सेक्स और समाज की अब तक प्रकाशित कड़ियों को आप सुधीजनों की खूब सराहना मिली है . दरअसल ,प्रचलित धारणाओं से हटकर लिखने -बोलने पर बहुत कम प्रशंसा मिलती है ,अक्सर गालियाँ हीं खानी पड़ती हैं . सेक्स आज भी कौतुहल का विषय बना हुआ है , किसी रहस्य से कम नहीं है . और इस मुद्दे पर विभिन्न यौन आसनों के अलावा बहुत कम लिखा पढ़ा गया है .हालाँकि ओशो,फ्रायड जैसे दो चार तथाकथित सिरफिरे दार्शनिकों ने इसके इतर जरुर रौशनी डाली लेकिन अमेरिका जैसे खुले समाज में उसे जेल में डाल दिया गया .मैंने जब इस स्तम्भ का नाम सेक्स और समाज रखा तो मेरे एक मित्र ने सवाल उठाया था – "सेक्स के साथ समाज का क्या सम्बन्ध ? यह तो बंद कमरे की चीज है !" बात सही है अब तक हम यही तो सुनते आये हैं . पर क्या यही सच है अथवा यहाँ भी सच को खोजे जाने की आवश्यकता है . समाज मानव से बनता है और मानव सेक्स की हीं तो उत्पत्ति है .समस्त सृष्टि के सजीव प्राणियों की जन्मदात्री प्रक्रिया है सेक्स या सम्भोग .आज सेक्स के आध्यात्मिक और सामाजिक सन्दर्भों को समझने की नितांत आवश्यकता है .सेक्स की समकालीन दशा अब तक की सबसे दयनीय अवस्था में है .इस प्राकृतिक उपक्रम का हर दिन अवमूल्यन होता जा रहा है .पिछली कड़ियों में सेक्स की वास्तविक आवश्यकता और मानव जीवन में इसकी भूमिका की चर्चा की जा चुकी है . सेक्स स्वस्थ और प्रसन्न मन से आनंद प्राप्ति की एक प्रक्रिया है जिसको सही सन्दर्भों में जान कर हीं जीवन का अंतिम लक्ष्य माने मोक्ष प्राप्त किया जा सकता है .जीवन में सेक्स की उपयोगिता महज संतानोत्पत्ति और दैहिक सुख प्राप्त करना नहीं है .सेक्स से मिलने वाले आत्मिक आनंद को जुटा कर हीं प्रेम का अनुभव किया जा सकता है .और जब तक प्रेम का जन्म नहीं होगा ईश्वर से मिलन संभव नहीं है .प्रेम को ईश्वर से साक्षात्कार में एकमात्र जरिए माना गया है .और सेक्स प्रेम की पहली सीढ़ी है .वैसे तो ईश्वर को पाने के कई मार्ग योग ,भजन , समाधी आदि बताये गये हैं लेकिन सामान्य मनुष्य के लिए इन रास्तों पर चलना सहज नहीं है . सेक्स से प्रेम और प्रेम के सहारे ईश्वर तक जाने की राह सहज और सुलभ है . जनसामान्य में आज सेक्स को लेकर रुझान तो बढा है लेकिन सही अर्थों को समझने के बजाय लोग विकृति की ओर बढ़ते जा रहे हैं .नित नए आविष्कारों ने मनुष्य को भौतिक सुख -सुविधा में इतना उलझा दिया है कि आँखें सत्य को देख नहीं पा रही हैं . जीवन के अंतिम लक्ष्य तक ले जाने का साधन और उसकी उर्जा को नकारात्मक रूप में देखा जाने लगा . काम बिस्तर तक हीं सिमट कर रह गया है जिसका लक्ष्य बस एक विपरीतलिंगी अथवा समलिंगी जोड़े की क्षणिक संतुष्टी भर रह गयी है .सेक्स मन बहलाने का खिलौना बन गया है . आज कल सुरक्षित सेक्स का प्रचार प्रसार जोरों पर है .सेक्स जनित रोगों और सामाजिक परम्पराओं को बचाने के नाम पर कंडोम जैसी वस्तु आ गयी है . जिसे करीब -करीब सामाजिक मान्यता भी मिल चुकी है .आज सेक्स टॉय जैसी कृत्रिम साधनों का उपयोग होने लगा है . ऐसे में मुझे एक दोस्त की बात याद आती है जो अक्सर कहता था "वो दिन दूर नहीं है जब सेक्स के लिए आदमी की जरुरत ख़त्म हो जायेगी और यह काम भी माउस की एक क्लिक से संभव हो जायेगा ".
जिन चीजों से बचने के नाम पर सुरक्षा के इन उपायों का उपयोग हो रहा है वो चीजें उतनी हीं फैलती जा रही है .आदमी को मालुम है कि कंडोम के प्रयोग से से उसका फायदा हीं फायदा है . { इसे नजदीक का फायदा कहना उचित होगा .वैसे हम इंसानों को दूर के हानि -लाभ की चिंता होती तो यह दिन नहीं देखना पड़ता } फायदा इस मायने में कि अपनी मनमानी करते हुए ना तो शारीरिक नुकसान का डर है और ना हीं चारित्रिक . तो हम बार- बार उसी अनैतिक सेक्स में उलझे हैं . शारीरिक नुकसान तो आप समझ गये होंगे . चारित्रिक हानि इसलिए कि हमारा चरित्र वही है जो समाज को दिखता है . और कंडोम का इस्तेमाल मर्द और औरत को सामाजिक लांछन से साफ बचा लेता है .कंडोम का इस्तेमाल वृहत पैमाने पर किस तरह के सेक्स में होता है यह भी आप बखूबी जानते हैं .आदमी गलत कामों से मुंह केवल इसीलिए मोड़ता है ताकि दूसरों की नज़र में सद्चरित्र बना रह सके .नहीं तो कुछ बातें गलत होने के बावजूद भी बने रहते हैं क्योंकि समाज में उसका चलन है . गलत या सही , पाप अथवा पुन्य व्यक्ति सापेक्ष होता है परन्तु सब समाज को दिखाने भर के लिए रह गया है . हम भौतिक सुख-सुविधाओं के अर्जन में समाज का ख्याल करते हैं अपना नहीं लेकिन आत्मिक /आध्यत्मिक सुख के लिए समाज की चिंता सताने लगती है .अधिक से अधिक सुविधाओं को जुटाने के समय मन को समाज के बहुसंख्यक लोगों का ख्याल नहीं आता है . दूसरो का हक़ छीनते समय हमें किसी बात का ख्याल नहीं रहता है जबकि आत्मिक सुख / आत्मिक ज्ञान / आत्मिक अनुभव के सम्बन्ध में समाज की याद जोर मारने लगती है .हम समाज के चलन की हर एक बात का ध्यान रखते हैं . क्यों हम अपने सच को नहीं ढूंढ़ पाते हैं और संसार के अब तक की गलतियों में फंस कर रह जाते हैं . (जारी …..)


सेक्स चिंतन ! अच्छा title है ….
"हम भौतिक सुख-सुविधाओं के अर्जन में समाज का ख्याल करते हैं अपना नहीं लेकिन आत्मिक /आध्यत्मिक सुख के लिए समाज की चिंता सताने लगती है .अधिक से अधिक सुविधाओं को जुटाने के समय मन को समाज के बहुसंख्यक लोगों का ख्याल नहीं आता है . दूसरो का हक़ छीनते समय हमें किसी बात का ख्याल नहीं रहता है जबकि आत्मिक सुख / आत्मिक ज्ञान / आत्मिक अनुभव के सम्बन्ध में समाज की याद जोर मारने लगती है .हम समाज के चलन की हर एक बात का ध्यान रखते हैं . क्यों हम अपने सच को नहीं ढूंढ़ पाते हैं और संसार के अब तक की गलतियों में फंस कर रह जाते हैं . " -> इसपे सबको खुले मन से अपने अन्दर झंकार कर प्रश्न करना चाहिए |
बाजारवाद ने सेक्स का विकृत रूप ही पेश किया है और इसी विकृत रूप को आज हम सब कुछ मान बैठे हैं |
jayram bhaiya is lekh k liye sabse pahle to aapko bhahut bhaut dhanywaad………..parantu sex prem ki pahli sedi kaise hui??…….yahan pahli sedi ka kya arth hua??……….aur yadi sex hi pahli sedi hai to dusri kaun si hai??……….aur dusri sedi k prem ki tulna aap kisse karege??……….bhaiyaa kripyaa mera margdarshan kare……………..anoop aakash verma……wwwanoopverma@gmail.com…………..
प्रिय अनूप जी , दरअसल आप किसी भ्रम में ना रहें . मान लीजिये आप ग्राउंड फ्लोर पर खड़े हैं और आपको ऊपर सातवे माले पर जाना है जहाँ आपका लक्ष्य है .तो आपको सीढियों को एक के बाद एक पार करके ही जाना पड़ेगा बगैर ऐसा किये आपका ऊपर जाना संभव नहीं है क्योंकि आप और हम साधारण मनुष्य हैं . हाँ यदि आप सुपरमेन या हनुमान होते तो शयद कूद -फंड कर पहुँच सकते थे वो भी बगैर सीढियों के . अब आप अपना लक्ष्य यानी मंजिल तय कीजिये आपकी मंजिल प्रेम की प्राप्ति हो या इश्वर की बात बराबर है . और आप तो जानते हैं प्रेम की raah में gyani purushon ne waasna को badhak maana है .तो kya आप bina is badha { pahli sidhi} को पार किये uski प्राप्ति कर सकते हैं . आप ऐसा kaise karnge yah आपको sochna है . waise asadharan manvon के liye kai raaste हैं .
bhaiya mera margdarshan karne k liye aapka bahut bahut dhanywad……….anoop aakash verma…….
pls