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लोकमुद्दों के बिल में आरक्षण की राजनीति

लोकमुद्दों के बिल में आरक्षण की राजनीति

1 डॉ. शशि तिवारी / 2012/01/05 9:29 pm

42 वर्षीय प्रौढ़ लोकपाल अब सख्त लोकपाल बनने के मूड में अंततः आ ही गया है। इस उम्र में कुछ अड़ियलपन भीआ जाता है जो सभी देख भी रहे है

लोकपाल या तंत्रपाल

लोकपाल या तंत्रपाल

1 जनोक्ति डेस्क / 2011/12/24 7:22 pm

सिद्धार्थ शर्मा करीब पांच दशकों में नौवीं बार लोकपाल विधेयक संसद में पेश है | १९६८ से अबतक लोकपाल की अतीव आवश्यकता के बावजूद संसद में इसका aपारित नहीं होना

भ्रष्टाचार : भारतीय समाज की नियति या नियम ?

भ्रष्टाचार : भारतीय समाज की नियति या नियम ?

0 सैयद असदर अली / 2011/12/01 2:11 pm

यह आप बीती है ऐसे इंसान की जो अपना गाँव सब छोड़ कर देश की राजधानी दिल्ली आया था, अपना एवं अपने परिवार का भविष्य सुधारने को, परन्तु हर मोड़

नेताओं एवं नौकरशाहों के लिए चेतावनी हैं थप्पड़

नेताओं एवं नौकरशाहों के लिए चेतावनी हैं थप्पड़

1 अवधेश कुमार / 2011/11/29 9:29 pm

एक गुस्साए युवक द्वारा केन्द्रीय कृषि मंत्री शरद पवार को थप्पड़ मारने की घटना पर पूरे देश में अफसोस प्रकट किया गया है। आम प्रतिक्रिया यही है कि ऐसी हिंसा से

कहीं ये थप्पड़ किसी क्रांति का आगाज़ तो नहीं ?

कहीं ये थप्पड़ किसी क्रांति का आगाज़ तो नहीं ?

2 राजीव गुप्ता / 2011/11/25 11:01 am

जब खाने-पीने की चीजों के दामों में आग लग जाय और रसोई के चूल्हे की आग गैस सिलेंडर महंगा होने से बुझ जाय , सरकार के मंत्री के घोटालो के चलते पूरी सरकार भ्रष्टाचार

भाजपा है भ्रष्टाचार मिटाने को प्रतिबद्ध

भाजपा है भ्रष्टाचार मिटाने को प्रतिबद्ध

0 सुमित श्रीवास्तव / 2011/11/04 2:26 am

हाल के कुछ महीनो में जिस प्रकार से भ्रष्टाचार के खिलाफ बड़े बड़े आन्दोलन हुए है चाहे वो आन्दोलन बाबा रामदेव का हो या अन्ना हजारे का हो सबमे सरकार

चरित्र-हनन न जोकपाल जनता मांगे लोकपाल

चरित्र-हनन न जोकपाल जनता मांगे लोकपाल

0 ब्रज किशोर सिंह / 2011/10/22 8:49 pm

मित्रों,जब हम बचपने में थे तब हमारे घर के बड़े-बुजुर्ग हमें अक्सर गाँव के तालाब में नहाने से रोका करते थे.चूंकि मारने-डांटने का प्रभाव बच्चों के मन-मस्तिष्क पर बहुत ही

व्यक्तिगत राय व्यक्ति तक ही सीमित होनी चाहिए

व्यक्तिगत राय व्यक्ति तक ही सीमित होनी चाहिए

1 राजीव गुप्ता / 2011/10/15 7:15 am

अरे  प्रशांत भूषण की पिटाई वाला समाचार आपने सुना ? बड़ी उत्सुकता से एक अधेड़ उम्र के व्यक्ति ने अपने एक अधेड़ उम्र के साथी से दिल्ली  की लाइफ लाइन कही जाने वाली

गरीबी और मजाक

गरीबी और मजाक

0 राजीव गुप्ता / 2011/10/11 10:07 am

आज़ादी के इतने वर्षो बाद भी गरीबी और मजाक एक दूसरे का पर्याय बने हुए है अगर ऐसा मान लिया जाय तो कोई अतिशयोक्ति नही होगी ! कम से कम

मूक समाज में जान की कीमत सिर्फ 27 रूपए  !

मूक समाज में जान की कीमत सिर्फ 27 रूपए !

0 पूजा शुक्ला / 2011/09/26 11:40 am

जान की कीमत लगा दी गई है, मात्र 27 रुपये, इससे सस्ती कीमत पर आपको जान इस महंगाई के युग में कही नहीं मिलेगी. यहाँ इस जूनून के बाज़ार में जान