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अब युद्ध छेड़ना होगा

अब युद्ध छेड़ना होगा

0 विजय कुमार / 2010/08/10 11:02 pm

” संघर्ष, मुठभेड़ और युद्ध “ सामान्य रूप से ये तीनों शब्द लगभग एक से लगते हैं; पर इनमें बड़ा अंतर है। ये अलग-अलग संदर्भ में प्रयोग होते हैं और इसीलिए

आतंरिक सुरक्षा का प्रश्न

आतंरिक सुरक्षा का प्रश्न

3 पुष्पेन्द्र आल्बे / 2010/03/14 6:53 pm

पिछले कुछ समय में नक्सलियों ने देश के अलग-अलग हिस्सों में हिंसक कार्रवाई करके केंद्र की यूपीए सरकार के सामने एक बड़ी चुनौती प्रस्तुत की है. साथ ही इससे यह

नक्सल-वार्ता का औचित्य

नक्सल-वार्ता का औचित्य

1 सुमित श्रीवास्तव / 2010/03/07 11:32 pm

नक्सलियों के खतरनाक इरादों का जैसा उल्लेख केंद्रीय गृहसचिव ने किया उससे यह साफ हो जाता है कि अभी तक एक बड़े खतरे की जानबूझकर अनदेखी की जा रही थी।

हे नपुंसक प्रतिनिधियों के जन्मदाता अर्थात मतदाता

हे नपुंसक प्रतिनिधियों के जन्मदाता अर्थात मतदाता

4 जयराम "विप्लव" / 2009/12/12 9:10 pm

   लद्दाख के सीमावर्ती गाँव चुशूल (समुद्र तल से चौदह हजार दो सौ तीस फीट की ऊंचाई ) के पास का रजान्गला दर्रे का युद्ध संसार के सर्वाधिक असाधारण और

भारतीय सीमा में चीनी घुसपैठ : एक विमर्श..!

1 जनोक्ति डेस्क / 2009/11/23 7:43 pm

देशों के पारस्परिक सम्बन्ध, व्यक्तियों के पारस्परिक सम्बन्धों से बहुत भिन्न नही होते. जवाबदेही का अंतर होता है. प्राथमिक उद्देश्य अवसर की निरंतरता व सुरक्षा ही होती है. मिले अवसरों का युक्तिसंगत प्रयोग , देश की घरेलू मशीनरी की जिम्मेदारी होती है और सुरक्षा की जिम्मेदारी पारस्परिक व सामूहिक होती है. अभी चीन से लगे सीमाओं पर जो उपद्रव व शोर हो रहा है, एक विचारणीय मसला है. कुछ जरूरी सवाल है, चीन ऐसा क्यों कर रहा है..?

पड़ोसियों को लेकर आँख-कान खुले रखे भारत

पड़ोसियों को लेकर आँख-कान खुले रखे भारत

0 सुन्दरम आनंद / 2009/11/06 4:29 pm

किसी भी राष्ट्र की संप्रभुता और समृद्धि के स्थायित्व में उसके पड़ोसियों का अप्रत्यक्ष ही सही लेकिन महत्वपूर्ण योगदान होता है . क्योंकि पड़ोसी देश का सहयोगात्मक रवैया एक राष्ट्र

भारत में सशस्त्र का सपना पूरा नहीं हो सकता

0 संजय द्विवेदी / 2009/11/03 9:20 pm

देश के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने जब 15 सितंबर,2009 को दिल्ली में पुलिस अधिकारियों के सम्मेलन में नक्सलवाद को देश का सबसे बड़ा खतरा बताया तो वे कुछ नयी बात नहीं कह रहे थे। इसके पहले भी देश के गृहमंत्री और कई नक्सल प्रभवित राज्यों के मुख्यमंत्री यह बात कहते आए हैं। बावजूद इसके हमारी सरकारें न जाने क्यों नक्सलवाद के खिलाफ एक समन्वित और परिणाम केंद्रित अभियान छेड़ने में असफल साबित हो रही हैं। नक्सली देश में हिंसक अभियान चला रहे हैं निरीह जनता को अपना निशाना बना रहे हैं पर देश का गरीब, आदिवासी तबका अपने नेताओं की राजनीतिक इच्छाशक्ति के इंतजार में खड़ा है।

नक्सलवाद का सच क्या है ?

2 डॉ०मधु लोमेश / 2009/11/02 1:32 pm

नक्सल आतंकवाद ,माओवादी हिंसा की घटनाएँ जो कभी छिट-पुट रूप में दिखाई देती थी आज तकरीबन देश के बीस राज्यों में पैर पसारे दिख रही है .राजनीतिक गलियारों में भले हीं इसे किसी आतंकवाद के सदृश घोषित कर दिया हो पर आम जनता इस सत्य को जान चुकी है कि वास्तव में ऐसी घटनाएँ सरकारी तंत्र की विफलता ,अव्यवस्था , भ्रष्टाचार ,सरकारी धन के दुरूपयोग , नीतियों के सही क्रियान्वयन ना होने से उत्पन्न आक्रोश ,असंतोष की ही परिचायक है जिसे हम सब जज्ब किये बैठे हैं . उनके हिंसक प्रदर्शनों ,हमलों पर रोक -थाम के लिए आवश्यक है कि सरकार अपनी कथनी और करनी के अंतर की समीक्षा करे .नक्सल प्रभावित संवेदनशील इलाकों में अंतर्विरोधों को समाप्त करने की पहल करें . रोटी ,कपडा ,मकान ,रोजगार समंधी ठोस कदम उठाये ना कि बल पूर्वक नाक्साली आन्दोलन को कुचलते हुए उन्हें अधिक उग्र बनने पर विवश करे

स्वतः प्राप्त हे पार्थ ! खुले यह,स्वर्ग-द्वार के जैसा।

1 जनोक्ति डेस्क / 2009/11/01 7:46 pm

  सम्पूर्ण विश्व ने सदियों से भारत पर लगातार आक्रमण किए हैं किंतु मुख्यतः मुग़ल और ब्रिटिश लोगो को ही अधिक सफलता मिली है। मुग़ल और ब्रिटिश लोग भी इस

सर्वांगीण विकास हीं नक्सलवाद को ख़त्म कर सकता है

सर्वांगीण विकास हीं नक्सलवाद को ख़त्म कर सकता है

1 जनोक्ति डेस्क / 2009/10/14 6:29 am

नक्सलवाद पर आज व्यापक बहस की जरुरत है . इसी विचार से विमर्श के इस स्तम्भ में पत्रकारिता के छात्र प्रणव का यह आलेख प्रस्तुत है :- नक्सलवाद और नक्सली