राष्ट्रीय|2010/02/28 1:50 pm

‘‘पत्तवेष कायो नमस्ते नमस्ते’’ : आचार्य गिरिराज किशोर

1940 में परमपूजनीय डाक्टर हेडगेवार जी की मृत्यु के पश्चात संघ कार्यवृद्धि के लिए माननीय दीनदयाल उपाध्याय जी, माननीय भाऊ जुगादे व माननीय नानाजी देशमुख आगरा भेजे गए। लोहा मण्डी में रहने लगे। कुछ दिनों के पश्चात संभवतः 1941 में दीनदयाल जी को लखीमपुर खीरी, नाना जी देशमुख को गोरखपुर भेजा गया। भाऊ जुगादे आगरा रह गए।
बालकों की शिक्षा की नींव ठीक हो तथा घर वापस लौटे प्रचारक शिक्षा के माध्यम से समाज सेवा व बालकों को संस्कार प्रदान करने के कार्य में लगें, इस विचार से नाना जी देशमुख ने गोरखपुर में प्राथमिक विद्यालय प्रारम्भ किया। यह विद्यालय ही आगे चलकर ‘सरस्वती शिशु मन्दिर’ के रूप में विख्यात हुआ। इसी योजना का विराट रूप आज विद्या भारती है।
1951 में राजनीतिक दल के रूप में भारतीय जनसंघ की स्थापना हुई। भाऊराव जी ने उत्तर प्रदेश में जनसंघ के कार्य विस्तार का दायित्व संगठन मंत्री के रूप में नाना जी देशमुख को सौंपा और दीनदयाल जी उपाध्याय को उत्तर प्रदेश भारतीय जनसंघ का महामंत्री बनाया था। डाॅ0 श्यामाप्रसाद मुखर्जी के बलिदान के पश्चात पंडित दीनदयाल जी उपाध्याय भारतीय जनसंघ के अखिल भारतीय महामंत्री के रूप में दिल्ली आए और नाना जी अखिल भारतीय संगठन मंत्री बने। दोनों व्यक्तियों के अभूतपूर्व परिश्रम-तालमेल से जनसंघ के कार्य का विस्तार हुआ।
1967 में उत्तर प्रदेश में चैधरी चरण सिंह को कांग्रेस से बाहर निकाल कर लाए और कांग्रेस सरकार गिर गई तथा संयुक्त विधायक दल (संविद) की सरकार बनी। चैधरी चरण सिंह जी मुख्यमंत्री और रामप्रकाश गुप्त उप-मुख्यमंत्री बने। ये सारी योजना नाना जी देशमुख की थी। इसके कारण ही नाना जी को उत्तर प्रदेश कांग्रेस के लोग ‘‘नाना फणनवीश’’ कहा करते थे। नाना जी की विशेषता थी कि जिस घर में वे तीन दिन ठहर जाएं वहाँ अतिथि के बजाए मालिक बन जाते थे और मालिक अतिथि बन जाता था। देश के ख्यातिनाम उद्योगपतियों से मिलना और उनसे सहयोग लेना भी उनकी विशेषता थी। पंडित दीनदयाल जी के स्वर्गवासी हो
जाने के बाद दिल्ली में रानी झांसी रोड पर स्थित ‘‘दीनदयाल शोध संस्थान’’ नाना जी देशमुख की कल्पना का साकार रूप है। आज दीनदयाल शोध संस्थान प्रमुख जानी-मानी संस्था है।
जब इन्दिरा गांधी जी ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय के निर्णय का उल्लंघन कर दिया तब बाबू जयप्रकाश नारायण के द्वारा घोषित समग्र क्रान्ति जन आन्दोलन के वे प्रमुख सहयोगी बने। जयप्रकाश जी के हृदय में अपने व्यवहार और सम्बन्धों से इतना परिवर्तन ला दिया कि बाबू जयप्रकाश जी ने कहा कि यदि नाना जी देशमुख साम्प्रदायिक हैं तो मैं भी साम्प्रदायिक हूँ। देश में आपातकाल लग गया, जयप्रकाश नारायण गिरफ्तार हो गए तब नाना जी देशमुख ने भूमिगत होकर आन्दोलन को दिशा दी, उसे जीवित रखा और जब सत्याग्रह की आवश्यकता हुई तो वे प्रथम सत्याग्रही बने। सत्याग्रह के सम्बन्ध में देशभर के कार्यकर्ताओं का वे मार्गदर्शन करते थे। आपातकाल में अन्ततः विजय प्राप्ति तक वे जुटे रहे।
1977 में आपातकाल समाप्ति के पश्चात देश में और सब राज्यों में सरकारें बनी, जिनमें जनसंघ प्रमुख सहयोगी था लेकिन नाना जी देशमुख ने मंत्री पद नहीं लिया। इसके विपरीत उत्तर प्रदेश के गोण्डा जनपद के ग्राम विकास का काम उन्होंने हाथ में लिया और सार्वजनिक रूप से घोषणा की कि 60 वर्ष की आयु के बाद सबको राजनीति छोड़कर सेवा का कार्य करना चाहिए। इसका उन्होंने अपने जीवन पर सफल प्रयोग किया।
चित्रकूट ग्रामोदय प्रकल्प सर्वविदित है। उस पिछड़े क्षेत्र में उन्होंने सरकार से जमीन लीज पर लेकर ग्रामोदय विश्वविद्यालय खड़ा किया। क्षेत्र के युवकों को स्वावलम्बी बनाने के लिए विभिन्न प्रकार के प्रशिक्षण केन्द्र विकसित किए और उसी प्रकल्प में वे अन्त तक रमे रहे। ग्राम विकास के वे सच्चे पुरोधा थे। विकास के इन्हीं सफल प्रयोगों के लिए उन्हें भारत सरकार ने पदम विभूषण दिया। वे राज्यसभा में भी मनोनीत किए गए।
1916 में उनका जन्म हुआ। उन्होंने एक लम्बी आयु प्राप्त की। 27 फरवरी, 2010 को उन्होंने अपने जीवन की यात्रा समाप्त की।
दिल्ली की दधीचि देहदान संस्था को अपने देहदान सम्बन्धी शपथ पत्र पर हस्ताक्षर करते हुए उन्होंने कहा था कि मैंने जीवन भर संघ शाखा में प्रार्थना में बोला है ‘‘पत्तवेष कायो नमस्ते नमस्ते’’। अतः मृत्यु के बाद भी यह शरीर समाज के लिए उपयोग में आना उचित है। इस प्रकार उन्होंने मृत्यु के उपरान्त अपना देह चिकित्सा शास्त्र पढ़ने वाले युवकों के अध्ययन के लिए समर्पित कर दिया। असंख्य लोग नाना जी के जीवन से प्रेरणा लेते रहे हैं और भविष्य में भी लेते रहेंगे।

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