अपने फर्ज से मुंह चुराते मनमोहन
1भारत देश में विकास की रफ्तार बढ़ाने में यूपीए सरकार के रथी अर्थात देश के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का विशेष योगदान रहा है। ऐसा बड़े अखबारों और टीवी चैनलों
15 अगस्त का जश्न मनाने को पूरा देश तैयार हो रहा है, अपनी गुलामी से मुक्त हुए 63 साल पूरे कर लिए हमने । हम हिन्दुस्तान से आगे बढ्ते हुए
हजारों लाखों बलिदानी शहीदों की कुरबानियों ने हमें परतंत्रता की बेड़ियों से मुक्त कर स्वच्छंद वातावरण में सांस लेने की आजादी दी। बरसों की गुलामी के बाद हमने आजादी पायी।
” संघर्ष, मुठभेड़ और युद्ध “ सामान्य रूप से ये तीनों शब्द लगभग एक से लगते हैं; पर इनमें बड़ा अंतर है। ये अलग-अलग संदर्भ में प्रयोग होते हैं और इसीलिए
भारत देश में विकास की रफ्तार बढ़ाने में यूपीए सरकार के रथी अर्थात देश के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का विशेष योगदान रहा है। ऐसा बड़े अखबारों और टीवी चैनलों
देश के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने जब 15 सितंबर,2009 को दिल्ली में पुलिस अधिकारियों के सम्मेलन में नक्सलवाद को देश का सबसे बड़ा खतरा बताया तो वे कुछ नयी बात नहीं कह रहे थे। इसके पहले भी देश के गृहमंत्री और कई नक्सल प्रभवित राज्यों के मुख्यमंत्री यह बात कहते आए हैं। बावजूद इसके हमारी सरकारें न जाने क्यों नक्सलवाद के खिलाफ एक समन्वित और परिणाम केंद्रित अभियान छेड़ने में असफल साबित हो रही हैं। नक्सली देश में हिंसक अभियान चला रहे हैं निरीह जनता को अपना निशाना बना रहे हैं पर देश का गरीब, आदिवासी तबका अपने नेताओं की राजनीतिक इच्छाशक्ति के इंतजार में खड़ा है।
नक्सल आतंकवाद ,माओवादी हिंसा की घटनाएँ जो कभी छिट-पुट रूप में दिखाई देती थी आज तकरीबन देश के बीस राज्यों में पैर पसारे दिख रही है .राजनीतिक गलियारों में भले हीं इसे किसी आतंकवाद के सदृश घोषित कर दिया हो पर आम जनता इस सत्य को जान चुकी है कि वास्तव में ऐसी घटनाएँ सरकारी तंत्र की विफलता ,अव्यवस्था , भ्रष्टाचार ,सरकारी धन के दुरूपयोग , नीतियों के सही क्रियान्वयन ना होने से उत्पन्न आक्रोश ,असंतोष की ही परिचायक है जिसे हम सब जज्ब किये बैठे हैं . उनके हिंसक प्रदर्शनों ,हमलों पर रोक -थाम के लिए आवश्यक है कि सरकार अपनी कथनी और करनी के अंतर की समीक्षा करे .नक्सल प्रभावित संवेदनशील इलाकों में अंतर्विरोधों को समाप्त करने की पहल करें . रोटी ,कपडा ,मकान ,रोजगार समंधी ठोस कदम उठाये ना कि बल पूर्वक नाक्साली आन्दोलन को कुचलते हुए उन्हें अधिक उग्र बनने पर विवश करे
यह भारत और भारतीयों का सौभाग्य था जो उनके जैसा सर्वगुण संपन्न महापुरुष मिला जिसने भारत की तस्वीर और इतिहास बदल दिया. उनके और उनके साथियों (जिसमे जवाहर लाल नेहरु,
सम्पूर्ण विश्व ने सदियों से भारत पर लगातार आक्रमण किए हैं किंतु मुख्यतः मुग़ल और ब्रिटिश लोगो को ही अधिक सफलता मिली है। मुग़ल और ब्रिटिश लोग भी इस
भारत की संसद को गाँधी ने 1909 ई० में हीं बाँझ और वेश्या बताया था .धीरे -धीरे वेश्यावृत्ति के पावन कर्म में अपनी राजनीति भी शामिल हो गयी जो अब
नक्सलवाद पर आज व्यापक बहस की जरुरत है . इसी विचार से विमर्श के इस स्तम्भ में पत्रकारिता के छात्र प्रणव का यह आलेख प्रस्तुत है :- नक्सलवाद और नक्सली
वाह री बौद्धिकता ! जब से नक्सलियों / माओवादियों के सफाए के लिए वायु सेना की तैयारी से जुड़ी रपट और चिदंबरम का बयान मीडिया में उछाला गया है तभी से कुछ हिंदी चिट्ठों के स्वनामधन्य बौद्धिक लेखक इसे सत्ता का दमनकारी चरित्र और वर्तमान हालात को आपातकाल से भी बदतर बता रहे हैं . हिंदी के लेखकों को माओवादियों /नक्सलवादी/ उग्रवादी (तथाकथित क्रांतिकारी ) के मानवाधिकारों की रक्षा में खड़े होने का आह्वान किया जा रहा है
नक्सलवादी अपने आप को वनवासियों का मसीहा बताते हैं। उनका दावा है कि वे वनवासियों की भलाई के लिए कार्य करते हैं। लेकिन यह उनका वास्तविक रुप नहीं है। वास्तविकता कुछ और ही है। अब यह किसी से छिपा नहीं है। नक्सलवादियों के बर्बर और अमानवीय चेहरे को सभी ने देखा है। नक्सलवाद पर नजर रखने वाले लोग जानते हैं कि वे इसके माध्यम से अपना वर्चस्व बनाये रखना चाहते हैं। उनकी विचारधारा से असहमत लोगों की सबके सामने गला काट कर हत्या कर दी जाती हैं।
हिंदू हिन्दी हिंदुस्तान
क्या है भारत की पहचान
पहले राज किया अंग्रेजों ने
अब अंग्रेजी के है गुलाम
देश की आजादी की खातिर