हाय हाय ये महंगाई

इस बढ़ती हुई महंगाई ने सच में आम आदमी की कमर तोड कर रख दी . आज जमाखोखोरी ,कालाबाजारी और मुनाफाखोरी सिर्फ शब्द नहीं है, यह है व्यापार जगत की वास्तविक हकीकत। इस हकीकत से जूझना पड़ रहा है सिर्फ आम उपभोक्ता को। इस हकीकत से मुकाबला करने की चुनौतियां जिन एजेंसियों के ऊपर है उन्होने अपनी आंखों पर पट्टियाँ बाँध रखी है। इसे इस तरह भी कहा जा सकता है कि जमाखोरी ,कालाबाजारी,और मुनाफाखोरी को नियंत्रण में रखने वाली एजेंसियों की ओर से इस तरह के कृत्यों को प्रश्रय दिया जाता है। तो वह है शक्कर । दैनंदिनी जीवन में प्रत्येक परिवार को शक्कर की जरूरत पडती है प्रतिदिन प्रातः बिस्तर में ही । लेकिन,वर्तमान में बाजारवाद ने कुछ ऐसी हालत पनपा दी है कि शक्कर की मिठास अब कडवी लगने लगी है सुबह होने के साथ ही मिलने वाली बेड टी । भारी दाम चुका कर दुकान से लाई गई  शक्कर लगता है अब गन्ने की गडेरियों से नहीं ,बल्कि नीम की निंगोलियों से बनने लगी है ।  शक्कर में उतर आया कडुआपन उत्पादन में आई कमी के कारण तो है ही,लेकिन इससे ज्यादाद बडा कारण व्यावसायिक प्रवृत्ति में आये दोष भी है । व्यवसाय की भी अपनी पवित्रता होती है । कोई भी व्यवसायी लाभ कमाने के लिए व्यवसाय करता है ,किंतु उसकी एक सीमा होती है। बाजार में बैठे थोक और खुदरा व्यापारियों में लोभ और लालच की मात्रा इतनी अधिक बढ़ गई है वे उपभोक्ताओं की मजबूरी का लाभ उठाकर जमाखोरी और कालाबाजारी करके ज्यादा से ज्यादा मुनाफा कमाना चाहते हैं।एक तो व्यवसायियों की इस प्रवृत्ति को नियंत्रण एजेंसियों की अनदेखी का लाथ मिल जाता हैं।
छूसरे नियंत्रकों के आचरण उनका गुण-दोष का भी भाव नियंत्रण पर भी गहरा असर पडता है जहां पर कंट्रोलिंग ऐजेंसियां सख्त होती हैं वहां तो व्यापारियों की  की प्रवृत्ति पर अंकुश दिखाई देता है किंतु जहां कंट्रोलिंग अधिकारियों की चांदी रहती है। इन दिनों शक्कर और सब्जियों से लेकर रोजमर्रा के प्रयोग की वस्तुओं के भाव बजाने का मतलब व्यापारिक पवित्रता में आई खोट ही सबसे बड़ा कारण है। पिछले दिनों शक्कर को लेकर आम उपभोक्ताओं में आक्रोश फूटा उससे प्रशासन मामूली सा कुछ हिला डुला । परंतु परिणाम यह हुआ कि स्थानीय प्रशासनों ने अपने अपने इलाकों के गोदामों में अवैध रूप से संग्रह शक्कर के बोरों को बाहर निकालने के लिए कतिपय व्यापारियों के यहां छापे डाले।
प्रशासन द्वारा शुरू की गई इस मामूली सी सख्ती का असर कई स्थानो पर देखने को भी मिला । विभिन्न शहरों  के शक्कर गोदामों पर श्रंखलाबद्ध छापों की कार्यवाही शुरू हुई और करोड़ों रूपए मूल्य की भारी मात्रा में अवैध रूप से संग्रहित शक्कर जब्त हुई ।इसका तत्काल असर यह हुआ कि शक्कर का भाव प्रतिकिलो एकदम से दो ढाई  रूपये तक गिर गया । बिना लाइसेंस के शक्कर  का व्यापार करने वाले व्यापारियों को गोदामों में निर्धारित मात्रा से अधिक शक्कर की जमाखोरी सामने आने पर या प्रश्न उठता है कि स्थानीय प्रशासन को इस तरह के अवैध संग्रहण या मुनाफाखोरी की जानकारी क्यों नहीं थी ? प्रशासन द्वारा मारे गये छापों के बाद मीडिया में जो कखबरें आ रही है उसके मुताबिक कई स्थानों पर छापों की कार्रवाई रोकने के लिए राजनैतिक दबाव आने लग गये है ।
अगर सही से सोचा जाए तो इस तरह जमा खोरी अन्य खाध्य पदार्थो पर भी की जा रही होगी जिस्से उन वस्तुओं के दाम भी आसमान छूने लगे हैं और आम जनता की पकड से बहुत दूर होते जा रहे है।
कालाबाजारी,जमाखोरी और मुनाफाखोरी करने वालने अधिकतर वे व्यापारी होते है जो राजनैतिक और प्रशासनिक क्षेत्र मे अच्छा खासा दबदवा रखते है।
पहले तो प्रशासनिक अधिकारियों का जत्था ऐसी पहुंच वाले लमाखोरों के गोदमों में कार्यवाही करने से कतराता है,क्योंकि अधिकारी जानते हैं कि ऐसे ऐसे व्यापारियों पर कार्यवाही करने का उन्हें अपनी सेवा में किसी न किसी रूप में खामियाजा भुगतना पड़ेगा।
परंतु अगर सच में सरकार कुछ करना चाहती हैं तो यह जरूरी हो गया हैंकि आम लोगों की रोज मर्रा में प्रयोंग होने वाली शक्कर और बाकी सभी वस्तुओं का बाजारी भाव संतुलित किया जाए ।
इनके दामों में अनाप-शनाप बढ़ोतरी न हो पाए इस बात को लागू करने के लिए कालाबाजारियों,जमाखोरों और मुनाफाखोरों के खिलाफ सख्ती बरतनी चाहिए ।

2 Comments

  • अब जबकि कालाबाजारियों,जमाखोरों और मुनाफाखोरों की टीम राजनितिक पार्टियों को मोटा चन्दा देते हैं तो इस अवस्था मैं राजनितिक पार्टियां इनके गलत कार्यों मैं सहयोग को अपना फर्ज मानती हैं |
     
    वैसे लगता है जनता भी महंगाई पे घडयाली आंसू ही बहती है … और वोट उसी पार्टी को देती है जो महंगाई के लिए जिम्मेदार है |

  • कमज़ोर विपक्ष की देन है महँगाई….
    बात सुनने में भले ही बेहद अजीब लगे पर है शत प्रतिशत कटु वचन,और इसी कमज़ोर विपक्ष् के चलते आज आम आदमी की कमर उसी सरकार ने तोङ कर रख दी है जो गरीबों का हाथ थामने की बात कर रही थी…..खैर! सरकार के पास अपनी कज़ोरियों को छिपाने के लिये आंकङओं की कोई चोंचले बाजी हो सकती है परंतु अकारण बिना मुद्दों के भी बखेङा खङा करने वाला विपक्ष अपने कान में तेल डाले आज् कहाँ सोया पङा है??… क्या ये मुद्दे नहीं हैं??…क्या इनका ताल्लुक हमारे विपक्ष को आम आदमी से जुङा हुआ नहीं लगता??….क्या गरीबों की भूख से व्याकुल आंखें मौजूदा विपक्ष को सरकार के प्रति कोइ ठोस कदम उठाने के लिये नहीं उकसाती??…..समझ नहीं आता इसे सरकार् का सौभाग्य कहें या देश का दुर्भाग्य की कमज़ोर विपक्ष का खामियाज़ा बेचारी भोली भाली जनता को भुगतना पङ रहा है…और शायद ये हमारे कमज़ोर विपक्ष की सुस्ती का ही परिणाम है की अब शरद पवार ये कहने से भी नही हिचकिचा रहे है-”कि मै मंत्री हूँ,कोइ ज्योतिष नही…..” सचमुच!ये बात हम सभी जानते है कि मंत्री जी ज्योतिष नहीं है,मगर मंत्री तो हैं..मगर हमारा विपक्ष इन मुद्दो पर भी हमेशा की तरह इस बार भी ना चाहते हुए भी मालुम होता है कि फिर आंखें मूंदे बैठा है…लालू जी पूरी तरह से फिर बिहार लौट गये अपनी ज़मीन तलाशने….देवगौङा अपने ही राज्य के मंत्रियों को गाली-गलोच देने में वयस्त हैं….जिन लोगों मे थोङई बहुत तथाकथित उर्जा बची हुई थी वो उन लोगों नें अलग राज्य की मांग में लगा दी…..मुलायम अपनी साइकिल की ही रिपेय्रिंग मे ही लगे हुये हैं….बहन जी की सरकार मजे में चल ही रही है….लेफ्ट कभी-कभार भले ही महँगाई के मुद्दे पर अपनी कमर सीधी करता हुआ नज़र भी आता है परंतु शायद उस पर भी अन्य खरबुजो का रंग चङने लगा है……और इन सबसे आगे केन्द्र का प्रमुख विपक्षई दल….वो अपने ही अंदरूनी मुद्दो मे इस कदर उलझ कर रह गया कि
    जनता के हित के मुद्दे उसे दूर के सुहावने ढओल् लगने लगे…और अब ऐसे मे जिसे सही अर्थों में सन्यास ले लेना चाहिये…..वो किसी ना किसी जगह फिट है…..और जो काम करने लायक हैं…वो राजनीति से सन्यास लेना चाहते हैं….अब ऐसे मे सरकार की नीतियों पर नज़र रखे तो रखे कौन????………ये सवाल हमारे कमज़ोर विपक्ष के सामने महँगाई के काल की तरह मुँह बाये खङा है……और “मैं ज्योतिष नहीं हूँ..”….कहकर सरकार ने एक दिन-प्रतिदिन कमज़ोर होते विपक्ष के मुँह पर तमाचा जङा है……..जिसके निशानों को हम अब बङती हुई महँगाई क रूप में देखेगें……………………….अनूप आकश वर्मा……………

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