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	<title>JANOKTI : जनोक्ति :  राज-समाज और जन की आवाज &#187; मीडिया-संसार</title>
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	<description>राज-समाज और जन की आवाज</description>
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		<title>बिरहा का एक लोकप्रिय स्वर जाता रहा और आहट तक नहीं हुई !</title>
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		<pubDate>Thu, 09 Sep 2010 13:19:49 +0000</pubDate>
		<dc:creator>माणिक जी</dc:creator>
				<category><![CDATA[कला-साहित्य]]></category>
		<category><![CDATA[बिरहा गायन]]></category>
		<category><![CDATA[मीडिया-संसार]]></category>
		<category><![CDATA[राम कैलाश यादव]]></category>
		<category><![CDATA[लोक गायकी]]></category>
		<category><![CDATA[संगीत नाटक आकादेमी]]></category>

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			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><a rel="attachment wp-att-6712" href="http://www.janokti.com/%e0%a4%95%e0%a4%b2%e0%a4%be-%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%b9%e0%a4%bf%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%af/%e0%a4%ac%e0%a4%bf%e0%a4%b0%e0%a4%b9%e0%a4%be-%e0%a4%97%e0%a4%be%e0%a4%af%e0%a4%a8-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%8f%e0%a4%95-%e0%a4%b2%e0%a5%8b%e0%a4%95%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%bf%e0%a4%af/attachment/ram-kailash-yadav-photo-by-shreeni/"><img class="alignright size-medium wp-image-6712" title="Ram Kailash Yadav .Photo by Shreeni" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2010/09/Ram-Kailash-Yadav-.Photo-by-Shreeni-300x199.jpg" alt="" width="300" height="199" /></a>बात हो हल्ले की नहीं है  मगर फिर कुछ तो आहट होनी थी उसके जाने पर जो उसके काम को बाकी दुनिया की तरफ से  सही आदर हो सकता था.,मगर ऐसा कुछ हुआ नहीं. गाँव के ठेठपन को आभास कराता एक लोककलाविद हमारे बीच अपने सादेपन और लोक गायकी की खुशबू बिखेरता हुआ ही अचानक चल बसा और मीडिया  जगत में आहट तक ना हुई.दिल तब अधिक दु;खता  है जब देश का कोई सादगी संपन्न कलाकार ये जहां चुपचाप छोड़ जाता है. उसके मरने के बाद उसके काम को सभी रोते देखें हैं मगर इस  बार यूं.पी.के बिरहा गायन को ना केवल ज़िंदा रखने बल्कि अपने और से उसे समृद्ध और संपन्न बनाने में कोइ कसर नहीं छोड़ने वाले  उसी दिशा में अपना जीवन फूँक देने वाले राम कैलाश यादव जी को क्या मिला.वैसे जो भी उनके संपर्क में आया वो ही समझ सकता है कि वक्त के साथ बिरहा के कानफोडू होने और बिगड़  जाने की हद तक आने पर उनका काम कितना महत्वपूर्ण है.जो सदा याद आयेगा. देश की कलापरक संस्थाएं ये आभास आज भी करती हैं.खैर भौतिकतावादी इस युग में कलापरक बात करना बीन बजाना लगने  लगा है. इनसे अच्छा तो कुछ संस्कृतिप्रेमी मित्रों  के साथ एक बैठक कर उन्हें याद कर लें बेहतर लगता है.वो भी बिना प्रेस नोट जारी किए.क्योंकि इस तरह के  प्रेस नोट छप जाना कम आश्चर्यजनक बात नहीं है.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">हमारे अपने जीवन से ही कुछ प्रमुख और जरूरी मूल्यों की बात अपने संगीतपरक कार्यक्रम के ज़रिए  करने वाले <span class='wp_keywordlink_affiliate'><a href="http://www.janokti.com/tag/%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%ae-%e0%a4%95%e0%a5%88%e0%a4%b2%e0%a4%be%e0%a4%b6-%e0%a4%af%e0%a4%be%e0%a4%a6%e0%a4%b5/" title="View all posts in राम कैलाश यादव" target="_blank">राम कैलाश यादव</a></span> <span class='wp_keywordlink_affiliate'><a href="http://www.janokti.com/tag/%e0%a4%b8%e0%a4%82%e0%a4%97%e0%a5%80%e0%a4%a4-%e0%a4%a8%e0%a4%be%e0%a4%9f%e0%a4%95-%e0%a4%86%e0%a4%95%e0%a4%be%e0%a4%a6%e0%a5%87%e0%a4%ae%e0%a5%80/" title="View all posts in संगीत नाटक आकादेमी" target="_blank">संगीत नाटक आकादेमी</a></span> से सम्मानित आम आदमी के गायक थे.उनके साथ पिछले दिनों आई.आई.टी.कानपुर में स्पिक मैके के राष्ट्रीय अधिवेशन  के तहत  छ; दिन रहने का मौक़ा मिला.जहां उनकी सेवा और उनके साथ कुछ हद तक अनौपचारिक विचार-विमर्श के साथ ही वहीं उनके गाये-सिखाए लोक गीतों पर रियाज़ के दौर बहुत याद आते हैं . अब तो वे  ज्यादा गहरी यादों के साथ हमारे बीच हैं,क्योंकि वे चल बसे.आदमी के चले जाने के बाद वो ज्यादा प्यारे हो जाते हैं.ये ज़माने की फितरत भी तो  है.उसी ज़माने में खुद को अलग रख पाना बहुत मुश्किलाना काम है.गांवों-गलियों और पनघट के गीत गाने वाला एक मिट्टी का लाडला ह्रदय गति से जुडी बीमारी  के कारण चल बसा.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">वे अपने मृत्यु के अंतिम  साल में भी हमेशा की तरह भारतीय संकृति पर यथासमय भारी लगने  वाली अन्य संस्कृतियों के हमले से खासे नाराज़ नज़र आते थे. कानपुर में उनका कहा एक  वाक्य आज भी कचोटता है कि आज के वक्त में खाना और गाना दोनों ही खराब हो गया है.ठेठ यूं.पी. की स्टाइल  में कही जाने वाली उनकी बातें भले ही कई बार समझ में नहीं आती हों लेकिन उनका लहजा और उस पर भी भारी उनके चहरे पर आने वाली अदाएं असरदार होती है.धोती-कुर्ते के साथ  उनके गले में एक गमछा सदैव देखा जा सकता था.उनके गाए गीतों में अधिकांशत; अपने मिट्टी की बात है या कुछ हद तक उन्होंने मानव समाझ से जुड़ी बुराइयों पर खुल कर गाया बजाया है.उनके कुछ वीडियो और ऑडियो गीत नेट पर मिल जायेंगे,मगर नहीं मिल पाएगा तो राम कैलाश  यादव का मुकराता चेहरा.ज्यादातर उनके गायन की शुरुआत में ओ  मोरे राम ,हाय मोरे बाबा,मोरे भोले रसिया  कहते हैं.और उस पर भी भारी  उनके पीछे टेर लगाकर गाते उनके साथी . आज उनके बगैर बहुर अधूरे लगते हैं.कोइ तो उनके साथ गाते बजाते बुढा हो तक गया है.</p>
<p style="text-align: justify;">अपने सभी मिलने वालों में भगवान् के दर्शन करने वाले निरंकारी भाव वाले गुरूजी के कई संगीत एलबम निकाले हैं. जिनमें उन्नीस सौ पिच्चानवें से अठ्यानवें के बीच निकले सती सुलोचना,दहेज़,क्रांतिकारी चंद्रशेखर आज़ाद,अभिमानी रावण ख़ास हैं.उन्होंने देशभर के लगभग सभी बड़े शहरों को अपने कार्यक्रम से नवाज़ा था.उनके साथ लोक वाध्य यंत्रों की एक पांच-छ; कलावृन्द  की मंडली होती रही.वे खुद खड़े होकर अपनी प्रस्तुती देते थे. बीच-बीच में कुछ अंगरेजी डायलोग बोलना और मूछों पर हाथ फेरना उन पर फबता था.उनसे सिखा एक गीत आज भी याद है जो मैं गुनगुनाता हूँ. बिरहा का कजरी में गाया जाने वाला ये एक ठेठ  रंग है.कि</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">हमरे नईहर से घुमरी घुमरी आवे बदरा</p>
<p style="text-align: justify;">आवे बदरा आवे बदरा ,हमरे ………….</p>
<p style="text-align: justify;">जाईके  बरस बदरा वांई  धोबी घटवा</p>
<p style="text-align: justify;">जहां धोबइन  भीगोईके पछारे कपड़ा</p>
<p style="text-align: justify;">हमरे नईहर से घुमरी घुमरी आवे बदरा   ……………..</p>
<p style="text-align: justify;">जाईके  बरस बदरा वांई रे कुंवनियाँ</p>
<p style="text-align: justify;">जहां पनिहारिन निहुरिके भरत बा घघरा</p>
<p style="text-align: justify;">हमरे नईहर से घुमरी घुमरी आवे बदरा   ……………..</p>
<p style="text-align: justify;">जाईके  बरस बदरा वांई रे महलियाँ</p>
<p style="text-align: justify;">जहां बिरहिन निहारता पिया का डगरा</p>
<p style="text-align: justify;">हमरे नईहर से घुमरी घुमरी आवे बदरा   ……………..</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">जाईके  बरस बदरा वांई फूल बगियाँ</p>
<p style="text-align: justify;">जहां मलिनिया बईठके  गुहत बा गुजरा</p>
<p style="text-align: justify;">हमरे नईहर से घुमरी घुमरी आवे बदरा   ……………..</p>
<p style="text-align: justify;">जाईके  बरस बदरा धनवा के खेतवा</p>
<p style="text-align: justify;">जहां जोहतबा किसानिन उठाईके नजारा</p>
<p style="text-align: justify;"><a rel="attachment wp-att-6711" href="http://www.janokti.com/%e0%a4%95%e0%a4%b2%e0%a4%be-%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%b9%e0%a4%bf%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%af/%e0%a4%ac%e0%a4%bf%e0%a4%b0%e0%a4%b9%e0%a4%be-%e0%a4%97%e0%a4%be%e0%a4%af%e0%a4%a8-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%8f%e0%a4%95-%e0%a4%b2%e0%a5%8b%e0%a4%95%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%bf%e0%a4%af/attachment/ram-kailash-yadav-in-spic-macay-national-convention-in-iitkanpur-2010-photo-by-shreeni/"><img class="alignleft size-medium wp-image-6711" title="Ram Kailash Yadav in SPIC MACAY National Convention in IIT,KANPUR ,2010. Photo by Shreeni" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2010/09/Ram-Kailash-Yadav-in-SPIC-MACAY-National-Convention-in-IITKANPUR-2010.-Photo-by-Shreeni-300x199.jpg" alt="" width="300" height="199" /></a>उनके नहीं रहने के पांच दिन बाद ये  खबर मुझे कोटा,राजस्थान के संस्कृतिकर्मी और  स्पिक मैके के राष्ट्रीय सलाहकार अशोक जैन और स्पिक मैके कार्यकर्ता वीनि कश्यप ने दी . मैं एक ही बात सोच रहा था कि इस  ज़माने में कलाकार तो बहुत मिल जाते हैं मगर सही इंसान नहीं मिल पाते .आज के  दिन एक कलाकार के साथ के रूप में याद रहने वाला दिलवाला इंसान हमारे बीच नहीं रहा.उनके पांचवें बेटे कृष्ण बहादुर से बातचीत पर जाना कि गुरूजी ने अपना अंतिम सार्वजनिक कार्यक्रम स्पिक मैके आन्दोलन की पुणे शाखा के लिए एक  सितम्बर को ही दिया था.वैसे सन अठ्ठासी से हार्ट अटक के मरीज यादव अब तक इलाहबाद से इलाज ले रहे है थे. बीमारी के चलते अचानक तबियत नासाज हुई और तीन सितम्बर को उनके गाँव लमाही जो ठेठ  यूं.पी. के हरिपुर तहसील में पड़ता है से पास के कस्बे ले जाते रास्ते में ही मृत्यु हो गई.अब उनके पीछे छ; बेटे हैं,बेटी कोइ  नहीं है . मगर अचरज  की बात हो या शोध की कि उनमें से एक भी बिरहा नहीं गाता है. हाँ उनके दो पोते जरुर इस काम को सीख कर आज रेडियो के ज़रिए  बहुत अच्छा  गा-बजा रहे हैं.प्रेमचंद और दिनेश कुमार जो पच्चीस-छब्बीस सालाना उम्र लिए युवा सृजनधर्मी हैं.मतलब राम कैलाश जी यात्रा के जारी रहने आसार हैं.</p>
<p style="text-align: justify;">भले ही और लोगों ने <span class='wp_keywordlink_affiliate'><a href="http://www.janokti.com/tag/%e0%a4%ac%e0%a4%bf%e0%a4%b0%e0%a4%b9%e0%a4%be-%e0%a4%97%e0%a4%be%e0%a4%af%e0%a4%a8/" title="View all posts in बिरहा गायन" target="_blank">बिरहा गायन</a></span>  को मनोरंजन के लिए खुला छोड़कर तार-तार कर दिया हो मगर गुरु राम कैलाश जी आज तक भी अपने दम पर सतत बने हुए थे. अगर उनके नहीं रहने के बाद भी  उन्हें सही श्रृद्धांजली देनी है तो हमें अपनी रूचि में संगीत को परख कर सुनने की आदत डालनी चाहिए. राम कैलाश जी सबसे ज्यादा संगीत के इस बिगड़ते  माहौल और लोक स्वरुप का बँटाधार करते इन कलाकारों से दु:खी  थे.वैसे इस <span class='wp_keywordlink_affiliate'><a href="http://www.janokti.com/tag/%e0%a4%ac%e0%a4%bf%e0%a4%b0%e0%a4%b9%e0%a4%be-%e0%a4%97%e0%a4%be%e0%a4%af%e0%a4%a8/" title="View all posts in बिरहा गायन" target="_blank">बिरहा गायन</a></span> की परम्परा को देशभर में बहुत से अन्य कलाकार भी यथासम्भव आगे बढ़ा रहे हैं,मगर उनकी अपने सीमाएं और विचारधारा हैं.ऐसे में ज्ञान प्रकाश तिपानिया,बालेश्वर यादव,विजय लाल यादव भी इस  क्षेत्र  से जुड़े कुछ ख़ास नाम  हैं.ये यात्रा तो आगे बढ़ेगी ही,मगर दिशा क्या होगी,भगवान् जाने.</p>
<p style="text-align: justify;">सारांशत: कुछ भी कहो उस प्रखर सृजनधर्मी की गहन  तपस्या का कोइ सानी नहीं है. एक बात गौरतलब है कि जितने बड़े तपस्वी गुजरे हैं.उनके बाद हुई खाली जगह ,यूं ही खाली पडी रही.बात चाहे उस्ताद बिस्मिलाह खान की हों या हबीब तनवीर की ,कोमल कोठारी की या फिर एम्.एस.सुब्बुलक्ष्मी की,बात सोला आना सच्ची है.</p>
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		<title>अभिव्यक्ति की आज़ादी और मर्यादा</title>
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		<pubDate>Sat, 14 Aug 2010 06:00:21 +0000</pubDate>
		<dc:creator>विजय कुमार</dc:creator>
				<category><![CDATA[चौथा खंभा]]></category>
		<category><![CDATA[RTI]]></category>
		<category><![CDATA[controversy]]></category>
		<category><![CDATA[democracy]]></category>
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		<description><![CDATA[किसी भी लोकतान्त्रिक देश में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता होना ही चाहिए। फिर भी इस विषय पर बार-बार विवाद खड़े होते हैं। प्रायः लोग इसे राजनीति में घसीटकर इस या उस... <a class="meta-more" href="http://www.janokti.com/%e0%a4%b8%e0%a4%bf%e0%a4%a8%e0%a5%87%e0%a4%ae%e0%a4%be-%e0%a4%ae%e0%a5%80%e0%a4%a1%e0%a4%bf%e0%a4%af%e0%a4%be-%e0%a4%ac%e0%a5%8d%e0%a4%b2%e0%a5%89%e0%a4%97-%e0%a4%ab%e0%a4%bf%e0%a4%b2%e0%a5%8d/%e0%a4%85%e0%a4%ad%e0%a4%bf%e0%a4%b5%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%a4%e0%a4%bf-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%86%e0%a4%9c%e0%a4%bc%e0%a4%be%e0%a4%a6%e0%a5%80-%e0%a4%94%e0%a4%b0-%e0%a4%ae/">Read more <span class="meta-nav">&#187;</span></a>]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><img class="alignright size-medium wp-image-5827" title="freedom TO EXPRESS" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2010/08/freedom-TO-EXPRESS-300x202.jpg" alt="" width="300" height="202" />किसी भी लोकतान्त्रिक देश में अभिव्यक्ति  की स्वतंत्रता होना ही चाहिए। फिर भी इस विषय पर बार-बार विवाद खड़े होते हैं। प्रायः लोग इसे राजनीति में घसीटकर इस या उस दल को कटघरे में खड़ा कर देते हैं। इस बारे कानून भी अस्पष्ट और ढीले हैं।</p>
<p style="text-align: justify;">कुछ समय पूर्व भाजपा नेता जसवंत सिंह की जिन्ना संबंधी पुस्तक पर गुजरात शासन ने प्रतिबन्ध लगाया था। तब कांग्रेस ने भाजपा के वैचारिक स्वातंत्र्य को ढकोसला कहा था। इन दिनों जेवियर मोरो की स्पेनिश भाषा में प्रकाशित सोनिया गांधी के जीवन पर आधारित सारो एल राजो (लाल साड़ी) नामक पुस्तक चर्चा में है। कांग्रेस वाले इसके विरुद्ध लेखक व प्रकाशक को धमकी दे रहे हैं। अब भाजपा वाले कांग्रेस को गरिया रहे हैं।</p>
<p style="text-align: justify;">समय-समय पर ऐसी पुस्तकें विवादित और प्रतिबन्धित होती रही हैं; पर प्रश्न यह है कि प्रतिबन्ध के मापदंड क्या हों ? केवल पुस्तकें ही नहीं, फिल्म, नाटक या चित्र भी विवादित हुए हैं। वस्तुतः कुछ लोग बिक्री बढ़ाने के लिए जानबूझ कर अपनी कृतियों को विवादित बना देते हैं। जसवंत सिंह के प्रकाशक ने इसी लालच में पुस्तक के कुछ अंश जारी कर दिये थे; पर पुस्तक की गर्मी अगले दिन शिमला में हो रही भाजपा की बैठक तक जा पहुंची और जसवंत सिंह न केवल बैठक, बल्कि दल से भी बाहर कर दिये गये। पुस्तक से प्रकाशक और लेखक दोनों ने लाखों रु0 कमाये। वैसे इसे शायद ही कोई पूछता; पर विवाद होने से अनेक भाषाओं में इसका अनुवाद हुआ। पाकिस्तान में भी इसका विमोचन और लेखक का सम्मान हुआ।</p>
<p style="text-align: justify;">विचार करने पर इस बारे में कुछ बातें ध्यान में आती हैं। विश्व के हर देश और समाज में कुछ लोगों के प्रति अत्यधिक श्रद्धा होती है। बहुत समय बीतने पर लोग उन्हें महामानव, अवतार या भगवान मान लेते हैं। फिर इनके बारे में चाहे सच हो या झूठ, लोग कुछ सुनना पसंद नहीं करते। यदि कोई कुछ कहे, तो लोग मारपीट पर उतर आते हैं। इस मामले में हिन्दू समाज बहुत सहिष्णु है। इससे उसकी बहुत हानि भी हो रही है। दूसरी ओर मुसलमान बिना पूरी बात पता लगाये, केवल अफवाह या षड्यन्त्र के आधार पर तोड़फोड़ पर उतर आते हैं। शासन भी उनके सामने मजबूर और असहाय नजर आता है। इसलिए उनकी उग्रता लगातार बढ़ रही है।</p>
<p style="text-align: justify;">इस बारे में एक घटना उल्लेखनीय है। 1920 में लाहौर में मुसलमानों ने ‘कृष्ण तेरी गीता जलानी पड़ेगी’ तथा ‘बीसवीं सदी का महर्षि’ नामक पुस्तकें प्रकाशित कीं। पहली में श्रीकृष्ण के चरित्र पर झूठे लांछन लगाये गये थे, तो दूसरी में महर्षि दयानंद पर। इसकी प्रतिक्रिया में हिन्दुओं ने ‘रंगीला रसूल’ नामक पुस्तक छापी। इसके तथ्य विख्यात इस्लामी ग्रन्थों से लिये गये थे। इसके लेखक श्री चमूपति शास्त्री और प्रकाशक ‘आर्य पुस्तकालय’ के महाशय राजपाल थे। इससे मुसलमानों में हड़कम्प मच गया। उन्होंने लाहौर उच्च न्यायालय में मुकदमा दायर किया, जिसमें वे पराजित हुए। इस पर भी उन्होंने छह अपै्रल, 1929 को महाशय जी की हत्या कर दी। इसकी याद में जून 1998 के विश्व पुस्तक मेले में गृहमंत्री श्री लालकृष्ण आडवाणी ने महाशय जी को मरणोपरांत ‘फ्रीडम टू पब्लिश’ पुरस्कार दिया।</p>
<p style="text-align: justify;">यदि इस घटना पर विचार करें, तो इसमें पहल मुसलमानों ने की। फिर उनकी पुस्तकें निराधार थीं, जबकि रंगीला रसूल तथ्यों पर आधारित थी, इसीलिए उसकी न्यायालय में भी जीत हुई।</p>
<p style="text-align: justify;">कुख्यात चित्रकार मकबूल फिदा हुसेन के कई चित्रों का सभी समझदार लोग विरोध करते हैं। इनमें उसने दुर्गा, सीता, सरस्वती, हनुमान, भारत माता आदि को अभद्र स्थिति में चित्रित किया है। दूसरी ओर उसने अपनी मां और मुस्लिम देवियों को पूरे वस्त्रों में सम्मान के साथ दर्शाया है। ऐसे में उसका विरोध होना ही चाहिए। यहां यह भी स्मरणीय है कि उसने अपनी फिल्म ‘मीनाक्षी ए टेल अ१फ थ्री सिटीज’ को तुरन्त वापस ले लिया था। चूंकि इसके गीत ‘नूर उन अला नूर’ पर मुसलमानों को आपत्ति थी।</p>
<p style="text-align: justify;">ऐसे एक नहीं, अनेक उदाहरण हैं। वर्ष 2004 में एक विदेशी लेखक की पुस्तक ‘शिवाजी, ए हिन्दू किंग इन मुस्लिम डायनेस्टी’ में शिवाजी का गलत चित्रण करने पर कुछ लोगों ने भंडारकर संस्थान, पुणे में तोड़फोड़ की तथा इसके एक सहलेखक के मुंह पर कालिख पोती। तीन वर्ष पूर्व सयाजीराव वि0वि0, बड़ोदरा में चंद्रमोहन नामक छात्र के चित्रों का हिन्दुओं तथा ईसाइयों ने बहुत विरोध किया। उसके कुछ चित्र इस प्रकार थे। 1. सलीब पर टंगे ईसा के लिंग में से निकलता वीर्य शौचालय में गिर रहा है। 2. मां दुर्गा गर्भ से निकल रहे एक शिशु की त्रिशूल से हत्या कर रही हैं। 3. भगवान विष्णु ने विराट स्वरूप में अपना लिंग पकड़ा हुआ है, उनके आसपास कई लिंग फैले हैं। विष्णु के दशावतार भी चित्रित हैं। 4. कई लिंगों से घिरा एक उत्तेजक शिवलिंग। चित्रकार का शरीर उसमें से उभर रहा है।</p>
<p style="text-align: justify;">स्पष्टतः इन्हें कलाकार कहना कला का अपमान है। ऐसे व्यक्ति का स्थान सभ्य समाज नहीं, जेल या पागलखाना ही है।</p>
<p style="text-align: justify;">वर्ष 2003 में कोलकाता फिल्मोत्सव में क्रिस्टोफर हिचंस की फिल्म हेल्स एंजेल (नरक का फरिश्ता) पर रोक लगा दी गयी। चंूकि इसमें हैती के तानाशाह डुवालियर और टेरेसा का मेलजोल तथा टेरेसा द्वारा चाल्र्स किटिंग से दान लेने के दृश्य दिखाये गये हैं। तीन वर्ष पूर्व भारत भवन, भोपाल में कैलाश तिवारी की चित्र प्रदर्शनी (विषय: आतंकवाद से उपजी त्रासदियां) का सेक्यूलरों ने विरोध किया। क्योंकि इसमें गोधरा, कश्मीर, मुंबई आदि में हिन्दुओं पर हुए अत्याचारों के चित्र थे। सोनिया के जीवन को दर्शाती फिल्म ‘राजनीति’ से कांग्रेसी नाराज हैं। इंदिरा गांधी पर बनी फिल्म ‘आंधी’ 1975 में प्रतिबन्धित कर दी गयी थी। तसलीमा नसरीन की ‘लज्जा’ या सलमान रश्दी की ‘शैतानी आयतें’ की भी यही कहानी है। इग्नू और एन.सी.ई.आर.टी की पुस्तकों में हिन्दुओं और भारत के बारे में बेहूदे प्रसंग छापकर नयी पीढ़ी पर क्या प्रभाव डाला जा रहा है, यह सोचने का विषय है।</p>
<p style="text-align: justify;">इन दिनों शिकागो वि0वि0 की वेण्डी डोनिगर द्वारा लिखित ‘द हिन्दूज: एन आल्टरनेटिव हिस्ट्री’ (पेंग्विन बुक्स) पर विवाद गरम है। इसके कुछ उदाहरण देखें।</p>
<p style="text-align: justify;">1. मुखपृष्ठ पर श्रीकृष्ण को नग्न स्त्रियों के बीच एक स्त्री के नितम्बों पर बैठे दिखाया है। 2. लक्ष्मण सीता के प्रति कामभाव रखता था (पृष्ठ 14)। 3. हिन्दू धर्मग्रन्थों के विचारों के केन्द्र में कामुकता है (पृष्ठ 15)। 4. हिन्दुओं का कोई मूल धर्मग्रन्थ नहीं है (पृष्ठ 25)। 5. सूर्य ने कुन्ती से बलात्कार किया था (पृष्ठ 36)। 6. गांधी जी की हत्या रा.स्व.संघ ने की। 7. मंगल पांडे पर भांग, अफीम या शराब का प्रभाव था (पृष्ठ 579)। 8. रानी लक्ष्मीबाई अंग्रेजों के प्रति निष्ठावान थीं (पृष्ठ 586)। 9. विवेकानंद गोमांस खाते थे और उन्होंने लोगों को इसका सुझाव दिया था (पृष्ठ 639)। 10. रामायण का राजनीतिक उपयोग भारत को ईसाइयों, मुसलमानों व अन्य धर्म वालों से मुक्त कराने में किया जा रहा है (पृष्ठ 667)। 11. यमी ने अपने भाई यम से यौनाचार का असफल प्रयास किया था। 12. तपस्या वस्तुतः आंतरिक कामाग्नि ही है।&#8230;.आदि</p>
<p style="text-align: justify;">उ0प्र0 में बसपा शासन में राज्यमन्त्री पारसनाथ मौर्य के पुत्र डा0 राजीव रत्न एक पत्रिका ‘अम्बेडकर टुडे’ निकालते हैं। पत्रिका स्वयं को भगवान बुद्ध और डा0 अम्बेडकर के विचारों का समर्थक बताती है; पर उसमें इनके विचार कम और हिन्दू ग्रन्थों, देवी, देवताओं, अवतारों, मंदिरों, परम्पराओं आदि पर गन्दी और अश्लील टिप्पणियां अधिक होती हैं। शासकीय विज्ञापनों से भरी यह पत्रिका किसका भला कर रही है, कहना कठिन है।</p>
<p style="text-align: justify;">यहां प्रश्न उठता है कि भाषण, लेखन, प्रकाशन या प्रसारण की स्वतन्त्रता की सीमा क्या हो; क्या इसकी आड़ में किसी धर्म, संस्था या व्यक्ति पर कैसी भी टिप्पणी की जा सकती है ?</p>
<p style="text-align: justify;">भारत लोकतान्त्रिक होने के साथ ही धार्मिक देश भी है। इसलिए किसी धर्म, देवी-देवता, पैगम्बर आदि पर लिखते या बोलते समय सावधानी रखनी चाहिए। देश और धर्म की रक्षार्थ मरने वालों पर भद्दी टिप्पणियों से लोग भड़कते हैं। इसलिए श्रीराम, श्रीकृष्ण, शिवाजी, प्रताप, गुरू गोविन्द सिंह आदि के बारे में कुछ भी कह देने से विवाद होगा ही; पर इसी पलड़े में गांधी और नेहरू परिवार या टेरेसा जैसों को नहीं रख सकते। भारतीय इतिहास के हजारों दस्तावेज संदूकों में बंद हैं। नेहरू से संबंधित कागज सोनिया के पास हैं। न जाने वे कभी खुलेंगे या नहीं ? विदेशियों पर तो इस मामले में बिल्कुल भरोसा नहीं किया जा सकता। हो सकता है, 50 साल बाद पता लगे कि जिन्हें हम भारत के रत्न या दल और देश का तारनहार समझते रहे, वे विदेशी जासूस थे।</p>
<p style="text-align: justify;">विचार स्वातंत्र्य संबंधी कानूनी अस्पष्टता और कछुआ-गति से चलने वाले न्यायालय के कारण ये बददिमाग लेखक, चित्रकार या फिल्मकार बार-बार सूरज पर थूकते हैं। जनता इनके विरुद्ध लाठी न उठाये, इसके लिए शासन, न्यायालय और बुद्धिजीवियों की निष्पक्ष सक्रियता आवश्यक है।</p>
<p style="text-align: justify;">
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		<title>दस टकिये पत्रकारों का दर्द</title>
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		<pubDate>Sat, 31 Jul 2010 08:17:19 +0000</pubDate>
		<dc:creator>संजय कुमार</dc:creator>
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			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><img class="alignright size-medium wp-image-5504" title="AA040013" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2010/07/freelance-journalist-of-india-i-246x300.jpg" alt="" width="246" height="300" />दूसरों के दुखःदर्द व जुल्म सितम के लिए रोजाना लड़ाई लड़ने वाले कलम के सिपाहियों के हक के लिए कोई खड़ा नहीं दिखता है। समाज में व्याप्त बराबरी-गैरबराबरी से पत्रकारों को भी दो-चार होना पड़ता है। खास तौर से उनकी माली स्थिति पर नजर डाले तो एक ऐसा बराबरी-गैरबराबरी सामने आता है जो चैंकाता तो है ही साथ ही सोचने के लिए मजबूर भी करता है। सवाल है मीडिया में काम करने वाले कस्बा से लेकर महानगर तक के पत्रकारों की माली स्थिति का ? और उनके साथ जो शोषण हो रहा है उसके पक्ष में खड़ा होने का ? जहां एक पत्रकार दस से बारह घण्टे काम करता है और एवज में एक सरकारी आदेशपाल से भी कम तनख्वाह पाता है।</p>
<p style="text-align: justify;">मीडिया हाउसों में कार्यरत मीडियाकर्मी जहां एक ओर मीडिया के चकाचैंध ग्लैमर से प्रभावित हैं। वहीं एक ऐसा वर्ग भी है जो अखबार में काम करते हुए जीने के लिए संघर्ष कर रहा है। कहने का तात्पर्य यह है कि जहां एक ओर मीडियाकर्मियों को दस हजार से एक लाख तनख्वाह मिलती है तो वहीं ऐसे भी मीडियाकर्मी है जिन्हें 15 सौ रुपये महीने पर सुबह से देर शाम तक खबरों के पीछे भागना पड़ता है। जाहिर सी बात है कि जैसा काम वैसा दाम की परिपाटी मीडिया हाउसों में कुलाचे मार रहा है। अनुभव और नाम के सहारे हजारों की तनख्वाह पाने वाला बड़ा पत्रकार भी उतना ही श्रम करता है जितना एक आम पत्रकार। बल्कि मुफ्सिल का पत्रकार तो और ही ज्यादा काम करता है। मुफ्सिल में घटने वाली सुबह की खबर पर वह लगातर बना रहता है। उसे डाक संस्करण से लेकर देर रात के संस्करण के लिए खबर को डेवलप कर लगातार भेजना पड़ता है।</p>
<p style="text-align: justify;">पत्रकारों के बीच एक सामान वेतन नहीं हो सकता लेकिन जिंदगी जीने के लिए जितना चाहिये वह तो मिलनी ही चाहिये? श्रमजीवी पत्रकारों के वेतन को लेकर सरकारी और गैरसरकारी स्तर पर प्रयास चले, लेकिन मीडिया हाउस के मालिकों ने नौकरी की परिभाषा ही बदल दी। संपादक हो या पत्रकार अमूमन सभी की बहाली अब अनुबंध के आधार पर हो रही है। जब इच्छा हुई रख लिया और निकाल दिया। वहीं बड़े नाम इसका फायदा भी उठा रहे हैं। जहां दूसरे मीडिया हाउस ने ज्यादा पैसे दिये, तुंरत पहले को छोड़, दूसरे को पकड़ लिया। वहीं सबसे बुरा हाल निचले स्तर के पत्रकारों का है वे हमेषा हासिये पर रहते हैं। मजेदार बात यह है कि अब मीडिया हाउस जब किसी को अपने  यहाँ रखता है तो उससे एक बौंड भरवाता है जिसमें उसका पेशा  पत्रकारिता नहीं बल्कि खेती बाड़ी, व्यवसाय आदि भरवाया जाता है।</p>
<p style="text-align: justify;">दूसरों के शोषण-उत्पीड़न के खिलाफ आवाज उठाने वाले स्वयं पत्रकार अपनी आवाज उठाने से वंचित रह जाते हैं ? देखा जाये तो पत्रकारों की जिंदगी रोज संघर्षों से भरी है। अमूमन हर मीडिया हाउसों द्वारा पत्रकारों का आर्थिक और शारीरिक शोषण जारी है। लेकिन विरोध की गुंज सुनाई नहीं पड़ती है। सबसे बड़ा मुद्दा आर्थिक  शोषण का है। चैंकने वाला तथ्य यह है कि छोटे और बड़े मीडिया हाउसों में 15 सौ रूपये के मासिक पर पत्रकारों से 10 से 12 घंटे काम कराया जाता है। यहीं नहीं उन पत्रकारों के पास मीडिया हाउस द्वारा कोई अनुबंध पत्र / नियुक्ति पत्र नहीं दिया जाता है। प्रबंधन की मर्जी जब नौकरी पर रखे या जब चाहे नौकरी से निकाल दे। भुगतान दिहाड़ी मजदूरों की तरह मास्टर रौल जैसा है। महीने के आखिर में एक मास्टर रौल पर हस्ताक्षर करवाया जाता है और भुगतान के बाद उसे फाड़कर फेंक दिया जाता है। वेतन के मामले में पीड़ित कलम के सिपाहियों का हाल सरकारी आदेशपालों से भी बुरा है।</p>
<p style="text-align: justify;">देश  के राज्यों में अधिकांश  युवा पत्रकार अपने कैरियर की शुरुआत मामूली सी तनख्वाह 1500 रुपये पर करते हैं। अगर देखा जाए तो दिहाड़ी मजदूरों को जितनी मजदूरी एक महीने में दी जाती है, उससे कम पत्रकारों को दी जाती है। बिहार से प्रकाशित कई अखबारों में कमोवेश स्थिति ऐसी ही है। वहीं कस्बाई पत्रकारों को अखबार मीडिया हाउस की ओर से अधिकतम 3000 रुपये प्रति माह दिये जाते हैं। जबकि बड़े पैमाने पर हजार 12 सौ रूपये मासिक पर रखा जाता है। उन्हें समाचार संकलन के अलावा अखबार के लिए विज्ञापन भी जुटाना होता है। पहले सेंटीमीटर या कालम के हिसाब से भुगतान दिया जाता था लेकिन अब प्रति खबर या मासिक भुगतान किया जाता है। बिहार के कस्बा और छोटे जगहों पर कार्यरत पत्रकारों ने बताया कि अखबार को आंदोलन, बदलाव आदि का नारा देने वाले बड़े समाचार पत्र समूह द्वारा एक स्ट्रींगर को प्रति समाचार 10 या 12 रु. दिये जाते हैं, चाहे खबर एक कालम की हो या चार कालम की। भुगतान तय रहता हैं वही 10 या 12 रूपये प्रति खबर। वहीं सुपर स्ट्रींगर को प्रति माह दो से तीन हजार दिया जाता है। जहां तक छोटे समाचार पत्र का सवाल है तो वे कस्बा और छोटे जगहों पर कार्यरत पत्रकारों को एक पैसा भुगतान नहीं करते हैं हां उनके समाचार जरूर छपते हैं। साथ ही उन्हें विज्ञापन लाने को कहा जाता है जिस पर कमीशन दिया जाता है। जबकि अखबार के मुख्य कार्यालयो में कार्यरत स्ट्रींगर और सुपर स्ट्रींगर को तीन हजार से 14 हजार रूपये प्रतिमाह दिये जाते हैं। संपादक/प्रबंधक तनख्वाह तय करते हैं। वहीं चैंकाने वाला तथ्य यह है कि अमूमन हर अखबार कस्बा या छोटे शहरों में किसी को भी अपना प्रतिनिधि रख लेते हैं उसे खबर के लिए कोई भुगतान नहीं किया जाता है। बल्कि वह जो विज्ञापन लाता है उस पर उसे कमीषन दिया जाता है। अखबार का संपादक/प्रबंधक जानते हैं कि वह बेगार पत्रकार अखबार के नाम पर अपनी दुकान चलायेगा ? जो उसकी मजबूरी बन जाती है आखिर  दिन भर अखबार के लिये बेगार करेगा तो खायेगा क्या ?  बिहार के सासाराम में एक छोटे समाचार पत्र के लिए रिपोर्टिंग करने वाला एक पत्रकार अपना नाम छुपाते हुए कहता हैं कि हालात यह है कि पैसा मिले या न मिले किसी मीडिया हाउस से जुड़ने के लिए पत्रकारों की लम्बी कतार है। बिना पैसे और विज्ञापन के कमीशन पर काम करने वाले पत्रकार मौजूद है तो भला क्यों कोई मासिक वेतन पर किसी को रखे ? यही हाल देश के अन्य क्षेत्रों का है।</p>
<p style="text-align: justify;">मजेदार बात यह है कि इसमें वे लोग भी शामिल हैं जो पत्रकारों के हित के लिए लम्बी-चैड़ी बातें करते हैं। तर्क दिया जाता है कि पत्रकारिता के पेशे  में ऐसे लोग आ गये है जो तिकड़मी, अनस्कील्ड और कहीं नौकरी नहीं लगी तो पत्रकार बन गये आदि आदि। सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर उन्हें रखता कौन है ? अखबार ही न ? और आज अखबार संपादक कम प्रबंधक अधिक चला रहा है।</p>
<p style="text-align: justify;">प्रख्यात पत्रकार स्व.प्रभाष जोशी ने भारतीय मीडिया द्वारा चुनाव के दौरान पैसे लेकर खबर छापने की परिपाटी के खिलाफ जो मुहिम छेड़ी थी, उसकी गुंज संसद और चुनाव आयोग में सुनाई दी है। पिछले लोकसभा चुनाव के दौरान देशभर में ये गुंज सुनाई दी थी। अब संसद में भी इसकी गुंज सुनाई पड़ी है। राज्यसभा में सांसदों ने पैसे लेकर मीडिया द्वारा खबर छापने की खतरनाक बढ़ती प्रवृति के खिलाफ गंभीर चर्चा की। पैसे लेकर खबर छापने की मीडिया के सोच के खिलाफ केवल सांसद ही नहीं बल्कि पिछले ही दिनों  पूर्व मुख्य निर्वाचन आयुक्त नवीन चावला ने भी चिंता व्यक्त की और इसे गलत करार भी दिया। पैसे लेकर खबर छापने की प्रथा कोई नई नहीं है और इसपर हो-हल्ला तब मचा जब स्व. प्रभाष जोशी ने पूरे देश भर में मीडिया के इस सोच के प्रति जन आंदोलन चला दिया था। गत लोकसभा चुनाव और कुछ राज्यों में हुए विधानसभा चुनाव के दौरान यह खुलकर सामने आ गया था। मीडिया ने पैसे लेकर खुलेआम खबर छापने का सिलसिला जारी रखा। यह हो-हल्ला लोकतंत्र के निर्माण में, लोकतंत्र के ही एक खंभे द्वारा किया गया। इस मसले पर पत्रकार भी दो खेमें में नजर आये।</p>
<p style="text-align: justify;">मीडिया ने अपने को बाजारवाद के चंगुल में डालकर संभवतः मीडिया को व्यवसायिक नजरिये से परोस दिया। हो-हल्ला तो चुनाव के दरम्यिन नेताओं द्वारा अपने फेवर में पैसे देकर खबर को प्रकाशन प्रसारण से हुआ। लेकिन गुपचुप तरीके से नये-नये हथकंडों के जरिए खबर छापने/प्रसारित करने का सिलसिला जारी है। इसमें दस टकिया पत्रकारों को मोहरा बनाया जा रहा है। यह चैंकाने वाला तथ्य है या नहीं, यह नहीं कहा जा सकता लेकिन बिहार के कई जिलों में तैनात पत्रकारों से खबर छापने के बदले अखबारों की प्रतियां बिकवाई जाती है। इसमें बड़े मीडिया गु्रप शामिल हैं। बिहार के कई जिलों के अखबारों से जुड़े पत्रकारों ने बताया कि किसी भी कार्यक्रम या खबर को छापने के लिए संबंधित संस्था या व्यक्ति से पैसे न लेकर उससे खबर छापने के एवज में अखबार की प्रतियां खरीदने पर दवाब बनाया जाता है। अखबार द्वारा अपने संवाददाताओं पर विज्ञापन के लिए दबाव बनाने की बात पुरानी हो चुकी है लेकिन प्रतियां बिकवाने का नया फंडा निकाल लिया गया हैं। यानी खबर छपने के बदले अखबार की प्रतियां खरीदों ? बदले में अखबार मालिक अपनी तिजोरी भर रहे हैं और दस टकिया पत्रकार जहां था वहीं खड़ा हैं।</p>
<p style="text-align: justify;">मीडिया में इस तरह की परिपाटी का जन्म लेना मीडिया के लिए भयावह है और जिस तरह की सोच मीडिया के अंदर बढ़ती जा रही है वह काफी खतरनाक है। पत्रकार को पत्रकार न रख, उसे सेल्स एजेंट के तौर पर मीडिया हाउस इस्तेमाल कर रहा है।</p>
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		<title>सात शहीदों को सात गमलों की श्रद्धांजलि</title>
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		<pubDate>Wed, 21 Jul 2010 14:58:54 +0000</pubDate>
		<dc:creator>अनिकेत प्रियदर्शी</dc:creator>
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			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><img class="alignright size-full wp-image-5019" title="bihar aasembly drama" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2010/07/bihar-aasembly-drama.jpg" alt="" width="420" height="455" />एक के बाद एक सात गमलों का काम तमाम कर दिया ..ऐसी हुंकारे भर रही थी मानो साक्षात देवी काली प्रलय मचाने विधान मंडल में उतर गई हों । अचानक एक गमला श्वेत वस्त्र मे खडी महिला मार्शल को भी दे मारा । तीन महिला मार्शलों ने इसके बाद मिलकर जोर लगाया और पार्षद कुमारी ज्योति चारो खाने चित ! उसके बाद उनके दोनो हाथों को पकडकर महिला मार्शलों द्वारा घसीट- घसीट कर बाहर ले जाने की प्रक्रिया शुरू हुई । इस दौरान वो उसी मिट्टी मे घसीटी गई जिसे उन्होने उस बेजुबान गमले से अलग कर दिया था । चश्मा आंखो की जगह अब मुंह पर आ लगा था और खींचा तानी का दौर बदस्तूर जारी था । रौद्र रूप अख्तियार किये हुए ही बेहोश हो चुकी थी कुमारी ज्योति ।</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">एक नया दिन और एक नही&#8230;कई नये हंगामे । अचानक दिखा एक और नजारा जब लगा कि चप्पल काटने से क्रुद्ध एक <span class='wp_keywordlink_affiliate'><a href="http://www.janokti.com/tag/%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%a7%e0%a4%be%e0%a4%af%e0%a4%95/" title="View all posts in विधायक" target="_blank">विधायक</a></span> बाबू ने अपनी पादुका स्पीकर महोदय के तरफ उछाल देना उचित समझा । अब एक पैर मे चप्पल और एक पैर खाली ! इन्हे जरा भी इस बात का आभास नही था कि ये चप्पल उन्होने सदन के सबसे गरिमामयी आसन के तरफ उछाल दिया था । मगर शायद इस बात को ये जानकर भी क्या करेंगे । इन्हे तो मर्यादा और गरिमा जैसे शब्दों से खुजली जो होने लगती है । 67 <span class='wp_keywordlink_affiliate'><a href="http://www.janokti.com/tag/%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%a7%e0%a4%be%e0%a4%af%e0%a4%95/" title="View all posts in विधायक" target="_blank">विधायक</a></span> सस्पेंड और 14 विधान पार्षद सस्पेंड ।</p>
<p style="text-align: justify;">एक <span class='wp_keywordlink_affiliate'><a href="http://www.janokti.com/tag/%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%a7%e0%a4%be%e0%a4%af%e0%a4%95/" title="View all posts in विधायक" target="_blank">विधायक</a></span> जी हरे रंग के फटे हुए कुर्ते मे निकले ..बताया कि अंगूठा फट गया है और कुर्ता भी फाड दिया गया है । अभी चोट का इलाज भी नही करवाया है । फिर थोडी ही देर बाद एक चैनल के स्टूडियों मे उस फटे हुए कुर्ते मे ही पहुंच गये । वाह वाह&#8230;ये कैमरा भी बडी जुल्मी होती है ये क्या क्या नही करवाती । विधायक जी इस स्टूडियो मे बोलते कम नजर आये&#8230;. देखते ज्यादा । उनकी आखों को देखकर ऐसा लग रहा था जैसे वो इस लोकतांत्रिक देश से अपने लिये असीम सहानुभूति का मौन अपील कर रहे हों । दे दो भाई दे दो&#8230; दे दो इन विधायक जी को आपकी सहानुभूति की बहुत अधिक आवश्यकता है ।</p>
<p style="text-align: justify;">उधर खबर आयी कि कांग्रेश की महिला पार्षद कुमारी ज्योति को पटना मेडिकल कांलेज अस्पताल मे भर्ती करवाया गया । खबर ये भी आयी कि उनकी हालत चिंता से बाहर है । भगवान का लाख लाख शुक्र है, तो चिंता अब उन लोगों को करनी है जिन्होने उन्हे घसीटने का प्रयास किया था । लेकिन अब सवाल तो ये भी है एक महिला पार्षद का इस तरह से पूरे मीडिया की उपस्थिति मे गमला चला चला कर आस पास खडे लोगों को मारना क्या जायज था ? कहते है कि कोई भी कठिनाई क्यों न हो, अगर हम सचमुच शान्त रहें तो समाधान मिल जाएगा। तो फिर ये सब क्यूं ????????</p>
<p style="text-align: justify;">जिस तरह से गुस्से मे अपने आप को नुकसान पहुचांने मे कुमारी ज्योति लगी हुई थी उससे वो साबित क्या करना चाहती थी ? प्रगति के लिए संघर्ष करो। अनीति को रोकने के लिए संघर्ष करो और इसलिए भी संघर्ष करो कि संघर्ष के कारणों का अन्त हो सके। मगर संघर्ष के नाम पर इस तरह से अभद्रता पर उतर जाना क्या वाकई जरूरी था ?? अपने अभद्र कर्मों के लिए अंतरात्मामनुष्य को धिक्कारती भी है तो हम ऐसा कार्य क्यूं करे जिसमें अपनी अंतरात्मा ही अपने को धिक्कारे ? ये जन प्रतिनिधि है ..तो अपने आचरण से ये किस जनता का प्रतिनिधित्व कर रही है ?</p>
<p style="text-align: justify;">कल <span class='wp_keywordlink_affiliate'><a href="http://www.janokti.com/tag/%e0%a4%95%e0%a4%be%e0%a4%82%e0%a4%97%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a5%87%e0%a4%b8/" title="View all posts in कांग्रेस" target="_blank">कांग्रेस</a></span> के एक वरिष्ट नेता किसी न्यूज चैनल पर एक बडी अच्छी बात कह रहे थे कि इस तरह के वाकयात जब भी होते है तो आप गौर करेंगे इसमे <span class='wp_keywordlink_affiliate'><a href="http://www.janokti.com/tag/%e0%a4%95%e0%a4%be%e0%a4%82%e0%a4%97%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a5%87%e0%a4%b8/" title="View all posts in कांग्रेस" target="_blank">कांग्रेस</a></span> के लोगों का आचरण हमेशा से सम्मानित रहता है । और कांग्रेस की महिला पार्षद ने आज जो किया वो तो वाकई सम्मान की पराकाष्ठा हो गई । इस हमाम मे सभी नंगे हैं , चाहे वो किसी भी पार्टी से क्यूं न हो अब कोई सम्मान से भरा आचरण इस राजनीति जैसे बदबूदार जगह पर करे भी तो कैसे ?? राजनीति के शब्दकोश मे सम्मान, मर्यादा, आचरण, निर्मल उद्देश्य, सदुद्देश्य, पुरुषार्थ,शुचिता, पवित्रता, सच्चरित्रता, समता, उदारता, शालीनता जैसे शब्दों का कोई जगह अब नही बनता है । ये सत्य है..या कह ले शाश्वत सत्य है ।</p>
<p style="text-align: justify;">मनुष्य परिस्थितियों का दास नहीं, वह उनका निर्माता, नियंत्रणकर्ता और स्वामी है। बीती रात से ही विधानमंडल मे जमे हुए विधायक सुबह सुबह दातून करते नजर आये । उनकी बात से तो ऐसा लग रहा था कि आज भी कुछ बहुत सही नही होने वाला है । और दिन के आगे बढते ही ये आशंका सही सिद्ध हो गई । अर्थात ये तय था कि आज भी सदन कि ऐसी की तैसी होने वाली है । इन सारी परिस्थितियों का एक तरह से निर्माण करके सदन को ठप्प कर दिया गया । आसक्ति संकुचित वृत्ति है ये साफ साफ दिख रहा था । सच मे इस संसार में अनेक विचार, अनेक आदर्श, अनेक प्रलोभन और अनेक भ्रम भरे पड़े हैं। ये सब देख तो ऐसा लग रहा था कि अब राजनीति एक विशेष तरह के इंसानो के लिए ही सार्थक है ।</p>
<p style="text-align: justify;">जो घटना घटी उसे थोडी सी विवेकशीलता दिखाकर रोका जा सकता था और साथ ही उस मसले पर कोई सार्थक बात की जा सकती थी । कहते है कि विवेकशील व्यक्ति उचित अनुचित पर विचार करता है और अनुचित को किसी भी मूल्य पर स्वीकार नहीं करता। मगर इस तरह के आचरण को अपनाकर भी किसी अनुचित का सामना नही किया जा सकता है । राष्ट्र को समृद्ध और शक्तिशाली बनाने के लिए आदर्शवाद, नैतिकता, मानवता, परमार्थ, देश भक्ति एवं समाज निष्ठा की भावना की जागृति नितान्त आवश्यक है। क्या आज कि राजनीति मे ये सब कहीं दिख रहा है ??</p>
<p style="text-align: justify;">अंतत: मेरा प्रश्न इन सभी दलो के नेतृत्व से भी है क्यूंकि नेतृत्व का अर्थ तो वह वर्चस्व है जिसके सहारे परिचितों और अपरिचितों को अंकुश में रखा जा सके, तथा उन्हे अनुशासन में चलाया जा सके। कहां है अनुशासन ?? कहां है नेतृत्व ?? कहां है इंसान ?? कहां है वो नेता जो शिक्षित और सुयोग्य ही नहीं, प्रखर संकल्प वाला भी होता था, जो अपनी कथनी और करनी को एकरूप में रखने के लिए अपना सब कुछ न्यौछावर करने को तैयार रहता था ?? स्वतंत्रता दिवस बहुत करीब है पर हम स्वतंत्र क्यूं हुए ?? कितने बलिदान को हमने भुला दिया क्या इसका जरा सा भी अहसास है हमे ?? पटना विधानसभा के सामने सात बलिदानियों की पाषाण प्रतिमाएं भी शायद आज अश्रुपूर्ण अवस्था मे रही होगी । इस निरंकुश स्वतंत्रता ने देश को कहां लाकर छोड दिया&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;.।</p>
<p style="text-align: justify;">
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		<title>कौआ और मीडिया</title>
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		<pubDate>Wed, 14 Jul 2010 12:24:40 +0000</pubDate>
		<dc:creator>शंकर दत्त फुलारा</dc:creator>
				<category><![CDATA[मीडिया-संसार]]></category>
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		<description><![CDATA[भारतीय समाज में कौए को आमतौर पर अच्छा नही माना जाता। कारण, शायद उसकी कर्कश आवाज, कुटिल बुद्धि, तांक-झांक करने की आदत, उसका काला रंग आदि हो। लेकिन, अपनी इन... <a class="meta-more" href="http://www.janokti.com/%e0%a4%b8%e0%a4%bf%e0%a4%a8%e0%a5%87%e0%a4%ae%e0%a4%be-%e0%a4%ae%e0%a5%80%e0%a4%a1%e0%a4%bf%e0%a4%af%e0%a4%be-%e0%a4%ac%e0%a5%8d%e0%a4%b2%e0%a5%89%e0%a4%97-%e0%a4%ab%e0%a4%bf%e0%a4%b2%e0%a5%8d/%e0%a4%ae%e0%a5%80%e0%a4%a1%e0%a4%bf%e0%a4%af%e0%a4%be/%e0%a4%95%e0%a5%8c%e0%a4%86-%e0%a4%94%e0%a4%b0-%e0%a4%ae%e0%a5%80%e0%a4%a1%e0%a4%bf%e0%a4%af%e0%a4%be/">Read more <span class="meta-nav">&#187;</span></a>]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><img class="alignright size-full wp-image-4592" title="kauwa" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2010/07/kauwa.jpg" alt="" width="240" height="214" />भारतीय समाज में कौए को आमतौर पर अच्छा नही माना जाता। कारण, शायद उसकी कर्कश आवाज, कुटिल बुद्धि, तांक-झांक करने की आदत, उसका काला रंग आदि हो। लेकिन, अपनी इन बुराईयों के कारण दुत्कारे जाने के बावजूद, वह सम्मान भी पाता है। अटरिया पर कागा बोले तो, त्यौहार या संक्रांति हो तो,<span class='wp_keywordlink_affiliate'><a href="http://www.janokti.com/tag/%e0%a4%95%e0%a5%8c%e0%a4%86/" title="View all posts in कौआ" target="_blank">कौआ</a></span> ग्रास खिलाने को, हमारे यहाँ तो बच्चे को आशीर्वाद भी काक-चेष्टा का दिया जाता है और काले रंग का टीका भी कौए को याद करके लगाया जाता है और पितृपक्ष में तो कौआ विशेष सम्मान पाता है। इन्हें बुद्धिमान भी माना जाता है |</p>
<p style="text-align: justify;">एकता में कौओं का कोई सानी नहीं; इनके साथी के साथ कोई घटना घट जाए तो, या कोई इनके घोंसले को छेड़ दे तो, मतलब, जब ये अपनी एकता प्रर्दशित करते हैं तो अपनी कांव- कांव के आगे किसी की नहीं सुनते&#8221;एक ही जगह पर मंडराते&#8221; रहते हैं। एक आदत इनकी और अच्छी है कि ये खाना मिलने पर खूब काँव-काँव करके अपने साथियों को जमा कर लेते हैं तब एक साथ खाने पर टूटते हैं | इन्हें कोई मरा जानवर मिल जाये तो इनकी एकता देखने को मिल जाती है |</p>
<p style="text-align: justify;">हमारे गांवों में दो तरह के कौए होते हैं एक जरा ज्यादा काला व बड़ा होता है, उसे सच्चा <span class='wp_keywordlink_affiliate'><a href="http://www.janokti.com/tag/%e0%a4%95%e0%a5%8c%e0%a4%86/" title="View all posts in कौआ" target="_blank">कौआ</a></span> कहते हैं ।वैसे गुण-अवगुण लगभग एक जैसे होते हैं। खाने में सामान्य गंदगी से लेकर कुछ भी अच्छा-बुरा खा लेते हैं। अपनी इसी आदत के कारण पहले जैसे विश्वसनीय नहीं रहे। वरना पहले तो हमारा ग्रामीण समाज इन पर बहुत भरोसा करता था, अब तो गाँवों से इनकी संख्या शहरों को पलायन कर गई है। क्योंकिगावों में खाने व तांक- झांक करने के अवसर कम होते हैं, शहरों में तरह- तरह के खाने या ये कहना चाहिए प्रयाप्त जूठन उपलब्ध होती है। और अपनी जिज्ञासु(खोजी)प्रक्रति के कारण शहर इन्हें अपने लिए ठीक लगता है। हमारे यहाँ एक पौराणिक कथा के अनुसार इनके एक पूर्वज ने अपनी प्रकृतिवश श्रीराम की पत्नी माता सीता के पाँव में चोंच मार दी जिससे रक्त निकल आया, भगवान राम को क्रोध आ गया उन्होंने बाण से कौए की एक आँख फोड़ दी। तब से यह एकचक्षू माना जाता है। इसीलिए बहुत चंचल होता है। वैसे काकभुषण्डी के रूप में इनके पूर्वज ने अच्छा सम्मान भी पाया है। आप भी सोच रहे होंगे की कौआ-कौआ -कौआ ये कौआ पुराण क्यों लिखने लगा, लेकिन क्या करूँ जब से टी.वी. <span class='wp_keywordlink_affiliate'><a href="http://www.janokti.com/tag/%e0%a4%a8%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a5%82%e0%a4%9c-%e0%a4%9a%e0%a5%88%e0%a4%a8%e0%a4%b2/" title="View all posts in न्यूज चैनल" target="_blank">न्यूज चैनल</a></span> चले हैं, बुरा मत मानना मुझे इन चैनलों के रूप में कौए ही कांव-कांव करते सुनाई देते हैं।  अब समानताएं ढूंढना आप भी शुरू कर दो। हाँ चुनावों को इनके लिए पितृपक्ष माना जा सकता है।</p>
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		<title>आम आदमी की आवाज बने मीडिया</title>
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		<pubDate>Tue, 13 Jul 2010 06:16:04 +0000</pubDate>
		<dc:creator>डा ० पुरुषोत्तम मीणा</dc:creator>
				<category><![CDATA[चौथा खंभा]]></category>
		<category><![CDATA[मीडिया-संसार]]></category>
		<category><![CDATA[film-tv]]></category>
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		<description><![CDATA[मीडिया आम लोगों के लिये लडना तो दूर, कहीं नजदीक भी नजर नहीं आ रहा है। मीडिया एक्टर, क्रिकेटर, कलेक्टर, लीडर और इंस्पेक्टर के इर्द-गिर्द घूमता हुआ उद्योगपतियों का व्यापार... <a class="meta-more" href="http://www.janokti.com/%e0%a4%b8%e0%a4%bf%e0%a4%a8%e0%a5%87%e0%a4%ae%e0%a4%be-%e0%a4%ae%e0%a5%80%e0%a4%a1%e0%a4%bf%e0%a4%af%e0%a4%be-%e0%a4%ac%e0%a5%8d%e0%a4%b2%e0%a5%89%e0%a4%97-%e0%a4%ab%e0%a4%bf%e0%a4%b2%e0%a5%8d/%e0%a4%ae%e0%a5%80%e0%a4%a1%e0%a4%bf%e0%a4%af%e0%a4%be/%e0%a4%86%e0%a4%ae-%e0%a4%86%e0%a4%a6%e0%a4%ae%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%86%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%9c-%e0%a4%ac%e0%a4%a8%e0%a5%87-%e0%a4%ae%e0%a5%80%e0%a4%a1%e0%a4%bf%e0%a4%af%e0%a4%be/">Read more <span class="meta-nav">&#187;</span></a>]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<blockquote>
<p style="text-align: justify;"><img class="alignright size-medium wp-image-4530" title="breaking-news.jpg" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2010/07/breaking-news.jpg-300x206.png" alt="" width="300" height="206" />मीडिया आम लोगों के लिये लडना तो दूर, कहीं नजदीक भी नजर नहीं आ रहा है। मीडिया एक्टर, क्रिकेटर, कलेक्टर, लीडर और इंस्पेक्टर के इर्द-गिर्द घूमता हुआ उद्योगपतियों का व्यापार बन गया है। मीडियाजन धन, दौलत और एश-ओ-आराम के पीछे दौड रहे हैं। ऐसे में सच्चे मीडिया सेवकों को सामने आना होगा। उन्हें अपने पत्रकारिता धर्म का निर्वाह करना होगा। मीडिया को मानवता की कराह को सुनना होगा और संसार को सुनाना भी होगा। हालात जो भी रहे हों या जो भी है, लेकिन यह सच है कि आम लोगों में बोलने की हिम्मत नहीं है, अब मीडिया को अपनी जुबानी लोगों की पीडा एवं समस्याओं को सुनना और उठाना होगा, तब ही किसी बदलाव या चमत्कार की आशा की जा सकती है।</p>
</blockquote>
<p style="text-align: justify;">हमारा देश अंग्रेजों की गुलामी से 1947 में आजाद हुआ था। आजादी के साथ-साथ हमने विभाजन के अभी रिस रहे घाव देखे थे। करोडों भोले भाले लोगों को लग रहा था कि आजादी के बाद इस देश में चमत्कार हो जायेगा। उनको कष्टों से मुक्ति मिल जायेगी। उनके स्वाभिमान एवं सम्पत्ति की रक्षा सुनिश्चित होगी। आम जनता के सामने जो सवाल 1947 में थे, वही के वहीं सवाल आज भी हमारे सामने सीना ताने खडे थे। बल्कि अधिक तीखे सवालों में तब्दील हो गये हैं।</p>
<p style="text-align: justify;">ऐसा नहीं है कि देश आगे नहीं बढा है, लेकिन विकास किस कीमत पर और किन-किन लोगों के लिये हुआ है, यह अपने आप में विचारणीय सवाल है? दुनिया के सामने हम ललकारते हुए कहते सुने जा सकते हैं कि हमने अनेक क्षेत्रों में क्रान्तिकारी प्रगति की है। मात्र आधी सदी में शहरों से चलकर, हमारों गांवों और ढाणियों में भी टीवी और इंटरनेट की पहुँच गये हैं। लेकिन समाज की समस्याएं आज भी वही की वहीं हैं। अपराध एवं अपराधियों में कोई कमी नहीं आयी है। विभेदकारी मानसिकता में कमी नहीं हुई है।</p>
<p style="text-align: justify;">राजनीतिज्ञों का रंग तो इतना बदरंग हो चुका है कि राजनेताओं की पूरी की पूरी कौम ही गिरगिट नजर आने लगी है। शोषित अधिक शोषित हुआ है और शोषक ताकतवर होता जा रहा है। दोनों को एक दूसरे का पता है कि कौन शोषक है और कौन शोक्षित, लेकिन विशेषकर शोषित वर्ग 1947 से पहले भांति बल्कि आज तो पहले से भी अधिक भयभीत और सहमा हुआ है। समाज में व्याप्त आर्थिक, सामाजिक, धार्मिक, सांस्कृतिक आदि विसमता एवं विरोधाभासों में कोई मौलिक बदला या परिवर्तन नहीं आया है। ऐसे में सवाल यह उठता है कि इस देश में लोकतन्त्र या जनता के शासन का क्या अभिप्राय है?</p>
<p style="text-align: justify;">लोगों को कार्यपालिका एवं व्यवस्थापालिका ने निराश किया है, न्यायपालिका ने अपनी भूमिका काफी हद तक, काफी समय तकअच्छी तरह से निभाई है, लेकिन सरकार के वास्तविक संचालक अफसरों ने जानबूझकर न्यायपालिका पर इतना गैर-जरूरी भार लाद दिया है कि चाहकर भी न्यायपालिका कुछ नहीं कर सकती। इसके अलावा न्यायपालिका भी <span class='wp_keywordlink_affiliate'><a href="http://www.janokti.com/tag/%e0%a4%ad%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%b7%e0%a5%8d%e0%a4%9f%e0%a4%be%e0%a4%9a%e0%a4%be%e0%a4%b0/" title="View all posts in भ्रष्टाचार" target="_blank">भ्रष्टाचार</a></span> में गौता खाने लगी है। अपराधों एवं जनसंख्य में हो रही बेतहासा वृद्धि के अनुपात में जजों की संख्या बढाना तो दूर, जजों के रिक्त पदों को भी वर्षों तक नहीं भरा जाता है। सब जानते हैं कि जानबूझकर जनता को न्याय से वंचित करने का षडयन्त्र चल रहा है। ऐसे में अब जनता न्यायपालिका से भी निराश होने लगी है।</p>
<p style="text-align: justify;">ऐसे में उद्योगपतियों के हाथ की कठपुतली बन चुक मीडिया से अभी भी लोगों को आशा है। लोग मानते हैं कि मीडिया ही आम जन के दर्द को समझने और प्रस्तुत करने का प्रयास करेगा। प्रिण्ट एवं इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की नैतिक जिम्मेदारी के साथ-साथ, यह उसका संवैधानिक कर्त्तव्य भी है कि वह आम लोगों के हक, स्वाभिमान, दर्द, स्वास्थ्य, सम्मान, इज्जत आदि के लिए अपनी प्राथमिकताएँ तय करे, लेकिन इसके विपरीत मीडिया आम लोगों के लिये लडना तो दूर, कहीं नजदीक भी नजर नहीं आ रहा है। मीडिया एक्टर, क्रिकेटर, कलेक्टर, लीडर और इंस्पेक्टर के इर्द-गिर्द घूमता हुआ उद्योगपतियों का व्यापार बन गया है। मीडियाजन धन, दौलत और एश-ओ-आराम के पीछे दौड रहे हैं। ऐसे में सच्चे मीडिया सेवकों को सामने आना होगा। उन्हें अपने पत्रकारिता धर्म का निर्वाह करना होगा। मीडिया को मानवता की कराह को सुनना होगा और संसार को सुनाना भी होगा। हालात जो भी रहे हों या जो भी है, लेकिन यह सच है कि आम लोगों में बोलने की हिम्मत नहीं है, अब मीडिया को अपनी जुबानी लोगों की पीडा एवं समस्याओं को सुनना और उठाना होगा, तब ही किसी बदलाव या चमत्कार की आशा की जा सकती है।</p>
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		<title>मीडियामोरचा अब वेब पर</title>
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		<pubDate>Thu, 08 Jul 2010 13:27:41 +0000</pubDate>
		<dc:creator>जनोक्ति डेस्क</dc:creator>
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			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><img class="alignright size-medium wp-image-4347" title="Picture 001" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2010/07/Picture-001-300x225.jpg" alt="" width="300" height="225" />पटना से संचालित हो रहे मीडिया के सरोकार पर आधारित ई-पत्रिका <span class='wp_keywordlink_affiliate'><a href="http://www.janokti.com/tag/%e0%a4%ae%e0%a5%80%e0%a4%a1%e0%a4%bf%e0%a4%af%e0%a4%be%e0%a4%ae%e0%a5%8b%e0%a4%b0%e0%a4%9a%e0%a4%be/" title="View all posts in मीडियामोरचा" target="_blank">मीडियामोरचा</a></span> अब अपने नए कलेवर के साथ पाठकों और प्रशंषकों के बीच वेब पर अवतरित हो गया है। सरोकारों से जुड़ी पत्रकारिता में उभरते हुए पत्रकार लीना द्वारा संचालित और संपादित इस साइट पर मीडिया से जुड़े आलेख, सूचनाएं और विचार मौजूद हैं। पंचलाइन पत्रकारिता के जनसरोकार के संकल्प से साथ वेब की दुनिया में उपलब्ध मीडियामोरचा की सबसे खास बात है कि लोकतंत्र के वाचडाग यानी मीडिया की खबर लेने वाली इस वेबसाइट से की सभी सहयोगी महिलाएं हैं।</p>
<p style="text-align: justify;">संपादक लीना कहती हैं कि मीडिया की दुनिया में तेजी से बदलाव आ रहा है। पत्रकार से लेकर मीडिया के बाजार तक सब बदले हैं, वैसी स्थिति में मीडिया के सरोकार भी बदल रहे हैं। हमारी कोशिश है कि मीडिया के सरोकार जनता से जुड़ रहे और मीडिया जनता की आवाज बनी रहे।</p>
<p style="text-align: justify;"><span class='wp_keywordlink_affiliate'><a href="http://www.janokti.com/tag/%e0%a4%ae%e0%a5%80%e0%a4%a1%e0%a4%bf%e0%a4%af%e0%a4%be%e0%a4%ae%e0%a5%8b%e0%a4%b0%e0%a4%9a%e0%a4%be/" title="View all posts in मीडियामोरचा" target="_blank">मीडियामोरचा</a></span> के नए रूप की विशेषता है कि अब जब चाहे सामग्री को अपडेट कर सकते हैं। इसमें नए लेखकों और विचार को अधिकाधिक जगह देने की कोशिश की जा रही है। संपादक लीना मीडिया से जुड़े लोग और मीडिया कोर्स में अध्ययनरत छात्र-छात्राओं से अपील करती हैं कि वे अपने आलेख भेजें, जिसे यथाषीघ्र पब्लिष किया जाएगा। सामग्री को निम्न आईडी पर भेजी जा सकती है।</p>
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		<title>हाथ को मीडिया का साथ</title>
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		<pubDate>Wed, 07 Jul 2010 05:04:24 +0000</pubDate>
		<dc:creator>नरेन्द्र निर्मल</dc:creator>
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		<description><![CDATA[देश में मंहगाई आज सातवें आसमान पर पहुच गया है. लोगो के थाल से दाल तो सरकार ने पहले ही हटा दिए. अब सरकार का इरादा चावल और आटे को... <a class="meta-more" href="http://www.janokti.com/%e0%a4%b8%e0%a4%bf%e0%a4%a8%e0%a5%87%e0%a4%ae%e0%a4%be-%e0%a4%ae%e0%a5%80%e0%a4%a1%e0%a4%bf%e0%a4%af%e0%a4%be-%e0%a4%ac%e0%a5%8d%e0%a4%b2%e0%a5%89%e0%a4%97-%e0%a4%ab%e0%a4%bf%e0%a4%b2%e0%a5%8d/%e0%a4%ae%e0%a5%80%e0%a4%a1%e0%a4%bf%e0%a4%af%e0%a4%be/%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%a5-%e0%a4%95%e0%a5%8b-%e0%a4%ae%e0%a5%80%e0%a4%a1%e0%a4%bf%e0%a4%af%e0%a4%be-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%a5/">Read more <span class="meta-nav">&#187;</span></a>]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><img class="alignright size-medium wp-image-4302" title="news_RYsYq_26" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2010/07/news_RYsYq_26-300x215.jpg" alt="" width="300" height="215" />देश में मंहगाई आज सातवें आसमान पर पहुच गया है. लोगो के थाल से दाल तो सरकार ने पहले ही हटा दिए. अब सरकार का इरादा चावल और आटे को भी गरीब के थालिओं से हटाने का है. वजह एक मात्र दिखाई देता है, सरकार देश से गरीबी मिटाना चाहती है और शायद ही ऐसा संभव हो पाए. इसलिए सरकार ने नई तरकीब निकाली है, गरीबी मिटाने के लिए नहीं, बल्कि गरीबों को मिटाने के लिए. क्योंकि भारत के नागरिक लाख समझाने पर भी अपनी आबादी घटाने पर विचार नहीं कर रहे है. खासतौर से गरीब और अशिक्षित लोग जनसँख्या को लेकर आज भी पूरी तरह उदासीन है, आज देश भर में महंगाई के खिलाफ विपक्ष ने धरना-प्रदर्शन कर देश में बंद तो सफल अवश्य कर दिया लेकिन क्या इससे महंगाई जैसी समस्या का हल हो जायेगा ऐसा शायद ही  संभव हो पाए.</p>
<p style="text-align: justify;">महंगाई  से त्रस्त आम जनता भले ही विपक्ष की बात मानकर एक दिन के लिए सड़क पर गाड़ी चलाना बंद कर दे, अपनी दुकानों की किवाड़ लगा दे या नौकरियों और अपने कामकाज पर जाना छोड़ दे, फिर भी सरकार कुछ नहीं करेगी ये तय है. क्योकि सरकार जानती है कि आम आदमी आज पूरी तरह विचलित स्थिति में है, वो अपने जीवकोपार्जन और घरेलु परेशानियों से  इस कदर जुझ रहे है कि उन्हें सही गलत समझने की फुरसत ही नहीं होती। वह हर बड़ी बात आसानी से कुछ ही दिनों में भूल जाते है। उन्हें तो बस वर्तमान की चीजे याद रहती है। और भूतकाल के कारनामों पर पर्दा डालना <span class='wp_keywordlink_affiliate'><a href="http://www.janokti.com/tag/%e0%a4%95%e0%a4%be%e0%a4%82%e0%a4%97%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a5%87%e0%a4%b8/" title="View all posts in कांग्रेस" target="_blank">कांग्रेस</a></span> आसानी से जानती है। इसलिए तो हर चुनाव से पूर्व जनहित में देश की तीजोरी को खोल दिया जाता है। अंतिम बजट सत्र के दौरान इतने उपहार लोगों को बांट दिए जाते है कि लोग सारे द्वेष, सरकार के कामकाजो के प्रति खटाश सब भूल जाएंगे। और ऐसा एक बार नहीं सरकार ने हर बार यहीं किया है। यहां लोगों को वर्तमान में झाकने की आदत पड़ गई है और लोग इंसानियत पूरी तरह भूलते जा रहे हैं। अगर सरकार ने पहले जितने कुछ अच्छे कार्य किए हो वो उसे आसानी से भूल जाते है लेकिन वर्तमान में थोड़ी सी गलती हो जाए तो सारे पुण्य पाप में बदल जाते है। एक आम आदमी की इस सोच का ही नतीजा है कि पिछली राजग सरकार बहुदल होने के बावजूद अच्छा कार्य किया सरकारी कर्ज तोड़े। लोगों के सिर पर जो विश्वस्तरिय कर्जा का काला बादल छाया हुआ था उसे साफ तो नहीं किया लेकिन कम अवश्य कर दिया। परमाणु परिक्षण कर देश को विश्व के बड़े देशों में ला खड़ा किया। वह भी स्वालंबी बनाते हुए। लेकिन आम आदमी ने उन्हें क्या दिया प्याज के आसू। करगील का करारा जवाब देकर पाकिस्तान को झुकने के साथ-साथ विश्व के बीच आतंकवाद फैलाने वाला दोषी देश साबित किया हालांकि उन्होंने दोस्ती की बस चलाकर खाई को पांटने का काम अवश्य किया था। लेकिन कुत्ते की पुंछ टेढ़ी की टेढी। देश के हर कोने में बड़े बड़े राज्य मार्गों का निर्माण कराया जिससे की आज व्यवसाय, औद्योगिक ईकाईयों से लेकर आम आदमी के लिए यातायात को लेकर काफी सुविधा बढ़ी है। वाजपई सरकार ने इतने बड़े गठबंधन को सिर्फ चलाया बल्कि अलग-अलग पार्टियों के हितों के साथ देश हितों का भी बखुबी ध्यान रखा।</p>
<p style="text-align: justify;">आम आदमी के लिए वाजपई सरकार ने सब कुछ किया खासतौर से <span class='wp_keywordlink_affiliate'><a href="http://www.janokti.com/tag/%e0%a4%ae%e0%a4%82%e0%a4%b9%e0%a4%97%e0%a4%be%e0%a4%88/" title="View all posts in मंहगाई" target="_blank">मंहगाई</a></span> पर भी अंकुश लगाए रखा। और उस रफतार से भी <span class='wp_keywordlink_affiliate'><a href="http://www.janokti.com/tag/%e0%a4%ae%e0%a4%82%e0%a4%b9%e0%a4%97%e0%a4%be%e0%a4%88/" title="View all posts in मंहगाई" target="_blank">मंहगाई</a></span> को बढ़ने नहीं दिया जिस रफतार से आज बढ़ाई जा रही है यूपीए कम <span class='wp_keywordlink_affiliate'><a href="http://www.janokti.com/tag/%e0%a4%95%e0%a4%be%e0%a4%82%e0%a4%97%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a5%87%e0%a4%b8/" title="View all posts in कांग्रेस" target="_blank">कांग्रेस</a></span> सरकार द्वारा। हां एक बड़ी गलती हुई वाजपई सरकार से कि उन्होंने जिस मुद्दे की वजह से चुनाव जीती और सत्ता तक पहुंचे उसे उन्होंने पूरा नहीं किया। यहीं कारण है कि पहले से नाराज मुसलमान के बाद हिन्दू वर्ग भी उनसे नाराज हो गया। लेकिन उन्होंने यह कभी नहीं सोचा कि किसी भी चीज का निर्माण करने से कही ज्यादा तोड़ना आसान है। मंदिर हो या मस्जिद मुश्किल से किसी भी समुदाय को तोड़ने में 2 से 3 दिन लग सकते है या कहे तो दो से तीन घंटे लेकिन इसे बनाने में कम से कम 2-3 महिने अवश्य लग जाएगे। ऐसे में भला उनके एक पक्षिय मंदिर निर्माण के निर्णय से सरकार गीर जाती तो क्या मंदिर का निर्माण हो सकता था, नहीं। तो उन्हें आज तक इस बात का दोषी क्यों माना जा रहा है। दूसरी चीज जब आज की <span class='wp_keywordlink_affiliate'><a href="http://www.janokti.com/tag/%e0%a4%95%e0%a4%be%e0%a4%82%e0%a4%97%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a5%87%e0%a4%b8/" title="View all posts in कांग्रेस" target="_blank">कांग्रेस</a></span> सरकार 4 साल मंहगे शाषण देने के बाद अंतिम वर्षों में सस्ता अनाज उपलब्ध करा दे। ऐसे में आप क्या समझ सकते है कि व्यापारी वर्ग पर पूरी तरह से कांग्रेसीयों का दवाब कायम है ऐसे में वाजपेई सरकार के अंतिम वर्षों में व्यापारियों पर दवाब डालकर आम आदमी की वस्तुओं के दामों को बढ़ाकर यह स्थिति पैदा की गई होगी। जिससे लोग पिछले कामों को भूल जाए और आज की महंगाई याद रखे जैसा की 2003 के चुनाव में हुआ था। आम आदमी को सोचना पड़ेगा की राजनीति में ऐसे हथकंडे अपनाए जाते है। कहां भी गया राजनीति कोई आसाना खेल नहीं है और जिसे खेलना आम आदमी के बस का नही है।  खासतौर से शरीफ आदमी की तो इसमें ऐंट्री ही नहीं है। सच बोलने वाला व्यक्ति यहां उपहास का साधन बन जाता है और झूठे व्यक्ति के सर पर हमेशा ताज लग जाता है, क्योंकि शरीफ आदमी के पास धन खर्चने, लोगों को दारू के लिए रूपय बांटने और वोट दवाब में डालने के लिए गुंडे नहीं होते।</p>
<p style="text-align: justify;">यहां तक की शरीफ आदमी जात-पात और धर्म के नाम पर वोट नहीं मांग सकता। वह काम के लिए मांगता है लेकिन आज सच्चाई है कि वोट सबसे ज्यादा काम को लेकर नहीं कौम को लेकर दी जाती है। और इस गुनाह को एक समुदाय सालों से करता आ रहा है। इसलिए आज देश में कोई पिछड़ा हुआ है तो बस वहीं लोग है। ऐसा नहीं है कि ये लोग पैसे के लिए बिक जाते है। ये आज भी इस भ्रम जाल में फंसे हुए है कि देश में इनका कोई हितैशी है तो वो कांग्रेस है। मैं नहीं कहता की बीजेपी ही अच्छी पार्टी है। हमारा मकसद है कि आप अपने क्षेत्र, मोहल्ले, समाज से खुद ऐसा प्रतिनिधि चुने जो गांव, समाज, परिवार, क्षेत्र में सबसे ईमानदार और कार्य के प्रति कर्मठ और विश्वासी हो। ऐसे लोगों को सामने लाकर उसे चुनाव में खड़ा कर हर प्रकार से मदद पहुंचाए फिर वो चाहे किसी भी जात या धर्म का हो। उसमें इंसानियत होनी चाहिए। पत्रकारिता जगत इस पहल में कुछ कर सकती है। लेकिन उसे फुरसत कहां वातानुकुलित जिंदगीयां जीने से उन्हें सरकार विज्ञापन के रूप में इतनी मदद पहुंचा देती है कि वह सरकार के खिलाफ बोलने से बचने के लिए अपने खबरियां चैनलों में नए-नए फिल्मी गोसिप और मनोरंजनात्मक कार्यक्रम प्रस्तुत करती रहती है। वहीं अखबार वाले विपक्ष को कमजोर बनाने में लगे हुए है कभी मोदी प्रकरण उठा लेते है। कभी बीजेपी के आंतरिक कलह को इस कदर बढ़ा-चढ़ाकर दिखाने और लोगों को सुनाने लगते है कि विपक्ष बेहद कमजोर हो चुका है।</p>
<p style="text-align: justify;">कभी अखबार या खबरियां चैनलों ने यह दिखाने की कभी कोशिश नहीं कि देश के 543 सांसदों और हजारों विधायक अपने अपने क्षेत्र में किस तरह का काम कर रहे है। किन किन सांसदों पे काले धन स्वीस खाते में पड़े है, किन-किन राजनेताओं के बच्चे विदेश में शिक्षा प्राप्त कर रहे है। इन शासक वर्ग के लोग जो देश चलाने का, गरीबी मिटाने का, और भारत को विश्व शक्ति बनाने का झूठा ख्वाब दिखाते है, कितनी आसानी से यहा की जनता की गाढ़ी कमाई चुसकर अमेरिका में बसने की तैयारी कर लेते है। जो लोग आज देश की आर्थिक नीतियों का संचालन करते है। और जिनके उपर महंगाई बढ़ाने या घटाने का जिम्मा है उनका भविष्य उनके बच्चों के रूप में अमेरिका बस चुका है। और इनकी उर्जा भी अमेरिकन नागरिकता पाने में लगी रहती है। फिर यह देश कैसे चल सकता है। जब देश को चलाने वालों में देश प्रेम ही नहीं बचा है। इस तरह के अंदरूनी विश्वासघात के प्रति मीडिया आंख फेरे खड़ी है। देश में नक्सली बढ़ रहे है, सैनिक मारे जा रहे है। लेकिन कभी ये सोचने या दिखाने की जरूरत नहीं पड़ती की नक्सलियों जिन्हें सरकारी कर्मचारी समझकर मार रहा है उनके भी परिवार में कोई हैं। उनके पीछे भी कोई रोने वाला है। कभी ये सोचने की जरूरत नहीं पड़ी की नक्सली कभी नेताओं को निशाना क्यो नहीं बनाता। अगर विकास को लेकर नक्सली हिंसा करते है तो उस क्षेत्र का सांसद जिम्मेवार है तो उस सांसद पर क्यों नहीं हमला होता। आखिर उनका फंनडींग का जरिया क्या है? इतने आधुनिक हथियार उन्हें कहा से प्राप्त हो रहे है और इसके लिए उन्हें धन कहा से मिल रहा है? लेकिन पत्रकार जोखिम उठाने तैयार नहीं है वो तो वातानुकुलित कक्ष में बैठकर होम प्रोडक्ट खबरे तैयार कर बेचना ज्यादा पसंद करता हैं। कुछ लोग करना भी चाहते है तो ऐसे लोग जानते है कि हर एक्सक्लूसिव खबर का जुड़ाव सरकार या राजनीति से होता है। जिसका प्रसारण करना बेहद जोखिम भरा होता है क्योंकि हर चैनल का मालिक या तो कोई राजनेता होता है या ऐसे चैनलों में अब राजनीतिक लोगों के पैसे खुले या छुपे तौर पर लगे होते है। लेकिन फिर भी सांसदों के क्षेत्रों में किस प्रकार का काम हो रहा है वहां के लोग कितने खुशहाल है और किस दिक्कतों से गुजर रहे है। कभी दिखाना नहीं चाहते। हां आज जब महंगाई की मार झेल रही जनता की आवाज विपक्षी सड़को पर उठा रहे तो तब इन मीडिया वालों को जनता की थोड़ी बहुत दिक्कतों का बड़ा ख्याल हो आया है। और इसी मीडिया का दोगला चरित्र तो देखिए जब पिछले दिनों बढ़ती महंगाई के दौरान विपक्ष चुप था तब भी ये विपक्ष को ही कोसते हुए उसे कमजोर और निकम्मा साबित करने में लगे हुए थे। ऐसा लगता है कि भारतीय मीडिया का चरित्र सत्ता समर्पित हो चुका है।</p>
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		<title>मीडिया और नक्सलवाद</title>
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		<pubDate>Sun, 30 May 2010 16:49:37 +0000</pubDate>
		<dc:creator>लीना</dc:creator>
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		<description><![CDATA[आपरेशन ग्रीन हंट और किशनजी द्वारा वार्ता करो, नहीं तो शहरों पर धावा करेंगे जैसी खबरें मीडिया में भी छायी रही हैं। पहले भी नक्सली वारदातों या सशस्त्र बलों द्वारा... <a class="meta-more" href="http://www.janokti.com/%e0%a4%b8%e0%a4%bf%e0%a4%a8%e0%a5%87%e0%a4%ae%e0%a4%be-%e0%a4%ae%e0%a5%80%e0%a4%a1%e0%a4%bf%e0%a4%af%e0%a4%be-%e0%a4%ac%e0%a5%8d%e0%a4%b2%e0%a5%89%e0%a4%97-%e0%a4%ab%e0%a4%bf%e0%a4%b2%e0%a5%8d/%e0%a4%ae%e0%a5%80%e0%a4%a1%e0%a4%bf%e0%a4%af%e0%a4%be/%e0%a4%ae%e0%a5%80%e0%a4%a1%e0%a4%bf%e0%a4%af%e0%a4%be-%e0%a4%94%e0%a4%b0-%e0%a4%a8%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b8%e0%a4%b2%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%a6/">Read more <span class="meta-nav">&#187;</span></a>]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><img class="alignright size-medium wp-image-3504" title="naxalite media" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2010/05/naxalite-media-300x210.jpg" alt="" width="300" height="210" />आपरेशन ग्रीन हंट और किशनजी द्वारा वार्ता करो, नहीं तो शहरों पर धावा करेंगे जैसी खबरें मीडिया में भी छायी रही हैं। पहले भी नक्सली वारदातों या सशस्त्र बलों द्वारा उनके खिलाफ चलाए जा रहे अभियान को मीडिया अच्छी तरजीह देती रही है। जब कहीं नरसंहार होते हैं या नक्सलवादियों की पकड़ धकड़, अखबारों या चैनलों पर प्रमुखता से खबरें नजर आती हैं। नहीं नजर आती हैं तो वह परिस्थितियां, स्थितियां या नक्सलियों के लिए सरकार द्वारा घोषित योजनाओं की रूपरेखा और उन तक इसे पहुंचाने के साधन या फिर नक्सलियों द्वारा किए जाने वाले कुछ कार्यक्रम।</p>
<p style="text-align: justify;">बिहार जैसे राज्य में जहां अरसे से नक्सलवाद एक प्रमुख समस्या रही है। संयुक्त बिहार में दक्षिण इसका गढ़ था। जो अब झारखंड में चला गया है। लेकिन अभी भी यहां का गया, औरंगाबाद, रोहतास, जहानाबाद, जमुई जैसे कई जिले नक्सलवाद से बुरी तरह प्रभावित हैं। बल्कि यह आज समूचे राज्य में पांव फैला चुका है।</p>
<p style="text-align: justify;">जहां तक बिहार में मीडिया और नक्सलवाद का सवाल है। तो कभी कभी ऐसा लगता है कि जिस तरह से आज मीडिया बाजारवाद के गिरफ्त में आकर मूल कारणों या फिर अपने उद्देश्यों से भट गया है वहीं नक्सलवाद जैसे अतिगंभीर व संवेदनशील मसलों पर भी वह सचेत नहीं दिखता। नक्सलवाद के बढ़ते कारणों या फिर नक्सलवाद की ओर मुड़ रहे युवा वर्ग को मुख्यधारा में लाने के लिए चलाये जा रहे सरकारी कार्यक्रमों को व्यापकता के साथ मीडिया नहीं उठाती। हर खबर के पीछे आनन फानन में नक्सली हाथ बता देना मीडिया की जल्दबाजी और गैरजिम्मेदारी है। खगडिया नरसंहार इसका जीवंत उदाहरण है। घटना के पीछे मीडिया ने नक्सली हाथ बता डाला। संभावना तक व्यक्त नहीं की। जबकि सच्चाई यह थी कि घटना जातीय संघर्ष का परिणाम था, जिसमें कई लोगों की जान गई थी।  स्थानीय प्रशासन भी इसमें नक्सलवाद का हाथ होने से इंकार करता रहा। बिहार सरकार ने मामले की जांच करवायी और यह साफ हुआ कि खगड़िया नरसंहार के पीछे नक्सली नहीं जातीय संषर्घ कारण था। मजेदार बात यह है कि मीडिया में कुछ ने तो अपनी गलती स्वीकारते हुए बाद में खबरों में सुधार कर दिया। जबकि कई ने नोटिस तक नहीं लिया। इसके अलावा हाल ही में नक्सल प्रभावित जहानाबाद जिले के शिवबिगहा से खबर आयी कि नक्सलियों ने एक भूपति के घर पर गोलाबारी कि जिससे उसके घर में आग लग गई। मीडिया ने भी इस खबर के पीछे नक्सली हाथ बता कर खबर चला दी। दूसरे दिन पुलिस प्रशासन ने खबर का खंडन किया और नक्सली हाथ से इंकार किया। दरअसल इस घटना के पीछे भी आपसी रंजिश का मामला था। कहने का तात्पर्य यह है कि बिना तहकीकात के खबर के पीछे नक्सली हाथ बता देने से नक्सली संगठन को ही कहीं न कहीं ‘‘प्रचार’’ के तहत फायदा होता है ? कई घटनाओं में देखा गया है कि नक्सली संगठन गांव या फिर सरकारी भवन आदि पर हमला करते हैं और वहां अपनी मांगों से संबंधित पोस्टर-पर्चा आदि छोड़ जाते हैं ताकि मीडिया में खबर बन सके। मंशा जाहिर है कि मीडिया का इस्तेमाल ?</p>
<p style="text-align: justify;">ये तो हालिया उदाहरण हैं। आनन फानन में खबरें देने की ढेरों घटनाएं देखने को मिलती हैं। नरसंहार या आपसी संघर्ष में होने वाली वारदातों में मीडिया को सचेत रहने की जरूरत है। देखना होगा कि कोई भी बड़ी घटना को आनन फानन में मीडिया द्वारा नक्सली घटना करार देने से फायदा किसे हो रहा है ? नक्सल जैसे संवेदनशील मुद्दे पर जल्दी में झूठी खबरें देने से मीडिया को परहेज करनी चाहिए।</p>
<p style="text-align: justify;">दूसरी ओर नक्सलियों को समाज की मुख्यधारा से जोड़ने को लेकर केन्द्र व राज्य सरकार की ओर से कई जनोपयोगी कार्यक्रम चलाये जा रहे हैं। ताकि भटकाव को रोका जाये और खासकर युवा वर्ग को योजनाओं से जोड़ा जाये। इन योजनाओं के क्रियान्वयन को लेकर खबरें मीडिया में नहीं के बराबर दिखती है। हां, इसे लेकर सरकारी विज्ञापन भले ही मीडिया में दिख जाता है। जबकि इसके सकारात्मक पहलू को सामने लाना चाहिये ताकि दूसरों पर भी सकारात्मक प्रभाव पड़े।</p>
<p style="text-align: justify;">सबसे अहम् मुद्दा है बिहार में या देश में कहीं भी कोई नक्सली क्यों बन जाता है ? इस पर गौर करें तो दो बातें सामने आती हैं। पहला कौन बनता है नक्सली ? कहीं भी धनाढ्य वर्ग का व्यक्ति नक्सली आंदोलनों में शामिल नहीं दिखता है। और इसी जवाब में इसके दूसरे सवाल कि कोई क्यों बन जाता है नक्सली का जवाब भी समाहित है। पिछड़े अविकसित क्षेत्र का वो इलाका जहां विकास तो क्या विकास की सरकारी योजनाओं की जानकारी तक लोगों से दूर है। जहां बेराजगारी, भूखमरी और मानसिक आर्थिक शोषण से जूझ रही लोगों के समस्याओं के समाधान का कोई विकल्प सामने नहीं दिखता है। ऐसे में ही नक्सली पैदा होते हैं। ऐसी परिस्थितियों को मीडिया द्वारा सामने लाने की जरूरत है। हालांकि अक्सर ही नक्सलियों द्वारा जबरन दूसरे को नक्सली गतिविधियों में शामिल करने की भी खबरें आती है। अगर ऐसा होता है तो क्यों? उसकी मजबूरी या उसको दी जा सकने वाली सरकारी मदद सामने नहीं आ पाते हैं।</p>
<p style="text-align: justify;">और आखिर क्यों नहीं सफल हो पाते हैं इन क्षेत्रों में सरकारी योजनाएं। वो कौन सी वजहें हैं कि विकास की धारा नक्सल प्रभावित क्षेत्रों तक पहुंचने से पहले ही सूख जाती है। व्यवस्था के प्रति नक्सलियों के मन में पनप रहे विद्रोह को दबाने के लिए इन कारणों को बेहतर ढंग से सामने लाने की जरूरत है।  जहां तक इन मुद्दों पर मीडिया का सवाल है तो वह तभी प्रभावी ढंग से सामने आता है जब नरसंहार जैसा कोई बड़ी वारदात होती है। यों तो मीडिया की टीम नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में घूमती रहती है। सषस्त्र बलों के साथ उनके अभियान की कवरिंग करने के लिए भी और माओवादी नेताओं के विषेष साक्षात्कार के लिए भी। उन्हें भी अपनी बात व्यवस्था तक पहुंचाने के लिए मीडिया की जरूरत रहती ही है। मीडिया और नक्सलियों द्वारा इस तरह एक दूसरे का इस्तेमाल करना पुराने समय से चलता आ रहा है।</p>
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		<title>दलित सवालों को दबाती मीडिया</title>
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		<pubDate>Sat, 15 May 2010 12:32:13 +0000</pubDate>
		<dc:creator>संजय कुमार</dc:creator>
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			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><img class="alignright size-medium wp-image-3112" title="indian media" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2010/05/indian-media-300x180.png" alt="" width="300" height="180" />आरोप है कि दलित सवालों को मीडिया ने लगभग दरकिनार सा कर दिया है। सवाल दलित मुद्दों का हो या फिर साहित्य या फिर कोई अन्य मुद्दा। इसे लेकर दलित बुद्धिजीवियों के बीच सवाल उठने लगे है कि दलित सवालों को उचित प्रतिनिधित्व मीडिया में नहीं मिल रहा है या नहीं। केवल दलित उत्पीड़न और बलात्कार को स्थान मिल रहा है। लेकिन वैचारिक सोच को दरकिनार करने की साजिश  हो रही है। दलित विमर्श पर फोकस को लेकर अब कोई मीडिया पक्षधर नहीं दिखता है।</p>
<p style="text-align: justify;">सीधी सी बात है उपभोक्तावादी संस्कृति में मीडिया का स्वरूप व्यापक हो चुका है। पत्रकारिता ‘‘मिशन है’’ शब्द का जमाना लद चुका है। साथ ही आज पत्रकारिता <span class='wp_keywordlink_affiliate'><a href="http://www.janokti.com/tag/%e0%a4%ac%e0%a4%be%e0%a4%9c%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%a6/" title="View all posts in बाजारवाद" target="_blank">बाजारवाद</a></span> की गिरफ्त में आकर एक खास वस्तु के रूप में अपनी पहचान बना चुकी है। खबर को मसालेदार बनाकर बेचने का सिलसिला जारी है। <span class='wp_keywordlink_affiliate'><a href="http://www.janokti.com/tag/%e0%a4%ac%e0%a4%be%e0%a4%9c%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%a6/" title="View all posts in बाजारवाद" target="_blank">बाजारवाद</a></span> से आम, खास होते मीडिया की मोह-माया से ‘‘कुछ’’ भी नहीं बच पाया है। हर खबर को ‘‘वस्तु’’ बना कर परोसने करने की होड़ के सामने दलित विमर्ष ही क्या मानवीय पहलू भी दूर हो चुके हैं।</p>
<p style="text-align: justify;">जहां तक मीडिया में दलित मुद्दों को उचित प्रतिनिधित्व देने की बात है तो प्रश्न <span class='wp_keywordlink_affiliate'><a href="http://www.janokti.com/tag/%e0%a4%ac%e0%a4%be%e0%a4%9c%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%a6/" title="View all posts in बाजारवाद" target="_blank">बाजारवाद</a></span> का ही सामने आता है। जो दलित विचार से जुड़े हैं वही अलग से दलित विमर्श के नाम पर पत्र-पत्रिकाएं निकालकर दलित साहित्य, विमर्श  आदि को जगह दे रहे हैं।</p>
<p style="text-align: justify;">दलित साहित्यकार डा०  पूरण सिंह मानते हैं कि मीडिया में दलित सवालों को उचित प्रतिनिधित्व मिलना तो दूर उन्हें गिना तक नहीं जाता। मीडिया जिसे देश के विकास में चैथा स्तम्भ कहा जाता है उसके मालिक सवर्ण मानसिकता के लोग यह बिल्कुल स्वीकार नहीं करेंगे, जिन्होंने इस <span class='wp_keywordlink_affiliate'><a href="http://www.janokti.com/tag/%e0%a4%b8%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%9c/" title="View all posts in समाज" target="_blank">समाज</a></span> का सदियों से शोषण, अपमान, तिरस्कार किया हो, उन्हें प्रतिनिधित्व दिया जाये ? मैं तो यह कहूँगा  कि मीडिया चाहे तो दलितों के यथार्थ को जनसामान्य तक पहुंचाने में सर्वोच्च भूमिका निभा सकती है। मीडिया के शीर्ष पर बैठे ये लोग जिस दिन मित्रता, शक्ति, विश्वमैत्री, पे्रम एवम् बन्धुत्व की भाषा बोलना सीख लेंगे उस दिन यह सवाल अप्रासंगिक हो जायेगा।</p>
<p style="text-align: justify;">ज्यादातर दलित साहित्यकारों का मानना है कि देश की मीडिया राजनीति, अपराध, हीरो हीरोइन, सांप-बिल्ली-कुत्ते, अंधविश्वास आदि खबरों से पटे रहते हैं। अखबरों के रविवारीय व संपादकीय पृष्ठों में भी दलित सवालों और रचनाओं को कोई स्थान नहीं मिल रहा। विचार व साहित्य के नाम पर सवर्णों के साक्षात्कार, कहानियां, कविताएं ही आती हैं। और तो और रविवारी, परिशिष्टों में मीडिया ज्योतिष, वास्तुशास्त्र आदि की चर्चाओं से लबरेज रहती है। डा० .भीम राव अम्बेडकर, ज्योति बा फूले जैसे दलित विचारकों के विचार तो नहीं के बराबर आते हैं। अब तो अन्य महान व्यक्तियों को भी मीडिया तरजीह नहीं देती है। मीडिया के आकलन से साफ होता है कि इसने वैचारिक मुद्दों से मुंह मोड़ लिया है।</p>
<p style="text-align: justify;">चर्चित दलित पत्रकार-साहित्यकार मोहनदास नैमिशराय मानते है कि भारत की सवर्ण मीडिया आरम्भ से ही बेईमान और दोगले चरित्र की रही है। उसकी कथनी और करनी में अंतर है। सच तो यह है कि पिछले एक दशक से वे दलित सवालों को अपने हित के लिए उछालने में लगे हैं। ऐसा करते हुए वे दलित सवालों को प्रतिनिधित्व नहीं दे रहे हैं, बल्कि दलितों को राजनीतिज्ञों की तरह रिझाते हैं। वह मार्केट तलाश करते रहे हैं, जो उन्हें मिल भी रहा है। दलितों पर लिखते हुए उनका व्यापार खूब फल-फूल रहा है। दलित <span class='wp_keywordlink_affiliate'><a href="http://www.janokti.com/tag/%e0%a4%b8%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%9c/" title="View all posts in समाज" target="_blank">समाज</a></span> के बुद्धिजीवियों को कम-से-कम यह समझना चाहिए। उन्हें अपने स्वतन्त्र मीडिया की स्थापना कर उसका विकास करना चाहिए।</p>
<p style="text-align: justify;">वहीं कवि-पत्रकार कैलाश दहिया कहते हैं मीडिया दलित अत्याचारों को तो उठा रहा है, लेकिन दलितों का जो दृष्टिकोण है उसे नजरअंदाज किया जा रहा है। दलित चाहता क्या है उस पर मीडिया बात नहीं करता। केवल आरक्षण के सवाल पर मीडिया को कोसने का काम करता रहता है। आरक्षण को सामाजिक स्तर पर नहीं देखता है बल्कि उसे आर्थिक आधार को ही सामने लाता है। दलितों के राजनीतिक सवाल को नहीं उठाता, बल्कि दलित नेतृत्व की बुराई ही करता रहता है। दलित राजनीति के सकारात्मक बातों को मीडिया निगल जाता है। कबीर व तुलसी के बीच में जो भेद है उसे मुद्दा नहीं बनाता। कबीर दलितों के सदगुरू है । जबकि  तुलसी वर्ण व्यवस्था के पोषक। कहने का तात्पर्य यह है कि पूरी व्यवस्था ही सवर्णो के हाथ में है। ऐसे में मीडिया में दलितों और उनसे संबंधित मुद्दों की उपेक्षा कोई आश्चर्य की बात नहीं। वैसे मीडिया में दलित सवाल नहीं उठ रहे हंै तो इसे कोसने की जरूरत नहीं है। क्योंकि मीडिया जो है वह सवर्णांे का है। अगर दलित मुद्दों को उठाने की बात है तो इसके लिए मानसिकता बदलने की जरूरत है। वैसे यह कहना जल्दबाजी होगी कि दलितों के लिए कोई अलग मीडिया बनायी जाए। हाँ , किसी भी मीडिया में दलितों का प्रतिनिधित्व साफ-साफ दिखाई देना चाहिए। जहां तक योग्यता की बात है तो यह कुतर्क के सिवाय कुछ नहीं है। जब अमेरिका में डायवर्सिटी का सिद्धांत लागू हो सकता है तो हमारे यहां क्यों नहीं? अंतर्मन में झांकने की जरूरत है। बस औपचारिकता पूरी करने के लिए दलित पर होते अत्याचारों को मीडिया में जगह दी जाती रही है वह भी मात्र व्यवसायिक नजरिये के तहत।</p>
<p style="text-align: justify;">सच है, मीडिया पर एक सरसरी नजर डाली जाये या फिर हाल में मीडिया पर हुए शोध पर नजर टिकायी जाये तो साफ पता चलता है कि कब्जा सवर्णो का है। ऐसे मे न्याय की बात बेमानी लग सकती है, बल्कि आरक्षण या फिर दलित-पिछड़ो के मामले में मीडिया के दोगले चरित्र से लोग वाकिफ हो चुके है। ऐसे में मीडिया में दलित मुद्दों का केवल और केवल खबर ही बनता है। वहीं देखा जा सकता है कि दलितों पर अत्याचार से जुड़ी खबरों को जरूर स्थान दिया जा रहा है।</p>
<p style="text-align: justify;">वहीं देश भर के जाने माने दलित चिंतक/लेखक-पत्रकारों ने  मीडिया में दलित सवालों के उचित प्रतिनिधित्व पर नहीं होने पर नाखुश  है। माताप्रसाद कहते है कि ‘‘प्रिन्ट मीडिया में दलित उत्पीड़न और बलात्कार को स्थान मिल रहा है यही स्थिति इलेक्ट्रानिक मीडिया की भी है, किन्तु दलित साहित्य को इनसे प्रोत्साहन नहीं मिल रहा है ’’। वहीं जसवंत सिंह जनमेजय कहते हैं ‘‘कुछ समय पहले जैन टी.वी. दलित विमर्श पर फोकस दिखाती थी, अब कोई मीडिया पक्षधर नहीं है ’’। भरत सिंह बेचैन का मानना है कि ‘‘ मीडिया में भी दलित सवालों और दलित साहित्य को कोई प्रतिनिधित्व नहीं दिया जाता। मीडिया वाले तो दलित सवालों से और ज्यादा मुंह चुराते हैं, लेकिन मीडिया की यह मनमानी ज्यादा दिन तक चलने वाली नहीं है दलित अब अपने अधिकारों के लिए सजग व आक्रामक होने लगे हैं ’’। जबकि जयप्रकाश वाल्मीकि कहते है ‘‘ राष्ट्रीय और प्रादेशिक स्तर के समाचार-पत्र राजनीति, अपराध समाचारों, आदि से भरे रहते हैं। रविवारीय पृष्ठों में भी दलित सवालों और रचनाओं को कोई स्थान नहीं मिल रहा। साहित्य के नाम पर सवर्णों के साक्षात्कार, कहानियां, कविताएं ही आती हैं। इनके रविवारी, परिशिष्टों में बहुत से स्थानों पर ज्योतिष, वास्तुशास्त्र तथा स्वास्थ्य चचाएं ही होती है। महिला विमर्श भी न के बराबर हैं और जो दिया जाता है उसमें सौन्दर्य-निखार तथा रसोई के एक से बढ़कर एक स्वादिष्ट व्यंजन बनाने की विधियां देकर ही महिला-विमर्श की पूर्ति की जा रही है। कुल मिलाकर मीडिया में नारी और दलित विमर्श गायब हैं। वहीं डी.डी. राउत मानव कहते हैं‘‘	मीडिया में दलितों पर अत्याचार से जुड़ी खबरों को जरूर स्थान दिया जा रहा है लेकिन उनका फोलो-अप कभी नहीं किया जाता जो आवश्यक होना चाहिए ’’। गणेश रायबोले कहते है ‘‘मीडिया भी बाजार का ही एक अंग है और बाजार पैसा नाम के मिथ को एक पवित्र सत्य की तरह पेश करता है जहां एक बात जरा हटकर कहने की विनम्र इजाजत चाहता हूं ‘पैसा झूठ, हिंसा, अहंकार और सत्ता में पर्यायवाची शब्द है। हालांकि शब्दकोष ऐसा नहीं कहता। पैसा कोई धनात्मक शक्ति नहीं इसलिए इसका सृजन, रक्षण या पालन से कोई संबंध नहीं है। पैसे का संबंध भक्षण से है। दरअसल जीवन के साधनों से दूसरों को (इनमें पेड-पौधे, पशु-पक्षी बगैरह भी शामिल हो सकते हैं) वंचित करके कमजोर करना और इन वंचितों की कमजोरी को स्वयं के शक्तिशाली होने के प्रमाण के रूप में पेश कर सकना ही पैसा है। पहले इसको पहचानना मुश्किल था लेकिन यदि आज संचेत रूप से पर्यायवरण एवं प्रदूषण इसकी वजह से संकट में पड़ी धरती के कारणों को खोजेंगे तो पैसे के राज का पर्दाफाश को जायेगा और आप देखेंगे जिस शक्ति को पैसा कहा जा रहा है कही से भी धनात्मक नहीं है। वह विशुद्ध शत्रुत्व है। मीडिया चूंकि बाजार का ही एक अंग है इसलिए पैसा ही उसका लक्ष्य है। बाकी सब चीजें साधन मात्र हैं। ऐसे में उचित-अनुचित के आधार पर मीडिया में दलित साहित्य के प्रतिनिधित्व की बात बेमानी है। हां, मीडिया दलित साहित्य को कुछ स्पेस दे रहा है, क्योंकि वह उसकी मार्किट वेल्यू को पहचान रहा है ’’। श्रीमती देवी नागरानी मानती है कि ‘‘	अभिव्यक्ति की आजादी है इस आजाद देश में, जहां पर एक मुक्त समाज में, प्रेस का कर्तव्य है बिहना किसी भय, प्रभाव के लोगों को जानकारी देना। अब कौन अपना दायित्व पूरी निष्ठा के साथ निभाता है इसका कोई मापदंड तो नहीं है, हां अगर ऐसा ईमानदारी से किया जाये तो फिर मसअले कम होते जायंेगे और उनके बार-बार उठाने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी। पर प्रेस पर भी कई अंकुश होते होंगे। यही मानकर जो छापा जा रहा है उसी से अनुमान लगाया जा सकता है कि किसी भी एक मुद्दे को लेकर हम उसके विकास की ओर जाती दिशा में कितना आगे बढ़ रहे हैं ’’। मूलचंद सोनकर इसे खरिज करते हुए कहते है कि बिल्कुल नहीं। मीडिया दलित संबंधी किसी भी सवाल को कोई अहमियत नहीं देता। उल्टे रवैया हमेशा नकारात्मक रहता है’’। तेजपाल सिंह तेज इसे स्वीकारते है उनका मानना है कि मीडिया सरकारी हो या निजी पूरी तरह व्यावसायिक हो गया है उसे कल्याणकारी कार्यों से कोई लेना-देना नहीं रह गया है। मीडिया द्वारा दलित सवालों को उचित तो क्या, स्थान तक न दिये जाने के अनेक उदाहरण मौजूद हैं। मीडिया एक व्यावसायिक संस्था बनकर रह गयी है। उत्तरप्रदेश के पिछले चुनावों में मीडिया के अनुमान का हश्र हम देख चुके हैं। उसे दलित तो क्या आम जनता की समस्याओं से भी कोई सरोकार नहीं है। कर्मशील भारती मीडिया को निजी हाथों का खिलौना मानते है। रवि शंकर कहते है‘‘ ऐसा प्रतीत होता है कि न तो मीडिया ने ही दलित समस्याओं को उजागर करने में अधिक रूचि दिखाई और न ही दलित साहित्यकारों ने मीडिया का लाभ उठाने में अधिक रूचि दिखायी। दलित साहित्य आमतौर पर दलित समाचार-पत्रों और पत्रिकाओं तक सिमटा पड़ा है। यही कारण है कि मीडिया में दलित सवालों को उचित प्रतिनिधित्व नहीं मिल पा रहा है।</p>
<p style="text-align: justify;">हालांकि कई दलित साहित्यकार-पत्रकार मानते हैं कि इन सब के पीछे बाजारवाद महत्वपूर्ण है। मीडिया चूंकि बाजार का ही एक अंग है इसलिए पैसा ही उसका लक्ष्य है। ऐसे में उचित-अनुचित के आधार पर मीडिया में दलित सवालों के प्रतिनिधित्व की बात बेमानी लगती है।	इधर तेजी से यह बात उठने लगी है कि दलितों को अपनी बात आम-खास जनता तक पहुंचाने के लिए एक अदद मीडिया की अलग से जरूरत है। अगर ऐसा होता है तो इस दिशा में एक सकारात्मक पहलू होगा, क्योंकि मीडिया के चरित्र से हर कोई वाकिफ है। कुछ कहने की आवश्यकता नहीं है।</p>
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