Post Tagged with: "भारत"

क्या महात्मा गाँधी अप्रासंगिक हो गए हैं ?

क्या महात्मा गाँधी अप्रासंगिक हो गए हैं ?

1 जनोक्ति डेस्क / 2010/11/01 9:28 pm

इक्कीसवीं सदी में जिस प्रकार की हिंसा का हमारी दुनिया को सामना करना पड़ रहा है वह एक बिलकुल अलग प्रकार की हिंसा हैं । ९/११ के बाद से दुनिया

सालों बाद भारत संयुक्त राष्ट्र में

सालों बाद भारत संयुक्त राष्ट्र में

0 रमेश भट्ट / 2010/10/19 5:19 am

19 साल के अन्तराल के बाद भारत संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का अस्थाई सदस्य बनने में कामयाब रहा। 192 देशों में 187 देशों ने भारत की दावेदारी का समर्थन किया।

नक्सलियों की कायरता ने लुकस टेटॆ की बलि ली

नक्सलियों की कायरता ने लुकस टेटॆ की बलि ली

0 अनिकेत प्रियदर्शी / 2010/09/05 12:41 pm

लुकस टेटॆ अब हमारे बीच नही हैं, लेकिन लुकस टेटॆ अब हर उस भारतीय के दिल मे है जिसने भारत को प्यार किया है । नक्सलियों की कायरता एवं बर्बरतापूर्ण

जनगणना या जातिगणना  !

जनगणना या जातिगणना !

0 अमित कुमार मीत / 2010/07/16 10:00 am

जात ही पुछो साधु की,मत पुछिए ज्ञान, मोल करो मयान का,ऊपर से होती पहचान | भारतीय सामाजिक व्यवस्था में दोहों का मतलब बदलने में समय नही लगता. झुठ,फरेब और ऊपरी

असंठित श्रमिकों की वर्तमान स्थिति

असंठित श्रमिकों की वर्तमान स्थिति

0 जनोक्ति डेस्क / 2010/06/16 6:10 pm

साभार : आईएलओ प्रकाशित पुस्तक “मुक्ति की रह” अनौपचारिक अर्थव्यवस्था मोटे तौर पर इस प्रकार परिभाषित की जा सकती है- ऐसी अर्थव्यवस्था जिसमें अनिगमित उद्यम, अनियत या दिहाड़ी मजदूर है। भारत सहित

शेखावत का आदर्श राजनैतिक जीवन

शेखावत का आदर्श राजनैतिक जीवन

1 जयराम "विप्लव" / 2010/05/15 5:17 pm

भारत के पूर्व उप राष्ट्रपति भैरों सिंह शेखावत का शनिवार की सुबह ११ बजकर १० मिनट पर निधन हो गया . गौरतलब है कि सांस लेने में तकलीफ़ की वजह

हिन्दुस्तानी को हिन्दुस्तानी रहने दो

हिन्दुस्तानी को हिन्दुस्तानी रहने दो

0 डॉ. वेदप्रताप वैदिक / 2010/05/13 3:15 pm

अगर हम दलितों, आदिवासियों और पिछड़ों को आरक्षण देते रहना चाहते हैं तो जन-गणना में जाति का हिसाब तो रखना ही होगा| उसके बिना सही आरक्षण की व्यवस्था कैसे बनेगी

भारत की कुपोषित नींव

भारत की कुपोषित नींव

0 रमेश भट्ट / 2010/05/10 10:00 am

भूमंडलीकृत भारत के विकास की चकाचौंध में कई मूलभूत समस्याएं मंत्रालय की रद्दी टोकरियों में, और नेताओं के झूठे वादों में दबकर रह जाती हैं। गरीबी, बेकारी, बदतर स्वास्थ्य सेवाएं

विकास का स्याह सच

विकास का स्याह सच

2 जयराम "विप्लव" / 2010/05/07 10:05 am

भारत में 90 के दशक में आर्थिक सुधारों का सिलसिला शुरू हुआ था . दो दशकों में इसने ऐसी रफ़्तार पकड़ी कि देश का स्वरुप बदलता गया . कब सपेरों

गाँधी का उन्मुक्त या नाटकीय सेक्स जीवन

गाँधी का उन्मुक्त या नाटकीय सेक्स जीवन

52 डा ० पुरुषोत्तम मीणा / 2010/05/06 4:19 pm

भारत पर जबरन थोपे गये राष्ट्रपिता मोहनदास कर्मचन्द गाँधी के जीवन पर इंगलैण्ड के सुप्रसिद्ध इतिहासकार जेड ऐडम्स ने अपने पंद्रह वर्ष के लम्बे अध्ययन और गहन शोधों के आधार