माओवाद की राजधानी ‘मनातू’ जहाँ सांसद भी जाने से डरते हैं |
2जनोक्ति की टीम झारखण्ड में माओवाद की जमीन तलाशने के लिए राजधानी रांची से होते हुए पलामू ( डाल्टेनगंज ) पहुंची | पलामू की जमीन पर कदम रखने से पहले
भाकपा (माओवादी) हिंसा में विश्वास रखने वाले तथाकथित कम्युनिस्टों का एक संगठन है जिन्होंने बंगाल के नक्सलबाड़ी गांव से 1967 में सशस्त्र क्रांतिकारी गतिविधियों का रास्ता अपनाया | आज भारत
निशा दास की रिपोर्ट रांची से झारखंड में नक्सल समस्या एक जटिल समस्या बनी हुई है। लंबे समय से इस जंजाल से निकलने का यहां के राजनेताओं के साथ -साथ नौकरशाहों
मेरे मन में एक प्रश्न बार-बार उठता है कि भारत में कितने ऐसे “राहुल” होंगे जिनके आगे “गाँधी” नहीं लगा होगा ? वो क्या करते होंगे ? बेरोजगार नहीं होंगे
जनोक्ति की टीम झारखण्ड में माओवाद की जमीन तलाशने के लिए राजधानी रांची से होते हुए पलामू ( डाल्टेनगंज ) पहुंची | पलामू की जमीन पर कदम रखने से पहले
भाकपा (माओवादी) हिंसा में विश्वास रखने वाले तथाकथित कम्युनिस्टों का एक संगठन है जिन्होंने बंगाल के नक्सलबाड़ी गांव से 1967 में सशस्त्र क्रांतिकारी गतिविधियों का रास्ता अपनाया | आज भारत
निशा दास की रिपोर्ट रांची से झारखंड में नक्सल समस्या एक जटिल समस्या बनी हुई है। लंबे समय से इस जंजाल से निकलने का यहां के राजनेताओं के साथ -साथ नौकरशाहों
मेरे मन में एक प्रश्न बार-बार उठता है कि भारत में कितने ऐसे “राहुल” होंगे जिनके आगे “गाँधी” नहीं लगा होगा ? वो क्या करते होंगे ? बेरोजगार नहीं होंगे
हाल ही में कैम्ब्रिज विवि में एक व्याख्यान के दौरान प्रकाश करात ने माना कि “भारत के वामपंथी” देश में होने वाले आर्थिक बदलावों को समझने में असफ़ल रहे तथा
मुरारी सिंह कंडारी 1947 से 1975 तक बिहार में कांग्रेस की सत्ता रही, इसी बीच दलितों को सरकारी जमीन के पट्रेट तो दिए गए पर उस जमीन पर कोई दलित
सुनिए जरा पाकिस्तान की छात्राएं भारत-पाक संबंधों के बारे में क्या सोचती हैं
आतंकियों के परिवार को हर संभव मदद का निर्णय करने वाली मनमोहन की खडाऊं सरकार इसे मानवता का नाम दे रही है | तो फ़िर क्या मानवता के नाते सिर्फ
आखिर राहुल- महिमामंडन में कांग्रेस पार्टी इस प्रकार क्यूँ जुटी है ? क्या कांग्रेस को यह डर हो गया है कि राहुल कि लोकप्रियता में जबरदस्त कमी आयी है |