नक्सलियों के खतरनाक इरादों का जैसा उल्लेख केंद्रीय गृहसचिव ने किया उससे यह साफ हो जाता है कि अभी तक एक बड़े खतरे की जानबूझकर अनदेखी की जा रही थी। आखिर यह एक तथ्य है कि पी चिदंबरम के गृहमंत्रालय का कार्य भार संभालने के पहले तक नक्सलियों को भटके हुए भाई बताने के साथ उन्हें समझा-बुझाकर रास्ते पर लाने का सपना देखा जा रहा था। आम जनता को चिदंबरम का शुक्रगुजार होना चाहिए कि उन्होंने एक भीषण खतरे के प्रति आंखें खोलने का काम किया, लेकिन यह कहना कठिन है उन लोगों की आंखें वास्तव में खुलेंगी जिनकी सक्रिय मदद के बगैर नक्सलियों से निपटना कठिन है। नक्सलवाद से ग्रस्त ज्यादातर राज्य सरकारें नक्सलियों से निपटने के नाम पर जिस प्रकार नित-नए बहाने बना रही हैं उससे तो यही लगता है कि वोट बैंक के लोभ में देशहित को ताक पर रख दिया गया है। हालांकि नक्सली संगठन दिन-प्रतिदिन आक्रामक और दुस्साहसी होते जा रहे हैं, लेकिन बिहार, झारखंड और पश्चिम बंगाल की सरकारें ऐसा व्यवहार कर रही हैं जैसे नक्सलवादियों का खूनी उत्पात सहन करने योग्य है। इन राज्यों के मुख्यमंत्री दिल्ली आकर कुछ कहते हैं और वापस लौटकर कुछ और। उनका यह रवैया नक्सलियों को बल प्रदान करने वाला है। उन्हें बल प्रदान करने का काम वे कथित बुद्धिजीवी भी कर रहे हैं जो इस या उस बहाने पुलिस-प्रशासन को तो कोसते हैं, लेकिन नक्सलियों की बर्बरता पर मौन धारण कर लेते हैं। यह साफ है कि नक्सली सरकार से वार्ता के कतई इच्छुक नहीं, लेकिन कथित मानवाधिकारवादी यही रट लगाए हुए हैं कि केंद्र सरकार को उनसे बात करनी चाहिए। चूंकि नक्सली देशद्रोह पर आमादा हैं इसलिए उनके प्रति नरमी बरतने का कोई औचित्य नहीं।
नि:संदेह ऐसे सवाल देश को गुमराह करने वाले हैं कि अब क्या सरकार अपने ही लोगों यानी नक्सलियों पर गोलियां चलाएगी? क्या वे लोग देश के नागरिक नहीं हैं जिन्हें नक्सली निशाना बना रहे हैं? ध्यान रहे कि वर्ष 2009 में नक्सलियों ने नौ सौ से अधिक लोगों को मारा है। यह शासन में बैठे लोगों के शुतुरमुर्गी रवैये का प्रमाण है कि नक्सली धीरे-धीरे तालिबान सरीखी ताकत में तब्दील हो रहे हैं और फिर भी राज्य सरकारें खतरे की गंभीरता का अहसास नहीं कर पा रही हैं। क्या यह सामान्य बात है कि नक्सलियों ने करीब 40 हजार वर्ग किमी इलाके पर कब्जा कर लिया है और वे अवैध तरीके से 14 सौ करोड़ रुपये सालाना कमाई कर रहे हैं? इस पर आश्चर्य नहीं कि वे 2050 तक देश में कब्जा करने का ख्वाब ही नहीं देख रहे, बल्कि उसे पूरा करने का भी इरादा रखते हैं। लगता है कि उनका यह इरादा देश के नीति-नियंताओं को झकझोरने के लिए पर्याप्त नहीं, क्योंकि केंद्रीय गृहसचिव के चौंकाने वाले खुलासे पर वैसी प्रतिक्रिया नहीं हुई जैसी अपेक्षित थी। एक अनुमान के अनुसार यदि नक्सलियों के खिलाफ कोई सघन अभियान छेड़ा जाए तो उन्हें पस्त करने में कम से कम सात-आठ वर्ष लगेंगे। अब क्या इसका इंतजार किया जा रहा है कि नक्सली और अधिक ताकतवर हो जाएं? यदि नहीं तो नक्सलवाद से ग्रस्त राज्य सरकारें नक्सलियों से दो-दो हाथ करने आगे क्यों नहीं आ रहीं?
Author: सुमित श्रीवास्तव
पाटलिपुत्र के मूल निवासी हैं| पत्रकारिता और सामाजिक में गहरी रूचि होने के कारण छात्र जीवन से ही दोनों क्षेत्रों में सक्रिय हैं| इंजीनियरिंग करने के बाद एनिमेसन में पढाई की है| वर्तमान में सुमीत श्रीवास्तव www.janokti.com के उप-संपादक हैं| www.rashtriyaswabhimaan.org के हिंदी संस्करण के प्रधान संपादक है, और साथ में लोकतंत्र दर्पण के संपादक का दायित्व है|
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नक्सलवादियों का नाम आते हीं लोग मानव अधिकारों का भोंपू लेकर चिल्लाना शुरू कर देते हैं . सामाजिक विषमता , जातिगत भेद-भाव आदि का हावाला देकर उनके हिंसागत कदमों का समर्थन करते हैं जबकि सरकारी प्रतिक्रिय्यात्मक हिंसा उन्हें हिंसा और गैर मानवीय लगती है ! अब जरा कोई इनसे पूछे की बिहार के जमुई जिले के १५ गारीं आदिवासियों ने कौन सा पूंजीवाद फैला रखा था जिसकी कीमत उन्हें अपनी जान से चुकानी पड़ी ? और आश्चर्य तब होता है जब इनमें से में अधिकांश लोगों के निजी जीवन में इन बातों से कोई सरोकार नहीं होता . दुनिया में दो ही जाति अर्थात “अमीर और गरीब ” होती है , का ढोल पीटने वाले वामपंथियों को देखकर हंसी आती है जब वे अपने नाम के आगे पाण्डेय , शर्मा, झा , करात , सिंह आदि लगाकर खुश होते हैं ! और भी कई बातें हैं जो भारत के वामपंथियों की पोल खोलते हैं . भारत में नाक्साल्वाद / माओवाद एक तरह से मफिओं ,नेताओं और विदेशी ख़ुफ़िया एजेंसियों के इशारों पर चल रहा है जिस पर अंकुश लगाना भारत सरकार का सबसे महत्वपूर्ण लक्ष्य होना चाहिए /