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माओवाद की राजधानी ‘मनातू’ जहाँ सांसद भी जाने से डरते हैं |

माओवाद की राजधानी ‘मनातू’ जहाँ सांसद भी जाने से डरते हैं |

2 जयराम "विप्लव" / 2011/02/05 4:52 pm

जनोक्ति की टीम झारखण्ड में माओवाद की जमीन तलाशने के लिए राजधानी रांची से होते हुए पलामू ( डाल्टेनगंज ) पहुंची | पलामू की जमीन पर कदम रखने से पहले

बिनायक सेन,नक्सलवाद और पिछड़ेपन की वजह

बिनायक सेन,नक्सलवाद और पिछड़ेपन की वजह

2 जयराम "विप्लव" / 2011/01/23 2:07 am

भाकपा (माओवादी) हिंसा में विश्वास रखने वाले तथाकथित कम्युनिस्टों का एक संगठन है जिन्होंने बंगाल के नक्सलबाड़ी गांव से 1967 में सशस्त्र क्रांतिकारी गतिविधियों का रास्ता अपनाया | आज भारत

नक्सलियों के आय के प्रमुख स्रोत

नक्सलियों के आय के प्रमुख स्रोत

1 त्रिपुरारी कुमार / 2010/11/10 6:46 pm

निशा दास की रिपोर्ट रांची से झारखंड में नक्सल समस्या एक जटिल समस्या बनी हुई है। लंबे समय से इस जंजाल से निकलने का यहां के राजनेताओं के साथ -साथ नौकरशाहों

BSNL को दुत्कार, रिलायंस से प्यार !

BSNL को दुत्कार, रिलायंस से प्यार !

0 सुरेश चिपलूनकर / 2010/11/03 12:27 pm

हाल ही में कैम्ब्रिज विवि में एक व्याख्यान के दौरान प्रकाश करात ने माना कि “भारत के वामपंथी” देश में होने वाले आर्थिक बदलावों को समझने में असफ़ल रहे तथा

मार्क्सवादियों का दोहरा शीर्षासन

मार्क्सवादियों का दोहरा शीर्षासन

0 डॉ. वेदप्रताप वैदिक / 2010/10/01 3:32 pm

यदि कार्ल मार्क्स अपनी कब्र से उठकर कभी भारत आ पहुंचें तो वे हक्के-बक्के रह जाएंगे| वे अपने भारतीय चेलों को चीनी चेलों से भी आगे-आगे दौड़ता हुआ पाएंगें| बंगाल

बिहार चुनाव में नक्सली भी आजमाएंगे अपनी किस्मत

बिहार चुनाव में नक्सली भी आजमाएंगे अपनी किस्मत

0 जनोक्ति डेस्क / 2010/09/26 12:34 pm

बिहार विधानसभा चुनाव को शांति से संपन्न कराने के लिए एक ओर चुनाव आयोग और राज्य सरकार अपनी तैयारियों में जुटा है वहीं दूसरी ओर राज्य विरोधी नक्सली भी चुनाव

सरेआम किसी को नंगा करने की आज़ादी !

सरेआम किसी को नंगा करने की आज़ादी !

3 अनिकेत प्रियदर्शी / 2010/08/14 11:12 am

15 अगस्त का जश्न मनाने को पूरा देश तैयार हो रहा है, अपनी गुलामी से मुक्त हुए 63 साल पूरे कर लिए हमने । हम हिन्दुस्तान से आगे बढ्ते हुए

किसी देश में क्या ऐसी भी आजादी होती है!

किसी देश में क्या ऐसी भी आजादी होती है!

0 राजेश त्रिपाठी / 2010/08/12 11:54 am

हजारों लाखों बलिदानी शहीदों की कुरबानियों ने हमें परतंत्रता की बेड़ियों से मुक्त कर स्वच्छंद वातावरण में सांस लेने की आजादी दी। बरसों की गुलामी के बाद हमने आजादी पायी।

अब युद्ध छेड़ना होगा

अब युद्ध छेड़ना होगा

0 विजय कुमार / 2010/08/10 11:02 pm

” संघर्ष, मुठभेड़ और युद्ध “ सामान्य रूप से ये तीनों शब्द लगभग एक से लगते हैं; पर इनमें बड़ा अंतर है। ये अलग-अलग संदर्भ में प्रयोग होते हैं और इसीलिए

महंगाई डायन

महंगाई डायन

0 अजय केशरी / 2010/08/03 1:23 pm

लूट..लूट..लूट॥ जंहा देखो वही मची है लूट । आज महंगाई बे-लगाम हो गई है, बाज़ार में मंडी में जहाँ देखो महंगाई चरम सीमा पर पहुँच गई है। इस महंगाई से