हाईप्रोफाइल कब्जे में मीडिया
2मीडिया ने जेसिका लाल, प्रियदर्शनी मट्टू, नीतीश कटारा मामले में न्याय दिलाने में जबरदस्त भूमिका अदा की और अब रुचिका-राठौर मामले को जिस तरह से उजागर किया है वह प्रयास
आरोप है कि दलित सवालों को मीडिया ने लगभग दरकिनार सा कर दिया है। सवाल दलित मुद्दों का हो या फिर साहित्य या फिर कोई अन्य मुद्दा। इसे लेकर दलित
मीडिया के वर्तमान हालत को देखकर कोई नहीं कह सकता कि पत्रकारिता मीडिया के लिए धर्म रह गया है ! सर्वविदित है कि मीडिया उद्योग बन चुका है और उद्योग को चलाने
शाम का वक्त था। समाचार पत्र ‘सत्य’ के डाक संस्करण को अंतिम रूप देने में समाचार संपादक त्रिभुवन जी पूरे जोश खरोश से लगे थे। आम दिनों की तरह आज
मीडिया ने जेसिका लाल, प्रियदर्शनी मट्टू, नीतीश कटारा मामले में न्याय दिलाने में जबरदस्त भूमिका अदा की और अब रुचिका-राठौर मामले को जिस तरह से उजागर किया है वह प्रयास
बाजारवाद के आगे आज सब कुछ गौण हो चुका है। आमखास इसकी गिरफ्त में हैं। मीडिया भी इससे अछूता नहीं। अपने को बाजार में बनाए रखने के लिए मीडिया बाजारवाद