राष्ट्रीय|Shortlink: 2010/03/07 11:32 pm

नक्सल-वार्ता का औचित्य

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  • जयराम "विप्लव"

    नक्सलवादियों का नाम आते हीं लोग मानव अधिकारों का भोंपू लेकर चिल्लाना शुरू कर देते हैं . सामाजिक विषमता , जातिगत भेद-भाव आदि का हावाला देकर उनके हिंसागत कदमों का समर्थन करते हैं जबकि सरकारी प्रतिक्रिय्यात्मक हिंसा उन्हें हिंसा और गैर मानवीय लगती है ! अब जरा कोई इनसे पूछे की बिहार के जमुई जिले के १५ गारीं आदिवासियों ने कौन सा पूंजीवाद फैला रखा था जिसकी कीमत उन्हें अपनी जान से चुकानी पड़ी ? और आश्चर्य तब होता है जब इनमें से में अधिकांश लोगों के निजी जीवन में इन बातों से कोई सरोकार नहीं होता . दुनिया में दो ही जाति अर्थात “अमीर और गरीब ” होती है , का ढोल पीटने वाले वामपंथियों को देखकर हंसी आती है जब वे अपने नाम के आगे पाण्डेय , शर्मा, झा , करात , सिंह आदि लगाकर खुश होते हैं ! और भी कई बातें हैं जो भारत के वामपंथियों की पोल खोलते हैं . भारत में नाक्साल्वाद / माओवाद एक तरह से मफिओं ,नेताओं और विदेशी ख़ुफ़िया एजेंसियों के इशारों पर चल रहा है जिस पर अंकुश लगाना भारत सरकार का सबसे महत्वपूर्ण लक्ष्य होना चाहिए /

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