सेक्स चिंतन की पिछली कड़ियों में सेक्स पर विमर्श के लायक भूमिका तैयार हो चुकी है . आगे सेक्स के विभिन्न सामाजिक सन्दर्भों और बुनियादी सवालों को केंद्र में रख कर चर्चा को आगे बढाने की कोशिश की जायेगी .इस अंक में सेक्स और प्रेम के मध्य रिश्तों पर कुछ बातें आपके ध्यान में ला रहा हूँ जिन पर हम सभी अक्सर सोचते हैं ,बहस करते हैं और कहीं न कहीं हर किसी के जीवन में प्रेम और सेक्स द्वन्द काबिज रहता है . मानव समाज में सेक्स के साथ खुद-बखुद प्यार और प्यार के साथ सेक्स जुड़ जाता है और जहाँ सेक्स हो वहां पाप की उपस्थिति अनिवार्य हो जाती है . स्त्री-पुरुष के प्रेम संबंधों की ओर ऊँगली स्वतः उठ जाती है क्योंकि जहाँ भी स्त्री-पुरुष संबंध होगा वहां सेक्स का होना अवश्यंभावी समझा जाता है .और हजारों सालों से सेक्स को पाप ही माना गया है .और साहिबान इससे भी भीषण विडंबना यह है कि यही पाप इस चराचर संसार की उत्पत्ति का मूल आधार है ! इस हिसाब से तो प्रेम पवित्र व दैवीय वृत्ति और सेक्स पाप की जड़ है . अब ,आप ही बताइए गलत क्या है और सही क्या है ? या तो प्रेम में सेक्स का कोई स्थान नहीं होना चाहिए या फ़िर सेक्स पाप नहीं है . लेकिन इस जगत में अब तक कोई मतैक्य नहीं हो पाया है .
प्रेम के दो पहलू सामने आते हैं, एक आत्मिक और दूसरा शारीरिक। प्रेम को या तो केवल सेक्स का पर्याय मान लिया जाता है, या फिर उसके सेक्स को नकारकर अथवा महत्वहीन बताकर प्रेम को मात्र एक ‘आत्मिक’ भावना का दर्जा दे दिया जाता है। अभी तक कुछेक लोगों ने बड़ी हिम्मत से इस द्वन्द पर निर्णय देने का साहस जरुर किया है . वो कहते है ; ” देह से यानी शरीर से प्यार नहीं होता लेकिन प्यार या प्रेम में देह की अनिवार्यता स्वतः आ जाती है “.
मुझे बड़ा अटपटा सा लगता है जब लोग कहते हैं, मैं उससे प्यार करता हूँ . उसके साथ ये सब ( सेक्स) कभी सपने में भी नहीं सोच सकता हूँ . वाह भाई ,क्या प्यार हैं ? प्यार के लिए कोई और, देह की जरुरत के लिए कोई दूसरी ! सवाल यह है कि आखिर ऐसा क्यों है ? क्यों प्रेम के संग सेक्स को स्वीकार नहीं किया जाता है ? क्यों सेक्स को इतना सामाजिक तौर पर घृणित बना दिया गया है जबकि व्यक्तिगत रूप से इससे पवित्र कुछ नहीं समझा जाता है और यह आप सभी जानते हैं . क्यों ज़माने भर की नैतिकता के नाम पर सेक्स को प्रेम से अलग करके मानव खुद उसी में उलझा हुआ है ?
सेक्स यह शब्द ही अत्यंत निंदित हो क्यों गया है ? इस प्रश्न का उत्तर रजनीश “ओशो” ने अपने संबोधन में कुछ इस प्रकार दिया था :
” संसार का हर धर्म तुम्हारे मन को किसी और दिशा में मोड़ना चाहते थे-परलोक की ओर। यदि तुम सच में ही यहां आनंदित हो-इसी लोक में, तो भला तुम क्यों किसी परलोक की चिंता करोगे? परलोक के अस्तित्व के लिए तुम्हारा दुखी होना अत्यंत आवश्यक है। उसका स्वयं अपने आप में कोई अस्तित्व नहीं है, उसका अस्तित्व है तुम्हारे दुख में, तुम्हारी पीड़ा में, तुम्हारे विषाद में।
दुनिया के सारे धर्म तुम्हारे अहित करते रहे हैं। वे ईश्वर के नाम पर, सुंदर और अच्छे शब्दों की आड़ में तुममें और अधिक पीड़ा और अधिक संताप, और अधिक घृणा, और अधिक क्रोध , और अधिक घाव पैदा करते रहे हैं। वे प्रेम की बातचीत करते हैं, मगर तुम्हारे प्रेमपूर्ण हो सकने की सारी संभावनाओं को मिटा देते हैं।
मैं काम का शत्रु नहीं हूं। मेरी दृष्टि में काम उतना ही पवित्र है, जितना जीवन में शेष सब पवित्र है। असल में न कुछ पवित्र है, न कुछ अपवित्र है; जीवन एक है-सब विभाजन झूठे हैं, और काम जीवन का केंद्र बिंदु है।
इसलिए तुम्हें समझना पड़ेगा कि सदियों-सदियों से क्या होता आ रहा है। जैसे ही तुम काम को दबाते हो, तुम्हारी ऊर्जा स्वयं को अभिव्यक्त करने के लिए नये-नये मार्ग खोजना प्रारंभ कर देती है। ऊर्जा स्थिर नहीं रह सकती। जीवन के आधारभूत नियमों में से एक है कि ऊर्जा सदैव गत्यात्मक होती है, गतिशीलता का नाम ही ऊर्जा है। वह रुक नहीं सकती, ठहर नहीं सकती। यदि उसके साथ जबरदस्ती की गई, एक द्वार बंद किया गया, तो वह दूसरे द्वारों को खोल लेगी, लेकिन उसे बांधकर नहीं रखा जा सकता। यदि ऊर्जा का स्वाभाविक प्रवाह अवरुद्ध किया गया, तो वह किसी अप्राकृतिक मार्ग से बहने लगेगी। यही कारण है कि जिन समाजों ने काम का दमन किया, वे अधिक संपन्न और समृद्ध हो गए। जब तुम काम का दमन करते हो, तो तुम्हें अपने प्रेम-पात्र को बदलना होगा। अब स्त्री से प्रेम करना तो खतरनाक है, वह तो नरक का द्वार है। चूंकि सारे शास्त्र पुरुषों ने लिखे हैं, इसलिए सिर्फ स्त्री ही नरक का मार्ग है। पुरुषों के बारे में क्या खयाल है?
मैं हिंदुओं, मुसलमानों, ईसाइयों से कहता रहा हूं कि अगर स्त्री नरक का मार्ग है, तब तो फिर केवल पुरुष ही नरक जा सकते हैं, स्त्री तो जा ही नहीं सकती। मार्ग तो सदा अपनी जगह रहता है, वह तो कहीं आवागमन नहीं करता। लोग ही उस पर आवागमन करते हैं। यूं कहने को तो हम कहते हैं कि यह रास्ता फलां जगह जाता है, लेकिन इसमें भाषा की भूल है। रास्ता तो कहीं आता-जाता नहीं, अपनी जगह आराम से पड़ा रहता है, लोग ही उस पर आते-जाते हैं। यदि स्त्रियां नरक का मार्ग हैं, तब तो निश्चित ही नरक में केवल पुरुष ही पुरुष भरे होंगे। नरक “सिर्फ पुरुषों का क्लब” होगा।
स्त्री नरक का मार्ग नहीं है। लेकिन एक बार तुम्हारे दिमाग में यह गलत संस्कार बैठ जाए, तो तुम किसी और वस्तु में स्त्री को प्रक्षेपित करने लगोगे; फिर तुम्हें कोई और प्रेम-पात्र चाहिए। धन तुम्हारा प्रेम-पात्र बन सकता है। लोग पागलों की तरह धन-दौलत से चिपके हैं, जोरों से पकड़े हैं, क्यों? इतना लोभ और लालच क्यों है? क्योंकि दौलत ही उनकी प्रेमिका बन गई। उन्होंने अपनी सारी जीवन ऊर्जा धन की ओर मोड़ ली।
अब यदि कोई उनसे धन त्यागने को कहे, तो वे बड़ी मुसीबत में पड़ जाएंगे। फिर राजनीति से उनका प्रेम-संबंध जुड़ जाएगा। राजनीति में सीढ़ी दर सीढ़ी ऊपर चढ़ते जाना ही उनका एकमात्र लक्ष्य हो जाएगा। प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति पद की ओर, राजनीतिज्ञ ठीक उसी लालसा से देखता है, जैसे कोई प्रेमी अपनी प्रेमिका की ओर देखता है। यह विकृति है।
कोई व्यक्ति किन्हीं और दिशाओं में जा सकता है, जैसे शिक्षा; तब पुस्तकें उसकी प्रेम की वस्तुएं हो जाती हैं। कोई आदमी धार्मिक बन सकता है, तब परमात्मा उसका प्रेम-पात्र बन जाता है…तुम अपने प्रेम को किसी भी काल्पनिक चीज पर प्रक्षेपित कर सकते हो, लेकिन स्मरण रहे, उससे तुम्हें परितृप्ति नहीं मिल सकती। ”
चिंतन की कड़ियों आगे चर्चा होती रहेगी ….. विभिन्न विद्वानों के विचार प्रस्तुत किये जाते रहेंगे ….. आप सभी अपने -अपने अनुसार सोचने और समझने के लिए स्वतंत्र हैं . ऐसा इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि कुछ पाठक हमारे इस विमर्श को ,चिंतन को , परिचर्चा को गलत समझ बैठे हैं . यहाँ किसी प्रकार के विचार थोपने की तैयारी नहीं है अपितु आप सबसे विचार जानने का एक प्रयास है ताकि हमारे ज्ञान में निरंतर वृद्धि हो सके . हाँ , उन लोगों के बारे में क्या कह सकता हूँ जो सेक्स शब्द से हीं चिढ़ते हैं या चिढने का स्वांग करते हैं !


सबसे पहले तो इस लेख के लिये बहुत बहुत धन्यवाद,बधाई और साधुवाद।……प्रेम वाकई दो रूपो मे बंटा हुआ है……
danyabad mai apke bat se sahamat hoon ki sex paap nahi hai agar paap hai to aage sansar ka bistar nahi ho payega