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	<title>JANOKTI : जनोक्ति :  राज-समाज और जन की आवाज &#187; पहचान की तलाश</title>
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		<title>उत्साह, उम्मीद और उर्जा का पर्याय है &#8220;युवा&#8221;</title>
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		<pubDate>Tue, 19 Jan 2010 16:27:23 +0000</pubDate>
		<dc:creator>सुन्दरम आनंद</dc:creator>
				<category><![CDATA[युवा]]></category>
		<category><![CDATA[आत्मविश्वास]]></category>
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		<description><![CDATA[। वास्तव में युवा शब्द एक खास आयु वर्ग को घोतक मात्र नहीं बल्कि अपने आप में उत्साह, उम्मीद और उर्जा का पर्याय हैं किसी बड़े या कठिन काम को करने के लिए इन तीन तत्वों का समुचित संतुलन लाज़िमी ]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p> <img src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2010/01/youth-of-india.jpg" alt="" title="youth of india" width="300" height="300" class="alignnone size-full wp-image-1382" />।<br />
वास्तव में युवा शब्द एक खास आयु वर्ग को घोतक मात्र नहीं बल्कि अपने आप में उत्साह, उम्मीद और उर्जा का पर्याय हैं किसी बड़े या कठिन काम को करने के लिए इन तीन तत्वों का समुचित संतुलन लाज़िमी इनके साथ एक विडंबना भी है कि ये द्विआयामी होते हैं, जिसका एक हिस्सा तो रचनात्मक होता है पर वही दूसरा पहलू विध्वंसक भी होता है। यानी उत्साह, उम्मीद और उर्जा सही सोच के साथ सही समय पर एकत्रित हों तो आशातीत सफलता को जन्म देते हैं, पर अगर यही गलत मोड़ ले ले तो दुःखद परिणाम सामने लाता है। कहने का अर्थ है कि उम्र का यह दौर बड़ी संकरी गलियों से होकर गुजरता हैं, जिसके एक तरफ सफलता है, यश है तो वही दूसरी ओर गुमनामी और असफलता है और बीच का फासला बस एक कदम का। आज के दौर में युवा एक मनोवैज्ञानिक शब्द बन चला है, यह एक सोच है, जिसमें व्यक्ति हर जोखिम का सामना करने के जज़्बे से लवरेज कुछ भी कर गुजरता हो, बस जरूरत है सही दिशा को चुनने की। अब सवाल उठता है कि सही दिशा का चुनाव कैसे हो? इसके लिए कई कारक जिम्मेदार हैं, मसलन, हमारा आत्मविश्वास, हमारा परिवेश और हमारी योग्यता। इनका सही जुड़ाव हमें फर्श से अर्श तक पहुचा सकता हैं। अगर गौर किया जाए तो आत्म विश्वास और परिवेश कुछ हद तक एक दूसरे से जुड़े होते है। स्वस्थ परिवेश में पला-बढ़ा एक आदमी आत्मविश्वासी का धनी होता है और इसके विपरीत आत्मविश्वास से परिपूर्ण व्यक्ति अपने इर्द-गिर्द एक स्वस्थ परिवेश गढ़ सकता हैं। अब अगर योग्यता की बात करें तो यह प्रतिभा, परिश्रम और शिक्षा का मिश्रित रूप होता हैं<br />
आज भूमंडलीकरण के इस दौर में युवाओं को सफलता की मनचाही उड़ान भरने के लिए खुला आसमान सामने हैं, जहां नित नई बुलंदियों को छूने का अवसर है पर वहीं प्रतिस्पर्धाओ  की गलाकाट जंग भी है। इंसानी जिन्दगी ने तरक्की की रफ्तार तो पकड़ ली है, पर हमसे सुस्ताने वाले फुर्सत के चंद लम्हे भी छीन लिये है। जागते हुए सोना और सोते हुए भी जागना आज की जीवन शैली हैं आम जिन्दगी के रास्ते इतने जद्दो जहद भरे हैं कि कदम-कदम पर रूकावटें हैं, बस खाली है तो सफलता की उंचाई वाली जगह, जिसे मापने का कोई पैमाना तो नहीं पर पाने का रसायनिक सूत्र है- अदम्य उत्साह, आत्मविश्वास और आवश्यक कौशल का सार्थक सम्मिश्रण या संक्षेप में कहे तो ‘युवा’। </p>
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		<title>तलाश पहचान की</title>
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		<pubDate>Sat, 14 Nov 2009 14:26:50 +0000</pubDate>
		<dc:creator>अभिषेक कुमार सिंह</dc:creator>
				<category><![CDATA[युवा]]></category>
		<category><![CDATA[पहचान की तलाश]]></category>
		<category><![CDATA[समाज और युवा]]></category>
		<category><![CDATA[हिंसक विचार]]></category>

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		<description><![CDATA[हर साल की तरह इस साल भी तालिमी मेला आया और हमारे कुछ यादों को हमारे दिलों में छोड़ गया। ये यादे हमें कब तक याद रहेंगी ये तो कहा नहीं जा सकता है। मगर इन यादों के ख़जाने में ]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;">
	<a href="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2009/11/SuperStock_1444R-261041.jpg"><img alt="SuperStock_1444R-261041" class="aligncenter size-medium wp-image-1096" height="300" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2009/11/SuperStock_1444R-261041-199x300.jpg" title="SuperStock_1444R-261041" width="199" /></a></p>
<p style="text-align: justify;">हर साल की तरह इस साल भी तालिमी मेला आया और हमारे कुछ यादों को हमारे दिलों में छोड़ गया। ये यादे हमें कब तक याद रहेंगी ये तो कहा नहीं जा सकता है। मगर इन यादों के ख़जाने में एक ऐसी घटना है जो शायद ही कभी भुलाई जा सके। वो घटना कुछ इस प्रकार है कि विश्वविद्यालय के प्रांगण में विश्वविद्यालय का एक पूर्व छात्र अहसान (काल्पनिक नाम) आता है और कहता है&nbsp; &quot;जामिया वाले मुझे भुलना चाहते हैं मगर मैं इन्हें खुद को भुलाने नहीं दुँगा&rsquo;&rsquo; और वो तीनचार हवाई फायर करता है। यह घटना अपने आप में एक अद्भुत घटना है। मगर इस घटना का कारण हमारे समाज के युवाओं के एक बहुत बड़ी सच्चाई को हमारे समक्ष प्रस्तुत करता है। और हमें यह सोचने पर मजबूर करता है कि आख़िर इसका जिम्मेदार कौन है? आमिर खान की बहुचर्चित फिल्म &rsquo;&rsquo;रंग दे बसंती&rsquo;&rsquo;में उन्होंने एक डायलॉग दिया कि यूनिवसर्टी के इस गेट के अंदर डीजे की एक औकात है। सब कहते हैं डीजे में कुछ बात है, डीजे कुछ करेगा। मगर इस गेट के बाहर न जाने कितने डीजे पीस गए है दुनिया की भीड़ में।&rsquo;&rsquo; । फिल्म में जितना प्रासंगिक ये बात थी ठीक उतनी ये आज पूरे विश्व के लिए है। कॉलेज गेट के अंदर अपने गु्रप के अंदर हर लड़के की एक पहचान होती है। मगर वहीं लड़का जब कॉलेज गेट को पार करके इस दुनिया की भीड़ में आता है और मगर वो इस भीड़ में अपनी एक पहचान कायम नहीं कर पाता है तो उसके अंदर ही अंदर एक विदु्रप जन्म लेने लगता है। ऐसी स्थिति में वह या तो&nbsp; खुद को नुकसान पहुँचा लेता हैं या फिर उस जगह वापस पहुँच जाता है। जहाँ उसकी पहचान थी। अगर विज्ञान के आधार पर देखे तो वैज्ञानिकों का मानना है कि कुद लड़के अपनी छवि को लेकर कुछ ज्यादा संवेदनशील होता&nbsp; हैं, या उन्हें अपनी एक अलग पहचान चाहिए होती है। और अगर ऐसा नहीं हो पाता है तो वे हिसंक हो जाते हैं। इसे हम असामान्य व्यवहार कहा जा सकता है। यह कहानी सिर्फ उस अहसान की ही नहीं है बल्कि हमारे जैसे उन हजारों &#8211; लाखों लोगों की है जो अपनी पहचान बनाने के लिए इस दुनिया से जद्दोजहद कर रहे हैं। यह घटना हमारे लिए सिर्फ घटना ही नहीं बन पाई क्योंकि मैं भी अहसान से खुद को जुड़ा हुआ महसूस करता हूँ। बहरहाल अब इन बातों को छोड़कर हमें इस बात की दुआ करनी चाहिए की अहसान इस भीड़ में खोने की बजाय अपनी एक पहचान बना पाएं। </p>
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