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	<title>JANOKTI : जनोक्ति :  राज-समाज और जन की आवाज &#187; फिल्म</title>
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		<title>सपनों का सिनेमा</title>
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		<pubDate>Sat, 08 May 2010 15:20:48 +0000</pubDate>
		<dc:creator>उमेश पंत</dc:creator>
				<category><![CDATA[सिनेमा-संसार]]></category>
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		<description><![CDATA[अक्सर इंसान सपने देखता है , कल्पनाओं में उनको जीता है और जब तन्द्रा टूटती हैं तो सोचने लगता है कि जो हमने देखा उसका अर्थ आंखिर था क्या ? अधिकांश सपनों को वो यूँ ही भुला देता हैं , ]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><img class="alignright size-medium wp-image-2885" title="lost-in-dreams" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2010/05/lost-in-dreams-202x300.jpg" alt="" width="202" height="300" />अक्सर इंसान सपने देखता है , कल्पनाओं में उनको जीता है और जब तन्द्रा टूटती हैं तो सोचने लगता है कि जो हमने देखा उसका अर्थ आंखिर था क्या ? अधिकांश सपनों को वो यूँ ही भुला देता हैं , जैसे उन्हें उसने कभी देखा ही न हो। क्या आपने कभी सोचा है कि किसी दूसरे के सपने अपनी आंखों से देखना कैसा लगता है ? और वो भी तब जब सपने किसी सुन्दर फिल्म में फिल्मा लिये गये हो और वो भी अकिरा कुरुसावा जैसे निर्देशक के द्वारा। कुरुसावा की फिल्म ड्रीम्स एक ऐसा ही अनुभव है। कहाजाता है कि ये पूरी फिल्म अकीरा कुरुसावा के उन सपनों के बारे में है जो उन्होंने अलग अलग समय में देखे। फिल्म में 8 छोटी छोटी कहानियां हैं, मुश्किल से पांच पांच मिनट की। इन कहानियों में कुरुसावा मनुष्य और प्रकृति के बीच के तारतम्य के असन्तुलित से हो जाने के लिये अपनी चिन्ता जाहिर करते मालूम होते हैं। सभी कहानियों के पात्र किसी न किसी रुप में या प्रकृति से जुड़े हैं या प्राकृतिक जीवनदर्शन से। इन कहानियों में कहीं प्रकृति अपने पूरे साफ सुथरे नैसर्गिक रुप में दिखाई देती है तो कहीं उसके साथ हुए खिलवाड़ से पनपी विभीषिका पूरे भयावह रुप में सामने आ जाती है। और उसके समानान्तर चलता है आनन्द और विभीषिका दोनों से जूझता इन्सान। ये कुरुसावा के सपनों का फिल्मांकन तो है ही साथ ही हमारे इर्द गिर्द की दुनिया की चिन्ताएं भी हैं। भले इनका रुप प्रतीकात्मक है पर ये चिन्ताएं आज के सन्दर्भ में भी उतनी ही प्रासांगिक हैं। और इस लिहाज से ये फिल्म महत्वपूर्ण हो जाती है।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong> बरसात में सूरज की चमक- </strong>सनशाईन थ्रो रेन फिल्म की पहली कहानी है। फिल्म को देखकर लगा कि कई बार लोकोक्तियां या कहावतें जिन्हें हम नितान्त क्षेत्रीय समझ रहे होते हैं वो विश्वव्यापी भी हो सकती हैं। हम अपने घर में अक्सर सुना करते थे कि जब धूप और बारिस दोनों साथ साथ हो रही होती हैं तो उस वक्त लोमणियों की शादी होती है। इस कहावत के जापानी वर्जन को फिल्म के इस हिस्से में देखा जा सकता है। एक बच्चा जिसकी मां उसे इस मौसम में बारिश में जाने से मना कर रही है पर बच्चा जाता है और जब वो घर लौटता है तो उसकी मां उसे बताती है कि एक लोमड़ी वहां आयी थी जो उसे एक चाकू देके गई है। माने यह कि वे चाहती है कि तुम इससे खुद को मार लो। मां बच्चे से कहती है कि वो लोमड़ी से माफी मांग ले हो सकता है कि वो माफ कर दे। बच्चा लोमड़ी तलाश में घर से जंगल की तरफ चला आता है। और वहां एक इन्द्रधनुष है फूलो के बगीचे के इर्द गिर्द पहाड़ों के बीच कहीं उगता हुआ। और बच्चा आगे बढ़ा जा रहा है अनन्त की ओर। फिल्म के इस हिस्से में सफेद कुहासे के बीच से उभरते लोमणियों के प्रतीकात्मक चेहरे जब पार्श्व में बजते किसी जापानी लोकसंगीत के साथ आगे बढ़ रहे होते हैं तो एक अजीब किस्म की रहस्यात्मक अनुभूती होती है। और उस मासूम बच्चे के लिये एक खास किस्म की सहानुभूति का भाव मन में पैदा होने लगता है न जाने क्यों।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong><em>आडू के बाग़ -</em></strong> द पीच और्चर्ड फिल्म की दूसरी कहानी है। ये कहानी गुड़ियाओं के एक त्योहार के बारे में है। माना जाता है कि इस त्योहार को तब मनाया जाता है जब आड़ू के बगीचों में सुन्दर गुलाबी फूल उगते हैं। और त्योहार में प्रदर्शित की गई हर गुड़िया एक आड़ू के पेड़ का प्रतीक मानी जाती है। लेकिन एक छोटा सा लड़का इस बार त्योहार में खुश नहीं है। क्योंकि उसके परिवार ने इस बार आड़ू के बगीचे से सारे पेड़ काट दिये। बच्चा एक लड़की के पीछे पीछे कटे पेड़ों वाले उस बगीचे में जाता है और देखता है कि गुड़ियाएं आड़ू के पेड़ों की आत्माओं में बदल गई हैं। और बच्चे को बताती है कि कैसे उन्हें काट दिया गया। लेकिन जब उन्हें महसूस होता है कि बच्चे को उनका खिलना कितना अच्छा लगता था वो फैसला करते हैं कि एक बार उसे फिर से आड़ू के उस खिले बगीचे का दर्शन करा दिया जांये। बगीचा एक बार फिर खिल जाता है पर थोड़ी देर बाद ही वहां सारे कटे हुए पेड़ वापस आ जाते हैं। वो लड़की जिसके पीछे बच्चा यहां आया था एक बार फिर दिखाई देती है। और थोड़ी देर में वो भी गायब हो जाती है और उसकी जगह एक गुलाबी फूलों वाला आड़ू का पेड़ वहां उग जाता है।</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;"><strong><em>मौत के परिंदे -</em></strong> क्रोज़ा इस सिलसिलेवार हिस्से की पांचवी कहानी है। इस भाग में मशहूर चित्रकार विनसेंट वानगाग की पेटिंग के जरिये उनके जीवन के एक खास हिस्से को बड़े ही दार्शनिक तरीके से कुरुसावा जीवन्त कर देते हैं। फिल्म के इस हिस्से में विन्सेन्ट वानगाग की भूमिका में विश्वविख्यात फिल्म निर्देशक मार्टिन स्कोर्सीजी खुद मौजूद हैं। फिल्म शुरु होती है वानगाग की एक पेटिंग से जिसके अन्दर एक लड़का किसी को ढूढ़ते हुए प्रवेश कर जाता है। वो लड़का वानगाग की कई पेंटिंग्स से गुजरता है और अन्त में उसे एक बूढ़ा आदमी पेंटिंग बनाता हुआ दिखाई दे जाता है। इस आदमी के दोनों कानों में पटिटयां बंधी हुई हैं और वो अपने चित्रों की दुनिया में खोया पेंटिंग बनाये जा रहा है। लड़का उस आदमी से पूछता है कि आपके कानों में पटिटयां क्यों बंधी हुई हैं तो वा आदमी उसे बताता है कि मैने अपने दोनों कान ही काट लिये क्योंकि ये कान मुझे मेरा काम करने में रुकावट पैदा करते थे। माना जाता है कि वानगौग ने अपने जीवन के अन्तिम समय में इसी तरह अपने कान काट लिये थे और अपने आंखिरी समय में वो जीवन से इतने परेशान हो गये थे कि उन्होंने आत्महत्या ही कर ली। क्रोज के आंखिरी दृश्य में कुछ कौवे आसमान को चीरते हुए उड़ते चले आते हैं। सम्भवतह कुरुसावा ने इस दृश्य में वौनगौग की आत्महत्या को ही प्रतीकात्मक रुप में दिखाया है। वानगाग की पेंटिग्य को फिल्म का यह हिस्सा जिस तरह से जीवन्त कर देता है वो सचमुच एक कमाल का अनुभव लेने जैसा है।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>माउन्ट फूजी का लाल सच</strong>- माउन्ट फूजी इन रेड फिल्म की छटी कहानी है जिसमें दिखाया गया है कि कैसे माउन्ट फूजी में स्थित न्यूक्लियर प्लांट में फैले रेडियेशन के चलते इतना जहरीला प्रदूषण हुआ कि आसमान लाल हो गया। और वहां के सभी लोगों ने समुद्र में शरण लेकर मौत को गले लगाना बेहतर समझा। अन्त में तीन लोग एक आदमी औरत और बच्चा ही षश रह गये हैं जो लगभग जान ही चुके हैं कि जल्द ही उनकी मौत भी तय है। और उनके भीतर पसरा मौत का डर इस कहानी में साफ देखा जा सकता है। फिल्म की अगली दो कहानियां जापान में हुए परमाणु हमलों की वजह से हुए ज़हरीले विकीरण पर कुरुसावा की चिन्ता को दिखाती हैं। ये कहानिया उस विभीषिका की सांकेतिक अभिव्यक्ति हैं जो जापान ने सम्भवतह उन परमाणु हमलों की वजह से झेली।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong><em>रोते हुए दैत्य -</em></strong> द वीपिंग डैमन फिल्म की सांतवीं कहानी है जिसमें दिखाया गया है कि एक पहाड़ पर कई ऐसे दैत्यनुमा लोग बुरी तरह चीख रहे हैं। अजीब सी आवाजें निकालेने वाले इन एक सींग वाले दैत्यों में से एक दैत्य लड़के को बतात है कि ये लोग न्यूक्लियर रेडियेशन के शिकार हैं। इसी विकीरण की वजह से इन लोगों की एक सींग उग आई और ये लोग भटकती हुई आत्माएं बन गये। और इनका सबसे बड़ा दुख ये है कि अब ये मर भी नहीं सकते और इसी तरह भटकते रहना इनकी मजबूरी है।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong><em>पवनचक्कियों का गाँव - <span style="font-style: normal; font-weight: normal;">एक सुन्दर सा गांव जहां हौले हौले एक नदी बह रही है। पेड़ों से मन्द मन्द हवा बहती आ रही है। और नदी और हवा के बहते जाने के बीच कई पनचक्कियां चल रही हैं। कुछ बच्चे हैं जो एक पत्थर पे फूल चढ़ा रहे हैं और वो नौजवान लड़का जो उन्हें देख रहा है फूल चढ़ाते हुए। लड़का इतने अच्छे वातावरण में बड़ी राहत महसूस करते हुए आगे बढ़ता है वहां उसे एक बूढ़ा सा आदमी दिखाई देता है जो पनचक्की बना रहा है। फिल्म के इस हिस्से में उस बूढ़े आदमी और इस लड़के के बीच जो बात होती है वो बेहद रोचक है। उस बात को सुनने के बाद आपको महसूस होगा कि आदमी अगर चाहे तो पूरी तरह प्राकृतिक संसाधनों की मदद से ही जी सकता है बिना प्रकृति को नुकसान पहुंचाये। ये भी कि इस तरह जीते हुए आदमी अपनी मौत को एक जश्न के रुप में मना सकता है। संवाद की शुरुआत में लड़का पूछता है कि इस गांव का नाम क्या है तो बूढ़ा जवाब देता है हम इसे गांव ही कहते हैं। इसका कोई नाम नहीं है। लड़का बिजली के बारे में पूछता है तो बूढ़ा आदमी जवाब देता है कि हमें बिजली की जरुरत महसूस ही नहीं होती। लड़का फिर पूछता है कि यहां रातें तो बड़ी गहरी होती होंगी। तब आप क्या करते हैं? बूढ़ा आदमी जवाब देता है कि रातें गहरी काली ही होनी चाहिये। तभी तो हम आकाश में बिखरे तारोें को साफ साफ देख पायेंगे। अन्धाधुन्ध हो रहे आविष्कारों पर सवाल उठाते संवादों के सिलसिले के अन्तिम पड़ाव में पहुचते हुए फिल्म जिन्दगी को एक को इत्मिनान से जिये गये पर्व और मौत को किसी जश्न की तरह दिखाती है। और बताने की कोशिश करती है कि अगर प्रकृति की नैसर्गिकता बर्करार रखते हुए और उसपे अपनी शर्तें न थोपते हुए सरलता से जिया जाये तो मौत को भी उत्सव की तरह अपनाया जा सकता है। क्योंकि तब न मौत आने में जल्दी करेगी, न हम मौत को बुलाने की जल्दबाजी में रहेंगे। ये सब उसी तरह होगा जैसे प्रकृति। बिल्कुल अपनी प्राकृतिक निरन्तरता में, अपने समय से। फिल्म के इस हिस्से के आंखिरी पलों में 103 साल का बूढ़ा आदमी जो 99 साल की औरत की अन्तिम यात्रा के जश्न में शामिल होने जा रहा है नौजवान से कहता है कि मेरे खयाल से मेरी उम्र मौत को अपनाने की बिल्कुल सही उम्र है। और अन्त में सम्भवतह जापानी लोकगीत की सुन्दर सी धुन के साथ पारम्परिक वाद्ययंत्रों और एक समान पोशाक पहने छोटे छोटे बच्चों से लेकर सौ साल से बूढ़े लोगों के जुलूस की जुगलबन्दी फिल्म के इस हिस्से को अहसास कर पाने की हद तक दर्शनीय बना देती है।</span></em></strong></p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">अकिरा कुरुसावा के सपनों की ये फिल्मी दुनिया न केवल फिल्म देखने की सुखानुभूति देती है बल्कि एक सरल सन्देश भी दे जाती है कि प्रकृति और इन्सान का रिस्ता मानवीय रिस्तों से अलहदा नही है। जब तक हमें उसकी गरज है तब तक ही उसे हमारी फिक्र। जिस दिन इन्सान ने प्रकृति के बारे में सोचना छोड़ दिया उस दिन प्रकृति भी हमें ऐसे तरसाना शुरु कर देगी। और इसका असर हमारे सपनों में भय बनकर समा जायेगा। कुरुसावा के ये सपने इसी असर की असरदार नुमाईश हैं।</p>
<p style="text-align: justify;">
]]></content:encoded>
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		<title>फ़िर दिल तोड़ा हॉकी ने</title>
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		<pubDate>Tue, 09 Mar 2010 17:18:20 +0000</pubDate>
		<dc:creator>पुष्पेन्द्र आल्बे</dc:creator>
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		<category><![CDATA[फिल्म]]></category>

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		<description><![CDATA[दिल्ली के ध्यानचंद नेशनल स्टेडियम में कुछ दिनों पहले जब हॉकी विश्वकप का आगाज हुआ था, तो क्रिकेट को धर्म की तरह पूजने वाले भारतीय खेल प्रेमियों ने अपने क्रिकेट मोह से परे जाकर भारतीय हॉकी टीम को भी अपने ]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><img class="alignright size-full wp-image-2008" title="भारतीय हॉकी" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2010/03/Hockey_Flickr_1.jpg" alt="" width="230" height="230" />दिल्ली के ध्यानचंद  नेशनल स्टेडियम में कुछ दिनों पहले जब हॉकी विश्वकप का आगाज हुआ था, तो  क्रिकेट को धर्म की तरह पूजने वाले भारतीय खेल प्रेमियों ने अपने क्रिकेट  मोह से परे जाकर भारतीय हॉकी टीम को भी अपने दिलों में जगह दे दी थी. देश  के करोड़ों खेल प्रेमियों के लिए क्रिकेट में महेंद्रसिंह धोनी की ‘टीम  इंडिया’ की तरह ही हॉकी टीम भी दुलारी बन गई थी. और जब, विश्वकप के पहले  ही मैच में भारतीय हॉकी  टीम के लड़ाकों ने चिर-परिचित प्रतिद्वंद्वी पाकिस्तान के खिलाफ  धमाकेदार जीत हासिल कर ली थी, तो मानों क्रिकेट को भूलकर समूचा देश हॉकी  के रंग में डूब गया था. दो साल पहले रिलीज होकर भारत में हॉकी को फिर से  जिंदा कर देने वाली शाहरूख खान की फिल्म ‘चक दे इंडिया’ की तर्ज पर  खेलप्रेमियों ने टीम को एक नया नारा भी दे दिया था-‘चक दे हॉकी ’.</p>
<p>लेकिन अफसोस, पाकिस्तान के खिलाफ  यह शुरूआती जीत चार दिन की चांदनी ही साबित हुई. पाकिस्तान को पहले ही  मुकाबले में 4-1 से करारी शिकस्त देने वाली टीम ने अपने कट्टर  प्रतिद्वंद्वी के खिलाफ जोश, जूनून और जीतने का जज्बा सबकुछ दिखाया था. इसी  के साथ अचूक डिफेंस, सटिक पेनल्टी कार्नर और आक्रामक रणनीति की भी इस मैच  में पाकिस्तान के खिलाफ जीत में अहम भूमिका रही थी. लेकिन बाद के  मुकाबलों में टीम की यह सभी खूबियां पूरी तरह से बेअसर साबित हुई. स्पेन  और इंग्लैंड के खिलाफ टीम के मिडफिल्डरों, पेनल्टी कार्नर विशेषज्ञों ने  मूलभूत गलतियां की, जिसके चलते टीम ग्रुप राउंड में ही विश्वकप की खिताबी  दौड़ से बाहर हो चुकी है. अब भारतीय हॉकी के लिए यह पोस्टमार्टम का दौर  है. नतीजतन, जब दूसरी टीमें विश्वकप के अपने अभियान में पूरे जोश के साथ  जुटी हुई थी, भारतीय हॉकी के तारणहार एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप कर रहे थे या फिर बहानेबाजी  करते हुए अपने प्रशंसकों के मायूस और गुस्सेल चेहरों से आंखें चुरा रहे  थे.</p>
<p>सवाल यह उठता है कि  आखिर भारतीय टीम की ऐसी दुर्गति क्यों हुई ? घरेलू मैदानों और अपने दर्शकों  के बीच खेलने का मनोवैज्ञानिक फायदा दुनिया के किसी भी खेल में किसी भी  देश की टीम को मिलता है.  जाहिर है, भारतीय हॉकी टीम के लिए भी यह फायदा मौजूद थी. वह अपने घरेलू  मैदानों पर अपने समर्थकों के बीच खेल रही थी. बावजूद इसके, घरेलू मैदान और  प्रशंसक भी भारतीय टीम में वह जज्बा पैदा नहीं कर पाएं, जो उन्हें खिताब  जीतने के करीब पहुंचा पाता. और इस दुर्गति के लिए कईं वजहें जिम्मेदार हैं.  सबसे बड़ी वजह यह रही कि भारतीय खिलाड़ियों अन्य देशों के खिलाड़ियों की  तुलना में न सिर्फ  शारीरिक तौर पर बेहद कमजोर थे, बल्कि मानसिक तैयारी के लिहाज से भी वे  विपक्षियों के मुकाबलें उन्नीस ही साबित हुए. विश्वकप अभियान में पेनाल्टी  कार्नर में मिले दर्जनों मौको को गोल में तब्दील न कर पाना भारतीय  खिलाड़ियों की सबसे बड़ी नाकामी साबित हुई. तीन विषेषज्ञ डेग फ्रिलकरों के  साथ मैदान में उतरने के बावजूद भारतीय खिलाड़ी पेनाल्टी कार्नर का फायदा  उठानें में फीसड्डी  साबित हुए. दूसरी ओर, विपक्षी टीमों ने भारतीय गोलकीपर को धता बताते हुए  पेनल्टी कार्नर के लगभग सभी मौकों को गोल में तब्दील किया. भारतीय  खिलाड़ियों की डीफेंस पंक्ति भी बेहद कमजोर साबित हुई. भारतीय खिलाड़ी  विपक्षी टीम के खिलाड़ियों की न तो सही ढंग से मार्किंग कर पाएं, न उन्हें  गोलपोस्ट के पास पहुंचने से रोक पाने लायक व्यूह रचना बना पाए. इसी का  नतीजा रहा कि टीम स्पेन और  इंग्लैंड के खिलाफ 5-2 और 3-2 के बढ़े अंतर से हारी. टीम के खिलाड़ियों के  बीच तालमेल का अभाव तो था ही, विपक्षी टीम से निपटने के लिए अचूक रणनीति  और आक्रामकता भी उनके खेल से नदारद थी.</p>
<p>मैदान में हुई भयावह तकनीकी गलतियों के साथ ही मैदान  के बाहर के माहौल ने भी टीम को कमजोर बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी.  विश्वकप में अपने अभियान के आगाज से ठीक  पहले तक भी टीम विवादों से घिरी हुई थी. पैसे के विवाद को लेकर हॉकी  इंडिया और खिलाड़ियों के बीच की लड़ाई सड़क तक पहुंच गई थी. यह विवाद  जैसे-तैसे सुलझा, तो विश्वकप से ठीक पहले एक प्रदर्शनी मैच में खिलाड़ियों  द्वारा एक करोड़ रूपए मांगे जाने की बात ने भी खूब तुल पकड़ा था. इन्हीं  विवादों के चलते विश्वकप में अपने अभियान के आगाज से पहले ही टीम का मनोबल  बूरी तरह गिरा हुआ था.</p>
<p>हालांकि  विश्वकप में शर्मनाक प्रदर्शन के लिए पूरी तरह से खिलाड़ियों को ही  जिम्मेदार ठहराना तर्कसंगत नहीं है. हॉकी इंडिया के पदाधिकारी और सरकार  में हॉकी के प्रति उदासीनता भी इसके लिए बराबर जिम्मेदार हैं. हॉकी का  ककहरा भी न जानने वाले पदाधिकारी बीतें सालों में देश में हॉकी की दुर्दशा  के बीच भी उदासीन रवैया अपनाएं हुए हैं. इसी  का नतीजा है कि न तो खिलाड़ियों को पर्याप्त पैसा मिल पाता है और न ही  पर्याप्त सुविधाएं. यह भारतीय खेलों के लिए दुर्भाग्यपूर्ण ही नहीं, आंखें  खोल देनी वाली हकीकत भी है कि जहां भारतीय क्रिकेटर करोड़ों रूपए की सालाना  कमाई करते हुए दुनिया के सबसे अमीर खिलाड़ियों में शुमार होते हैं, वहीं  हाॅकी समेत अन्य खिलाड़ी एक लाख रूपए के लिए भी तरस जाते हैं. चंद लाख  रूपयों के लिए हाॅकी  खिलाड़ियों को जिस तरह हॉकी इंडिया के पदाधिकारियों से जीहूज्जत करना  पड़ी, वह निश्चित ही शर्मनाक है. और पैसों के मामलें को खिलाड़ियों को किसी  भी तरह से दोषी नहीं ठहराया जा सकता, बल्कि इसके लिए हॉकी इंडिया पूरी  तरह से जिम्मेदार है. हाॅकी इंडिया के उदासीन पदाधिकारियों ने न तो हॉकी  की हालत सुधारने के लिए बरसों से कोई गंभीर प्रयास किया है और न ही अपनी  जिम्मेदारियों को ठीक  से निभाया है. नहले पर दहला यह कि वर्तमान में यूपीए सरकार में खेल  मंत्रालय वहीं केपीएस गिल संभाल रहे हैं, जो देश में हॉकी की दुर्दशा के  लिए सबसे ज्यादा जिम्मेदार है. हॉकी इंडिया देश में हॉकी के गिरते स्तर  को लेकर किस कदर उदासीन है, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि वह  टीम के साथ कोच के तौर पर एक विदेशी कोच जोसे ब्रासा को जोड़े हुए है.  विश्वकप के सभी मैचों में यह  बिल्कुल साफ था कि भारतीय खिलाड़ियों और कोच के बीच सामंजस्य का बेहद अभाव  था. विदेशी होने की वजह से ब्रासा भारतीय खिलाड़ियों के खेल, उनके  बेकग्राउण्ड और उनकी खूबियों-कमजोरियों के बारे में ज्यादा नहीं जानते. ऐसे  में टीम से मैदान में अच्छे प्रदर्शन की उम्मीद भला कैसे की जा सकती है.  विष्वकप में शर्मनाक षिकस्त के बाद ब्रासा ने बहानेबाजी बनाते हुए बयान  दिया कि भारतीय  खिलाड़ियों में अनुभव का अभाव था. जबकि हकीकत यह है कि टीम के आधा दर्जन  खिलाड़ी अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सौ से भी ज्यादा मैच खेल चुके हैं. विदेषी  कोच ब्रासा भारतीय खिलाड़ियों के बारे में कितना जानते हैं, इसका अंदाजा  उनके इसी बयान से लगाया जा सकता है. सरकार का हाॅकी को लेकर उदासीन रवैया  भी दुर्दशा के लिए जिम्मेदार है. पहले से ही करोड़पति क्रिकेटरों के ऊपर  वक्त-बेवक्त पैसे की  बारिश करने वाली सरकार को हाॅकी के खिलाड़ियों पर तरस नहीं आता. चूंकि  हाॅकी में क्रिकेट की तरह ग्लैमर नहीं है, इसलिए सरकार भी उससे दूर ही रहती  है.</p>
<p>वैसे, इस बार विश्वकप  भारत में ही हो रहा था, इसलिए कुछ उम्मीदें फिर भी बंध गई थी. टीवी पर  वीरेंद्र सहवाग, प्रियंका  और राज्यवर्धन राठौर जैसी ग्लैमर  शख्सियतें विश्वकप में भारतीय टीम  को समर्थन देनें की बात कहते नजर आती थी. लेकिन अफसोस कि इससे कुछ नहीं  हुआ. कड़वी हकीकत यह है कि भारतीय हॉकी अभी भी रसातल में है. उसे फिर से  जिंदा करने के लिए प्रियंका चैपड़ा और वीरेंद्र सहवाग को जोड़ने से बात  नहीं बनने वाली, बल्कि इसके लिए जमीनी स्तर पर जरूरी कदम उठाने होंगे.  अफसोस कि ऐसा दूर-दूर तक होता दिखाई नहीं होता.</p>
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		<title>इरफान कमाल के साथ खास मुलाकात</title>
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		<pubDate>Wed, 03 Mar 2010 17:34:21 +0000</pubDate>
		<dc:creator>पुष्पेन्द्र आल्बे</dc:creator>
				<category><![CDATA[सिनेमा-संसार]]></category>
		<category><![CDATA[bollywood]]></category>
		<category><![CDATA[cinema]]></category>
		<category><![CDATA[film]]></category>
		<category><![CDATA[film-tv]]></category>
		<category><![CDATA[खास मुलाकात]]></category>
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		<category><![CDATA[फिल्म तकनीक]]></category>
		<category><![CDATA[सिनेमा]]></category>

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		<description><![CDATA[मुंबइयां इंडस्ट्री के फार्मूलों और तौर-तरीकों को उन्होंने बेहद करीब से देखा है. इकतालीस वर्षीय इरफान कमाल के पिता अपने जमाने के शीर्ष कोरियोग्राफर थे, जिन्होंने मनमोहन देसाई और बी. सुभाष जैसे फार्मूला फिल्मों के दिग्गज फिल्मकारों के साथ काम ]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>मुंबइयां इंडस्ट्री के फार्मूलों और तौर-तरीकों को उन्होंने बेहद करीब से देखा है. इकतालीस वर्षीय इरफान कमाल के पिता अपने जमाने के शीर्ष कोरियोग्राफर थे, जिन्होंने मनमोहन देसाई और बी. सुभाष जैसे फार्मूला फिल्मों के दिग्गज फिल्मकारों के साथ काम किया. बावजूद इसके उनकी पहली फिल्म यथार्थवादी कहानी कहती है. उनकी पहली फिल्म थैंक्स मां 5 मार्च को देश भर  में रिलीज होेने जा रही है.  प्रस्तुत है इंडस्ट्री में ताजगी भरा पदार्पण करने वाले इरफान कमाल से पुष्पेंद्र आल्बे की बातचीत के संपादित अंश.<img src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2010/03/Irfan-Kamal-with-Shams-Patel-300x199.jpg" alt="" title="Irfan Kamal with Shams Patel" width="300" height="199" class="alignright size-medium wp-image-1885" /></p>
<p><strong>कुछ अपने बारे में बताएं ?</strong></p>
<p>मेरा जन्म मुंबई में हुआ. मेरे पिताजी अपने जमाने के प्रख्यात कोरियाग्राफर थे, जिन्होंने अमर अकबर एंथोनी, कुली और डिस्को डांसर जैसी सुपरहिट फिल्मों में कोरियोग्राफी की. इसी के चलते फिल्म इंडस्ट्री के साथ मेरा रिश्ता बचपन में ही मजबूत हो गया था. जाहिर है,स्वाभाविक तौर पर मुझे इसे करियर के तौर पर अपनाना ही था.<br />
<strong><br />
फिर भी बॉलीवुड में आपके शुरुआती साल बतौर अभिनेता के रहे ?</strong></p>
<p>असल में, इसके पीछे इंडस्ट्री में दाखिल होने की मेरी छटपटाहट थी. मैं किसी भी कीमत पर फिल्म इंडस्ट्री का हिस्सा बनना चाहता था. इसी के मद्देनजर मैंने अंगारे, अपने दम पर जैसी फिल्मों में छोटी भूमिकाएं कीं. इन फिल्मों से बतौर अभिनेता तो मुझे कोई खास फायदा नहीं हुआ, लेकिन इस काम ने मुझे आत्मविश्वास दिया. मुझमें इस बात का यकीन आया कि मैं भी इंडस्ट्री में अपनी छाप छोड़ सकता हूं. </p>
<p><strong>अभिनेता से निर्देशक बनने तक का सफर आसान तो नहीं रहा होगा ?</strong></p>
<p>बेशक. मुझे भी संघर्ष के लंबे दौर से गुजरना पड़ा. लेकिन इस दौरान मैंने कभी भी हौसला नहीं खोया. बतौर अभिनेता कुछेक फिल्मों में नजर आने के बाद मुझे अंदाजा हो गया था कि मेरी मंजिल अभिनेता बनना नहीं, बल्कि निर्देशक बनना है. </p>
<p><strong>तो फिर आपने यह लक्ष्य कैसे हासिल किया ?</strong></p>
<p>मैं क्वांटम फिल्म कंपनी के साथ जुड़ा. उनके साथ मिलकर मैंने 2007 में पहली फिल्म बनाई. फिल्म का नाम था- लेडी गोडीवा: बेक इन द सीड्स. इसके साथ ही एक अन्य फिल्म में क्रिएटिव डायरेक्टर की भूमिका भी निभाई. और अब बतौर निर्देशक मेरी पहली फिल्म थैंक्स मां रिलीज होने जा रही है. </p>
<p><strong>पहली फिल्म के लिए ही आपने जोखिम भरा विषय चुना.नाकामयाबी का डर नहीं लगा ?</strong></p>
<p>मैं काम करने में यकीन करता हूं, नतीजे की उम्मीद नहीं करता. जब मुझे लावारिस बच्चों की कहानी पसंद आई, तो मैंने तय कर लिया था कि यही मेरी पहली फिल्म होगी. बेशक फिल्म में इंडस्ट्री के बड़े सितारे नहीं है, लेकिन एक दिल को छू जाने वाली कहानी है. और मेरा हमेशा से मानना रहा है कि एक अच्छी कहानी को दर्शक हमेशा पसंद करते हैं. </p>
<p><strong>&#8221; थैंक्स मां &#8220;की कहानी के बारे में कुछ बताएं ?<br />
</strong><br />
दरअसल, इस फिल्म का विचार मेरे दिमाग में तब आया, जब  मैं एक दिन अपने घर से आॅफिस की ओर आ रहा था. रास्ते में ट्रॅाफिक के चलते एक जगह कार रोकी, तो सड़क के किनारे मुझे लावारिस बच्चे कचरा बीनते नजर आए.ं बस यहीं से मेरी फिल्म की कहानी मिल गई. इसके बाद मैंनें इस कहानी को क्वांटम फिल्म्स के अपने साथियों को बताया और इस तरह फिल्म अस्तित्व में आई.</p>
<p><strong>बॉलीवुड में आजकल मसाला फिल्मों का दौर है, लेकिन आपने पहली ही फिल्म में संवेदनशील और लीक से हटकर कहानी कहने का जोखिम उठाया ?<br />
</strong><br />
मैं मसाला और कलात्मक फिल्मों के इस अंतर को नहीं मानता. मेरे विचार से कोई भी कहानी कलात्मक या मसाला नहीं होती, बस उसे पर्दे पर पेश उस तरह से किया जाता है. सभी कहानियां दिलचस्प होती है. यह पूरी तरह से निर्देशक  के ऊपर होता है कि वह उस कहानी को किस तरह प्रस्तुत करता है. इसलिए पहली फिल्म के लिए इस तरह का विषय चुनते हुए मुझे कोई हिचकिचाहट नहीं हुई. मेरा मानना है कि संवेदनशील  और अच्छी कहानी वाली फिल्मों को दर्शक हमेशा  पसंद करते हैं. और फिर, लावारिस बच्चों की समस्या हमारे देश  की एक प्रमुख समस्या है.</p>
<p><strong>इस बारे में जरा और विस्तार से बताईए ?</strong></p>
<p>असल में, लावारिस बच्चों की समस्या हमारे देष की सबसे गंभीर समस्याओं में से एक है. यह अलग बात है कि मीडिया इस समस्या की ओर कोई ध्यान नहीं देता. न ही सरकार इस समस्या को सुलझाने के लिए कोई गंभीर प्रयास करती है. जबकि हकीकत यह है कि रोजाना 270 से भी ज्यादा मासूम बच्चें लावारिस जिंदगी गुजारने के लिए छोड़ दिए जाते हैं. यह आंकड़ा मुझे अपनी कहानी के लिए कुछ स्वयंसेवी संस्थाओं के साथ वक्त बिताने के दौरान पता चला. दुखद बात यह है  कि इतनी बड़ी तादाद में बच्चें सिर्फ गरीबी के चलते ही नहीं छोड़े  जाते, बल्कि सामाजिक और पारिवारिक स्तर पर बेईज्जती से बचने के लिए भी माएं इस तरह के कदम उठाने को मजबूर हो जाती है. इसी के चलते यह एक जटिल समस्या बन गई है.</p>
<p><strong>तो फिर आपकी फिल्म की कहानी क्या हैं?<br />
</strong><br />
यह एक ऐसे बारह वर्षीय बच्चें की कहानी है, जो मुंबई के फुटपाथ पर अपने दोस्तों के साथ लावारिस जिंदगी जीता है. एक दिन उसे दो दिन की मासूम बच्ची लावारिस अवस्था में मिलती है. इसके बाद वह बच्चा अपने दोस्तों के साथ मिलकर न सिर्फ उसे संभालने का जिम्मा उठाता है, बल्कि उसे उसकी मां तक पहुंचाने की कसम भी खाता है. फिल्म के आखिर में वह अपने मकसद में कामयाब होता है, लेकिन इस बीच उसे दुनिया की हकीकत पता चलती है. नतीजतन, मां को लेकर उस लावारिस बच्चें ने अपने मन-मंदिर में जो छवि बना रखी थी, वह पूरी तरह चकनाचूर हो जाती है.</p>
<p><strong>फिल्म के कलाकारों के बारे में बताइए?</strong></p>
<p>मेरे भतीजे शेम्स पटेल ने फिल्म के बारह वर्षीय नायक की भूमिका निभाई है. इसके अलावा, बाकी सभी बाल-कलाकार हमनें मुंबई की झुग्गी-बस्तियों से ही लिए हैं. इसके लिए कईं महीनें तक तीन सौ से भी ज्यादा बच्चों का टेस्ट लिया गया, जिसमें से आखिर में चार बच्चें चुने. शेम्स पटेल को फिल्म में बेहतरीन भूमिका के लिए हाल ही में देश के सर्वोच्च राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया गया, जो कि हमारे लिए बेहद गर्व की बात है. इससे हमारा उत्साह कईं गुना बढ़ गया है. </p>
<p><strong>फिल्म अंतरराष्ट्रीय महोत्सवों में भी खूब तारीफें  बटोर चुकी हैं! </strong></p>
<p>हां, यह मेरे लिए गर्व की बात है कि मेरी फिल्म ने भारतीय सिनेमा को विश्व स्तर पर तारीपफें दिलाईं. हमारी फिल्म को एडिनबर्ग और कान्स महोत्सव में खूब पसंद किया गया. अब भारतीय दर्शकों की बारी है. मुझे उम्मीद है कि वे भी मेरी फिल्म की संवेदनशनील कहानी को पसंद करेंगे. देष में भी हमारी फिल्म की तुलना स्लमडाग मिलियनेयर से की जा रही है. </p>
<p><strong>&#8221; थैंक्स मां &#8220;के बाद अगली फिल्म?</strong></p>
<p>पहले तो मैं चाहूंगा कि मेरी फिल्म टिकट खिड़की पर भी कामयाब रहे. इससे मुझे अपनी अगली फिल्म के लिए संसाधन जुटाने में मदद मिलेगी. वैसे मेरी अगली फिल्म एक प्रेम कहानी होगी. वह मसाला फिल्म तो होगी, लेकिन फिर भी मुंबइयां फिल्मों से हटकर होगी.</p>
<p>-</p>
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