oh ! u r from LALU’S land ?

बिहार विधानसभा चुनाव को लेकर राजनीतिक विश्लेषक उहापोह की स्थति में हैं | कौन दल जीतेगा या कौन हारेगा ? बात केवल इतनी सी नहीं है | असल मुद्ददा है 9 करोड़ की आबादी वाले बिहार के भविष्य का | क्या गुजरे पांच सालों में बदले बिहार में बदलाव के साथ-साथ सही मायनों में विकास धरातल पर पहुंचेगा ? यह सवाल इसलिए जरुरी है क्योंकि विकासपुरुष की छवि वाले सेनापति की वापसी अगर हुई तो क्या अपने फ़ौज को भ्रष्टाचारियों से मुक्त रख पाएंगे ? और यदि वापस लालू-पासवान की जोड़ी सत्तासीन हुई तो कहीं वापस जंगलराज तो नहीं शुरू हो जायेगा ? क्या अपने मतदान का सही प्रयोग करके जनता बिहार के खास 8मर्ज -भय,भूख,भ्रष्टाचार,अशिक्षा ,स्वास्थ्य ,पलायन ,जातिवाद और वंशवाद से मुक्त हो पायेगी ?

लेकिन इस असंभव से दिखने वाले कार्य के संधान हेतु किस राजनीतिक दल या गठबंधन को चुना जाना चाहिए ?

कांग्रेस की वापसी के आसार राहुल गाँधी के हौव्वे से पूरे होंगे ऐसा फिलहाल तो नहीं दिख रहा है | भाजपा भी राज्य में किसी निर्णायक स्थिति में नहीं है | लालू-पासवान एक बार फिर मिलकर चुनावी खिचड़ी पका रहे हैं और सत्ता का प्रसाद जनता से पाने की उम्मीद लगाये हैं | इन दोनों दलों में परिवारवाद का बोलबाला आज भी कायम है | उधर ,नितीश कुमार ने विधानसभा उपचुनाव के दौरान परिवारवाद से छुटकारा पाने की थोड़ी -बहुत कोशिश तो जरुर की थी लेकिन प्रयोग औंधे मुंह गिर गया | विश्लेषक इसके पीछे बटाईदारी कानून के खिलाफ सवर्णों के आक्रोश को बड़ी वजह मानते हैं जबकि ऐसा भी हो सकता है बिहार की जनता अभी तक खुद को परिवारवाद से पीछ छुडाने के लिए तैयार नहीं कर पाई है | तभी तो परिवारवादियों के खिलाफ खड़े किये गये नितीश के उम्मीदवार अपने ही घर के भेदियों के हाथों पराजित हो गये | बावजूद इसके की कुछ नेताओं ने पार्टी से बागवत करके अपनी बीबी -भाई-भतीजे को जितवाया , जनता का मिजाज ही है जो नीतीश उनको सर पे बिठाए घूम रहे हैं |

[pullquote]

बहुत पहले मैंने एक लेख में लिखा था कि नीतीश चोरों के साधू सरदार हैं | और यह बात आज भी उतनी ही सही है | जदयू में राजद और लोजपा के भ्रष्ट नेताओं की तादाद बढ़ गयी है | अब जनता को ही समझना होगा की आखिर जब तक स्थानीय और जातीय और व्यक्तिगत स्वार्थों में लिप्त होकर जबतक ऐसे अपराधियों का मनोबल अपने मतों से बढ़ते रहेंगे तब तक हर नीतीश कुमार मज़बूरी में ही सही इनको अपनी सेना में भर्ती करते रहेंगे !

[/pullquote]इतना सब है फिर भी , भ्रष्टों के भ्रष्ट सेनापति और भ्रष्टों के इमानदार सेनापति के कार्यों में अंतर ही , जनता को सही रास्ता दिखायेगा | नीतीश शासन में ऑल इज वेल भले नहीं रहा लेकिन वेल जरुर है |

सुशासन ना सही पर कुशासन भी नहीं रहा | आज लालू का बेटा क्रिकेट में नामी हो गया ,पासवान का बेटा फ़िल्मी हीरो हो गया ! लालू अपनी बीबी को बिहार की गद्दी पर बिठा चुके हैं तो अब पासवान भाई को बिठाने के जुगाड़ में हैं ! ऐसे ही अनगिनत नाम संभावित उम्मीदवारों की सूची में शामिल है जो किसी ना किसी के भतीजे ,भाई, भौजाई ,लुगाई लगते हैं ! लेकिन क्या किसी ने कभी नीतीश के बेटे का नाम सुना है ? क्या किसी को उनके भाई-भतीजे के बारे में जानकारी है ? परिवारवाद के मुद्दे पर नीतीश जनता की पहली पसंद होनी चाहिए | बिहार में अपराध घटा है, हजारों अपराधी जेल में बंद हैं, कानून-व्यवस्था सुधरी है, अपहरण घटा है और अब पहले की तरह भय और आतंक नहीं है किन्तु यह सच है कि एक नागरिक को जो चाहिए, वह अभी वहां प्राप्त नहीं है | कुल मिलाकर जहाँ नीतीश के नेतृत्व वाली राजग ही एक मात्र विकल्प है बिहार की जनता के सामने वहीँ नीतीश कुमार को भी उम्मीदवारों के चयन को लेकर सोचना होगा क्योंकि बिहार की जनता को सच्चे जनप्रतिनिधि चुनने का एक अवसर और मिलना ही चाहिए |

और शायद इस बार बिहार की जनता खुद पर लगे जातिवाद के कलंक को मिटाने के लिए उठ खड़ी हो | क्योंकि वर्षों से बिहार की राजनीतिक जागरूकता को जातिवादी नेताओं ने गलत इस्तेमाल किया है | हालाँकि पिछले विधानसभा चुनाव परिणामों को कुछ लोग जनता के बदले मिजाज का नतीजा बताते हैं लेकिन यह पूरा सच नहीं है | मिजाज जरुर बदला था लेकिन वह जनदेश जातिवाद के विरुद्ध नहीं कहा जा सकता | जातिवाद के विरुद्ध जनादेश तो तब होता जब जाति के नाम पर राजनीति करने वाले एक-एक विधायक अपने हारे हुए मुंह के साथ राजनीति से तौबा कर लेते | दरअसल पिछला चुनावी परिणाम केवल लालू के जंगलराज का विकल्प लेकर आया था , कोई साफ-सुथरी , जातिवाद और वंशवाद से मुक्त बिहार का आगाज लेकर नहीं |

खैर , जो आगाज तब नहीं हुआ वो अब हो सकता है | इस कृषि-प्रधान राज्य में लघु उद्योगों का विकास अत्यंत आवश्यक है और यह बात जानता भी जानती है कि झारखण्ड के बटवारे के बाद बिहार में दो ही चीज बची थी आलू और लालू |आलू खाने वाली जनता लालू को भी देख चुकी है अब क्यों नहीं जाति -पांति से ऊपर उठकर विकास के मुद्दे पर मतदान करे और बहुमत से मतदान करें ! कहीं गड़बड़ी हुई तो छोटे भाई झारखण्ड जैसा बुरा हाल हो जायेगा ! वैसे तो बिहार की जनता 05 के चुनाव में अधकचरे मतदान का परिणाम भोग चुकी है इसीलिए उम्मीद है कि अबकी बारी बिहारी जनता काफी फूंक-फूंक कर कदम उठाएगी |

जनता के संग-संग बिहार को बदलने के लिए बिहार के नेताओं और राजनीतिक दलों को भी बदलना होगा और ऐसी उम्मीद नीतीश कुमार और भाजपा से तो की ही जा सकती है | उम्मीदवारों के चयन से लेकर गठबंधन में छोटे -मोटे दरारों को भी पाटना होगा |

क्योंकि जरा सी चूक बिहार को फ़िर जंगल राज में पहुंचा सकता है और लोग फ़िर से प्रवासी बिहारियों को ” oh ! u r from LALU’S land ? कहकर अपमानित करना शुरू कर सकते हैं |

7 Comments

  • बहुत ही सुंदर और संतुलित आलेख. बिहार में विकास को समझाने के लिए ‘सेंटर फॉर पालिसी रिसर्च’ के प्रताप भानु मेहता का निम्न आलेख देख सकते हैं. यह १३ सितम्बर २०१० को प्रभात खबर में प्रकाशित हुआ है .

    http://epaper.prabhatkhabar.com/showxml.aspx?id=31026&boxid=155517018

  • बिहार और बिहारियों के दृष्टिगत लेख में उपस्तिथ आपके विचार पढ़ा. अच्छा और दमदार पहलु है व उम्मीद है की नितीश -लालू का ये चुनाव न होकर एक उत्तम बिहार के चुनाब का प्रयास होना चाहिये |

  • आज बिहार उस मोड़ पर खड़ा है जहाँ आपकी उम्मीदों की परीक्षा होनी है . आशा है आम बिहारी ‘ बिहार ‘ को ही जितायेगा .

  • थोड़ी देर से ही विकास का पहिया घूमना शुरू हो गया है. इसमें कोई शक नहीं कि नीतीश ने जात पात, बिगड़ी हुई क़ानून व्यवस्था और घूसखोरी को एक हद काबू में किया है. विकास की राह पर अपने नन्हे कदम रख चुके हैं. नीतीश कुमार की सबसे बड़ी उपलब्धि यही है कि उन्होंने पाँच साल तक मिली जुली सरकार को चलाया

  • नीतिश ने अच्छा काम किया है. मैं बिहार गया था. वे मिस्टर क्लीन हैं. हर नेता को उनकी तरह काम करना चाहिए ताकि सभी क्षेत्रों में विकास संभव हो.

  • बिहार में कोई भी सरकार बने हमें विकास चाहिए और केवल एक क्षेत्र में ही नहीं, हर क्षेत्र में चाहिए. और हम उम्मीद करते है कि जो भी सरकार बनेगी वो जातीय राजनीति से उठ कर विकास के काम ज्यादा ध्यान देगी.

  • बिहार शायद भारत का प्रतिबिंब है. थोड़ी देर से ही विकास का पहिया घूमना शुरू हो गया है. इसमें कोई शक नहीं कि नीतीश ने जात पात, बिगड़ी हुई क़ानून व्यवस्था और घूसखोरी को एक हद काबू में किया है. सिर्फ़ पाँच वर्षों में दास बाबू की भविष्यवाणी सच होना तो चमत्कार जैसा है. लगता है कि बिहार विकास की राह पर अपने नन्हे कदम रख चुका है. नीतीश कुमार की सबसे बड़ी उपलब्धि यही है कि उन्होंने पाँच साल तक मिली जुली सरकार को चलाया. लेकिन सारा श्रेय नीतीश कुमार को देना भी ठीक नहीं होगा, साथ ही लालू के सिर सारी धीमे विकास का ठीकरा भी फोड़ना उचित नहीं होगा.

Leave a Reply