4%b5-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a4%b6%e0%a5%88%e0%a4%b2%e0%a5%80/attachment/swami_ramdev_yoga_classes-3/"><img class="alignleft size-medium wp-image-17907" title="swami_ramdev_yoga_classes" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/swami_ramdev_yoga_classes2-255x300.jpg" alt="" width="255" height="300" /></a>मनीष वत्स</strong></span></p>
<p style="text-align: justify;">बाबा रामदेव को बधाई मिलनी चाहिये क्योंकि उनका अभियान एक हद तक सफल हुआ &#8212;&#8211;</p>
<p style="text-align: justify;">(१)  अधिकाधिक मात्रा में भीड जुटा कर रामलीला मैदान को पाटने का</p>
<p style="text-align: justify;">(२) सरकार को एक हद तक झुकाने का</p>
<p style="text-align: justify;">(३)  मीडिया जगत में वाहवाही लूटने का</p>
<p style="text-align: justify;">(४)  और देश बचाने को आये देश के विभिन्न भागों के मासुम बच्चे ,  असहाय महिलायें  एवं निर्दोष नागरिकों को पीटवाने का लेकिन यहाँ पर एक प्रश्न उठता है ।</p>
<p style="text-align: justify;">क्या काला धन जो विदेशो में जमा है भारत में लौटकर आयेगा?</p>
<p style="text-align: justify;">अगर वापस आ भी गया तो उसका लाभ कितने भारतीय उठा पायेंगे?</p>
<p style="text-align: justify;">क्योंकि &#8212;&#8212;&#8212;&#8211; इसे एक उदाहरण के द्वारा समझा जा सकता है&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;- अगर हमारी जेबें किसी कारण फट गयी हो तो उसमे सिक्के ठहर नही पायेंगे औृ कही ना कही बिखर जायेंगे , इन सिक्कों को बिखरने से बचाने के लिये हमें सबसे पहले जेबें मरम्मत करवानी होगी , उन्हे दुरुस्त करवाना होगा ना कि हम उसमे पैसे डालते रहे और बिखरे हुये सिक्कों को ढूढने का हम अथक प्रयास करते रहें । पूर्व प्रधानमंत्री और दिगंवत राजीव गाँधी ने स्वयं कहा था कि जनता के पास सरकारी फंड का मात्र दस फीसदी हिस्सा भी नही सही से पहुँच पाता है तो आखिर जनता का हक जाता कहाँ है ? इस बात को भी माननीय राजिव गाँधी जरुर जानते होंगे ,वर्तमान सरकार भी बखूवी से जानती होगी ॅ</p>
<p style="text-align: justify;">फिर वैसे भ्रष्ट तंत्र में कालेधन को वापस लाने का क्या मतलब रह जाता है, यह पुनः चार लाख करोड से आठ लाख करोड में तब्दील होकर उसी खाते का शन बढायेगा जहाँ से यह आयेगा</p>
<p style="text-align: justify;">मुषकः पुनः मुषकः भवः की कहावत चरितार्थ हो जायेगी</p>
<p style="text-align: justify;">तात्पर्य यह कि हमारे पास मौजुद संसाधनों का जब सही उपयोग हो ही नही पा रहा है तो फिर बाबा रामदेव उन पैसों का प्रलोभन जनता को क्यों दे रहे हैं जिसका अस्तित्व सरकार बताने तक को तैयार नही है क्यों भोले भाले नागरिकों का ब्रेन बाश कर उसे व्यक्तिगत कार्यों से धऽयान हटाने कि कोशिस कर रहे हैं दुसरी बात है मानसिकता में परिवर्तन &#8212;&#8212;&#8211; बाबा रामदेव अगर वास्तव में जन सेवा को ईच्छुक है तो उन्हे जनता के बीच जाकर उनके मानसिकता को बदलने का पुण्य कार्य करें , इस तरह की भीड जुटाने का कार्य तो सिर्फ उन राजनीतिक पार्टियों का है जो अपने स्वार्थ कि खातिर अपने ईमान तक को बैच सकती हैं एक देश सेवक को यह शोभा नही देता ।</p>
<p style="text-align: justify;">देश सेवा का सबक तो उस मजदुर से लिया जा सकता है जो रात-दिन एक करके अथक मेहनत के बल पर अपने परिवार का पेट पालता है  पर टैक्स भरने से भी नही हिचकता , उस किसान से लेनी चाहिये जो ऊपने खेतों मे हल जोतकर , कडी मेहनत कर अन्न उपजाता है और देश के अण्न भंडार को बढाने मे सहायता करता है ,एसी गाडी मे चलने वाला और चार्टड प्लेन का मज़ा लेने वाला इंसान कभी भी देश भक्त नही हो सकता</p>
<p style="text-align: justify;">आज देश की दुर्दशा इतनी खराब है कि एक मामुली आदमि को मामुली से काम के लिये भी सरकारी कार्यालय का दस चक्कर लगाना पडता है ताकि ऑफीस बाबू द्वारा मांगे गये चढावे के दस रुपये बच जायें , भला उस इंसान को चार लाख करोड कालाधन हो या  एक अरब लाख करोड , क्या मतलब ? जिसका मेहनत से अर्जित दस रुपया भी सेफ ना हो वह इतने भारी रकम को देखने का ख्वाव भी नही देख सकता , उसको बचाना तो दूर की बात है</p>
<p style="text-align: justify;">सरकार द्वारा अधिकृत जन-वितरण प्रणाली से हर महीने प्राप्त होने वाले कम दर पर अनाज और मिट्टी के तेल जिस देश के नागरिक को पुरे साल  साल मे मात्र दो से तीन बार भी सही से नही मिल पाते हैं , दलालो का पेट सालों भर इन्ही अनाजों से भरता है  उस देश के नागरिक को भला चार लाख करोड जैसे भारी रकम से क्या मिल सकता है जिसकी दलाली तो देश की सरकार खुद कर रही है , इसका अंदाजा एक बालक भी लगा सकता है ।</p>
<p style="text-align: justify;">किसान क्रेडिट कार्ड &#8212;- किसानो को जमीन के आधार पर भारत सरकार के बैंक कर्मचारियों के लिये  एक  अनूठी मुनाफा योजना जिसका लाभ लगभग सभी सरकारी बैंक के मैनेजर उठा रहे हैं , ‍१० से २० फीसदी कमीशन खाकर   । इसके अलावा बहुत सारी विकृतियाँ के शिकार आम परन्तु खास नागरिक है जैसे दहेज प्रथा , ऒनर किलिंग वगैरह- वगैरह बाबा रामदेव को समाज मैम व्याप्त इन भ्रष्टाचार के संपोलों से लडना चाहिये , इन विकृतियों को जड से निर्मुल करने का बीडा उठाना चाहिये विषधर पर उनका डायरेक्ट  वार सिर्फ उनके लिये परेशानी  ही खडा कर सकता है , शायद उन्हे पता होगा कि संपोले ही विषधर बनते हैं</p>
<p style="text-align: justify;">आज भले ही बाबा लाख दावा करते फिरें कि मैं व्यवस्था परिवर्तन करने जा रहा हुँ परनतु लेकिन कही व्यवस्था परिवर्तन सीरफ सत्ता परिवर्तन तक ही ना सीमित रह जाये , ये सत्य है कि बाबा के पास अकूत दौलत है , उनकी छवि को बेदाग भी कहा जा सकता है , रुतवे का उनके पास कमी नही परन्तु उनके साथ काम करने वाले , उनके सहयोगी , उनके शिष्य , सभी को तो रुतवा बनाना है सभी को पैसा कमाना है , कही शिव का भष्मासुर को वरदान शिव के लिये ही घातक ना हो जाये क्योकि इतिहास दोहराता है , ‍१९७७ कि संपुर्ण क्रान्ति के बाद लोगों मे आशायें जगी थी किन्तु उस क्रान्ति के बाद उत्पन्न हुये भजष्मासुरों को कोई नही भूला सकता ।</p>
<p style="text-align: justify;">&nbsp;</p>
]]></content:encoded>
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		<title>ग्रामीण भारत से मीडिया की दूरी</title>
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		<pubDate>Sun, 09 Jan 2011 03:51:33 +0000</pubDate>
		<dc:creator>संजय कुमार</dc:creator>
				<category><![CDATA[मीडिया-संसार]]></category>
		<category><![CDATA[अंतरजाल]]></category>
		<category><![CDATA[अखबार]]></category>
		<category><![CDATA[खबरिया चैनल]]></category>
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		<description><![CDATA[संचार क्रांति के दौर में मीडिया ने भी लंबी छलांग लगायी है। मीडिया के माध्यमों में रेडियो, अखबार, टी.वी., खबरिया चैनल, अंतरजाल और मोबाइल सहित आये दिन विकसित हो रहे अन्य संचार तंत्र समाचारों को क्षण भर में एक जगह ]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><a rel="attachment wp-att-12238" href="http://www.janokti.com/hindi-news-media-%e0%a4%9a%e0%a5%8c%e0%a4%a5%e0%a4%be-%e0%a4%96%e0%a4%82%e0%a4%ad%e0%a4%be-cinema-media-blog-fourth-pilar/hindi-media-%e0%a4%ae%e0%a5%80%e0%a4%a1%e0%a4%bf%e0%a4%af%e0%a4%be/%e0%a4%97%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%ae%e0%a5%80%e0%a4%a3-%e0%a4%ad%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a4%a4-%e0%a4%b8%e0%a5%87-%e0%a4%ae%e0%a5%80%e0%a4%a1%e0%a4%bf%e0%a4%af%e0%a4%be-%e0%a4%95%e0%a5%80/attachment/pigeons-on-mobile-tower2/"><img class="alignright size-full wp-image-12238" title="Pigeons on Mobile Tower2" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/Pigeons-on-Mobile-Tower2.jpg" alt="" width="300" height="400" /></a>संचार क्रांति के दौर में मीडिया ने भी लंबी छलांग लगायी है। मीडिया के माध्यमों में रेडियो, अखबार, टी.वी., खबरिया चैनल, अंतरजाल और मोबाइल सहित आये दिन विकसित हो रहे अन्य संचार तंत्र समाचारों को क्षण भर में एक जगह से कोसों दूर बैठे लोगों तक पहुंचाने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं। बात साफ है, बढते प्रतिस्पर्धा के दौर में मीडिया का दायरा व्यापक हुआ है। राष्ट्रीय अखबार राज्यस्तरीय और फिर जिलास्तरीय प्रकाशन पर उतर आये हैं। कुछ ऐसा ही हाल, राष्ट्रीय स्तर के टीवी चैनलों का भी है। चैनल भी राष्ट्रीय से राजकीय और फिर क्षेत्रीय स्तर पर आकर अपना परचम लहरा रहे हैं।</p>
<p style="text-align: justify;">मीडिया चाहे प्रिंट हो या इलेक्ट्रानिक सभी ज्यादा-से-ज्यादा ग्राहकों / श्रोताओं तक अपनी पहुंच बनाना चाहते हैं। यकीनन आज बाजार, मीडिया पर हावी हो चुका है। अखबार और टीवी आपसी प्रतिस्पर्धा में आ गये हैं। मीडिया का स्वरूप आज बदल चुका है। राष्ट्रीय अवधारणा में तबदीली हो चुकी है। एक अखबार राष्ट्रीय राजधानी फिर राज्य की राजधानी और फिर जिलों से प्रकाशित हो रही है। इसके पीछे भले ही शुरूआती दौर में, समाचारों को जल्द से जल्द पाठकों तक ले जाने का मुद्दा रहा हो। लेकिन आज खबर पर, बाजार का मुद्दा हावी है। हर बड़ा अखबार समूह इसे देखते हुए अपने प्रकाशन के दायरे को बढ़ाने में लगा है। और आये दिन बड़े पत्र समूह छोटे-छोटे जिलों से समाचार पत्रों के प्रकाशन की घोषणा करते आ रहे है। एक अखबार दस राज्यों से भी ज्यादा प्रकाशित हो रहा है और उस राज्य के कई जिलों से भी प्रकाशन किया जा रहा है। साथ में दर्जनों संस्करण निकाले जा रहे हैं। दैनिक हिन्दुस्तान, दैनिक जागरण, दैनिक भाष्कर, दैनिक आज, राजस्थान पत्रिका, प्रभात खबर जैसे कई समाचार पत्र हैं, जो कई राज्यों की राजधानी के अलावा राज्य के कई जिलों से कई संस्करण प्रकाशित कर रहे हैं। राष्ट्रीय अखबार क्षेत्रीय में तब्दील हो चुके हैं। जो नहीं हुए है वे भी प्रयास कर रहे हैं। पूरे मामलों में देखा जा रहा है कि एक ओर कुछ अखबार समूहों ने अपने प्रसार/प्रकाशन को बढ़ाया है तो वहीं कुछ समाचार पत्रों का दायरा सिमटा है। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि भारत की ज्यादा आबादी गांव में रहती है, फिर भी एक भी बड़ा अखबार समूह ग्रामीण क्षेत्रों को केन्द्र में रखकर प्रकाशन नहीं करता है।</p>
<p style="text-align: justify;"><a rel="attachment wp-att-12239" href="http://www.janokti.com/hindi-news-media-%e0%a4%9a%e0%a5%8c%e0%a4%a5%e0%a4%be-%e0%a4%96%e0%a4%82%e0%a4%ad%e0%a4%be-cinema-media-blog-fourth-pilar/hindi-media-%e0%a4%ae%e0%a5%80%e0%a4%a1%e0%a4%bf%e0%a4%af%e0%a4%be/%e0%a4%97%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%ae%e0%a5%80%e0%a4%a3-%e0%a4%ad%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a4%a4-%e0%a4%b8%e0%a5%87-%e0%a4%ae%e0%a5%80%e0%a4%a1%e0%a4%bf%e0%a4%af%e0%a4%be-%e0%a4%95%e0%a5%80/attachment/village-of-india/"><img class="alignleft size-medium wp-image-12239" title="village of india" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/village-of-india-300x200.jpg" alt="" width="300" height="200" /></a>ग्रामीण क्षेत्र आज भी प्रिंट मीडिया से अछूते हैं। देश के कई गांवों में समाचार पत्र नहीं पहुंच पा रहे हैं। अंतिम कतार में खड़े व्यक्ति तक केवल आकाशवाणी की पहुंच बनी हुई है। भले ही प्रिंट मीडिया ने काफी तरक्की कर ली हो। संस्करण पर संस्करण प्रकाशित हो रहा हो। लेकिन, ये अखबार ग्रामीण जनता से कोसों दूर हैं। जो एक बड़ा सवाल है। देखा जाये तो जिले स्तर पर अखबरों के प्रकाशन के पीछे शहरी तबके को ही केन्द्र में रख कर प्रकाशन किया जा रहा है। अखबार की बिक्री ब्लॉक तक होती है। गांवों में अखबारों की पहुंच हो इस दिशा में शायद ही किसी मीडिया हाउस ने सार्थक प्रयास किया हो। सच तो यह है कि किसी एक गांव में समाचार पत्रों की प्रतियां 100 का आंकड़ा भी पार नहीं कर पाती है। बिहार को ही ले, यहां 8463 पंचायत हैं और इस पंचायत के तहत लाखों गांव आते हैं। फिर भी अखबारों की पहुंच सभी पंचायतों तक नहीं है। नवादा जिले में 187 पंचायत है। ब्लॉक की संख्या 14 है और गांव की संख्य 1099 है। इनमें मात्र 200 गांवों में अखबार पहुंचने की बात कही जाती है। अखबारों का सर्कुलेशन प्रति गांव कम से कम 10 और ज्यादा से ज्यादा 30 है। इस बात से अंदाजा लगाया जा सकता है कि बिहार के एक जिले के हजारों गांवों में मात्र 20 प्रतिशत से भी कम गांव प्रिंट मीडिया के दायरे में हैं। समाचार पत्र समूह शहरों को केंद्र में रख कर खबरों का प्रकाशन करते हैं । क्योंकि, शहर एक बहुत बड़ा बाजार है और समाचार पत्रों में बाजार को देखते हुए शहर एवं ब्लॉक की खबरों को ही तरजीह दी जाती है। ब्लॉक स्तर पर अखबारों के लिए समाचार प्रेषित करने वाले पत्रकारों का मानना है कि ग्रामीण क्षेत्र में बाजार का आभाव है। यानी ग्रामीणों की आर्थिक स्थिति सामने आती है। किसान फटे हाल हो और अनपढ़ हो तो, ऐसे में अखबार भला वह क्यों खरीदें ? हालांकि यह पुरी तरह से स्वीकार्थ नहीं है क्योंकि अब गांवों में पढ़े लिखों की संख्या बढ़ी है। प्राथमिक विद्यालय सक्रिय है या फिर नौकरी पेशे से जुड़े लोग जब गांव जाते हैं तो उन्हें अखबार की तलब होती है। ऐसे में वे पास के ब्लॉक में आने वाले समाचार पत्र को मंगवाते हैं। कई सेवानिवृत्त लोग या फिर सामाजिक कार्यकत्ता चाहते है कि उनके गांव में समाचार पत्र आये। हालांकि इनकी संख्या काफी कम होती है फिर भी ऐसे कई गांव है जहां लोग अपनी पहल पर अखबार मंगवाते हैं।</p>
<p style="text-align: justify;">गांव से अछूते अखबारों के पीछे देखा जाये तो समाचार पत्र समूहों का रवैया भी एक कारण है। शहरों से छपने वाले समाचार पत्रों को गांव की खबरों से कोई लेना-देना नहीं रहता। अखबारों में गांव की खबरें नहीं के बराबर छपती है। जो भी खबर छपती है वह ब्लॉक में पदस्थापित प्रतिनिधियों से मिलती है वह भी ज्यदातर सरकारी मामलों पर केन्द्रीत रहती है। ब्लॉक का प्रतिनिधि ब्लॉक की खबरों को ही देने में दिलचस्पी रखता है ताकि ब्लॉक लेवल में अखबार बिक सकें। गांव की एकाध खबरें ही समाचार पत्रों को नसीब हो पाता है। जब तक कोई बड़ी घटना न घट जाए तब तक गांव की खबर अखबार की सुर्खियां नहीं बन पाती। गांव पूरी तरह से मीडिया के लिए अपेक्षित है। जबकि गांव में जन समस्या के साथ-साथ किसानों की बहुत सारी समस्याएं बनी रहती है। बिहार के पूर्णिया जिले के बनमंखी प्रखड के मसूरियामुसहरी गंव के प्रथमिक स्कूल में डेढ़ साल में कभी कभार शिक्षक पढाने आते थे। लेकिन, आकाशवाणी पर 9 दिसंबर 2010 इस संबंध में खबर आयी। खबर के आने के बाद प्रशासन हरकत में आयी और दूसरे दिन से स्कूल में शिक्षक आने लगे। बात साफ है मीडिया की नजर गांव पर पड़ेगी तो गांव खबर में आयेगा और वहाँ की जनसमस्याओं पर प्रशासन सक्रिय हो पायेगा। हालांकि कभी कभार मीडिया में गांव की खबरें आती है लेकिन वह कई दिनों के बाद। असके पीछे कारण यह है कि मीडिया से जुड़े लोग शहर और कस्बा, ब्लॉक तक ही सीमित है। अखबार वाले अपने प्रतिनिधियों को गांव में नहीं रखते। इसके पीछे आर्थिक कारण नहीं है क्योंकि ज्यादातर अखबरों के ब्लॉक प्रतिनिधि बिना किसी मेहनाता के रखे जाते है। अगर वे विज्ञापन लाते हैं तो उन्हें उसका कमीशन भर दिया जाता है।</p>
<p style="text-align: justify;">ग्रामीण भारत के नजरिए से देखा जाए तो कई गांवों में टीवी सेट नहीं हैं। असके पीछे बिजली का नहीं होना सबसे बड़ा कारण है। हालांकि ब्लॉक के करीब के गांवों में टीवी सेट ही नहीं केबल टीवी आ चुका है या फिर बैटरी पर ग्रामीण टीवी का मजा लेते हैं। जहां तक बिहार के गांवों का सवाल है, प्रत्येक घर में टीवी सेट उपलब्ध नहीं है। कमोबेश देश के अन्य राज्यों के गांवों में भी यही स्थिति बनी हुई है। बडा ही र्दुभाग्य की बात है कि संचार क्रांति के दौर में गांवों में शहरों की तरह समाचार पत्र/ टीवी सेट तो नहीं पहुंच है। लेकिन मोबाइल फोन ने ग्रामीण क्षेत्र को अपने कब्जे में ले लिया है। गांव का मुखिया हो या मनरेगा में काम करने वाला मजदूर आज मोबाइल के दायरे में आ चुका है। एनआरएस-2002 के आंकडे से पता चलता है कि बिहार के गांवों में 18 घरों में से केवल एक घर में टी.वी सेट था। पंजाब में पांच से तीन था। वहीं उत्तर प्रदेश के गांवों में 80 प्रतिशत घरों में टी.वी. नहीं था।</p>
<p style="text-align: justify;">इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि जो मीडिया सिर्फ देश की राजधानी तक ही सीमित हुआ करता था आज वह राजपथ से होते हुए कस्बा और गांव तक पहुंच चुका है। थोड़ी देर के लिए प्रिंट मीडिया को दरकिनार कर दें तो पाएंगे कि रेडियो पत्रकारिता की पहुंच गांवों में ज्यादा है। प्रयास प्रिन्ट मीडिया का भी होना चाहिए इस दिशा में आगे आने की जरूरत है।</p>
<p style="text-align: justify;">
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		<title>टीवी एंकर सईद अंसारी का नया शो-स्टार-ट्रैक</title>
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		<pubDate>Tue, 28 Sep 2010 15:49:17 +0000</pubDate>
		<dc:creator>दीपाली पाण्डेय</dc:creator>
				<category><![CDATA[चौथा खंभा]]></category>
		<category><![CDATA[आकाशवाणी]]></category>
		<category><![CDATA[टीवी एंकर सईद अंसारी]]></category>
		<category><![CDATA[न्यूज़ २४]]></category>
		<category><![CDATA[मीडिया]]></category>
		<category><![CDATA[स्टार टीवी]]></category>

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		<description><![CDATA[रंजन जैदी अच्छी खबर यह है कि जाने-माने टीवी एंकर, लिम्का बुक ऑफ वर्ल्ड रेकॉर्ड विजेता सईद अंसारी अब न्यूज़ २४ के नए शो स्टार-ट्रैक को होस्ट करेंगे. अनुमान है कि यह एक ऐसा प्रोग्राम होगा जिसमें देश-विदेश के महत्वपूर्ण ]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><strong><a rel="attachment wp-att-7841" href="http://www.janokti.com/hindi-news-media-%e0%a4%9a%e0%a5%8c%e0%a4%a5%e0%a4%be-%e0%a4%96%e0%a4%82%e0%a4%ad%e0%a4%be-cinema-media-blog-fourth-pilar/%e0%a4%9f%e0%a5%80%e0%a4%b5%e0%a5%80-%e0%a4%8f%e0%a4%82%e0%a4%95%e0%a4%b0-%e0%a4%b8%e0%a4%88%e0%a4%a6-%e0%a4%85%e0%a4%82%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%a8%e0%a4%af/attachment/sayeed-ansari/"><img class="alignright size-full wp-image-7841" title="Sayeed-Ansari" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/Sayeed-Ansari.jpg" alt="" width="200" height="200" /></a>रंजन जैदी </strong></p>
<p style="text-align: justify;"><span style="font-size: 13.3333px;">अच्छी खबर यह  है कि जाने-माने टीवी एंकर, लिम्का बुक ऑफ वर्ल्ड रेकॉर्ड विजेता सईद अंसारी अब  न्यूज़ २४ के नए शो स्टार-ट्रैक को होस्ट करेंगे. अनुमान है कि यह एक ऐसा प्रोग्राम होगा जिसमें देश-विदेश के महत्वपूर्ण व्यक्तियों से वह दर्शकों के लिये बातचीत कर सकेंगे.शो सम्बन्धी खाके के बारे में तो सईद अंसारी  और न्यूज़ २४ की सर्वे-सर्वा अनुराधा प्रसाद ही प्रकाश डाल सकते हैं. सईद अंसारी से अभी पिछले माह ही मेरी प्रेस क्लब में आयोजित एक संगोष्ठी में भेंट हुई थी. तब मैंने कहा था कि ऐसे कार्यक्रम क्यों प्लेन नहीं करते जो खुद की प्रतिभा को तो सामने लायें ही, चैनल को भी स्तरीयता प्राप्त हो. चैनल अभी तक अपनी खास पहचान नहीं बना पाया है. कारण यह है कि उसके पास क्षमता और प्रतिभाओं की कमी नहीं है. यदि है तो उस परिकल्पना की जो अच्छे कार्यक्रमों की सर्जना  का उत्स जगाती है. अनुराधा प्रसाद एक प्रतिभाशाली पत्रकार हैं. उनके पास क्षमता की भी कमी नहीं है, किन्तु  ऐसे नीति नियंता  उनके पास नहीं हैं , जो अच्छे कार्यक्रमों के सर्जक बन सकें. सईद अंसारी जैसे एंकर की प्रतिभा को भी न्यूज़ २४ अबसे पहले तक पहचान ही नहीं पाया.  जब कि  न्यूज़ २४ की  सर्वे-सर्वा अनुराधा प्रसाद  प्रतिभाओं  की पारखी बताई जाती है. बहुत पहले मैंने एक लेख में भी सईद अंसारी की प्रतिभा का ज़िक्र किया था. आप के पास मिटटी है लेकिन आप को चाक प़र बर्तन बनाना नहीं आता है तो  आपके लिये मिटटी बेकार है. अगर आप अच्छे कुम्हार हैं, शिल्पी  हैं तो आपके मिटटी के बधने (वह बर्तन जिससे मस्जिद में नमाज़ी वुजू करते हैं)  मस्जिद में और मूर्ति मंदिर तक पहुँच जाएगी.  यही शक्ल पारखी की होती है.  अनुराधा ने पहचाना, प़र देर से.  अब सईद अंसारी को अपनी प्रतिभा का परिचय देना होगा. चुनौतियां कम नहीं होंगीं.  इंडिया टीवी के रजत शर्मा इस जैसे कार्यक्रम (आपकी अदालत) से ही जाने जाते हैं. इस तरह के कार्यक्रमों के जनक तो जाने-माने पत्रकार विनोद दुआ हैं. दिल्ली दूरदर्शन प़र अपने समय में उनका धमाल सबने देखा है. सईद अंसारी का मीडिया-सफ़र आकाशवाणी से शुरू हुआ था. तरक्की की मंजिलें तय करते हुए वह स्टार टीवी तक पहुंचे.  उनकी एंकरिंग में जो  शोज़ स्टार टीवी प़र आते थे,  वे कमज़ोर नहीं होते थे. उनका एक शो कानून से सम्बंधित था, जो दर्शकों को बेहद जानकारी उपलब्ध कराता था,  आज ऐसे कार्यक्रम नहीं हैं. सईद ने उस कार्यक्रम को नयी ऊर्जा दी थी.  यह उनके हौसले और उनकी प्रतिभा का ही कमाल था कि सन २००७ में उन्हें लिम्का बुक ऑफ वर्ल्ड रेकॉर्ड में जगह दी गयी. यह सच है कि प्रतिभाएं कहीं भी हों, अपनी खुशबू अवश्य बिखेरती है. न्यूज़ २४ का नया शो स्टार-ट्रैक  सफलता की ऊँचाइयाँ  छुए, यही मेरी दुआ है.  देर आयद, दुरुस्त आयद.</span></p>
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		<title>मीडिया का इस्तेमाल करते नक्सली</title>
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		<pubDate>Sat, 18 Sep 2010 16:46:46 +0000</pubDate>
		<dc:creator>संजय कुमार</dc:creator>
				<category><![CDATA[चौथा खंभा]]></category>
		<category><![CDATA[नक्सली]]></category>
		<category><![CDATA[मीडिया]]></category>

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		<description><![CDATA[बिहार के लखीसराय जिले में पिछले दिनों नक्सली-पुलिस मुठभेड़ और फिर कुछ पुलिसकर्मियों को नक्सलियों द्वारा बंधक बनाये जाने की घटना ने जहां शासन-प्रशासन-राजनीतिक गलियारे और आम जन में हलचल पैदा कर दी। अपने साथियों को छुड़वाने की शर्त को ]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><a rel="attachment wp-att-7371" href="http://www.janokti.com/hindi-news-media-%e0%a4%9a%e0%a5%8c%e0%a4%a5%e0%a4%be-%e0%a4%96%e0%a4%82%e0%a4%ad%e0%a4%be-cinema-media-blog-fourth-pilar/7370/attachment/71c42f01d961fe6e25799f_large/"><img class="alignleft size-full wp-image-7371" title="naksalwadi " src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2010/09/71C42F01D961FE6E25799F_Large.jpg" alt="" width="400" height="300" /></a><span style="font-size: medium;"><br />
बिहार के लखीसराय जिले में पिछले दिनों नक्सली-पुलिस मुठभेड़ और फिर कुछ पुलिसकर्मियों को नक्सलियों द्वारा बंधक बनाये जाने की घटना ने जहां शासन-प्रशासन-राजनीतिक गलियारे और आम जन में हलचल पैदा कर दी। अपने साथियों को छुड़वाने की शर्त को मनवाने के लिए नक्सलियों ने हवलदार लुकस टेटे की हत्या कर माओवादी विचारधारा को कलंकित कर तालिबानी सोच को सामने ला दिया है। हवलदार लुकस टेटे की हत्या नक्सलियों की जीत नहीं बल्कि उनकी हार है। दबे- कुचले और जनता की लड़ाई लड़ने का ढकोसला करने वाले तथाकथित नक्सलियों ने साफ कर दिया है कि उनकी सोच विचारधारा से नहीं चलती है ? क्योंकि, केवल हवलदार लुकस टेटे की हत्या नहीं हुई है बल्कि  टेटे के पूरे परिवार की हत्या हुई है ! घर चलाने वाला टेटे अब नहीं रहा। टेटे का दोष सिर्फ रहा कि वह एक पुलिसकर्मी था। छतीसगढ़ हो या बिहार की नक्सली घटना और वह उस समाज से आया था जिसे समाज के मुख्यधारा में आने के लिए आज भी संघर्ष करना पड़ रहा है।</p>
<p>हवलदार लुकस टेटे की हत्या नक्सलियों ने सरकार पर दबाव बनाने की कोशिश के तहत की है। हालांकि पूरे प्रकरण में सबसे हैरान करने वाली बात यह रही है कि नक्सली अपनी शर्त मनवाने के लिये अपनी बात मीडिया के माध्यम से रविवार, 31 अगस्त से ही लगातार वार्ता का मैसेज दे रहे थे। एक बंधक की हत्या के बाद सरकार वार्ता के लिए तैयार है तो नक्सलियों ने चुप्पी साध ली है। इससे यही प्रतीत होता है कि नक्सलियों ने अपने बजूद के लिए ऐसा किया और इसके लिए मीडिया का बेजा इस्तेमाल किया। बंधक बनाये पुलिसकर्मियों की हत्या कर देने की खबर को नक्सलियों ने मीडिया में फैलाया। पहले अभय यादव की हत्या कर उसके शव को अभयपुर रेलवे स्टेशन के पास फेंकने की खबर मीडिया तक पहुंचायी। खबरिया चैनलों में खबर भी चली। खबर की पुष्ठि को लेकर अफरातफरी मची।<br />
मीडिया ने भी इस गलत खबर को अपुष्ट रूप से चलाया। बिहार और राष्ट्रीय मीडिया का इस्तेमाल हुआ। और फिर नक्सलियों ने हवलदार लुकस टेटे की हत्या कर दी। खबर को मीडिया तक नक्सलियों ने फिर पहुंचायी। चार अगस्त को सरकार द्वारा बुलाई गई सर्वदर्लीय बैठक में एक स्वर से सभी ने नक्सलियों से बंधक बनाये गये पुलिसकर्मियों को छोड़ने और वार्ता की, अपील की। पांच अगस्त को अपुष्ठ खबर सुबह को आने लगी कि नक्सलियों ने तीनों बंधक बनाये गये पुलिसकर्मियों को छोड़ दिया है।<br />
पूरे प्रकरण में नक्सलियों ने मीडिया का इस्ताल करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। नक्सली या माओवादी शब्द आज किसी परिचय का मोहताज नहीं है और न ही किसी एक राज्य के दायरे से बंधा है। इधर नक्सलियों की क्रूरता ने पूरे समाज को अपने गिरफ्त में ले रखा है। लड़ाई भले ही सरकार से उनकी हो लेकिन निशाने पर आम आदमी है। पुलिसकर्मी हो या अफसर आखिर वह भी तो समाज से जुड़ा है और आम आदमी ही है। व्यवस्था नहीं, सरकार नहीं। जीविका के लिए सेवा में आता है। </span><span style="font-size: medium;">वैश्विक</span><span style="font-size: medium;">रण के इस दौर में नक्सलवाद भी </span><span style="font-size: medium;">वैश्विक</span><span style="font-size: medium;"> हो गया है। ऐसे में आज नक्सलवाद समाज व मानवता के सामने एक बड़ा प्रश्न बन कर सामने आया है। वैश्विक होते नक्सलवाद के दायरे में आम खास लोग निशाने पर आ चुके हैं। बंगाल, छत्तीसगढ़, बिहार, झारखंड समेत अन्य नक्सल प्रभावित राज्यों में घटित घटनाएं गवाह है। यह सब </span><span style="font-size: medium;">वैश्विक</span><span style="font-size: medium;"> </span><span style="font-size: medium;">नक्सलवाद </span><span style="font-size: medium;">का ही नतीजा है।<br />
नक्सली या माओवादी आधुनिक तकनीक का भरपूर इस्तेमाल कर रहे हैं। साथ ही सबसे ताकतवर माध्यम मीडिया का इस्तेमाल करने से वे नहीं चूकते हैं। खास तौर से खबरिया चैनलों का। इसका फायदा यह है कि नक्सली अपने विचारधारा को नहीं बल्कि आतंक को मीडिया के माध्यम से तुरंत लोगों तक पहुंचा देने में सफल हो जाते हैं।<br />
दूसरी ओर मीडिया की नजर नक्सलियों पर रहती है तो नक्सलियों की भी मीडिया पर। दोनों एक दूसरे का इस्तेमाल कर रहे हैं। एक अपने को स्थापित करने के लिए दूसरा अपने को बाजार में बनाये रखने के लिए। सबसे अहम् बात यह है कि भूमंडलीकरण के इस युग में जहां नक्सलवाद </span><span style="font-size: medium;">वैश्विक</span><span style="font-size: medium;"> हो गया है वहीं मीडिया भी। ऐसे में मीडिया तक खबर गलत-सही को पहुंचाते रहते है। एक ओर अपनी बात बताने के लिए पत्रकारों को न्यौता देकर बुलाते हैं। अपनी पीड़ा बताते हैं दूसरी ओर अपराधियों की तरह हत्या कर दहषत फैलाने का काम करते है। इस दोहरी मानसिकता का औचित्य क्या है सवाल खड़ा कर जाता है।<br />
देश  में नक्सली घटना को अंजाम देने के लिए विदेश  सहयोग की भी खबरें आती रहती है। </span><span style="font-size: medium;">वैश्विक</span><span style="font-size: medium;">रण के तमाम तंत्र का इस्तेमाल किया जाता है। हाल के नक्सली घटनाओं से साफ है कि इनका मकसद धारा से नहीं बल्कि मानवता को डराते हुए अपने को स्थापित करना है। ताकि लोग डर जाये और नक्सलवाद के समक्ष घुटने टेक दे। पूरे घटना को मीडिया के माध्यम से विष्व के समक्ष परोसा जा रहा है। और शायद </span><span style="font-size: medium;">वैश्विक</span><span style="font-size: medium;"> नक्सलवाद की मंशा  यही रही हो !<br />
लखीसराय की नक्सली घटना  कई दिनों तक हवा में तैरती रही। पुलिसकर्मियों की हत्या या फिर उन्हें छोड़ने की खबर अपुष्ट तौर पर हिचकोले खाती रही। मीडिया घटना को सबसे पहले दिखाने की होड़ में लगी रही। खबर का बाजार गर्म रहा। यहां कहने से परहेज नहीं कि नक्सलियों ने मीडिया का इस्तेमाल कर लिया। जहां मीडिया ने अपने मीडियाधर्म के तहत घटनाक्रम को दिखाया वहीं घटना को अंजाम देने वाले नक्सली मीडिया के सहारे अपने खिलाफ पुलिसिया घेरा बंदी की जानकारी पाने से नहीं चूकते। नक्सलियों की पहली तस्वीर इसी चैनल पर, सबसे पहले इसी चैनल पर, सिर्फ और सिर्फ इसी चैनल पर, के आपसी होड़ ने मीडिया की भूमिका को लेकर सवाल खड़े किये। जो कुछ मिला उसे फटाफट जीवंत दिखाने की होड़ ने मीडिया की भूमिका पर सवाल उठाये हैं। कई उदाहरण पड़े हैं जिसे चैनलों ने दिन रात दिखा कर अति कर दी। तब भी सवाल उठे कि क्या मीडिया को इतना दिखाना उचित था। आतंकी हमलों के साथ भी कुछ ऐसा होता है। घटना होने पर उसे दिन रात खींचा जाता है।<br />
</span><span style="font-size: medium;">वैश्विक</span><span style="font-size: medium;">रण के दौर में आज जहां मीडिया आधुनिक और तेवरदार हुआ है वहीं देश , दुनिया और मानवता को हिला कर रख देने वाला नक्सलवाद भी उसी की राह पर चलते हुए अपने को आधुनिक बना लिया है। ऐसे में मीडिया को अपना हर कदम फूंक &#8211; </span><span style="font-size: medium;">फूंक</span><span style="font-size: medium;"> कर रखने की जरूरत है।<br />
</span></p>
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