“जाके पाँव न फटी बिबाई ,वो क्या जाने पीर पराई “
3बीते दिनों एक जनाब – गाँधी पुलिस कार्यवाही में पकड़े गये जो नक्सली सरगना बताये जाते हैं . यूँ तो नक्सलों के मुख्य सरगना के रूप में कार्यरत थे .यूँ
जम्मू कश्मीर में जो भयावह हालात अभी बन रहे हैं वो समूचे देश के लिए एक बड़े खतरे को जन्म दे रहें हैं.भारत विरोधी मानसिकता तो हमेशा से कश्मीर के
20. विदेश नीति 20.1 भारत “जम्बूद्वीप” नामक एक संस्था के गठन का प्रस्ताव अफगानिस्तान, पाकिस्तान, नेपाल, भूटान, बाँग्लादेश, म्याँमार, कम्बोडिया, इण्डोनेशिया, मलेशिया, श्रीलंका, मालदीव, (मेहमान सदस्यों के रुप में मॉरिशस,
18. चुनाव व्यवस्था 18.1 प्रत्येक जिले को संसदीय चुनाव क्षेत्र तथा प्रखण्ड को विधानसभा चुनाव क्षेत्र का रुप दिया जायेगा. 18.2 इस प्रकार, देश में कुल 405 संसदीय क्षेत्र सीटें
बीते दिनों एक जनाब – गाँधी पुलिस कार्यवाही में पकड़े गये जो नक्सली सरगना बताये जाते हैं . यूँ तो नक्सलों के मुख्य सरगना के रूप में कार्यरत थे .यूँ
भारत की संसद को गाँधी ने 1909 ई० में हीं बाँझ और वेश्या बताया था .धीरे -धीरे वेश्यावृत्ति के पावन कर्म में अपनी राजनीति भी शामिल हो गयी जो अब
नक्सलवाद पर आज व्यापक बहस की जरुरत है . इसी विचार से विमर्श के इस स्तम्भ में पत्रकारिता के छात्र प्रणव का यह आलेख प्रस्तुत है :- नक्सलवाद और नक्सली
१० अक्तूबर को भारत नीति संस्थान के द्वारा दीनदयाल शोध संस्थान, नई दिल्ली में ” वर्तमान सन्दर्भ में हिंद स्वराज की प्रासंगिकता ” विषय पर एक संगोष्ठी का आयोजन किया गया . इस संगोष्ठी में वरिष्ठ गांधीवादी चिन्तक और पूर्व सांसद राम जी सिंह , जेएनयु के प्राध्यापक अमित शर्मा , पांचजन्य के सम्पादक बलदेव भाई सिंह , आईबीएन -7 के पत्रकार आशुतोष , आचार्य गिरिराज किशोर , केदारनाथ साहनी , और भारत नीति संस्थान के संचालक राकेश सिन्हा समेत दर्जनों पत्रकार ,लेखक और छात्र शामिल हुए . इस अवसर पर प्रो ० अमित शर्मा ने कहा कि हिंद स्वराज की प्रासंगिकता पर विचार करने से पूर्व गाँधी को जानना आवश्यक है . गाँधी ने जीवन के दो लक्ष्य बताये हैं, एक आत्मसाक्षात्कार और दूसरा ब्रह्मसाक्षात्कार . गाँधी शास्त्र के नहीं लोक के जानकार थे
वाह री बौद्धिकता ! जब से नक्सलियों / माओवादियों के सफाए के लिए वायु सेना की तैयारी से जुड़ी रपट और चिदंबरम का बयान मीडिया में उछाला गया है तभी से कुछ हिंदी चिट्ठों के स्वनामधन्य बौद्धिक लेखक इसे सत्ता का दमनकारी चरित्र और वर्तमान हालात को आपातकाल से भी बदतर बता रहे हैं . हिंदी के लेखकों को माओवादियों /नक्सलवादी/ उग्रवादी (तथाकथित क्रांतिकारी ) के मानवाधिकारों की रक्षा में खड़े होने का आह्वान किया जा रहा है
नक्सलवादी अपने आप को वनवासियों का मसीहा बताते हैं। उनका दावा है कि वे वनवासियों की भलाई के लिए कार्य करते हैं। लेकिन यह उनका वास्तविक रुप नहीं है। वास्तविकता कुछ और ही है। अब यह किसी से छिपा नहीं है। नक्सलवादियों के बर्बर और अमानवीय चेहरे को सभी ने देखा है। नक्सलवाद पर नजर रखने वाले लोग जानते हैं कि वे इसके माध्यम से अपना वर्चस्व बनाये रखना चाहते हैं। उनकी विचारधारा से असहमत लोगों की सबके सामने गला काट कर हत्या कर दी जाती हैं।
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क्या है भारत की पहचान
पहले राज किया अंग्रेजों ने
अब अंग्रेजी के है गुलाम
देश की आजादी की खातिर