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	<title>JANOKTI : जनोक्ति :  राज-समाज और जन की आवाज &#187; भारत की द्स-दिशा</title>
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		<title>बंद कमरे में कलम घिसने वाले पत्रकार नहीं थे प्रभाष जोशी</title>
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		<pubDate>Sun, 08 Nov 2009 14:11:56 +0000</pubDate>
		<dc:creator>जयराम "विप्लव"</dc:creator>
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		<description><![CDATA[प्रभाष जोशी से मेरी जान-पहचान पुरानी ना सही पर तीन बरसों में कार्यक्रमों के दौरान हुई कुछ एक मुलाकातों का असर गहरा जरुर है .दिल्ली जैसे महानगर में प्रभाष जी का ठेठपन मेरे जैसे कितने गंवई इंसानों को उनके करीब ]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><a href="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2009/11/PJoshi.JPG"><img alt="Prabhash Joshi/" class="aligncenter size-medium wp-image-1092" height="272" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2009/11/PJoshi-300x272.jpg" title="Prabhash Joshi/" width="300" /></a> </p>
<p style="text-align: justify;">प्रभाष जोशी से मेरी जान-पहचान पुरानी ना सही पर तीन बरसों में कार्यक्रमों के दौरान हुई कुछ एक मुलाकातों का असर गहरा जरुर है .दिल्ली जैसे महानगर में प्रभाष जी का ठेठपन मेरे जैसे कितने गंवई इंसानों को उनके करीब चुम्बक की भांति खींच लाता था .जनसत्ता हो या तहलका उनके आलेखों को पढ़कर और यदा-कदा टेलीविजन के कार्यक्रमों में उनको सुनकर खुद को उनसे जुडा हुआपाता था .&quot;प्रभाष जोशी &quot; यह नाम पहली बार दिल्ली विश्वविद्यालय में प्रवेश हेतु साक्षात्कार के दौरान सुधीश पचौरी के मुख से सुना था .उन्हीं दिनों हिन्दी विभाग जामिया में दाखिला लिया तो जनसत्ता पढने की लत लगी और यहीं से शुरू हुआ प्रभाष जोशी और हमारा संबंध जो तक़रीबन एकतरफा होते हुए भी सीमाओं से परे था .एक पाठक की हैसियत से&nbsp; देशकाल को लेकर जो समसामयिक सवाल&nbsp; मन में कौंधते, उनका उत्तर &#39;कागद कारे&#39; में उनको पढ़कर मिल जाया करता . इस अनोखे संवाद ने धीरे-धीरे जोशी जी को मेरे हर रविवार का साथी बना दिया था .जहाँ दिन भर जनसत्ता हाथ में लेकर उनके आलेख में मीनमेख ढूँढना मेरा काम था .ऐसा इसलिए की मुझे उनसे जलन होती थी आखिर हर कोई उनका नाम क्यूँ लेता है .मन हीं मन उनसे लम्बी बहस होती और उसी बहस से अपने विचारों की धार भी बनाता . लगभग ढाई बरस तक कागद कारे पढ़ते हुए उनकी साफगोई और वादनिरपेक्षता ने मुझे भी उनका प्रशंसक -समर्थक बना दिया था .हालाँकि आप मुझे उनका अंधभक्त नहीं कह सकते क्योंकि मेरा मानना है &#8211; &#39;किसी विचारधारा या व्यक्ति के विचारों को अनुसरित करने और खुद को उसमें बाँध लेने से स्वयं का विकास&nbsp; और नए विचारों का मार्ग स्वतः अवरुद्ध हो जाता है .&#39;&nbsp;</p>
<p style="text-align: justify;">प्रभाष जोशी को कुछ लोग गांधीवादी तो कोई समाजवादी और कुछ लोग तो ब्राह्मणवादी ,रुढिवादी पत्रकार बताते हैं . परन्तु मैं उन्हें सिर्फ और सिर्फ एक पत्रकार जानता और मानता हूँ . एक पत्रकार को पत्रकार हीं रहने दिया जाए तो बहुत है ! प्रभाष जी सच लिखते थे और उनके सच को पढ़कर ,सुनकर उन्हें कभी वामपंथी,कभी समाजवादी ,कभी रुढिवादी ,कभी ब्राह्मणवादी तो कभी संघी भी मान लिया जाता रहा है . अभी दो महीने भी नहीं बीते जब रविवार में छपे उनके एक साक्षात्कार को लेकर उन्हें ब्राह्मणवादी और संघी कहा गया { ब्राह्मणवादी या संघी होना गलत है या सही अथवा अपमानजनक यह अलग सवाल है } .हिन्दी चिट्ठाकारी के एक गुट ने उनके खिलाफ बेसिर -पैर का अभियान चलाने की कोशिश की थी .जोशी जी के नाम पत्रकारिता की दूकान चलाने वाले शायद भूल गये कि प्रभाष जोशी को किसी भी वाद से नहीं जोड़ा जा सकता है .क्योंकि प्रभाष जी की नज़रों में नंदीग्राम और गुजरात में बहाया गया खून एक था .उनके लिए सत्ता मद में चूर इंदिरा गाँधी और बुद्धदेव भट्टाचार्य में कोई भेदभाव नहीं था . उनके शब्द बाण किसी की व्यक्तिगत आलोचना में नहीं बल्कि शोषण और अन्य के खिलाफ शोषितों के हक में चला करते थे . क्या ऐसे किसी पत्रकार को किसी भी वाद से जोड़ना उचित है ? पत्रकार शब्द और उसके मायने स्वयं में परिपूर्ण हैं इसलिए यह सोचने की जरुरत&nbsp; है कि किसी पत्रकार बोला जाए और किसे नहीं ? जोशी जी अनुकरणीय क्यों है और उन्हें पत्रकार क्यों माना जाए ? इन दो सवालों के जबाव उनके जीवनकर्म में समाहित हैं . प्रभाष जी बंद कमरे में कलम घिसने वाले पत्रकार नहीं होकर एक एक्टिविस्ट / कार्यकर्त्ता थे ,जो गाँव ,शहर ,जंगल की खाक छानते हुए सामाजिक विषमताओं का अध्ययन कर ना केवल समाज को खबर देते थे अपितु उसे दूर करने का हर संभव प्रयास भी उनकी बेमिसाल पत्रकारिता का हीं एक हिस्सा&nbsp; था .</p>
<p style="text-align: justify;">आज प्रभाष जी इस दुनिया को त्याग कर अनंत यात्रा पर जा चुके हैं . उनके निधन पर शोक प्रकट करने वाले लोगों&nbsp; व अखबारों और ब्लॉग पर स्मृति लेख के जरिये संवेदना जताने वालों ने उनके आगे आखिरी शब्द लगा कर इस बात को उभारने की भरसक कोशिश की है कि अब कोई प्रभाष जोशी जैसा नहीं बनना चाहता है .अब कोई उनकी समृद्ध पत्रकारीय विरासत का&nbsp; दामन थामने को तैयार नहीं है .लेकिन क्या सच इतना अंधकारमय है ? नहीं, ऐसा नहीं हो सकता ! कई नौजवान पत्रकार और पत्रकारिता के सैकड़ों छात्र उनकी इस विरासत से जुड़ने का ख्वाब पाल रहे हैं . ये वही लोग हैं जिनके बीच प्रभाष जी किसी न किसी कार्यक्रम में अक्सर आते और आगे बढ़ने की प्रेरणा देते रहे हैं .&nbsp;</p>
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		<title>खबरिया चैनलों की होड़ और गलाकाट स्पर्धा</title>
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		<pubDate>Tue, 03 Nov 2009 11:08:25 +0000</pubDate>
		<dc:creator>संजय द्विवेदी</dc:creator>
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		<description><![CDATA[खबरिया चैनलों की होड़ और गलाकाट स्पर्धा ने खबरों के मायने बदल दिए हैं। खबरें अब सिर्फ सूचनाएं नहीं देती, वे एक्सक्लूसिव में बदल रही हैं। हर खबर अब ब्रेकिंग न्यूज में बदल जाना सिर्फ खबर की कलरिंग भर का मामला नहीं है। दरअसल, यह उसके चरित्र और प्रस्तुति का भी बदलाव है । खबरें अब निर्दोष नहीं रहीं। वे अब सायास हैं, कुछ सतरंगी भी।]]></description>
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<p><![endif]--><a href="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2009/11/television2.nodedisplay2.jpg"><img alt="television2.nodedisplay" class="aligncenter size-full wp-image-1058" height="130" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2009/11/television2.nodedisplay2.jpg" title="television2.nodedisplay" width="107" /></a><span lang="HI" style="font-size: 10.5pt; font-family: Mangal; color: navy;">ख</span><span lang="HI" style="font-size: 10.5pt; font-family: Mangal; color: navy;">बरि</span><span lang="HI" style="font-size: 10.5pt; font-family: Mangal; color: navy;">या चैनलों की होड़</span><span style="font-size: 10.5pt; color: navy;">&nbsp;</span><span lang="HI" style="font-size: 10.5pt; font-family: Mangal; color: navy;">और गलाकाट स्पर्धा ने खबरों के मायने बदल दिए हैं। खबरें अब सिर्फ </span><span lang="HI" style="font-size: 10.5pt; font-family: Mangal; color: navy;">सूचनाएं नहीं</span><span lang="HI" style="font-size: 10.5pt; font-family: Mangal; color: navy;"> देती</span><span style="font-size: 10.5pt; color: navy;">,</span><span lang="HI" style="font-size: 10.5pt; font-family: Mangal; color: navy;"> वे एक्सक्लूसिव में बदल रही हैं। हर खबर अब ब्रेकिंग न्यूज में बदल जाना </span><span lang="HI" style="font-size: 10.5pt; font-family: Mangal; color: navy;">सिर्फ खबर की कलरिंग भर का मामला नहीं है। दरअसल</span><span style="font-size: 10.5pt; color: navy;">, </span><span lang="HI" style="font-size: 10.5pt; font-family: Mangal; color: navy;">यह उसके चरित्र और प्रस्तुति का भी बदलाव है</span><span lang="HI" style="font-size: 10.5pt; font-family: Mangal; color: navy;"> । खबरें अब निर्दोष नहीं रहीं। वे अब सायास हैं</span><span style="font-size: 10.5pt; color: navy;">, </span><span lang="HI" style="font-size: 10.5pt; font-family: Mangal; color: navy;">कुछ सतरंगी भी।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="margin: 0in 22.5pt 0.0001pt; text-align: justify;"><span lang="HI" style="font-size: 10.5pt; font-family: Mangal; color: navy;">खबरों का खबर होना सूचना का उत्कर्ष है</span><span style="font-size: 10.5pt; color: navy;">, </span><span lang="HI" style="font-size: 10.5pt; font-family: Mangal; color: navy;">लेकिन जब होड़ इस कदर हो तो खबरें सहम जाती हैं</span><span style="font-size: 10.5pt; color: navy;">,</span><span lang="HI" style="font-size: 10.5pt; font-family: Mangal; color: navy;"> सकुचा जाती हैं और खड़ी हो जाती हैं किनारे । खबर का प्रस्तोता स्क्रीन पर आता है और वह बताता है कि यह खबर आप किस नज़र से देखेंगे। पहले खबरें दर्शक को मौका देती थीं कि वह समाचार के बारे में अपना नज़रिया बनाए। अब नज़रिया बनाने के लिए खबर खुद बाध्य करती है। आपको किस ख़बर को किस नज़रिए से देखना है</span><span style="font-size: 10.5pt; color: navy;">, </span><span lang="HI" style="font-size: 10.5pt; font-family: Mangal; color: navy;">यह बताने के लिए छोटे पर्दें पर तमाम सुंदर चेहरे हैं जो आपको अपनी खबर के साथ बहा ले जाते हैं। ख़बर क्राइम की है तो कुछ खतरनाक शक्ल के लोग</span><span style="font-size: 10.5pt; color: navy;">, </span><span lang="HI" style="font-size: 10.5pt; font-family: Mangal; color: navy;">खबर सिनेमा की है तो कुछ सुदर्शन चेहरे</span><span style="font-size: 10.5pt; color: navy;">,</span><span lang="HI" style="font-size: 10.5pt; font-family: Mangal; color: navy;"> ख़बर गंभीर है तो कुछ गंभीरता का</span><span style="font-size: 10.5pt; color: navy;">&nbsp;</span><span lang="HI" style="font-size: 10.5pt; font-family: Mangal; color: navy;">लबादा ओढ़े चेहरे </span><span style="font-size: 10.5pt; color: navy;">!</span><span lang="HI" style="font-size: 10.5pt; font-family: Mangal; color: navy;"> कुल मिलाकर मामला अब सिर्फ ख़बर तक नहीं है। ख़बर तो कहीं दूर बहुत दूर</span><span style="font-size: 10.5pt; color: navy;">, </span><span lang="HI" style="font-size: 10.5pt; font-family: Mangal; color: navy;">खडी है&#8230;ठिठकी हुई सी। उसका प्रस्तोता बताता है</span><span style="font-size: 10.5pt; color: navy;">&nbsp;</span><span lang="HI" style="font-size: 10.5pt; font-family: Mangal; color: navy;">कि आप ख़बर को इस नज़र देखिए। वह यह भी बताता है कि इस ख़बर का असर क्या है</span><span style="font-size: 10.5pt; color: navy;">&nbsp;</span><span lang="HI" style="font-size: 10.5pt; font-family: Mangal; color: navy;">और इस खबर को देख कर आप किस तरह और क्यों धन्य हो रहे हैं </span><span style="font-size: 10.5pt; color: navy;">!</span><span lang="HI" style="font-size: 10.5pt; font-family: Mangal; color: navy;"> वह यह भी जोड़ता है कि यह ख़बर आप पहली बार किसी चैनल पर देख रहे हैं। </span></p>
<p class="MsoNormal" style="margin: 0in 22.5pt 0.0001pt; text-align: justify;"><b><span style="font-size: 10.5pt; color: navy;">&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;</span></b><b><span lang="HI" style="font-size: 10.5pt; font-family: Mangal; color: navy;"> </span></b><span lang="HI" style="font-size: 10.5pt; font-family: Mangal; color: navy;">दर्शक को कमतर और ख़बर को बेहतर बताने की यह होड़ अब एक ऐसी स्पर्धा में तब्दील हो गई है जहाँ ख़बर अपने असली व्यक्तित्व को खो देती है</span><span style="font-size: 10.5pt; color: navy;">&nbsp;</span><span lang="HI" style="font-size: 10.5pt; font-family: Mangal; color: navy;">और वह बदल जाती है नारे में</span><span style="font-size: 10.5pt; color: navy;">, </span><span lang="HI" style="font-size: 10.5pt; font-family: Mangal; color: navy;">चीख में</span><span style="font-size: 10.5pt; color: navy;">, </span><span lang="HI" style="font-size: 10.5pt; font-family: Mangal; color: navy;">हल्लाबोल में या एक ऐसे मायावी संसार में जहाँ से कोई मतलब निकाल पाना ज्ञानियों के ही बस की बात है। </span></p>
<p class="MsoNormal" style="margin: 0in 22.5pt 0.0001pt; text-align: justify;"><b><span style="font-size: 10.5pt; color: navy;">&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;</span></b><b><span lang="HI" style="font-size: 10.5pt; font-family: Mangal; color: navy;"> </span></b><span lang="HI" style="font-size: 10.5pt; font-family: Mangal; color: navy;">हर ख़बर कैसे ब्रेकिंग या एक्सक्लूसिव हो सकती है</span><span style="font-size: 10.5pt; color: navy;">, </span><span lang="HI" style="font-size: 10.5pt; font-family: Mangal; color: navy;">यह सोचना ही रोचक है। टीवी ने खबर के शिल्प को ही नहीं बदला है। वह बहुत कुछ फिल्मों के करीब जा रही है</span><span style="font-size: 10.5pt; color: navy;">, </span><span lang="HI" style="font-size: 10.5pt; font-family: Mangal; color: navy;">जिसमें नायक हैं</span><span style="font-size: 10.5pt; color: navy;">, </span><span lang="HI" style="font-size: 10.5pt; font-family: Mangal; color: navy;">नायिकाएं हैं और खलनायक भी। साथ मे है कोई जादुई निदेशक । ख़बर का यह शिल्प दरअसल खबरिया चैनलों की विवशता भी है। चौबीस घंटे के हाहाकार को किसी मौलिक और गंभीर प्रस्तुति में बदलने के अपने खतरे हैं</span><span style="font-size: 10.5pt; color: navy;">, </span><span lang="HI" style="font-size: 10.5pt; font-family: Mangal; color: navy;">जो कुछ चैनल उठा भी रहे हैं। पर अपराध</span><span style="font-size: 10.5pt; color: navy;">, </span><span lang="HI" style="font-size: 10.5pt; font-family: Mangal; color: navy;">सेक्स</span><span style="font-size: 10.5pt; color: navy;">, </span><span lang="HI" style="font-size: 10.5pt; font-family: Mangal; color: navy;">मनोरंजन से जुड़ी खबरें मीडिया की आजमायी हुई सफलता का फंडा है। हमारी नैसिर्गिकी विकृतियों का प्रतिनिधित्व करने वाली खबरें खबरिया चैनलों पर अगर ज्यादा जगह पाती हैं तो यह पूरा का पूरा मामला कहीं न कहीं<b> टीआरपी </b>से ही जाकर जुड़ता है। इतने प्रभावकारी माध्यम और उसके नीति नियामकों की यह मजबूरी और आत्मविश्वासहीनता समझी जा सकती है। बाजार में टिके रहने के अपने मूल्य हैं। ये समझौतों के रूप में मीडिया के समर्पण का शिलालेख बनाते हैं। शायद इसीलिए जनता का एजेंडा उस तरह चैनलों पर नहीं दिखता</span><span style="font-size: 10.5pt; color: navy;">, </span><span lang="HI" style="font-size: 10.5pt; font-family: Mangal; color: navy;">जिस परिमाण में इसे दिखना चाहिए । समस्याओं से जूझता समाज</span><span style="font-size: 10.5pt; color: navy;">, </span><span lang="HI" style="font-size: 10.5pt; font-family: Mangal; color: navy;">जनांदोलनों से जुड़ी गतिविधियाँ</span><span style="font-size: 10.5pt; color: navy;">, </span><span lang="HI" style="font-size: 10.5pt; font-family: Mangal; color: navy;">आम आदमी के जीवन संघर्ष</span><span style="font-size: 10.5pt; color: navy;">,</span><span lang="HI" style="font-size: 10.5pt; font-family: Mangal; color: navy;"> उसकी विद्रूपताएं हमारे मीडिया पर उस तरह प्रस्तुत नहीं की जाती कि उनसे बदलाव की किसी सोच को बल मिले। पर्दें पर दिखती हैं रंगीनियाँ</span><span style="font-size: 10.5pt; color: navy;">, </span><span lang="HI" style="font-size: 10.5pt; font-family: Mangal; color: navy;">अपराध का अतिरंजित रूप</span><span style="font-size: 10.5pt; color: navy;">,</span><span lang="HI" style="font-size: 10.5pt; font-family: Mangal; color: navy;"> राजनीति का विमर्श और सिनेमा का हाहाकारी प्रभाव । क्या खबरें इतनी ही हैं</span><span style="font-size: 10.5pt; color: navy;"> ?</span><span lang="HI" style="font-size: 10.5pt; font-family: Mangal; color: navy;"> </span></p>
<p class="MsoNormal" style="margin: 0in 22.5pt 0.0001pt; text-align: justify;"><span style="font-size: 10.5pt; color: navy;">&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp; </span><span lang="HI" style="font-size: 10.5pt; font-family: Mangal; color: navy;">बॉडी और प्लेजर की पत्रकारिता हमारे सिर चढ़कर नाच रही है। शायद इसीलिए मीडिया से जीवन का विमर्श</span><span style="font-size: 10.5pt; color: navy;">, </span><span lang="HI" style="font-size: 10.5pt; font-family: Mangal; color: navy;">उसकी चिंताएं और बेहतर समाज बनाने की तड़प की जगह सिकुड़ती जा रही है। कुछ अच्छी खबरें जब चैनलों पर साया होती हैं तो उन्हें देखते रहना एक अलग तरह का आनंद देता है। एनडीटीवी ने </span><span style="font-size: 10.5pt; color: navy;">&lsquo;</span><span lang="HI" style="font-size: 10.5pt; font-family: Mangal; color: navy;">मेघा रे मेघा</span><span style="font-size: 10.5pt; color: navy;">&rsquo;</span><span lang="HI" style="font-size: 10.5pt; font-family: Mangal; color: navy;"> नाम से बारिश को लेकर अनेक क्षेत्रों से अपने नामवर रिपोर्टरों से जो खबरें करवाईं वे अद्भूत हैं। उनमें भाषा</span><span style="font-size: 10.5pt; color: navy;">, </span><span lang="HI" style="font-size: 10.5pt; font-family: Mangal; color: navy;">स्थान</span><span style="font-size: 10.5pt; color: navy;">, </span><span lang="HI" style="font-size: 10.5pt; font-family: Mangal; color: navy;">माटी की महक</span><span style="font-size: 10.5pt; color: navy;">,</span><span lang="HI" style="font-size: 10.5pt; font-family: Mangal; color: navy;"> फोटोग्राफर</span><span style="font-size: 10.5pt; color: navy;">, </span><span lang="HI" style="font-size: 10.5pt; font-family: Mangal; color: navy;">रिपोर्टर और संपादक का अपना सौंदर्यबोध भी झलकता है। प्रकृति के इन दृश्यों को इस तरह से कैद करना और उन्हें बारिश के साथ जोड़ना तथा इन खबरों का टीवी पर चलना एक ऐसा अनुभव है जो हमें हमारी धरती के सरोकारों से जोड़ता है। इस खबर के साथ न ब्रेकिंग का दावा था न एक्सक्लूसिव का लेकिन ख़बर देखी गई और महसूस भी की गई।</span>&nbsp;<span lang="HI" style="font-size: 10.5pt; font-family: Mangal; color: navy;">कोकीन लेती युवापीढ़ी</span><span style="font-size: 10.5pt; color: navy;">, </span><span lang="HI" style="font-size: 10.5pt; font-family: Mangal; color: navy;">राखी और मीका का चुंबन प्रसंग</span><span style="font-size: 10.5pt; color: navy;">, </span><span lang="HI" style="font-size: 10.5pt; font-family: Mangal; color: navy;">करीना या शाहीद कपूर की प्रेम कहानियों से आगे जिंदगी के ऐसे बहुत से क्षेत्र हैं</span><span style="font-size: 10.5pt; color: navy;">&nbsp;</span><span lang="HI" style="font-size: 10.5pt; font-family: Mangal; color: navy;">जो इंतजार कर रहे हैं कि उनसे पास भी कोई रिपोर्टर आएगा और जहान को उनकी भी कहानी सुनाएगा । अभिषेक बच्चन की शादी को लेकर काफी चिंतित रहा मीडिया शायद उन इलाकों और लोगों पर भी नज़र डालेगा जो सालों-साल से मतपेटियों मे वोट डालते आ रहे हैं</span><span style="font-size: 10.5pt; color: navy;">, </span><span lang="HI" style="font-size: 10.5pt; font-family: Mangal; color: navy;">इस इंतजार में कि इन पतपेटियों से कोई देवदूत निकलेगा जो उनके सारे कष्ट हर लेगा </span><span style="font-size: 10.5pt; color: navy;">!</span><span lang="HI" style="font-size: 10.5pt; font-family: Mangal; color: navy;"> लेकिन उनके भ्रम अब टूट चुके हैं। पथराई आँखों से वे किसी ख़बरनवीस की आँखें तकती है कि कोई आए और उनके दर्द को लिखे या आवाज़ दे। कहानियों में कहानियों की तलाश करते बहुत से पत्रकार और रिपोर्टर उन तक पहुँचने की कोशिश भी करते रहे हैं। यह धारा लुप्त तो नहीं हुई है लेकिन मंद जरूर पड़ रही है। बाजार की मार</span><span style="font-size: 10.5pt; color: navy;">, </span><span lang="HI" style="font-size: 10.5pt; font-family: Mangal; color: navy;">माँग और प्रहार इतने गहरे हैं कि हमारे सामने दिखती हुई ख़बरों ने हमसे मुँह मोड़ लिया है। हम तलाश में हैं ऐसी स्टोरी की जो हमें रातों-रात नायक बना दे</span><span style="font-size: 10.5pt; color: navy;">, </span><span lang="HI" style="font-size: 10.5pt; font-family: Mangal; color: navy;">मीडिया में हमारी टीआरपी सबसे ऊपर हो</span><span style="font-size: 10.5pt; color: navy;">, </span><span lang="HI" style="font-size: 10.5pt; font-family: Mangal; color: navy;">हर जगह हमारे अखबार/चैनल की ही चर्चा हो। इस बदले हुए बुनियादी उसूल ने खबरों को देखने का हमारा नज़रिया बदल-सा दिया है। हम खबरें क्रिएट करने की होड़ में हैं क्योंकि क्रिएट की गई ख़बर एक्सक्लूसिव तो होंगी ही</span><span style="font-size: 10.5pt; color: navy;">&nbsp; </span><span lang="HI" style="font-size: 10.5pt; font-family: Mangal; color: navy;">।</span><span style="font-size: 10.5pt; color: navy;">&nbsp;</span><span lang="HI" style="font-size: 10.5pt; font-family: Mangal; color: navy;"> एक्सक्लूसिव की यह तलाश कहाँ जाकर रूकेगी</span><span style="font-size: 10.5pt; color: navy;">, </span><span lang="HI" style="font-size: 10.5pt; font-family: Mangal; color: navy;">कहा नहीं जा सकता। बावजूद इसके हम पत्रकारिता के बुनियादी उसूलों पर कायम रहते हुए एक संतुलन बना पाएं तो यह बात हमारी विश्वसनीयता और प्रामाणिकता को बनाए रखने</span><span style="font-size: 10.5pt; color: navy;">&nbsp;</span><span lang="HI" style="font-size: 10.5pt; font-family: Mangal; color: navy;">में सहायक होगी।</span><span style="font-size: 10.5pt; color: navy;"><o:p></o:p></span></p>
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		<title>वर्तमान पत्र-अकारिता और माखनलाल चतुर्वेदी -3</title>
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		<pubDate>Sun, 01 Nov 2009 03:33:58 +0000</pubDate>
		<dc:creator>जनोक्ति डेस्क</dc:creator>
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		<description><![CDATA[देश के अन्य पत्रों में जिनकी सेवाएं मूल्यवान ही रही हैं वे हैं अलमोड़ा की शक्ति और उसकी लगातार अपने क्षेत्र की राष्ट्रीय सेवाएं&#160; बिहार के &#8216;देश&#8217;और &#8216;महावीर&#8217;आगरे का &#8216;आर्य मित्र&#8217; आदि । &#8216;प्रताप&#8217; के साथ&#160; जिन पत्रों का उल्लेख ]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;">
	<a href="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2009/10/OnteachingJournalism12.jpg"><img alt="OnteachingJournalism1" class="aligncenter size-medium wp-image-1017" height="225" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2009/10/OnteachingJournalism12-300x225.jpg" title="OnteachingJournalism1" width="300" /></a> देश के अन्य पत्रों में जिनकी सेवाएं मूल्यवान ही रही हैं वे हैं अलमोड़ा की शक्ति और उसकी लगातार अपने क्षेत्र की राष्ट्रीय सेवाएं&nbsp; बिहार के &lsquo;देश&rsquo;और &lsquo;महावीर&rsquo;आगरे का &lsquo;आर्य मित्र&rsquo; आदि । &lsquo;प्रताप&rsquo; के साथ&nbsp; जिन पत्रों का उल्लेख होना चाहिए उसमें &lsquo;सैनिक&rsquo; की तेजस्विता और उसके संपादक श्रीयुत श्रीकृष्णदत्त पालीवाल के प्रयत्न हिनदी भाषियों के आदर करने की चीज है।&nbsp; &lsquo;अभ्युदय&rsquo; का सेवा सतत जारी है और जब स्वयं पं. कृष्णकांत जी लिखते हैं तब इस पत्रों की हिन्दी में भारी कमी है। चित्रों में, अन्य मासिकों के साथ, पूना के श्रीयुत वासुदेव रावजी जोशी के प्रयत्नों के फलस्वरूप &lsquo;चित्रमय जगत&rsquo; का भी विशेष ध्यान है।</p>
<p>	&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp; सज्जनों, जिस प्रांत से मैं आ रहा हूं उसके अधिकांश जिलों में हिन्दी भाषियों की बस्ती है, और ऐसा एक भी जिला नहीं जहां हिन्दी भाषान समझी जा सकती हो। उस प्रांत में अंग्रेजी भाषा के नाम लेने भर को अंग्रेजी में एक प्रांतीय सरकारी गजट रहा है, और एक अर्द्ध साप्ताहिक हितवाद निकल&nbsp; रहा है । उस प्रांत में अंग्रेजी भाषा ने नाम लेने भर को अंग्रेजी में एक प्रांतीय सरकारी गजट रहा है, और एक अर्द्ध साप्ताहिक हितवाद निकल रहा है। इधर हितवाद ने बहुत कुछ तरक्की की है, किंतु उसका व्रत जनता की जोखिम से भरी राजनीति को साहस के साथ प्रकट करना नहीं है। इन दो पत्रों को छोड़कर प्रायः उस सूबे भर में हिन्दी और मराठी भाषा के पत्र प्रकाशित हो रहे हैं। मराठी भाषी पत्रों में नागपुर के महाराष्ट्र का दर्जा ऊंचा है। मेरी सम्मति में, हृदय की उच्चता में उसका स्वर मराठी &lsquo;केसरी&rsquo; से भी कभी-कभी ऊंचा रहता है ।<br />
	&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp; महाशयों, हिन्दी पत्रों में कुछ समय पहले उस प्रांत में &lsquo;प्रभा&rsquo; &lsquo;श्री शारदा&rsquo; और&nbsp; &lsquo;हितकारिणी&rsquo; प्रकाशित हो रही थी, किंतु इस समय केवल &lsquo;हितकारिणी&rsquo; ही किसी प्रकार चल रही है । सागर के &lsquo;समालोचक&rsquo; को हिन्दी के सम्मानय और पुराने सुकवि एवं सुलेखक सैयद अमीद अली &lsquo;मीर&rsquo; के आशीर्वाद और सहायता का सौभाग्य प्राप्त हुआ है। यों मेरे देशभक्त तरूण अब्दूल गनी जिस साहस के साथ हिन्दी मु्स्लिम समस्याओं पर अपने विचार &lsquo;समालोचक&rsquo; में प्रकट कर रहे हैं, हिन्दी जगत में मुसलमानों में हिन्दी-पत्रकारों में शायद वे अकेले ही होंहे। वे जातिगत पक्षपात को राष्ट्रीयता पर कभी कब्जा नहीं करने देते। नागपुर के उत्साही और देश भक्त श्रुयत सतीदासजी मूंदड़ा की सेवाओं के स्वरूप हिन्दी अर्द्ध साप्ताहिक &lsquo;प्रमवीर&rsquo;ने हिन्दी जगत की अच्छी सेवा की है। यद्यपि &lsquo;प्रणवीर&rsquo; के मुख्य पृष्ठ पर वयोवृद्ध श्री राधामोहन गोकुल जी नाम ता, और वे कभी-कभी उस पत्र में लिखते भी थे, किंतु उस पत्र को यशस्वी ढंग से चलाने का श्रेय श्रीयुत रामगोपाल जी विद्यालंकार और श्रीयुत सिद्धानाथ माधव अगरकर को&nbsp; ही हैं । वीरवर भाई विजय सिंह जी पथिक जब वर्धा से चल गए, तब क्षीमान सेठ जमनालाल जीके आश्रय प्राप्त वर्धा के &lsquo;राजस्थान भी हिन्दी की सेवा की। यद्यपी&nbsp; मैं उन धनिक सज्जनों कृतज्ञ हूं जिनकी सहायता से उस प्रदेश में साहित्य सेवा होती रही किंतु मैं अपना कटु अनुभल निहायत अदब से प्रकट करना चाहता हूं कि धनिक मित्रों के आश्रय वाले सामयिक पत्रों का जीवन सदैव दाता की लहर पर निर्भर रहा है और श्री शारदा, राजस्थान केसरी, राजस्थान और मारवाड़ी के रूप में धनिकों की वह लहर आयी और चली गयी। मध्य भारत के पत्रों मं महात्मा गांधी के हिनदी &lsquo;नवजीवन&rsquo; के सहृदय संपादक पं. हरिभाऊ जी उपाध्याय ने हमारे जंगलों में लौटने पर &lsquo;मालव मयूर&rsquo; मेंअपनी शक्तियां लगायीं। उसकासंपादन बहुत अच्छा होता रहा है। अभीकुछ दिनों से श्रीयुत गोपीवल्लभ जी उपाध्याय के संपादकत्व में, मालव विद्यापीठ की मुख्य पत्रिका &lsquo;विद्या&rsquo; बड़े सुंदर ढंग से प्रकाशित हो रही है, और यदि धनिक लहर ने संपादक को मजाक न समझा तो&nbsp; विश्वास करना चाहिए कि यह पत्रिका हिन्दी में अपना स््तान ढूंढने का यतन करेगी। यों तो &lsquo;हिन्दी केसरी&rsquo; के रूप में मध्यप्रदेश ने सबसे पहले राष्ट्रीयता की गंभीर गर्जना कीथी और राष्ट्रीय सभाका सन 1990 का निर्णय झंड़ा सत्याग्रह और मध्यप्रांतीय सरकार पर प्रजा पक्ष के लोगों का असर यह बात स्पष्ट रूप से प्रकट कर रहा है कि उस प्रांत में पुरानी ज्योति को हिन्दी के सामयिक पत्रों ने जिंदा रखा है। मध्यप्रदेश में पत्रकार के नाते जिनकी शक्तियां कीर्तिमान नहीं हैं&nbsp; उनमें वयोवृद्ध पंडित रघुवर प्रसाद जी द्विवेदी ,ठाकुर छेदीलाल जी, ठाकुर लक्ष्मण सिंह, पंडित नर्मदा प्रसाद मिश्र, पं. द्वारका प्रसाद मिश्र के नाम उल्लेखनीय है। गो0रक्षा पर समाचार-पत्रों में पं. गंगाप्रसाद अग्निहोत्री की धूम है और व्याकरण तथा शिक्षा में समाचार पत्र लेखकों में श्री पंडित गोपाल दामोदर तामस्कर, श्रीयुत मैथिलीप्रसाद श्रीवास्तर और श्रीयुत कुलदीप सहाय का नाम लिया जा सकता है।</p>
<p style="text-align: justify;">
	&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp; &lsquo;विनोद&rsquo; साहित्य का प्राण है यह दिशा हिन्दी में नयी है अतः इसे साधना भी श्रम-साध्य होता है। इस विषय में &lsquo;मतवाला&rsquo; का नाम सूझ की दृष्टि से प्रथम लिया जा सकता है, यद्यपि उसकी रूचि से लोग अधिकतर सहमत नहीं हो पाते। प्रकट साम्प्रदायिक पत्रों में श्री ईश्वरी प्रसाद जी के संपादन में &lsquo;हिन्दू पंच&rsquo; अच्छी सफलता, प्राप्त कर रहा है। पत्रों को शोभने वाली सूझ सदैव श्री नरदेव जी शास्त्री के &lsquo;शंकर&rsquo; में देखने को मिलती है। &lsquo;सेवा&rsquo; बालवीरों का सुंदर मासिक है उसका संपादन अभी कुछ तक बड़े अच्छे ढंग से होता रहा है। मेरा विश्ष, लक्ष्य जाता है, पं. हृषिकेश शर्मा द्वारा संपादित मद्रास प्रांत के उस हिन्दी प्रचारक मासिक की ओर जिसकी सेवाएं भारत के हृदय मिलाने तथा हिन्दी भाषा को राष्ट्रव्यापी बनाने के लिए हैं।</p>
<p>	&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp; सज्जनों,भारतीय भाषा-समुद्र के इन प्रचारकों की भुजाएं इंग्लैंड के मल्लाहों से कम कीमत की नहीं गिनी जा सकती । धार्मिक पत्रों में &lsquo;समन्वय&rsquo; का दाम गनीमत है किंतु मद्रास प्रांत से श्रीयुत रामचंद्र जी शुक्ल के सम्पादकत्व में &lsquo;युग-प्रवेश&rsquo; जो सेवा कर रहा है व कम मूल्य की नहीं। यों &lsquo;रिलियो-पोलिटिकल&rsquo; ढंग से काम करने वाले पत्रों की उपयोगिता में &lsquo;भारत-धर्म&rsquo; साप्तहिक और &lsquo;भारत-मित्र&rsquo; दैनिक का उल्लेख होना जरूरी है। शिक्षकों के विषय में मैं गरीब अध्यापकों के मुख्य पत्र &lsquo;अध्यापक&rsquo; की सेवाओं की कद्र करता हूं । भिन्न-भिन्न विषयों के पत्रों के प्रयोग के मासिक &lsquo;विज्ञान&rsquo; की सेवाएं मूल्यवान हैं। बैठक में कई उपयोग&nbsp; पत्र प्रकाशित हो रहे हैं जिनमें श्री किशोरी दत्त जी&nbsp; शास्त्री का &lsquo;चिकित्सक&rsquo; और &lsquo;धन्वन्तरि&rsquo; उल्लेखनीय है। प्रोफेसर चतुरसेन जी शास्त्री &lsquo;संजीवन&rsquo; लेकर आगे बढ़े थे किंतु उस अच्छे पत्र के पैर न जमे । वैद्यक के पत्रों का उल्लेख करते हुए यह कहना पड़ेगा कि आज से तेहर-चौदह वर्ष पं. जगन्नाथ प्रसाद जी शुक्ल के सभापतित्व में &lsquo;सुधानीति&rsquo; श्रेष्ठता के साथ निकल रहा ता, वैसे पत्र का हिन्दी में बड़ी आवश्यकता है। हिन्दी पत्रों की रूचि अब विशेषांकों के रूप में आगे बढ़ रही है &lsquo;चांद&rsquo; और &lsquo;मनोरमा&rsquo; जैसे मासिकों के तो वर्ष में अनेक विशेषांक निकल जाते हैं । विश्वास होता है यदि हिन्दी जनता ने लक्ष्य दिया, तो इन पत्रों के विशेषांकों का स्वरूप ही इनका स्थायी स्वरूप होगा। तो भी यह कहना पड़ेगा कि चटक-मटक के सिवा उच्च रूचि, मौलिकता,कला और सम्पादकीय कौशल के दर्शन हमें अभी अपने पत्रों में बहुत कम हो पाते हैं।इधर गत बारह-तेरह वर्षों से समाचार पत्रों में कविताएं देने की चाल चल पड़ी है और यह दुःख के साथ देखा जाता है कि राष्ट्रभक्ति के नाम पर खून-फांसी, कऔर कालापानी का जो नाम लिया जाता है वे कविताएं चाहे&nbsp; हिन्दी भाषियों को खूल-फांसी और कालापनी की सूरते न देखने दें, किंतु काव्य का जरूर खून कर रही हैं। तेजस्वी भावों के ळिखने से मतलब चमत्कारहीन और बिना कल्पना पहुंच का गद्य लिखना नहीं है।कविता, न तो रसों का देश निकाला है न भावों और कल्पनाओं ही का। उसमें राष्ट्र की धमनियों को छूने वाली ज्योति, प्रेम की उन्मादकारिणी लहर और चरित्र की तपोपूर्ण आत्मा होना चाहिए। कविताओं को सदा जिन्दा रहना चाहिए किंतु वे समाचारों से पहले ही मर जाती हैं और प्रायः अधकतम प्राणहीन होकर ही समाचार-पत्रों में आती हैं। प्रोस्ताहन का प्रारंभिक युग निकल गया, अब तो प्रत्यक्ष सेवा कीतपस्याका युग है। होना चाहिए &lsquo;वीर-संदेश&rsquo; ही, किन्तु वे समचारों से पहले ही मर जाती हैं और प्रायः अधिकतम प्राणहीन होकर ही समाचार-पत्रों में आती हैं। प्रोत्साहन का प्रारंभिक युग निकल गया, किंतु वह अमर स्फूर्तिदायी और काव्यमय होना चाहिए। छायावाद हो परंतु अस्पष्टता की ओर सेबेसमझी की अद्दण्डता न हो, नियमों को तोड़-फोड़ डालिए, जमाना आपके लिए अलग नियम बनायेगा, खूब निरंकुश हो जाइए, किंतु वामीऔर अर्थ को तो अछूतारहने दीजिए, सब दिशाओं के बंधन टूट तोड़कर न रख दीजिए । यह उनके लिए हैं, जो सुकवि नये युग के संदेश वाहक हैं, जो नहीं लिखते जोकेवलल नवीनता की सृष्टि करन वाले&nbsp; वाले तरूणों की आलोचना करते हैं या उनकी सेवाओं को&nbsp; उपेक्षा की दृष्टि सेदेखते हैं सामयिक पत्रों के नाते उनसे क्या कहा जाये ? मैं आपसे पूछता हूं हिन्दी में हमारे इतने शक्तिशाली होने का दिन कब उगेका ? देश में अंग्रेजी का ज्ञान जरूरी नहीं, किंतु पत्र-संपादन में हम अंग्रेजी की ओर दुर्लक्ष्य नहीं कर सकते ।</p>
<p>	यह संपादन कला की मैके कीबाषा है, कला के संभलने का ज्ञान और विस्तार की सूचना अंग्रेजी ही दे सकेगी। कार्यालयों में उसके जाने वालों की बड़ी राशि रहनी चाहिए। अमेरिका छपाई के व्यापार में छठवां नंबर रखता है, भारत में हम अभी कीलों ही जोड़ रहे हैं। हमारी दोश पूर्ण वर्णमाला में हमने छापे के उपयुक्त सुधार नहीं किए । अंग्रेजी पत्र कहता है, ज्ञान में मेरे से समता करे ? क्या हम इस चुनौती का जवाब न देंगे ? क्या हम अपने पाठकों को यह कहने देंगे, भाई मैं इन बातों को क्या जानूं ? मैंने अंग्रेजी नहीं पढ़ी। विज्ञापनों के अस्तित्व के विषय में प्रत्रों मंे बहस का खिलवाड़ न हो। उपदेश, उदाहरण के शतांष मूल्य पर भी नहीं ठहरता । हां, नीति का ख्याल रखिए, रूचियों की उच्चता पर ध्यान रखिए । विश्वास कीजिए अंग्रेजी के शराब के विज्ञापनों से हिन्दी पत्र आज भी अच्छे हैं , केवल दवाओं आदि के विज्ञापन मात्र हटाना, एक न निभने वाली प्रतिज्ञा है।<br />
	&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp; सज्जनों चीन के बादलों, एशिया की आवश्यताओं और जिम्मेदारियों को देखिए इस हलचल में हिन्दी के पत्रों का कौन सा स्थान होगा? क्या अंग्रेजी पत्रों की नकल करना, धारा सभाओं, असेम्बली, स्टेट कौंसिल, नरेन्द्र मंडल, स्वदेशी और विदेशी हलचलें, कहीं भी हमारे आदमी नहीं। कब तक ? कठोर घटना स्थलों के मैदानों और राजकर्त्ताओं के गुप्त षड़यंत्रों के भी च हमारे तरूण किस दिन प्रवेश परेंगे ? किस दिन हमारा कोई तरूण चार कपड़ों, बहुत छोड़ीजरूरत की वस्तुओं और केवल एक सिपाही की तरह थोड़ा सा खर्च लेकर लड़ाई के समाचारों की चोखम भरी जिम्मेवारी अपने सिर पर लेकर किसी हिन्दी पत्र के कार्यालय से विदा होगा ? किस दिन हमारे पत्रकार राजशासन को ऐसा झुला डालेंगे कि देश की ताकत देशवासियों के हाथों में होगी और हमारे पत्रकार युद्ध क्षेत्रों में जाकर टेलीफोन, तार और बेतार के तार का उपयोग कर भारत में संदेश भेज सकेंगे ? क्या ये सब गुलाम के स्वप्न है ? अब 124 ए, 153ए, और अन्य छोटी मोटी धाराओं से हम ऊप गये, किस दिन घोड़े के सवार की तरह तैयार चुस्त, बालचरों की तरह फुर्तीले और देश के गरीबों की तह भूख प्यास बर्दाश्त करने में पक्के होकर हमारे तरूण विदेशों में खबरें लाने जावेंगे ? और किस दिन उनकी भेजी हुई खबरों के बल पर राजकर्मचारी हमारे कार्यलयों में पूछताछ करेंगे औत तलाशियां लेंगे। जापान, अमेरिका, इंग्लैंडकी कहानियां पढ़ लीं । किस दिन हिन्दी पत्र अपने पत्रों के कार्यालयों से देश के शासक भिजवा सकेंगे ? किस दिन कहा जायेगा कि अमुक रण क्षेत्र का लड़ाका अमुक धारासभा का&nbsp; सभापित, अनुक वैदेशिक मंत्री, हिन्दी उपसंपादक ता ? किस दिन हमारे तरूण युद्ध क्षेत्रों में लड़ाई के कप्तानों से सुनेंगे &lsquo;अच्छा एडीटर साहब बिना इजाजत आप अमुक सीमा से बाहर नहीं जा सकते । अपने संवाद सांकेतिक भाषा में नहीं भएज सकते, और तब तक संवाद नहीं भेज सकते जब मैं देख न लूं मैं आपके संवाद और अखबार की खाक परवाह नहींकरता खबर जितना जरूरत समझूंगा, जाने दूंगा, जितना जरूरत समझूगा रोक लूंगा।&rsquo; इसके बाद वह फिर गरजकर कहेगा &lsquo;तुम्हारे अखबार की प्रति मेरे पास पहुंचनी चाहिए मैं देखूंगा, संवाद भेजने में कोई चालाकी तो नहीं की गयी, आपके एडीटर-इन-चीफ न उसके शीर्षक देने में तो कोई चालाकी नहीं की।&rsquo;</p>
<p>	&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp; हमारा अज्ञान तरूण-पूछेगा और &lsquo;आज्ञाभंग&rsquo; या गलती का दंड ? और उत्तर पावेगा, &lsquo;गलती का दण्ड, लाइसेंस का छिल जाना और जरूरत होने पर शत्रु पक्ष के साथ रहना, आज्ञा के भंग का दंड, कोटमार्शल&rsquo; यही गंभीर परिश्थिति होगी, जो हमारे तरूणों की बुद्धि की कसौटी होगी, जब वे घर से, साथियों से, स्वदेश से बहुत दूर कठोर अनूशासन में रहकर वार-पत्र कला की महान साधना को जन्म देगा। क्या यह कभी होगा ?यह जवाब में बूढ़ों के आशीर्वाद से चाहता हूं, मित्रों की संयुक्त शक्ति से चाहता हूं। और तरूणों की बलिदान की भावना से चाहता हूं।</p>
<p>	&nbsp;मैं कई जरूरी प्रश्नों की चर्चा न कर सका, यह परिमित समय के साथ ही, मेरी&nbsp; स्मृति का, मेरे ज्ञान का अपराध है, मुझे तो न बोलना पड़ता यही अच्छा ता बोलते हुए एक बात मन में रह जाती है-</p>
<p>	आबरू ली कलम उठाने ने</p>
<p>	लायकी जान ली जमाने ने</p>
<p>	थी खामुशी बयान से अच्छी</p>
<p>	बात खो दी जुबां हिलाने ने।</p>
<p style="text-align: justify;">
	&nbsp;</p>
<p style="text-align: justify;">
	<strong>( माखनलाल चतुर्वेदी जी का संभाषण समाप्त )</strong></p>
]]></content:encoded>
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		<title>वर्तमान पत्र-अकारिता और माखनलाल चतुर्वेदी -2</title>
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		<pubDate>Sat, 31 Oct 2009 18:21:57 +0000</pubDate>
		<dc:creator>जनोक्ति डेस्क</dc:creator>
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		<description><![CDATA[महाशयों, हमारे देश के समाचार पत्र संगठित नहीं हो रहे । श्रीयुत नटराजन के सभापितत्व में बम्बई में श्रीमान रामस्वामी शास्त्री के सभापतित्व में मद्रास में, &#8216;फारवर्ड&#8217; के एक भूतपूर्व संपादक महाशय के सभापतित्व में बंगाल में, और इसी प्रकार ]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;">
	<a href="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2009/10/OnteachingJournalism11.jpg"><img alt="OnteachingJournalism1" class="aligncenter size-medium wp-image-1011" height="225" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2009/10/OnteachingJournalism11-300x225.jpg" title="OnteachingJournalism1" width="300" /></a> महाशयों, हमारे देश के समाचार पत्र संगठित नहीं हो रहे । श्रीयुत नटराजन के सभापितत्व में बम्बई में श्रीमान रामस्वामी शास्त्री के सभापतित्व में मद्रास में, &lsquo;फारवर्ड&rsquo; के एक भूतपूर्व संपादक महाशय के सभापतित्व में बंगाल में, और इसी प्रकार सिन्ध में एक-एक पत्रकार संघ स्थापित है। बम्बई के भाग्यशाली संघ के सबापति तो कुछ समय तक महतामा गांधी भी&nbsp; रह चुके हैंष किंतु खेद है कि सिवा कभी-कभी निंदा और विरोध के प्रस्तावों को पास कर लिने के इन संघों का कोई विश्ष उपयोग जहां तक मेरा तुच्छ सूचना ज्ञान पहुंचा है, नहीं हुआ। इन संघों ने म्लकर यह उद्योग नहीं किया कि एक बार देश के समस्त पत्रकारों के रूप में अपनी राश्ट्रीय पत्र शक्ति का बल तौलते और पत्रकारों को संगठित करते । हमारे संघठित न होने के कारणों में दो प्रधान दिखते हैं-एक तो संपादकगण या संचालकगण स्वयं अपने-अपने पत्रों के जीवन विधाता हैं फिर भला वे किसी के अनुशासन में कैसे रहें ? दूसरे दिन पूंजीवतियों के हाथ में देश के कुछ प्रभावशील समाचार पत्र हैं शायद वे इस बात का भय मानते हैं कि यदि साहसी गरीब &lsquo;उपकरण&rsquo; पत्रकार संघ में बलवान हो गया तो निरंकुशता की एक गहरी ठोकर लगेगी और उसके ठोकर लगते ही पूंजावादी इमारत की नींव हिलने लगेगी। इसकगा एक तीसरा कारण भी तो शायद हो-संगठन का कार्य बिना धन के नहीं चल सकता, और धन तो धनपतियों की जेब में है। गरीब अपने आपसी ताकत को भीसंग्रहित नहींकरना चाहते, शयद उनका यह ख्याल है कि केवल समाचार पत्रों का उपदेश ही समाचार-पत्रों को काफी बलशाली बना देगा, इधर धनपतियों की रुचि पर चलने वाली संस्थाओं में वह साव्रजनिक बल नहीं आता जो किसी देश की हलचल को यशस्वी कर प्रजा बल के पैरों, को, उसके ध्येय के मंग्राम में मजबूत बनाता है। तब फिर संगठन कैसे हो ? देश में यदि बार-बार दमन के कानून जारी किये गये और समाचार-पत्रों को कुचला गया, तो इसकाकारण समाचार-पत्रों का संगठित ने होना ही है। उन समाचार पत्रों और समाचार-पत्र संचालकों का तो प्राय)&nbsp; जिन्हें अपने व्यापार या सरकारी दबाव में शक्ति पानेके लिए पत्रों का संचालन करना होता है, किंतु जिन समाचार-पत्रों के सम्मुख लोकमत का सबल होना ही उद्देश्य है, उन्हें समाचार-पत्रकार के नाते नित्य सरकारी नियंत्रण में रहना और आये दिन सरकारी प्रहारों को सहना पड़तदा है। यद्यपि सब देशों के दरवाजे हमारे देशवासियोंकेलिए प्रायः बंद से हैं किंतु व्यापार, कला, मजदूरी, विद्याभ्यास तथाअन्यान्य कामोंसे जो लोग देश से बाहर गये हैं या चले जाते हैं, उन्हें देश में लौटने में कोई भारी कठिनाई नहीं होती। किंतु जो लोग आंदोलन के नाते समाचार-पत्रों&nbsp; में लिखने का पाप करेत हैं, या जो समाचार-पत्रों से संबंध रखते हैं, उन भारतवासियोंको इस देश के शासन की ओर वरदान दिया जाता है कि वे अपनी मातृभूमि का पुनःमुख ने देखें। लाला लाजपतराय जी पांच वर्षों तक अमेरिका में बंदी जीवन व्यतीत करते हैं, स्वामी सत्यदेव कठिनाई से पासरोर्ट पाते हैं और कितने ही साहित्यसेवी पासपोर्ट नहीं पाते, ऐसे व्यक्तयों ही में से होने के कारण, श्रीयुत शापुरजी सकलातवाला एम.पी. पार्लमेण्ट के सदस्य होकर भी, भारत आने से रोके जा सकते हैं। क्या हम उन लोगों के देश के लिए सहे हुए कष्टों को भूल सकते हैं जिन्होंने देश से बाहर समाचार-पत्रों मेंअपार आंदोलन कर संसार के लोकमत की देश की स्वाधीनता के अनुकूल बनाया है ?</p>
<p>	&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp; सज्जनों, यदि&nbsp; आज अमेरिका&nbsp; की आयोवा युनिवर्सिटी के विद्वान प्रोफेसर सुधीन्द्र बोस बार-बार प्रयत्न करने के पश्चात भी भारत में नहीं आ सकते, और यदि श्रीयुत वसंतकुमार राय, राजा महेन्द्र प्रताप, श्रीयुत हरिशंकर विद्यालंकार, श्रीयुत एम.एन. राय, श्री कालिदास नाग, लाला हरदयाल, श्री तारकनाथ दास, श्री रासबिहारी बोस और श्रीयुत सैयद हसन आज &lsquo;देशनिकाले&rsquo; के दण्डनीय अपराधियों की तरह देश से बाह हैं और अपनी मातृभूमि में नहीं आते तो इसका कारण है : देश के पत्रकारों के संगठन की कमी। उन सज्जनों के भारी अपराध नहीं, जिनका हमारे देश में शासन है। इस इंग्लैंड में तो उसकी वोलशेविक और समाजसत्तावादी साम्राज्यनाशक प्रजा रह सकती है, कि्तु उसी इंग्लैड के शासन में हमारे देश में वे लोग नहीं आ सकते, जिन्होंने समाचार पत्रों द्वारा, निर्भीकतापूर्वक भारत की दशा पर आंदोलन किये हैं। इसके सिवा कष्ट सहकर या बिनाकष्ट सहे जो लोग प्रसिद्ध लेखक या संपादक बन गये हैं, और जिन पर थोडी सी आपदा आते ही लोकमत खूब प्रक्षुब्ध हो उठता है, उनकी बात जाने दीजिए। उन पर प्रहार करते समय तो सरकार भी दो बार सोच लेती है, किंतु जिन अभागों ने, प्रसिद्ध लेखन या प्रधान&nbsp; नेता का गौरवपूर्ण पद नहीं पाया, जिन्हें समाचार-पत्रों के साधारण लेखन, उप संपादक या साधआरम कार्यकर्ता की हैसियत से अपना जीवन व्यतीत करना पड़ता है यदि उन पर कभी कानून की कृपा हो जाती है, तो उन्हें जेल में तरह-तरह के कष्कट दिये जाते हैं, साधारम चोर और डाकू से भी बदतर रखा जाता है और खाने-पीने तथा जीने में इतनी बाधाएं पैदा कर दी जाती है कि वे बेचारे कब इहलीला संवरम कर गए, इसका उस जनता को पता ही नहीं चलता, जिसकी सेवा करते-करते उन्होंने ये उपहार पाये। ऐसे अप्रसिद्ध श्रेणी के लोगों के आश्रितों ,माता-पिताओं , भाई-बहनों और बाल-बच्चों की जो दुरवस्था होती है उसकीतो कल्पना ही बस है। वे भूखों मरते हैं, सरकार के संदेह भाजन होने से प्रभावशील लोग पूछते ही नहीं। जनता उनसे परिचित न होने के कारण सहायता नहीं करती, परिणाम यह होता है कि उन परिवारों को भीख भी नहीं मिल पाती। मुझे क्षमा कीजिए उन लोगों की दुरवस्था का कारण और खुछ नहीं, केवल देश के पत्रकारों का उचित संगठन न होना ही है। भारत के अंग्रेजी के समाचार पत्रों के विद्वान संपादक और पत्रकार अपना चाहे जो रूख रखेंमैं आशा करता हूं कि हिन्दी के पत्रकार अपने संगठन का ऐसा स्परूप देंगे जिससे वह संगठन कष्ट भोगी पत्रकारों के लिए सहायक भी हो सके।</p>
<p>	&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp; सज्जनों, एक बार एक अंग्रेजी दैनिक के संपादकीय विभाग में काम करने वाले मित्र सेपूछा, पत्कार कौन है ? क्या भारत सरकार के बोर्ड आफ इनफारमेशन के भू.पू. डाईरेक्टर प्रोफेसर रशब्रुक विलियम्स, और आजकल के उनके उत्तराधिकारी मि. कोटमन पत्रकार हैं ? यदि देश के प्रधान व्यापारी टाटा या श्रीमान घनश्यामदास जी बिड़ला कल कोई पत्र प्रकाशित करने लगें तो पत्रकारों की गमना में वे आ जायेंगे । अथवा किसी देशी रियासत के महाराज अपे राज्य में पत्र प्रकाशित कर उसमें लेख लिखने लगें तो वे पत्रकार हो जायेंगे। संभव है, इस प्रशनों के मेरे जवाब का लोग मजाक उड़ायें पर सज्जनों मेरा तो स्पष्ट मत है कि ये सज्जन पत्रकारों की श्रेणी में नहीं गिने जा सकते। यदि देश में कोई पत्रकार संघ&nbsp; कायम हो और उसमें सरकारी नौकर, धनिकों सेवक और ऐसे ही लोगों की तादाद अधिक हो जाये, जिनके जीवन पत्रों की आमदनी पर अवलंबित नहीं, या जिनके पत्र किसी कमाई के विज्ञापन मात्र हैं तो मैं ऐसे संघ को, ऐसी सबा को, ऐसे सम्मेवन को निहायत अदब के सथ पत्रकार संघ कहने से इंकार करूंगा। पत्रकार&nbsp; तो केवल वही है जिसका जीवन, पत्र और संपादन-कला पर ही अवलंबित है, और जिनके सुखों का साधन और दुःखों का सहारा समाचार पत्र ही है, पत्रकार हैं वेलोग जिनका मुल्य चाहे उनके पत्रों के संस्कारों की तरह कम-अधिक कूता जाता हो, किंतु केवल पत्रकार होने से जिनके प्रभाव को कम नहीं कूचा जा सकता।<br />
	&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp; सज्जनों, यह सच है कि भारत में पत्रों का धंधा उतना आकर्षक नहीं है।&nbsp;&nbsp; अच्छे मस्तिष्क परिपूर्ण ज्ञान और दाप्तिमान कला के लोग , समाचार पत्रों में अपना जीवन खपाना नहीं चाहते, इसका प्रधान कारण तो यह है कि यह व्यवसाय राज्यकर्ताओं द्वारा आदर की दृष्टि से नहीं देखा जाता, इसलिए जो लोग जुर्माने, जेल यातना या अफसरों तथा राजाओं की नाराजगी से अपनी तौहीन अनुभव करते हैं वे इस रोजगार में अपने जीवन को बरबाद करना नहीं चाहते, दूसरे समाचार-पत्रों पर रहने वाली रूकावटों के कारण पत्र अपने गुणों विकास नहीं कर पाते, और ऐसी दशा में वे गरीभी&nbsp;&nbsp; में अपना जीवन व्यतीत करते हैं तब यदि कुछ तरूण निर्भिकतापूर्वक अपने दमकते हुए मस्तिष्क को लेकर पत्रों की सेवाओं में प्रवेश भी करना चाहते हैं, तो पत्रों की ऐसी स्थिति नहीं होती कि वे इन भविष्य के उज्जवल स्वप्न देखने वाले तरूणों को स्वर्ण मुद्राओं की कीमत पर स्वागत कर सकें। यह देखा गया है कि जब-जब समाचार-पत्रों के बंधन शिथिल किये गये हैं या&nbsp; देश की व्यापारिक अवस्था अच्छी रही है और समाचार-पत्र के जोखिम भरे रास्ते से अपने आपको पीछे नहीं खींचा, किंतु इस बात से इंकारनहीं किया जा सकता कि सरकार ने इपने विरोध से भारत में पढ़े-लिखे तरूणों को पत्रकार नहीं बनने दिया।<br />
	&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp; सज्जनों, इस दिशा में एक कठिनाई और है, समाचार-पत्र संपादन-कला की शिक्षा का, इस देश में कहीं समुचित प्रबंध नहीं है। अभी कुछ दिन हुए मुंबई विश्वविद्यालय इस दिशा में कुछ उद्योग करना चाहता ता, किंतु आखिर कुछनहीं हुआ । देश के तरुणों को संपादन-कला की शिक्षा देने के पथ में हमें भारत-व्यापी संगठन का चंद खिलौना मिलने तक नहीं ठहरना चाहिए। यह संतोष की बात है कि हिन्दी साहित्य सम्मेलन की परीक्षाओं में एक विषय पतर्-संपादन भी है किंतु उस परीक्षा मं पास होने वाले तरुणों का&nbsp; पत्रों के कार्यालय में जब वे नियुक्त किये जाते हैं, को काम का उपयोग नहीं हो पाता। केवल परीक्षा से ही संपादक उपजेंगे भी नहीं। हिन्दी समाचार-पत्रों के कार्यालय में योग्य व्यक्तियों के प्रवेश कराने के लिए, एक पाठशाला-आजकल के नये नामों की बाढ़ में से कोई शब्द चुनिये तो कहिए कि एक संपादन-कला के विद्यापीठ की आवश्यकता है। ऐसी विद्यापीठ किसी योग्य स्थान पर बुद्धिमान, परिश्रमी, अनुभवी, संपादक शिक्षकों द्वारा संचालित होना चाहिए। उक्त पीठ में अन्याय विषयों का एक प्रकाण्ड ग्रंथ संग्राहलय होना चाहिए । वहां सरकार गैसे सरकारी रिपोर्ट, प्रस्ताव आदि की व्यवस्थाबद्ध फाइलें होनी चाहिए। पीठ की तालीम में इतिहास ,भूगोल, अर्थशास्त्र राजनीति और साहित्य के परस्परावलम्बी ज्ञान के रूप में प्रत्र संचालन की विविध शाखाओं का समावेश होना चाहिए । वहां बताया जाना चाहिए कि प्रत्येक विषय का अभ्यास कैसे किया जाए, साधन सामग्री कैसे जुटायी जाये और उसकाकिस तरह उपयोग किया जाये, एक भाषासे दूसरी भआषा में अनुवाद किन-किन पद्धतियों से किये जायें, घटनाओं को काव्य, कहानी, कुतूहल, गंभीरता, विरोध, समर्थन और उपेक्षा का स्वरूप कैसे दिया जाये, और कोई भी बात समझ लेने के पश्चात समाचार-पत्रों में कैसे दी जाये, आलोचनाएं कैसे की जायें, आलोचकों के जवाब कैसे लिखे जायें, किन आलोचनाओं में विषय की मीमांसा करते हुए व्यक्ति की उपेक्षा की जाये, और किन में नहीं आदि बातों की शुद्ध और सप्रयोग शिक्षा देने की व्यवस्था होनी चाहिए। इसी संस्था द्वारा प्रयोग के लिए एक साप्ताहिक पत्र और एक मासिक पत्र भी प्रकाशित किया जाये। इस संस्था से उत्तीर्ण होने के पश्चात विद्यार्थियों को, देश के कुछ प्रसिद्ध और उत्तम समाचार-पत्रों के कार्यालयों में कुछ समस्वी संपादकों के पास, प्रत्यक्ष ज्ञान के लिए रखा जाये । इस तरह अंगरेजी&nbsp; पढ़ने-लिखने और समझने का निश्चित ज्ञान पा चुकने वाले&nbsp; तरूण, चार-पांच वर्षों में संपादकों के काम की चीज हो सकेंगे और रिपोर्ट, प्रूफ, भेंट तथा अन्य भिन्न-भिन्न संपादन के कार्यों से गुजर कर, उनमें से कुछ व्यक्ति, यदि उनमें स्वभाव-सिद्ध लगन हुई तो देश के अच्छे पत्रों में पत्रकार हो सकेंगे । इसकेबाद भी अधिक महत्व का कार्य तब हो जब हम विशेष होनहार तरूणों को इस कला का ज्ञान प्राप्त करने के लिए विदेशों में भिजावा देंगे। पिछड़े हुए देश अफगानिस्तान, टर्की और चीन के सैकड़ों तरूण महान यूरोपीय ज्ञान क्षेत्रों में हैं, तब क्याहमारे देश में संपादन-कला के कुछ तरूण भी न&nbsp; हों ? अस्तु ऐसी विद्यापीठ में एक भाग संपादन-कला की तालीम देने वाला तथा दूसरा भाग व्यवस्थापक तैयार करे वाला होना चाहिए। छापेखानों का आर्थिक और व्यवसाय की दृष्टि से संचालन हमारे पत्रों की एक भारी जरूरत है। कई होनहार पत्रों के डूबने के प्रधान कारणों में एक कारण ता उत्तम व्यवस्तापक के अभाव में उत्तम संपादक अकेला कुछ अधिक नहीं कर सकता, श्रम विभाग होना ही चाहिए। राजा के मंत्री की तरह संपादक को व्यवस्थापक की जरूरत है। कई होनहार पत्रों के डूबने के प्रधान कारणों में एक कारण ता उत्तम व्यवस्थापक की कमी। अस्तु,सज्जनों, ऐसी विद्यापीठ की स्थापना की ओर मुझे आशा है कि आपका ध्यान गये बिन न रहेगा। किंतु ,भूखे भजन न हो गुपाला-ऐसे विद्यापीठ का निर्माण पत्रों के मुद्रम व्यवसायियों द्वारा नहीं, स्वर्ण-मुद्राओं द्वारा ही हो सकता है। हिन्दी भाषी जनता का जितना विस्तृत क्षेत्र&nbsp; है उसमेंकितने ही धनी-मानी और राजा-महाराज पड़े हुए हैं। यदि वे मैसूर, त्रावणकोर और बड़ौदा के रूख से हिन्दी जगत की इस कमी को देएखें तो इस विद्यापीछ के कायम होने मेंदेर नहीं लग सकती। हम तो हिन्दू यूनिवर्सिटी को अन्य सरकारी युनिवर्सिटियों को तरह गिने चुने विषयों की तालीम देते ही नहीं देखना चाहते-हम चाहते हैं कि उसके संचालक, अपने पाठ्यक्रम में संपादन कला को भी स्थान दें। मेरा विश्वास है किआपके प्रयत्नों का रूख इस काल की तालीम की इन दिशाओं में अवश्य मुड़ेगा। यदि कुछ धनिक सज्जन एक-एक विद्यार्थी को अपनी सहायता से विदेशों संपादन-कला का अभ्यास करने भिजवायेंगे तो देश के भावी लोकमत की जाग्रत करने की दिशा में एक अच्ची सेवा करेंगे।</p>
<p>	&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp; सम्मान्य सज्जनों, देश के अंगरेजी पढ़े-लिखे यह कहकर मजाक उड़ा दिया करते हैं कि देशी भाषा के पत्रों में कुछ नहीं होता, और हमारे दुर्भाग्य से बंगाला, मराठी, गुजराती और तेलुगू भाषियों की अपेक्षा ऐसे लोगों की तादाद हमारे यहां अधिक है जो लोग अंग्रेजी पत्रों की महत्ता का स्वप्न देखते हैं वे यह नहीं जानते कि अंग्रेजी पत्र कभी जनता के हाथों नहीं पहुंच पाते। जैसा कि माननीय बाबू गोविंददास ने स्टेट कौंस्ल में हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाने के प्रस्ताव पर बोलते हुए कहा-देश में डेढ़ फीसदी आदमी अंग्रेजी अक्षरों से परिचित हैं। अंग्रेजी पत्र बजट, अर्थनीति, शास्त्रीय ज्ञान और भिन्न-भिन्न बातों की चर्चा&nbsp; करते हैं और कहा जाता है कि देशी भाषा के पत्रों में यह कुछ&nbsp; भी नहीं होता। अंग्रेजी के ज्ञाता, जापानी, जीनी, तुर्क और आयरिश अपने देश की भआषा में संवादपत्र पढ़ने&nbsp; के आदी होते हैं और हमारे पत्रों के अंगरेजी पाठक नहीं होते । हमें तो ऐसे पाठकों से&nbsp; बरतना पड़ता है, जो देश के शासन द्वार पढ़े-लिखे नहीं होने दिये जाते, और जो केवल अपना नाम भर लिखना-पढ़ना जानते हैं ऐसी दशा में हम देश की गरीब जनता के हित का साहित्य दें या देश के दोष-दर्शक सज्जनों को दें। श्रम की दृष्टि से देखिए तो अंग्रेजी पत्रकारों के लेखक टाइप की हुई प्रतियां देते हैं तार-समाचार अंग्रेजी मं आते हैं, बड़े-बड़े राजनीतिज्ञों के भाषण अंग्रेजी में होते हैं, और सेनफ्रन्सस्को एक्जामिनर, यॉर्क शायर&nbsp; पोस्ट, टाइम्स तथा ट्रिब्यून, स्वराज्य, हिन्दू,फारवर्ड-सब अंग्रेजी में प्राकशित होते हैं, और अंग्रेजी पत्राकारों को पढ़कर थोड़ी सी कांट-छांट करने और एक दो पंक्तियां जोड़ने के सिवाकुछ नहींकरना होता। देशी भाषा&nbsp; में में लिखते हैं, वह पत्रों मं छपने योग्य नहीं होता उसे सर्वता नवीन और शुद्ध करके पत्र मं देना पड़ता है। ऐसी अवस्था होने के कारण थोड़े ही श्रम में अधिक योग्य पत्र बनाने का अवसर अंग्रेजी पत्रकार को तो होता है। देशी भाषाके पत्रकार को नहीं । तो भी गरीबों के दुःख दर्द की बातें देशी भाषा के पत्रकार-पत्रों में देखने को मिलती है, अग्रेजी के समाचार-पत्रों में देश की सच्ची जनता का उतना साहित्य देखने को नहीं मिल सकता।</p>
<p>	&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp; देशी भाषा के समाचार-पत्रों में जो घातक परंपरा देखने में आती है वह है अंग्रेजी पत्रों की जरूरत से अधिक&nbsp; जूठन समेटना। मैं यह बात तो मानता हूं कि प्रत्येक संपादक का अंग्रेजी का ज्ञान खूब उज्जवल होना चाहिए ताकि देश में प्राप्त ज्ञान के द्वार उसके लिए खुले हुए रह, पर वह अपने ही साथी संवाद पत्रों को हेय दृष्टि से न देखें । हमें देशी भाषा के समाचार-पत्रों के अवतरण संवाद और सम्मतियां उद्धत करनी चाहिए और जिस कार्य में एक पत्र सिर खपा चुका है उसमें प्रत्येक को सिर न खपाकर, अपनी ओर से कुछ न कुछ नया देना चाहिए। जिसका उपयोग देशी भाषा के अन्य पत्रों को नगण्य समझने की परंपरा दोषपूर्ण है तो भी हमें चाहिए कि हम अपनी परिस्थितियों से झगड़ते हुए अपने समाचार-पत्रों को ऐसा बना दें कि जिससे हम पर ज्ञान की कमी का लांछन न रह जाये। हम जानते हैं इसमें श्रम अधिक लगेगा किंतु यह कार्य इस देश में इसी देश की भाषा का शासन बढ़ाने के लिए करना ही होगा। समाचार-पत्रों की भाषा जनता की भाषा होनी चाहिए । उसमें कठिन शब्दों का प्रयोग उसी समय होना चाहितए जब कि वैज्ञानिक शब्द को अन्य भाषा से हम अपनी भाषा में प्रकट कर रहे हों। किंतु अन्य बातों में समाचार पत्रों की भाषा में न संस्कृति का बोझ आना चाहिए, न फारसी का दबाव। वह साधारण से साधारम जन की समझ में आने वाली भाषा होनी चाहिए। यह सच है कि धनवाद हमारे मार्ग की एक भारी कठिनाई है। देश के शासन की रचना ऐसी है देश की वृद्धि के साथ-साथ शिक्षा, व्यवसाय, कृषि,राजसभा स्थानीय स्वराज्य और सरकारी नौकरी के स्थानों में धनिक ही अधिक बढ़ सकेंगे किंतु इस कृत्रिमता के खिलाफ एक संसार व्यापी आंदोलन चल रहा है। यह देखते हुए भी कि धनिक अपने धन से बड़े-बड़े स्वतंत्रता की डींग हांकने वालों को खरीद लेते हैं, हमें हरगिज निराश नहीं होना चाहिए और यह करना चाहिए कि चरित्रशील लेखनियों और उज्जवल एवं प्रजाहितकारी भावों की ही वृद्धि हो। अभी भी हिन्दी संसार में दुनियावादी उम्र उन अखबारों की भले ही अधिक हो जिन्हें अपने विज्ञान, व्यापार और प्रभाव बढ़ाने के नाते धनिकों की निश्चित छत्रछाया मेंरहना पड़ता है, किंतु आज भी हिन्दी केसरी, कर्मयोगी, प्रताप, सैनिक और स्वदेश जैसे साप्ताहिकों का देश की स्मृति पर गहरा प्रभाव है। हितवार्ता का नाम भी इन्हीं पत्रों की श्रेणी में ठआता है। इनमें प्रातप की तपस्या बड़ी और उसकी स्थिति स्थायी हो गयी है। इसमें संदेह नहीं कि जो लोग पत्र कार्यालयों में काम कर चुके हैं उनकी सेवाओं का काफी मूल्य है तो भी यह हिन्दी का दुर्भाग्य है कि लाला, लाजपतराय जी, पं. मदनमोहन मालवीय, बाबू काशीप्रसाद जी जायसवाल, बाबूजी प्रकाश जी, बाबू राजेन्द्र प्रसाद जी, भाई परमानंद जीआदि सज्जनों ने हिन्दी पत्र संपादन से दूर होकर हिन्दी पत्रकारों की श्रेणी को गरीब बना दिया। ये सज्जन ऐसी कड़ियां हैं जिनका संबंध भारत व्यापी राष्ट्रीय जीवन और प्रभाव से है, ऐसे सज्जनों द्वारा साहित्य की प्रत्यक्ष सेवा छोड़ देने से हिन्दी समाचार पत्रों की प्रतिष्ठा को हानि पहुंची है। मुझ इस बात का पूरा पता नहीं कि भारत के कौन-कौन पत्रकार देश से बाहर सेवा कर रहे हैं। विदेशों में कष्ट भोगने वपाले जिन सज्जनों का मैं ऊपर उल्लेख कर चुका हूं उनके सिवा प्रसिद्ध लेखक सेण्ट निहालसिंग और श्रीयुत पनिक्कर का हो नाम मुझे याद आता है। हिन्दी भाषियों के या हिन्दी पत्रकारों के गौरव की बाहरी देशों में बढ़ाने वालों के नामों में मुझे गर्वपूर्वक एक तो सहृदय वण्डित बनारसीदास चतुर्वेदी का नाम लेना चाहिए दूसका नाम हिन्दी उत्साही और कर्मशील संपादक डरबन निवासी श्रीयुत भवानी दयाल का उल्लेख करना चाहिए।</p>
<p>	&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp; सज्जनों, जिन वृद्ध ने, आज से दो-तीन वर्ष पूर्व इस क्षेत्र में नई पीढ़ी की पुराक की थी उनमें बाबू बालमुकुंद गुप्त, स्वर्गीय पं. राधाचरण गोस्वामी, स्वर्गीय श्री राधाकृष्णदास, पूज्यवर पंडित माधवरावजी सप्रे, आचार्य महावीर प्साद जी द्विवेदी और पंडित अंबिका पत्साद जी वाजपेयी आदि हैं। आज के हिन्दी भाषा के युग को पंडित महावीर प्रसाद जी द्विवेदी द्वारा निर्मित तथातेज को पं. माधवराव जी सप्रे द्वारा निर्मित कहना चाहिए। यह सेवाएं सब सज्जनों की हैं किंतु संपदकीय व्यवस्था, विचार,प्रवाह और भाषा शैली के रूप में वर्तमान युग को द्विवेदी जी और सप्रे जी का ही यूग कहना होगा।</p>
<p>	&nbsp;</p>
<p>	सज्जनों, इसके पश्चात जब से राष्ट्र के तेजस्वी भावों का युग शूरू हुआ और निर्भिक भाषा-शैली और विचार-परंपरा का प्रवाह हिन्दी में बहा तब बहुतों को ख्याल ता कि &lsquo;कर्मयोगी&rsquo; की शैली युग निर्माण का काम करेगी किंतु यह पत्र अधिक दिनों तक नहीं टिका सका। नागपुर के केसरी के वीर-पथ को कायम रखने का काम भाई गमेश शंकर जी की लेखनी ने किया। अनेकों कष्ट में वे हिन्दी द्वारा सामयिक जगत की उथल-पुथल में लगे ही रहे, अतः हिन्दी की तेजस्वी&nbsp; भावनाओं के युग को धीमे-धीमे निर्माण करने का श्रेय श्री गणेशशंकर&nbsp; जी को ही देना होगा। हिन्दी पत्रों में विदेशों से सतत् गर्जना करने का श्रेय राजा महेन्द्र प्रातप&nbsp; को तथा उन सब सज्जनों, को है जिन्होंने, &lsquo;सरस्वती&rsquo; &lsquo;माधुरी&rsquo;, &lsquo;चांद&rsquo; और&lsquo;मनोरमा&rsquo; मैं विदेशों से अपने लेख भिजवाये। मासिम साहित्य में &lsquo;प्रभा&rsquo; &lsquo;के न रहने से तेजस्वी साहित्य की भारी हानि हुई । &lsquo;माधुरी&rsquo; की आज-कल की हालत इस बात का सुबूत है कि यहां साहित्य धनपतियों के हाथ में होता है और सम्पादक अपने भावों के लिए स्वतंत्र नहीं होता, वहां साहित्य की धारा एक सी नहीं बह सकती। &lsquo;सरस्वती&rsquo;आज भी अपने पूर्वपथ पर हैं और वह उसेकायम रखे हुए हैं &lsquo;मनोरमा&rsquo; अच्छी रूचि से प्रकाशित हो रही है, साहित्य की भिन्न-भिन्न बाजुओं पर प्रकाश डालने का प्रयत्न किया जाता है। बाल-साहित्य में &lsquo;विद्यार्थी का वह स्थान नहीं रहा।उससे परिपूर्ण उन्नति का आशा की गयी थी, किंतु वह थोड़ा बढ़कर ठहर गया। शिशु साहित्य की स्वाभाविकता खूब आयी और लहेरिया सराय के &lsquo;बालक&rsquo; ने तो बाल-साहित्य में देश की अन्य भाषाओं के सामने भी अपने को हिन्दी में नाम लेने की चीज बना दिया । यद्यपि देश में स्त्रियों को मताधिकार मिल रहा है, तो स्त्रियों पर देश की जागृति के साथ बढ़ती हुई जिम्मेवारियां आ रही हैं तो भी &lsquo;गृहलक्ष्मी&rsquo;, &lsquo;स्त्री दर्पण&rsquo;, &lsquo;महिला-सर्वस्व&rsquo; तथा अन्य तत्संबंधी पत्र- पत्रिकाओं ने अपने स्वर को युग के साथ परिवर्तित नहीं किया । इस दिशा का उत्तम पत्र &lsquo;चांद है। उसमें साहित्यिक रूचि है, शैली है और सबसे अधिर समय के संदेश को पढ़ने का सामर्थ्य है। इस दिशा में नाम लेने लायक स्त्री-संपादित पत्र हैं- &lsquo;ज्योति&rsquo;, &lsquo;हिन्दी के दैनिकों में श्रीयुत पराड़करजी द्वारा संपादित- &lsquo;आज&rsquo; का आसन उच्च हैं। बाबू शिवप्रसादजी गुप्त ने हिन्दी को श्रेष्ठतर सामयिक साहित्य देने में बड़ा धन व्यय किया और कष्ट उठाया है। &lsquo;हिन्दू संसार&rsquo;का संपादन उच्च रूचि और जिम्मेदारी का पूर्ण विचार रखकर कियका जाता है उसमें दलबन्दी को राष्ट्रीय भावना पर राज्य नहीं करने दिया जाता । &lsquo;स्वतंत्र&rsquo;की विशेषता उसके नेपाल संबंधी लेख हैं। इस विशेष दिशा में उसकी बुलंद आवाज है। &lsquo;विश्वमित्र&rsquo; और &lsquo;वर्तमान&rsquo; देश की राष्ट्रीयता में अग्रगामी मत के पत्र रहे हैं, जिस मत का ग्रहण करना कष्ट साध्य होता हैं और खरते सेखाली नहीं होता&nbsp; पुराने साप्ताहिकों में &lsquo;बंगवासी&rsquo; अपने ढंग से चला जा रहा है वह स्थायी सनातनधर्मी पत्र है। &lsquo;वेंकटेश्वर&rsquo; का संपादन आजकल विश्वसनीय और दृढ़ हाथों में दीख पड़ता है किंतु व्यापारी समुदाय द्वारा संचालित पत्रों में राष्ट्रीय ज्योति नहीं रह पाती । आज का स्वप्न न जाने किस दिन बदल जाये। द्विद्वैनिक पत्रों में &lsquo;सूर्य&rsquo; है जिसका अपना पथ है हिन्दी जगत की सेवा में उसकी सच्चाई पर अविश्वास नहीं किया जा सकता।</p>
<p>	&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp; देशी राज्यों में काम करना बड़ी टेढ़ी खीर है। निरंकुश शासकों के भी च काम करने में जिस धैर्य, सहिष्णुता और साहस की जरूरत होती है, उसे कायम रखते हुए श्रीयुत रामनारायम जी चौधरी और श्रीयुत शंकरलाल जी वर्मा उस वीर योद्धा की ध्वनि को गूंजती हुई रखे हुए&nbsp; हैं जो हिन्दीभाषियों में राष्ट्रीय पथिक के नाम से परिचित हैं। ग्वालियर का &lsquo;जायजी प्रताप&rsquo; ग्वालियर राज्य का पत्र है किंतु स्वर्गीय माधवराव महाराज के जमाने से&nbsp; लगातार आज तक श्रीयुत माथुर महाशय उस सरकारी पत्र को बड़े ही अच्छे ढंग से चलाये जा रहे हैं। &lsquo;भारत-वीर&rsquo; का जिक्र&nbsp; अभी नहीं किया जा सकता, अभी तो श्रीमान भरतपुर-नरेश के सुधरोंकीधूम है। यह देखना है कि जब महाराज का रूख बदलेगा, तब पत्र कहां&nbsp; तक राष्ट्रीय सेवा या यों कहिए कि भरतपुर और राजपूताने की गरीब प्रजा की सेवा कर सकता है.<br />
	&nbsp;</p>
<p style="text-align: justify;">
	<strong>( माखनलाल चतुर्वेदी जी का संभाषण जारी&#8230;&#8230;&#8230;.</strong><strong> )</strong></p>
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		<title>वर्तमान पत्र-अकारिता और माखनलाल चतुर्वेदी -1</title>
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		<pubDate>Thu, 29 Oct 2009 03:04:53 +0000</pubDate>
		<dc:creator>जनोक्ति डेस्क</dc:creator>
				<category><![CDATA[दस्तावेज़]]></category>
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		<description><![CDATA[देश के उपदेशक संपादक,सज्जनों एवं पत्रकार बंधुओं ! मेरी अपेक्षा ज्ञान-वद्ध वयोवृद्ध औत तपोवृद्ध व्यक्तियों के होते हुए, आपने मेरे जैसे अनुभवहीन व्यक्ति को, इस संस्था के सभापतित्व का गौरवपूर्ण पद प्रदान किया, इसके सिए मैं, शिष्टाचार-वश ही, आपको धन्यवाद ]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;">
	<a href="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2009/10/OnteachingJournalism1.jpg"><img alt="Journalism/ mission to profession " class="aligncenter size-medium wp-image-1005" height="225" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2009/10/OnteachingJournalism1-300x225.jpg" title="Journalism/ mission to profession " width="300" /></a></p>
<p style="text-align: justify;">
	देश के उपदेशक संपादक,सज्जनों एवं पत्रकार बंधुओं !</p>
<p style="text-align: justify;">
	मेरी अपेक्षा ज्ञान-वद्ध वयोवृद्ध औत तपोवृद्ध व्यक्तियों के होते हुए, आपने मेरे जैसे अनुभवहीन व्यक्ति को, इस संस्था के सभापतित्व का गौरवपूर्ण पद प्रदान किया, इसके सिए मैं, शिष्टाचार-वश ही, आपको धन्यवाद दे सकता हूं, हृदय से नहीं। सम्मेलन का यह दूसरा वर्ष है। संस्था सर्वता बाल्यावस्था में है, ऐसे समय संपादन-कला सार्वजनिक जीवन और राष्ट्रीय स्फूर्ति के लालन-पालन में, जिनके हाथ अधिक अनुभवशील, अधिक सावधान होते उन्हीं को यह कार्य सौंपना उचित ता। एक वर्ष के शिशु को सजीव, सतेज और सक्षम कर ले जाने के लिए शिशुसंगोप में निपुण हाथों की जरूरत थी। मेरा तो इस कला में कोई स्थान ही नहीं किन्तु मैं सोचता हूं, आपने अपने तेज के पानी के बरते हुए हथियारों को इस संस्था के किसी बलवती जिम्मेदारी के समय संभालने के लिए रख छोड़ा है, और इसलिए मुझ जैसे आदमी को आपने आज्ञा दी है कि मैं प्रारंभिक समय की परिमित जिम्मेदारियों में आपकी आज्ञा का पालन कर दूं। यद्यपि मैं सोचता हूं कि ऐसी जिम्मेवारियों गौरव का कारण नहीं होती, वेतो एक आपदा, एक संकट ही होती हैं जहां अपने व्यक्तियों से अलग बैठकर मनुष्य को अनुशासन विद्यार्थी, और उन सब सज्जनों के नम्र प्रतिनिधि के नाते कार्य करूंगा, जिनके ज्ञान, अनुभव औत तप को आज ते सभापतित्व के पाने का मुझसे अधिक अधिकार था ।<br />
	सज्जनों, भारतीय उपवन में कितने ही फूल और फल देते हैं जो इस देश की उपज नहीं, उनका आगमन अन्य देशों से इस देश में हुआ है। समाचार-पत्रों और समाचार पत्रों का व्यवसाय भी इसी बात का एक उदाहरण है। इसीलिए समाचार पत्रों से संबंध रखने वाला प्रशस्न ज्ञान भी हमें उन्हीं देशों के साहित्य से मिलता है और अपने देश की परिस्थिति के अनुसार हमें उसका उपयोग कर लेना होता है। पाश्चात्व देशों में समाचारपत्र का कार्य बहुत महत्वपूर्ण है और उसमें कार्य करने वाले लोगों का समाज में बड़ा आदर है। गत सौ-डेढ़ सौ वर्षों के अंदर, संसार में जो लड़ाइयां, जोमहायुद्ध, जो संधियां, जो समझौते और जो सामाजिक राजनैकिक एवं औद्योगिक हलचले हुई, उनका महान यश अधिकतर समाचार पत्राकारों और समाचार पत्रों को ही&nbsp; देना पडे़गा । युद्ध घोषणा अथवा संधि की चर्चा जैसे कार्य, यद्यपि प्रत्यक्षः राज-संकट का संचालन करने वाले राजनीतिज्ञ ही किया करते हैं, किंतु युद्ध या संधि की परिस्थितियां उत्पन्न करने अथवा उन परिस्थितियों को जिंदा रहने देने और भार डालने का कार्य समाचार-पत्र ही किया करते हैं। इस बात से समाचार-पत्रों और उनके संचालकों की &lsquo;कर्तुम् अकर्तुम् अन्यताकर्तुम्&rsquo; की शक्ति का अंदाजा लगाया जा सकता है। इंग्लैड में साम्राज्य के जो चार आधार-स्तंभ माने जाते हैं, उनमें एक समाचार पत्र भी है और इसलिए इंग्लैंड में, और उससे भी अधिक जापान में, समाचार-पत्रों को &lsquo;फोर्थ स्टेट&rsquo; कहा जाता है। इंग्लैड, जापान और अमेरिका-जैसे &lsquo;ममहाशक्ति&rsquo; कहे जाने वाले देशों में लॉर्ड नॉथक्लिफ, लॉर्ड बेव्हर ब्रुक और&nbsp; &lsquo;जीजी&rsquo; के उत्पादक प्रसिद्ध जापानी फूकूजावा-जैसे व्यक्तियों को यह गौरव प्राप्त है कि उनके देशों को उसी पथ में चलना होता है जिस पथ में वे चलना चाहते हैं.<br />
	बंधुओं, यदि समाचार-पत्र संसार की के बड़ी ताकत है, तो उसके सिर जोखिम भी कम नहीं। पर्वत की जो शिखरें हिम से चमकती और राष्ट्रीय रक्षा की महान दीवार बनती हैं, उन्हें ऊंचची होना पड़ता है। जगत में समाचार-पत्र यदि बड़प्पन पाये हुए हैं, तो उनकी जिम्मेवारी भी भारी है। बिना जिम्मेवारी के पड़प्पन का मूल्य ही क्या है ? और वह बड़प्पन तो मिट्टी के मोल हो जाते हैं जो अपनी जिम्मेवारी को संभाल नहीं सकता। समाचार पत्र तो अपनी गैर-जिम्मेदारी से, स्वयं ही मिट्टी के मोल कानहीं हो जाता है, वरन् वह देश के अनेक महान अनर्थों का उत्पादक और पोषक भी हो जाता है। इस समय एकाधिकार या अल्पाधिकारी शासनों के सिंहासन डोल रहे हैं और जन-सत्ता का सूर्य धीरे-धीरे नभ मंजल के मध्य भाग को छूना चाहता है । ऐसे समय जनता के हृदयय की ध्वनि, उनके संकट के शस्त्र उनके एकांत के चिंतन, उनके जन-समूह के प्रबोधक समाचार-पत्र का महत्व और भी अधिक हो जाता है, और चूंकि निरंकुशता से समानता की ओर जाने का जगत का रूख बदलने का सामर्थ्य अब अनपा काम नहीं कर सकेगा, अतः समचारा पत्रों का प्रभाव उत्तरोत्रर बढ़ता ही जायेगा । इसलिए सामयिक पत्रो से संबंध समझने, उसे अनुभव करने और उसके बूते परिस्थितियों में परिवर्तन करने के उपासकों को, अपने गंभीर उत्तरदायित्व को क्षण-क्षण अनुभव करना होगा और आने वाले परिस्थितियों का सक्रिय जवाब देने के लिए सदैव प्रस्तुत रहना होगा।<br />
	सज्जनों, समाचार-पत्रों का प्रधान काम है : लोक मत का निर्माण । और इसीलिए ,इस व्यवसाय के व्यक्ति चिंतित रहते हैं कि देश की आवाज के स्पष्ट, अर्थपूर्ण और उन्मुक्त करने में, देश का आत्माओं को कार्य-शील चिंतन और चरित्र-पूर्ण बनाने में उसका कार्य अपकर्म का कारण न बन जाये। जो देश स्वतंत्र है, जगह साहस और महत्वाकांक्षाओं में, शराब और अफिीम जैसे विषयुक्त पदार्थोंकी तरह बंधन नहीं रखा पाते थे, जिस तरह अपनी गंभीर जिम्मवारियों को विनोद की तरह निपटाते हैं, उसी तरह आपने और समाज के विनोद और शौक के लिए राष्ट्रीय हित को कभी-कभी गौण बना सकते हैं। किंतु जो देश भारहत की तरह पराधीन है, उसे देश के संपादकों को, अपने देश के भाग्य के साथ खिलाड़ी मित्र की तरह बरतने का अवसर नहीं रहता, उन्हें एक जोखम भरे रोगी आत्मीय की तरह बरतना पड़ता है। वे अपने भी मार देश और उसके कमजोर भाग्य के साथ मजाक नहीं कर सकते, देश की किसी भी घटना और अपने किसी भी साधन का उपयोग सामाजिक और व्यक्तिगत विनोद और शोक के लिए नहींकर सकते। पराधीन देश के पत्र-संपादकों से कहीं अधिक और जोखम से भरी हुई होती है। स्वतंत्र देशों में पत्र-संपादन प्रोत्साहन का, गौरव का और सुख का साधन होता है।परतत्र देशों का सचाचा पत्र-संपादन विदेशी राजकर्ताओं से सीधा लोहा लेना, उनके स्वार्थों पर बिना झिझके पैर&nbsp; रखना होता है। सन् 1780 में कलकत्ते से प्रकाशित होने वाले भारत के प्रथम पत्र &lsquo;हिकिज जर्नल&rsquo; से लगाकर, बड़े-बड़े जुर्माने, जब्तियां और पिछले 147 वर्षों से कठोर यंत्रणाएं इस बात का गहरा&nbsp; सबूत हैं कि किसी पराधीन देश का पत्र-संपादन प्राणों की बाजी का व्यापार हैं। भारत के समाचार-पत्रों ने तीन बातों को लगातार सामने रखा है :</p>
<p>	&nbsp;1. हम इतने बचकर लिखे कि&nbsp; कानून का दैत्य हमें निगल न जाये।</p>
<p>	2. कानून द्वारा लिखने के साधन, उसकी स्फूर्ति, छिन जाने के बाद भी ऐसी कौन सी बातें&nbsp; हैं कि जिन्हें लिखकर हम राष्ट्र को खड़ा करने का बल उसमें ला सकें।</p>
<p>	3. ऐसी कौनसे साधन हैं जो व्यवसाय की दृष्टि से समाचार-पत्रों को जिंदा रख सकें।</p>
<p>	इसे सिवा पत्र-संचालन की कला, हारे देश में सर्वधा नयी होने के कारण और जनाता के बल की लहर देश में अबीत क प्रवेश न कर सकने के कारण, देश की ओर से देश की जनता की ओर से समर्थन, जो सहायता, जो शक्ति हमें मिलनी चाहिए वह हमें नहीं मिलती। जनता की सहायता के अभाव में दुर्देव से,एवं कठिनाई से पेश पा रहे हैं। समाचार पत्रों की उपमा उस स्त्री से दी जा सकती है जिसके गुण और बल पर भयभीत अत्याचारियों के आक्रमण हो रहे हैं, किंतु जिसके पोषण और प्राणाधार अज्ञान हों। इस तरह, जानकार शत्रु और अज्ञानी&nbsp; सहायक के भी च, सहायक के स्वार्थों की सतत रक्षा करते जाना एक कठिन तपस्या है।</p>
<p style="text-align: justify;">
	&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp; ऐसी है परिस्थिति, जिसमें से समाचार-पत्रोंको गुजरना होता है। किंतु ऐसी अनेक अड़चनों और विकट परिस्थितियों में भी भारतीय पत्रों और उनके संचालकों ने अपने अस्तित्व को कायम रखा और पिछले शताब्दी के पचीस वर्षों में समाचार-पत्रों की संख्या बढ़ायी, यह देख-सुनकर किसे अचंभा न होगा ? और कौन यह न कह उठेगा कि इस कार्य को कंधे पर&nbsp; लेने वाले लगातातर कष्ट भोगियों के धैर्य, उनकी लगन उनके दीघोंद्योग का ही यह परिणाम है। कौन नहींकहेगा कि आज समाचार-पत्रों को जो बल जो अवलस्था प्राप्त है, उसका यश इस&nbsp; देश के&nbsp; स्वर्गीय लोकमान्य तिलक, स्वर्गीय मोती बाबू, श्रीयुत सुब्रहमण्य् अय्यर जैसे व्यक्तियों को ही है। मुझे विश्वास है कि यदि हमने अपने देश&nbsp; की अगली पीढ़ी के चित्र को अपने रक्त बिन्दुओं पर चित्रित हो जाने दिया, यदि हमने भी पहली सी लगन, उसी त्याग और उसी अध्यवसाय से अपना काम किया, तो हम अपने पीछे आने वाली पीढ़ी के हाथों एक गर्व करने योग्य परिस्थिति दे जाने में समर्थ हो सकेंगे। स्वतः राज्य का उपयोग करने वालों की अपेक्षा, उन लोगों की कीर्ति निःसंशय अधिक उज्जवल, उनका प्रयत्न अधइक वंदनीय उनका पुण्य अधिक है जिन्होंने अपनी भुजाओं के बल से राज्य कमाया और अपनी आजाद पीढियों के हाथों में धरोहर की तरह सौंप दिया ।</p>
<p>	&nbsp;</p>
<p>	&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp; मैंने यह बात गई जगह पढ़ी और सुनी है कि राष्ट्र की अथवा मानव हृदय की धमनियों को फड़का देने वाले कवि अपने आप जन्म लेते हैं, वे बनाये नहीं जाते । इस विषय पर निश्चित रूप से मुझे कुछ&nbsp; पता नहीं, किंतु पत्र-संपादकों&nbsp; के विषय में मैं इस बात को मानता हूं। मैं पतत्र संपादन के विषय के जानकार अंग्रेजी लेखक मि. जॉन पेण्डलटन के इस कथन से सर्वता सहमत हूं कि आक्सफोर्ड का गौरव, कैम्ब्रिज की कीर्ति और बैरिस्टरी का बड़प्पन, पत्र संपादन से अधिक नहीं ठहरता । यहां ते स्वभावजन्य बैचेनी ही अधिक यशास्वनी हेती है। यह कला अलंकारों वाले सौंदर्य की उपमान नहीं ,इस कला के ब्राह्मांग को क्षण-क्षण बदलने वाली नवीनता की ुपमा दी जा सरती है, और इस कला की आत्मा की उपमा है वह सौंदर्य जो प्राणों के मूल्य का है, चूंकि वह भय की गोद में निवास करता है। भय की गोद में निवास करने वाला सौंदर्य&nbsp; सजाये हुए राजमहलों में नहीं रहता, वह प्रकृति के हाथों निर्माण हुई जोखमि की जगहों में निवाल करता है। उसी तरह पत्र-संचालन की कला युनिवर्सिटी की पत्थर की तस्वीरों के बूते जीवित नहीं रह सकती , उसके लिए हृदय की लगन ही आवश्यक है। इस कला का जीवन सहृदयता, धीरज, लगन, बैचेनी और स्वभिमान का स्वभाव सिद्ध होना । शिक्षा और श्रम द्वारा विद्वता और बहुश्रुतथा को जीता जा सकता है, ऊपर लिखे स्वभाव-सिद्ध गुणों को नहीं. स्वभाव सिद्ध गुण जिनका बना नहीं, किंतु यह भी सच है कि हर काम हर आदमी नहीं कर सकता । मैं नहीं मानता कि ज्ञान के समान मानव बहुंच और विशेष मानव-कृति यह भी सच है कि हर काम हर आदमी नहीं कर सकता। मैं नहीं मानता कि ज्ञान के समान मानव बहुंच और विशेष मानव-कृति, इयत्ता से सर्वता परे हैं। प्रत्येक बात मानवीय रूचि की स्वाभाविकता पर अवलंबित होती है। अतःमेरी नम्र सम्मति में तो मनुष्य अपने मन का तौल देखकर ही अपने कार्य के लिए कार्य ढूढे। समाचार-पत्रों के जोखम भरे धेधों में तो, यदि ऐसे ही स्वभाव-सिद्ध रूचि वाले&nbsp; लोग आयेंगे तो यह कला अधइक&nbsp; बढ़ेगी और अपेक्षित फल देगी।</p>
<p>	&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp; सज्जनों समाचार पत्रों के उदय ने समस्त जगत को पाठशाला बना डाला है। &lsquo;श्ष्यस्तेअहं शाधि मैं त्वां प्रपन्नम्&rsquo; कहकर, धर्माध्यक्षों के चरणों पर मस्तक झुकाने की परंपरा सब देशों में रही है, आज भी है , किंतु बिना जाने ही समाचार-पत्रों के ज्ञान की उनकी सूचनाओं का, उत्सुकता से मार्ग, प्रतीक्षा करे वाले शिष्यों की जितनी बड़ी संख्या आज जगत में है उतनी बड़ी संख्या संसार के सब धर्मों के &lsquo;आतुरों&rsquo; के समूचे जोड़ की भी नहीं है। यह सच है कि समाचार-पत्रों को किसी ने शिक्षक नियुक्त नहीं किया, किंतु यह बात कहकर ये एक शिक्षक के नाते पड़ने वाली जिम्मेदारी से बच नहीं सकते । अयाचित और स्वयं-स्वीकृत सेवा अधिक उत्तरदायित्वपूर्ण हो जाती है। विद्यार्थी अपने शिक्षक के नाते पड़ने वाली जिम्मेदारी से बच नहीं सकते । अयाचित और स्वयं-स्वीकृत सेवा अधिक उत्तरदायित्वपूर्ण हो जाती है। विद्यार्थी अपने शिक्षकों से जो तालीम पाते है, वह ऐसे ज्ञान के रूप में होती है, जिसे उन्हें भविष्य जीवन में आजमाना होता है, आज नहीं, और उन्हें अपने ज्ञान के अनेक विद्वानों द्वारा परिमार्जित करने के लिए काफी अवसर भी रहता है। पत्र-संपादकों के श्रोताओं या पाठकों का यह हाल&nbsp; नहीं । जिस बात केलिखने में संपादक को थोड़ा ही कष्ट उठाना पड़ता है, केवल जरा सोचना और कुछ संदर्भ पुस्तकों को देखना पड़ता है, यदि यही बात परिस्थिति को देखकर, या हानि-लाभ का ख्याल कर न लिखी जाये तो वह पाठकों को तरित्र, धन, गौरव और ज्ञान के रूप में महान हानि का कारण होती है। इसलिए कि समाचार-पत्र का पाठ्य जीवन युद्ध में लगा हुआ जीव होताहै, समाचार पत्रों से पाये हुए ज्ञान को परिमार्जित करने के लिए विद्वान, शिक्षकों और उचित अवकाश का&nbsp; उसके पास अभाव होता है। यह बात ठीक वैसी ही है इतिहास के लेखक या भविष्यवादी की गलती केवल पढ़ने में कष्ट देती हैऔर पिछली परंपरा या भावी जीवन की चर्चा करतीह है, अतः मनुष्य की प्रत्यक्ष हानि नहींकरता, किंतु कानून बनाने वाले की गलती तुरंत&nbsp; लोगों के धन7जन का नाश करने लगती है। अतः समाचार-पत्रों के सेवक को अपनी कलम तलवार से कहीं अधिक सावधानी से उठानी पड़तीहै। तलवार की पीड़ा प्रारंभ में ही होती है, अतः घाव के पूरा होने के पहले ही वार बचाने का यत्न किया जा सकता है। किंतु पत्र संपादक के प्रहार का अनुभव,नाश और हानि के साथ होता है। इसलिए इस दिशा मेंकलम उठाने वाले की दृष्टि, परिणाम पर सतत लगी रहनी चाहिए। नियुक्त शिक्षक केवल अपने की नियुक्त करने वाले के सामने उत्तरदायी है, किंतु पत्र संपादक समस्त देश के सामने उत्तरदायी होता है क्योंकि उसके हाथ में देश का हित और अहित होता है।<br />
	&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp; सम्मान बंधुगण, स्वभाव-सिद्ध संपादकों की चर्चा करने से मेरा मतलब ज्ञान को गौण स्थान देने से नहीं । मैं मानता हूं कि संपादक के स्वभाव-सिद्ध गुणों को जिंदा रखने के लिे ज्ञान ही एक महान साधन है।किंतु हीरा कीमती वस्तु भले ही हो, बाजार में रखे जेाने से हले उसे करारे संघर्षणों का सामना करना होगा, इसी तरह, संपादक की जवाबदारी संभावने वाले व्यक्ति के भाग्य में लगातात विश्व को ज्ञान का संघर्षण बढ़ा होता है। संपादकों या पत्रकारों के लिए आवश्यक ज्ञान का प्रश्न अभी् विश्व के कोई भी विद्याफीछ पूर्ण रूप से नहीं सुझा पाये। अमेरिका-इंग्वैंड आदि देशों में अभी थोड़े वर्षों से पाठ्यक्रम बने हैं किंतु उनमें अभी निश्चिता नहीं आ पायी है। भारत में हमारे अज्ञात पर जीने वाला शासन होने के कारण, हम सदैव विश्व के ज्ञान को बहुत देर बाद पाया करते हैं। किंतु संपादन कला के ज्ञान के विषय में यह विलंब अक्षम्य अपराध होगा। हमें ऐसा उद्योग करना चाहिए जिससे समाचार पत्रों और संपादन-कला के ज्ञान की जड़ जमें । मैं सोचता हूं कि आप सब सज्जन इस बात पर अवश्य विचार करेंगे कि वे कौन-कौन से प्रधान उपाय हैं, जो समाचार-पत्र और संपादन-कला के लिए अधिक उपयोगो सिद्ध हो सकते हैं।<br />
	&nbsp;&nbsp;&nbsp;<strong> (&nbsp; माखनलाल चतुर्वेदी जी का संभाषण <strong> </strong>जारी &#8230;..)</strong></p>
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