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	<title>JANOKTI : जनोक्ति :  राज-समाज और जन की आवाज &#187; कालाबाजारी</title>
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		<title>क्या आपके मुंह में ताला लगा है ?</title>
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		<pubDate>Wed, 14 Jul 2010 05:49:00 +0000</pubDate>
		<dc:creator>डा ० पुरुषोत्तम मीणा</dc:creator>
				<category><![CDATA[विचार -विमर्श]]></category>
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		<description><![CDATA[आज जबकि कदम-कदम पर लोगों के मान-सम्मान को बेरहमी से कुचला जा रहा है। अधिकतर लोगों के कानूनी, संवैधानिक, प्राकृतिक एवं मानव अधिकारों का खुलेआम हनन एवं अतिक्रमण हो रहा है। हर व्यक्ति को मनमानी, गैर-बराबरी, भेदभाव एवं भ्रष्टाचार का ]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><img class="alignleft size-medium wp-image-4566" title="shut up" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2010/07/shut-up-300x210.gif" alt="" width="300" height="210" />आज जबकि कदम-कदम पर लोगों के मान-सम्मान को बेरहमी से कुचला जा रहा है। अधिकतर लोगों के कानूनी, संवैधानिक, प्राकृतिक एवं मानव अधिकारों का खुलेआम हनन एवं अतिक्रमण हो रहा है। हर व्यक्ति को मनमानी, गैर-बराबरी, भेदभाव एवं भ्रष्टाचार का सामना करना पड रहा है।</p>
<p style="text-align: justify;">विकलांग, वृद्ध, निःशक्तजन, छोटे -बड़े , बीमारों एवं महिलाओं को संरक्षण देना तो दूर, उनके प्रति लोगों में संवेदनाएँ ही समाप्त होती जा रही है। अपना सब कुछ दाँव पर लगाकर परिवार का पालन करने हेतु व्यवसाय करने वाले व्यवसाईयों को भी हफ्ता व कमीशन देना, मजबूरी हो चुका है। गरीबी रेखा से नीचे (बीपीएल) जीवन जीने वाले परिवारों के राशन की कालाबाजारी करने के अपराधी-अभाव व तंगहाली का जीवन जीने वाले लोगों को समाज के विरुद्ध अपराध करने को मजबूर कर रहे हैं।</p>
<p style="text-align: justify;">रसोई-गैस सिलेण्डरों की सरेआम कालाबाजारी एवं उनका व्यावसायिक उपयोग करने वाले कुछ चालाक लोगों की मनमानी के कारण देशभर में समस्त रसोई गैस उपभोक्ता, महंगी रसोई गैस की मार झेलने को विवश हैं। जनता की सेवा के लिये नियुक्त लोक सेवक (पब्लिक सर्वेण्ट) जनता के मालिक बन बैठे हैं और जनहित के लिये स्वीकृत बजट से अपने ऐश-ओ-आराम के साधन जुटा रहे हैं। ऐसी अनेकों प्रकार की नाइंसाफी, मनमानी एवं गैर-कानूनी गतिविधियाँ केवल इसलिये ही नहीं चल रही हैं कि सरकार एवं प्रशासन में बैठे लोग निकम्मे, निष्क्रिय और भ्रष्ट हो चुके हैं, बल्कि ये सब इसलिये भी तेजी से फल-फूल रहे हैं, क्योंकि हम आजादी एवं स्वाभिमान के मायने भूल चुके हैं। सच तो यह है कि हम इतने कायर, स्वार्थी और खुदगर्ज हो गये हैं कि जब तक हमारे सिर पर नहीं आ पडती, तब तक हम इनके बारे में सोचते ही नहीं !</p>
<p style="text-align: justify;">इस बात में भी कोई दो राय नहीं कि गैर-कानूनी कार्यों में लिप्त लोगों के राजनैतिक एवं आपराधिक गठजोड की ताकत के कारण आम व्यक्ति इनसे बुरी तरह से भयभीत हैं और इनका सामना करने की सोचते हुए भी डरने लगता हैं।</p>
<p style="text-align: justify;">यह जानते हुए भी कि सर्प चूहों को अक्सर उनके बिलों में ही दबोचते हैं। फिर भी हम चूहों की तरह अपने घरों में, स्वयं को पूरी तरह सुरक्षित समझ कर दुबके हुए हैं।</p>
<p style="text-align: justify;">अकेला व्यक्ति अपराधी तत्वों से टक्कर नहीं ले पाता है, कुछ अन्य लोग इस सोच के चलते, कि अभी तक अपना घर तो सुरक्षित हैं, जब सामना होगा तो देखा जायेगा, चुपचाप सहमे, डरे और दुबके हुए बैठे रहते हैं ? लेकिन क्या हम उस दिन के लिये पहले से सुरक्षा कवच बना सकते हैं, जिस दिन-</p>
<ul>
<li style="text-align: justify;">-हम या हमारा कोई अपना, बीमार हो और उसे केवल इसलिये नहीं बचाया जा सके, क्योंकि उसे दी जाने वाली दवायें उन अपराधी लोगों ने नकली बनायी हों, जिनका हम विरोध नहीं कर पा रहे हैं?</li>
<li style="text-align: justify;">-हम कोई अपना, किसी भोज में खाना, खाने जाये और खा वस्तुओं में मिलावट के चलते, वह असमय ही तडप-तडप कर बेमौत&#8230;!</li>
<li style="text-align: justify;">-हम कोई अपना, बस यात्रा में हो और बस मरम्मत करने वाले मिस्त्री द्वारा उस बस में नकली पुर्जे लगा दिये जाने के कारण, वह बस बीच रास्ते में दुर्घटना हो जाये और&#8230;?</li>
<li style="text-align: justify;">-हम अपने वाहन में पेट्रोल या डीजल में घातक जहरीले कैमीकल द्रव्यों की मिलावट के कारण बीच रास्ते में वाहन के इंजन में आग लग जाये और&#8230;?</li>
<li style="text-align: justify;"> -जब हम या हमारा कोई आत्मीय किसी बीमारी या दुर्घटना के कारण किसी अस्पताल में भर्ती हो और भ्रष्ट डॉक्टर बिना रिश्वत लिये तत्काल उपचार या ऑपरेशन करने से मना करे दे या लापरवाही, अनियमितता या विलम्ब बरते और&#8230;?</li>
<li style="text-align: justify;">-जब हम या कोई आत्मीय रेल यात्रा करे और रेल की दुर्घटना हो जाये, क्योंकि रेल मरम्मत कार्य करने के लिये जिम्मेदार लोग मरम्मत कार्य किये एवं संरक्षा सुनिश्चित किये बिना ही वेतन उठाते हों! और दुर्घटना में&#8230;!</li>
</ul>
<blockquote>
<p style="text-align: justify;"><span style="color: #000080;">मित्रों हम में से अधिकतर यह नहीं जानते हैं कि समाज के केवल 10 प्रतिशत लोग ही भ्रष्ट, बेईमान एवं शोषक प्रवृति के हैं और केवल 10 प्रतिशत लोग ही उनके समर्थक हैं! क्या यह आश्चर्यजनक और शर्मनाक नहीं कि मुठ्‌ठीभर 20 प्रतिशत लोग, समाज के 80 प्रतिशत विशाल जनसमूह को बेरोकटोक लूट रहे हैं? क्या इन 80 प्रतिशत पीडित लोगों के मुंह में जुबान नहीं है?</span></p>
</blockquote>
<p>मित्रो, यह भी सच है कि अनेक लोकतान्त्रिक निकायों तथा प्रशासन पर भ्रष्ट, बेईमान व शोषक लोगों के लगातार काबिज होते जाने के कारण, आम व्यक्ति इनमें आस्था तथा विश्वास खोता जा रहा है और इन सबके विरुद्ध वितृष्णा, क्षोभ एवं गुस्से से भी उबल रहा है, किन्तु एकजुटता व जागरूकता के अभाव में वह कुछ करने की स्थिति में नहीं हैं।</p>
<p style="text-align: justify;">यदि इन सभी लोगों को अपने साथ होने वाले अपमान और नाइंसाफी का अहसास कचोटने लगे और यदि ये 80 प्रतिशत लोग तन-मन-धन से एकजुट हो जावें, तो उनकी ताकत के सामने, बडे से बडे भ्रष्ट, बेईमान व शोषक लोग भी आसानी से घुटने टेक सकते हैं। क्योंकि जनतन्त्र में आम जनता की एकजुट ताकत को नकारना असम्भव है!</p>
<p>यदि हम नाइंसाफी के विरुद्ध, पूरी ताकत के साथ और दिल से बोलना शुरू करें, अपनी बात कहने में हिचकें नहीं, तो अभी भी बहुत कुछ ऐसा शेष है, जिसे बचाया जा सकता है, लेकिन यदि हम अभी भी चुपचाप, डरे, सहमें व दुबके बैठे रहे तो वह दिन दूर नहीं जबकि-</p>
<ul>
<li>-आपको अपने मुकमदे की शीघ्र सुनवायी या शीघ्र फैसला करवाने के लिये भी शुल्क देना पडेगा !</li>
<li>-अस्मत लुटने पर भी पुलिस वाले रिपोर्ट लिखने से साफ इनकार कर दें और कहें कि पहले रिशवत दो, तब ही मुकदमा दर्ज होगा?</li>
<li>-राशन की दुकान वाला गरीबों को मिलने वाले सारे के सारे राशन को ही काला बाजारियों के हवाले कर दे और गरीब लोग भूख से तडत-तडप कर मर जायें?</li>
<li>-किसी साधारण या बीपीएल परिवार के व्यक्ति के बीमार होने पर, बिना रिश्वत दिये सरकारी अस्पताल में भी इलाज करने से साफ इनकार कर दिया जावे?</li>
<li>-आवासीय विद्यालयों में पढने जाने वाली छात्राओं की, उनके विद्यालय संरक्षक स्वयं ही अस्मत लूटने और बेचने लगें ?</li>
<li>-सीमा पर तैनात सेना अधिकारी या कोई सेना अध्यक्ष पड़ोसी दुश्मन देश से रिश्वत लेकर, देश की सीमाओं को उस देश की सेनाओं के हवाले कर दें?</li>
<li></li>
</ul>
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		<title>कोड़ा राग में भ्रष्टाचार का नया तराना</title>
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		<pubDate>Fri, 04 Dec 2009 15:42:02 +0000</pubDate>
		<dc:creator>जनोक्ति डेस्क</dc:creator>
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		<description><![CDATA[बिहार के छोटे भाई झारखण्ड ने लड़-झगड़ कर नया राज्य बनाया कि जानवरों का चारा तक डकार जाने वाले नेताओं से वनवासी जनता को बचाया जा सके ,उन्हें उनका हक़ मिल सके . शुरूआती दौर में तीन चार साल लालूराज ]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;">बिहार के छोटे भाई झारखण्ड ने लड़-झगड़ कर नया राज्य बनाया कि जानवरों का चारा तक डकार जाने वाले नेताओं से वनवासी जनता को बचाया जा सके ,उन्हें उनका हक़ मिल सके . शुरूआती दौर में तीन चार साल लालूराज के अंधियारे में मरांडी और कुछ समय तक मुंडा सरकार द्वारा विकास की रौशनी मिलने से लोग खुश होने लगे थे . खुशहाली के इस युग को जल्दी हीं भ्रष्ट राजनीति से उपजी लोकतांत्रिक अस्थिरता ने लील लिया . आया राम,गया राम की सी हालत हो गयी . देश के इतिहास में पहली बार एक निर्दलीय विधायक मुख्यमंत्री की कुर्सी पर विराजमान हुआ .चारा चोरों से भागते -भागते एक दिन झारखण्ड वासी खुद अपने हीं आदमी के हाथों हलाल हो गये . उन्हीं के आदिवासी&nbsp; मुख्यमंत्री मधु कोड़ा ने उनके पाकेट से ४ हजार करोड़ रूपये मार लिए .भारतीय लोकतंत्र की भ्रष्ट राजनीति का एक और उत्कृष्ट नमूना पेश हुआ .अब सीबीआई इस पर जांच करेगी &#8230;..सालों जांच का नतीजा क्या होगा आप सबको पता है ! दरअसल,मधु-कोड़ा अथवा लालू या माया-मुलायम कोई मुद्दा नहीं है मुद्दा है राजनीति से गायब होते सरोकार और मूल्यों का ,मुद्दा है बढ़ते भ्रष्ट राजनीतिक-सामाजिक जीवन का .</p>
<p style="text-align: justify;">इसी मसले पर प्रस्तुत है<span style="color: rgb(0, 0, 205);"><strong> लोकसभा टीवी के <a href="http://www.blogger.com/profile/03999746860464195738">पत्रकार रमेश भट्ट</a> </strong></span>की संछिप्त पोस्ट :-<a href="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2009/12/image3.jpg"><img alt="image3" class="aligncenter size-full wp-image-1201" height="224" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2009/12/image3.jpg" title="image3" width="290" /></a></p>
<p style="text-align: justify;">भ्रष्टाचार आज हमारे दैनिक जीवन का एक बडा हिस्सा बन गया है। इसी बीमारी ने हमारे देश के 62 साल के विकास के सफरनामें में बडी रूकावाट पैदा की। नीति निर्माता जानते है। सरकार जानती है यहां तक की भ्रष्टाचार को पानी पी पी के कोसने वाले हम भी कम भ्रष्ट नही है। हम अपनी नैतिक जिम्मेदारी से बचने के लिए दूसरों के भ्रष्ट और अपने को गंगा नहाया समझते है। सही मायने में यही इस समस्या का मुख्य कारण है। वो कहते है ना, बुरा जो देखन में चला, बुरा न मिलया कोई, जो मन देखा आपनों, मुझसे बुरा न कोई। हमें कोई हक नही है दूसरों को भ्रष्ट कहने का। राजीव गॉंधी ने यह बात 1985 में कही थी कि गरीबी उन्मूलन योजनाओं के लिए केन्द्र से भेजा एक रूपये में सिर्फ 15 पैसा ही जरूरत मंदों तक तक पहुंच पाता पाता है। अब उनके लाल राहुल भी यही राग अलाप रहे है। कई सर्वेक्षण भारत में भ्रष्टाचार की हालात बता रहे है। कैग तो हर बार भ्रष्टाचार का काला चिटठा लाती है। मगर होता क्या है कितने लोगों के सजा मिल पाती है। आज सीबीआई छापे मार के लोगो की अकूत संपत्ती का पता कर रही है। मगर क्या वो इसके लिए जिम्मेदार लोगों को अंजाम तक पहुंचा पायेगी। आज कोई कहता है कानून बनाने वाले नेता भ्रष्ट है कोई कहता है न्याय देने वाला न्यायालय भ्रष्ट है कोई कहता है कि सुरक्षा देने वाली पुलिस भ्रष्ट है । सही कहा एक न्यायाधीश ने कि, इस देश को भगवान ही बचा सकता है। मगर क्या सिर्फ रोने से इस बीमारी का हल निकल जायेगा। हमने जो भ्रष्टाचार को मौन स्वीकारोक्ती दे रखी है उससे हमें बहार आना होगा। सुविधा शुल्क लेने देने वालो की दुकानदारी को ताला लगाना होगा। विदेश में जमा काले धन के वापस लाना होगा। साथ ही देश में छिपे काले धन को भी निकालकर गरीबों के विकास के लिए खर्चना होगा। चलिए ये तो छोटा खेल है। बडे खेल यानि तू भी खुश मैं भी खुश का खेल जो नेता और अफसर खेलते है। उसके लिए सरकार को कठोर होना होगा। एक ईमानदार प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की इच्छा से यह सब नही होगा। सरकारी नीतियों के लिए जवाबदेही तय करनी होगी। हर सरकारी योजना में चाहे वो नरेगा हो, मीड डे मिल हो, सार्वजनिक वितरण प्रणाली हो यह कोई और सब पर गिद्ध दृष्टि रखनी होगी। नेताओं, अफसरों और ठेकेदारो की सरकारी माल को लूटने से रोकना होगा। इनके जमीर को जगाना होगा। आज हर क्षेत्र में सुधार होने है। मगर इनमें बदलाव के लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति का अभाव साफ दिखाई देता है। चुनाव सुधार, प्रशासनिक सुधार, पुलिस सुधार सबके सब ठंडे बस्ते में पडे है। कितनी शर्म की बात है कि आजादी के 62 साल बाद 77 फीसदी जनता के एक दिन में खर्च करने की क्षमता 20 रूपये हैं। सरकार को समझना होगा कि भ्रष्टाचार भी एक तरह का आर्थिक आतंकवाद है, जिसके खिलाफ भी जीरो टांलरेंस की नीति अपनानी होगी। इससे जुडे मामलों की सुनावाई जल्द से जल्द निपटाने के लिए अलग से कोर्ट बनाने होंगे। सूचना के अधिकार, ई गर्वनेंस, सीटीजन चार्टर और सोशल आंडिट जैसे&nbsp; पारदर्शी तरीकों&nbsp; के प्रति जनता को जागरूक करना होगा। मीडिया को अपनी जिम्मेदारी का विस्तार करना होगा। सरकारी नीतियों से जुडी जानकारियों को जन जन की तक ले जाना होगा। सिर्फ जुबानी खर्च करने से कुछ नही होगा। हमें हर हाल में बदलाव लाना होगा।</p>
<p style="text-align: justify;">मैं चाहूं तो निजा में कुहून बदल डांलू, फकत यह बात मेरे बस में नही।</p>
<p style="text-align: justify;">उठो आगे बढ़ो नौजवानों यह लडाई हम सब की है, दो चार दस की नही।</p>
]]></content:encoded>
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		<title>हाय हाय ये महंगाई</title>
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		<pubDate>Thu, 26 Nov 2009 04:17:29 +0000</pubDate>
		<dc:creator>जनोक्ति डेस्क</dc:creator>
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			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;">इस बढ़ती हुई महंगाई ने सच में आम आदमी की कमर तोड कर रख दी . आज जमाखोखोरी ,कालाबाजारी और मुनाफाखोरी सिर्फ शब्द नहीं है, यह है व्यापार जगत की वास्तविक हकीकत। इस हकीकत से जूझना पड़ रहा है सिर्फ आम उपभोक्ता को। इस हकीकत से मुकाबला करने की चुनौतियां जिन एजेंसियों के ऊपर है उन्होने अपनी आंखों पर पट्टियाँ बाँध रखी है। इसे इस तरह भी कहा जा सकता है कि जमाखोरी ,कालाबाजारी,और मुनाफाखोरी को नियंत्रण में रखने वाली एजेंसियों की ओर से इस तरह के कृत्यों को प्रश्रय दिया जाता है। तो वह है शक्कर । दैनंदिनी जीवन में प्रत्येक परिवार को शक्कर की जरूरत पडती है प्रतिदिन प्रातः बिस्तर में ही । लेकिन,वर्तमान में बाजारवाद ने कुछ ऐसी हालत पनपा दी है कि शक्कर की मिठास अब कडवी लगने लगी है सुबह होने के साथ ही मिलने वाली बेड टी । भारी दाम चुका कर दुकान से लाई गई&nbsp; शक्कर लगता है अब गन्ने की गडेरियों से नहीं ,बल्कि नीम की निंगोलियों से बनने लगी है ।&nbsp; शक्कर में उतर आया कडुआपन उत्पादन में आई कमी के कारण तो है ही,लेकिन इससे ज्यादाद बडा कारण व्यावसायिक प्रवृत्ति में आये दोष भी है । व्यवसाय की भी अपनी पवित्रता होती है । कोई भी व्यवसायी लाभ कमाने के लिए व्यवसाय करता है ,किंतु उसकी एक सीमा होती है। बाजार में बैठे थोक और खुदरा व्यापारियों में लोभ और लालच की मात्रा इतनी अधिक बढ़ गई है वे उपभोक्ताओं की मजबूरी का लाभ उठाकर जमाखोरी और कालाबाजारी करके ज्यादा से ज्यादा मुनाफा कमाना चाहते हैं।एक तो व्यवसायियों की इस प्रवृत्ति को नियंत्रण एजेंसियों की अनदेखी का लाथ मिल जाता हैं। <br />
	छूसरे नियंत्रकों के आचरण उनका गुण-दोष का भी भाव नियंत्रण पर भी गहरा असर पडता है जहां पर कंट्रोलिंग ऐजेंसियां सख्त होती हैं वहां तो व्यापारियों की&nbsp; की प्रवृत्ति पर अंकुश दिखाई देता है किंतु जहां कंट्रोलिंग अधिकारियों की चांदी रहती है। इन दिनों शक्कर और सब्जियों से लेकर रोजमर्रा के प्रयोग की वस्तुओं के भाव बजाने का मतलब व्यापारिक पवित्रता में आई खोट ही सबसे बड़ा कारण है। पिछले दिनों शक्कर को लेकर आम उपभोक्ताओं में आक्रोश फूटा उससे प्रशासन मामूली सा कुछ हिला डुला । परंतु परिणाम यह हुआ कि स्थानीय प्रशासनों ने अपने अपने इलाकों के गोदामों में अवैध रूप से संग्रह शक्कर के बोरों को बाहर निकालने के लिए कतिपय व्यापारियों के यहां छापे डाले। <br />
	प्रशासन द्वारा शुरू की गई इस मामूली सी सख्ती का असर कई स्थानो पर देखने को भी मिला । विभिन्न शहरों&nbsp; के शक्कर गोदामों पर श्रंखलाबद्ध छापों की कार्यवाही शुरू हुई और करोड़ों रूपए मूल्य की भारी मात्रा में अवैध रूप से संग्रहित शक्कर जब्त हुई ।इसका तत्काल असर यह हुआ कि शक्कर का भाव प्रतिकिलो एकदम से दो ढाई&nbsp; रूपये तक गिर गया । बिना लाइसेंस के शक्कर&nbsp; का व्यापार करने वाले व्यापारियों को गोदामों में निर्धारित मात्रा से अधिक शक्कर की जमाखोरी सामने आने पर या प्रश्न उठता है कि स्थानीय प्रशासन को इस तरह के अवैध संग्रहण या मुनाफाखोरी की जानकारी क्यों नहीं थी ? प्रशासन द्वारा मारे गये छापों के बाद मीडिया में जो कखबरें आ रही है उसके मुताबिक कई स्थानों पर छापों की कार्रवाई रोकने के लिए राजनैतिक दबाव आने लग गये है । <br />
	अगर सही से सोचा जाए तो इस तरह जमा खोरी अन्य खाध्य पदार्थो पर भी की जा रही होगी जिस्से उन वस्तुओं के दाम भी आसमान छूने लगे हैं और आम जनता की पकड से बहुत दूर होते जा रहे है। <br />
	कालाबाजारी,जमाखोरी और मुनाफाखोरी करने वालने अधिकतर वे व्यापारी होते है जो राजनैतिक और प्रशासनिक क्षेत्र मे अच्छा खासा दबदवा रखते है। <br />
	पहले तो प्रशासनिक अधिकारियों का जत्था ऐसी पहुंच वाले लमाखोरों के गोदमों में कार्यवाही करने से कतराता है,क्योंकि अधिकारी जानते हैं कि ऐसे ऐसे व्यापारियों पर कार्यवाही करने का उन्हें अपनी सेवा में किसी न किसी रूप में खामियाजा भुगतना पड़ेगा। <br />
	परंतु अगर सच में सरकार कुछ करना चाहती हैं तो यह जरूरी हो गया हैंकि आम लोगों की रोज मर्रा में प्रयोंग होने वाली शक्कर और बाकी सभी वस्तुओं का बाजारी भाव संतुलित किया जाए । <br />
	इनके दामों में अनाप-शनाप बढ़ोतरी न हो पाए इस बात को लागू करने के लिए कालाबाजारियों,जमाखोरों और मुनाफाखोरों के खिलाफ सख्ती बरतनी चाहिए ।</p>
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