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	<title>JANOKTI : जनोक्ति :  राज-समाज और जन की आवाज &#187; जेपी आंदोलन</title>
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		<title>लोकनायक के ऐतिहासिक पत्र-4</title>
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		<pubDate>Thu, 07 Oct 2010 09:54:49 +0000</pubDate>
		<dc:creator>जनोक्ति डेस्क</dc:creator>
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		<description><![CDATA[समाजवाद से सर्वोदय की ओर यहां तक मैं बडे़ मैत्रीपूर्ण वातावारण में जिसकी स्मृति मेरे शेषजीवन को बराबर मिठास देती रहेगी, पार्टी के अपने साथियों के साथ काम करता रहा। किन्तु कुछ वर्ष पहले मेरे रास्ते में एक मोड़ आया ]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><strong><a href="http://www.janokti.com/%E0%A4%A6%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A4%BE%E0%A4%B5%E0%A5%87%E0%A4%9C%E0%A4%BC-file-stories/%E0%A4%B2%E0%A5%8B%E0%A4%95%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%AF%E0%A4%95-%E0%A4%95%E0%A5%87-%E0%A4%90%E0%A4%A4%E0%A4%BF%E0%A4%B9%E0%A4%BE%E0%A4%B8%E0%A4%BF%E0%A4%95-%E0%A4%AA%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0-3/">समाजवाद से सर्वोदय की ओर</a></strong></p>
<p style="text-align: justify;"><a rel="attachment wp-att-8472" href="http://www.janokti.com/%e0%a4%a6%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%a4%e0%a4%be%e0%a4%b5%e0%a5%87%e0%a4%9c%e0%a4%bc-file-stories/%e0%a4%b2%e0%a5%8b%e0%a4%95%e0%a4%a8%e0%a4%be%e0%a4%af%e0%a4%95-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%90%e0%a4%a4%e0%a4%bf%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%b8%e0%a4%bf%e0%a4%95-%e0%a4%aa%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0-4/attachment/jayaprakash-narayan-morarji-desai/"><img class="alignright size-full wp-image-8472" title="Jayaprakash Narayan-Morarji Desai" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/Jayaprakash-Narayan-Morarji-Desai.jpg" alt="" width="388" height="394" /></a>यहां तक मैं बडे़ मैत्रीपूर्ण वातावारण में जिसकी स्मृति मेरे शेषजीवन को बराबर मिठास देती रहेगी, पार्टी के अपने साथियों के साथ काम करता रहा। किन्तु कुछ वर्ष पहले मेरे रास्ते में एक मोड़ आया और हमारा साथ छूट गया। अलग होने की यह ़िक्रया तो, दर्पोक्ति में जिसे जीवन-दान कहते हैं, उसी से आरम्भ हो गयी थी। मेरे लिए जीवनदान का अर्थ दल और सत्ता की राजनीति छोड़कर अपने शेष जीवन को भूदान और सर्वोदय आन्दोलन में लगाने के निर्णय से अधिक कुछ नहीं था।</p>
<p style="text-align: justify;">स्वतंत्रता, समानता और बन्धुत्व की वही पुरानी ज्योति, जिसने मेरे जीवन का रास्ता प्रशस्त किया था और जो मुझे लोकतांत्रिक समाजवाद की ओर लायी थी, सड़क के इस मोड़ पर मुझे आगे बढ़ा लायी। मुझे विद्यमान थे, इस स्थल पर नहीं पहुंच सका। फिर भी कुछ वर्ष पूर्व मुझे विश्वास हो गया कि हमारा आज का समाजवाद मानव-जाति को स्वतंत्रता, बन्धुत्व, समानता, और शान्ति के उत्कृष्ट लक्ष्य तक नहीं ले जा सकता। इसमें संदेह नहीं कि समाजवाद किसी भी प्रतिस्पर्धी सामाजिक तत्वज्ञान की अपेक्षा मानव-जाति को उन लक्ष्यों के अधिक निकट ले जाने का आश्वासन देता है। किन्तु मुझे विश्वास हो गया है कि जब तक समाजवाद सर्वोदय में रूपान्तरित नहीं हो जाता, वे लक्ष्य इसकी पहुंच के बाहर रहेंगे और जिस प्रकार हम आजादी के आनन्द से वंचित रह गये, वैसे ही आनेवाली पीढ़ियों को समाजवाद से वंचित रहना पड़ सकता है।</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;"><strong><a href="http://www.janokti.com/tag/jayprakash-narayan/">भौतिकवाद और अच्छाई</a></strong></p>
<p style="text-align: justify;">मैं जब पूना में तीन सप्ताह का उपवास कर रहा था, उसी समय यद्यपि राजनीति से नहीं, माक्र्सवाद से मेरा पूर्ण सम्बन्ध-विच्छेद हो गया। रूस का नृशंस हत्याओं के कारण शंकाओं की जो एक लम्बी प्रक्रिया आरम्भ हो गयी थी, अब उसका अन्त हो गया। यह साफ मालूम हो गया कि तात्विक दृष्टि से भौतिकवाद में न तो नैतिक व्यवहार के लिए कोई आधार है और न अच्छा बनने के लिए कोई प्रेरणा या अभिक्रम ही।</p>
<p style="text-align: justify;">मनुष्य उसकी चेतना शक्ति, समाज और संस्कृति-जिसका उसने निर्माण किया है-यदि ये सब भूत-द्रव्य की, फिर व</p>
<p style="text-align: justify;">71ृ	ह द्वन्द्वात्मक दृष्टि से चाहे कितना ही सक्रिय क्यों न हो, अभिव्यक्ति मात्र है, तो मैं नहीं समझता कि क्यों किसी व्यक्ति को अच्छा बनने अर्थात उदार, दयावान् और निःस्वार्थी बनने की कोशिश करनी चाहिए? तब किसी दुर्बल, दीन और दुःखी के प्रति किसी को सहानुभूति क्यों होनी चाहिए? मृत्यु के उपरान्त जो भूत-द्रव्य है, वह भूत-द्रव्य में विलीन हो जायगा। अतएव नैतिक व्यवहार के लिए उससे क्या प्रेरणा मिल सकती है? सत्ता या सम्पति की भोग-वासना या जनता से जयजयकार कराने अथवा अपने समकक्षियों से आदर पाने की आकांक्षा- उसके सामने काम करने के लिए ये ही प्रलोभन हो सकते हैं। किन्तु ऐसे प्रलोभनों का सही या गलत मूल्यांकन से काई सम्बंध नहीं रह सकता। नैतिक आदर्शों का निःसन्देह एक इतिहास है, उनका एक सामाजिक हेतु है। किन्तु जब मनुष्य अपने परम्परागत आचार-व्यवहार के सिद्धांन्तों में ही शंका करने लगता है और अपने से पूछता है कि मैं नैतिक नियमों के अनुसार आचरण क्यों करूं, तो भौतिकवाद के पास उसके लिए कोई जवाब नहीं मिलता। समाज-सेवा, त्याग, स्वतंत्रता, समानता और अन्य सब आदर्शों से पूछने लगे कि मैं इन आदर्शों को बिलकुल ही स्वीकार क्यों करूं और इनकी वजह से नाहक परेशानी और घाटा क्यों सहूं, तो भौतिकवादी तत्वज्ञान, द्वन्द्वात्मक या अन्यथा उसे कोई सन्तोषजनक उत्तर नहीं दे सकता। मैं यह नहीं कहता कि तात्विक भौतिकवादियों मे ऐसे  व्यक्तियों के उदाहरण नहीं हैं, जिनेंने उच्च आदर्शों के लिए महान् त्याग किये है। मैं इतना ही कहना चाहता हूं कि उनका वह कार्य उनके तत्वज्ञान से मेल नहीं खाता।</p>
<p style="text-align: justify;">इस संकट से मुक्त होने का एक रास्ता यह मान लेना हो सकता है कि मनुष्य एक यंत्र हैं, उसकी गतिविधि यथानिश्चित रहती है और उसे संकल्प स्वातंत्रय नहीं होता। यह मान लेने पर जरूर माक्र्स और लेनिन को दुनियाभर के शोषितों के लिए काम करने और कष्ट झेलने ही पड़ते। यंत्र बनाकर रखने को कभी तैयार होगा। कौन पहले आया, यह प्रश्न नहीं है। दरअसल बात यह है कि आज सृष्टि में जितने प्रकार हैं, उनका वर्णन जड़ या चेतन के रूप में हो सकता है। माक्र्सवाद की गलती यह कल्पना कर लेनी थी कि उसका आदि-कारण कुछ भी हो, चैतन्य का ज्ञान उसी तरह हो सकता है, जैसे जड़ का। उन्हें यह नहीं सूझा कि जड़ के नियम चैतन्य के क्षेत्र में लागू नहीं हो सकते।</p>
<p style="text-align: justify;">जड़ का अध्ययन एक वस्तु-आधारित अन्वेषण है, जब कि चैतन्य का अध्ययन है एक आन्तरिक अनुभूति। जड़ पदार्थ का अध्ययन यानी वस्तु आधारित अन्वेषण, संक्षेप में विज्ञान, लाजमी तौर पर नीति-निरपेक्ष माक्र्सवादियों और सामान्यतया भौतिकवादियों ने नैतिकता की बुनियाद ही खत्म कर दी है। इसमें शक नहीं कि वे क्रान्तिकारी नैतिक मूल्यों के बारे में बहुत बातें करते हैं, किन्तु वह ‘‘अपने उद्देश्य की पूर्ति के लिए कैसे भी साधनों का प्रयोग किया जाय’’ इस प्रमेय का, एक निकृष्ट प्रयोग मात्र है। एक बार किसी व्यक्ति ने सचाई के साथ या यों ही अपने मन को समझा लिया कि वह क्रान्ति के पक्ष में है अथवा एक दल या जनता के पक्ष में है, तो फिर वह कुछ भी बुरे कर्म करने के लिए स्वतंत्र हो जाता है।</p>
<p style="text-align: justify;">माक्र्सवादी और भौतिकवादी ही नहीं, बल्कि वे भी, जो तात्विक दृष्टि से उनसे मतभेद रखते है, चेतन शक्ति को विज्ञान के तरीकों से समझना चाहते है। इसलिए मनोविज्ञान भी नैतिक मूल्यों का कोई आधार नहीं हो सकता। विज्ञान के लिए भी चेतन-षक्ति को समझ पाना सम्भव नहीं हैं, क्योंकि वह एक अन्तरानुभूति की चीज है। अन्तरानुभूति अपने गुण के कारण ही भौतिक उपकरणों के द्वारा व्यक्त नहीं की जा सकती। इसलिए सारे वेदान्तियों या सूफियों और योगियों को, जिन्हें आत्मा की यथार्थता या पूर्णब्रह्म की अनुभूति थी, किसी भाषा में उसे व्यक्त करना सम्भव नहीं हुआ। जैसा कि रोजर गाडेल ने कहा हैः ‘‘तत्वज्ञानी अपने तत्व चिन्तन में मग्न रहता हैए सन्त या सूफी का जीवन ही उसका सदुपदेष होता है।’’</p>
<p style="text-align: justify;">आधुनिक विज्ञान एक ऐसे स्थल पर पहुंच गया है, जहां भूत-द्रव्य और चेतन-षक्ति का द्वैत इतना झीना पड़ गया है कि द्वैत मालूम ही नहीं होता। गोडल ने अपने लेख ‘समकालीन विज्ञान और योग का मुक्तिदायी अनुभव’ में कहा हैः</p>
<p style="text-align: justify;">‘‘किन्तु अब अकस्मात् क्वाण्टम मिकेनिक्स के मोड़ के आसपास वस्तु जगत के अन्वेषण ने भौतिक विज्ञान के तार्किकों को चिन्ताजनक स्थिति में डाल दिया है। उनके सम्मुख</p>
<p style="text-align: justify;">सृष्टि का एक अस्पष्ट और जटिल दृष्य है, जहां द्रष्टा और दृष्य ऐसे एकीभूत हो जाते हैं कि उन्हें अलग-अलग नहीं किया जा सकता। उनका सम्मुखीकरण इतना घनिष्ठ है कि प्रत्येक दूसरे में प्रतिबिम्बित होता है, किन्तु पृथक्करण या एकीभूत होने की शक्ति उनमें सही है।</p>
<p style="text-align: justify;">‘‘सन्दिग्धता के इस क्षेत्र में अनुभव पर आधारित हमारे पूर्व के सुपरिचित सब संकेत और सूत्र लुप्त हो जाते हैं। उर्जा और भूत ‘द्रव्य’ की भावनाओं में इतने गहन परिवर्तन या रूपान्तर की आवष्यकता है कि उनका मूल अर्थ ही नष्ट हो जायगा, उर्जा भूत ‘द्रव्य’ में संघनित हो जाती और भूत ‘द्रव्य’ भौतिकता से पृथक हो विकिरण में मिल जाता है। प्रकाष क्वाण्टम के संचारण से सम्बद्ध तरंगों के कालान्तर में संचारण के लिए किसी आधार की आवष्यकता नहीं रह जाती। वे न तो किसी तरल में, न किसी ठोस में और न किसी गैस में ही तरंगित या कम्पित होते हैं। सादृष्य के अयथार्थ सूत्र ही उसे जल के तल पर लहराते हुए तरंग हैं, चेतना के तरंग हैं, एक अमूर्त कार्य के वक्ररेखीय परिणमन हैं, जिन्हें हमारी चेतना या विचार-षक्ति दूर-दूर प्रक्षिप्त करती या भेजती है।</p>
<p style="text-align: justify;">विज्ञान इस द्वैत की पूर्ण व्याख्या नहीं कर सकता, क्योंकि किसी बाह्य पदार्थ के अध्ययन में द्रष्टा और दृष्य भिन्न रहेंगे ही, भले ही वे एक-दूसरे में खूब गुंथे हुए और हिले-मिले हों। केवल अन्तिम आध्यात्मिक अनुभूति में ही यह द्वैत नष्ट होता है, जब द्रष्टा एवं दृष्य एक हो जाते हैं।</p>
<p style="text-align: justify;">मनुष्य जब सृष्टि के समष्टिरूप को समझने या उसके साथ आत्म साक्षात्मकार करने का प्रयास करता है, तो नैतिक मूल्य पैदा होते हैं। इस समष्टि का जिसे अनुभव हो गया है, उसके लिए नैतिक मूल्यों के अनुसार आचरण करना उतना ही सहज और स्वाभाविक हो जाता है, जितना सांस लेना।</p>
<p style="text-align: justify;">कुछ लोगों को राजनीतिक और आर्थिक संघर्ष के सन्दर्भ में यह बात असंगत लग सकती है। मैं बड़ी नम्रता से उनके साथ अपनी असहमति प्रकट करता हूं। सारे कारोबार-व्यक्तिगत, सामाजिक, राजनैतिक, आर्थिक या दूसरे सबका एक समष्टिरूप होना चाहिए और इस समष्टि का केन्द्र बिन्दु होना चाहिए, जीवन का तत्वज्ञान।</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;"><strong><a href="http://www.janokti.com/tag/jayprakash-narayan/">आवष्यकताओं की परिसीमा और समाजवाद</a></strong></p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">इससे मेरा ध्यान एकदम सामाजिक और आर्थिक पुनर्निर्माण के उस पहलू की ओर खिंच जाता है, जिसकी समाजवादी और साम्यवादी दोनों ने उपेक्षा की है। समाजवादी और साम्यवादी दोनों का बहुत जोर भौतिक समृद्धि, उत्पादन की उत्तरोंत्तर वृद्धि और जीवन स्तर के अधिकाधिक उंचा उठाने पर रहता है। इससे इनकार नहीं किया जा सकता कि मनुष्य की भौतिक आवष्यकताओं की यथेचित पूर्ति होनी चाहिए। जब यह देखते हैं कि समाजवादी और साम्यवादी हमेषा गरीब और पद-दलितों की वकालत करते हैं, भौतिक उन्नति और सुख के उपर उनका जोर देना समझ में आता है। यह भी सत्य है कि भारत जैसे गरीब और पिछड़े हुए देष में सामाजिक पुनर्निर्माण का मुख्य काम ही जन-साधारण के जीवन स्तर को काफी उंचा उठाना है। किन्तु भौतिक समृद्धि को देवता-तुल्य बना देने और भौतिक पदार्थों की अक्षुण्ण भूख को शान्त करनेवाली जीवन-दृष्टि को प्रोत्साहित करने से न तो यहां काम चलेगा और न कहीं अन्यत्र ही। यदि लगातार वह भूख उनको सताती रही, तो न लोगों के दिल और दिमाग में शांति रहेगी और न एक दूसरे के बीच आपस में ही शान्ति रहेगी। उससे व्यक्तियों, दलों और राष्टों के बीच अवष्य ही एक अनियंत्रित स्पर्धा खड़ी हो जाएगी। प्रत्येक व्यक्ति अपने पड़ोसी से आगे बढ़ने की कोषिष करेगा और प्रत्येक राष्ट केवल दूसरे राष्टों को पकड़ने की ही नहीं, उन सबको पीछे छोड़ जाने की कोषिष करेगा। इस प्रकार के असन्तुष्ट समाज में हिंसा और युद्ध उसकी एक खासियत हो जाते है। जीवन के समस्त मूल्य ‘और चाहिए’, ‘और चाहिए’ की सर्वोपरि इच्छा के अधीन हो जायंगे। धर्म, कला, दर्षन, विज्ञान, सबकों ‘अधिक चाहिए’, और भी अधिक चाहिए’, जीवन के इस एक लक्ष्य की पूर्ति में लग जाना पड़ेगा। समता, स्वतंत्रता, बन्धुत्व सब-के-सबको भौतिकवाद की सार्वभौमिक बाढ़ में डूब जाने का खतरा पैदा हो जायगा। मानव-जीवन में कोई अन्य सहारा, कोई सच्चा सन्तोष नहीं रहेगा, क्योंकि जितना ही अधिक किसी के पास होता है, उतनी ही अधिक उसकी भूख बढ़ती है।</p>
<p style="text-align: justify;">मैं जानता हूं, काफी समाजवादी हो गये हैं और आज भी है, जो जीवन के शुद्ध भौतिकवादी दृष्टिकोण के खतरे से परिचित हैं। फिर भी समाजवाद का खास सम्पर्क जीवन के भौतिकवादी पहलुओं से था और है। समाजवादी या मजदूर दल और ट्रेड यूनियन लोगों को जीवन के सन्तुलित या पूर्ण स्वरूप का षिक्षण नहीं देते। यदि समाजवादी आन्दोलन मैं जिस मुद्दे को उठा रहा हूं, उसकी ओर ध्यान दे, तो विज्ञान, औद्योगीकरण और सामाजिक संगठन तथा अन्तर्राष्टीय सम्बन्ध, सबके बारे में उसका दृष्टिकोण क्रान्तिकारी हो जाय।</p>
<p style="text-align: justify;">नैतिक जीवन और मानवीय व्यक्तित्व के विकास तथा समस्त मानवीय गुणों ओर मुल्यों के फूलने-फलने के लिए शारीरिक क्षुधाओं पर नियंत्रण रखना अनिवार्य है। खास तौर से समावादी मूल्यों के सम्बंध में यह बात सही है। सबके सामान्य प्रयत्न से जो अच्छी चीजें उपलब्ध हों, उन्हें एक-दूसरे के साथ बांटकर खाने का तरीका ही समाजवादी जीवन-मार्ग है। जितनी ही स्वेच्छा और सहमति से बांट लेने का यह काम होता है, उतना ही समाज में कम तनाव और दबाव होगा और उतना ही अधिक समाजवाद उसमें होगा। मैं समझता हूं कि जब तक समाज के सदस्य अपनी आवष्यकताओं पर नियंत्रण रखना नहीं सीखते, स्वेच्छा से चीजों को बांट लेना यदि असंभव नहीं, तो कठिन अवष्य होगा। समाज निष्चय ही दो टुकड़ों में बंट जायगा। एक उन लोगों का, जो दूसरों को अनुषासित करने का प्रयत्न करते होंगे और दूसरा, बाकी बचे हुए सब लोगों का। समाज की इस प्रकार की व्यवस्था में एक प्रष्न हमेषा सामने रहता है, अनुषासित करनेवालों पर अनुषासन कौन रखेगा, राज्य करनेवालों पर राज्य कौन करेगा? साम्यवादी देषों के उदाहरण और समाजवादी सरकारों के अनुभव से यह प्रकट है कि इस नित्य प्रष्न का उत्तर देना बहुत ही कठिन है। इसका एक ही हल मालूम होता है और वह यह कि उपर से अनुषासन करने की आवष्यकता और उसके क्षेत्र को जितना अधिक-से-अधिक संभव हो, संकुचित और सीमाबद्ध किया जाय। यह हो सकेगा, इस बात का इतमिनान दिलाने पर कि समाज का प्रत्येक सदस्य आत्मानुषासन से कम करता है, समाजवादी मूल्यों के अनुरूप आचरण करता है और दूसरी चीजों के साथ-साथ अपने साथियों के बीच स्वेच्छापूर्वक बांट-बांटता और सहयोग करता है।</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;"><strong><a href="http://www.janokti.com/tag/jayprakash-narayan/">राजनीति और लोकनीति या दलीय और अदलयीय राजनीति</a></strong></p>
<p style="text-align: justify;">इससे मैं सर्वोदय और समाजवाद, दल और सत्ता से बंधी हुई राजनीति तथा दल और सत्ता से मुक्त राजनीति या राजनीति और जिसे विनोबा केवल ‘लोकनीति’ कहते हैं, इस समस्या की तह तक पहुंच गया।</p>
<p style="text-align: justify;">मैंने दल और सत्ता की राजनीति से अलग होने का निष्चय इसलिए नहीं किया कि मैं उससे उब गया या निराष हो गया था, बल्कि इसलिए किया कि मुझे यह स्पष्ट हो गया था कि राजनीति से काम नहीं बनेगा। उद्देष्य तो वही पुराना समता, स्वतंत्रता, बन्धुत्व और शान्ति की स्थापना है।</p>
<p style="text-align: justify;">किन्तु क्या राजनीति का कोई विकल्प है? क्या राज्य के माध्यम को छोड़कर समाज को बदलने और उसके पुनर्निर्माण का और भी कोई रास्ता हो सकता है? राजनीति केवल राज्य या सत्ता का विज्ञान है।</p>
<p style="text-align: justify;">एक विकल्प था। उसे महात्मा गांधी ने हमारे सामने रखा था। किन्तु मुझे स्वीकार करना चाहिए, वह मुझे स्पष्ट नहीं हुआ था। स्वतंत्रता की हमारी लड़ाई के समय गांधीजी ने सषस्त्र संघर्ष का एक विकल्प दिखाया था और हमने उनका अनुकरण किया कि हमें उस पर पक्का विष्वास हो गया था, बल्कि इसलिए कि उनका नुसखा कारगर साबित हुआ था।</p>
<p style="text-align: justify;">कहावत है, सफलता की तरह कोई सफल नहीं होता। गांधीजी के आंदोलन लोगों को जाग्रत करने और आंदोलन में कूद पड़ने की प्रेरणा देने में, जैसे पहले कोई भी आंदोलन नहीं कर पाया था, सर्वोच्च सफलता प्राप्त कर रहे थे। सारे प्रतिस्पर्धी कार्यक्रमों और विचारधाराओं को हार मानकर पीछे हटना पड़ा था।</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;"><strong><a href="http://www.janokti.com/tag/jayprakash-narayan/">गांधी जी का लोक सेवक संघ</a></strong></p>
<p style="text-align: justify;">किन्तु गांधीजी को अवसर ही नहीं मिला  िकवे समाज को बदलने और उसके पुननिर्माण की अपनी अहिंसक पद्धति का दर्षन करा सकते। इसमें सन्देह नहीं कि उन्होंने इस संबंध में काफी कहा और लिखा है। किन्तु इसके पूर्व  िकवे इस पर अमल करते, बड़ी क्रूरता के साथ उन्हें हमारे बीच से छीन लिया गया। पीछे की ओर देखते हैं, तो अब इसमें सन्देह नहीं मालूम होता कि उन्होंने अपने भावी कार्यक्रमों की बुनियाद डालना उसी समय शुरू कर दिया था। किन्तु वे जो कुछ कर रहे थे, उसका आषय जेैसा और भी बहुत-से लोगों की समझ में उस समय नहीं आया था, मैं भी समझ नहीं पाया। उदाहरण के लिए, उन्होंने स्वतंत्रता के संग्राम में इतनी अद्भुत सफलता प्राप्त की, किन्तु अपने आदर्ष के अनुरूप देष के पुनर्निर्माण में उपयोग करने के लिए सत्ता अपने हाथ में नहीं ली, इस घटना का अभिप्राय समझने में भी मैं बिल्कुल चूक गया। उसी प्रकार जब उन्होंने यह प्रस्ताव किया कि कांग्रेस को राजनीतिक क्षेत्र से हट जाना चाहिए और अपने को जिसे उन्होंने ‘लोक-सेवक-संघ’ कहा था, उसमें समेट लेना चाहिए। इस अद्वितीय प्रस्ताव के तात्पर्यार्थ से फिर मैं वंचित रह गया। देष को ही उस प्रस्ताव पर शांतिपूर्वक विचार करने का अवसर नहीं मिला। सारा देष दुःख और क्षोभ में ऐसा डूबा हुआ था कि मुक्ति-चिन्तन संभव नहीं था। इसके अतिरिक्त सबकी आंखें उनकी आरे लगी थी, जिनसे नैया के इस खेवैया की अनुपस्थिति में उसे सुरक्षित स्थान तक चलने की आषा थी और उनकी ओर से राष्ट्रपिता की ‘अंतिम इच्छा और वसीयत’ क्या थी, इसके संबंध में एक शब्द भी नहीं सुनाई पड़ा। इसके भी आगे जब यह देखा गया कि गांधीजी के प्रत्येक राजनैतिक सहयोगी ने राजनीति का परम्परागत मार्ग अपना लिया है, इस बात का संदेह तक नहीं हो सका कि गांधी-विचार में दल और सत्ता की पद्धति का कोई विकल्प भी है।</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;"><strong><a href="http://www.janokti.com/tag/jayprakash-narayan/">गांधीजी और दलगत राजनीति</a></strong></p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">यहां यह एक प्रष्न भी उठाया जा सकता है कि गांधी जी के संबंध में, जिन्होंने अपना सारा जीवन राजनीति मंे बिताया, यह शंका ही क्यों की जाती है कि उन्हें इसके विकल्प की भाषा में सोचना चाहिए था। मेरी विनम्र राय में गांधीजी को राजनीति के जिस अर्थ का यहां मैं विचार कर रहा हूं, उस अर्थ से कभी कोई वास्ता नहीं रहा। गांधीजी ने स्वतंत्रता का जो आंदोलन चलाया, वह इसी अर्थ में राजनीतिक था कि उसका लक्ष्य भारत की राष्ट्रीयता स्वाधीनता था, किन्तु वह किसी दल के लिए सत्ता का आंदोलन हो, इस अर्थ में ‘राजनीति’ नहीं था। यदि उसका लक्ष्य सत्ता था, तो वह सत्ता पूरे भारतवर्ष की जनता के लिए थी। इसमें वे लोग भी सम्मिलित थे, जो पाकिस्तान बनाने के लिए अलग हुए और दोनों हिन्दुस्तानों में जितने दल मौजूद थे, वे और भविष्य में जो बनेंगे, वे भी सम्मिलित थे। गांधीजी किसी दल के नेता नहीं थे, जो अपने दल की सत्ता के लिए लड़ते और दांव-पेंच खेलते। यदि ऐसा होता, तो उनके मन में कांग्रेस को सत्तावादी राजनीति छोड़ने की बात कहने का कभी विचार ही न आता। वे एक राष्ट्रीय नेता थे, अपने देष की स्वतंत्रता के लिए लड़ रहे थे, न केवल इतना, वे मानवता के एक विष्व नेता थे और अपने सजातीय मानवमात्र की बन्धन-मुक्ति के लिए कार्य कर रहे थे। भारतीय स्वतंत्रता का आंदोलन एक सर्वोत्तम जन-आंदोलन था। वह राजनीति यानी राज्य की राजनीति नहीं थी, बल्कि लोक-नीति यानी जनता की राजनीति थी।</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;"><strong><a href="http://www.janokti.com/tag/jayprakash-narayan/">दलीय पद्धति</a></strong></p>
<p style="text-align: justify;">जो भी हो, राजनीति ने जो प्रष्न पैदा किये, वे मेरे दिमाग में गूंजते रहे। मैं संतुष्ट नहीं हुआ और एक विकल्प खोजने के लिए विवष हो गया। दलीय राजनीति का परम्परागत स्वभाव है, सत्ता के लिए उसमें सब तरह से निर्बल और दूषित कर देनेवाले संघर्ष होते ही हैं, यही बात मुझे और अधिक चिन्तित करने लगी। मैंने देखाः धन, संगठन ओर प्रचार के साधनों के बल पर विभिन्न दल कैसे अपने को जनता के उपर लाद देते हैं, कैसे जन-तंत्र यथार्थ में दलीय तंत्र बन जाता है, कैसे दलीय तंत्र अपने क्रम से स्थानिक चुनाव-समितियों और निहित स्वार्थों से सम्बद्ध गुटों का राज्य बन जाता है, किस प्रकार जन-तंत्र केवल मतदान में सिमट और सिकुड़कर रह जाता है, किस प्रकार मत देने का यह अधिकार तक, उन शक्तिषाली दलों के द्वारा अपना उम्मीदवार खड़ा करने की पद्धति के कारण, बुरी तरह सीमित हो जाता है, क्योंकि काम चलाने के लिए मतदाताओं को केवल उन्हीेंमे से किसी को चुनना पड़ता है, किस प्रकार यह सीमित निर्वाचनाधिकार तक अवास्तविक हो जाता है, क्योंकि निर्वाचक-गण के समक्ष जो मुद्दे रखे जाते हैं, वे बहुत अधिक तो उनकी समझ के बाहर होते हैं।</p>
<p style="text-align: justify;">दलीय पद्धति को जैसा मैंने देखा, वह लोगों को डरपोक और नपुंसक बना रही थी। इसने इस तरह से काम नहीं किया कि जनता की शक्ति और अभिक्रम ;इनीषियेटिवद्ध बढ़े या उन्हें स्वराज्य स्थापित करने और अपनी व्यवस्था अपने-आप संभालने में सहायता मिले। दलों को तो केवल इससे मतलब था कि सत्ता उनके हाथ में आये और वे जनता के उपर, बिना शक जनता की सलाह से, राज्य कर सकें। मैंने ऐसा अनुभव किया कि दलीय पद्धति लोगों को भेड़ों की स्थिति में ला देना चाहती हैं, जिनका एकाधिकार केवल नियत समय पर गड़ेरियों को चुन लेना है, जो उनके कल्याण की चिन्ता करेंगे। मुझे इसमें स्वतंत्रता का दर्षन नहीं हुआ, उस स्वतंत्रता या स्वराज्य का, जिसके लिए मैं लड़ा था और इस देष के लोग जिसके लिए लड़े थे।</p>
<p style="text-align: justify;">
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		<title>लोकनायक के ऐतिहासिक पत्र-3</title>
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		<pubDate>Tue, 21 Sep 2010 05:23:27 +0000</pubDate>
		<dc:creator>जनोक्ति डेस्क</dc:creator>
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		<description><![CDATA[साम्यवाद से जनतंत्रीय समाजवाद की ओर आजादी की लड़ाई सन 1929 में जब मै। अपने देश वापस आया, वह समय मार्क्सवाद के लिए अनुकूल नहीं था। राष्ट्रीय भावना अपनी चरम सीमा पर थी। उसी वर्ष दिसम्बर महीनें में, जब गांधी ]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><strong><a rel="attachment wp-att-7487" href="http://www.janokti.com/%e0%a4%a6%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%a4%e0%a4%be%e0%a4%b5%e0%a5%87%e0%a4%9c%e0%a4%bc-file-stories/%e0%a4%b2%e0%a5%8b%e0%a4%95%e0%a4%a8%e0%a4%be%e0%a4%af%e0%a4%95-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%90%e0%a4%a4%e0%a4%bf%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%b8%e0%a4%bf%e0%a4%95-%e0%a4%aa%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0-3/attachment/loknayak-jay-prakash-narayan-2/"><img class="alignright size-full wp-image-7487" title="loknayak-jay-prakash-narayan" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2010/09/loknayak-jay-prakash-narayan1.jpg" alt="" width="320" height="216" /></a>साम्यवाद से जनतंत्रीय समाजवाद की ओर आजादी की लड़ाई</strong></p>
<p style="text-align: justify;">सन 1929 में जब मै। अपने देश वापस आया, वह समय मार्क्सवाद के लिए अनुकूल नहीं था। राष्ट्रीय भावना अपनी चरम सीमा पर थी। उसी वर्ष दिसम्बर महीनें में, जब गांधी जी कलकत्ता कांग्रेस के प्रस्ताव के अनुसार भारतवर्ष के लिए पूर्ण औपनिवेशिक स्वराज्य की मांग को लार्ड इरविन से स्वीकार कराने में सफल न हुए, तो राष्ट्रीय आजादी की ओर एक लम्बी उड़ान मारने के लिए क्षेत्र तैयार हो गया। पूर्ण स्वराज्य राष्ट्रीय आन्दोलन का लक्ष्य रखा गया और दूसरे वर्ष के प्रारम्भ में ही महात्मा गांधी ने अपना सुविख्यात नमक सत्याग्रह शुरू कर दिया। स्वाभाविक ही था, मैं अपने पूरे उत्साह के साथ इस संघर्ष में कूद पड़ा। लेकिन भारतीय कम्युनिस्ट मुझे इस संघर्ष के किसी भी ओर-छोर पर दिखाई नहीं दिये। यह बात सच है कि उनमें से कुछ लोग मेरठ षड्यन्त्र-केस के सिलसिले में जेलों में बंद थे। किन्तु काफी लोग बाहर ही थे और सीपीआई का गुप्त संगठन ज्ञी किसी न किसी रूप में चल ही रहा था। मैं जल्दी ही फरार हो गया था, किन्तु राष्ट्रीय आंदोलन के इस अज्ञात क्षेत्र में भी कम्युनिष्ट कहीं दिखाई नहीं दिए। यदि वे भी इस आंदोलन के फरारी होते, तारे दो फरारियों का सम्पक्र गुप्त रास्तों से आसानी से हो सकता था। वस्तुस्थिति इससे भी बदतर थी। मैंने सुना कि वे लोग राष्ट्रीय आंदोलन को बुर्जुआ आंदोलन और महात्मा गांधी को भारतीय बुर्जुआ वर्ग का पिट्ठू कहकर निन्दा कर रहे है। मैं शर्म और अज्ञान से भरी हुई उस पूरी कहानी की याद दिलाना नहीं चाहता। मैंने उसका जिक्र यहां केवल यह बताने के लिए किया है कि भारतीय कम्युनिस्टों और उनकी माक्र्सवादी छाप से मेरे मतभेद कैसे पैदा हुए। हिन्दुस्तान के कम्युनिस्ट वास्तव में तीसरे या कम्युनिस्ट इंटरनेशनल, जो उस समय तक पूरी तरह स्टाॅलिन के नेतृतव में आ चुका था, द्वारा निर्धारित नीति का अनुसरण कर रहे थे। कमिन्टर्न कम्युनिस्ट इंटरनेशनल सन 1928 से ही स्पष्टतया गलत नीति पर चल रहा था। उसके परिणामस्वरूप सारी दुनिया के मजदूर और समाजवादी आंदोलनों में फूट पड़ गयी थी और सारे औपनिवेशिक प्रदेशों में कम्युनिस्ट राष्ट्रीय आंदोलनों से कटकर अकेले पड़ गये थे। मुझे लगा, जैसा दरअसल बाद में स्वीकार भी किया गया, वह नीति सामान्यतया माक्र्सवादी सिद्धान्त के और विशेषतया महान् नेता लेनिन के द्वारा प्रतिपादित प्रसिद्ध औपनिवेशिक नीति के विरूद्ध थीं इसी प्रकार भारतीय कम्युनिस्ट र्पाअी के साथ मेरे मतभेदों ने स्वयं सोवियत रूस के साथ मेरे सैद्धांतिक विरोध की नींव डाल दी। सोवियत रूस उस समय तक मेरे लिए समस्त कम्युनिस्ट सद्गुणों का उच्चतम नमूना और आदर्श था। कुछ साल पहले से ही रूस में जो सैद्धान्तिक संघर्ष और सत्ता के लिए लडऋाई चल रही थी, उसने अब तक एक दबी हुई चिन्ता के सिवा मेरे अन्दर और कोई स्थिर प्रतिक्रिया उत्पन्न नहीं की थी। वास्तव में उन घटनाओं के संबंध में उस समय तक अधिक जानकारी उपलब्ध नहीं थी। किन्तु जब अपने देश में सोवियत रूस द्वारा निर्दिष्ट नीति से मुंहामुंही हुई, मेरा माक्र्सवादी ज्ञान उससे संतुष्ट हो ही नहीं सका और इसलिए उसका विरोध किये बिना मुझसे न रहा गया।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>कांग्रेस समाजवादी दल</strong></p>
<p style="text-align: justify;">स्वाभाविक था, मैं भारतीय कम्युनिस्ट दल से अलग रहा और स्वतंत्रता संग्राम के सैनिकों में सम्मिलित हो गया। किन्तु उस समय तक स्वतंत्रता या स्वराज्य का अर्थ मेरे लिए केवल राष्ट्रीय आजादी ही नहीं रह गया था, बहुत व्यापक हो गया था। स्वतंत्र भारत का अर्थ मैं समाजवादी भारत करता था ओर स्वराज्य से मेरा आशय था गरीब और पददलित लोगों का राज्य। इस विषय में प्रसिद्ध कराची-घोषणा के बावजूद मुझे आवश्यक था, हमने स्वतंत्रता संग्राम में समान विचार रखनेवाले सैनिकों का एक कांग्रेस समाजवादी दल संगठित कर लिया, ताकि कांग्रेस की सामाजिक नीति और अधिक निश्चित रूप से समाजवादी हो सके और स्वतंत्रता की लड़ाई ही कुछ और अधिक क्रांतिकारी ढंग से चलायी जा सके। मार्क्सवादी परिभाषा में उसका अर्थ होता है, राष्ट्रीय स्वतंत्रता के आंदोलन को जनता के आर्थिक और सामाजिक विस्तार के आंदोलन से जोड़ देना। कांग्रेस समाजवादी दल ने कांग्रेस की नीति के सामाजिक आर्थिक पहलू को स्वरूप देने और आजादी की लड़ाई को मजबूत बनाने में एक बहुत महत्वपूर्ण हिस्सा लिया है। स्वातंत्र्य-संग्राम के कभी न झुकनेवाले और निर्भीक सैनिकों में अधिकांश कांग्रेस समाजवादी ही थे।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>हिटलर का उत्थान और लोकप्रिय मोर्चा</strong></p>
<p style="text-align: justify;">सन 1930 के आरम्भ में जन-राष्ट्रीय आंदोलन तेजी पर थां यूरोप में उद्वेगकारी घटनाएं घट रही थीं। उनका चरम उत्कर्ष था-हिटलर का अपने हाथ में सत्ता ले लेना। स्टाॅलिन ने भविष्यवाणी की थी कि हिटलर का पतन शीघ्र होगा, क्योंकि एक अर्ध विक्षिप्त व्यक्ति जर्मनी की जटिल और विषम समस्याओं को सुलक्षा नहीं सकेगा। स्टाॅलिन ने यह भी भविष्यवाणी की थी कि हिटलर की सत्ता के खंडहरों पर कम्युनिस्ट जर्मनी का महल खड़ा किया जायगा। जब इस प्रकार की कोई भी चीज नहीं हुई-बल्कि हिटलर ने उल्टे अपनी शक्ति संगठित कर ली और कम्युनिस्टों, समाजवादियों और शक्तिशाली ट्रेड-यूनियनों को दबा दिया, विश्व विजय के लिए तैयारी शुरू कर दी और उसकी योजनाएं सफल होने लगीं-तब आखिरकार क्रेमलिन के स्वामी का आसन डोला और तेजी से पैंतरा बदला गया।</p>
<p style="text-align: justify;">अब खोद-खोदकर कब्र में से स्टाॅलिन की गलतियां निकालने का प्रचलन हो गया है। कुछ क्रुश्चेव ने खोदकर निकाली है। जुकोव और गहरा खोदने के लिए उत्सुक मालूम होता है। मुझे वैसा कुछ करने की कोई इच्छा नहीं है। किन्तु मैंने अन्यत्र जो कहा है, उसे दोहरा देना चाहता हूं कि एक समय आएगा, जब स्टाॅलिन की गलतियो मे सबसे अधिक गम्भीर, सबसे अधिक दूषित और सबसे अधिक महंगी पड़नेवाली गलती, उसका उन विघटनकारी नीतियों को अपनाना घाषित होगा, जिनके कारण हिटलर के हाथ में सत्ता आयी। जर्मनी के कम्युनिस्टों ने यदि स्टाॅलिन से प्रेरणा लेकर सोशल डेमोक्रेटों को अपना प्रथम श्रेणी का और नाजियों को तदुपरान्त ही अपना शत्रु घाषित न किया होता, तो हिटलर कभी भी जर्मनी का मालिक नहीं बन सकता था। समाजवादी एकता और लोकप्रिय मोर्चे की जो नीति नाजीवाद की सफलता के बाद अपनायी गयी थी, यदि शुरू से ही उस पर अमल किया गया होता, तो नाजी आतंक और द्वितीय महायुद्ध का कभी दर्शन ही न होता।</p>
<p style="text-align: justify;">इस लोकप्रिय मोर्चे की नीति का प्रभाव भारत पर भी पड़ा। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने संकेत पाकर अपना रूख बदला और वर्षों तक आक्षेप करने, निन्दा ओर गालियां देने के बाद भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस को उन्होने अचानक राष्ट्रीय मोर्चा स्वीकार करके उसका समर्थन किया।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी और कांग्रेस समाजवादी दल की संधि</strong></p>
<p style="text-align: justify;">अभी भी  माक्र्सवाद से आत्मीयता होने के कारण इस नयी नीति से मेरा हृदय आनन्दमग्न हो गया और मेरी आशाएं उंची उठने लगीं। मैं एक संयुक्त आनन्दमग्न हो गया और मेरी आशाएं उंची उठने लगीं। मैं एक संयुक्त सोशलिस्ट कम्युनिस्ट दल की सम्भावना के स्वप्न देखने लगा। मुझे लगा, इस प्रकार के संयुक्त नेतृत्व में स्वातंत्रय आंदोलन और भारतीय समाजवाद दोनों बड़ी तेजी से कूदते-फांदते हुए आगे बढंगे।</p>
<p style="text-align: justify;">श्री राममनोहर लोहिया, एम0 आर0मसानी, अच्युत पटवर्धन और अशोक मेहता जैसे मेरे कुछ प्रमुख साथियों ने इस नीति का विरोध किया। उन्होंने अच्छी तरह समझ लिया था कि इसका अन्त दुःखद होगा। किन्तु मेरे माक्र्सवादी जोश ने मेरी तर्कशक्ति पर विजय पाली और नरेन्द्रदेवा जैसे आदरणीय साथी के समर्थन से मैं अपने स्वप्नों और आशाओं को लेकर आगे बढ़ आया।</p>
<p style="text-align: justify;">भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के साथ एक समझौता हो गया, जिसके अनुसार कांग्रेस-सोशलिस्ट दल की सदस्यता कम्युनिस्टों के लिए खोल दी गयी। कांग्रेस-सोशलिस्ट दल की शाखाएं, खास तौर से दक्षिण भारत में, जान बूझकर कांग्रेस-सोशलिस्ट दल के वफादार लोगों की उपेक्षा करके कम्युनिस्टों के हाथों सौंप दी गयीं। कांग्रेस सोशलिस्ट दल के समर्थन से अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी तथा कांग्रेस की अन्य संस्थाओं में भी कम्युनिस्ट चुने गये। ट्रेड युनियन आंदोलन के संबंध में यह तय हुआ की दोनों मिलकर साथ साथ काम करें।</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">संयुक्त मोर्चें के मायाजाल से मुक्ति</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">इस नीति के घातक परिणाम सर्वविदित हैं। प्रसंग के लिए उनमें से एक तो यही हैं कि सारा दक्षिण भारत कम्युनिस्ट पार्टी के हाथों में चला गया। किन्तु उस दुःस्वप्न जैसे अनुभव से एक बड़ा लाभ हुआ। उसने राजनीति के क्षेत्र में हमें एक अच्छा सबक सिखा दिया। हम लोगों ने हममें से कुछ ने काफी दुःख के साथ सीख और समझ लिया कि किसी प्रमाणप्राप्त कम्युनिस्ट पार्टीं के सथ ऐक्य नहीं हो सकता। कमिन्टर्न से सम्बद्ध या क्रेमलिन से प्रमाणित कम्युनिस्ट पार्टी मास्कों के हाथ की कठपुतली मात्र है। वह स्वतंत्र प्रतिनिधि नहीं है। ऐसी पार्टी के सदस्य पहले रूस के प्रति वफादार होते हैं, उसके बाद ही किसी दूसरे के प्रति वफादारी दिखा सकते हैं। कम्युनिस्ट पार्टिंयां जब-जब संयुक्त मोर्चे की बात करती हैं, वह हमेशा एक बहाना होता है और नहीं तो संकटपूर्ण स्थिति से विवश होकर अपनायी हुई एक अल्पकालिक नीति। एकच्छत्र कम्युनिस्ट राज्य ही हमेशा उनका एकमात्र लक्ष्य रहता है। कम्युनिस्ट बला टालने की वृत्ति से अपने पिट्ठुओं के सिवा किसी दूसरे को सत्ता देने की ता कभी सोच ही नहीं सकते। ये थे व अमूल्य सबक, किन्तु इनके लिए जो कीमत चुकानी पड़ी, शायद वह बहुत ज्यादा थी। युद्ध ने इन निष्कर्षों को और भी पुष्ट कर दिया और इतनी अधिक आशा के साथ जो समझौता किया गया था, उसे असंदिग्ध रूप से रद्द करने के लिए साथ जो समझौता किया गया था, उसे असंदिग्ध रूप से रद्द करने के लिए विवश कर दिया।</p>
<p style="text-align: justify;">अन्तर्राष्ट्रीय साम्यवाद इस समय पुनर्जन्म की प्रसव वेदना से गुजर रहा है। किन्तु अभी भी यह बताना सम्भव नहीं है कि जो शिशु होगा, वह मृत होगा या जीवित। मेरे जैसे व्यक्तियों की तो यही हार्दिक इच्छा है कि अन्तोगत्वा इसका परिणाम शुभ हो, सुखद हो।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>रूसी मुकदमे और हत्याएं</strong></p>
<p style="text-align: justify;">भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के साथ हमारे जो प्रत्यक्ष अनुभव थे, उनके अतिरिक्त लगभग उसी समय स्वयं सोवियत रूस में कुछ ऐसी दूसरी घटनाएं घट रही थीं, जिन्होंने मेरी विचार-सरणी को बहुत अधिक प्रभावित किया। ये घटनाएं थीं रूस के उन प्रसिद्ध कम्युनिस्ट नेताओं पर चलाये गये कुख्यात मुकदमे, जिनकी रचनाओं को मैंने बड़ी उत्सुकता के साथ घोलकर पी डाला था और जो मेरे लिए महान् क्रांतिकारी शूर-वीर थे, जिन्होंने लेनिन के अति विश्वासपात्र साथियों के रूप में इतिहासप्रसिद्ध महान् क्रांति की थी।</p>
<p style="text-align: justify;">इन मुकदमों के विवरण के साथ-साथ कालान्तर में जिस अन्यायपूर्ण शासन ने रूस को जकड़ रखा था, उसके सम्बन्ध में ऐसे व्यक्तियों के द्वारा जिन्हें मैं ईमानदार समझता था, अध्ययन करके लिखी हुई चीजें भी आयीं। यूजीनलियनस की एसाइनमेन्ट इन युटोपिया जो मेरे विचार से एक उत्कृष्ट साहित्य रचना है, उन प्रारम्भिक रचनाओं में से एक है, जिसने मेरे मन को उद्वेलित कर दिया। तत्पश्चात् दूसरे विवरण प्राप्त हुए। जाॅन डुई ने ट्राटस्की के मामले की छानबीन की। उनके जो निष्कर्ष थे, उन्हें झुठलाना असम्भव था। कामेनेव, जाईनोवियफ, राडेक, रिकोव, बुखारिन आदि व्यक्तियों के विरूद्ध लगाये गये आरोप और उनके द्वारा कही हुई अपराध स्वीकारोक्ति बेहद बैचानी पैदा करती थी। कम्युनिस्ट नभोमण्डल के अन्य और कुछ अल्प प्रकाशवाले सितारों की भी वही भयंकर दुर्गति हुई। क्रुश्चेव ने अब कुछ ऐसे मुकदमों की निन्दा की है, जिनमें उसका हाथ नहीं था। मुझे इसमें जरा भी संदेह नहीं है कि सोवियत रूस में जैसे-जैसे स्वतंत्रता का प्रसार होता जायगा, दूसरे कम्युनिस्ट नेता दूसरे-दूसरे अत्याचारों का भाण्डाफोड़ करेंगे और एक दिन आएगा, जब ट्राटस्की तक को पुनः उसी आदर के स्थान पर बिठा दिया जाएगा, जिसका वह अधिकारी था।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>मार्क्सवाद का पुनः परीक्षण</strong></p>
<p style="text-align: justify;">इन सब घटनाओं और अनुभवों ने मुझे माक्र्सवाद के बुनियादी सिद्धान्तों की पुनः जांच करने के लिए मजबूर कर दिया। समाजवादी आंदोलन के मरे अधिकांश सथी पुनश्चिन्तन् की उस कष्टसाध्य प्रक्रिया से परिचित हैं, क्योंकि हम साथ-साथ ही उस दौर से गुजरे है। सैद्धान्तिक पुनश्शिक्षण की इस प्रक्रिया का कांग्रेस समाजवादी दल और तत्पश्चात पुराने समाजवादी दल के विकास और प्रगति पर गहरा प्रभाव पड़ा।</p>
<p style="text-align: justify;">कांग्रेस समाजवादी दल का संगठन एक माक्र्सवादी-लेनिनवादी गुट के रूप में हुआ था। प्रारम्भिक काल में हम हमेशा यह दावा किया करते थे कि भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी और क्रेमलिन दोनों भारतवर्ष में खास तौर से तथा विश्व की स्थिति में आम तौर से माक्र्सवादी लेनिनवाद का मिथ्या प्रयोग कर रहे है। किन्तु अब मेरे मन में एक गंभीर प्रश्न खड़ा हो गया, माक्र्सवाद-लेनिनवाद का कुछ भी अर्थ किया जाय, फिर भी क्या वह सामाजिक क्रांति ओर समाजवाद की स्थापना के लिए एक स्वयंपूर्ण और सुरक्षित मार्गदर्शक हो सकता है? हिंसा क्रांति की पोषिका है, यह मान्यता यदि पूरी तरह नहीं मिटी थी, तो भी कम-से-कम इतना तो मुझे साफ दिखाई देता थाः</p>
<p style="text-align: justify;">(क) एक ऐसे समाज में, जहां गणतान्त्रिक ढंग से सामाजिक परिवर्तन करना लोगों के लिए संभव था, हिंसक तरीकों को अपनाना क्रांति के विरूद्ध कार्य है।</p>
<p style="text-align: justify;">(ख) गणतांत्रिक स्वतंत्रताओं के अभाव में न तो समाजवाद की सृष्टि हो सकती है और न उसका रक्षण ही। इस तर्क के आधार पर मैंने सर्वहारा की तानाशाही के सिद्धान्त को व्यवहार में, जिसका अर्थ मुट्ठीभर अफसरों की तानाशाही होता है, अमान्य कर दिया।</p>
<p style="text-align: justify;">रूसी क्रांन्ति एक जन-क्रांति के रूप में आरम्भ हुई थी, जिसे जाॅरशाही रूस की विस्तृत जनता का सक्रिय समर्थन प्राप्त था। किन्तु जब लेनिन ने संविधान सभा को , जिसमें वह एक बड़े अल्पमत में था, बलपूर्वक भंग कर दिया और विद्रोही सिपाहियों तथा शहरी मजदूर-वर्ग की सहायता से सत्ता पर कब्जा कर लिया, तो उसने इस जन क्रांति को अल्पसंख्यकों की क्रांति में बदल डाला। क्रांति की बादवाली असफलता और समाजवाद की विकृति मेरे ख्याल से एक अल्पमत के द्वारा बलपूर्वक सत्ता-अपहरण के प्रत्यक्ष परिणाम थे।</p>
<p style="text-align: justify;">इस प्रकार मैं इसी नतीजे पर पहुंचा कि जहां जनता में लोकतांत्रिक स्वतंत्रताओं का अभाव हो, वहां भी हिंसक क्रांति के लिए लोकप्रिय समर्थन मिलना चाहिए और क्रांतिकारी सरकार के लिए जनता के बहुमत का आधार होना चाहिए। वैधानिक चुनावों की अपेक्षा क्रांति के दौरान में लोकेच्छा की अभिव्यक्ति आसान होती है। सामाजिक क्रांति में लोकेच्छा क्या है, इसका पता लगाने की पूर्ण स्वतंत्रता और गणतंत्र के पक्ष में ही होती है। जान-बूझकर तानाशाही स्वीकार करने की वृत्ति उनमें हरगिज नहीं होती। कम्युनिस्टों ने लेनिन की प्रतिभाशाली प्रेरणा पाकर अपने कुटिल साधनों से सर्वत्र जनता के उपर अपने अल्पमत और तानाशाही शासन को मढ़ने का प्रयत्न किया है। चीन में शायद इसका अपवाद हमें मिले। वहां च्यांगकाई शेक की अपेक्षा माओ-त्से-तुंग के पक्ष में एक बड़ा जन-समुदाय दीख पड़ता है। यद्यपि उसका यह अर्थ नहीं है कि चीनी सरकार एक तानाशाही सरकार नहीं है। कदाचित वह एक बहुमत की अल्पमत के उपर तानाशाही है। और भी, शायद यूगोस्लाविया में ऐसा है। अन्यत्र कम्युनिस्ट राज्य एक अल्पमत का राज्य ही है। किन्तु अल्पमत में हो या बहुमत में, जहां कहीं कम्युनिस्ट सत्तारूढ़ हैं, उन्होंने निरपवाद तानाशाही की स्थापना की है, उसे वे अपनी सामान्य दुमानी भाषा में जनता का राज्य अथवा समाजवादी प्रजातंत्र तक कह डालते है। इन सबने मुझे इस निष्कर्ष पर पहुंचा दिया कि समाजवाद का रास्ता किसी प्रकार की भी तानाशाही से नहीं गुजरता।</p>
<p style="text-align: justify;">सोवियत अनुभव ने मेरे लिए यह बात और भी स्पष्ट कर दी कि समाजवाद पूंजीवाद का अभाव मात्र नहीं हैं। यह सम्भव है कि पूंजीवाद नष्ट हो जाय, उद्योग, वाणिज्य, बैंक-व्यवस्था, कृषि आदि सबका राष्ट्रीकरण और सामूहीकरण हो जाय और फिर भी समाजवाद बहुत दूर ही रह जाय। समाजवाद बहुत दूर रह जाय, इतना ही नहीं, बल्कि यह भी सम्भव है कि बिल्कुल उसके विरूद्ध ही चला जाय। सोवियत रूस में हमने केवल ‘औपचारिक’ स्वतंत्रता का निषेध देखा। अफसरशाही शासकों के एक नये वर्ग की वृद्धि तथा शोषण के नये-नये रूप भी हमने देखे। यह सब समाजवाद का अभावमात्र नहीं था, बल्कि उसका निषेध भी है।</p>
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		<title>लोकनायक के ऐतिहासिक पत्र-2</title>
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		<pubDate>Wed, 15 Sep 2010 10:12:32 +0000</pubDate>
		<dc:creator>जनोक्ति डेस्क</dc:creator>
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<p style="text-align: justify;">अपने लड़कपन में, जैसे उस समय के सभी लड़के होते थे, मैं एक कट्टर राष्ट्रवादी था। मेरा झुकाव क्रांतिकारी तरीकों की ओर था। उस समय बंगाल इसमें  सबसे आगे था। तो भी दक्षिण अफ्रीका के सत्याग्रह के इतिहास ने मेरे तरूण हृदय को मुगध कर लिया था। मेरे क्रांतिकारी विचार पक्के नहीं हो पाये थे कि गांधीजी का प्रथम सत्याग्रह-आंदोलन एक चढ़ते हुए तूफान की तरह देश में छज्ञ गया। उस जमाने के उन हजारों नौजवानों में से मैं भी एक था, जो सूखी पत्तियों की तरह उस तूफान में उड़कर कुछ देर के लिए आकाश में पहुंच गये थे। एक उंचे विचार की उड़ान में बहुत उंचे उड़ जाने का वह अल्प अनुभव अन्तस्तल में कुछ ऐसी छाप छोड़ गया, जिसे काल और वस्तुस्थिति की भयंकरता भी मिटा नहीं सकी।</p>
<p style="text-align: justify;">यही वह समय था, जब स्वतंत्रता मेरे जीवन का एक आकाश दीप बनी, जो आज तक वैसी ही बनी हुई है। कालान्तर में वह स्वतंत्रता अपने देश की स्वतंत्रता मात्र के भाव का अतिक्रमण करके मनुष्य की सब जगह और सब प्रकार के बन्धनों से मुक्ति ही नहीं, बल्कि इससे भी आगे बढ़कर मानवीय व्यक्तित्व की स्वतंत्रता विचार की स्वतंत्रता, आत्मा की स्वतंत्रता अर्थदात्री बन गयी। यह स्वतंत्रता जीवन की एक निष्ठा बन गयी है। मैं रोटी के लिए सत्ता के लिए सुरक्षा के लिए समृद्धि के लिए राज्य की प्रतिष्ठा के लिए या किसी अन्य वस्तु के लिए इसके साथ समझौता नहीं कर सकता।</p>
<p style="text-align: justify;">आश्चर्य की बात है, मुझे संयुक्त राज्य अमेरिका में माक्र्सवाद या अधिक स्पष्ट भाषा में, जैसा उस समय वह था, सोवियत कम्युनिज्म की दीक्षा मिली। अमेरिका एक पुनर्निर्मित और सफल पूंजीवादी देश है। सन् 1922 से सन 1929 तक वह मेरा घर ही था। मेदीसन और बिजकोन्सिन उस समय प्रगतिवाद के गढ़ समझे जाते थे। वहीं यहूदी और यूरोपीय सहपाठियों की संगति में मैंने माक्र्सवाद का गहरा अध्ययन किया। मैं समझता हूं, उस समय अंग्रेजी भाषा में माक्र्सवादी जितना भी साहित्य उपलब्ध था, हमने कोई भी बिना पढ़े नहीं छोड़ा था। जर्मन भाषा के एक बुत तेज विद्यार्थी की सहायता से माक्र्सवादी कुछ ऐसे मूल ग्रन्थों का भी हमने अध्ययन किया था, जिनका अनुवाद नहीं हुआ था। श्री एम.एन.राय के उग्र लेखों ने, जो यूरोप से साम्यवादी गुप्त गोष्ठियों और खास तौर से एशियाई विद्यार्थियों की गोष्ठियों में प्रवेश कर गये थे, माक्र्सवाद की दीक्षा पूर्ण कर दी।</p>
<p style="text-align: justify;">फिर भी स्वतंत्रता के मेरे लक्ष्य में कोई परिवर्तन नहीं हुआ। किन्तु उसकी पूर्ति के लिए क्रांति का माक्र्सवादी सिद्धान्त गांधीजी की सविनय अवज्ञा आंदोलन और असहयोग पद्धति की अपेक्षा अधिक निश्चित और शीघ्रगामी मालूम हुआ। महान नेता लेनिन की रोमांचकारी सफलता ने, जिसके विवरण पढ़कर हम कभी अघात ही नहीं थे, लगता था, क्रांति के लिए माक्र्सवादी रास्ते की श्रेष्ठता को निःसंशय सिद्ध कर दिया है।</p>
<p style="text-align: justify;">उसी समय माक्र्सवाद ने समता और बन्धुत्व की एक और ज्योति मेरे लिए जगा दी। केवल स्वतंत्रता पर्याप्त नहीं थी। इसका अर्थ होना चाहिए सबकी, जो लोग निम्नतम स्तर पर हैं, उनकी भी स्वतंत्रता। इस स्वतंत्रता में शोषण से, भुखमरी और दरिद्रता से मुक्ति भी शामिल होनी चाहिए। मैं नहीं कह सकता, वे कौन-से पूर्व अनुभव थे, जिन्होंने मेरे अवचेतन मस्तिष्क में गरीबों और पीड़ितों के प्रति सहानुभूति की बुनियाद डाल दी थी। लेकिन बीजरूप में सहानुभूति अवश्य थी, माक्र्सवाद ने उसे प्रस्फुटित और प्रौढ़ करके प्रत्यक्ष जीवन में ला दिया। अमेरिका में मेरी जो जीवनचर्या थी, उसने इस प्रक्रिया को और भी पुष्ट और प्रबल कर दिया। मै। एक निम्न मध्यम-वर्गीय परिवार का था। अपने परिवार से मुझे मुश्किल से कुछ सहायता मिल पाती ािी। अतएव अपने जीवन-यापन और विश्वविद्यालय के शिक्षण का खर्च निकालने के लिए मुझे एक साधारण मजदूर की तरह खेत और कारखानों में काम करना पड़ता था। समता की बात ने मुझे उतना ही मोहित कर लिया था, जितना आजादी के आदर्श ने। इस महत्वपूर्ण प्रश्न पर गांधीजी की स्थिति क्या थी, मैं उस समय निश्चित रूप से नहीं जानता था। दरअसल उन दिनों श्री एम0 एन0 राय जो लिखते थे, उसने मुझे विश्वास दिला दिया। (यद्यपि श्री राय भी आगे चलकर अपने इन विचारों से बहुत दूर हट गये) कि गांधीजी सामाजिक क्रांति के विरूद्ध हैं और संकट के समय जल्दी ही शोषण और असमानता की प्रणाली को स्वीकार कर लेंगे। उस समय मैं यह नहीं समझता था कि सामाजिक क्रांति के संबंध में गांधीजी के अपने विचार हैं, साथ ही उसके लिए उनके अपने तरीके भी हैं।</p>
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		<title>लोकनायक के ऐतिहासिक पत्र-1</title>
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		<pubDate>Sun, 12 Sep 2010 16:31:57 +0000</pubDate>
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<p style="text-align: justify;">काफी चिन्तन के बाद मैने आपकों यह पत्र लिखने का निश्चय किया है। यह काम मेरे लिए आसान नहीं था। जीवनभर के साथियों से एकदम सम्बन्ध विच्छेद करना कभी आसान नहीं होता। हमने साथ-साथ काम किया है, जेलें काटी है, अज्ञातवास की जोखिमों से गुजरे है और साथ &#8211; साथ ही स्वतंत्रता की राख होते देखी है। हम सभी को अभी कुछ यात्रा पूरी करनी बाकी है।</p>
<p style="text-align: justify;">किन्तु जहां तक मेरा सम्बंध है, मैं यह अनुभव करता हूं कि अब मैं यात्रा के एक ऐसे मोड़ पर आ गया हूं, जहां मुझे साथ छोड़कर बाकी का रास्ता अकेले ही तय करने का निश्चय कर लेना चाहिए। यदि आप लोगों को भी अपने साथ चलने के लिए राजी कर सका होता, तो मेरे दिल में बेहद खुशी होती। किन्तु मैं जानता हूं, कम-से-कम अभी तो यह सम्भव नहीं है। फिर भी मुझे विश्वास है, हमारे रास्ते एक हो ही जायेंगे। हम स्वयं भले ही उस दिन को देखने के लिए बाकी न रहें, स्वतंत्रता और बन्धुत्व स्थापित होते हैं, तो समाजवाद को आखिरकार सर्वोदय में विलीन होना ही पड़ेगा।</p>
<p style="text-align: justify;">चार वर्ष पहले बोधगया-सर्वोदय-सम्मेलन के अवसर पर ही मैंने राजनीति छोड़ने का निश्चय कर लिया था। किन्तु प्रजा-समाजवादी दल का सदस्य में बना रहा, यद्यपि किसी-किसी बैठक में शामिल होने तथा कभी-कभी कुछ सलाह दे देने के अतिरिक्त दल के कार्यक्रमों में मैंने भाग नहीं लिया। पिछले आम चुनावों से कुछ पहले मै। इस निष्कर्ष पर पहुचा कि मुझे प्रजा-समाजवादी दल की निष्क्रिय सदस्यता से भी मुक्त हो जाना चाहिए। किन्तु आचार्यजी बीमार थे और उनसे चर्चा किये बिना मै। यह कदम उठाना नहीं चाहता थाा। इस देश और समाजवादी हित के दुभ्ज्र्ञाग्य से आचार्य नरेन्द्रदेव का निधन हो गया। प्रजा-समाजवादी दल के लिए, जो पहले ही फूट के कारण कमजोर हो गया था, यह एक मर्मान्तक धक्का था। प्रमुख साथियों ने मुझसे आग्रह किया कि मैं चुनावों के समाप्त होने तक अपने त्याग-पत्र की घोषणा न करूं। मै। राजी हो गया, किन्तु यह तय था कि जैसे ही चुनाव समाप्त होंगे, मेरे इस्तीफे की घोषणा कर दी जायेगी। इसमें जो देर हुई, उसका एक ही कारण है। मैं चाहता था कि आपके सामने और सामान्यतया पूरे देश के सामने उन सब चीजों को रख दूं, जिनसे प्रेरित होकर मैंने यह सख्त कदम उठाया है। मेरे लिए यह कदम बिल्कुल स्वाभाविक था। सरों को जरूर बहुत सख्त मालूम हो रहा है। प्रायः प्रतिदिन कोई न कोई व्यक्ति मुझसे यह प्रश्न पूछते हैं कि मुझे राजनीति छोड़नी ही क्यों चाहिए थी। लोगों का राजनीति पर कितना विश्वास है, उस पर उन्हें कितना भरोसा है, यह देखकर मुझे दया आती है। किन्तु मुझे अपने इस कार्य का औचित्य प्रत्येक व्यक्ति को अलग-अलग बताना कठिन मालूम होता है। उसी कठिनाई को दूर करने का मै। यहां प्रयास कर रहा हूं।</p>
<p style="text-align: justify;">राजनीति ने लोगों के दिमागों को इस तरह जकड़ रखा है, और फिर इसका विकल्प भ्ी अभी इतनी प्रारम्भिक स्थिति में है कि अपने इस वक्तव्य के द्वारा अधिक पाठकों को राजी करने में शायद ही मुझे सफलता मिले। फिर भी मुझे आशा है कि इससे एक-दूसरे को अधिक समझने में मदद मिलेगी और जिन विचारों का इसमें प्रतिपादन किया गया है, उनमें लोगों की रूचि बढ़ेगी। इसका एक दूसरा पहलू भी है। प्रत्येक व्यक्ति अपनी विशिष्ट पृष्ठ-भूमिका से ही चीजों का अवलोकन करता है। जो लोग न तो उन अनुभवों से होकर गुजरे हैं, जिनसे होकर मुझे गुजरना पड़ा है और न उन आदर्शों की खोज के पीछे पड़े हैं, जो मेरे आदर्श रहे हैं। सम्भव है, वे मेरी दलीलों की कदर न करें। समाजवाद या वर्ग-संघर्ष या राजनीतिक आन्दोलन अथवा संसदीय। गणतंत्र का जिन्हें नया-नया जोश है-सम्भव है, वे मेरे आशय को अभी न समझ पायें। अपने विशेष जोश में जब उन्हें कुछ रूकावटों का सामना करना पड़ेगा और उन रूकावटों का हल क्या होगा, इसकी छानबीन वे करेंगे, तो शायद जल्दी मेरी बात उनकी समझ में आये। मेरा यह संकेत हरगिज नहीं है कि मैंने सामाजिक समस्याओं का कोई सर्वथा निर्दोष हल ढूंढ लिया है या सर्वोदय ही समाज-दर्शन की इति है। मनुष्य स्वभाव से ही जिज्ञासु होता है, इसलिए वह बराबर सत्य की ओर बढ़ रहा है। वह पूर्ण सत्य तक कभी नहीं पहुंच सकता, किन्तु क्रमशः असत्य को कम करते-करते सत्य के पथ पर लग सकता है। इसमें केाई सन्देह नहीं, सर्वोदय विचार और मानव-मस्तिष्क इस प्रकार बराबर सत्य की ओर बढ़ता ही जायेगा। लेकिन मैं यह जरूर मानता हूं कि सर्वोदय आज के वर्तमान सामाजिक तत्वज्ञानों और प्रणालियों से स्पष्टतया आगे बढ़ा हुआ और उन्नत विचार है। मैं जिस प्रक्रिया से इस निष्कर्ष पर पहुंचा हूं, उसे समझाने का प्रयत्न चित्र नहीं है, मेरे पास तो उस काम के लिए पर्याप्त साधन-सामग्री भी नहीं है। मैं अपनी उस विचार-सारणी के विकास का उल्लेख कर रहा हूं, जिससे प्रेरित होकर मैंने आखिरकार राजनीति को छोड़ा है।</p>
<p style="text-align: justify;">साभार : सर्व सेवा संघ</p>
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		<title>लोकनायक भाग २</title>
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		<pubDate>Fri, 05 Mar 2010 05:35:01 +0000</pubDate>
		<dc:creator>संजय पुरोहित</dc:creator>
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		<description><![CDATA[जे.पी और कश्मीर समस्या जे.पी. का व्यक्तित्व अनूठा था। वे स्वयं को किसी विचारधारा से बांध कर नहीं रख सके। कारण था कि हर विचारधारा में गुणों के साथ अवगुणों को भी स्वीकारना पड़ता है, जो जे.पी. के लिए संभव ]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><img src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2010/03/jayapraksah_narayan-300x198.jpg" alt="" title="jayapraksah_narayan" width="300" height="198" class="alignright size-medium wp-image-1893" /><br />
<strong>जे.पी और कश्मीर समस्या </strong><em><br />
जे.पी. का व्यक्तित्व अनूठा था। वे स्वयं को किसी विचारधारा से बांध कर नहीं रख सके। कारण था कि हर विचारधारा में गुणों के साथ अवगुणों को भी स्वीकारना पड़ता है, जो जे.पी. के लिए संभव नहीं था। इसका निराला तरीका उन्होंने यह निकाला कि हर विचारधारा के गुणों को वे अपने में समाहित करते रहे और जिन बातो को उनका ह्दय नहीं मानता था, उन्हे वे अपने पास फटकने भी नहीं देते थे। उनके व्यक्तित्व में माक्र्स, लेनिन और महात्मा गांधी का एक शानदार सम्मिश्रण था। देश की आजादी के साथ विरासत में मिली कश्मीर समस्या के प्रति उनका नजरिया भी देश हित में बदलता रहा। कश्मीर के प्रति जे.पी. के दृष्टिकोण को यदि दो अलग-अलग भागो में समझा जाये तो इसमे हमे जमीन-आसमान का अन्तर दिखलाई पड़ता है।<br />
    भारत की स्वतंत्रता के साथ ही कश्मीर का भारत में विलय हो गया। हालांकि यह पूर्णतया वैधानिक विलय था तथापि जयप्रकाश नारायण के अनुसार कश्मीर के लोगो के दिलों में भी भारतीयता की भावना होगी तभी उसका वास्तविक विलय भारत में होगा। वे केन्द्र सरकार के इस रूख से भी इत्तफाक नहीं रखते थे कि शेख अब्दुल्ला को अलग-थलग कर दिया जाये। शेख अब्दुल्ला की नीतियां भारत के समर्थन में कम थी और विरोध में अधिक थी, फिर भी जे.पी. उनके समर्थन में थे। उन्होंने शेख अब्दुल्ला के इस तर्क का भी समर्थन किया था कि कश्मीर का भविष्य कश्मीर की जनता तय करेगी।  यह केन्द्र सरकार के विरोध स्वरूप था या कोई अन्य कारण यह जे.पी. ही बेहतर जानते थे। 1953 में शेख अब्दुल्ला को जेलबन्द कर दिया गया और जे.पी. ने इसका मुखर विरोध किया। जे.पी. का तर्क भी दमदार था। उनके अनुसार शेख अब्दुल्ला के बगैर घाटी में हुए सभी चुनाव निष्पक्ष और स्वतंत्र नहीं है। एक दशक बाद जब जनमत संग्रह की बात उठी तो इसका भी जे.पी. ने समर्थन किया। इसी दौरान उनके एक वक्तव्य ने जम कर राजनीतिक गर्मी पैदा कर दी। उन्होंने कहा,‘‘मुझे यह असत्य लगता है कि कश्मीर के लोगों ने भारत से मिलने का निर्णय कर लिया था। वे (कश्मीर के लोग) ऐसा कर सकते हैं, किंतु उन्होंने अभी तक ऐसा नहीं किया है। यदि हमें कश्मीर के लोगों के निर्णय में इतना विश्वास है तो हम उन्हे द्वितीय अवसर का विरोध क्यों कर रहे हैं ? इस वक्तव्य के बाद उनके प्रति देश के अनेक राष्ट्रवादी लोगों का नजरिया नकारात्मक रूप से बदला। कुछेक ने उनकी एक सभा में पहुंच कर बेहुदगी भी की।<br />
    जे.पी. पर इन सबका कोई असर नहीं हुआ उल्टे वे 1964 में ही पाकिस्तान की यात्रा कर आए। वहां उन्होंने राष्ट्रपति अयूब खां के साथ विचार भी किया और पाकिस्तान के संयुक्त प्रतिरक्षा के विचार का समर्थन भी किया।<br />
    1965 में भारत पाकिस्तान के मध्य युद्ध हुआ। इस युद्ध के बाद जे.पी. का कश्मीर के प्रति नजरिया पूरी तरह बदला हुआ माना जा सकता है। पहले वे कश्मीर से संबंधित किसी भी वार्ता में पाकिस्तान को शामिल किये जाने का समर्थन किया करते थे वहीं अब दो टूक शब्दों में उन्होंने कहा,‘‘Kashmir chapter is closed for Pakistan.Now there are only two party remains i.e.k~ Government of India and People of J &#038; K&#8221;<br />
    जे.पी. के रूख में इस तरह के बदलाव के पीछे पाकिस्तान के प्रति उनके नजरिये में गंभीर परिवर्तन को समझा जा सकता है। उनकी नजर में यदि कश्मीर को स्वतंत्र कर दिया गया तो पाकिस्तान या तो उसके हड़प लेगा या बर्बाद कर देगा। जे.पी. ने यह स्पष्ट मत बना लिया था कि कश्मीर की भलाई इसी में है कि वह भारत का अंग बने। हालांकि उन्होंने शेख अब्दुल्ला से वार्ता का समर्थन किया लेकिन साथ ही कश्मीर की अधिक स्वायत्ता के प्रति भी उनके मन में समर्थन के भाव दिखलाई पड़ते थे।<br />
    जैसा का जे.पी. का व्यक्तित्व भी था। सही पक्ष के प्रति अपने समर्पण को उन्होंने  कभी हीन नजरों से नहीं देखा। जो सही लगा, उसका अनुसरण किया, उसके समर्थन में जुट गये। कश्मीर के बारे मे जे.पी. के द्वितीय विचार आज कितने प्रासंगिक हैं यह हम समझ सकते हैं। पाकिस्तान के हिस्से वाले कश्मीर की बदहाली और भारतीय कश्मीर का अपेक्षाकृत विकास इसकी कहानी कहता है। वहीं पाकिस्तान कश्मीर की बर्बादी के लिए जुटा हुआ है, जिसके बारे में जे.पी. ने बहुत पहले ही आगाह कर दिया था। जे.पी. के कश्मीर के प्रति विचार उनके दो नजरियों को प्रदर्शित करते हैं लेकिन दोनों  पर विचार करने से पूर्व हमें समकालीन परिदृश्य को भी मध्यनजर रखना चाहिये।<br />
<strong></p>
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		<title>लोकनायक भाग-१</title>
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		<pubDate>Sat, 27 Feb 2010 14:30:42 +0000</pubDate>
		<dc:creator>जनोक्ति डेस्क</dc:creator>
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		<description><![CDATA[जयप्रकाश का पुनर्जन्म &#8211; जवाहर लाल कौल फीनिक्स पक्षी के बारे में कहावत है कि वह जलकर अपनी ही राख से फ़िर जन्म लेता है। जेपी के बहुआयामी व्यक्तित्व के बारे में सोचते हुए मुझे अक्सर महसूस होता है कि ]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><strong>जयप्रकाश का पुनर्जन्म &#8211; जवाहर लाल कौल</strong><br />
<img src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2010/02/Jayaprakash_18165.jpg" alt="" title="Jayaprakash_18165" width="255" height="300" class="alignright size-full wp-image-1682" /><br />
फीनिक्स पक्षी के बारे में कहावत है कि वह जलकर अपनी ही राख से फ़िर जन्म लेता है। जेपी के बहुआयामी व्यक्तित्व के बारे में सोचते हुए मुझे अक्सर महसूस होता है कि सेवाग्राम के गांधी आश्रम में मैंने उन्हें अपनी ही भावनाओ से पुनर्जीवित होते देखा है। मैंने जे.पी. का एक वह रूप भी देख था जिसमें वे निराश टूटे हुए ओर हार मान चुके सिपाही से दिखाई दिए थे। मुगावली में भिंड के बागियों के समर्पण के अवसर पर वे रो रहे थे। शायद अपनी सहचरी प्रभावती की याद में। लेकिन वहां से लौटते हुए रेल के एक विशेष केबिन में मुझसे बात-बात पर कुपित होना और फ़िर रो पड़ना या सारा दोश दूसरों पर मढ़ना ओर नौजवानों को कोसाना, फ़िर हाथ पटक कह देना कि मुझसे अब कुछ नहीं होगा, मैं थ गया हूं बीमार हूं। यह किसी योद्धा या नायक के लक्षण नहीं थे। उनकी निराशा का सीध प्रभाव मेरे मन पर भी पड़ा था। मुझे लग रहा था कि जेपी हार मान चुके है। पूर्व में वे कितन ही साहसी और पहल करने वाले रहे हासें अब उन्हें लग रहा था कि उनके अपने साथी ही उनका साथ छोड़कर गए है। इंदिरा जी को वे बेटी कहा करते थे। उसी बेटी को अधिनायकवाद की ओर बढ़ते देख वे विहवल तो थे, लेकिन अपने आप को पूरी तरह बेबस महसूस कर रहे थे। मुझे लग रहा था कि इनसे किसी तरह के नेतृत्व आशा रखना व्यर्थ है। उनका शरीर ही जवाब नहीं दे चुका है उनका मन भी टूट चुका है, लेकिन परिस्थितियों ने ऐसी करवट बदली कि जेपी के मूर्छित व्यक्तित्व में हरकत होने लगी और सेवाग्राम में उन्होंने एक तूफान को जन्म दिया। यह सम्मेलन सर्वोदय समाज की आपात बैठक थी, जिसमें तय होना था कि सर्वोदय कार्यकर्ताओं को सरकरी तानाशाही और कुशासन के विरूद्ध आंदोलन में शामिल होना चाहिए कि नहीं। सर्वसेवा संघ के मुखिया यानी स्वयं विनोबा भावे इसके विरूद्ध थे। उनका मानना था कि सर्वोदय एक रचनात्मक अभियान है। इसका सामयिक राजनीति से कोई लेना देना नहीं है। लेकिन जेपी सहित अधिक्तर सदस्यों का मत था कि जब सत्ता ही जनविरोधी हो जाए तो उसके प्रति उदासीन रहना उचित नहीं।<br />
आपात स्थितियों में तो संन्यासी भी शस्त्रा उठाना अपना धर्म मानते है। इस विवाद को सुलझाने के लिए सर्वोदय कार्यकर्ताओं का यह सम्मेलन बुलाया गया था। इसमें सभी राज्य शाखाओं के पदाधिकारी शामिल हुए। एक बंद कक्ष में महत्वपूर्ण बैठक आयोजित होनी थी। इसमें प्रेस का प्रवेश वर्जित था। प्रभाष जोशी उन दिनों सक्रिय सर्वोदय कार्यकर्ता थे और मैं दिनमान के प्रतिनिधी के रूप में वहां पहुंच गया था। मैंने प्रभाष जी से अनुरोध् किया कि वे मुझे किसी तरह इस सभाकक्ष में पहुंचा दें। खादी का सिला सिलाया कुर्ता पायजामा खरीदा। अपने सिर के आकार की गांधी टोपी ली। एक प्रसिद्ध सर्वोदय कार्यकर्ता के रूप में मैं प्रभाष जोशी के साथ अंदर पहुंच कर दो सौ विशिष्ट कार्यकर्ताओं में खो गया। मेरी बस इतनी ही कोशिश थी कि उत्तर भारत का कोई कार्यकर्ता मुझे पहचान न ले। मेरा विचार है कि मंच पर बैठे एक सर्वोदय नेता ने मुझे पहचान भी लिया, लेकिन वे केवल मुस्कुरा दिए यानी मेरी इस अनुशासनहीनता से वे कुपित नहीं थे।<br />
जेपी के अनेक भाषण मैंने सुने है। उन्होंने तीन बातें साफ-साफ कहीं। एक जिम्मेदार नागरिक के नाते वे उस सब के प्रति आंखे मूंद नहीं रह सकते जो देश में हो रहा है। जिन मूल्यों और लक्ष्यों के लिए उन्होंने आजादी की लड़ाई लड़ी थी, वही जानबूझकर तिरोहित हो उसके खिलाफ आवाज उठाना मेरा पहला कर्तव्य है। उनकों दूसरी बात थी कि लड़ाई का एक ही तरीका हम जानते है, वह है अहिंसक सत्याग्रह। यही हमें गांधी से मिला है। इसी का हम उपयोग करेंगे। जेपी ने इसे एक और कोण से उचित ठहराया। उनके अनुसार सभाओं में एक समाजवादी के नाते हमेशा हिस्सा लेता रहा। जेपी पर जब बातें होती है तो मुझे भारत के चार लोगों की याद आ जाती है। इसमें महात्मा गांधी, जवाहर लाल नेहरू, सरदार बल्लभभाई पटेल और जयप्रकाश नारायण की विचारधारा की चर्चा प्रासंगिक है। गांधी के भारतीयता का पूर्ण भाव था वहीं नेहरू यूरोपीय विचारधरा के प्रति समर्पित थे। लोहिया में भारतीयता थी पर जेपी ने इन सभी से अलग यूरोपीय विचारधारा को मानते हुए भी भारतीयता में अपना पूर्ण भाव दिखाया और यही उनके विजय का कारण बना। वे यूरोपीय उदारवादी विचारधरा से पूर्णरूप से प्रभावित थे। जितने निर्मल और सदाचारी जेपी थे उतना चारों में कोई नहीं दिखता यही बात उनके राजनीति छोड़ने के बाद एक प्रमुख कारण मानी जाने लगी। हालांकि असली भारतीयता भी वही है जो गांधी ने कहा और जिसे जेपी ने आत्मसात किया। मन में, चित्त में, सत्ता जिसे कभी आकर्षित नहीं करे जो लक्ष्य के प्रति, ध्येय के प्रति समर्पित हो, जो एक अर्थ में ब्रह्मचर्य का व्रत ले ले वहीं जेपी का नाम आता है। संविधन निर्माण के बाद जो पहला चुनाव हुआ तो कांग्रेस और सोशलिस्ट दोनों उसमें हार गए। उस समय भी जेपी बहुत बड़े लोकप्रिय नेता के रूप में सबसे आकर्षक थे। जब सत्ता किसी के लिए आकर्षण होती है तो वह साधन कभी नहीं बन सकता। भारतीय समाज के उत्कर्ष में यह चुनाव एक ऐसा मोड़ के रूप में आया, जिसमें जेपी को भूदान में शरीक कर दिया। भूदान आंदोलन का आकलन भी ठीक से नहीं हुआ। उसे सिर्फ विश्व में भूदान जैसा आंदोलन कहीं नहीं हुआ। विनोबा और बाद में जेपी को इसका जितना श्रेय मिलना चाहिए वह नहीं लिया। कुछ लोगों ने जेपी के बारे में यह भी कहा कि वे राजनीति में चले गए। जिसे यह पता नहीं है कि भूदान भरतीयता की, उसके मूल विचारधरा की प्रतीक है जबकि पूरा देश यूरोपीय विचारधरा से चल रहा है। इस बात को जेपी के लिए भी एक निर्णायक फैसले के तहत कहा जा सकता है। भारत जैसे विभिन्न मत वाले देश में भूदान ने जो किया उसका आकलन अभी तक नहीं हो पाया। जेपी इसी भारतीयता के उत्कर्ष को दूसरे तरीके से राजनीति के मार्फत लोगों के सामने रखा सम्पूर्ण क्रांति की जब चर्चा होती है तो मुझे लगता है कि उन्होंने जिस ध्येय के लिए यह किया व ह पूर्ण रूप् से सफल हुआ। वैसे तो हर आंदोलन का उत्कर्ष और अपकर्ष होता है। भूदान में भी खिन्नता आई। जेपी और लोहिया के संबंध् में स्नेह और प्रतिद्वंद्विता हुई पर सफलता और असफलता के पैमाने पर यदि किसी आंदोलन और व्यक्ति की चर्चा होती तो उस लिहाज से संपूर्ण क्रांति भी सफल हुई और जेपी को उसका श्रेय मिला। लोहिया ने भी एक बार कहा कि यदि इस देश का कोई सफल नेतृत्व कर सकता है या इस देश को कभी किसी भी रूप में हिला सकता है तो वह जयप्रकाश है। जेपी जिस समय राजनीति मे आए उसे बड़ा संक्रमण का काल कहा जा सकता है बांगलादेश की लड़ाई के दौरान इंदिरा गांधी बहादुर सिपाही की उपाधि अपने उपर ले ली थी। इसका फायदा इंदिरा गांधी द्वारा यह लिया गया कि सभी संस्थाएं टूटीं, पार्टियों का अस्तित्व सत्तसा के पास विशाल पुलिस और सैन्य बल है जिसके विरूद्ध हम सशस्त्रा क्रांति नहीं कर सकते। इसलिए हमें कुछ अतिवादी गुटों या धुर साम्यवादियों का यह तर्क स्वीकार नही कि सत्ता परिवर्तन या सामाजिक क्रांति केवल हथियार से ही हो सकती है। तीसरी बात थी कि अगर सर्वोदय समाज या इसकी शीर्ष कार्यसमिति सर्वसेवा संघ यह फैसला करती है कि एक सर्वोदय कार्यकर्ता की हैसियत से सरकार विरोधी आंदोलन में शामिल नहीं हो सकते। अगर यह माना जाता है कि भ्रष्टाचार मिटाने का प्रयास सर्वोदय कार्यकर्ताओं का सरोकार नहीं हो तो मै। अपने पद से त्यागपत्रा देने को तैयार हूं। जे.पी. की इस घोषणा से खलबली मच गई।<br />
अधिक्तर कार्यकर्ताओं ने इसका जोरदार तालियों से स्वागत किया, लेकिन कुछ नेता चिंतित हो उठे। उन दिनों गुजरात के राज्यपाल के माध्यम से इंदिरा गांधी को हर तरह की सूचना मिलती रहती थी। सर्वसेवा संघ में तो सदस्य, निर्मला देशपांडे और दयानंद पटनायक बाकायदा इंदिरा जी के खिलाफ होने वाले किसी भी फैसले का डटकर विरोध् कर रहे थे।  इससे सर्वसेवा संघ में गंभीर समस्या पैदा होई। संघ का फैसला बहुमत से नहीं होता सर्वसम्मत होता है। तेरह सदस्यों में अगर एक भी सदस्य असहमत हो तो फैसला नहीं हो सकता। यहां तो दो सदस्य विरोध् करने पर तुल गए थे। गतिरोध् ऐसा था कि अंत में मामला विनोबा के पास पहुंचा। सबने फैसला उन पर छोड़ा।<br />
विनोबा ने जेपी को समझाने की कोशिश की लेकिन शीघ्र ही वे जान गए कि जेपी को आंदोलन से अलग रखना संभव नहीं था। इसलिए उन्हें मजबूरी में छूट देनी पड़ी कि सर्वोदय कार्यकर्ताओं अपनी निजी हैसियत में चाहे तो आंदोलन में शामिल हो सकते है। विनोबा की मजबूरी और जे.पी के निश्चय की बात दिनमान में बाबा बोले हां बाबा रपट में छपा। जेपी के बारे में अक्सर यह कहा जाता है कि वे बार-बार अपनी विचारधारा बदलते रहे है। कभी वे मार्क्सवादी थे और गांधीवाद की आलोचना करते थे। फ़िर गांधीवादी समाजवादी हुए और अंत में गांधीवादी। गांधीवादी रहते हुए भी कभी वे जनसंघ जैसे राजनैतिक दलों के घोर आलोचक थे। लेकिन जेपी आंदोलन के दौरान उन्होंने इसी दल का सक्रिय सहयोग लिया। इस बात को अलग दृष्टिकोण से देखा जा सकता है। जेपी एक विकासमान व्यक्तित्व थे। किसी उएक विचारधारा के कैदी बनकर रहना उन्हें स्वीकार नहीं था। मार्क्सवादी वे तब थे जब उन्हें साम्राज्यवादी शोषण के खिलाफ वही एक मात्रा शक्तिशाली आंदोलन लगता था। समाजवादी वे तब हुए जब उन्होंने साम्यवादी हिंसा के संदर्भ में भारतीय परिस्थितियों से साक्षात्कार किया। गांधी में उन्हें भारतीयता का मर्म मिला। विभिन्न विचारधारा से नहीं तानाशाही प्रवृत्ति ओर राष्ट्र के सत्व को खाने वाले भ्रष्टाचार के साथ था।<br />
इसके विरूद्ध हर उस नागरिक को एकजुट करने की आवश्यकता थी जो इन प्रवृत्तियों को राष्ट्र के लिए खतरनाक मानता था। इसलिए जेपी के विचारों में बदलाव दरअसल उन विचारयात्रा के पड़ाव थे, जिन्हें वे एक-एक करके पार कर रहे थे। इसी संदर्भ में उनकी समग्र क्रांति की भी आलोचना होती है। आलोचना का मुख्य आधार यह है कि उसमें वर्तमान हालात और समस्याओं की तर्कसंगत और व्यवहारिक हल नहीं है। लेकिन क्या गांधीजी के स्वराज और लोहिया के चैखम्बा राजा में सभी सवालों के उत्तर हैं। अगर होते तो लोहियावादी राजनैतिक दलों और गांधीवादी संगठनों के पास ठोस वैकल्पिक राजव्यवस्था अर्थशास्त्रा का खाका होता।<br />
गांधी और जेपी की गति इस मायने में समान थी कि दोनों का अधिकांश जीवन संघर्षों और आंदोलनों के बीच गुजरा। और इस बीच जो चिंतन उन्होंने किया उसका सैद्धान्तिक रूप तो वे सामने रख पाए लेकिन सिद्धान्तो को व्यावहारिक योजनाओं के रूप में विकसित करने का उन्हें मौका नहीं मिला। </p>
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