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	<title>JANOKTI : जनोक्ति :  राज-समाज और जन की आवाज &#187; क्रिकेट</title>
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		<title>अंग्रेजी पट्टे का निशान है क्रिकेट</title>
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		<pubDate>Mon, 06 Feb 2012 05:11:44 +0000</pubDate>
		<dc:creator>जयदीप शेखर</dc:creator>
				<category><![CDATA[दो-टूक]]></category>
		<category><![CDATA[क्रिकेट]]></category>
		<category><![CDATA[दो टूक]]></category>

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		<description><![CDATA[बँगला के क्रान्तिकारी कवि सुकान्तो भट्टाचार्य अपनी एक कविता में आशा व्यक्त करते हैं कि गुलामी का पट्टा खुलने के बाद हमारी गर्दन पर बब्बर शेर की तरह &#8216;अयाल&#8217; उग आयें, जिसके नीचे पट्टे के निशान छुप जाये, ढक जाये। ]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><a href="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2012/02/Cricket_india.png"><img class="alignright size-full wp-image-26260" title="Cricket_india" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2012/02/Cricket_india.png" alt="" width="300" height="300" /></a>बँगला के क्रान्तिकारी कवि सुकान्तो भट्टाचार्य अपनी एक कविता में आशा व्यक्त करते हैं कि <strong>गुलामी का पट्टा खुलने के बाद हमारी गर्दन पर बब्बर शेर की तरह &#8216;अयाल&#8217; उग आयें, जिसके नीचे पट्टे के निशान छुप जाये, ढक जाये।</strong></p>
<p style="text-align: justify;">पराधीन भारत के ये कवि अपनी युवावस्था में ही दुनिया छोड़ गये थे। बाद में गुलामी का पट्टा तो खुला, मगर अफसोस, कि कवि की आशा पूरी नहीं हुई। हमारी गर्दन पर सिंह के समान लम्बे, लहराते, रेशमी, स्वर्णिम बाल नहीं उगे&#8230; और पट्टे के निशान आज भी सारी दुनिया को दिखायी दे रहे हैं: एक- 1935 के अधिनियम के रुप में (जिसपर हमारा संविधान आधारित है); दो- राष्ट्रमण्डल के सदस्य के रुप में (जिसका प्रधान ब्रिटेन का &#8216;राजमुकुट&#8217; है); तीन- अँग्रेजी भाषा के &#8220;प्रभुत्व&#8221; के रुप में, और चार- क्रिकेट के &#8220;नशे&#8221; रुप में।</p>
<p style="text-align: justify;">जी हाँ, मैं क्रिकेट को भी गुलामी की एक निशानी मानता हूँ, क्योंकि यह सिर्फ उन्हीं देशों में खेला जाता है, जो कभी अँग्रेजों के पक्के गुलाम रहे थे! आजाद ख्यालों वाले शायद ही किसी देश में इसे खेला जाता है।</p>
<p style="text-align: justify;">अगर इसे एक &#8220;खेल&#8221; के रुप में भी अपनाया जाता, तो ठीक था, मगर क्रिकेट को तो यहाँ अब &#8220;धर्म&#8221; बताये जाने का फैशन है। हालाँकि &#8220;धर्म&#8221; यह &#8220;प्रशंसकों&#8221; के लिए है; आयोजकों-प्रायोजकों-क्रिकेटरों के लिए यह &#8220;विशुद्ध व्यवसाय&#8221; बन चुका है। इसकी चकाचौंध ने अन्यान्य खेलों की चमक को फीका कर दिया है। इसमें &#8220;खेल&#8221; या &#8220;खेल-भावना&#8221; तो अब खोजे नहीं मिलेगी। अभी-अभी &#8216;आई.पी.एल.-5&#8242; के लिए क्रिकेटर बिके- जैसे सामानों की नीलामी होती है, उसी तर्ज पर!</p>
<p style="text-align: justify;">&#8220;धर्म&#8221; या &#8220;व्यवसाय&#8221; की भावना को भी सहा जा सकता था, मगर आम जनता- खासकर, युवा पीढ़ी के लिए- यह क्रिकेट &#8220;अफीम&#8221; का काम करने लगा है।</p>
<p style="text-align: justify;">याद कीजिये- मार्क्स या लेनिन ने &#8220;धर्म&#8221; को (भारत के सन्दर्भ में) &#8220;अफीम&#8221; क्यों कहा था? क्योंकि यहाँ का शोषित वर्ग अपनी अवस्था के लिए सत्ताधारियों की नीतियों या व्यवस्था को दोषी नहीं मानता था, बल्कि &#8220;पिछले जन्मों&#8221; के कर्मों को दोषी ठहराता था। इस प्रकार, धर्म यहाँ के दबे-कुचले लोगों को क्रान्ति करने से रोकता था और उन्हें एक प्रकार से नीन्द में रखता था।</p>
<p style="text-align: justify;">वही काम आज क्रिकेट कर रहा है। यहाँ के आम लोगों (खासकर युवा पीढ़ी) का ध्यान यह देश-समाज के ज्वलन्त मुद्दों से हटाता है। यहाँ तक कि त्यौहारों को मनाने से भी यह उन्हें विरक्त करता है, क्योंकि क्रिकेट होली-दीवाली-रमजान में भी जारी रहता है!</p>
<p style="text-align: justify;">मगर &#8220;उम्मीद&#8221; है कि अब भी कायम है, और इसकी झलक मिली थी- पिछले वर्ष अन्ना के अनशन के दौरान। कँधों पर तिरंगा लिए &#8220;भारत माता की जय&#8221; से दिशाओं को गुंजायमान करते हुए देश की जो युवा पीढ़ी सड़कों पर उतरी थी, बेशक वह क्रिकेट को धर्म मानने वाली पीढ़ी ही थी!</p>
<p style="text-align: justify;">अर्थात्, सुकान्तो भट्टाचार्य की आशा अब भी कायम है&#8230; एक दिन हमारी गर्दन पर सिंह के समान लहराते अयाल उगेंगे&#8230; और गुलामी के पट्टे के सारे निशान उसके नीचे छुपेंगे&#8230;   नौजवानों के दिलों में देशभक्ति की चिंगारियाँ आज भी सुलग रही हैं&#8230; एक दिन &#8220;बदलाव&#8221; की ज्वाला भड़केगी जरूर&#8230;</p>
<p style="text-align: justify;">&nbsp;</p>
]]></content:encoded>
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		<title>फ़िर से फिक्सिंग</title>
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		<pubDate>Tue, 31 Aug 2010 06:14:13 +0000</pubDate>
		<dc:creator>रमेश भट्ट</dc:creator>
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			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><span style="color: #000000;"><img class="alignright size-medium wp-image-6419" title="PAK_CRICKET_172253e" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2010/08/PAK_CRICKET_172253e-236x300.jpg" alt="" width="236" height="300" />क्रिकेट एक बार फिर शर्मशार है। एक स्थानिय अखबार न्यूज ऑफ द वर्ल्ड के खुलासे में पाकिस्तानी क्रिकेटरों पर फिक्सिंग  का अरोप लगा है। पाकिस्तान को लॉर्ड्स में इंग्लैण्ड के खिलाफ करारी हार का सामना करना पड़ा। पाकिस्तान यह मैच एक पारी और 235 रन से हार गया जो उसकी अब तक की सबसे बडी हार है। स्कॉटलैण्ड पुलिस ने जिस सटोरिये को गिरफतार किया है उसका नाम मजहर माजिद है। यह पाकिस्तान का रहने वाला है। स्थानिय अखबार के संवादाता द्धारा किये गए स्टिंग आपरेशन में माजिद मैच फिक्सिंग के बारे में बात कर रहा है। यानि मैच से पहले स्पाट फिक्सिंग  हुई कि कौन सी गेन्द नो बॉल फेंकनी है। बहरहाल इस पूरे प्रकरण में जांच चल रही है। माजिद के बारे में कहा गया है कि पाकिस्तान मूल का लन्दन निवासी यह व्यक्ति कई पाकिस्तानी खिलाड़ियों का गहरा दोस्त है। बहरहाल क्रिकेट को कलंकित करने वाले इन क्रिकेटरों पर आजीवन प्रतिबंध लगाने से कुछ नही होगा। आइसीसी को कोई कठोर कदम उठाना होंगें। यह पहला मौका नही जब किसी खिलाड़ी पर मैच फिक्सिंग  का अरोप लगा है। 1993 में वसीम अकरम पर आरोप लगा कि उन्होनें तेंज गेन्दबाज अताउर रहमान को लचर प्रदर्शन  करने के लिए एक लाख रूपये की पेशकश की। बाद में उन्हें इस घटनाक्रम के चलते अपनी कप्तानी गंवानी पड़ी थी। 1994 में कप्तान सलीम मलिक पर भी मैच फिक्सिंग  के चलते आजीवन प्रतिबंध लगा दिया गया। साल 2000 कम से कम भारतीयों के लिए एक सदमा था। दक्षिण अफ्रीका  के पूर्व कप्तान हैंसी क्रोनिए के खुलासे ने पूरी दुनिया में हड़कंप मचा दिया। इस घटनाक्रम में अजय जडेजा और मोहम्मद अजरूदीन के भी नाम सामने आए। इतना ही नही पाकिस्तान के लेग स्पीनर दानिश कनेरिया और कामरान अकमल पर भी यह आरोप लगे। इससे बता चलता है कि सटोरिया की खिलाड़ियों के बीच जबरदस्त घुसपैठ है। खासकर पाकिस्तानी टीम पर आए दिन किसी न किसी विवाद में छाई रहती है। आखिर कब तक आइसीसी पाकिस्तान की टीम पर चुप्पी साधे बैठा रहेगा। उसके खिलड़ियों पर आए दिन आरोप लगते रहते है। पाकिस्तान के पूर्व कोच बॉब वूल्मर की हत्या का क्या राज था। श्रीलंकाई टीम पर जानलेवा हमला किसकी साजिश का नतीजा था। पाकिस्तानी गेन्दबाज आए दिन खेल के दौरान गेन्द से खिलवाड़ करते है। कहते है की शरीर का अगर कोई अंग खराब हो जाए तो उसे काट दिया जाता है। आज क्रिकेट कुछ लोंगों की वजह से कलंकित है खासकर पाकिस्तान। लिहाज क्रिकेट की गरिमा के बनाए रखने के लिए पाकिस्तानी क्रिकेटरों पर प्रतिबंध लगाना न सिर्फ  आवश्यक है बल्कि इस टीम को विश्वकप से भी बाहर का रास्ता दिखा देना चाहिए।</span></p>
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		<title>आईपीएल के रोमांच के लिए हो जाइए तैयार</title>
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		<pubDate>Fri, 12 Mar 2010 10:13:50 +0000</pubDate>
		<dc:creator>पुष्पेन्द्र आल्बे</dc:creator>
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		<description><![CDATA[2008 में आईपीएल के पहले सत्र के उदघाटन समारोह के दौरान लीग के चेयरमैन ललित मोदी की आंखों में एक ख्वाब स्पष्ट तौर पर दिखाई दे रहा था. यह ख्वाब भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड बीसीसीआई को और ज्यादा अमीर बनाने ]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><img class="alignright size-medium wp-image-2049" title="indian-premier-league-ipl-3-2010-cricket-match-schedule1" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2010/03/indian-premier-league-ipl-3-2010-cricket-match-schedule1-300x211.jpg" alt="" width="300" height="211" />2008 में  आईपीएल के पहले सत्र के उदघाटन समारोह के दौरान लीग के चेयरमैन ललित मोदी  की आंखों में एक ख्वाब स्पष्ट तौर पर दिखाई दे रहा था. यह ख्वाब भारतीय  क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड बीसीसीआई को और ज्यादा अमीर बनाने को लेकर नहीं था.  मोदी यह ख्वाब अपनी महत्वाकांक्षी इंडियन प्रीमियर लीग की बेहतरी को लेकर  देख रहे थे. आईपीएल, यानी कि एक ऐसा टूर्नामेंट जिसमें ऑस्ट्रेलिया, दक्षिण  अफ्रीका,  इंग्लैंड, न्यूजीलैंड, श्रीलंका, वेस्टइंडीज समेत क्रिकेट की दुनिया के  सभी दिग्गज, युवा और उभरते हुए खिलाड़ियों को एक ही मंच पर अपनी प्रतिभा  दिखाने का मौका मिलता है. क्रिकेट की दुनिया में यह एक ऐसी प्रतियोगिता  साबित हो रही है, जिसमें गेंद और बल्ले के इस खेल का कायाकल्प कर देने की  संभावनाएं छुपी हुई हैं. इसीलिए मोदी ने 2008 में लीग का आगाज करते हुए कहा  था- ‘यह एक नया और अभिनव  प्रयोग है, जो क्रिकेट के विकास में सहायक होगा.’ और आज, 12 मार्च को, जब  देर रात आईपीएल के तीसरे संस्करण का रंग-बिरंगा आगाज होगा, तो मोदी के इस  सपने का भागीदार पूरा देश बनेगा.</p>
<p>मोदी की बात सही भी है. खास बात यह है कि यह चैंपियंस लीग बीसीसीआई  के लिए पैसा कमाने का जरिया भर नहीं है. क्रिकेट की दुनिया के सबसे रईस  बोर्ड बीसीसीआई पर हमेशा ही खेल  का औद्योगिकीकरण करने का आरोप लगता रहा है. विश्व क्रिकेट में बीसीसीआई का  बढ़ता प्रभुत्व इसके सशक्त उदाहरण हैं. लेकिन लगता है आईपीएल के साथ  बीसीसीआई ने अपनी प्रतिष्ठा को सुधारने का मन भी बना लिया है. असल में,  आईपीएल पूरी तरह से क्रिकेट को बढ़ावा देने वाली परिकल्पना है. ललित मोदी  के मुताबिक- ‘यह लीग अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट खेलने वाले सभी देशों की घरेलू  टीमों और खिलाड़ियों  को एक नया मंच प्रदान करेगी.’ मोदी की बात सही भी है. आईपीएल में  अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट के दिग्गज खिलाड़ियों की ही भरमार नहीं है, बल्कि  प्रथम श्रेणी क्रिकेट खिलाड़ियों को भी तवज्जो दी गई है. असल में यह  अंतरराष्ट्रीय और घरेलू खिलाड़ियों का सामंजस्य है.</p>
<p>मोदी का मानना है कि आईपीएल घरेलू  क्रिकेट के स्तर को सुधरने में अहम भूमिका  निभाएगी, क्योंकि लीग में खेलने का मौका हासिल करने के लिए सभी देशों के  घरेलू क्रिकेटरों को अच्छा प्रदर्शन करने की प्रेरणा मिलेगी. इसके साथ ही  घरेलू क्रिकेट में उम्दा प्रदर्शन कर रहे खिलाड़ियों को अपनी राष्ट्रीय  टीमों के चयनकर्ताओं और आईपीएल के टीम मालिकों का ध्यान अपनी ओर खींचने का  मौका भी मिलेगा.’ आईपीएल के चलते अंतरराष्ट्रीय क्रिकेटर भी अपनी घरेलू  टीमों की ओर से  खेलने के लिए प्रेरित होंगे. आमतौर पर राष्ट्रीय टीम में जगह बना लेने के  बाद खिलाड़ी घरेलू क्रिकेट को लेकर उदासीन रवैया अपना लेते हैं. लेकिन  आईपीएल में खेलने की इच्छा के चलते अंतरराष्ट्रीय क्रिकेटरों ने भी अपनी  घरेलू टीम को भी तवज्जो देना शुरू कर दिया है. श्रीलंका इसकी सबसे उम्दा  मिसाल हैं, जहां आईपीएल की शुरूआत से ठीक पहले आयोजित की गई घरेलू  ट्वेंटी-20 स्पर्धा में सनत  जयसूर्या, कुमार संगकारा, मुरलीधरण जैसे सभी बड़े खिलाड़ियों ने हिस्सा  लिया.</p>
<p>क्रिकेट में संभावित  इन्हीं सकारात्मक बदलावों के चलते ललित मोदी इसे विश्व क्रिकेट में स्थापित  कर देना चाहते हैं. मोदी के मुताबिक- ‘आईपीएल सिर्फ भारत में ही आयोजित  नहीं होगी, बल्कि दूसरे देशों को भी इसकी मेजबानी का पूरा मौका मिलेगा.’  दक्षिण अफ्रीका का इसकी  उम्दा मिसाल है, जहां पिछले साल आईपीएल बेहद कामयाब साबित हुआ था. इसके  साथ ही आगामी सत्रों में मोदी लीग में टीमों की संख्या बढ़ाने के बारे में  भी सोच सकते हैं. फिलहाल तो मोदी के साथ ही समूची क्रिकेट बिरादरी आईपीएल  के तीसरे संस्करण का स्वागत करने के लिए तैयार हो रही है. और आज से, भारतीय  क्रिकेटप्रेमियों सहित समूची दुनिया के क्रिकेटप्रेमियों का दिल आईपीएल के  लिए ही धड़केगा.  आप भी पैंतालिस दिनों के इस रोमांच के लिए अभी से तैयार हो जाइए.</p>
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		<title>सचिन की उपलब्धियों को स्वीकारने का वक्त</title>
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		<pubDate>Sun, 07 Mar 2010 06:19:39 +0000</pubDate>
		<dc:creator>पुष्पेन्द्र आल्बे</dc:creator>
				<category><![CDATA[खेल-कूद]]></category>
		<category><![CDATA[bcci]]></category>
		<category><![CDATA[indian cricket team]]></category>
		<category><![CDATA[sachin tendulkar]]></category>
		<category><![CDATA[क्रिकेट]]></category>
		<category><![CDATA[सचिन तेंदुलकर]]></category>
		<category><![CDATA[‘भारत-रत्न’]]></category>

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		<description><![CDATA[तकरीबन दो सप्ताह पहले दक्षिण अफीका के खिलाफ एकदिवसीय श्रंखला के दौरान ग्वालियर वनडे में दो सौ रनों की कीर्तिमान भरी पारी खेलकर समूचे देश को मंत्रमुग्ध कर देने वाले सचिन तेंदुलकर को लेकर अब देश में एक नई बहस ]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><img src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2010/03/88068-413x600.jpg" alt="" title="88068" width="413" height="600" class="alignright size-large wp-image-1925" />तकरीबन दो सप्ताह पहले दक्षिण अफीका के खिलाफ एकदिवसीय श्रंखला के दौरान ग्वालियर वनडे में दो सौ रनों की कीर्तिमान भरी पारी खेलकर समूचे देश को मंत्रमुग्ध<br />
कर देने वाले सचिन तेंदुलकर को लेकर अब देश में एक नई बहस छिड़ गई है. यह बहस सचिन को देश का सर्वोच्च पुरस्कार ‘भारत-रत्न’ दिए जाने के मुद्दे पर छिड़ी है. उम्मीद के मुताबिक ही सवा अरब से ज्यादा की आबादी वाले क्रिकेट के दीवाने इस देश की नब्बे फीसदी से भी ज्यादा आबादी सचिन को यह पुरस्कार दिए जाने के हक में है. हालांकि कुछेक फीसदी लोग ऐसे भी है, जिन्हें सचिन को यह पुरस्कार दिया जाना उचित नहीं लगता. लेकिन सचिन को भारत रत्न दिए जाने का विरोध करने वाले ऐसे लोगों का आंकड़ा आटे में नमक के बराबर है.</p>
<p>सच यह है कि भारत की आबादी का एक बड़ा हिस्सा सचिन को यह पुरस्कार दिए जाने के पक्ष में है. भारत रत्न, देश का सर्वोच्च सम्मान है, जो 1947 में आजादी मिलने के बाद अब तक इकतालिस शख्सियतों को दिया जा चुका है. आजाद भारत के पहले राष्ट्रपति डा०  राजेंद्र प्रसाद ने 2 जनवरी 1954 को भारत रत्न सम्मान पर अपनी मुहर लगाई थी और 1954 में ही भारत के पहले उप-राष्ट्रपति सर्वपल्ली राधाकृष्णन को सबसे पहले इस सम्मान से नवाजा गया. आमतौर यह सम्मान राजनीतिक, सांस्कृतिक और सामाजिक क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान के लिए दिया जाता है. 1954 के बाद ‘भारत-रत्न’ अभी तक सीवी रमन, जवाहरलाल नेहरू, इंदिरा गांधी, उस्ताद जाकिर हुसैन, डा०  राजेंद्र प्रसाद, लाल बहादुर शास्त्री, राजीव गांधी, सरदार वल्लभ पटेल, मोरारजी देसाई, डाॅ अब्दुल कलाम, रवि शंकर और अर्मत्य सेन जैसी महान शख्सियतों को भारत के सामाजिक, राजनीतिक क्षेत्र में योगदान के लिए दिया जा चुका है. </p>
<p>और अब, समूचे देश में सचिन तेंदुलकर को यह सम्मान देने की मांग उठने लगी है. ऐसे में पहले यह परखना जरूरी हो जाता है कि क्या सचिन देश के इस सर्वोच्च सम्मान को पाने के हकदार है ? अतीत में भारत-रत्न पाने वाली महान विभूतियों के नामों पर नजर दौड़ाएं तो स्थिति ज्यादा स्पष्ट हो जातीे है. नेहरू-गांधी परिवार के सदस्यों को भारतीय राजनीति में अहम योगदान के लिए इस सम्मान से नवाजा गया. वहीं, लता मंगेशकर, भीमसेन जोशी और पंडित रवि शंकर को कला क्षेत्र में भारत का मान बढ़ाने के लिए यह पुरस्कार दिया गया. इसी तरह डा० अब्दुल कलाम आजाद को तकनीक के क्षेत्र में भारत का नाम वैश्विक मंच पर सुनहरे अक्षरों में दर्ज कराने के लिए ‘भारत-रत्न’ से सम्मानित किया गया. निस्संदेह, ये सभी भारतीय सरजमीं पर जन्मी वे महान शख्सियतें है, जिन्होंने अपने कर्मों से भारत का गौरव बढ़ाया. </p>
<p>जाहिर है, गांधी-नेहरू परिवार ने जो योगदान भारतीय राजनीति में दिया, डा० अब्दुल कलाम ने जो योगदान भारत की तकनीकी विकास में दिया और पंडित रवि शंकर व उस्ताद जाकिर हुसैन ने जो योगदान कला के क्षेत्र में दिया, वैसा ही योगदान सचिन तेंदुलकर भी खेल के क्षेत्र में दे रहे हैं. पिछले दशक से भी ज्यादा समय से सचिन ने क्रिकेट के मैदान पर सिर्फ कीर्तिमान ही नहीं बनाएं है, बल्कि भारतीय क्रिकेट का झंडा भी बुलंद किए रखा है. सैंतीस वर्षीय सचिन भारतीय क्रिकेट का पर्याय हैं, तो सिर्फ इसलिए कि उन्होंने दुनिया के प्रत्येक कोने में भारतीय टीम के लिए मैच जीते हैं, उसकी साख बढ़ाई है. मैदान में उनकी मौजूदगी ही करोड़ों भारतीयों को इस बात की गारंटी देती है कि मैच में उनकी टीम जीत हासिल कर सकती है. आज शाहरूख खान, प्रिटी जिंटा जैसे फिल्मी सितारे और मुकेश अंबानी व विजय माल्या जैसे उद्योगपति भी अगर क्रिकेट में पैसा निवेश कर रहे हैं, तो यह सिर्फ सचिन की बदौलत है. सचिन के खेल से क्रिकेट भारत का सर्वाध्कि पसंदीदा खेल बना और उसमें ग्लैमर और पैसा आया. </p>
<p>फिर, सचिन का योगदान सिर्फ क्रिकेट के मैदान तक ही सीमित नहीं है. पिछले एक दशक से भी ज्यादा समय से वे भारत की एकमात्र ऐसी शख्सियत बने हुए है, जिसके नाम पर समूचा देश एकजूट हो जाता है. उत्तर से लेकर दक्षिण तक और पूर्व से लेकर पश्चिम तक, सचिन का जादू देश के हर कोने में महसूस किया जा सकता है. वे देश के सबसे बड़े ब्रांड एम्बेसडर है और एकता के प्रतीक भी. समूचे देश को एकजूट करने का माद्दा न तो भारतीय फिल्मों के महानायक अमिताभ बच्चन में है और न ही देश को संचालित करने वाली सरकारों के किसी नेता में है. यह करिश्मा सिर्फ सचिन में है. हाल ही में बाल ठाकरे के साथ सचिन के एक तथाकथित विवाद ने इस बात पर मूहर भी लगा दी, जब समूचे देश के साथ ही मराठीभाषी भी सचिन के साथ खड़े दिखाई दिए थे. </p>
<p>इसके साथ ही, सचिन की जीवनशैली और उनका नजरिया भी क्रिकेट के मैदान पर उनके द्वारा बनाए गए कीर्तिमानों से कम नहीं है. क्रिकेट की दुनिया का हर कीर्तिमान अपने नाम दर्ज होने, करोड़ों रूपए की सालाना कमाई करने और शोहरत के शिखर पर आसिन होने के बावजूद सचिन के पैर अभी भी जमीन पर टिके हुए हैं. उनके व्यहार की सरलता और मासूम मुस्कान भी उनके चैको-छक्कों की तरह ही प्रत्येक भारतीय को मंत्रमुग्ध कर देती है. देश की युवा पीढ़ी के लिए सचिन की जीवनशैली एक मिसाल है, जो सिखाती है कि दौलत-शोहरत के बावजूद विनम्र बनकर कैसे रहा जाता है. देश को लेकर उनका नजरिया भी मंत्रमुग्ध कर देने वाला रहता है. राज ठाकरे और बाल ठाकरे जैसे पथभ्रष्ट राजनेताओं की ‘देश बांटो , राज करो’ की नीति को धता बताते हुए सचिन को यह कहने में गर्व होता है कि वे पहले एक भारतीय है, उसके बाद महाराष्ट्रीयन. यह कहने का साहस न तो उत्तरप्रदेश से आए अमिताभ बच्चन में है और न ही दिल्ली से आए शाहरूख खान में. यह कहने का साहस सिर्फ सचिन तेंदुलकर में है, जो पिछले दो दशकों से भारतीय तिरंगा अपने हेलमेट पर लगाकर मैदान में सिर्फ भारतीय क्रिकेट की विजय के लिए उतरता रहा है. </p>
<p>जाहिर है, सचिन को भारत-रत्न दिए जाने के मुद्दे पर विवाद खड़ा करने में कोई तुक नहीं है. खेल के क्षेत्र में उनका वही योगदान है, जो राजनीति में गांधी-नेहरू परिवार और कला में लता मंगेशकर, भीमसेन जोशी और पंडित रवि शंकर का. आलोचकों का तर्क है कि देश के इतिहास में आज तक किसी भी खिलाड़ी को यह सम्मान नहीं दिया गया है. अगर यह मान भी लिया जाएं कि नहीं दिया गया है, लेकिन अब सचिन को दे दिया जाए तो इसमें बुराई क्या है. भारत रत्न में जरूरत पढ़ने पर संसोध्न किया जा सकता है, यह तभी स्पष्ट हो गया था जब दक्षिण अफीका के महान स्वतंत्रता सेनानी नेल्सन मंडेला को ‘भारत-रत्न’ से सम्मानित किया गया था. सम्मान की नियमावली से बाहर जाते हुए 1987 में पाकिस्तानी स्वतंत्रता सेनानी खान अब्दुल गफार खान को भी ‘भारत-रत्न’ से नवाजा जा चुका है. तो अगर ऐसे में सचिन भारत-रत्न पाने वाले पहले खिलाड़ी बन सकते हैं, तो इसमें कोई बुराई नहीं है. कुछ अन्य आलोचकों का यह भी मानना है कि सचिन की उम्र इस सम्मान को पाने के लिए बहुत कम है. इसका मतलब तो यह है कि हमें सचिन की उपलब्धियों ;जो उन्होंने क्रिकेट के मैदान में सैंतीस साल की उम्र में ही हासिल कर ली, को स्वीकार करने के लिए उनके साठ या अस्सी साल तक होने का इंतजार करना चाहिए. इन्हीं नीतियों के चलते भारत सरकार ने भीमसेन जोशी जैसी महान शख्सियत को ‘भारत-रत्न’ से सम्मानित करने में साठ साल लगा दिए. तो क्या हमें वहीं गलती सचिन तेंदुलकर के मामलें में भी करनी चाहिए. जाहिर है, यह गलती शर्मनाक साबित हो सकती है. अगर सचिन भारत-रत्न के लायक हैं, तो उन्हें यह सम्मान अभी दिया जाना चाहिए, न कि उनके साठ या अस्सी साल के होने पर.</p>
<p>इसीलिए, देश के राजनीतिक गलियारों में भी सचिन के पक्ष में खड़े होने का सिलसिला शुरू हो गया है. महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण ने स्पष्ट कर दिया है कि वे केंद्र के पास सचिन को ‘भारत-रत्न’ दिए जाने का प्रस्ताव भेजेंगे. क्रिकेट की दुनिया के भूतपूर्व महानतम खिलाड़ियों-रवि शास्त्री, नवजोतसिंह सिद्धू और सौरव गांगुली ने भी सचिन को सम्मान दिए जाने की वकालत की है. यहां तक कि बदले हुए हालात के मद्देनजर बाल ठाकरे ने भी सचिन को ‘भारत-रत्न’ का सच्चा दावेदार करार दिया है. चंद दिनों पहले मराठी मुद्दें पर सचिन की खिलाफत करके फजीहत करा चुके बाल ठाकरे ने अब ऐलान कर दिया है कि भारतीय क्रिकेट का यह कोहिनुर अभी भी करोड़ों भारतीयों के दिलों में ‘रत्न’ की तरह विराजमान है. </p>
<p>सचिन अगर ‘भारत-रत्न’ पाने में कामयाब हो जाते हैं, तो वे कईं नए कीर्तिमान स्थापित करेंगे. वे ‘भारत-रत्न’ लेने वाले सबसे कम उम्र के भारतीय तो बनेंगे ही, सम्मान पाने वाले पहले खिलाड़ी भी बन जाएंगे. एक ऐसे सच्चे भारतीय, जिसने पिछले दो दशकों से भारतीय क्रिकेट की शान को बनाए रखा है, के नाम पर अगर यह कीर्तिमान दर्ज हो जाते हैं, तो इसमें कोई बुराई नहीं है. सही मायनों में, यह सचिन का विरोध करने का नहीं, उनकी उपलब्धियों को स्वीकार करते हुए उनके पक्ष में खड़े होने का समय है. </p>
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		<title>सचिन तेंदुलकरः महानता पर सवाल नहीं</title>
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		<pubDate>Thu, 25 Feb 2010 10:34:43 +0000</pubDate>
		<dc:creator>पुष्पेन्द्र आल्बे</dc:creator>
				<category><![CDATA[खेल-कूद]]></category>
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		<description><![CDATA[समाचार पत्र में खेल संपादक होने के नाते कल का दिन मेरे लिए भी उतना ही ऐतिहासिक था, जितना कि करोड़ों भारतीय क्रिकेट प्रेमियों के लिए. बतौर खेल संपादक दैनिक जागरण, दैनिक भास्कर, प्रभात किरण जैसे मीडिया संस्थानों में पिछले ]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><img src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2010/02/1056635402-300x207.jpg" alt="" title="सचिन तेंदुलकर" width="300" height="207" class="alignright size-medium wp-image-1788" />समाचार पत्र में खेल संपादक होने के नाते कल का दिन मेरे लिए भी उतना ही ऐतिहासिक था, जितना कि करोड़ों भारतीय क्रिकेट प्रेमियों के लिए. बतौर खेल संपादक दैनिक जागरण, दैनिक भास्कर, प्रभात किरण जैसे मीडिया संस्थानों में पिछले छह साल के कार्यकाल के दौरान मैंने हमेशा ही यह माना कि एकदिवसीय क्रिकेट में दो सौ रनों के एवरेस्ट को कुछेक खिलाड़ी ही पार कर सकते हैं. इन खिलाड़ियों में मैं सचिन तेंदुलकर के साथ ही वेस्टइंडीज के क्रिस गेल, पाकिस्तान के शाहिद अफरीदी, श्रीलंका के सनत जयसूर्या और भारत के वीरेंद्र सहवाग को शामिल किए हुए था. और कल मेरी वह उम्मीद पूरी हुई, जब सचिन ने दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ दोहरे शतक का कारनामा कर दिखाया.</p>
<p>लेकिन इस लेख में बहस का मुद्दा सचिन का दोहरा शतक नहीं है. यहां बहस का मुद्दा यह है कि आखिर कीर्तिमानों के शिखर पर खड़ा होने के बावजूद सचिन को क्रिकेट इतिहास का महानतम बल्लेबाज क्यों नहीं माना जाता ? आखिर टेस्ट, एकदिवीय क्रिकेट के हर कीर्तिमान को अपने नाम करने के बावजूद सचिन को महानतम खिलाड़ियों में से एक क्यों माना जाता है, महानतम क्यों नहीं ? क्या यह सचिन की उपलब्धियों को लेकर पूर्वाग्रह है? या फिर क्या, सचिन को वह क्रेडिट नहीं दिया जा रहा है, जिसके वे हकदार हैं ?</p>
<p>यह सारी बातें दिमाग में इसलिए आती हैं, क्योंकि कल सचिन के दोहरे शतक के कीर्तिमान के बाद टीवी समाचार चैनलों पर जो कुछ भी बहसबाजी दिखी, उसमें किसी न किसी तरह से यह साबित करने की कोशिश की गई कि सचिन कीर्तिमानों के शिखर पर खड़े होने के बावजूद अभी भी सर्वकालिक महान बल्लेबाज नहीं है. आईबीएन सेवन पर आशुतोष यह बात करते नजर आएं, तो आज तक पर कपिल देव कह रहे थे कि भारत का महानतम बल्लेबाज अभी भी सुनील गावस्कर है. दूसरे चैनलों पर भी मनिंदर सिंह, यशपाल शर्मा जैसे भूतपूर्व क्रिकेटर सचिन को महानतम बल्लेबाज कहने से परहेज ही करते नजर आएं.</p>
<p>जाहिर है, यह सारी बातें बेफिजूल की हैं. और इस बात के पर्याप्त प्रमाण भी हैं. बात सचिन के कीर्तिमानों से शुरू करते हैं. एकदिवसीय क्रिकेट में उनके नाम सत्रह हजार से ज्यादा रन, छियालिस शतक दर्ज हैं. इसी तरह टेस्ट क्रिकेट में तेरह हजार से ज्यादा रन और सैंतालिस शतक उनकें नाम दर्ज है. मतलब, क्रिकेट के दोनों संस्करणों में उनके नाम तीस हजार से ज्यादा रन और नब्बे से ज्यादा शतक दर्ज हैं. अब महान खिलाड़ी होने के दूसरे दावेदारों ब्रेडमेन और विवियन रिचर्ड्स से सचिन की तुलना करें तो बात आईनें की तरह साफ हो जाती है. बे्रडमेन का टेस्ट क्रिकेट में 99 के औसत का कीर्तिमान यकीनन ऐसा है, जिस तक सचिन भी नहीं पहुंच सकते. लेकिन यहां यह बात भी नहीं भूलनी चाहिए कि ब्रेडमेन ने अपनी ज्यादा क्रिकेट इंग्लैंड के साथ खेली, यानी कि मात्र एक टीम के साथ. दूसरे, उस जमानें में तकनीक इस कदर विकसित नहीं थी कि आउट होने के सभी फैसलें बिल्कुल सही मान लिए जाएं. रन आउट, पगबाधा और नजदीकी कैंचों जैसे मामलों में मैदानी अंपायर का फैसला ही सर्वमान्य होता था, जो गलती भी कर जाते थे. लेकिन आज सचिन उस युग में खेलते हैं, जहां एक दर्जन कैमरें उनके आउट होने पर अपनी मुहर लगाने को तैयार रहते हैं. मतलब साफ है ब्रेडमेन तकनीक के न होने से कई बार आउट होने के बावजूद नाटआउट रहे होंगे, जबकि सचिन के लिए आउट का मतलब आउट है. तीसरे, बे्रडमेन के जमाने में एकदिवसीय क्रिकेट नहीं था, जबकि सचिन ने एकविसीय क्रिकेट को नई पहचान दी है. कहा जा सकता है कि अगर उस जमाने के सर्वकालिक महान बल्लेबाज ब्रेडमेन थे, तो आधुनिक क्रिकेट के सर्वकालिक महान बल्लेबाज सिर्फ सचिन ही हैं. इसी तरह का मामला रिचर्ड्स  के साथ भी है. यकीनन, रिचर्ड्स ने एकविसीय क्रिकेट में सचिन से ज्यादा महान पारियां खेली हैं, लेकिन उनका जादू सिर्फ एकदिवसीय क्रिकेट तक ही सीमित था, टेस्ट क्रिकेट में वे उस तरह की कामयाबियां हासिल नहीं कर पाए. लेकिन सचिन एक संपूर्ण बल्लेबाज है, जिन्होंने एकविसीय और टेस्ट दोनों संस्करणों में नए कीर्तिमानों का शिखर खड़ा किया. रही बात सुनील गावस्कर से तुलना की तो, इस तुलना का आधर ही गलत है. गावस्कर ने अपने एकदिवसीय क्रिकेट में मात्र एक शतक लगाया, जबकि सचिन पचास शतक पूरे करने वाले हैं. </p>
<p>फिर, महानता सिर्फ आंकड़ों के आधर पर ही तय नहीं होती. खिलाड़ी के उस खेल पर प्रभाव को भी इसमें तवज्जो दी जाती है. सचिन भारतीय क्रिकेट में ही नहीं, विश्व क्रिकेट में भी पैसा लाएं. आज अगर युवराज सिंह और महेंद्रसिंह धोनी जैसे युवा आईपीएल के एक सत्र के लिए चार-पांच करोड़ रूपए ले रहे हैं, तो यह सचिन की बदौलत ही है. वे क्रिकेट में ग्लैमर लाएं और ग्लैमर से पैसा आया. </p>
<p>इसी तरह इस तथ्य को भी मानना होगा कि सचिन पिछले इक्कीस सालों से भारत के सबसे बड़े मैच विजेता बल्लेबाज बने हुए हैं. उनके खेल में वो निरंतरता है, जो विश्व क्रिकेट के अन्य किसी खिलाड़ी के कॅरिअर में देखने को नहीं मिली. 1989 से कॅरिअर की शुरूआत करने वाले सचिन की रनों की भूख अभी भी कायम है. वे अभी भी भारत को मैच जिता रहे हैं. 1989 में ही विश्व क्रिकेट के दो अन्य महान बल्लेबाजों ब्रायन लारा और सनत जयसूर्या ने भी अपने कॅरिअर का आगाज किया था. लारा दो साल पहले ही क्रिकेट से सन्यास ले चुके हैं, जबकि जयसूर्या टेस्ट क्रिकेट से सन्यांस के बाद एकदिवसीय और ट्वेंटी-20 तक ही सीमित हो गए हैं. 1989 में ही सचिन के साथ कॅरिअर की शुरूआत करने वाले वकार युनूस और माइकल टेलर जैसे खिलाड़ी कईं साल पहले संन्यास लेकर भूतपूर्व खिलाड़ियों की जमात में शामिल हो चुके हैं. लेकिन सचिन का बल्ला आज भी भारत के लिए मैच जीत रहा है.</p>
<p>इसलिए सचिन की आलोचना नहीं, तारीफ कीजिए. ग्वालियर वनडे में उन्होंने जो कीर्तिमान रचा, वह उनकी नियति थी. इससे पहले भी सईद अनवर, 194 सनत जयसूर्या 189 और विव रिचडड्र्स 189 जैसे बल्लेबाज दोहरा शतक जड़ने के बिल्कुल करीब पहुंच गए थे. लेकिन वे यह कारनामा नहीं कर पाएं, क्योंकि यह कारनामा भी अन्य कीर्तिमानों की तरह ही सचिन के नाम ही दर्ज होना था. और ग्वालियर वनडे में यह इतिहास दर्ज भी हो गया. कम से कम अब तो किसी को इस बात में शक नहीं होना चाहिए कि सचिन आधुनिक क्रिकेट के महान नहीं, महानतम बल्लेबाज हैं. </p>
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