राष्ट्रीय|2010/01/21 5:59 pm

सरकारी जल नीति की हकीकत

। हम भीतर बाहर से जल ही से जुड़े हुए हैं। पीने के लिए, खाद्यान्न उत्पादन के लिए, उद्योग, बिजली उत्पादन इत्यादि के लिए भी जल ही चाहिए। जैसे जल के अनेक उपयोग हैं वैसे ही जल के स्त्रोत भी हैं। अनेक चिन्तनषीलों का मत है कि आने वाले समय जल-संकट का समय होगा और जल ही विभिन्न देशों में विवाद का कारण बनेगा।
इन्ही सब विषयों पर समग्र दृष्टिकोण स्थापित करने के लिए सरकार ने 1987 में पहली जल-नीति की घोषणा की थी लेकिन इस जल-नीति के बनने के इतने वर्षों बाद भी जल प्रबंधन संबंधी अनेक समस्याएं पूर्ववत् बनी हुई हैं। देश के कई हिस्सों में पिछले पांच-छः साल से सूखा पड़ा हैं, कई राज्यों में बाढ़ का प्रकोप निरन्तर और प्रतिवर्ष बढ़ता रहता है।
हमारी पवित्र नदियां दूषित हो चली है। प्राचीन कथा-कहानियों का गुणगान करने वाले संत भी नदियों को दयनीय हालत पर मौन व्रत धारण किये हुए हैं। भाखड़ा नंगल बांध हो या टिहरी या नर्मदा ,अब तक बन रहे बड़े बांधों के विस्थापितों को आज तक किसी प्रकार का उचित मुआवजा तक नहीं मिला। कुछ क्षेत्रों में जहां लोगों ने अपनी कोशिशों से संसाधनों को सुधारने का प्रयास किया है, वहां, एक मजबूत अड़ंगे की तरह सरकारी टांग पहुंची है।
स्वैच्छिक संस्थाओं द्वारा ध्यानाकर्षण के बाद भारत सरकार ने भी महसूस किया था कि 1987 की राष्ट्रीय जल-नीति में कुछ कमियां रह गई है। इसी के आगे बढ़ाते हुए सरकार ने ‘जल-नीति प्रारूप 1998’ बनाया। इस प्रारूप को ‘राष्ट्रीय जल बोर्ड’ ने भी स्वीकृति दे दी है। इस बोर्ड के अध्यक्ष केन्द्र सरकार के जल संसाधन मंत्रालय के सचिव ही होते हैं। केन्द्र सरकार द्वारा प्रस्तुत प्रारूप को अधिकारियों की स्वीकृति मिल गयी है।
अगले तथा अंतिम चरण में इस प्रारूप पर राष्ट्रीय जल संसाधन समिति में विचार होता है। इस समिति के अध्यक्ष प्रधानमंत्री स्वयं तथा सदस्यों के रूप में मुख्यमंत्री स्वयं होते है। समिति द्वारा स्वीकार किए जाने पर इसे मान्यता मिल जाती है, लेकिन अफसोस जनहित से जुड़े इस विषाल मुद्दे पर यानी जल नीति प्रारूप पर सार्वजनिक बहस नहीं हो सकी है न ही कारवाई गई है। हकीकत यह है कि केन्द्र सरकार ने सवा अरब आबादी से जुड़े प्रारूप तक को भी गोपनीय रखा।
लेकिन जैसे ही जल-नीति का अध्ययन किया गया तो उसमें भी मोटे-मोटे सुराख निकले। यह नीति भी चंद उद्योगपतियों तथा बहुराष्ट्रीय कंपनियों की प्राथमिकता के आधार पर ही बनाई गई है। विसंगतियों के कारण 1987 की जल-नीति विफल रही थी, उनमें से ही अधिकतर विसंगतियां 1997 के प्रारूप में भी विद्यमान पाई गई।
जल संसाधनों का प्रबन्धन देश के सम्पूर्ण राजनीतिक माहौल से अलग नहीं होता, अर्थात् जब तक देश की मूल राजनीतिक दिशा जनता की स्वायत्ता की ओर नहीं मुड़ेगी, झुकेगी, तब तक जल-नीति में थोड़े बहुत प्रावधान किए जाने से कोई विशेष अंतर नहीं आने वाला है .हाँ फाइलों की खानापूर्ति अवश्य हो जाएगी .
इसलिए सरकारी नीतियों में पड़ा थोड़ा अन्तर हमारे लिए सार्थक सिद्ध हो सकता है। इसके अलावा देष की सोच भी इसी प्रकार की चर्चाओं से बदलती हैं। इसलिए यह आवष्यक है कि जनता तथा सरकार इस विषय पर खुली बहस करें।
जल नीति का उद्देश्य
अन्य नीतियों की तरह जल-नीति के इस प्रारूप में उद्देष्य की स्पष्ट नहीं। मूल भावना यह निकलती है। कि मनुष्य अपने उपभोग के लिए पृथ्वी, जल तथा अन्य प्राकृतिक स्त्रोतों का उपयोग ठीक से करे। परमपिता ने सृष्टि के केन्द्र में मनुष्य को रखा है लेकिन मनुष्य ने अपना परिचय सिर्फ एक भोगी के रूप में ही दिया है। इसलिए हमारा यह मानना है कि मनुष्य के समग्र विकास को केन्द्र में रखना चाहिए न कि निरन्तर बढ़ते भोग-विलास को। इसके साथ ही मनुष्य को ब्रह्माण्ड के एक अंग के रूप में ही देखा जाना चाहिए क्योंकि मनुष्य प्रकृति का ही एक अंग है, प्रकृति से तारतम्य बैठाते हुए मनुष्य के समग्र विकास में सहयोग होना।
इस जल-नीति की सबसे गंभीर कमी राज्यों क जल-अधिकारियों की चुप्पी है। प्रस्तावित प्रारूप केवल बड़े-बड़े निर्माण तथा केन्द्रीय तन्त्र को ही अधिकारपूर्ण बनाने का प्रयास मात्र है। यह प्रारूप (बिल) पानी का निजीकरण करके कुछ विषेष लोगों को लाभ पहुंचाने और निर्धन को पीने के पानी से भी मोहताज करता दिखाता है। पूरे दस्तावेज में साधारण जन के संरक्षण की झलक कहीं नहीं झलकती।
समाज के हितों की अनदेखी करके बहुराष्ट्रीय कंपनियों के उद्योगों को बेरोक-टोक जल मिल सके, ऐसी व्यवस्था इस जल-नीति में की जा रही है। जल को जीवन के लिए प्रकृति-प्रदत्त नहीं मानकर मूल्यवान जल से चंद कंपनियां ही मूल्य कमा सकें, ऐसा करने हेतु यह प्रारूप बनाया जा रहा है। इस प्रारूप के पास होने के बाद जल-दर्षन, जल-संस्कृति, जल-तीर्थ सहेजने वाला समाज उन बहुराष्ट्रीय कंपनियों की ओर ताकता रहेगा जो देष का जल हथिया कर पानी बाजार खड़ा करने की योजना बना रही है।
हमें सबके साथ होने वाले इस धोखे को रोकने हेतु जाग्रत होकर अपनी संस्थाओं, राज्य सरकारों के माध्यम से या व्यक्तिशः अपने-अपने सुझाव भारत सरकार को भेजने होंगे, जिससे हमारे पूर्ण मानव समाज तथा जीव जगत तक को सहज रूप से स्वच्छ व ताजा जल हमेषा उपलब्ध होता रहे। शामलाती पानी का शोषण व प्रदूषण तथा जल संरक्षण करने वालों को प्रोत्साहन देने वाली जल नीति बनवाने के कार्य में हम सब मिलकर जुटें।

स्त्रोत : वंचित वाणी ,वार्षिक अंक ०८

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