बड़ें फैसले लेने में जल्दबाजी ठीक नहीं
0यूपीए - 2 इस समय अपने कार्यकाल के सबसे बुरे दौर से गुजर रही है ! सरकार जल्दबाजी और अपने गलत फैसलों के कारण संसद में रोज नए – नए मुद्दे लाकर समूचे विपक्ष समेत अपने
वर्तमान समय भारतीय लोकतंत्र का संकर्मण काल कहा जा सकता है. लोकतंत्र की इस व्यवस्था ने देश को आकंठ भ्रष्टाचार , बेहद गरीबी , बेरोजगारी , मुक्त भोग विलासिता , भोंडे
हर रात सोचता हूँ, एक नई सुबह आये, सुबह तो हर रोज़ आती है, पर बैरंग चली आती है फिर सोचा,कि ये रात बदल जाए, पर,ख्वाव वदलकर, सुनसान चली आती
साभार : आईएलओ प्रकाशित पुस्तक “मुक्ति की रह” अनौपचारिक अर्थव्यवस्था मोटे तौर पर इस प्रकार परिभाषित की जा सकती है- ऐसी अर्थव्यवस्था जिसमें अनिगमित उद्यम, अनियत या दिहाड़ी मजदूर है। भारत सहित
यूपीए - 2 इस समय अपने कार्यकाल के सबसे बुरे दौर से गुजर रही है ! सरकार जल्दबाजी और अपने गलत फैसलों के कारण संसद में रोज नए – नए मुद्दे लाकर समूचे विपक्ष समेत अपने
वर्तमान समय भारतीय लोकतंत्र का संकर्मण काल कहा जा सकता है. लोकतंत्र की इस व्यवस्था ने देश को आकंठ भ्रष्टाचार , बेहद गरीबी , बेरोजगारी , मुक्त भोग विलासिता , भोंडे
हर रात सोचता हूँ, एक नई सुबह आये, सुबह तो हर रोज़ आती है, पर बैरंग चली आती है फिर सोचा,कि ये रात बदल जाए, पर,ख्वाव वदलकर, सुनसान चली आती
साभार : आईएलओ प्रकाशित पुस्तक “मुक्ति की रह” अनौपचारिक अर्थव्यवस्था मोटे तौर पर इस प्रकार परिभाषित की जा सकती है- ऐसी अर्थव्यवस्था जिसमें अनिगमित उद्यम, अनियत या दिहाड़ी मजदूर है। भारत सहित
देश की सबसे बड़ी समस्या बेरोजगारी पर पटना से “ अनिकेत प्रियदर्शी ” ने अपने विचार जनोक्ति को लिखा है जिन्हें हम यहाँ प्रकाशित कर रहे हैं : बेरोजगारी स्वतंत्र
विश्वव्यापी आर्थिक संक्रमणकाल में जिसे देखो वही देश के हालात का रोना लेकर बैठा हुआ है। बौद्धिक जुगाली के केंद्र दिल्ली में तो विमर्श की कोई कमी नहीं है। हर