राष्ट्रीय|2011/06/05 6:14 pm

कब तक जन भावनाओं को कुचलती रहेगी कांग्रेस सरकार ?

बाबा रामदेव के नेतृत्व में भ्रष्टाचार और काले धन के खिलाफ रामलीला मैदान में जारी मुहिम के एक दिन पहले फाइव स्टार व्यवस्था को लेकर मीडिया में काफी चर्चा रही, लेकिन गर्मी से बेहाल भूखे पेट पसीना पोछते रिपोर्टरों को देखकर सारे चैनलों से फाइव स्टार का सगूफा गायब हो गया। वहीँ दूसरी तरफ अन्ना हजारे के आन्दोलन से रामदेव की मुहिम की तुलना करने वाले तथाकथित बुद्धजीवियों के चेहरे पर उस समय हवाईयां उड़ने लगी जब अनशन स्थल पर एक दिन पहले ही पचास हज़ार से अधिक लोगों का हुजूम उमड़ पड़ा।
इस अनशन की सबसे महत्वपूर्ण बात तो यह रही कि रामदेव की आगवानी करने कांग्रेसनीत यूपीए सरकार के चार-चार वरिष्ठ मंत्री हवाई अड्डे पर पहुँच गए। इससे कांग्रेस का कमीनापन उसी समय समझ में आ गया। साथ ही कांग्रेस के बड़बोले मनीष तिवारी और दिग्विजय सिंह जैसे सोनियां के चमचों को अपनी ही पार्टी के कुकृत्यों से शर्मिंदा होने का अवसर पहली बार देखने मिला। ऐसे में दिग्गी राजा को हिस्टीरिया का दौरा आना लाजमी था, सो उन्होंने रामदेव के बारे में कसीदे कसना शुरू कर दिया।
इस दौरान अनशन की हवा निकालने में जुटी शर्मनिरपेक्ष ताकतों और बिके हुए मीडिया घरानों का पहला निशाना बनी बाबा रामदेव के मुहिम का समर्थन करने मंच पर पहुंची ऋतम्भरा… जिनके ऊपर साम्प्रदायिक होने का आरोप लगाकर न्यूज़ रूम में बुद्धजीवियों और समाज सेवियों का एक पैनल चर्चा करने में जुट गया।सेकुलरिज्म का चश्मा पहने इन महान विभूतियों की पारदर्शी नज़र में अन्ना हजारे के मंच पर नक्सलियों का दलाल अग्निवेश समाज सेवी दिखता है और वात्सल्य ग्राम वाटिका में अनाथ बेसहारा बच्चों को सहारा देने वाली साध्वी साम्प्रदायिक।
अन्ना और रामदेव की मुहिम के दौरान एक अंतर और देखने को मिला। अन्ना के मुहिम को फ़िल्मी जगत के बड़े-बड़े निर्माता निर्देशकों और अभिनेताओं से लेकर एलीट वर्ग तक का समर्थन मिला….जबकि रामदेव को देश के किसान, मजदूर और माध्यम वर्गीय लोंगों का साथ और आत्मविश्वाश मिला। लेकिन इतना जरुर है कि बाबा की आलोचना शाहरुख़ खान और सलमान खान जैसे देश भक्त कलाकारों ने की। एक तरफ अन्ना हजारे के मंच पर चौबीसों घंटे प्रख्यात वकील (दलाल) शांति भूषण, एनजीओ किंग अरविन्द केजरीवाल और किरण वेदी समेत सिविल सोसाईटी के नुमायिंदे नज़र आ रहे थे तो राम देव के मंच पर संत और विभिन्न धर्म के गुरु नज़र आ रहे थे।
अब बात करतें है असली ड्रामे की…. शांति पूर्वक चल रहे अनशन में उस वक्त अशांति फैली जब केंद्र सरकार के वरिष्ठ मंत्री कपिल सिब्बल ने प्रेस कांफ्रेंस कर पत्रकारों को रामदेव के साथ हुए तथाकथित समझौते की चिठ्ठी पढकर सुनाई। रामदेव से सरकार के साथ हुए समझौते की बात देर रात तक मीडिया में सुर्खिया बनी रही।सरकार की सफलता और अनशन की विफलता की बात सोचकर कई कांग्रेस भक्तों के चेहरे की लालिमा अचानक ही बढ़ गयी। उनके चेहरे की दिगविजयी मुस्कान छुपाये नहीं छुप रही थी। लेकिन इस वक्त एक प्रश्न जो सबकी जेहन में था वो था सरकार की चतुराई भरी रणनीति।
अचानक आधी रात को रामलीला मैदान में रामण लीला का दृश्य कहा से उभर कर आने लगा। अपने काले कारनामों और नापाक मंसूबों को अंजाम देने के लिए सरकार के इशारे पर करीब पांच हज़ार से भी अधिक पुलिस के जवानों ने रात के दो बजे रामदेव सहित सभी सत्याग्रहियों को घेरकर बर्बरता पूर्वक पीटना शुरू कर दिया। इसके बावजूद भी जब अनशनकारी नहीं हटे तो पंडाल में आग लगाकर आंशू गैस छोड़े गए। अपनी बर्बरता का नमूना पेश करते हुए पुलिस वाले बाबा रामदेव को बेरहमी से खीचते हुए उठा ले गए। रामलीला मैदान में दो दिनों से भ्रष्टाचार के खिलाफ इस मुहिम में उमड़े जनसैलाब की भावनावों के साथ जिस तरह पुलिस वालों ने बलात्कार किया उसका उदहारण भारतीय लोकतंत्र को शर्मशार करने के लिए नाकाफी है।
देश में इतनी बड़ी घटना हो गयी…इस दौरान जिस कांग्रेस त्रिगुट (सोनिया, राहुल और मगनमोहन) के इशारों पर यह सत्ता के लोभ में गन्दा खेल खेला जा रहा है उनकी तरफ से अभी भी कोई बयान नहीं आया। इससे यही लगता है कि इस देश में रामदेव जैसे लोगों की जगह नही है यहाँ अलगाववादियों और नक्सलवादियों द्वारा किए गये विरोध को ही तबज्जो दी जाती है। क्या आने वाले समय मे लोग आतंकवादियों, नक्सलवादियों का समर्थन कर अपनी माँग मनवाने के बारे मे सोचेंगे? जिस तरह से रामदेव को प्रताड़ित करने साजिश की गई है उससे तो यही लगता है। लोकतंत्र का तो गला घोटा गया है और केंद्र सरकार को कोई अफ़सोस नही है, उल्टा रामदेव को ठग कह रही है।
आखिर भ्रष्टाचार और काले धन के मामले पर सत्ता में बैठे राजा-रानी और युवराज़ जनता की भावनाओं को कब तक कुचलेंगे। कब तक हम अन्ना और रामदेव रूपी बैसाखी के सहारे इनसे लड़ते रहोगे। उठो जागो और लक्ष्य प्राप्ति तक लड़ते रहो….

2 Comments

  • भाजपा का निकम्मापन तो इसी बात से जाहिर होता है कि जो काम विपक्ष में बैठे सांसदों को करना चाहिए वो काम संत और समाजसेवी कर रहे हैं। इतना ही नहीं अन्ना और रामदेव छाप अनशनों में जनता का भरपूर समर्थन भी मिल रहा है। इनकी अकर्मण्यता इस कदर हो गयी है कि भ्रष्टाचार, मंहगाई और काले धन जैसे राष्ट्रीय मुद्दों को भुनाने की छमता ही नहीं बची है। हिन्दुत्व और राष्ट्रवाद तो दूर की बात है। इन वजहों से उसका “वोट बैंक” काफ़ी खिसक चुका है। हालांकि मेरी हमेशा से सोच रही है कि बाबा रामदेव, नरेन्द्र मोदी, गोविन्दाचार्य और आरएसएस से जुड़े जमीनी कार्यकर्ताओं को आगे लाकर एक मजबूत विकल्प बनाये जाये नहीं तो वह दिन दूर नहीं जब बीजेपी जैसा वैचारिक संगठन रसातल में चला जायेगा और जनता अपना विकल्प कहीं और चुन लेगी।

  • भा ज पा वो कम नहीं कर सकती जो बाबा रामदेव या अन्ना हजारे कर सकते हैं. ये उनका निकम्मापन नहीं उनकी सोचने की सीमा है वे सब उतने चंट और चालक नहीं हैं जितने कि कांग्रेसी. फिर वे राजनीती की सीमा से बाहर जाने कि नहीं सोच सकते वोही उनका सबकुछ हैं देश को व्यवस्था परिवर्तन की जरुरत है और उसके लिए ऐसे समाजसेवी चाहिए जो दिन रात गरीब जनता में रहता हो और उनके दर्द समझता हो. ऐसे केवल अन्ना और बाबा ही हैं

Leave a Reply