Post Tagged with: "बाजारवाद"

वाद -विमर्श ,”वाद” क्या होते हैं ?

वाद -विमर्श ,”वाद” क्या होते हैं ?

0 जनोक्ति डेस्क / 2010/10/15 12:54 am

Anand G.Sharma आनंद जी.शर्मा – “वाद” क्या होते हैं ? * उन “वादों” का जनक / प्रणेता कौन होता है ? * “वाद” वास्तव में कोई निश्चित विचारधारा होते हैं

सूखती स्याही और कुन्द होती खबरों की धार

सूखती स्याही और कुन्द होती खबरों की धार

0 के .पी. त्रिपाठी / 2010/09/10 10:46 pm

“मत कहो, आकाश में कुहरा घना है, यह किसी की व्यक्तिगत आलोचना है ” दुष्यंत कुमार की यह पंक्ति वर्तमान मीडिया परिवेश में अक्षरतः सटीक बैठती हैं। कलम की स्याही सूख रही

इलैक्ट्रॉनिक मीडिया नया विलन

इलैक्ट्रॉनिक मीडिया नया विलन

0 अखिलेश शर्मा / 2010/08/24 9:58 am

80 के दशक की यादें ताज़ा हो गईं. तब गांव में एक बड़े हॉल में एक टीवी पर वीडियो फिल्में देखने जाता था. चाहे शक्ति कपूर हो, अमरीश पुरी या फिर

मनोरंजक  खबरिया चैनल

मनोरंजक खबरिया चैनल

0 संजय कुमार / 2010/08/23 9:51 pm

तेजी से दर्शकों के मानसपटल पर छा जाने वाले संचार क्रांति के सशक्त माध्यम, खबरिया चैनल मनोरंजन चैनलों में तब्दील होते जा रहे हैं। राजनीतिक खबरों को पीछे धकेलते हुए

कौआ और मीडिया

कौआ और मीडिया

1 शंकर दत्त फुलारा / 2010/07/14 5:54 pm

भारतीय समाज में कौए को आमतौर पर अच्छा नही माना जाता। कारण, शायद उसकी कर्कश आवाज, कुटिल बुद्धि, तांक-झांक करने की आदत, उसका काला रंग आदि हो। लेकिन, अपनी इन

दलित सवालों को दबाती मीडिया

दलित सवालों को दबाती मीडिया

1 संजय कुमार / 2010/05/15 6:02 pm

आरोप है कि दलित सवालों को मीडिया ने लगभग दरकिनार सा कर दिया है। सवाल दलित मुद्दों का हो या फिर साहित्य या फिर कोई अन्य मुद्दा। इसे लेकर दलित

छिन सकती है, मीडिया की स्वतंत्रता !

छिन सकती है, मीडिया की स्वतंत्रता !

0 डा ० पुरुषोत्तम मीणा / 2010/05/13 5:43 pm

मीडिया के वर्तमान हालत को देखकर कोई नहीं कह सकता कि पत्रकारिता मीडिया के लिए धर्म रह गया है ! सर्वविदित है कि मीडिया उद्योग बन चुका है और उद्योग को चलाने

आकाश पर मत थूको

आकाश पर मत थूको

0 संजय कुमार / 2010/05/01 4:54 pm

शाम का वक्त था। समाचार पत्र ‘सत्य’ के डाक संस्करण को अंतिम रूप देने में  समाचार संपादक त्रिभुवन जी पूरे जोश खरोश से लगे थे। आम दिनों की तरह आज

खबर छापने के बदले अखबार खरीदने पर दवाब

खबर छापने के बदले अखबार खरीदने पर दवाब

0 संजय कुमार / 2010/04/21 1:07 pm

प्रख्यात पत्रकार स्व.प्रभाष जोशी ने भारतीय मीडिया द्वारा चुनाव के दौरान पैसे लेकर खबर छापने की परिपाटी के खिलाफ जो मुहिम छेड़ी थी, उसकी गुंज संसद और चुनाव आयोग में

मीडिया में नियुक्ति का सच

मीडिया में नियुक्ति का सच

3 संजय कुमार / 2010/03/12 12:44 pm

देश दुनिया की खबरों को मीडिया अनोखे अंदाज में लोगों के सामने लाने की दिशा में रोजाना कुछ न कुछ नया करके रिझाने की फिराक में रहता है। राजनीतिक, सामाजिक,