राष्ट्रीय|2012/02/09 9:46 am

सवर्ण वोटरों का दर्द ना जाने कोय !

दिल्ली के नेहरु प्लेस और इलाहबाद के मोतीलाल नेहरु इंजीनीयरिंग कालेज कैम्पस में दो बातें आपको सामान मिल जायेंगी, वैसे एक व्यावसायिक केंद्रऔर शैक्षणिक संस्थान में कोई समानता नहीं होती, पर फिर भी अगर आप दोनों जगहों पर तैनात प्राइवेट सुरक्षा कर्मियों से बात करेंगे या वर्दी पर नामपढेंगे तो समानता मिल जायेगी. महज़ चार से पांच हज़ार रुपयों के लिए चौकीदारी करने वाले अधिकाँश लोग पाण्डेय, मिश्र, शुक्ल, तिवारी नाम के वोब्राह्मण है जिनपर मनुवाद कर देश के संसाधनों पर कब्ज़ा करने का आरोप लागाया जाता है.इनमे से अधिकाँश मुलायम राज में पुलिस भर्ती परिक्षा मेंशामिल हो अपना भाग्य आजमा चुके है. आज कुशल नेतृत्व के अभाव में ब्राह्मण समेत सम्पूर्ण सवर्ण समाज का कमोबेश यही हाल है. पार्टियाँ अब जाति कीपार्टियाँ बन चुकी है, टिकट जाति के नाम पर बंटते है ऐसे में सरकारी नीतियों,पद व् नौकरिया जाति के नाम पर ना देकत निष्पक्ष दी जाती होंगी ये सोचना भी बेमानी है.

ब्राह्मण कभी तमिल भाषी द्रविड़ समाज का भला नहीं कर सकते,इस अवधारणा के तहत की पेरियार के आन्दोलन ने पूरे दक्षिण भारत के द्रविड़ ब्राह्मणों कोअन्य द्रविड़ जातियों से अलग कर एलियन बना राजनैतिक ध्रुवीकरण का जो कार्य किया वो कालांतर में कांशीराम ने ठीक वैसा ही आह्वाहन उत्तर प्रदेशमें किया, उन्होंने उत्तर भारत के समाज से ब्राह्मणों को निकाल अन्य जातियों को बहुजन समाज का नाम दिया. पेरियार हालांकि संपूर्ण दक्षिण भारतके दलितों पिछडो को संगठित करने में कामयाब रहे थे परन्तु लाख कोशिशो के बावजूद कांशीराम और उनकी उत्तराधिकारी मायावती महज़ दलितों को ही अपने साथ जोड़ पायी, मुलायम, नितीश और लालू जैसे कद्दावार नेताओ ने उनके आन्दोलन से ओबीसी गायब कर दिए.

चिंतको का मानना है की पेरियार-कांशीराम के आन्दोलन से शुरू हुए एंटी ब्राह्मण मुहीम ने अगर पिछड़ी जातियों को सत्ता पर आरूढ़ किया है तो साथही पूरे देश में ब्राह्मण समेत अन्य सवर्ण जातियों को लगातार सत्ताच्युत भी किया है.अपनी कम आबादी होने के कारण लोकतन्त्र में सवर्णों कीसंख्याबल इतनी नहीं होती की अपना प्रतिनिधि जन पंचायतो, संसद या विधान सभाओ में भेज सकें, उस पर लगातार चारित्रिक दोषारोपण कर कुछ दल के नेता इन्हें उपेक्षित से शोषक बना देतें है. जब 800 सालो से भारत की सल्तनत पर आधिपत्य स्थापित करने वाले मुस्लिम समाज में मुफलिसी और अशिक्षा का दौर आ सकता है तब महज 40 सालो तक हिन्दुस्तानी राजनैतिक व् प्रशासनिक पटल पर कायम ब्राह्मण समाज का हाल राजनैतिक सत्ता से बाहर हो उनसे बदतर नहीं होगा इसकी गारंटी कोई नहीं दे सकता .

पूरे देश का 6 करोड़ की जनसंख्या वाला ब्राह्मण वर्ग विभिन्न उपजातियों में बंटा है और पूरे भारत में ही फैला हुआ है इसी भगौलिक फैलाव के कारणइनका चुनावी महत्त्व घाट जाता है. बात अगर यूपी की करें तो , पूरेभारत में सबसे ज्यादा ब्राहमण यही बसते है वे यूपी की आबादी का कुल 9% है.यहाँ आज़ादी के बाद से ही ब्राह्मणों ने परंपरागत रूप से कांग्रेस को वोट किया है, कांग्रेस ने भी स्वतन्त्रता सेनानी गोबिंद बल्लभ पन्त, पंक्तिपावन सरयूपारीण कमलापति त्रिपाठी,श्रीपति मिश्र से लेकर पहाड़ी ब्राह्मण हेमवती नंदन बहुगुणा व् नारायण दत्त तिवारी आदि मुख्यमंत्री बना इस जनादेश का पूरा सम्मान भी किया. सन 1989 के वी पी सिंह के राष्ट्रीय राजनीति के पटल पर आने और 1992 में ओ बी सी आरक्षण के बाद से यूपी की राजनीति का जो जातीय ध्रुवीकरण शुरू हुआ उसके चलतें नेता जाति के हो गए, तिवारी पहाड़ के हो गए, माया दलित नेत्री तो मुलायम पिछडो के नेता हो गए. इसी राजनैतिक परिस्तिथि में वीरबहादुर सिंह की मृत्यु के बाद, यूपी में ठाकुर -ब्राह्मण समेत पूरा सवर्ण समाज नेतृत्व विहीन हो गया.

राम मंदिर आन्दोलनकाल में नेत्रित्व विहीन ब्राह्मण, वैश्य कायस्थ समाज तो भाजपा के साथ जुड़ गया पर क्षत्रिय समाज सुलभता के आधार पर वी पी सिंह, सपा-कांग्रेस-भाजपा में आता जाता रहा. सन 2007 में लगभग राजनैतिक हाशिये पर आ चुके 9% वोटो वाले ब्राह्मण समाज ने गुंडई और राजनैतिक उपेक्षा के मद्देनज़र बसपा की नेत्री मायवती का सर्वजन हिताय सर्वजन सुखाय की लॉलीपोप ले ली नतीजे अप्रत्याशित निकले पूर्वांचल में जहाँ सुरक्षित सीटें जीतना मायावती का ख्वाब हुआ करती थी वहा वे वह अन्य दलों का सूपड़ा साफ़ कर गयी. ‘तिलक तराजू और तलवार इनको जूते मारो चार’ के सवर्ण घृणा से परिपूर्ण नारों से आगे बढ़ी बसपा ने ये करिश्मा रातों रात नहीं किया. सन 1995 से मायावती ने कांशीराम के लक्षित बहुजन समाज के अलावा सवर्णों को भी टिकट देना शुरू किया, 2002 चुनावों में सवर्णों को 37 टिकट मिले फिर सन 2005 में मायावाती के नेतृत्व में लखनऊ में ब्राह्मण कांफ्रेंस कर सबको चौंका दिया. उस समय अधिकतर दलितवादी नेताओ ने इस बात की शंका जाहिर की थी की कही इस बात से दलित वोटर मायावती की बसपा से पलायन न कर जाएँ, वही दलित चिन्तक चन्द्रभान प्रसाद को ब्राह्मण की नेतृत्व शुन्यता और दलितों का महज़ 21% वोटो से आगे ना पाने की विवशता को ख़त्म करने का एक संवाद दिखा. इन्ही प्रकार के संवादों की परिणिति सन 2007 में ब्राह्मण-दलितों की सोशियल इंजीनीयरिंग के फार्मूले ने एक बसपा को धड़े की पार्टी से संपूर्ण बहुमत वाली पार्टी बना दिया.

 

  • Share this post:
  • Facebook
  • Twitter
  • Delicious
  • Digg

Leave a Reply