राष्ट्रीय|2012/02/18 4:04 pm

यूपी के चुनावी रंगमंच पर नेताओं की नौटंकी

कहा जाता है कि दुश्मनी में भी एक अंदाज़ होना चाहिए परन्तु आजकल राजनीति में ऐसी बात कहाँ ? एक वो समय था जब विपक्ष में बैठे लोग पक्ष वालो को दुर्गा कह संबोधित करते थे. समय बदला, समाज बदला, समाज की सोच बदली फिल्मो टीवी से हिंसक प्रवृत्ति को बल मिला, सरकारी असंवेदनशीलता ने उसे खाद पानी दिया. रमैय्या वस्ता वैय्या के शहरी नायक कब भाग डी के बोस गाने लगे पता ही नहीं चला, मगर वे बदलते समाज का आइना जरूर बन गयी.

समाज के तरह ही राजनीति भी बदल गयी, एक समय था जब लोग राजनीति में , दूसरो के हक सम्मान के लिए लडते थे पर शायद अब लगता है लोग एक दूसरे को नीचा दिखाने के लिए ज्यादा समर्पित है . इसकी बड़ी मिसाल संसद में हुडदंग, राजनेताओ के द्वारा अभद्र भाषा व् सरकारी अधिकारियो पर सार्वजनिक फटकार-प्रहार, विपक्षियो की पिटाई जैसे वाकये जो इतने आम हो गए है की हमने चौंकना भी छोड़ दिया है . किसी भी नेतृत्व से शालीनता का व्यवहार ना केवल अपेक्षित है वरन संसदीय परंपरा के दूरगामी स्थायित्व के लिए भी जरूरी है. फ़्रांसिसी दार्शनिक विक्टर ह्यूगो ने फरमाया भी है की तीखें और सख्त शब्द मुद्दों की कमजोरी को दर्शाते है.

चुनावों में हमेशा से ऐसा ही होता रहा है ऐसा नाहे है पहले चुनावी मुद्दे और नारे लोकसंवाद पर ज्यादा हावी रहतें थे पर इतिहास गवाह है जब भी मुद्दों से भटक राजनीति व्यक्तिवादी हुई है लोगो को चुनावों में निराशा ही हाथ लगी है. अगर मोरारजी भाई ने 1971 में इंदिरा हटाओ कहा तब इंदिरा ने बिना किसी व्यक्तिगत पलटवार के अपने अगेंडे में गरीबी उन्मूलन को आगे रख कर जनता से पूछा “मैं कहती हूँ गरीबी हटाओ, वे कहतें है इंदिरा हटाओ, अब फैसल आप कीजिये” जाहिर है वे सफल हुई. अगर सोनियाजी मोदी को ‘मौत का सौदागर’ नहीं बना पायी या पिछलें लोकसभा चुनावों में आडवाणी जी, प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को ‘कमजोर प्रधानमंत्री’ नहीं बना पाए तो इसका श्रेय मुद्दों की जगह व्यक्तिगत प्रहार ही था.

rahul gandhi_up election_muslim reservation

एंग्री यंग में की भूमिका में राहुल

इस बार का तो सारा कांग्रेस पार्टी का प्रचार राहुल गांधी को महानायक अमिताभ की तरह एंग्री यंग मैन बनाए जाने में लगा है उन्हें खुद भी इसमें मजा आ रहा है. “जवाब हम देंगे” , “उठो जागो बदलो”,”सबके सुरक्षा सबको न्याय, गौरवगाथा का नया अध्याय”, “घर के लुटी लाज, दम तोड़ती सांस, पटरी से उतरे विकास का अब एक एक बात का जवाब हम देंगे” जैसे आक्रामक नारों से शुरू हुई है साथ ही पोस्टरों में गांधीवादी तेवरों से इतर राहुल की गुस्से वाली फोटो का प्रयोग नवयुवको की हताशा व् गुस्से से उन्हें जोड़ने के लिए क्या गया है.अभियान के मुख्य नारा ‘जवाब हम देंगे’ से उसी गुस्से को केंद्रीकृत कर युवाओ के सवालों के साथ जोड़ा है. यहाँ तक तो सब ठीक था पर राहुल ने 14 नवम्बर को ही यूपी की उबाल मार रही राजनीति में ‘यूपी के अप्रवासियो को भिखारी’ कह कर तडका मार दिया. पूर्व में बबलू, युवराज, अमूल बेबी नाम से विरोधियो द्वारा पुकारे जाने वाले राहुल का ठीक बाल दिवस पर अपने को एंग्रीमैन अवतार में ढालकर विज्ञापन के एक महत्व पूर्ण सिद्धांत टीसर कैम्पेन या चुभाकर ध्यानाकर्षित करने के अभियान को अपनी चुनावी रणनिति का हिस्सा बना लिया. उसी योजना के तहत उन्होंने यूपी के अप्रवासियो को भिखारी जैसी चुभने वाली बात कर वस्तुतः कांग्रेस नाम के ब्रांड को इमोशनल कर बेचने का प्रयास किया, जबकि वे बड़ी सफाई से इस बात को छुपा गए की वे यूपी के युवको का भाग्य बदलेंगे कैसे ? उसके बाद अमेठी में प्रियंका ने पुनः इस बात को दोहरा दिया जिसपर बीएसपी ने उछाल दिया कि क्या दोनों भाई बहन के पास अलादीन का चिराग है जो पांच साल में यूपी को बदल देंगे.वैसे ये भड़काऊ भाषण की चाल महज़ कांग्रेस भाजपा, बसपा, सपा के मुकाबले को बसपा कांग्रेस के बीच बनाने का प्रयास था.

१५ फरवरी को लखनऊ रैली में जिस तरह उन्होंने युवाओं को संबोधित करते समय जिस तरह एक कागज़ को प्रतीकात्मक रूप से विपक्ष के चुनावी वायदों की लिस्ट के रूप में फाड़कर विपक्षियो के झूठे वादों पर आक्रमण किया उससे उन्होंने युवाओं के गुस्से को भुनाने का प्रयास तो कर लिया पर साथ ही एक व्यक्तिगत बहस भी शुरू करवा दी.

उमाभारती के चरखारी से चुनाव लड़ने के घोषणा पर, राहुल गांधी ने पूछा कहाँ थी ये ?? जब जरूरत थी तब कहाँ थी?? मगर चुनाव का समय हुआ, 15 दिन बचे तब आ गई, मध्यप्रदेश से तो निकाल दिया था दी गयी है.राष्ट्रमंडल खेलों के घोटाले पर, 2जी स्पेक्ट्रम के घोटाले पर, सीवीसी की नियुक्ति पर और अन्ना हज़ारे के अनशन पर चुप रहने वाले राहुल गाँधी के इन सवालों पर उमा ने भी पलटवार करते हुए कहा “उनकी माँ रोम की है मैं फिर भी मध्य प्रदेश की हूँ ,राहुल गांधी को अपनी माँ की बैकग्राउंड याद रखना होगा तभी अपनी बुआ पर टिपण्णी करनी चाहिए”. उमा भारती यही नहीं रुकी और कह डाला “मध्यप्रदेश में उनके गुरुदेव दिग्विजय सिंह को धुल चटाई है, वही हाल मैं इन गुरु- चेले का यहाँ करूंगी” जिस पर दिग्वविजय ने उमा के हाल के राजनैतिक सफ़र पर व्यंग्य कर दिया “वो जिस पार्टी में जाते है उस पार्टी का कुंडा करके जाती है और यूपी में नेता के अभाव में आयात की गयी है”.

 

दिग्विजय सिंह ने तो मानो पिछले कुछ सालो में शब्दों के बाण चलाने में महारत हासिल कर ली है फिर चाहे अन्ना आन्दोलन का हस्र बाबा रामदेव सरीखा करने की बात हो या ओसामा ‘जी’ कहने की, एक वरिष्ठ पत्रकार कहतें है की दिग्विजय सिंह कांग्रेस की ऐसी अनगाइडेड मिसाइल हैं , जो कब कहां फट जाए , कहना मुश्किल है . कब क्या बोल जाएं , इसका अंदाजा किसी को नहीं होता है.

वैसे चुनावों के ठीक पहले सरकार विरोधी लहर और विरोधियों के लगातार हमले से परेशान चली रही बसपा सुप्रीमो मायावती ने चुनाव आयोग के हाथी ढंकने के फैसले पर भावनात्मक राजनीति शुरू कर दी अपने जन्मदिन पर व्यंगात्मक लहजे में मीडिया को धन्यवाद करतें कहा कि विज्ञापन पर करोड़ों रुपए खर्च करने के बावजूद पार्टी को इतना प्रचार नहीं मिलता, जितना इससे मिला साथ ही नारा दिया ” खुला हाथी लाख का और बंद हाथी सवा लाख का”. जो आज सलमान खुर्शीद से लेकर बेनी बाबू कर रहे है सलमान साहब के ९% मुस्लिम आरक्षण के वायदे पर चुनाव आयोग के विरोध बावाजूद उन्होंने कहा ” चुनाव आयोग उन्हें फांसी पर ही क्यों न लटका दे लेकिन वो अल्पसंख्यकों को उनका हक दिलवाकर रहेंगे”, तो कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह और केंद्रीय कानून मंत्री खुर्शीद की उपस्थिति में उसी कायमगंज में बेनी बाबू ने कहा, ‘मुस्लिमों के लिये आरक्षण बढ़ाया जाएगा और अगर निर्वाचन आयोग चाहता है तो वह मुझे नोटिस जारी कर सकता है।’

भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी अपनी गली मोहल्ले वल्ले भाषा का अपने मंच से इस्तेमाल करते रहे है अभी हाल ही में औराई विधानसभा क्षेत्र में वे कह रहे थे की “इधर गधे-उधर गधे, सब तरफ गधे ही गधे, अच्छे घोड़ों को नहीं घास और गधे खा रहे हैं च्यवनप्राश “.वे बार बार कह रहे है की “कांग्रेस मां-बेटे की पार्टी है, राहुल के कागज़ फाड़ने पर उन्होंने बोला की “राहुल गांधी को देश का प्रधानमंत्री तो बनाना चाहती हैं, पर क्या फायदा होगा? वह आज कागज फाड़ रहे हैं, कल कपड़ा फाड़ेंगे” इस विवाद पर मुलायम ने शालीनता दिखाते हुए कहा “राहुल गांधी अभी बहुत छोटे है “. इससे पहले ऐन चुनावों से पहले भाजपा के मुखपत्र कमल संदेश में राहुल गांधी आड़े हाथों लेते हुए कहा गया था की कि कांग्रेस के युवराज अपनी शादी ने होने से काफी दुखी हैं।तब कांग्रेस ने भी भी बीजेपी के पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी पर पर चुटकी लेते पूछा की भाजपा को पहले यह बताना चाहिए कि क्या वाजपेयी भी शादी नहीं होने से दुखी थे?

उत्तर प्रदेश में जारी विधानसभा चुनावों के बीच राजनैतिक दलों की ज़ुबानी जंग जब शबाब पर है,तो अराजनैतिक लोग कहा पीछे रहने वाले थे बाबा रामदेव भी इन चुनावों में कांग्रेस के विपक्ष में है वे कह रहे है “एक ही परिवार देश की राजनीति में काबिज़ होकर देश को लूटने में लगा है. उत्तर प्रदेश का चुनाव धर्मयुद्ध है” तो राहुल उनको जवाब देते हुए पूछ रहे है की “रामदेव जी अपने कुछ लोगों को काले झंडे लेकर मेरी जनसभा में भेज देते हैं। मुझ पर जूता मारने के लिए कहते हैं, पर मैं किसी से नहीं डरता” इस पर रामदेव ने कहा कि, राहुल बचकानी बातें ना करें ये बाते यही समाप्त नहीं हुई. बाबा रामदेव ने एक कदम आगे बढ़ अपने मंच पर गरीब बच्चो को खड़ा कर प्रियंका की नक़ल उतारते हुए चुटकी ली तो, वाराणसी के जाल्हुपुर के रैली में ‘आकाश’ नाम के बच्चे को चाकलेट देकर और जनता को आकाश की बुलंदिया दिखाकर राहुल गांधी ने उसका प्रतिउत्तर दिया.बाबा रामदेवजी चुनावों में मुद्दों की जगह व्यक्तिगत मसले को उठा रहे है जिसको अन्ना आन्दोलन में करके कांग्रेस के कई प्रवक्ता अपनी छवि धूमिल कर चुके है.

ये भी सच है की राहुल के सरल भाषण सिर्फ और सिर्फ ज़मीनी मुद्दे उठा रहे है तो वही बसपा प्रमुख मायावती अपने दलित वोट बैंक को समझा रही है की समाजवादी पार्टी का मतलब है ‘जंगल राज’ की वापसी, कांग्रेस का मतलब पलायन और ग़रीबी, भाजपा का मतलब हुआ कि सांप्रदायिक और सामंतवादी शक्तियाँ, तो भाजपा भी रामराज व राममंदिर के पुराने वायदों से लुभा रही है. सलमान, बेनी और दिग्विजय आजमगढ़ के नवयुवको की बाटला मुठभेड़ को मुद्दा बना रहे है तो कुछ लोग मुसलमानों के अलग फिरको में ही ज़ुबानी जंग करवा रहे है.

 

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