राष्ट्रीय|2011/02/25 10:08 pm

राजनीति के फेर में फंसे बाबा जी

योग सिखाते-सिखाते बाबा रामदेव जी कांग्रेस की राजनीति में फंस गये। बाबा ने योग सिखाने के साथ-साथ भ्रष्टाचार के विरोध में भी अपनी सांसे अन्दर-बाहर करनी शुरू की तो बहुतों को पसंद आया और बहुतों को नापसंद। इधर बाबा के इस आन्दोलन की नापंसदगी इस रूप में बढ़ी कि एक सांसद जी ने तो बाबा को सिर्फ योग सिखाने की सलाह दे डाली तो दूसरे नेताजी ने बाबा को सलाह दी कि धन लेते समय जांच करवा लिया करें कि वह कहीं काला धन तो नहीं।


अब समझ में यह नहीं आ रहा कि बाबा के भ्रष्टाचार के विरोध में निकल पड़ने से उन्हें नेताओं का विरोध सहना पड़ रहा है अथवा उन सांसद महोदय को बचाने के लिए कांग्रेस की ओर से विरोध चालू हो गया? जो भी हो पर इतना तो तय है कि बाबा अपना काम छोड़कर दूसरे के काम में टांग अड़ाने लगे हैं। बाबा का काम है देश की जनता को योग सिखाना और वे करने लगे भ्रष्टाचार हटाने की बातें, ऐसे में बाबा को विरोध तो झेलना ही था।

वैसे
यह कोई नियम नहीं है कि कोई व्यक्ति किसी एक काम को कर रहा है तो देशहित में किसी दूसरे काम को नहीं करेगा। बाबा ने यही सोचकर कि वे योग के साथ लोगों की जीवन-शैली को आसान बना रहे हैं तो इसी के साथ भ्रष्टाचार पर चोट करके देश की जीवन-शैली को भी सुधार दिया जाये। बाबा जी इस प्रयास में यह भूल गये कि योग सिखाना और देश की जनता को किसी विशेष मुद्दे पर जागरूक करना दो अलग-अलग बातें हैं।

अब
आप कहेंगे कि बाबा ने ऐसा कौन सा गलत काम किया जो योग सिखाते-सिखाते भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम छेड़ दी। गलत बाबा ने नहीं किया उनके करने का अंदाज गलत निकला। बाबा अपने भ्रष्टाचार विरोध के लिए पूरे जी-जान से लगे हैं और एक बार में लाखों की भीड़ को इसके प्रति जागरूक करने का काम करते हैं। इसके बाद भी भ्रष्टाचार के मीटर की सुई नीचे नहीं आ रही है। इसका कारण समझ में नहीं आया।

कहीं ऐसा तो नहीं कि अपनी लोकप्रियता को देखकर बाबा को भी राजनीति का स्वाद लग गया हो। इसके पीछे एक ठोस कारण हमें तो दिखाई देता है और वह ये कि भ्रष्टाचार देश की ऐसी कोई समस्या नहीं जो पिछले एक साल में ही उभरी हो, फिर बाबा ने साल भर पहले से इस पर पहल क्यों नहीं शुरू की। यदि आप सभी को याद हो तो देश में बाबाओं ने, नेताओं ने, सामाजिक कार्यकर्ताओं ने, राजनैतिक दलों ने भ्रष्टाचार के विरोध में अपने स्वर को उस समय तेज किया जब बिहार में नीतीश कुमार दोबार लौट आये और उन्होंने भ्रष्टाचार को निशाना बनाया। सभी को लगा कि भ्रष्टाचार के विरोध से जब नीतीश दोबारा आ सकते हैं तो जो अभी तक आये भी नहीं हैं वे कम से कम एक बार तो आ ही सकते हैं।

बाबा
जी आप योग के साथ भ्रष्टाचार को दूर करने की बात कर रहे हैं, अच्छा है पर कम से कम यह बताते चलें कि आप जिस ज्ञान को देश भर में बांटने का दावा करते नहीं थकते उस ज्ञान से कितने गांवों को, कितने गरीबों को अपने शिविरों के द्वारा लाभान्वित किया है? आप बतायें कि आपके शिविर क्यों बड़े शहर में लगते हैं और उनकी फीस का स्वरूप अलग-अलग क्यों होता है? आप बतायें कि आपके योग-शिष्यों में से कितनों ने आपसे प्रभावित होकर अपनी ब्लैकमनी को जनता के, सरकार के सामने उजागर किया है? आप यह भी संज्ञान में ले लें कि आपके आसपास विचरने वाला मानव जीव क्या भ्रष्टाचार से मुक्त हो सका है?

आपने
लगता है राजनीति का मन बना लिया है और इसी कारण से नगर-नगर अपने शिष्यों को कागजों पर हस्ताक्षर लेने का ठेका सा बांट दिया है। अरे, जागरूकता मन के भीतर से आती है, किसी के द्वारा कागज पर हस्ताक्षर के द्वारा नहीं। आप लोगों के मन को जगाने का काम करें, भ्रष्टाचार स्वयं भाग जायेगा। आप स्वयं विचार करिये कि आपकी इस लोकप्रियता के बाद भी आपके शिष्य जनता के हस्ताक्षरों को मोहताज घूम रहे हों तो यह आपके अभियान पर, आपकी संकल्पना पर, आपके स्वयं के विश्वास पर प्रश्नचिन्ह है। कृपया लोगों को निरोग बनाने का ही काम पहले कर लें, मन को, तन को निरोग बनाने का संकल्प कर लें, देखियेगा कि देश स्वयं ही भ्रष्टाचार से मुक्त होकर निरोग दिखाई देगा।
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दोनों चित्र गूगल छवियों से साभार

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1 Comment

  • बाबा रामदेव ने एक और बात कही है। कालेधन के सच को बाहर लाने उन्होंने कुछ प्रमुख राजनेताओं एवं मंत्रियों का नारको टेस्ट कराने का सुझाव दिया है। इस सुझाव को भाजपा ने हाथोंहाथ लपकते हुए प्रधानमन्त्री एवं मुख्यमंत्रियों को भी नारको टेस्ट के दायरे में रखे जाने की वकालत की है। भाजपा का यह सुझाव सस्ती राजनीति से प्रेरित है और बचकाना भी है। प्रधानमन्त्री जैसे उच्च संवैधानिक पदों पर बैठे हुए व्यक्तियों के लिए नारको टेस्ट की वकालत करना उनका ही नहीं, देश का अपमान करना है। अगर अविश्वास की खाई इतनी गहरी है तो देश के जनता यकीन किस पर करें?यदि देश में लोकतान्त्रिक व्यवस्था जीवित हैं तो उसकी बडी वजह विश्वास और ईमानदारी है। कुछ बेईमान मिलकर पूरे देश को बेईमान नहीं ठहरा सकते। इसलिए केवल राजनेताओं को कोसना उचित नहीं है। बेहतर तो यही है, ऐसा कोई सुझाव देने के पूर्व बाबा रामदेव स्वयं को नारको टेस्ट के लिए पेश करते। यह बात किसी से छिपी नहीं है कि उन्होंने योग को नया बाजार दिया जिसका विराट स्वरूप हरिद्वार में नजर आता है। यह बात भी सभी जानते हैं कि स्वयं को अतिसाधारण एवं जनसेवक बताने वाले बाबा के अधिकांश कार्यक्रम पूंजीपतियों द्वारा प्रायोजित रहते है।
    योग गुरू बाबा रामदेव महंगाई, भ्रष्टाचार एवं कालेधन के खिलाफ राष्ट्रव्यापी अभियान चला रहे हैं। 7 फरवरी से उन्होंने पदयात्रा अभियान की शुरुआत की है। वे अपने अभियान के तहत 5॰ करोड लोगों का हस्ताक्षरयुक्त ज्ञापन 29 मार्च को नई दिल्ली में प्रधानमंत्री को सौंपेंगे। बाबा ने ऐसे मुद्दों को हाथ में लिया जो जनता से जुडे हैं। भ्रष्टाचार एवं काले धन के खिलाफ जनजागरण का अभियान यदि सही दिशा में चले तो बेहतर है लेकिन इसके भटकने एवं बीच में ही ध्वस्त होने की आशंका ज्यादा प्रबल है। दरअसल बाबा के इस अभियान के पीछे राजनीतिक उद्देश्य निहित हैं। वैसे भी रामदेव अगले आम चुनाव में अपने संगठन को मैदान में उतारने का इरादा रखते हैं। इसकी उन्होंने विधिवत घोषणा भी की है। इसका अर्थ है वे इन मुद्दों को जनता के बीच ले जाकर कांग्रेस, भाजपा एवं अन्य राष्ट्रीय राजनीतिक पार्टियों के बीच अपने संगठन के लिए जगह बनाना चाहते हैं। वे इसमें कितने कामयाब होंगे, कहा नहीं जा सकता क्योकि देश की प्रायः सभी पार्टियां वर्षों की तपस्या के बावजूद अपने-अपने राज्यों से बाहर नहीं निकल पाई हैं। बाबा रामदेव ने योग में जरूर चमत्कार दिखाया है लेकिन यह कोई जरूरी नहीं है कि वे राजनीति में भी ऐसा चमत्कार कर पाएंगे। दरअसल वे योग के माध्यम से प्राप्त राष्टीय ख्याति को राजनीति में भुनाना चाहते हैं। फिर भी उनकी कोशिश यकीनन समाज की बेहतरी के लिए है। इस अर्थ में उनके अभियान का स्वागत किया जाना चाहिए। लेकिन उन्होंने कुछ ऐसी बातें कही हैं जिन पर बहस की जा सकती है। मसलन उन्होंने कहा है कि यदि सरकार ने विदेशी बैंकों में जमा अकूत काला धन देश में वापस लाने के साथ-साथ भ्रष्टाचार, महंगाई और खनिजों के अवैध खनन के खिलाफ ठोस कार्रवाई नहीं की तो उनके नेतृत्व में लाखों लोग मिस्त्र् की तरह सडकों पर उतरकर आंदोलन करेंगे। इस बयान के संदर्भ में बाबा रामदेव से यह सवाल पूछा जाना चाहिए कि मिस्त्र् की तरह आंदोलन का क्या अर्थ है? क्या भारत में किसी तानाशाह की सरकार है? क्या यहां मिस्त्र् की तरह आपातकाल लागू है? क्या देश में नागरिक अधिकारों को कुचला जा रहा है? क्या भ्रष्टाचार, बेरोजगारी एवं महंगाई की समस्या इतनी भीषण है कि लोग गुस्से में हैं तथा कानून-व्यवस्था हाथ में ले रहे हैं? क्या पूरे देश में अराजकता का माहौल है तथा संसद मूकदर्शक बनी हुई है? अगर ऐसा नहीं है तो मिस्त्र् की जनक्रांति का उदाहरण देने का क्या अर्थ है? मिस्त्र् में नागरिक अधिकारों को कुचला जा रहा है, वहां हुस्नी मुबारक 30 वर्षों से गद्दी पर बैठ हुए हैं, वहां बेरोजगारी, भ्रष्टाचार एवं महंगाई की वजह से लोगों का जीना मुहाल हो गया है, जब पानी सिर के ऊपर से गुजरने बेताब नजर आया तब वहां जनता सडकों पर उतर आई. इससे स्पष्ट है मिस्त्र् में शांतिपूर्ण जनक्रांति के पीछे कारण कुछ और हैं। लेकिन भारत में तो लोकतान्त्रिक शासन व्यवस्था है। आजादी के बाद लोकतंत्र की जडें और भी मजबूत हुई हैं। जिस महंगाई, काले धन एवं भ्रष्टाचार के लिए रामदेव जनक्रांति का सपना देख रहे हैं, वह पूरे विश्व की समस्या है। अमेरिका सहित सभी छोटे-बडे देश इससे जूझ् रहे हैं। यद्यपि विश्व के देशों का हवाला देकर भारत अपनी कमजोरी को छिपा नहीं सकता पर इस बात पर गौर करने की जरूरत है कि केन्द्र एवं राज्य सरकारें इन समस्याओं पर नियंत्रण पाने के लिए प्रभावी कदम उठा रही हैं अथवा नहीं? केन्द्र सरकार ने 2जी स्पेक्ट्रम, आदर्श हाउसिंग सोसाय्ाटी, कामनवेल्थ गेम्स जैसे बडे घोटालों के खिलाफ कार्रवाई शुरू की है। विदेशी बैंकों में जमा काले धन के मामले में भी सरकार ने कदम उठाए हैं तथा महंगाई को कम करने के उपायों पर भी केन्द्र एवं राज्य् सरकारें कदम उठा रही हैं। यह अवश्य है कि इन मुद्दों पर जनता एवं जनप्रतिनिधियों का दबाव बना रहेगा तो सरकार ढिलाई नहीं बरत पाएगी। इसलिए बाबा रामदेव को मिस्त्र् की जनता की तरह सोचने एवं पहल करने की जरूरत नहीं है अलबत्ता सरकार पर नैतिक दबाव बनाने के अन्य उपायों पर अवश्य विचार करना चाहिए।

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